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Full text of "Ranganatha Ramayana [Hindi]"

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रंगनाथ रामायण 


[ राजा गोनबुद्ध-रचित मूल तेलगू से अन॒दित ] 


ऋचुक/द्क 

श्री ए०,सी० कामसाक्षि राव 
संग्पादुक 
श्रीअवधनन्दन 


हार-राष्ट्रमाषा-परिषद 


पठना 


प्रकार्णेक 
बिहार-राष्ट्रभाषा-परिपद 
पटना 


सर्वस्वत्वाधिकार प्रकाशकाधीन 
१८८२ शकाब्द; २०१७ विक्रमाव्द; १९६१ खुध्टाब्द 
सजिल्द मृल्य ६. ४० 


मुद्रक 
बेदी साधज प्रेस 
रांची 


वक्तव्य 


प्रस्तुत ग्रथ' 'रगनाथ रामायण” को पाठकों के सम्मुख उपस्थित करते हुए हमें 
बडा हर्ष हो रहा है । परिषद्‌ का मूल उद्देश्य जहाँ अधिकारी विद्वानों द्वारा मौलिक 
प्रथों का प्रणयणन कराकर प्रकाशित करना रहा है, वहाँ देश और विदेश की समृद्ध 
भाषाओ के उत्कृष्ट ग्रथो का हिन्दी-अतुवाद कराकर उनके प्रकाशनो से हिन्दी-साहित्य 
की समृद्धि में योगदान भी रहा है । इस प्रकार, परिषद्‌ से अवतक जर्मन भाषा से 
रिचर्ड पिशल-लिखित 'प्राकृत भाषाओं का व्याकरण” तथा फ्रच भाषा से मारिस मेटर- 
लिक-रचित नाटक 'तीलपर्छ/ के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हें । इन दोनो के अतिरिक्त 
सस्कृत-साहित्य से काव्यमीमासा' तथा कथासरित्सागर' (प्रथम खड ) के अनुवाद 
मूल सस्क्ृत के साथ भी परिषद्‌-द्वारा प्रकाशित हुए है। 'कथासरित्सागर का दूसरा खण्ड 
इसी साल प्रकाणित होनेवाला है और उसके अन्तिम खण्ड का अनुवाद-कार्य सम्पन्न हो 
रहा है । पाइचात्य भाषाओं के साहित्य के अलावा परिषद्‌ ने सविधान द्वारा स्वीकृत 
चौदह भाषाओ और उनके साहित्य पर परिचयात्मक निवन्ध उन-उने भाषाओं के अधि- 
कारी विद्वानों से लिखवाकर, उनके सगम्रह के रूप में चतुर्देश भाषा-निवन्धावली' प्रकाशित 
क्री है । तदुपरान्त भारत की प्रमुख लोकभाषाओ में से पन्द्रह लोकभाषाओ और उनके 
साहित्य पर निवन्‍्ध लिखवाकर पचदश लोकभापा-निवन्धावली' नाम का सग्रह प्रकाशित 
कियः हुँ। उपर्थक्त पुस्तकों का हिन्दी-ससार में अच्छा स्वागत हुआ--यह हमारे लिए 
प्रसन्नता की बात हैं । 


किन्तु, भारतीय भाषाओं के साहित्य से अनुवाद द्वारा हिन्दी-भाण्डार को भरने 
की दिशा में परिषद्‌ ने सकल्प किया था कि सर्वप्रथम दक्षिण भारत की चार--तमिल, 
तेलुगु, कन्‍्तड और मलयालम--भाषाओ के साहित्य से एक-एक ग्रय॒ चुनकर अनूदित 
कराया जाय। तदनुसार ही तमिल' और तेलुगु के एक-एक ग्रथ॒ और उसके अनुवादक 
का चुनाव किया गया और अनुवाद के काम सौपे भये। इस योजना में हमें तेलुगु की 'रग- 
नाथ रामायण' के अनुवाद की पाण्डुलिपि सबसे पहले प्राप्त हुई और आज हम उसी 
रामायण को आपके सामने उपस्थित करने में समर्थ हो सके हैँ । हमें प्रसन्नता हैं कि 
इसके बाद ही हम तमिल का 'कब रामायण' का हिन्दी-अनुवाद भी यथाज्षीघ्र प्रकाशित 
कर हिन्दी-ससार के सामने रख सकेंगे। 

मूल रगनाथ रामायण” के सौष्ठद के सम्बन् में मं [स-विश्वविद्यालय के विद्वानू 
गैडर तथा तेलुगु-विभाग के अध्यक्ष श्रीनिडदवोलु वेंकट राव ने अपने परिचय में जो 
उद्गार प्रकट किये हे, वे इसी ग्रथ में अन्यत्र देखने को मिलेंगे । फिर, इस ग्रथ के 
अनुवादक श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने भी, अपनी भूमिका में, तेलुगु-साहित्य का विवेचन करते 
हुए इस ग्रथ की महत्ता पर जो कुछ प्रकाश ड़ाला है, वह अलम्‌ है । उसके बाद इस 


( ४ ) 


पम्बन्ध में और कुछ लिखना पिप्टयेषण ही होगा। हम तो कवल इतना ही कहग कि 
दक्षिण भारत के प्राचीन एवं मूर्वन्य साहित्य की गरिमा एव्र आभा से हिन्दी-साहित्य 
के भाण्डार के भरने की दिग्षा में हमारा यह विनम्र अनुप्ठान नगण्य न समझा जायगा। 


इस अवसर पर हम सबसे पहले श्री म० सत्यनारायण को साथुवाद दिये विना 
नहीं रह सकते कि उन्होने परिषद्‌ को इस दिग्या में अपने विचार और सुझाव दकर 
अत्यधिक उत्साहित किया है । प्रारभ में हमें उनका सहयोग न प्राप्त होता, तो शायद 
हम -इस ग्रंथ को तना शीघ्र प्रकाण में न ला सकते । साथ ही हम दक्षिण भारत के 
गाँवनगाँव में हिन्दी की घूनी रमानेवाले श्रीअवधनन्दनजी के कृपापूर्ण सहयोग और 
साहाय्य को शब्दों में वाँवना नही चाहते । इसम रचमात्र भी अत्युक्ति नहीं कि उनके 
प्रयत्त का ही यह परिणाम हैं कि हम इस अनुवाद को हिन्दी-जगत्‌ के सामने ला सके हें। 
उन्होने अनुवादक से सारी पाण्डुलिपि प्राप्त कर पढ जाने की कृपा की, साथ ही सम्पादन 
भी यथासाध्य किया। निसकोच रूप से हम यह कह सकते हें कि इस कार्य 
में साहित्य के प्रति उनका अदम्य उत्साह और परम पवित्र निप्ठा गौरव एवं ध््प्या की 
वस्तु है । हम श्रीनिडदवोलू वेंकट राव के प्रति अतिशय क्ृतज्ञ हें कि उनका परिचय 
हमें इस ग्रथ के लिए उपलब्ध हो सका । अनुवादक और सम्पादक के साथ-साथ हम 
उनका भी आभार स्वीकार करते हे, जिनका साहाय्य हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त 
हो सका हूँ । 


आजा हैँ, सुधी पाठकों को रमनाथ रामायण के अनुशीलन से प्रसन्नता होगी और 
वे देंख सकेंगे कि वाल्मीकि रामायण एवं तुलसीदास के रामचरितमानस से यह किन- 
किन वातो में एक और किन-किन वातों में भिन्न है, और यह अनुभव करेंगे कि भाषा 
और वेश-भूषा की भिन्नता होते हुए भी हमारे सम्पूर्ण देश की मूल सस्कृृति किस प्रकार 
सर्ववा एक, अभिन्न ए अखण्ड हैँ | 


७-२-६१ मुवनेश्वरनाथ मिश्र माधव 
सचालक 


प्रस्चिय 


तेल्गु-साहित्य में राम-कथा को अग्रस्थान प्राप्त हुना हूं; और आज तेलुगु में 
रामकथा से सत्रधित रचनाओ की संख्या लगभग तीन-चार सौ तक हूँ। पुराण, प्रवध, 
द्विपद, शतक, वचन, यक्षगान, दंडक, पद, गोत एवं सकीत्तंन--मतरूव यह कि आज 
तल्गु में महाकाव्य जैसे शास्त्रीय रूप से अपढ़ प्रामीण जनता के द्वारा गाये जानेवाले 
लोकगोौतो तक में रासकथा उपलब्ध हूँ । साहित्य-रचना के रूप में रामकथा-साहित्य का 
प्रारंभ तेरहवीं सदी में हुआ और उस समय से उस साहित्य की उत्तरोत्तर उन्नति 
होती गई । इस साहित्य को प्रेरणा देवेवालो में भव्राचलूम सें विराजमान श्रीरामचद्ध 
के अनन्यभवत रामदास तथा अमरगायक भ्रक्‍त त्यागय्या सर्वश्रेष्ठ हेँ। 

तेलगु-साहित्य फे सभी युगो में रामकथा विशेष आकर्षण की वरतु रही है। 
भआाज भी जब तेलगु-साहित्य में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ जन्म ले चुकी है और जन्म ले 
रही है, तेलुगु-नाषा के कई प्रसिद्ध आधुनिक कवियो ने रासकथा को श्ञास्त्रीय पद्धति 
पर लिखा है और आज भी कुछ कवि इस कथा फो लिखने में लगे हें। यह इस बात 
को प्रमाणित करता हूँ कि राम-भक्ति तेलगु-जनता के हृदय को ही नहीं, बत्कि उनकी 
प्रतिभा पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी हूँ। प्राच्य तथा प्रतीच्य विद्वन्‌ू रमत्ूण 
फा अध्ययन आधुनिक ढग से करने लूगे हें। अतएवं आधुनिक विचार एवं सास्कृतिक 
परिपाइव की दृष्टि से इस सहाकाव्य की व्याख्या करना आवश्यक हूँ । चूंकि दक्षिण की 
भाषाओं में भो संस्कृत-रामायण को कथा अनुवादों के रूप में अथवा मौलिक रचना के 
रूप में आ गई है, हमें विचार करना होगा कि आय एवं आरयेतर सरकृतियो का समन्वय 
करने में रामायण का क्या स्थान हुँ और रामायण भारत की सामासिक सस्कृति का 
प्रतीक फैसे बनी हुई हू आदि । 

'रंगनाथ रामायण' एक द्विपद-काव्य है, जो तेलुगू की रामकथा-सबधी क्ृतियो 
में अत्यंत्त लोकप्रिय हूँ । उसकी सरल, शुद्ध तथा प्रवाहमयी देशी शेल्ली ने पडित एव 
पामर दोनो को समान रूप से आऊक्रृप्ट किया है। इस कथा के कुछ भाग 'तोलुवोम्म 
लाटा (एक विशेष प्रकार कीं पुतलियों का नृत्य) जैसी लोक-क्ला फः कार्य त्रमो में 
भी गाये जाते हूं और यह इस बात को स्पष्ट करता है कि कवि रास की अमर-पथा 
को तेल्ग्‌-हृदय तक पहुंचाने में किस प्रकार सफल हुए हूँ । 

चूंकि इस कृति का नाम रंगनाथ रामायण है, सहज ही यह भ्रम हो जाता है 
कि इसका कवि 'रगनाथ” नामक कोई व्यक्ति रहा होगा । किन्तु, इस विषय पर 


( ३ ) 


जो झोवष-कार्य हुआ है, उससे यह प्रमाणित हो गया हूं कि तेरहवीं सदी में बूदपुर 
(ऐतिहासिक बोबान नगर) के आसपास राज करनेवाले सूर्यवंत्ी राजा विदृठलराजु के 
क्षादेशानुसार उनके पुत्र गोनवुद्ध राजा से इसकी रचना की ह । इसका उल्लेख कवि 
स्वयं काव्य के प्रारंभ सें कर चुके हे। प्रकाशित एवं अप्रकाशित शिलालेखों के आधार पर 
यह प्रमाणित हो चुका है कि इस काव्य की रचना रूगनग १३८० ई० में हुई थी । 
'रंगनाव रामावर्णा की विज्ञेपता यह है कि उसकी रचना उस समय तक जनता 
में प्रचलित राम-कथा के आवार पर हुई हैँ, जो संस्छृत-रामायण से कई स्थानों में भिन्न हे । 
यद्यपि, रामायण आर्यावरत्त या उत्तराप्य के राजा राम की क्‍या है, तथापि वह 
परंपरायत लोक-क््याओो के रूप में सारे दक्षिण में अति प्राचीच काल से व्याप्त थी। 


अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका हुँ कि दक्षिण की भाषाएँ, तमिल, 
तडुगु, कन्नड और महूयालम--जो संस्कृत भाषा-परिवार से सर्वया भिन्न परिवार की हूँ -- 
अपनी प्रारंभिक अवस्था में संस्छृत से कसी प्रकार का संबंध नहीं रखतो थीं। 
ऐसी दक्षा में यह बाद्या नहीं की जा सक्रती कि इन भाषाओों के दोलनेवाले वाल्मीकि 
रामायण की मूलकथया का ज्ञान प्राप्त करें । उन्होने स्वृलठ रूप में कया को ग्रहण किया 
होगा बीौर सिश्च-भिन्न व्यक्तियों ने भिन्न-भिन्न युगो में उतत कथा का अपने ढंग से मोड़- 
तोड़कर प्रचार क्या होगा। यह कोई जआाइचय नहीं, यदि घर-घर में इस क्या का प्रचार 
हो गया हो और उत्सुक वालक्न-वालिकाओं के मनोरंजन के लिए तथा उनमें राम तथा 
उनकी पत्नी चीता के आदर्श जीवन में प्रतिविवित आवे-धर्म को प्रतिष्ठित करने के 
उद्देश्य से घर के बड़े-बूढ़े, रामायण के इतिवृत्त का छोटी-छोटी कहानियो के रूप में 
प्रसार किया हो । हमारे यहाँ ऐसी प्रवा रही भी है। महाकवि कालिदास अपने मेघदूत 
में कहते हूँ कि कौश्ांदी नगर में ब्रामवृद्ध अपने पोते-पोतियों को उदयन की कथा 
सनातें थे । स्वयं कालिदास-छत रघुव॑ंश में वर्णित राम-कबा कुछ स्थावों में मूलकया 
से भिन्नता रखती हूँ । 

राम की कवा त्रेतायुग की होने के कारण उदयन की कथा से भी अधिक प्राचीन है 
ओर कदाचित्‌ उसने द्वाविड़ों के हृदय एवं प्रतिभा पर अमिद प्रभाव डाला होगा । 
इसका एक कारण यह भी हो सकता हैँ कि रामायण के द्वो प्रधान पात्रों में रावण 
दक्षिय का था। हूंका का राज्य, राम के विजय प्राप्त करने के पहचात्‌ भी बना रहा 
जौर विभोषण उसका पारूतन करता रहा। आवुनिक युग की भाँति यदि राम भी रूंका 
को जीतने के पढचात्‌ अपने फिसो भाई को अपनी तरफ से रूंका का राज्य चलाने के 
लिए नियुक्त करते, तो कदाचित्‌ दक्षिणापव्र का इतिहास कुछ बातो में भिन्न होता । 

तेलाए-भाषा तमिल के मुकाबले में प्राचीन न होने पर भी कुछ हु॒द तक प्राचीन 
हो कही जा सकतो हूं; उस भापा के बोलनेवालो में बहुत समय तक वाल्मीकि रामायण 
को बवेक्षा छोक-कृयाओं के द्वारा प्रचलित राम-क्या का ही आदर होता रहा ॥ ऋमशः 
तेचुगु-नायानायो संस्कृत के प्रति आहृष्ट हुए और उस भाषा के परकांड पंडित बन गयें। 
“रंगवाव रामायर्णा बौर “भास्कर रामायर्णा के कवि संस्कृत के महान्‌ पंडित थे और 


( हद ) 

उन्होंने अपनी क्ृतियों में स्पष्ट कहा भी हूँ कि उनकी कृतियाँ वाल्मीकि रामायण को 
आधार मानकर चलती हे। फिर भी, वे जनता के बीच प्रचलित रामकथा की सर्वथा 
उपेक्षा नहीं कर सके । 

कहा जाता है कि सन्‌ १३१० ई० में कवित्रया के प्रसिद्ध कवि एरंना से 
मूल संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तेलगु-पद्य में लिखा था। खेद है कि वह रचना 
आज हमें अप्राप्त है--केवल उसके कुछ एक पद्च तेलुगु के एक लक्षण-प्रन्थ में हमें 
मिलते हें। एर्रना के पश्चात्‌ सन्‌ १८६० ई० तक किसी और कवि ने वाल्मीकि रामायण 
का सही-सही अनुवाद तेलूयु में प्रस्तुत नहीं किया । सन्‌ १८६० ई० में गोपीनाथ वेंकट 
कवि ने संस्कृत-रामायण का सही अनुवाद तंलगु-पत्य में प्रस्तुत किया । उसके पद्चात््‌ 
कितने ही कवियों ने अपनो प्रतिभा के अनुसार सस्क्ृत-रामायण का अनुवाद किया। 


कहने का तात्पयं यह है कि १८६० ई० तक रास क्वी कथा पर जो काव्य लिखे गये, 
उनपर लोक-कथाओ का ही अत्यधिक प्रभाव रहा। 


आज के शूभ समय में, जबकि भारत की विभिन्न सस्कृतियों में आदान-प्रदान का 
कार्य प्रारम हो गया है, यह अत्यंत हुं की बात हूँ कि दक्षिण के एक सुयोग्य तथा 
हिन्दी-तेल्गु-भाषाओ के निपुण विद्वान्‌ श्री ए० सी० कामाक्षि राव ने, तेलगु क्री अत्यत 
लोकप्रिय द्विपद रामायण का अनुवाद राष्ट्रभाषा हिप्दी के गद्य में किया है, जिससे 
वह भारत के सभी साहित्यों तक पहुँच सके । 


तेलुगु की 'रंगनाथ रामायण अपने इतिवृत्त, भाव, कला एवं शैली के कारण 
तीन करोड़ तेलयू-भाषाभाषियों के हृदय में राम-भक्ति को जायरित करने में सफलता प्राप्त 
कर चुकी है । यदि उसका हिन्दी-अनुवाद आसेतुहिमाचछल व्याप्त चालीस करोड़ 
भारतवासियो के हुदयो में राम-भक्ति जागरित करनेवाली प्रबल दवित का स्रोत बन सके, 
तो आइचर्य नहीं करना चाहिएं। जयहिन्द ।' 


त्ा० ८, शाके १८८२ विद्यारत्न निडद्वोलु वैंकट राव, एम्‌० ए० 
चैन्न, सोमवार रीडर तथा तेल्गु-विभाग के अध्यक्ष 
श्प-रे-६० ई० सद्रास-विश्वविद्यालय 


१. आन्ध्र महाभारत' क तीन प्रसिंद्ध कवि नन्नैया, तिककना और एरंना कवित्रया 
के नाम से विख्यात हेँ। 
२ प्रस्तुत परिचय मूल अगरेजी लेख से अनूदित । 


नस्तावना 


[ ३९ । 


लेलए-थ/क/-विदेशी पडितो के द्वारा 'इटालियन ऑफ दि ईस्ट' (पवार ० छाल 
ए०50 कही जानवाली तलगु-भाषा, द्राविड़-भाषा-परिवार क्ली समृद्ध एवं साहित्य-सपन्न 
भाषा है । वैसे तो इसके तीव नाम हे--तेल्‌गु, तेनुगू, आंध्रमु; किन्तु तेलगृ' शब्द का ही 
अधिकाधिक प्रयोग होता हे । आंध्र शब्द पहले जाति-परक था, किन्तु बाद को वह देश- 
परक हुआ और निदान आपछ्रदेश क्ली भाषा आप्रमु' कहलाई। तेलगू अजंत भाषा हे--- 
प्रायः इसके सभी शब्द स्वरांत और विशेष रूप से उकारात होते हे। (उदा०-सतोषमु, 
साहसमु, नीनु, नेनु आदि)। अत., यह भाषा अधिक सगीतभय होने की क्षमता 
रखती हूँ। फदाचित्‌ इसी कारण से विदेशी विद्वानों ने इसे पूर्व की इटालियन भाषा 
कहा होगा ॥ 


इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी समय आंध्र-साम्राज्य उत्तर में पाठलि- 
पुत्र से फावेरी नदी फे दक्षिण तक फैला हुआ था। किन्तु, समय-समय पर इस 
साम्राज्य पर बहुत-से आक्रमण हुए और इसका बहुत-सा भाग इसरो के अधीन हो गया। 
विजयनगर के प्रसिद्ध सम्राट कृष्णदेवराय के समय में तेलगु-प्रदेश उत्तर में पटक से प्ररम्भ कर 
दक्षिण में मदुरे तक फैला हुआ था। आज भाषावार प्रान्तो के विभाजन के बाद 
तेलगु-प्रदेश की सीमाएँ बहुत हद तक निश्चित-सी हो गई हे ॥/ आज इसकी उत्तरी 
सीमा उत्त र-पुर्द में वरहमपुर से प्रारंधभकर उत्तर में गोदावरी नदी के किनारे होते हुए न॑जामा- 
बाद फे कुछ उत्तर तक चली गई है । इसकी दक्षिणी सीमा मद्रास के उत्तर में ूूगभग 
तीस मील से प्रारंभ कर कोलार तक हूँ और पूर्व में समुद्र-तट तक यह प्रदेश फैला हुआ है। 
इन सीमाओ के भीतर-स्थित विज्ञाल भू-भाग में तथा भारत के अच्यास्य प्रान्तो में बसे 
हुए तेलुगु-भाषाभाषियों की संख्या १९५१ ई० की जन-गणना फे अनुसार तीन करोड़ तौस 
लाख हूं। भारत में हिन्दी-भाषाभाषियो के बाद तेल्गु-भाषाभाषियों की संख्या ही 
अधिक हूँ । 

तेलगु-भाषा के दो रूप हमें देखने फो मिलते हँ--साहित्यिफ भाषा का रूप 
ओर बोलचाल की भाषा का रूप। साहित्यिफ भाषा का रूप प्रदेश-भर से एक ही है, 
किन्तु बोलचाल को भाषा के रूप में कहीं-कहीं थोडा-सा अन्तर दिखाई देता हूँ। 
सन्‌ १८७५ तक साहित्य-रचना को लिए फेवर साहित्यिक भष्षा का ही प्रयोग होता रहा, 
किन्तु उसके बाद बोलचाल की भाषा को भी साहित्य सें स्थान देने के लिए आवदोलन 


( ६ ) 


शुरू हुआ । यह आंबवोलन आज तक चल रहा है। आज स्थिति ऐसी है कि तेलुगु के 
पचहत्तर फी सदी लेखक अपनी साहित्य-साधना बोलचाल की भाषा के साध्यम से करते हे। 
साहित्यिक भाषा (ग्राथिक भाषा) और बोल्चाल की भाषा (व्यावहारिक भाषा) में 
जो अन्तर हैँ, वह विशेषतया क्रियाओं तथा कुछ शब्दों के रूपो तथा संधि के नियम- 
पालन के ऊपर मिर्भेर करता हूँ । एक उदाहरण से यह अन्तर स्पष्ट करेंगे। 


सा्रहितल्यिक-थ?7०7--शी राम चरित्रमु परम पावन मैनदि । अंदुवलनने तेलुगुलो 

ननेकुल रासायण-मुनिदिवरलों रचियिचिरि। इप्पटिकिनि राचचुचु तम जल्ममुन्‌ 
चरितार्थम्‌ गाविचु कोनु चुन्नाद । 
व्यावहारिक सापा-- 

श्रीराम चरित्र परस पावन सेदि। अंदुबल्लने तेलगुलो अनेकुलु रासायणाप्लियिदि 
बरलो ब्रासाद । इप्पढिकी व्रास्तु तम जन्मान्नि चरितार्थम्‌ चेसुकुंटुल्नार। 

(श्रीराम की कहानी परम पावन हैँ। इसलिए, कई लोगो ने अवतक रामायण की 
रचना की। आज भी कुछ लोग इसकी रचना करते हुए अपने जीवन को चरितार्थ कर रहे है ।) 

जैसा हम पहले निवेदन कर चुके हे, तेलगु द्राविड़-भाषा-परिवार की एक मुख्य 
भाषा है । किसी समय तमिल, तेलुगू, कन्नढ़ और मलयारूस मूल द्वाविड़-भषा की _ 
बोलियाँ सात्र थीं। किन्तु, बाद को भिन्न-भिन्न वातावरण में पनपने के कारण आज ये 
एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती हे। तेलुगु-प्रदेश पर कई राजवंशो ने राज्य किया । 
सातवीं शताब्दी तक सातवाहन, इक्ष्वाकु, बृहत्फलायन, शालंकायन, पत्ल्व, विप्णकुडिन 
तया पूर्व चालक्य राजाओ ने तेलगु-प्रदेश पर राज्य किया था । इन राजाओ की राज- 
भावा या तो सस्कृत थी या प्राकृत । जो शिलालेख अबतक उपलब्ध हें, उनसे बहुतों 
फो भाषा प्राकृत हूँ । इन राजाओं में कुछ तो वेदिक घर्मावलंवी थे और कुछ बुद्ध के 
अनुयायी थे। इस तरह तेरूगु-प्रदेश में राजभाषा तथा धर्म की भाषा की हैसियत से संस्कृत 
तया प्राकृत का अत्यधिक प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में देशभाषा पर पड़ता रहा। 
परिणाम यह हुआ कि आज तेलूगू में पचहत्तर फी सदी शब्द सरक्षत्त या प्र-क्ृत भाषाओं 
क्र तत्सन या तदूभव रूप हें। तेलगु-प्रदेश के पंडितो का संस्कृत के प्रति इतना 


अधिक आग्रह रहा कि तेलुगु का सब से प्रथम व्याकरण संस्कृत-भाषा में 
लिखा गया । 


तेलुगू की साहित्यिक भाषाके भी दो रूप सिरूते है । एक रूप वह है, जो सस्कृत 
शब्दों तथा समस्त पदों से भरा हुआ होता है और दूसरा वह, जिसमें ठेंठ तेख्ग शब्दो 
फा ही बाहुलय हूँ । ठेठ तेलुगु को जानू तेनुग! कहते हूँ । इन दोनो रूपो में संसकृत- 
बहुल भाषा का ही अधिक आदर होता रहा और घौरे-घोरे ठेठ तेलूग के प्राचीन काच्यो 
के बहुत-से शब्दों का प्रचलन कम होता गया। इसलिए, ठेठ तेलग के प्राचीन काव्यो 
को समझना बहुत-से तेलुगु-भापाभाषियो के लिए भी आज कठिन-सा ही गया हूं। 
शव जा सस्कतवहुल तंलुगु क॑ उदाहरणो को देखने से इन दोनों में अंतर स्पष्ट 


ठेठ तेलगु-- 
चेप्पु लोनिरायि चेविछोनि जोरीग, 
कटिलोनि नलुसु, फकालिसुल्ल, 
इटिलोसि पोर इंतित कादया ॥ 

(जूतो में पड़ा हुआ कफड, फान में पहुँचा हुआ कीडा, आँख की फ़िरफिरी, पैरो में 
काँटा और घर में ऋगड़ा--इनकी पीड़ा असहनीय होती हे।) 
संस्कृतबहुल ते लुगु-- 

अधरमु _गदली गदलक 
अधुरमु उप भाष लूडियि 
मोन त॒तुडी अधिकार रोग पुरित 
बधिराधक शवबम्‌ जूड पापमु सुमती ॥ 

[ अधरो को बिना हिलाये, मधुर भाषा से रहित हो, मौन ब्रत धारण फरनेवाला 
अधिकार-रोग से भरा व्यक्ति बहरे तथा अंधे दाव फे बराबर हे। उसे देखना भी पाप है। 
(रेखाकित शब्द संस्कृत फे है ।) ] 

इन दोनो शैलियों का सामंजस्थ भाषा फे जिस रूप में पाया जाय, जिसमें तेलुगु 
का मुहावरा भी और संस्कृत का मधुर एवं गभीर शब्द-समूह भी हो, वही तेलुगु अधिक 
लोकप्रिय है और वही सुंदर समझी जाती है । रंगवाथ रामायण की भाषा में ऐसी ही 
सुंदरता पाई जाती है । इसकी चर्चा यथास्थान आगे की जायगी । 

चपेलुए-सराहछित्य-महाकवि नन्नवया का आध्र-महाभारत तेलुगु-साहित्य फे उपलब्ध 
काव्य-प्रत्यो में सबसे प्राचीन है । इसकी रचना ग्यारह॒वीं शताव्दी फे मध्य में हुई थी। 
इस काव्य को प्रौढ भाषा एवं उत्कृष्ट कला-कौशर फो देखकर चिद्दान्‌ यह अनुमान फरते हें 
कि यही महाभारत तेलुगु-साहित्य का आदिकाब्य नहीं हो सफता। उनका विचार हैँ 
कि किसी भी भाषा फे प्रथम साहित्य का रूप इतना विकसित एवं प्रौढ नहीं हो 
सकता; शताब्दियों की साहित्य-साधना फे परिणास-स्वरूप ही ऐसी प्रौढ रचना का 
प्रगयन संभव हैं । वह विचार कल्पना-मात्र कहा नहीं जा सकता। सातवीं तथा आठवीं 
शताब्दी फे जो शिलालेख एवं ताँबे फे दानपत्र अबतक उपलब्ध हुए, उनमें उत्कृष्ट 
काव्य-स्वरूप के नमूने मिलते हुं। अत., यह फहना सत्य से दूर नहीं होगा कि तेलुगु सें 
साहित्य-रचना का प्रारभ ईसा की सातवीं शताब्दी सें ही हुआ होगा, किन्तु सातवीं से 
दसवीं छाताबइदो तक का साहित्य हमें आज उपलब्ध नहीं हो सका । 

सन्‌ १०४५० ई० से आजतक के तेलंगु-साहित्य फे इतिहास को पाँच यूगो में 
विभाजित किया जा सकता है-- 

१. पुराण-युग (१०५०--१३५० ई०) 

२ श्रीनाथ-परुग (१३५०--१४५०० ई० ) 

३ प्रबब->युग. (१५००--१६०० ई०) 

४ दक्षिणाप्रयुग (१६००--१८७४५ ई०) 

५- आधुनिक-युग (१८७५ ई० से) 


हे 


( ८ ) 


प्रत्येक युग फा सक्षिप्त परिचय इस प्रकार हँ-- 

दुशाण-चुय--बैदिक धर्म तया उसके समर्थक पुराणों के प्रचारार्थ इस युग में 
साहित्य-पावना का प्रारंभ हुआ। महाकवि नज्नया ने महाभारत को रचता प्रारभ की 
भौर बरण्य-पर्व का अद्धं भाग लिख भी न पाये कि उनका स्वर्गवास हो गया । उसके 
दो सौ वर्ष के पश्चात्‌ तिककना सोमयाजी ने विराद पर्व से प्रारंभ कर शोष पंद्रह पर्वों की 
रचना की। उसके पद्चात्‌ एरंनाप्रगडाने अरण्य-पर्व का अघूरा अंदर पूरा किया । इस 
तरह भहाभारत की रचना तीन कवियों के द्वारा लगभग तीन सौ वर्षों में पूरी हुई । 
इन तीन सहाकवियों को कवित्रय कहते हैँ । आश्र-महाभारत तेल्गु-माषाभाषियों के 
लिए एक साथ, पर्मश्ास्त्र, नोति-प्रन्य, पुराण तथा महाकाव्य हैँ। उसका प्रभाव तेलुगु- 
जन-जीवन पर अक्षुण्ण हूँ 


इसी युग में रामायण की रचना भी हुई । गोनबुद्धराजु ने बेशज छन्द 'द्विपदा 
में रामायण की रचना की, जो साधारण जनता के बीच अत्यंत प्रिय हुई, जिसका 
हिन्दी-अनुवाद उपस्थित हे। भास्कर रासायण्णा को रचना भी इसी युग में हुई, 
किन्तु वह केचर पंडितों क्षे बीच समादुत हुई । महाभारत तथा रामायण के 
अलावा इस युग में शव फाव्यो की रचना अत्यधिक मात्रा में हुई । नश्नेचोड़ कवि रूत 
कुमारसम्भवं, पालकुरिकि सोमनाथ-कृत वसवपुराणम! सतथा पंडिताराध्यचरित्र' 
इस युग की श्रेष्ठसम शैवभक्तिपरक रचनाएं हूँ, जो तेलगु-साहित्य के उज्ज्वल आभूषणों की 
भाँति शोभायमान हूं। इस युग के एक भौर प्रतिद्ध कवि नाचन सोम हे, जिनका उत्तर- 
हरिवश एक बडी ही सूंवर छुति है। 

अरिना/थ-सुण--इस युभ के प्रसिद्ध कवियों में श्रीवाथ तथा पोतना अग्रगण्य हे। 
श्रीनाव राजदरवार के महाकवि तथा मभहापंडित थे । उन्होने कविता-शैली में क्रांतिकारी 
परिवत्तेव किया । उनके प्रसिद्ध प्रन्थ हे--काशीखलंडम', “ूंगारनैघधम” दथा पलसाटि 
घरित्रमु! । इनमें काशीलंडमु' और “शूृंगारनपधम' संस्कृत को काव्यों के अनुवाद हे 
आर पलनाटिचरित्रमु' ऐतिहासिक वीर-काच्य हुँ । श्रीमाथ के अनुवाद की शैली भी 
निराली है । मूल ग्रन्थ को आधार मानते हुए, उसके समस्त काव्य-सौंदर्य को तेलुगु की 
मूहावरेदार भाषा में मूत्तिमान्‌ करने की उनकी क्षमता अद्भूत है। उनके समकालीन कवि 
पीत्तना, तेलुनु-भाषाभाषियों को हृदय-पीठ पर सर्वदा विराजमान रहेंगे। उनकी उत्कृष्ट 
रचना आश्च-महाभागवर्त हैँ, जिसका प्रचार गरीब की भोपड़ी से अमीरो के 
सहलो तक में हूँ । पोतना राम के भक्‍त थे, किन्तु उन्होने कृष्ण-प्रधान काव्य की रचना की । 
उनकी भक्त विलक्षण थी। राम-हकृष्ण, छिव-केशव में उन्होने कोई भेद नहीं किया। 
उनकी भागवत के कुछ भाग, जैसे प्रद्लाद-चरित्र, गजेन्रमोक्ष तथा कृष्ण-लीलाएं आदि 
तेलुगु-अदेश में इतने असिद्ध हूँ कि लोग उन्हें जबानी याद करके समय-समय पर भगजित- 
भाव से गाते रहते हे। 

अवन्ध-युण --गह.. पुग तेलुगु-साहित्य का स्वर्ण-युग साना जाता हैं । विजयनगर- 
साम्राज्य के विस्यात राजा श्रौकृष्णदेवराय का प्राश्नय पाकर तेलयु-साहित्य ने अभूतपूर्व 


( € ) 


उन्नति को। श्रीकृष्णदेवराय स्वयं भो कवि थे और उन्होने आमुफ्तमालयदा' नामक 
एक प्रौढ काव्य की रचना को थी। उनके दरबार में आठ सहाफति थे, जो अष्टदिश्गज 
के नाम से प्रख्यात थे। इस युग में कई प्रबंध-काव्यो की रचना हुई । तेलगु सें प्रवध- 
काव्य को एक विलक्षण परिभाषा प्रचलित है । किसी पौराणिक, ऐतिहासिक अथवा 
काल्पनिक प्रेमार्यान को आश्वित कर आवश्यकता तथा औचित्य की दृष्टि से उसे घटा-बढ़ाफर 
अपनी प्रतिभा एवं कला-कौशल के अनुसार तेलुगु फ्री मुहावरेदार भाषा में, तेलुगु-जन- 
जीवन फो प्रतिबिबित करते हुए जिस कला-कृति का निर्माण फवि फरता है, उसे प्रबध- 
काव्य कहते हे। ऐसे प्रबंध-काव्यो में अल्लसानि पेहना फा सनृचरिचत्र', तिम्पना का 
'पारिजातापहरण' तथा रामराजभूषण का वसुचरित्र' अत्यत प्रसिद्ध हे । धूर्जटि फवि फा 
'कालहस्तीइवरशतक' ओर तेनालि रामकृष्ण का 'पाडरगमाहात्म्यमु' इस युग के भक्ति-परक 
महाकाव्य हे। इस युग फे उत्तराद्ध में पिगलि सूरना ने 'फलापूर्णोदियमु नामक एक मौलिक 
प्रबधन्‍्काव्य फी रचना की, जो घस्तु, भाव एवं कला की दृष्टि से बेजोड हैँ। उन्होने 
'राघवपांडवीयमु' नामक एक हृ॒यर्थो काध्य लिखा, जो अपने ढंग का प्रथम फाव्यह । 
इसको अपना आदर्श सानकर आगे कई फवियो ने तीन-तोन, चार-घार अथंबाले 
फाव्योकी रचना की । 


दुश्षिण79-युण-पिजयनगर-साम्राज्य के पतन के पश्चात्‌ आद्न-साम्राज्य दक्षिण 
म तंजाऊर और गदुरे में प्रस्फुटित हुआ । घहाँ के प्रायः राजा स्वय विह्ान्‌ होते थे 
और विद्वानों तथा कवियों फा बहुत आदर करते थे। उनका आश्रय प्राप्त करके फई तेलूगु- 
फर्वि तेलगु-साहित्य-मदिर फो अपनी सरस कृतियों से सजाने छगे। इस युग फी कविता 
भी प्रबंध-शली को ही अपनाकर चली, फिन्तु समय के साथ-साथ उसकी भाव-प्रवणता 
में शिथिलता आती गई। भाव-सौंदयं की अपेक्षा पाडित्य-प्रदर्शन एवं आश्रयवाता 
फी अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा फो ही फवि अधिक महत्त्व देने छबगे । फिर भी, इस 
युग में कई सूंदर फाव्यो की रचना हुई, जिनमें फकटि पापराजु-कृत उत्तर- 
रामायण', घेमकूरि वेंकट कवि-कृत 'विजयविलासमु', फवयित्री मोल्ला द्वारा विरचित 
रामायण” तथा कवयित्नरी मुदुदु पलनो कृत राधिका स्वातनमु' आदि अत्यत 
प्रत्चिद्ध है ॥ 
आधुनिक काल के साहित्य का परिचय देने के पहले तेलुगु-साहित्व की एक 
और प्रवुत्ति का उल्लेख कर देना आवश्यक है । तेलुगु की प्रवध-फाव्य-धारा के साथ ही 
'सुकक्‍तक-काव्य-धारा का भी विकास समानातर में होता रहा । मुक्तक-साहित्य के 
बतर्गत दशातक, गीत, सकीत्तेंन तथा यक्षणान आदि आते हे । तेल॒गु में लगभग एक 
हजार शतक हे, जिनमें बहुत-त प्रकाशित हो चुके हे। पेलगु-साहित्य में इन शतको का 
महत्त्वपूर्ण स्थान है । इनमें बहुत-से शतक भक्तिपरक हे, कुछ नीति-बोधक्त हूँ और 
कुछ शुद्भार-रस से भरे हे। इनकी फविता उच्चकोटि की है। इसके अलावा समय-समय 
पर भवक्‍तो के द्वारा रचे हुए पद तथा संकीत्तंन साहित्य तथा सगीत की दृष्टि से अद्वितीय हूं । 
अश्नप्तय्या, त्यागय्या ओर क्षेत्रय्या, ये तेलुगु के तीन भक्त-कवि हे, जिन्होने भगित के उन्सेष में 


( १० ) 


कितने ही मधुर गीतो का गाव किया है । त्यागय्या (त्थायराज ) तमिलनाड के तिरवाड़ी 
वामक स्थान में हुए थे । उनके कीत्त॑न सारे दक्षिण में गाये जाते हूं। 

आधुनिक छुए--भाषुनिक युग में तेल्गु-गद्य की ञच्छी उन्नति हुई हक गद्य की 
विभिन्न प्रतत्तियों को प्रारभ करके गद्य का विकास करने का श्रेय स्व० श्रीवीरेशलिगम्‌ 
पंठुलू को है । उन्होंने स्वयं कितने ही निबव, नाठक, प्रहलन तथा उपन्यास आदि लिखे और 
दूसरे लेखक्नों को लिखने की प्रेरणा दी । आधुनिक तेलगु-साहित्य में उचका वही स्थान हैँ, जो 
हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चद्ध का है । इस युग के प्र'रभ में कई ऐसी सस्थ(थों की स्थापना हुई, 
जो गद्य-साहित्य के निर्माताओं को प्रोत्साहन देती थीं। चिलकर्माति लक्ष्मीमरसिहस्‌, पानुगि 
नरासहराव, ग्रजाड़ अप्पाराव उन प्रारभिक लेखको में से हे, जिन्होने गद्य-साहित्य के निर्माण 
में अपक परिश्रम किया था | इसी समय व्यावहारिक भाषा को साहित्य-रचना के लिए प्रयोग 
करने को प्रश्न पर जबरदस्त आादोलन शुरू हुआ। कई युवा-लेखको तया पत्र-पत्रिकाओ ने 
इस आंदोलन का समर्थन किया। इस आंदोलन के फलस्वरूप बहुत बड़ी संस्या में गद्यनलेखक 
निऊड आये, जो आजतक गद्य-साहित्य की सर्वतोम्‌खी उन्नति के लिए प्रयास कर रहे हें । 


फविता फे क्षेत्र में भी तेलगु-साहित्य भारत की अन्यान्य भाषाओं की साहित्यिक 
प्रगति के साथ कदम-ब-कदम भागे बढ़ रहा है। अँगरेजी साहित्य का अध्ययन, स्वतंत्रता- 
आंदोलन, पत्तं मान जीवन का संघर्ष और व्यक्ति-स्वातंत्यवाद ने इस युग फे कवियों को एक 
नई दुष्टि प्रदान की तथा उसका प्रभाव उनकी कविताओ में लक्षित होने छूगा । छाया- 
वाद, रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की जैसी कविताएँ हिन्दी-साहित्य में पाई 
लाती है,वबैसी रचनाएँ तेलुगु में भी हे। भेद इतना ही है कि तेलुगु में उनके नाम मिन्न- 
भिन्न हे--जैसे भाव-कविता, अतिवास्तविक कविता, अभ्युदय-कविता आदि। वर्त्तमान समाज भे 
पाई जानेवाली आर्थिक असमानता, संघर्षमय जीवन, प्राचीन रूढियो तथा परंपराओं के प्रति 
विद्रोह तथा समस्त मानव-जाति के कल्याण का आग्रह आज की कविताओ में दिखाई पड़ते है । 


[ २ ) 


रामायण, महाभारत एवं भागवतपुराण भारत की सांस्कृतिक एकता को सुरक्षित 
रखनेवाले महत्त्वपूर्ण प्रन्य हें। राम औौर कृष्ण भारतीय संस्कृति के प्रतीक है । वस्तुत., 
मासेतुहिमाचल इन अलोकिक महापुरुषों को पूजा होती हैँ और प्रत्येक भारतीय भाषा 
के कवि इनके जीवन-वृत्तो का गान करने में ही अपने कवि-कर्म की सफलता मानते आये हे । 
रामायण की कथा नित्य नवीन है । हम अपनी वाल्यावरथा से ही न जाने 
कितनी बार और कितने लोगो के द्वारा इस कथा को सुनते तथा स्वयं पढ़ते रहे हे, 
फिर भी जव-जव इसे सुनने या पढ़ने का अवसर सिलता है, तव-तव हम में नवोत्साह 
जागरित हो उठता हूँ । यही इस कथा की महत्ता है । वाल्मीक्ति-रासायण में चतुरानन के 
मुंह से निकले हुए निम्नलिखित शब्द अक्षरद्वः सत्य प्रमाणित होते हूँ -- 
यावत्‌ स्यास्य॑च्ति गिरयः सरित्तत्च महोतले । 
तावत्‌ रामायणक्रथा लोकेषु प्रचरिष्यति ॥ 


( ११ ) 


तेलुगु भाषा में रामकथा-संबंधी कितने ही काव्य है । ये काव्य प्राय दो रूपों 
में मिलते है--प्रबध-काध्य तथा मुक्तक-गीत। प्रबंध फे रूप में प्राप्त होने वाल काध्यो 
में अधिकतर काव्य वाह्मीकि-रमायण फे सरस अनुवाद-मात्र हें। 'रगनाथ रामायंण' 
तथा 'मोल्ल रामायण' ही वो ऐसे प्रबंध-काव्य हे, जो स्वतंत्र रचना कहे जा सफते हे 
इन दोनों फी कथा यद्यपि प्रधानतया वाल्मीकि-रामायण को आधार सानकर चली हूं, 
तथापि काव्य-रचना फे लक्ष्य में, कथा-वस्तु फो विधान में वर्णनो में, तथा चरित्न- 
चित्रण में नवीवता हे । इन दोनो में 'मोल्ल रामायण आकार में छोटी है। “रंगनाथ 
रामायण! ही आंध्र-देश में अधिक लोकप्रिय है । इसके रचता-काल तक जनता में 
प्रचलित रामकथा-सबधी कई ऐसे प्रसंग इस रामायण में मिलते हैँ, जो चाल्मीकि- 
रामायण में नहीं मिलते । अबतक रामकथा-संबधी जितने प्रबध-काव्य उपलब्ध हुए, 
उनमें यही सब से प्राचीन काव्य हे। 

“रगनाथ रामायण सबधी चर्चा प्रारभ करने के पहले हम एक विषय स्पष्ट कर 
दना आवश्यक समभते हे। जिस प्रकार तुलसी-रामायण उत्तर-भारत के लोक-जीवन के 
पोर-पोर में व्याप्त होकर, उसके पारिवारिक सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक 
जीवन फो प्रभावित कर सकी, उसी प्रकार ओर उसी मात्रा में तेलगु-भाष,भाषियों के 
जीवन फो तेलुगु-रामायण प्रभावित नहीं कर सकी। आंध्र-जनता के बीच वह कार्य 
आध्र-महाभारत तथा आांध्र-महाभागवत ने किया। इन दोनो ग्रन्थों ने तेलुगु-प्रदंश् में 
लोक-जीवन को प्रभावित ही नहीं, बल्कि अनुप्राणित भी किया है । तुलसी-रामायण 
हिन्दी-भाषाभाषियो फे लिए एक साथ धर्म-प्रन्थ, पुराण, नीतिशास्त्र, समाजश्ञास्त्र तथा 
लोक-जीवन का पथ-प्रदर्शक है । तेलुगु-प्रदेश में वह स्थान तेलगु-रामायण को नहीं 
बल्कि तेलुगु-भागवत फो प्राप्त हैँ । तेल्गु-भाषाभ,षियो के लिए आंध्र-महाभःरत्त' 
एक साथ पम्मंशास्त्र, वेदान्त-ग्रन्थ, नीति-प्रन्थ, महाकाव्य और इतिहास हे। 

परन्तु, फिर भी राम फो कथा, जो परपरा से जनता के बीच लोक-कथाओं 
तथा लोक-गीतो के रूप में प्रचलित थी, अपना अक्षण्ण प्रभाव लोगो के जीवन पर 
डालती रही। आद्र-देश में समय-समय पर कई ऐसे भक्‍त हुए, जिग्होने अपने भवित-रस 
पूर्ण गीतों एवं भजनों फे द्वारा राम-भक्ति का ऐसा प्रचार छोगो में किया कि श्रीराम 
आपफ्रो के इष्टदेव-से हो गये । आफ्र-प्रदेश में विरछा ही ऐसा कोई गाँव होगा, जहाँ 
श्रीराम का सबदिर न मिलता हो। तेलगु-भाषाभाषियो में रामय्या, रामन्ना, रामराब, 
रामचन्द्र राव, सीतय्या, लक्ष्मन्नला आदि नामो की तो गिनती ही नहीं हूं । 

किक्तु, प्रइवन यह हुँ कि तुलसी-रासायण फे समान सर्वव्यापक तथा प्रभावज्ञाली 
राम-काव्य तेलुगु में क्यो नहों लिखा जा सका ? एसी बात नहीं कि तेलगु-प्रदेश में 
इसके लिए आवश्यक प्रतिभा का अभाव था । यदि ऐसी बात होती, तो महाभारत एव 
भाग वत जैसेगप्रौह एव सरस महाफाव्यो की रचना ही तेलगू में नही होती । मत. इसका 
कारण जानने के लिए हमें इतिहास का आश्रय लुना पडेगा। 

ग्रह सर्वेविदित हैँ कि भगवान्‌ वुद्ध की धामिक फ्रान्ति से वेदिक घर्म को बडा 
भारी धवद्रा लगा । बौद्धधर्म कई शाताब्दियो तक उत्तर-भारत के राजाभो के द्वार 


( १२ ) 


समादव रहा । उत्तर-भारत के कुछ राजाओ ने जैनबर्म को भी अपनाया था। घीरे- 
घीरे ह इन दोनों धर्मों न अपनी विजय-पात्रा सदूर दक्षिण तक बढ़ाई । दक्षिणापथ के 
कई राजाओं ने इस घ॒र्म क आगे अपने घुटने देक दिये। आंध्र-राजाओ में सबसे या 
दातवाहन थे, जिन्‍्होने वैदिक धर्म के अनुयायी होते हुए भी वौद्ध तथा जैन धर्मों का 
आदर किया । इन्हीं शातवाहनों के सामत इक्ष्वाकु-बद्य के राजा (ई० पुृ० २०० ) 
बौद्धपर्म को अनुयायी बने । इन्होने बौद्ध तथा जैन धर्मों को बहुत आदर दिया और 
चैंदिक' धर्म के प्रभाव फो नप्ठ करने का भी यथाशवित प्रयत्वन किया । इस प्रकार, दक्षिण 
भारत में वैदिक, वौद्ध एवं जैन धर्मों के बीच कई शताब्दियों तक सघर्ष चलता रहा। 
वोच-बोच में ऐस आंध्र-रजा भी हुए, जिन्‍्होने वंद्िक धर्म को प्रोत्साहन दिया और बौद्ध 
तथा जैन धर्मों को समूल नष्ट करने का प्रयत्व किया। 


सन्‌ ८२५ ई० में शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ । उन्होने बौद्धधर्म के प्रचार 
को रोकने तथा वैदिक धर्म को पुत्र. प्रतिष्ठापित करने का जो प्रयत्न किया, उससे 
क्ांध्र-प्रदेश के वैदिक घर्मावलंवियो को आंध्र-देश से बौद्धधर्म को समूल उखाड़ फेंकने 
क्ी प्रेरणा सिली। उन्होने कई मो्चों पर बौद्धधर्म का विरोध किया । बीद्धघर्मावलंबियो 
फो तरह-तरह की यातनाएँ दी गईं और कई ऐसे प्रन्यो के निर्माण का प्रयत्न हुआ, 
जिनके द्वारा वैदिक धर्म तथा उनके समर्थक पुराणों की प्रतिष्ठा बढ़ी। वातावरण भी 
इसके लिए अनुकूल था । उसी समय तमिल-देश में अनेक वेष्णव तथा शव सतो का 
भाविर्भाव हुआ, जिन्होंने अपनी सरस एवं सबल रचनाओं से बौद्ध तथा जैन धर्मों का 
विरोध आरंभ किया । उसी युग में मांध्र में राजराज नरेन्द्र नामक एक विख्यात राजा हुए 
जो वेदिक धर्म के अनन्य अनुयायी थे। इन महापुरुषों का प्रोत्साहन पाकर तेल्यू-साहित्य 
में पुराण-पुग॒ प्रारंभ हुआ, जिसमें प्रधानतया पुराणी और इतिहासो फा अनुवाद-कार्य हुआ । 
इन प्रस्यों की रचना करने में कवियों का उद्देश्य यही था कि उनके द्वारा भगवान्‌ 
फै उस लोकरंजनकारी रूप फो अभिव्यवित की जाय, जिसको आलंवन सानकर मानव- 
हृदय वैदिक धर्म के कल्याण-मार्गय की औौर अपने आप आक्षप्ट हो सके । लगभग 
छनू १०२५ ई० में कवि नन्नया ने महाभारत का अनुवाद प्रारंभ क्या, किन्तु वे महा- 
भारत के केवल ढाई पर्व-परात्र की रचना कर पाये थे कि उनका स्वर्गवास हो गया। 
इसके पवचात्‌ तलगु-रामसायण (रंगनाथ रामायण) की रचना हुई । 


तेल्गू में रामायण को रचना को प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियाँ तुसी-रामायण 
फी रचना के लिए प्रेरणा देनेवाली परिस्थितियो से भिन्न थीं। रगनाथ रामायण का उद्देश्य 
वैदिक धर्में की प्रतिप्ठा को बढ़ाना तथा रामचन्ध जैसे अलौकिक शक्तिशाली एवं सौंदय- 
पंपन्न व्यक्ति तथा अवतार-पुरुष के भव्य चरिच्न को प्रस्तुत करना था, जिसकी अनुभूति- 
मात्र से मानवच्हदय गद्गद हो उठे। या यो कह सकते है कि रंगनाथ रामायण उस 
प्यापक पृष्ठभूमि को तैयार करने में सफल हुई, जो पीछे चलकर राम के प्रति भक्ति- 
भावना को जन्म देने के लिए आवश्यक थी। भक्ति का प्रादुर्भाव अचानक नह 


हीं होता। अनंत 
सौंदर्य, शक्ति और शीरू से सपन्न चरित्र के प्रत्यक्षीकरण से व्यक्ति का हृदय पहले 


( ९३ ) 


अइचरय से भर जाता है और धोरे-धीरे वह उस गक्ति-सपन्न व्यक्ति के महत्व की 
अनुभूति करते रूगता है। उसको उपरात उसकी प्रशसा करने की इच्छा सहज ही उसके 
मन में जागरित होती है । महान्‌ व्यवित की प्रशसा करने क्वी यह इच्छा ही भक्ति की 
पहली सीढ़ी है । रंगनाथ रामायण के प्रतिभावान्‌ रदथिता ने अपनी रचना के द्वारा 
यही कार्य संपन्न किया। 


रंगनाथ रामायण बाल्सीकिरामायण का सात्र अनुवाद नहीं है । स्थूल रूप से 
वाल्मीकिरामायण की कथा इसमें भा तो गई है, किन्तु उसके कवि ने बीच-बीच में 
ऐसे प्रसंग भी जोड़ हे, जो फदाचित्‌ उस ससय तक जनता के बीच लोक-कथाओं के रूप 
में प्रचलित हो चुके थे । हम नीचे ऐसे कुछ प्रसगो का उल्लेख करेंगे, जो चाल्मीकि- 
रासायण में नहीं मिलते, यद्यपि उनमें से कुछ प्रसग ज॑नग्रस्थों में सिलते हे। कदाचित्‌ 
कवि ने वहीं से इन प्रसगो को लेकर अपनी रामायण में सम्मिलित कर दिया हो 

१. जंबुमाली का बृत्तात, २. रावण से तिरस्कृत हो विभीषण का अपनी माता फे 
पास जाना, ३ ककेसी (रावण की साता) का रावण को हितोपदेश, ४. रावण का राम की 
धृर्विद्या-कुशलता की अद्यंस, करना, ५. गिलहरी की भवित, ६. नागपाश में बद्ध होकर 
राम-लक्ष्मण को पास नारदजी का आना, ७. रावण के जागे सदोदरी का रास की महिसा 
एवं शौय की प्रशसा करना, ८ दूसरी बार सजीवनी लाते सम्॒य हन्‌ मान्‌ तथा सात्यवान्‌ 
का युद्ध, ६. कालनेमि का वृत्तात, १०.सुलोचना का बृत्तात, ११. शुक्राचायं के आगे रावण 
का दुखड़ा रोना, १२. रावण का पाताल-होम, १३१. अंगद का रादण के समक्ष 
सदोदरी को बुरा लाना, १४. रावण फी नापज्ति में स्थित अमृत-बल्छा को 
सोखने के निमित्त आश्ेयास्त्र का प्रयोग करने की विभीषण को सलाह; 
१५ लक्ष्मण फी हंसी । 


उक्त प्रप्तयों में जबुमाली का वृत्तांत, कालनेसि का वृत्तात, रावण के समक्ष अंगद 
का मंदोदरी को घसीटकर छाना, आग्नेयासस्‍्त्र का प्रयोग करने कौ विभीषण की सलाह 
जादि ऐसे हूं, जो मूलकथा की घठनाओ को अधिक तकें-सगत सिद्धि करने फे निमित्त 
जोडे हुए प्रतीत होते हे। रावण से तिरस्क्ृत होकर विभीषण का अपनी माता फे पास 
जाना, केकेसी का हितोपदेश और सुलोचना का वृत्तात आदि रावण के परिवार के लोगो 
के चरित्र पर प्रकाश डालने के साथ ही साथ इस ओर भी इगित करते हें कि रादण 
भूत-प्रेतोी का वशज एवं भूत-प्रेतों का राजा नहीं था, किन्तु एक दिलक्षण परिवार में 
उत्पन्न हुआ विशिष्ट व्यदित था । रावण का, राम की घनुविद्या की छुशलता की प्रशसा 
फरना, मंदोदरी का रावण के समक्ष श्रीराम की महिसा एवं पराक्षम क्ी प्रदंसा करना, 
गिलहरी का बृत्तात आदि प्रसंग राम के उस छोकोत्तर व्यक्षितत्व पर प्रकाश डालते हें, 
जो शत्रुओ की भी प्रशंसा प्राप्त करने की क्षमता रखता था। साथ ही साथ, वे रावण 
तथा मंदोदरो के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हें । उक्त प्रसगो के अकाधा इस रामायण 
में यत्र-तन्न ऐसे वर्णन भी मिलते हैँ, जो वाल्मीकिरामायण में नहीं मिलते, किन्तु जिन्हें 
कवि ने वैदिक धर्म में लोगो फी निष्ठा बढाने के निमित्त जोडः हैं । 


( ४ ) 


पात्रों का चिक्र०/-पात्र-चित्रण की दृष्टि से रगनाथ रामायण विद्येष महत्त्व रखती है । 
जैसा हमने पहले ही निवेदन किया है, रगनाथ रामायण में श्रीराम के महिमा-समन्वित शक्ति, 
शील तथासौंदर्य से परिपूर्ण चरित्र को प्रस्तुत करने का अधिक प्रयत्न हुआ है । इस रामायण 
के नायक राम जहाँ एक धौरोदात्त वीर तथा सर्वंगुणसंपन्न व्यक्ति थे, वहाँ इस काव्य 
का खलनायक रावण भी उदार, चीर, साहसी, असमान पराक्रमी, राजनीतिकुशल, स्वाभि- 
सानी एवं शिवजी का अनन्य भक्त भी था । किल्तु, उसके दोष भी उसके गुणोसे 
कम नहीं थे। वह कामुक, अभिमानी तथा उद्धत था। इसलिए, इस रामायण के कविने 
रावण को चरित्र का चित्रण करने में अपनी अद्वितीय प्रतिभा एबं सहृद्यता का 
परिचय दिया है । उन्होंने एक कलाकार तथा इतिहास-लेखक--इन दोनो फे उत्तर- 
दायित्व को सफलतापूर्वक निभाया है । जहाँ उन्होने रावण के कृष्ण पक्ष की निंदा की है 
वहाँ उसके उज्ज्वल पक्ष को प्रकट करने की उदारता भी दिखाई हूँ । उनकी दृष्टि 
में रावण एक विलक्षण वोर था, जिसमें जड़-चेतन तथा गुण-दोषो का अद्भुत 
सम्मिश्रण था। उसका पतन इसलिए हुआ था कि जड ने चैतन्य पर पूरा-पुरा अधिकार 
प्राप्त कर लिया था | कदाचित्‌ यह रामायण के प्रति द्वाविड़ दृष्टि का प्रमाण भी हो। 
द्राविड़ लोग रावण को उसी दृष्टि से नहीं देखते, जिस दृष्टि से आर्यों ने उसे देखा और 
राक्षस, निद्याचर आदि नामो से सबोधित किया । द्रविड़ दृष्टि में रावण भी एक वीर, 
विद्वान, पराक्रमी मनुष्य ही था, किन्तु उसके गरणों पर दुर्गुणो ने विजय प्राप्त कर ली थी 
ओर यही उसके सर्वताश का कारण हुआ । इसके अतिरिक्त, कलूग की दृष्टि से 
देखा जाय, तो हमें यह मानना पड़ेगा कि रामचन्द्रजी का प्रतिहन्द्री केबल एक रूपट 
तथा नीच व्यक्ति नहीं हो सकता था । रावण को अपने बल-पौरुष का जहाँ अभिमान हूं, 
वहाँ उसके हृदय में अपने झात्रु के गुणों के प्रति आदर भी हैँ | वह राम के बल- 
विक्रम पर आइचयं ही प्रकट नहीं करता, वल्कि उनकी प्रशंसा भी करने रूगता है। श्रीराम 
की घत्रुविद्या की निपुणता देखकर रावण कहता है-- - 


नल्‍लवो रघुराम नयनाभिराम, विललविद्या गृदव, वीरावतार । 
वपुरे, राम भूपाल, छोकमुल नीपादि विलुकाडु नेचुने करूग ? 
(हे चीलूमेघश्यास, नयनाभिरास, धनुविद्या-निपुण, वीरावतार, रघ्राम, 
हे राजा राम, इस संसार में तुम्हारे समान घतुवर और कोई हो सकता है?) 
रावण की इस प्रशंसापूर्ण शब्दों को सुनकर रावण के मतन्नी रावण से कहते हूं 
क्कि आपका इस श्रकार जझत्रु की प्रशंसा करना आपको शोभा नहीं देता। तब रावण 
कहता है-- 
विल्लुविद्या पेपुनू , विक्रम ऋ्ममु, गलितनवुनु, बाहुगव॑ राजसम, 
लादियों गुणमुल नधिकुडनहि, फोदंडदीक्षा गरनितो राज 
वरुनितो, रामभूवरुनितो नोरलू पकिचि चूड नेपद्ट्न नेन, 
साबिये इस्मूड्‌ जगमुलूयदु ? मेटि शूरुल पंषु पेच्चंग वलदे? 


( १४५ ) 


(धर विद्या-नेपुण्य, पराक्तम, झौयं, बाहुबल आदि गुणों में श्रेप्ठ राजा राम की समता 
फरनेवाला तीनो लोको में कोन है ? क्या भहान्‌ पराक्तमी व्यवितयों की महानता की प्रद्मयसा नहों 
करनी चाहिए ? 


रावण के इन शब्दों से फवि दो उद्देश्यो की पूति फरना चाहते हे। रावण फे ये 
वचन जहाँ एक ओर उसकी उदारता प्रकट करते हूं वहाँ वे शत्रु के द्वारा भी 
प्रशता प्राप्त करनेवाले श्रीरास के असाधारण एवं अलौकिक व्यक्तित्व पर भी प्रकाश 
डालते है । 

यही नहों, रावण अच्छी तरह जानता था कि श्रीरास विष्णु को अपर रूप हे 
और उनके हाथो मरने से मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिए, वह सोचता हूं फि युद्ध 
के लिए ललकारनेवाले दात्रु के सामने घटने टेककर म॑ अपनी दीनता क्यो प्रकट 
फरूे और अपनी वीरता फो क्यो करूकित फरू । जब मदोदरी राम की महिसा 
का वर्णन करके रावण को युद्ध करने से रोकने का प्रयत्न करती हूँ, तो रावण 
कहता है -- 

ये चेल्लभगुलू निक राघबुल बोनीक चपुदु। भूमिज नीय 
वारूठ बलडने, यदु गाक येनू श्रीरामु शरमुलूचे जत्तुनेनि 
ताकवासूलू मेच्च ना फोसचून्न बेकुंठ मेदुरागवच्चु निच्चटिक्कि 
ललन नीवेटिकि ? लक येमिदिकि ? दलकोन्नु मुक्ति सत्पथमु गेकोदु। 

(अब में किसी भी प्रकार राघवों फा वध करूँगा हो; मे सीता को नहीं दूंगा। यदि 
इसकी विपरीत में श्रीराम के शरो से ही सारा जाऊँगा, तो मेरा चिर अभिलषित 
स्वर्ग सेरे पास स्वयं आ जायगा और स्वर्ग के निवासी मेरी प्रशसा करेंगे । जब में 
मुक्तिपथ को प्राप्त करने जा रहा हूं, तबहे सुन्दरी ! मुभो न तुम्हारी आवश्यकता हु 
लका फो।) 


च 


वाल्मीकिरासायण सें सुलोचना का वृत्तात नहीं मिलता हैँ । तुलसी-रामायण 
की कुछ प्रतियों में इस कथा का बडा सरस वर्णन मिलता है। फिन्तु पडितो का विचार हूं 
कि तुलसी-रामायण का यह अंद प्रक्षिप्त है । रंगनाथ रामायण में इस महान्‌ साध्वी 
फे चरित्र का अत्यृत्तम चित्रण सिलता है । बेंगला-कवि साइकेल मधुसूदन ने अपनी रचना 
'मेघनाद-व्ध में सुलोचना के चरित्र को विशेष प्रधानता दी है और उस वीर एव 
सती-साध्वी स्त्री का एक भव्य चरित्र उपस्थित किया हैँ । ईनच्वजीत की मृत्यु के उपरफ्त 
उसकी वीर पत्नी सुलोचना अपने पति के सृत शरीर के साथ सती होना चाहती हूँ । 
अतः, वह अपने ससुर रावण से इच्रजीत के मृत शरीर फो मेंगा देने की प्रार्थना फरती हैं। 
किन्तु, रावण अपनी असमर्थता प्रकट करता हुँ; क्योकि इन्द्रजीत का शब शनत्रुओ के अधीन 
सें था । तब सुलोचना अपने पति का मृत दरीर प्राप्त करने के हेतु स्वयं साहस के साथ 
शत्रु-शिविर में चली जाती है । वहाँ पहुंचकर वह पहले रामचन्धजी से पति-शिक्षा देने 
फी प्रार्थना करतो हे । उसके साहस पति-भक्ति एवं निर्मेल चरित्र से प्रभावित होकर 
रामचन्द्र उसकी प्रार्थता स्वीकार करने को प्रस्तुत-से होते दीखते हे । तब हनुमान्‌ उन्हें 


बजा व 


( १६ ) 


पमभाते है कि ब्रह्मा का लेख भूठा नहीं होने देवा चाहिए। इस पर रामचन्द्र सलोचना 
को आइवासन दते हे कि अगले जन्म में तुम अपने पति के साथ चिरकाल तक सुसमय 
जीवन व्यतीत करने को उपरांत बैकठ-घाम प्राप्त करोगी। इसके पश्चात्‌ सुलोचना राम से 
अपने पति का ज्रीर मॉँगती हु । तब सुत्रीव उसे ताना देते हुए बहता है-- यदि तुम 
पतिव्रता हो,तो अपने मृत पति से बात्ताकाप करो ४ सुझोचना इस चुनौती को स्वीकार 
करती हैँ और युद्ध -भूमि में पड़े हुए अपने पति के शव के पास जाकर बड़े ओोजपूर्ण 
घब्दों में कहती है--यदि में सन, वचन, रर्म से अपने एतिक्की सच्ची भवित करती हूं, 
तो मेरे पति सजीव होकर मुझे वार्त्तालाप करें। तब मेघनाद का शव आँखें खोलकर 
कहता है--हे प्रिये! मेरे पिता ने ही मुझे सारा है। नहीं तो और किसकी ऐसी शक्ति यी 
कि मझो मार सके, काल की गति प्रवलू है। इतलिए चिन्ताभत करो ४ इतना 
कहकर इच्द्जीत की आंखें सदा के लिए बंद हो जाती हूं। इसके एशचात्‌ सूती सुलोचना 
अपने पति के शव को साथ लेकर जातो है और उसके साथ सती होकर देवलोक में 
पहुंच जाती 
कल7-फक्छ "ला की दृष्टि से भी रंगनाथ रासायण उच्छ कोटि का महाकास्य है । 
फला के उत्द्ृप्द चचत्कार इसके प्रत्येक पृष्ठ में दृष्टिगोचर होते हंं। कवि सरह्ष्त के 
फाव्य-शास्त्र के निष्णात विद्वान्‌ होने के कारण उदित-वेचित्र्य एवं अर्थगौरव, इन दोनो 
फा उचित अनुपात दनायें रखने में सर्वथा सफल हुए हैँ । उनकी क्ला-लाधना में पग-पण 
पर उनका हत्य बेटलेवाले अनुप्नास एवं यसक अलंकारों की छठा कवि के अगाध 
पांडित्य एवं भाषा पर उनके विलक्षण अधिकार का प्रमाण प्रस्तुत करती हूँ । भावों की 
मासिक अभिव्यंजना फे लिए प्रयुक्त अथलिकार इतने स्वाभाविक हुँ कि हम कवि की 
नोचित्य-प्रियता पर भसुग्ध हो जाते है । रंगनाथ रामायण की भाषा विल्क्षण साधुर्य एवं 
घंभीरता से परिपूर्ण हे । तेलुगु की साहित्यिक भाषा के जिन दो रूपो की चर्चा पहले की 
गई हैँ, उन दोनो झगो का सुन्दर सम्मेलन इस काव्य में हो गया हूँ । कवि 
का तेलग एवं संस्कृत दोनों भाषञों पर पुरा-पुरा अधिकार था और दोनो भाषाओ के 
एव्द-भांडार उनके आदेश का पारूम के लिए सर्वथा प्रस्तुत रहते दिखाई देते हूं । 
कवि ने तेल्गु की सजीव एवं मधुर महावरेदार भाषा के साथ संस्कृत-शब्दो का 


एंसा सुन्दर मेल कराया हूँ कि भाषा में मणि-कांचन-योग की-सी शोसा भा गई है । 
इसकी भाषा का एक नमूना नीचे दिया जाता है-- 


राज-तिलक चेतोविनिर्मलशिप्द्‌ विशिष्ठ, गौतम जावालि कह्यप कप्व वामदेवादलो 
वरमुर्तीइवदल सप्मादि बहुबेद चतुर बोबकुल भरतुडु रप्पिचि भय भवत लोप्प, परम सस्झृद 
दचोभंगुलू, मेरय नी रामुनकु प्ट्राभिषेकंदु सेयूडारूढ रियतितो! नि पलक दार पृत्ति 
मंगल तूर्यमुलू मोयुचुंड, जानकी रामुरू चदुरोप्प तेच्चि रमणीयतरसेन रत्तपीठयन, कोररोप्प 
निरवुर कूर्चुड बनि चि सानित वेदोवत मंत्र पूर्वक्मुग अभिषेकंव कर रथिचेय ना राम नौदल 
ना पूर्णदारि वार डब्यस्नप्पुडु तग चूडनोप्पे गीर्वार्ण सृस्यरू क्ीतेनल सेय पार्वती सहिदुड 
प्रषुर्तिपनोप्पु मंगजहर सोलि त्मल से तोदगु यंगा नदिय बोले फ्सनीयथ मगच ना तीयेंघरल 


( १७ ) 


अंश्रुक् फोलिकि भूतलंबुन निडि पोलपारे जूड हरिपाद मुन बुद्धि अय्यादि गंग 
घरणि प॑ बरगुविधबल्चु पडग बरिकिप रास भूपालछुंडपुडु हरुड्विप्णवबु, दानयनु 
माड्किनूंड । 

(भरत ने निर्मेलचेता एवं सदाचार-संपन्न वसिष्ठ, गौतम, जाबालि, परयप, बष्ठ, 
वामदेव आदि मुवीदवरों को तथा चतुर्वेद-पारंगत विबुधों को बुलाकर दिनय एवं भदित 
के साथ उनसे कहा--आप कृपया विधिदत्‌ श्रीराम का राजतिलक कीजिए । तब 
संगल-वाद्यो की धघ्वन्ति के साथ वे जानकी तथा राम फ्ो बुला लाये और रमणीय रत्तपीठ 
पर उन दोनो को आसीन कराया और बेदसंत्र-पुर्वक पुण्य सलिल से उनका अभिषेक 
किया। राम के सस्तक पर से गिरनेवाली वह पुण्य जलधारा देखने में बहुत ही रमणीय 
प्रतीत होती थी। देवताओ की स्तुतियो को प्राप्त करते हुए पार्वती के साथ विलसित 
होनेवाले परसक्षिव की जठा से भरनेवाली गंगा नदी की भाँति वह जलघारा अत्यत 
कमनीय दीख रही थी । वह (जलूघधारा) क्रमशः उनके चरणों से होकर पृथ्वी पर 
ऐसे गिरने रूगी, मानो विष्णु क॑ चरणों में जन्म लेकर पवित्न गगा पृथ्वी पर उतर 
रही हो। इस प्रकार, उस समय रासचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव की भाँति 
शेभायमान हुए ।) 


मुहावरों का सस्यक्‌ प्रयोग, भावों के अनुकूल भाषा, स्वाभाविक अनुप्रासो फी 
छठा, उक्ति-सौंदयं तथा ओज, प्रसाद एवं साधुर्य गुणो से युक्‍त शलो, ये सभी फ्रवि के 
विलक्षण पांडित्य तथा कवित्व-शब्ति का परिचय देते हें । 


वैसे तो अनुवाद का फार्य ही कुछ कठिन है; क्योक्ति कितना भी प्रयत्न क्या जाय, 
मूल की सुन्दरता अनुवाद में नहों आ सकतो । एक भाषा की श्रेष्ठ कलाकृति फा दूसरी 
भाषा के गद्य में सरस अनुवाद प्रस्तुत करना स्वभावत. कठिन फार्य है । तेलुगू और 
हिन्दी दो भिन्न भाषा-परिवार की भाषाएँ हे और उनके अपने-अपने मुहावर हूं। मुहादरो 
का अनुवाद तो हो नहीं सकता। हाँ, यह प्रयत्व अवश्य हो सकता है कि तेलुग मुहावर 
फा सिलता-जुलता हिन्दी-मुहावरा फा उपयोग किया जाथ। फिर भी, अनुवाद अनुवाद ही हे। 
अनुप्रास, यम्क आदि अलकारों का सौंदर्य एवं उक्ति-बेचित्र्य आदि अनुवाद में लाना 
कठिन है । उदाहरण के लिए-- 

_तोगल्‌ बेट्वितुमु दुष्टारि सतुल, तोगलू जानकि इक तोल गग 

_तोगलार ! इकभीद तोग येट्टि दनुचु, तोगतेहल चिदिभि बेतु रु पेच्चु पेरिगि। 


तोग' के कई अर्थ हे--दु ख, कप्ट, घरूल । यहाँ फचि ने यझक अलकार के 
हारा तोग' शब्द के प्रयोग से भिन्न-भिन्न अर्थों की अभिव्यजना की हु; किन्तु यह सुन्दरता 
अनुवाद में लाना असभव है। 

फिर भी, अनुवादक ने मूल के प्रति निप्ठा बरतते हुए यथ.सभव सूल रचना की 
सुंदरता को अनुवाद में लाने की भरपूर चेष्टा की है । उसे कहाँतक सफलता मिली हैं, 
इसका मूल्याकन करता सहृदय पाठकों का काम हूँ । 


( र८ ) 


में अंत में दक्षिण-भारत-हिन्दी-प्रचार-सभा के भूतपूर्व संयुवत मंत्री परम आदरणीय 
पडित अवधनदनजी के प्रति अपनी हादिक क्ृतनज्ञता प्रकट करता हूं, जो इस ग्रन्य के 
संपादन का कार्य बडी दक्षता के साथ संपन्न करते हुए लगातार मेरी सहायता करते रहे। 
मे॑ विहार-शणष्ट्रभाषा-परिषद्‌ का भी अधभार मानता हूँ, जिसने सुर्भे इस कार्य 
के लिए बोग्य समझकर नेरें द्वारा यह अनुवाद कराया । यदि यह प्रन्य हिन्दी-भाषा- 


भाषधियों फो तेलुगु की विपुल साहित्य-संपत्ति का किचित्‌ भी आभास करा सकेगा, तो से 
अपने परिश्रम को सफल मानूँगा । 


श्री रामनव सती 


ता० १६, शके १८८२ ए० सी० कामाक्षि राव 
प-४-१६६० ६ई० 


विषयानुक्रमणी 


परिचय एन्डे 
यरत/एवनए शनि 
बालकोड १-4९ 


१ देवस्तुति---३, २ ग्रन्थ-रचना का कारण--४, ३ कथा का प्रारभ--६, 
४ कुश-लव का रामायण-गान--&, ४ परुत्रकामेष्टियज्ञ करने के लिए दशरथ का मत्रियों 
से परामर्श--8, ६ ऋष्यश्वग का वृत्तान्त--१०, ७ वेश्याओ के साथ ऋष्यश्व॒ग का 
रोमपाद के घर आना--१२, ८ दशरथ का यज्ञदीक्षा लेना--१४, & रावण के अत्या- 
चारो के बारे में ब्रह्मा से देवताओो की शिकायत--१४, १० देवताओ का विष्णु की 
स्तुति करता--१५, ११ दशरथ को यज्ञपुरुष का पायस देना--१६, १२ देवताओ को 
वानरो के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्मा की सलाह--१६, १३ श्रीराम आदि का 
जन्म---१७, १४ श्रीरामादि का बचपत--१5०, १५ विदवामित्र का आगमन--१८, 
१६ यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भेजने के लिए राजा से विश्वामित्र की प्राथंना--१६, 
१७ राम-लक्ष्मण को विदश्वामित्र के साथ भेजने के लिए वसिष्ठ की सम्मति--२०, 
१८ विद्वामित्र के साथ राम-लक्ष्ष्ण को भेजना--२१, १६ अनगाश्रम का 
वृत्तान्त---२१, २० विद्वामित्र का श्रीरामचन्द्र को ताडका का वृत्तान्त सुनाना--२२, 
२१ ताडका का वध--२३, २२ विद्वामित्र का श्रीराम को भृशाइव-सतान-रूपी दछास्त्र 
देता--२४, २३ कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तात सुनाना--२६, रहें 
वद्वामित्र का यज्ञ--२६, २५ कौशाबी का वृत्तात--२5, २६ गंगा नदी का वृत्तात--३३ , 
२७ गगावतरण को कथा--३५, २८ अमृतन्मथन की कथा--३६, २६ गौतम 
के आश्रम का वृत्तात--४२, ३० मिथिला में आममन--४३, ३१ विद्वामित्र को 
दवित का परिचय---४४, ३२ शिव-धनुष का वृत्तात--५३, ३३ शिव-धनुभग---५४, 
३४ दशरथ का वशक्रम--५८, ३५ राजा जनक की वशावली--६०, ३६ सीता 


और राम का विवाह--६३, ३७ परशुराम का गर्व-भग--६५, रे८ अयोध्या 
में प्रवेश---६८ । 


झयोध्यय्कोीड ७९-१२२ 


१ रामराज्याभिषेक का सकल्प--७३२, २ मथरा की कुमत्रणा--७६, ३ कैकेयी 
के महल मे दक्षरथ का आगमन--७८, ४ दशरथ से कंकेयी का वर माँगना--८० , 


( २० ) 


५ कैकेबी के भवन में राम का दश रथ से भेंट करता--5२, ६ कौसल्या का दुख --८४; 
७ लक्ष्मण का क्रोव और राम का समकाता---5५, झ राम का कौसल्या 
को धैर्य देना--5७, ६ राम का अभिषेक-बग का वृत्तात सीता को सुनाना--छ८; 
१० रान का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलने की अनुमति देना--६०, १६ राम- 
लक्ष्मण का सम्पत्ति-दान--६१, १३ त्रिजठाख्य को राम का गायो का दान देना--६१॥ 
१३ सीता-लक्ष्मणसहित रामका दशरथ के दर्शावा्थ जाना--६२, १४ कैकेयी पर वसिप्ठ 
का ऋब--६५, १५ राम का दगरव को सात्वता देना--६६, १६ सीता को सीख 
देना--६६, १७ राम का वन-गमन--&७, १८ गुह से राम की भेंट--१००, १६ 
राम का गगा पार करके वन में प्रव्रेश करना--१०२, २० काकासुर-बृत्तात--१०३, 
२१ सुमत्र का अयोध्या पहुँचना--१०३, २२ दणअरथ का कौसल्या को अपने शाप का 
वृत्तात सुनाना--१०४, २३ दशरथ का स्वर्गवास--१०5८, २४ भरत का अयोध्या में 
प्रवेश---११०, २५ भरत का कौसल्या के घर जाना--१११, २६ भरत का राम के 
पास जाना--११३, २७ भरत का भरद्वाज के आश्रम में पहुचना--१ १४, २८ भरत 
की राम से भेंट--११६, २६ भरत का रास को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना--१ १७, 
३० श्रीराम को जावालि का उपदेश--१२०, ३१ पादुका-दान--१२० । 


ऋएफण्यकीड 7९३-/४० 
१ चित्रकूट से प्रस्थान--१२५, २ राम का दण्डक वन की यात्रा करना-- 
१२६, मे विराव का वध--१२६, ४ श्रीराम का शरभग के आश्रम में पहुँचना---१२७, 
५ श्रीराम का सुतीक्षण मुनि के आश्रम में पहुँचना--१२८, ६ मदकर्णी का वृत्तात-- 
१३०, ७ अगस्त्य से भेंट--१३०, ८ जठायु से मित्रता--१३२, ६ हेमत-वर्णन--- 
१३२, १० जवुमालि का वृत्तात--१३३, ११ चूंणखा का वृत्तात--१३६; १२ खर- 
टदूपण का वब--१३६, १३ लका में अकपन तथा रावण का वार्त्तालाप--१४५; 
१४ घूंगल्ला का रावण से दीनालाप--१४६, १५ रावण का पुत्र मारीच के पास 
जाना--१४७, १६ मारीच का पुनः उद्वोवन--१४८, १७ मारीच का माया-मृग के 
रूप में आना--१४६, १८ राम का माया-मृग का पीछा करना--१५१, १६ भिक्षुक 
के वेश में रावण का सीता के पास आना--१५३, २० जानकी का शोक--१५५, 
२१ जठाय्‌ू और रावण का युद्ध--१५६, २२ जानकी को अज्नोकवन में रखना--१५६, 
२३ श्रोराम का ढु ख--१५६, २४ लक्ष्मण का राम को सात्वना देना--१६३, २५ 
जटायू का अग्ति-सस्कार करता--१६५, २६ कवंघ का वध--१६६, २७ राम-लक्ष्मण 
की शवरी से भेंट--१६७, २८ श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना--१६८। 


मकिश्किकाकाड ९७९-२९० 


१ पपासरूदर्भन--१७३, २ हनुमान की राम से भेंट--१७५, ३ हनमान्‌ का 
अपने जन्म का दूत्ताव चुनाना--१७६; ४ नुन्नीव का सताके आभूषणों को देवा--१७८, 


( २११ ) 


५ वालिनसुग्रीव का दंदवयुद्वध--१८३; ६ तारा का वालि की रोकमा--१५५; 
७ वालि का सहार--१८७, ८ तारा का शोक--१५६; ६ वालिका सुग्रीव को उपदेश 
देता--१६१, १० सुग्रीव को किष्किधा का राजा बनाना--१६२, ११ राम का माल्य- 
वंत पर पहुँचना--१६३, १२ लक्ष्मण का किष्किधा में जाना--१९५; १३ सुग्रीव का 
साल्यव॒त पर पहुँचता--१६७, १४ सीता के अन्वेषण के लिए सुग्रीव का वानरो को 
भेजना--१६८, १४ हनुमान्‌ को मुद्रिका देता--१६६, १६ महर्षि कइु के आश्रम 
में--२०१, १७ स्वयप्रभा का सत्कार--२०२, १८ वानरो की व्याकुलता--२०३, 
१६९ सपाति से भेंद--२०४, २० सीता का पता बताना--२०५, २१ वानरो का 
अपनी शक्ति का परिचय देना--२०६, २२ समुद्र लाँघने के लिए हनुमान्‌ को प्रेरित 
करना--२०७, २३ समुद्र पार करना--मैनाक से भेंट--२०८ । 


इन्द्रकोड २११-२७६ 
१ हनुमान्‌ का लका में प्रतेश--२१३, २ लकिणी का हनुमान्‌ को रोकना-- 

२१४, ३ हनुमान्‌ का लका में सीता का अन्वेषण --- २१५, ४ हनुमान्‌ का रावण 
के अत पुर में प्रवेश करना--२१६, ५ हनुमान्‌ का रावण के उद्यान में जाना--२१८, 
६ हनुमान्‌ की सीता से भेंट--२१६, ७ सीता से रावण का प्रलाप--२२०, ८ सीता 
का रावण की निन्‍्दा करना--२२२, &€ मनन्‍्दोदरी का रावण को उपदेश--२२३; 
१० राक्षसियो को सीता को दुख देना--२२४, ११ त्रिजटा का स्वप्न--२१२४, 
१२ हनुमानू का सीता को राघवों का वृत्तात सुनाना--२२५, १३ हनुमान्‌ का सीता 
को राम की अंगूठी देना--२२६, १४ सीता का सदेह--२२६, १५ अशोकवन का 
ध्वस--२३०, १६ हनुमान्‌ का राक्षसों का वध करना--२३१, १७ अक्षयकुमार का 
हनुमान्‌ पर आक्रमण करना--२३५, ६८ इन्द्रजीत का हनुमान्‌ को बन्दी बताना-- 
२३७, १६ हनुमान्‌ का रावण को अपने आगमन का कारण बताना--श१३८, २० 
लका-दहव--२३६, २१ अगद आदि वानरो से हनुमान्‌ की भेंट--२४२, २२ वानरो का 
मधुवन में विचरण करना--२४३, २३ राम को सीता का कुशल-समाचार सुनाना-२४४ । 


सु्द्धकांड २४७४-७७४७ 
१ श्रीराम का हनुमान्‌ की प्रशसा करना--२४६, २ लका के वैभव का वर्णन-- 

२५०, हे कपिलसेनाओ की युद्ध-यात्रा--२५२, ४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र 

को देखना--२५३, ५ सध्या-वर्णन--२५४, ६ मत्रियों के साथ रावण की मत्रणा-- 
२५५, ७ दानव-वीरो के दर्पपूर्ण वचन--२५६, ए८ राक्षस-बीरों को विभीषण का 
उपदेश---२५७, ९ रावण को विभीषण का हितोपदेश--२५८, १० कुभकर्ण को सीता- 
पहरण का वृत्तात सुनाना--२६०, ११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का 
परिचय देना--२६२; १२ विभीषण द्वारा इच््रजीत के दभ की निदा--२६२, ३ 
रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना--२६३, १४ विभीषण का अपनी 
माता के भवन में जाना--२६५, १५ विभीषण की शरणागति--२६६, १६ हनुमान 


( २२ ) 


का विभीवण की योग्यता राम को समावा--२६७, १७ विभीषण को स्तुति---२६८; 
१८ त्रिकूट पत्रत की उत्पत्ति की कथा--२६६, १६ विभीषण का राम को रावण के 
बैमव का परिचय देता--२६६, २० राम का विभीषण को लका का राजा वबनाना-- 
२७१, २१ शुक्र का सदेश--२७१, २२ राम का दर्भ-जयतन--२७२, २३ राम का 
समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रशोग करता--२७३, २४ समुद्र का राम से प्रार्थना करना-- 
२७५, २४ सेतु-बन्धचन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देता--२७६, २६ सेतु- 
बन्धत--२७७, २७ चन्द्रोदयय का वर्णव--२७७, २८ गिल॒हरी की भक्ति--२७६, 
२६ सेतु को देखकर राम का हित होता--२००, ३० राघवों का सुवेलादि पर 
पहुँचना--२८१, ३१ कैकसी का हितोपदेश---२८२, ३२ शुक तथा सारण का राम की 
सैन्य-शक्ति का परिचय पाना--२१८४, ३३ सारण का रावण को कपियो का परिचय 
देतना--२८५, ३४ शुक्र का रावण को राम का पराक्रम सुनाना--२८७, ३४५ राम के 
माया-बतुष तथा सिर दिखाकर सीता को भयभीत करना--श१८८, ३६ माल्यवान्‌ का 
हितोपदेश--२६०, ३७ सूवेलादि पर से राम-लक्ष्मण का लका को देखना--२६२, 
३८ रावण तया सुग्रीव का दद्व-युद्धझ--२६३, ३६ अगद का दौत्य--२६५, ४० रावण 
का अपना वैभव प्रदर्शत करना--२६७, ४१ रामका रावणके छत्र-चामरों पर अस्त्र 
चलाना--२६८; ४२ रावण का राम की घनतुविद्या का प्रशसा करना--२६६, ४३ 
वानरोका लका ध्वस करना--२६९, ४४ राक्षसों तथा वानरों का भीषण सग्राम-- 
३००, ४५ युद्धभूमि का वर्णन--३०२, ४६ इन्द्रजीत का माया-युद्ध--३०४, ४७ 
नाग-पाजवद्ध दाशरथियों को देख सीता का दु खी होना--३०६, ४८ लक्ष्मण के लिए 
राम का विलाप करना--३ ०८, ४६ विभीषण तथा अगद का वानरो को घैर्य देता-- 
३०६, ५० नारद का आगमन--३१०, ५१ राघवो का नाग्र-पाश से मुक्त होता-- 
३१०, +*२ घपूम्राक्ष का युद्ध--३१२९, ५४३ जकपन का युद्धझ३१३, ४४ महाकाय 
का युद्ध--३१५, ५५ अगद के द्वारा महाकाय का सहार--३१६, ५६ प्रहस्त का 
युद्धब-३२०, ५७ नील के द्वारा प्रहस्त का वध---३२२, ५८ मदोदरी के हित-वचन-- 
३२३, ५६ मदोदरी की मत्रणा की उपेक्षा करता--३२४, ६० रावण का प्रथम 
युद्धड-३२४, ६१ विभीषण का राम को राक्षस-त्वीरो का परिचय देना, ६२ हनुमान्‌ 
का रावण से युद्ध करके मूच्छित होना--३२७, ६३ नील का रावण से युद्ध करता-- 
३१८, ६४ रावण का ब्रह्मणजक्ति से लक्षण को गिराना--३२६, ६५ राम-रावण 
का प्रथम युद्ध३३०, ६६ रावण का खिन्न होकर लका लौट जाना--३३१; 
६७ राक्षमों का कुमकर्ण को जगाना---३३१, ६८ राघवों की युद्ध-यात्रा पर कुमकर्ण का 
ऋ्रद् होता--३३३, ६६ कुमकर्ण का शाप-ृत्तात---३३५, ७० कुमकर्ण का हितोपदेश--- 
३३६ , ७१ रावण का कुमकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना--३३८ , ७२ कुभ- 
कर्ण की गर्वोक्तियाँ--३३६, ७३ कुभकर्ण का युद्ध के लिए जाना--३४०, ७४ वानर- 
कुमकर्ण का युद्ध--३४१; ७५ कुभकर्ण और हनुमान्‌ का युद्ध--३४४, ७६ सुग्रीव 
तथा कुमकर्ण का युद्ध-३४५, ७७ कुभकर्ण का मूच्छित सुग्रीव कों लका ले जाना--३४५, 
७८ कुमकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना--३४६, ७६ विभीपषण कुभकर्ण बौर का 


( २३ ) 


वार्तालाप---३४८, 5८० श्रीराम के द्वारा कुभकर्ण का सहार--३५०; ८१ कुभकण की 
मृत्यु पर रावण का शोक--३५१, ८२ अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसों की युद्ध 
यात्रा--३५२, 5रे अगद तथा नरातक का दढ्-युद्धझ--३५५, एछ४्ं देवातक तथा त्रिशिर 
का अंगद पर आक्रमण करना--३५६, ८५ हनुमान्‌ आदि वीरो के द्वारा त्रिशिर आदि 
राक्षयों का वब--३५६, ८६ अतिकाय का युद्ध--३५७, ८७ लक्ष्मण तथा अतिकाय 
का दन्द्व-पुद्ध---१६०, ८८ अतिकाय का वध--३६१, 5६ इद्रजीत का द्वितीय युद्ध-- 
२६२, ६० ब्रह्मास्त्र से इच्रजीत का राम-लक्ष्मण आदि को मूच्छित करना--३६४; 
६१ हनमान्‌ का ओषधी-शैलः लाकर वानरो की मूर्च्छा दूर करना--३६६, ६२ वानरो 
का लका जलाना--३६८, ६३ कुभ-निकुभ का युद्ध के लिए प्रस्थान--३६६, ४ 
सुग्रीव के द्वारा कुभ का वध--३७२, ६५ मकराक्ष का युद्ध--३७३, ६६ इन्द्रजीत 
का तूतीयः युद्ध--३७४, €७ इन्द्रजीत का होम करता तथा कृति नामक शक्ति प्राप्त 
करना--३७५, &८ रामका आग्नेय अस्त्र से इन्द्रजीतः की मायाकों दूर करनता-- 
२३७६, ६६ इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथप्राप्त करता--३७८५, १०० इन्द्रजीत का 
माया-सीता का सिर काटना--३५१, १०१ इन्द्रजीत का निकुभिल-यज्ञ करना--३८२, 
१०२ लक्ष्मण का शोक--३८३, १०३ इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों 
को समभझाना--३८४, १०४ लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान--३८५, १०४ निकुभिल- 
होम में विषध्त--३८५, १०६ लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के 
वचन कहना--३८६, १०७ इन्द्रजीत तथा लक्ष्मण का युद्ध--३८७, १०८ इन्द्रजीत 
का वध--३६०, १०६ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक--३६३, ११० रावण 
का सीता का वध करने के लिए जाना--३६४, १११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना 
का शोक--३६५, ११२ सुलोचना का राम की स्तुति करना--३६७, ११३ सुलोचना 
का सहगमन--३६६, ११४ रावण का अपनी प्रधान सेता को युद्ध के लिए भेजना-- 
४००, ११५ वानर-सेना को हनुमान्‌ आदि का प्रोत्साहन देना--४०२, ११६ राक्षस- 
स्त्रियों का रावण की निन्‍दा करना--४०३, ११७ रावण का द्वितीय युद्ध--४०४५, 
१६८ सुग्रीव के ब्वारा विख्पाक्ष आदि राक्षसों का वध--४०७, ११६ रावण का राघवों 
पर आक्रमण करना--४०६, १२० रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मूच्छित होना-- 
४११, १२१ रावण का चिंतित होना--४१२, १२२ लक्ष्मण की मूर्च्छा पर राम का 
शोक--४१४, १२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान्‌ का द्रोणाद्वि को जाना--४१५, 
१२४ कालनेमि का वृत्तात--*१६, १२५ मकरी का हनुमान्‌ को निगल जाना--४१८, 
१२६ धान्यमालिनी का वृत्तात--४१९, १२७ कालनेमि का वध--४२१, १२८ भरत 
का स्वप्त--४२२, १२६ हनुमान्‌ का माल्यवाम्‌ से युद्ध करना--४२३, १३० लक्ष्मण 
को लिए राघव का शोक--४२४, १३१ हनुमान्‌ का द्रोण-पर्वत ले आना--४२६, 
१३२ सजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर होता---४२७, १३३ रावण का शुक्राचार्य 
से परामर्श करना--४२६, १३४ पाताल-होम--४२९६, १३५४५ अगद का मदोदरी को 
रावण के पास घसीटकर लाना--४३१, १३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की 


( २४ ) 


महिमा बताना--४३३; १६७ रावण का तुतीय यद्ध के लिए प्रस्थान--४३५; १३५ 
वानरो के द्वारा खडगरोम आदि राक्षसों का वव--४३७, १३६ इन्द्र का मातलि के 
द्वारा राम को रब भेजना--४३८, १४० राम का रावण के वाणों का प्रतिवाण चलाना-- 
४४०, १४१ रावण का राम पर शूल चलाना--४४०, ६४२ अगस्त्य के द्वारा 
राम को बादित्यहृदय का उपदेश---४४१, १४३ राम-रावण का परस्पर दोषारोपण--- 
४४२; १४४ रावण की मूच्छा--४४३, १४५ रासका रावण के कर चरणो को खडित 
करना--४४५, १४६ आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से रामका रावण को जक्तिहीन कर 
देवा--४४७, १४७ ब्रह्मास्त्र से रावण का वव--४४८, (६४८ विभीषण का झोक-- 
४४६, १४६ मृत रावण के निकट सदोदरी का आना--४४६, १५० मदोदरी का 
विलाप--४५१; १५१ राम का विभीषण के द्वारा रावण की अंत्येप्टि कराना--४५३; 
१५२ विभीषण का राजतिलक--४५४, १५३ हनुमान्‌ का सीता को राम की विजय 
का समाचार देना--४५४; १५४ राम के आदेश से विभीषण का सीता को लिवा 
लाना---४५५; १५६ सीता का अग्निप्रवेश---.४५७, १५७ सीता-परिगहण -- ४५०; 
१५८ दगरथ के दर्गबन--४५९६, १५६ देवताओं का अभिनन्दन--४६०, १६० पुष्पक- 
बारोहण---४६१; १६१ श्रीरास का सीता को विभिन्न दृष्यो को दिखाकर समझाना-- 
४६२; १६२ राम के द्वारा शिवलिंग का प्रतिप्छापन---४६३, १६३ श्रीराम का 
सेतु को महिमा वताना--४६५; १६४ भरद्वाज मुनिका आतिथ्य--४६७, १६५ हनुमान 
का भरत को राघवों का कुशल-समाचार सुनाना--*६६, १६६ भरत-मिलाप---४७१, 
१६७ अयोध्या में प्रवेश---/9३; १६८ राजतिलक---४७४; १६९ मित्रों को प्रीतिभोज 
देवा--४७५ ॥ 


रंगनाथ जग़माथण 


श्रीरंगनाथ जरमाथण 


(बालकाँड) 


१. देव-स्तुति 


चरित रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तर । 
एककमक्षर प्रोक्त महापातकनाशनम्‌ ॥ 
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे, 
रघुनाथाय नाथाय सीताया पतये नम ॥ 


श्रीलक्ष्मीनाथ, दैत्य-विजयी, लोक-रक्षक, नित्य, सदानद, मोक्षदायक, कर्म-रहित, सृष्टि 
के स्वयभूत आधार, हृदय-कमल में स्थित भक्ति-रूपी आनन्द को व्यक्त करने के साधन-क्रम में 
तत्पर भुमर-हूपी भगवान्‌, गजराज को मोक्ष प्रदान करनेवाले, अपने आश्वित-लोक के वधु, 
ससार के बधनों से मुक्ति देनेवालें, वलि को बाँघने का दृढ़ सकलप करनेवाले, प्रणव-रूप, 
गोपिकाओ के हृदय में विहार करनेवाले, अबोध-गम्य आकारवाले, निराकार, योगियों के 
हृदय में ओकार-छूप में वत्तं मान, योगिसदर्णित, मोक्ष-प्रचारक, श्रुतियों के शिरोमणि, विश्युद्ध-चेतन्य 
स्वरूप, अतिलोकवासी, समस्त लोको का आश्रय, ब्रह्माण्डरूपी मुक्ता का आयतन, नित्याधार, 
अखिन तक्त्तानीत, आदि-अत्त-रहित, पवित्रात्मा, अविनाशी, वेद-रप्री कमल के लिए सूय, 
अक्षीण कल्याणो का आधार, निशशक मन से सद्भक्ति तथा सेवा करनेवाले भकतो के लिए 
दया-सिधु, करुणा-सिघु, बोधक, वोध्य तथा बोध--इन तीनो में व्यकत होनेवाले पूर्ण-रूप, 


& रंगनगाथ एयायण 


आदितत्व, तत्त्वमसि' आदि कथनानुसार भेदातीत, अभेद, प्रतापी परमेश्वर का (भक्ति-युवतत 
ध्याव करने के निमित्त) मैंने अत्यत वैर्थ के साथ नियमों का पालन किया, कर्म के बबनों 
को ठकराया, एकात में रहते हुए इन्द्रिय-व्यापारों को भुला दिया, सुस्थिर होकर सुलभ- 
साध्य तथा परिचित आसन (सुखासन) पर उपविप्ट हुआ, मन को भक्ति-रस-परिपूर्ण 
बनाया, (शरीर के भीतर रहनेवाली) वह॒त्तर नाडियो का विचार करके उनका परिमार्जन किया, 
एकचित्त तथा निर्मल मन से ताडियो में अत्यत सूक्ष्म रूप से व्याप्त पवन को रोका, 
मन को निव्चल बनाकर निरुद्ध प्राण-वायु को मूलाधार-चक्र मेँ प्रविप्ट कराया और उसे 
क्रमण. छह कमलों को पार कराते हुए चदमडल में पहुँचाया । वहाँ योगीन्द्रों के हृदय का 
भेद परखने के लिए परम-व्योम के रूप में स्थित अनादि ब्रह्म-स्वरूपा, अत्यत सूक्ष्म तथा 
निर्मेल नाडी को यूप, अविचल मन को यज्ञ-पत्रु, निप्ठानुरक्ति को बेदी, समस्त इन्द्रियों को 
काप्ठ, ज्ञान को अखड अग्नि तथा आनदन्योग को यज्न-फल के रूप में मानते हुए इच्छित- 
आनद-प्राप्ति के हेतु, कर्म के द्वारा प्राप्त होनेवाले मोक्ष रूपी परमेश्वर, अगोचर, कर्म-रहित, 
हमारे देव, कमलनत्रवाले, हमारे पालनहार, आदि नाराबण तथा अखिल लोकार्घीश की 
भक्ति, स्तुति, प्रार्थना एवं वदना की । अपने मन की इच्छा पूर्ण करने के निमित्त हार, 
कर्पूर, नीहार, गोक्षीर तथा तारको के सदृश उज्ज्वल चारदा देवी की उपासना की; चारु 
रामायण-रूपी चंद्र के जन्म-स्थान के रूप में विलसित होनेवाले वाल्मीकि का स्मरण किया, 
भारत-रपी मजरी के पारिजात, तत्त्ववेत्ता परागर-पुत्र का स्मरण किया और उनके पुत्र 
शुकदेव की उडी भक्ति से स्तुति करने के पद्चात्‌ में अपने मन में एक ऐसे ग्रन्थ की रचना 
करने का विचार करने लगा, जिसकी कथा के कथन से सभी सज्जन मेरा कीत्ति-गान करेंगे, 
जिसकी कया का वर्णन करने से मेरे इह-लोक और पर-लोक दोनो सफल होगे और जिस 
कथा के कथन से ईप्सितार्थ सिद्ध होगे और साथ-ही-साथ पुण्य की प्राप्ति होगी । 


२. श्रन्थ-रचना का कारण 

सृष्टि के समस्त प्राणी, जिस पुण्यात्मा की प्रणसा बडे आदर से करते हे, जो सदा- 
चार के पुण्य-फलस्वरूप सूर्य के समान उदित होकर कलिकाल का अघकार दूर करते थे, 
जो श्रेप्ठ वर्म-पयय का महत्त्व जानते थे, जिनके पवित्र तेज के समान झत्रु-रूपी नक्षत्रों के 
प्रकाश मद पड जाते थे, जिन्होंने अपने खडग की दीप्ति-रूपी गगा-प्रवाह में अन्य राजाओं 
के ललाट में लगे गर्व-पयक को थो दिया था, असमान वलशाली, सत्यनिष्ठ, शरणार्थी 
राजा-हूपी भूमरो के लिए (जिनका कर-कमल) आधार था, ऐसे कोनकाट भूपति के वज 
की कीत्ति वढाते हुए नय, विनय, दया के आगार महाराजा के पुत्र गोनरुद्र नरेंद्र महान 
प्रतापी तथा पवित्रात्मा थे । उनके पीत्र बुद्ध भूषाल अभग, अग्नतिम विक्रमी, कुल-गोत्र के 
सवर्दधक, देवेद्ध के समान वैभवणाली, थीर और विख्यात थे । उनके पुत्र अक्षीण दाक्षिण्य- 
बनी (अर्थात्‌ अक्षीण कृपावाले), धन-वान्य में कुबेर, मर्म में घर्मराज (युधिप्ठिर) के समान 
अति-पुण्य सौजन्य-्शील, अत्रुओ के लिए अति शौर्यवान्‌ वामदेव कारत्तिकेय, शुभजन्मा, 
कामिनियो के लिए कामदेव, अखड विक्रमी और रण-विश्ञारद थे । वें चदन, मदार-चद्विका- 
हार, कदली, कुद, इदु सम उज्ज्वल कीर्निमानू, गोनवश-रूपी पारिजात के फल-स्वरूप 


बालकाड 2 


दीखनेवाले, गोनवश-रूपी उदयाद्वि पर भानु-सम दीप्त होनेवाले, गोनवश-रूपी क्षीरसागर 
के (उत्पन्न) चद्र सम सुशोभित, अपनी कीत्ति को दिगू-दिगतो में व्याप्त करनेवाले, अपने 
दान-धर्म के ह्वारा सबकी प्रणसा प्राप्त करनेवाले, अपने असमान पौरुष से वडी आसानी से 
शत्रुओं का नाश करनेवाले, महा बलणाली एवं प्रतापी राजाओं के लिए वज्ञपाणि सम 
दीखनेवाले, (शत्रु) नृप-वन के लिए साक्षात्‌ अग्निदेव, सत्यनिप्ठ, महावलशाली बत्रु-सेनाओ 
को मथने में मयर पर्वत की भाँति प्रचड रूप धारण करनेवाले, अपने खड्ग-रूपी सूर्य-विम्व 
की प्रभा से प्रतापी राजा-रूपी अधकार का नाश करके अमर-वधुओ के सुख-कमलो को 
वीर-मूमरो से अलकृत करनेवाले, शत्रुओ के प्राण-रूपी अनिल का सेवन करखेवाले श्रेष्ठ 
भुज-भुजगो ( सर्प-रूपी भुजाओं ) पर राज्य-भार वहन करनेवाले थे, वे कुरु, केरल, अवती, 
कुतल, द्रविड, मरु, मत्स्य, करुष, मगध, पुलिद, सरस, पाण्ड्य, कोसल ओर बर्बर की राज- 
सभाओ में प्रणसा प्राप्त करनेवाले, साम-दाम-भेद आदि नीतियों में निपुण, प्र।चीन राजाओं 
के समान समस्त बेभवों से युक्त तथा नय, विनय आदि उपायो से सुस्थिर विजय 
प्राप्त किये हुए, यशस्वी विद्वुलनरेश, राजाओ में सर्वज्ञ, नरेशों से पूजित, सफल जगद्धित- 
चातुय्यं-घुरी, एक दिन अपनी राज-सभा में चैठे हुए थे । उस समय पुराणवेत्ता, जास्त्रन्, 
काव्य-ताटक-शिरोमणि, मित्र, मत्री, पुरोहित, आश्वित, पुत्र, सामत राजा और बवहुश्ुत उनकी 
सेवा में उपस्थित थे । राजा भूलोक के देवेन्द्र के समान बडे उत्साह से रसिकजनों द्वारा 
भारत, रामायण आदि का पाठ सुनकर बहुत प्रसन्न हुए । 


तत्पश्चात्‌ वे रसिक-णेखर (राजा) राम-कथया-सुधा से अनुरक्त हो, सभा में यो बोले-- 
तेलुगू में रामायण को सुदर ढग से कहने की कविता-शवित रखनेवाले कवि इस ससार 
में कौन हे ? तब पडितो ने उस उदात्त, यशस्वी विट्वुलनरेश से कहा-- - 

(महाराज) आपके सुपुत्र, निपुण, पापरहित, नीति-निष्ठ, सर्वज्ञ, अनघ, शिप्ट-सपन्न, 
सर्वपुराणवेत्ता, सुदर कलाओ के मर्मज, सज्जनों को आश्रय देने में ही सुख का अनुभव 
करनेवाले, कविसावंभौम, कवि-कल्पतरु, कवि-कुल-भोज, कवीच्, शत्रु-राजाओ के लिए वज्ञ- 
पाणि, शत्रु राजा-हझपी वन के लिए प्रवण्ड पावक के समान दीखनेवाले, जिनके भयकर 
खड्ग में स्वर्गलोक तक प्रतिबिबित है, त्रिलोक-दुर्दम, श्रेष्ठ-साधु-जन-रूपी कमलो के लिए 

- सूर्य, पुरुषश्नेप्ठ, आपके परम भकक्‍त, निखिल शब्द, अर्थ, गुण आदि के ज्ञाता, महापडित, 
रामायण के मर्मज्ञ बुद्ध-नरेश (रामायण को कथा तेलुगु में कहने की) कविता-शक्ति 
रखते है । (काव्य रचने के लिए) आप उन्हें आदेश दें ।” 

यह सुनकर उदात्त चरित्रवाले मेरे जनक ने मुझे बडे स्नेह से बुलाकर यह आदेश 
दिया--रामायण की कथा पुराणों के ढग पर तेलुगु भाषा में मेरे नाम पर लिखो कि 
ससार के कवि और पडित उसकी प्रशसा करें ।” उनके मृदु वचनो से अत्यत हर्षित होकर 
उनकी आज्ञा का पालन करने के हेतु शत्रुओं के लिए भयकर मूत्ति, महानू, ललितसदुगुणा- 
लकारवाले, निश्वल दयालु, धन्यात्मा तथा पृण्पात्मा मेरे पिता विट्वलनरेश के नाम पर 
श्रीरामचन्द्र का चरित्र, इस ढंग से लिखूँगा कि राजा, पडित, रसिक, सुकवि श्रेप्ठ, 
गोष्ठियों में (उसे सुनकर) ह्षित होकर उसकी प्रशसा करेंगे और जिसमें, शब्द, अर्थ, भाव, 


दि एस्यगनाशत्र स्यायण 


गति, पद, बब्बा, अर्थ-गौरव, बति, रस, कल्पना, प्रासन, अस़मान रीतियाँ जादि होगे और 
आदि कवि वाल्मीकि की कृपा से सभी सज्जन मेरी प्रशंसा करेंगे । क्या का प्रारभ यो है-- 
३. कंथा का प्रारंभ 

एक दिन श्रेष्ठ तपस्स्वाध्याय-निरत, महान्‌ शीलवान्‌ मुनिश्वेप्ठ नारद से अनघ, 
तयोनिधि वाल्मीकि ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया--हें मुने, आप कृपया वतलाइए कि इस 
ससार में, श्वोमान्‌, क्षमाणील, पृण्यात्मा, उन्नत, नीतिज्, प्राज्ष, दुर्दम, उत्तम, जितकाब, अजेय, 
ईप्याहीन, सपन्न, सृत्रती, उदार और चउरित्रवान्‌ कौन हैं ? किसके क्रो से इद्रादि देवता 
डरते रहते है ? ऐसा व्यक्ति क्या, कभी हुआ हूँ या आगे चलकर इस पृथ्वी पर जन्म 
लेनेवाला हैं ?” 


बे 


यह सुनकर लोकजाता नारद मुनि ने अपने मन में बहुत देर तक सोंच-विचार कर 
क्हा-- इस पृथ्वी पर श्रीविष्णु, महाराज व्चर्थ के यहाँ जन्मे हे । वे नियतात्मा, अति- 
चौर्यनिधि, कृपानिधि, जयी और स्वजनों की रक्षा में विचक्षण हेँ। वे कबु-कवर, सुदराकार, 
विवादग ओप्ठ, पीन वक्ष, विद्याल-नेत्र, विजाल जवतस और आजानुवाहु हैँ । वे नियतात्मा, 
वेदवेदाग-कोविंद बेंदविदु, विवेकभृूषण, सूर्य के समान तेजस्वी, समुद्र के समान गमीर, 
अमराद्ि के समान घोर और पृथ्वी के समान क्षमागील हे । उनकी मूर्ति (लोगो को) 
बपनी जोर आहृप्ट करती है | वे कौसल्या के आानद-दाता, श्वीकर, दीप्तिमानू, त्रिलोक- 
पावन मूर्ति, राम के नाम से अवतरित हुए है । 


नर 


कप 


राजर्पि (विव्वामित्र) के (रामचन्द्र को) मॉगने तथा राजा के भेजने पर वे मुनि 
के साथ सये । (उन्होंने) यज्ञ की रक्षा की, दानवी का नाज्ञ किया, राक्षसो का सहार 
क्या, झिला को स्त्री बनावा, जिव-बनुष को तोड़ा जौर सीताजी से विवाह करके बडी 
स्थाति पाई । मीताजी के साथ जगेब्या जाते समय बड़े क्रोध से विप्र (प्रणुराम) ने 
बाकर उन्हें रोका, तो वे उनसे जूक पडे और उनका बयुप छोनकर उसे तोड़ डाला । 
उसके वाद सव लोगों के हृव्यों को आनद ने भरते हुए वे अण्ोब्या पहुँचे 

जब पिता (राम को) युवराज वतारऊँगा--ऐसा कहकर अयोध्या का राज देते को 
उद्चत हुए, तव ढोठ मबरा ने कैकेयी के कान भरे । कंकेयी पहले ही युद्ध में दो वर प्राप्त 
कर चुकी थी। (राजा ने) राघव को कानन में भेज दिया । पिता के वचन से वंँबकर, 
वें सीता और लक्ष्मण के साथ वन में गये, जहाँ उन्होंने बड़े उत्साह से वनों में 


में तपस्या 
करनेवाले सण्मी मूनियों की रक्षा की, खर-दूपणादि राक्षमों के सर चारो से काट डाले, 


ऋ प्यमूक पर्वत पर सुग्रीद से मित्रता की, एक ही वाण से वालि का सहार किया, (त्तीता 
को पुत्र प्राप्त करने का) दृढ़ निः्रय करके सेतु को वाँचा तथा पापी दशक्ठ के दसों 
सिर छकाठ घडाने । ह 

उसके पच्चात्‌ आशज्ितों के कन्पवृक्ष रामचद्र, सीता के साथ, 


वनचर-समूह तथा 
इन्द्रादि देवताओं द्वारा स्तुति किये 


जाते हुए और खंवा प्राप्त करते हुए, (अबोध्या) जाये 
और अउतो पृज्य सामूज्य-लक्पो का पालन करते हुए तथा प्रजा को सुख पहुँचाते हुए कृत- 
इत्वय हुए हैँ ॥” 


बालकाड छ 


ईंस प्रकार श्रीराम का चरित्र अथ से इति तक कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को 
घले गये । मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि अत्यत हुं से अपने शिष्य भरद्वाज के साथ सज्जनता की 
मूत्ति, अकलुष जीवन-युक्‍्त, तमसा नदी के तट पर गये और उस नदी के जल से अपने 
अनुष्ठान का पालन करते रहे । उस नदी के किनारे (पेड पर) क्रौच पक्षियों का एक 
जोडा बडे प्रेम से मिलकर बैठा था । एक व्याध ने जब उनमें से एक को मार गिराया, 
तब क्रौची शोक से विलाप करते लगी । यह देखकर न्याय और धर्म का विचार करके 
मुनि उस व्याध पर क्रोध करते हुए बोले--हे निषाद, हे पापी, इन्होने तुम्हारा क्‍या 
बिगाडा था ? जब ये क्रौच बड़े प्रेम से मिले, तब तुमने इस प्रकार एक को क्यो मार 
गिराया ? इस पाप के कारण तुम बहुत दुख प्राप्त करते हुए अनेक वर्षों तक भटकते 
रहोगे ।” 


इस प्रकार व्याध को शाप देकर वाल्मीकि ने अपने शिष्य भरद्वाज से ठन्दोबद्ध शब्दो 
में कहा--“मेरे द्वारा कहे हुए बचनो पर बार-बार विचार करने पर मालूम होता है कि 
इन चार समवर्ण पृक्तियों में छनन्‍्दोबद्धता हैं । यह बडे आश्चर्य की बात है कि ये शाप के 
वाक्य अपने आप एक पद्म के रूप में प्रकट हुए है ।/ तब भरद्वाज आदि शिष्य बडी भवित 


००] 


से उस पद्य को (दुहराने) पढने लगे । अनघ वाल्मीकि अपने आश्रम को लौट आये । 


एक दिन ब्रह्मा उनके आश्रम में आये । वाल्मीकि ने उनकी अग॒वानी की, चरणों 
पर भुककर नमस्कार किया, कुशासन पर बिठाकर उनकी पूजा की और हाथ जोइकर अपने 
मुह से निकले छन्दोबद्ध शाप-वचन उन्हें सुनाया । तब ब्रह्मा ने मुस्कुराकर कहा--हे अनघ, 
यह वाणी पद्म के रूप में आपके मुख से व्यवत हुई है । नारद ने सारा राम-चरित मुझे 
सक्षेप में कह सुनाया है । आप उसको विस्तार के साथ सुनाइए । अपने आप वह चरित्र 
आपको सूक जायेगा ।” यो कहकर ब्रह्मा चले गये । 


इस प्रकार बडी ऋपापूर्वक कमलासन के वर देकर चले जाने के पश्चात मुनि ने 
निर्मेल मति से ध्यान लगाकर सोचा और रघुचरित, दशरथ की कथा, रघुराम का जन्म, 
राम का आचरण, ताडका-वधघ, उदृण्ड राक्षसों का गवें-भग, यज्ञ-रक्षा, गगा का महत्त्व, 
गौतम की स्त्री का श्ाप-मोचन, धनुर्भग, सीता-विवाह, अयोध्या जाते समय परशुराम का 
क्रोध, राम के युवराज्याभिषेक की तैयारी, दुष्ट स्त्री कैकेयी के कदुवचन, अभिषेक में विध्न, 
राम-वन-गमन, राजा का शोक, दशरथ की मृत्यु, दाशरथि से गृह की भेंट, गगा पार 
करना, तपोनिधि भरद्वाज से (राम की) भेंट, चित्रकूट पर्वत पर पहुँचना, भरत और राम 
की भेंट और उनका पादुका प्राप्त करके लौट जाना, दडकवन-गमन, प्रचड विराध का वध, 
पुण्यात्मा शरभंग के दर्शन, मुनियो को वचन देना, अगस्त्याश्रम में पहुंचना दिव्य अस्त्रो की 
प्राप्ति, मुनि के आदेशानुसार पर्ण-कुटी बनाकर निवास करना, (राम पर) मुग्ध होकर 
राक्षसी (शूप॑णखा) का आना, उसके साथ वार्त्तालाप, रामानुज के द्वारा उसका नाण, उधर 
रावण का वुद्धि-भूष्ट होना, कुटिल मारीच की मृत्यु, राक्षसराज (रावण) के द्वारा सीता- 
पहरण, राम का विलाप, जटायु की मृत्यु, कबध से भेंट, पपासरोवर को गमन, ऋष्यमूक पर्वत पर 
सुग्रीव से भेंट, उससे मित्रता, वालि-सुग्रीव के वैर का कारण जानना, श्षीराम का एक साथ 


दर रंगनाथ एयायण 


सातो ताड़ के पेड़ो को काट देना, वालि का वध, दारा का बिलाप, रविपुत्र (अगद) का 
राज्याभिषेक, माल्यवत में उस पुरुषोत्तम का वर्षा-काल विताना, काकुत्स्थ (राम) का कोप, 
कपियो का आना, अगूठी देकर (उन्हें) भेजना, वानरों के द्वारा सीता का अथक अन्वेषण, 
बिल का दर्शन, महेन्रगिरि का आरोहण, सपाती से भेंट, समुद्र को लॉघते समय वीच में 
मैनाक के दर्शन, सिंहिका की वायूपुत्र से मुठभेड और उसकी मृत्यु, लका राक्षसी को तग 
करना, उस स्त्री से लका का मार्ग जानकर लका में प्रवेश करना, अत पुर में सीता की 
खोज, अशोकवन का अवलोकन, वहाँ सीताजी का सदर्शन, विश्वास दिलाने के लिए अगूठी 
देकर उन्हें सान्‍्त्वना देना, अणोकवन को उजाडना, उस समय हनुमान्‌ का अक्षयकुमार को 
मार डालना, पवनसुत का वधन में पडना, लका नगर को जलाना, मानिनी सीता का चूडा- 
मणि देकर श्रीराम तथा हनुमान को उत्साहित करना, सूर्यकुलाधिप (श्रीराम) का लका 
प्र आक्रमण करना, समुद्र-तट पर पहुँचना, समुद्र का मार्ग देने से इनकार करता, श्रीराम 
का क्रोध, विभीषण का आगमन, विभीयण के दुख से राम का दु-खी होना, सेतु-बधन, 
जलधि को पार करना, सेना को (उचित स्थानों पर) नियुक्त करना, पराक्रम के साथ 
कुभकर्ण आदि उम्र वीरों को मार डालना, रावण का वबंब करना, दया से विभीषण को 
लकाधिपति बनाना, अनुपम शुद्धि (सीता का अग्नि-प्रवेश), ब्रह्मादि देवताओं द्वारा प्रशसित 
होते समय सीताजी की रामचद्रजी से भेंट, पुष्पक विमान में बडे कुतृहल के साथ समुद्र 
पार करना, सेतु पर श्रीकठ को प्रतिप्ठित करना, अयोध्या को लौट आना, भरत-मिलन, 
अद्वितीय ढग से रघुराम का सिहासनारूढड होना, कपि सेनापति, सुग्रीव, विभोषण आदि 
को विपुल सपत्ति देकर विदा करना, बडे प्रेम से सब प्रकार से प्रजा की रक्षा करते हुए 
उनका पालन करना, आदि सब वारतें अच्छी तरह जानकर चौवीस हजार इलोको और पाँच 
सौ सर्गो में तथा छह काडो में रामायण की रचना की । 
वाद की कथा उत्तर-काण्ड में लिखकर वाल्मीकि मुनि सोचने लगें कि कौन इस कथा 
का पाठ करने में समर्थ होगे और पृथ्वी में यह कथा कैसे फैलेगी ? उसी समय, शुद्धात्मा, 
मनसिजाकारवाले, मजुमाषी, सगीत-साहित्य-वेत्ता, मुनिवेषधारी कुश और लव उनके पास 
आये और हाथ जोडकर बोलें---हें अनघ, हम बडे उत्साह से रामायण पढने आये हे, 
हमें पढाइए । (यह सुनकर) ह्पषिंत होकर सुनि ने सोचा, मेरा मनोरथ पूरा हो गया । 
उन्होंने राम का चरित्र, जो ग्रेय, पठनीय तथा पुण्यदायक है, तत्री-लयान्वित रीति से उन्हें 
पढाया । उन्होंने भी श्वगारादि रस, वृत्ति-मेद, सधि, समास, शब्द और अर्थ जानते हुए 
उसका अध्ययन किया और स्थान-स्थान में, मुनि-समराजों में उसका गान करते हुए उनकी 
प्रणमा पाते रे । काकुत्स्थव्लभ (राम) ने भी अपने भाइयो के साथ बड़े कुतृहल से 
उन्हें सभा में वुला भेजा । उनके रूप, उनकी स्थिरता, उनकी वाणी आदि (श्रीराम को) 
बहुत श्रिय लगे । श्रीराम कथा सुनने लगे । वह कथा इस प्रकार है-- 


कलकोॉडे 6 
8. कुश-लव का रामायण-गान 

कीसल-देश में सरयू नदी के किनारे, पृथ्वी के उरु-भाग के समान अयोध्या नगर 
सृशोभित था । वह बारह योजन लवा, पाँच योजन चौडा थाऔर शिल्प-निपुण मय द्वारा 
निर्मिंम था । वह शत्रु-राजाओ की आँखों में खटकनेवाला नगर सूर्यवशी राजाओं की राज- 
धानी था । वह रत्तमय गोपुर, मणिमय तो<ण, मणिमय कुद्टिम (फर्श ), गवाक्ष, क्रीडा- 
गृह, $दक शैल (बनावटी पवव॑त), पट्ह-नाद (नगाडे की आवाज), विज्ञालकाय हाथी, 
उत्तम घोडे, नाता प्रकार के रथ-समूह, सेना, स्वच्छ सौध, वाजार, कमतीय उपवन, सरोवर, 
तालाब, बावड़ी ऊख के खेत, धान के खेत, गहरी खाई तथा महलो से भरा हुआ ससार- 
भर में विख्यात था । उस नगर में दशरथ नामक राजा राज्यू करते थे, जो धतुविद्या में 
निपुण, साम, दाम, भेद आदि चार उपायो के ज्ञाता, (भगवान्‌ के ऐश्वर्य आदि) षड़गुणो के 
आगार, ( इच्छा, ज्ञान एव क्रिया ) शतक्तित्रय-सधानकर्त्ता, धर्मनिरत, कृताध्वर ( जिसने 
यज्ञ किया हूं), श्रीसपत्न, धर्मशास्त्र, पुराणादि के ज्ञाता, अजनदन, वाल्यावस्था से,निय्रमानुकूल 
प्रजा का पालन करते रहनेवाले परमपवित्र व्यक्ति, इन्द्र के निभित्त शबरासुर का गर्व भग 
कर इंद्र से मदार-पुप्पो को प्राप्त करनेवाले, इन्दुमती के पुत्र और सूर्यवश में श्रेष्ठ राजा थे । 


वे तेज, काति, त्याग, चातुर्य, उदारता, साहस, आदि सद्गृूणो के भाडार थे । 
वें उदित होते हुए सूर्य की भाँति अपने उम्र तेज से सप्त द्वीपो को दीप्त करते हुए शासन 
करते थे । उस नरनाथ के तीन सौ पचास रातनियाँ थी, जिनमें विशेष कर अचल शील- 
वाली कोसल्या, कुचकुभ-निर्जित परिधानवाली कैकेयी, पुण्यशीला सुमित्रा त्रयी विद्याओं 
के समान थी । इस पृथ्वी पर उनके हिंतैषी पुरोहित वसिष्ठ आदि पुण्य सयमी थे । पुण्यात्मा 
घृष्टि, विजय, सिद्धार्थ, अर्थशाघक, जयत, नीतिवेत्ता अशोक, धीमान्‌ मत्री सुमत्र आदि 
उनके आठ सचिव थे । सभी सचिव परस्पर मित्र और स्वामिकार्य में विचक्षण और चतुर थे । 
वे परम भर्मों के उद्घाटन में निपुण थे और विचार-पूर्वक प्रजा की रक्षा करते थे । 
समस्त कार्यों को सेमालनेवाले ऐसे आठ मत्रियो से युक्त राजा दशरथ अष्टाक्षर और अष्ट- 
भुजाओं से समन्वित नारायण की तरह सुझोभित थे । उनके राज्य में निर्बल, चुगलखोर, 
रोगी, दरिद्र, व्यभिचारी, अनाचारी, पापी, क्र, नीच, जड, मूर्ख, मद, एक भी व्यक्ति नही था । 
सारी प्रजा मणि-कुडल आदि से अल॒कृत, धर्मपरायण, कुलाचार-निरत, सकलशास्त्र- 
पारगत तथा विष्णु-भकत थी । इस प्रकार बडी कुशलता से राज्य का पालन करते और 
राज्य-सुब भोगते हुए राजा दशरथ एक दिन अपने मन-ही-मन इस प्रकार सोचने लगे । 


५. पुत्रकामेष्ठि यज्ञ करने के लिए दशरथ का मंत्रियों से परामर्श 


राजा -दशरथ अपनी निस्सतान अवस्था का तथा अपनी ढलती आयु का विचार 
-करते हुए बहुत दु.खी हुए । उन्होने अपने सभी श्रेष्ठ मत्रियों को बुला भेजा और उन्हें 
उचित आसन पर बैठते का आदेश देकर स्वय भी आसन पर बैठ गये । और उनसे इस 
प्रकार कहने लगे--“मैंने बहुत दान दिये, अनेक धर्म-कार्य किये, कई यज्ञ किये मौर बहुत 


 . 


कि 


९० रंग्न्ल्थ शयरपक 


सालो से जीवन व्यतीत कर रहा हैँ । मैने बडी कीत्ति पाई है । तुम्हारे जैसे स्नेहीं मंत्रियों 
के रहते हुए मुझे किसी वात का अभाव नहीं हैं| पुत्र-हीन होने का एकमात्र 5 ज़ ह्ठी 
मक्के है। कुल का उद्धार करनेवाले पुत्रों के विवा कोई भी व्यक्ति पुण्य और स्वर्गलोक 
क्वी प्राप्ति नहीं कर सकता । इसलिए मेरे भी पुत्र उत्पन्न होने चाहिए। समस्त ससार 
मेरी प्रथना करें, एत्र्थ में अच्वमेध यज्ञ करूँगा और उसके बाद पुत्र-कार्मेप्टि वज्ष करूँगा । 
इन यज्ञों के कारण मेरा हित होगा जोर में जरूर पुत्र प्राप्त करूँगा | राजा के यो कहने 
प्र वे सब बड़े सभुमचित्त होकर मन में हर्षित हुए । उन्हें प्रसन्न देखकर राजा मन में 
विचारकर वोले-- 
में जनुपम रीति से, बडे विनय के साथ अव्वमेब यज्ञ करूँगा, जिसकी प्रणसा देवता 
करेंगे और पुत्रों के लिए पुत्रकामेप्टि-यम चेत्र-पर्व रीति (दर्मकों की आँखों को तृप्ति 
देनेंदाली रीति) से करूँगा | ऐसा कहकर उन्होने आवश्यक प्रवन्ध करने के लिए सब लोगो 
को भेजा । उसी समय अनघ वसिप्ठ आदि मुनि वहाँ आये । (राजा ने) दण्डवत की और 
वडी श्रद्धा से उन्हें लिवा लाये और उनसे बोले--हे महान्‌ सबमी तथा पुण्यवान्‌ वसिष्ठ ! 
यथाओघक्र आप मुझे श्रेष्ठ अच्वमेव ये करवाइए, जिससे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हो 7 
इस पर (मुनि वोले)--(तुम्हारे द्वारा सपन्न होनेवाले अब्बमेध यज्ञ का निर्वाह हम करेंगे । 
उस श्रेप्ठ यज्ञ की महिमा का वर्णन करना क्‍या सहज हैँ ? इसके अतिरिक्त पुत्र-कामेप्ठि 
करने से तुम वन्यात्मा पुत्रों को प्राप्त करोगे । यह सुनकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ । 
उन्होने सबको विदा किया और रनवास में पहुँचकर सभी रानियो को यह जुम सवाद 
सुनाया । तब से वे प्रमन्नचित्त रहने लगे | एक दिन जनघ सूत (सुमत्र) राजा के पास 
आकर एकान्त में यो कहने लग्रे-- 


<. ऋष्यथूृग का वृत्तांत 

सुमत्र ने कहा-- हें महाराज, इसके पहले आपको सतान-प्राप्ति कैसे होगी, इस 
सम्बन्ध में मेने एक कथा सुनी थी। आप उसे सुने | अगराज के पुत्र गृणवाल्‌ रोमपाद के 
राज्य में न जाने उनके किस अपराब से वर्षा नहीं हुई । अपने राज्य में कही भी वर्षा 
न होते देख राजा बहुत दुखी हुए । उन्होने श्रेप्ठ मुनियो से वर्षा के निमित्त बहुत हवन 
करवाये, फिर भी वर्षा नहीं हुई | तव राजा को अत्यत दुख से पीडित देखकर मुनियों ने 
कहा-- हैं महीपाल ! हे राजचन्द्र! इस पृथ्वी पर वर्षा होने के लिए हम शुद्ध मन से आपको 
एक उपाय वठायेंगे । हे पर्वत के समान घोर! परहितनिरत विभाडक के पुत्र पुण्यनिधि 
ऋष्यम्धंग जन्म से नगरज्राम के सम्बन्ध में कोई ज्ञान व रखने के कारण स्त्रियो के नाम 
तक में अनभिन्न हैँ | वे तपस्वी की वृत्ति में जगलों में रहते हे । हें वनुधेश । उनके यहाँ 
बाते ही अनावृष्टि-दोष तुर्त दूर हो जायगा । इसपर राजा अपन मन में सोचने लगे कि 
उस मुनिश्वेप्ठ को नगर में कंसे ले भा सकूँगा । उन्होंने वुद्धिमान्‌ मत्रियों तथा मुनियों को 
बुलाकर बड़े प्रमन्न चित्त से पूछा । मुनियों तथा मत्रियों ने भी बडी प्रसन्नता से उपाय 
वतावे, तो राजा मन ही मन बहुत हर्षित हुए । मुनियों ने कहा--“महाराज, अभी 
भाप कई (प्रव्यर के) मिप्दान्न तथा सुन्दर वस्तुएँ देकर वेब्याओं को वन में सेजिए । 


/ 
का 


ब/लकाड गँ 


वे प्रौद् कामिनियाँ सीधे वहाँ जाकर, अच्छी तरह उस मुनि के दर्शन करेंगी, उनकी महिमा 
देखेंगी, उन्हें मिष्टान्न देंगी और बडे प्रेम से उनके मन को विचलित करेंगी । वे कामिनियाँ 
अपनी विलास-चेष्टाओ से उनके मन को रसाई बना देंगी और अपने मोहक रूप की माया 
का प्रभाव डालकर यहाँ वापस आयेंगी । तब वे भी उनके पीछे-पीछे यहाँ आयेंगे । 


यो कहकर सभी मुनि चले गये । उस ठिन रात्रि को राजा बहुत प्रसन्नचित्त रहे ! 
सबेरे उठते ही राजा ने मुनियो का स्मरण करते हुए बडी अनुरक्ति के साथ अनुपम यौवन- 
रूप-सपन्न, कामदेव के मोहन मत्र के सदृश सुन्दर तथा चतुर वेश्याओं को बन में भेजा । 
वें यूवतियाँ उस मुनि के वन में गईं और उनके आश्रम्त के पास जा पहुँची । उन्होने अपनी 
ताट्य-कला तथा सगीत-कला का परिचय मुनि को दिया । वे पृण्यनिधि यह न जान सके 
कि वे स्त्रियाँ हे, और सगोीत आदि का रसास्वादन न कर सकने के कारण सोचने लगे कि 
ये इस वन में रहनेवाली मदगामिनी कोई अनोखी मृगी है । एक दिन वे रमणियाँ उनके 
पास पहुँच गईं । उन्होनें कामिनियो को अच्छी तरह देखा, उनके कुचों का नाम पूछा, कुच्छो 
पर डोलनेवाले हारो का उद्देश्य पूछा और कहने लगे--“मेरे सिर पर तो एक ही श्वग है, 
लेकिन आपके उर पर दो श्यग निकल आये हे । आपके ये वल्कल वस्त्र बडे ही कोमल हे । 
ये अनुपम वलकल किस पेड से प्राप्त होते है ? आपके जटाजूट मेरी जठाओ के 
समान नहीं हे, वे चमक रहे हैं । आपके शरीर पर मली हुई राख सुगध दे रही है । 
आपके ये वेद-ताद श्रुतिमधुर हे । मेने इस वन में ऐसा दृश्य अबतक नही देखा हैं, 
न सुना हूँ । कही मुनियो की भी ऐसी वेष-भूषा होती है ? आप कहाँ के मुनि हे ?” 


उस महान्‌ व्यक्ति को अपने जाल में फेपते देख उन स्त्रियों ने हँपते हुए कहा-- 
“हैं मुनि, कर्ण-मधुर साम-गान करते हुए, उसके अनुसार शुद्ध रीति से पदन्यास करके 
दिखाना हम जानती हे । इंप् पृथ्वी पर हमारा कौशल जानना आपके लिए कहाँ सभव है ? 
इस तरह अपनों वचन-चातुरोी से उस मुनिनाथ को भुलावा देकर उन सुदरियो ने 
पूछ:-आप कौन हे ? किनके पुत्र हें ”? क्यो इस वन में रहते हे, बताइए । तब उन्होंने 
कहा--*में शुद्ध कीत्तिमान्‌, पुण्यात्मा विभाडक का पुत्र हूँ । मेरा नाम ऋष्यश्वग है । तप 
में महान्‌ निष्ठा रखते हुए तपस्या करने के लिए ही में यहाँ रहता हूँ । मेरे पिताजी 
भागीरथी में स्तान करने की इच्छा से योगिपुगवों के साथ गये हुए हे । वे अन्य देशो में 
ते जाकर बडी तपस्याएँ करते हुए अमल तथा भक्तियुकत चित्त से यही पर रहते हे । 
आप लोगो के यहाँ आने से में पापरहित हुआ, क्ूतार्थ हुआ । अपने पिताजी की क्ृपा से 
बहुन अधिक तपश्चर्या में लोन में भी यही रहता हूँ | इन वनो में आप जैसे नागर लोगों 
को , देखकर मुझे आइचय हुआ । क्या अब हम सब आश्रम में चर्ले ? ” 

यो कहकर उन मुनियों को (उन वार-वनिताओं को) अपने आश्रम में ले जाकर 
ऋष्पश्ञग ने उनका आदर-सत्कार किया । उन युवतियों ने प्रसन्नता से उन मुनि का आतिथ्य 
ग्रहण करने के बाद कहा--हें मुनिवर, यह लीजिए, हम अपने वन से श्रेष्ठ फल लाये हूँ ।' 
यो कहकर उन्होने स्वादिष्ठ एवं मनोहर लड्डू, पूडी और तरह-तरह के स्वादिप्ठ 
भिष्ठान्न उन्हें दिये । मुनि उन्हें खाते जाते थे और वीच-बीच में उनके स्वाद की प्रशसा 


श्र रंगन/शथ शायायण 


करते जाते थे । उन युवतियों की ओर देकर वार-वार मिठाई माँगतें, परवण-से -होकर 
हाथ फैलाते और कहते--हे मुनिवर, से ने अब तक ऐसे फल कही नहीं देखे । आपका 
ही तप श्रेष्ठ तप है ।' 
यह सुनकर उन युवतियों ने मुस्कुराते हुए अपनी तनुलताओं को उनके शरीर से 
छुलाकर, अपने सौरभमय उच्छ्वासों से उनके घैयँ को डिगाते हुए होलें-हौले अपने 
मुख-कमलो को उनके मुख से सटाया और मीठे वचन, हाव भाव, मबुर संगीत तथा मादक 
दृष्टियों से उन्हें मोहित कर उनके हृदय को रसाद्र करते हुए, अपने कुचों से कसकर 
आलिगन पाश में उन्हें परवण बनाया और फिर कहने लगी--हे अनघ, अब हमें आज्ञा 
दें कि अपने आश्रम को वापस जायें । यो कहते हुए विभाडक के आगमन के भय से 
पीडिते वे वहाँ से रवाना हो गईं और उस वन के निकट ही रहने लगी । उत्त कमल- 
लोचन रमणियों के जाने के पछचातू, ऋष्यश्वग ने यह सोचते हुए कि न जाने वे फिर कब 
लौट आयेंगी, सारी रात जागकर ही व्यतीत कर दी और दूसरे दिन वे उस जगह पर जा 
पहुँचे, जहाँ पहले दिन उन्होने उन रमणियो को देखा था । 


७, वेश्याओं के साथ ऋष्यश्रृंग का रोमपाद के घर आना 

पायलो का ककार करती हुई, राजहसो की गति से वे युवतिणं मुनि के पास आईं 
और प्रफुलल वदन हो चारो ओर से उन्‍हें घेरकर कहने लगी--हे मुनिवर, आप हमारे 
वन में पधारें । जब उन्होने स्वीकार कर लिया, तब वे उस श्रेष्ठ मुनि के चित्त को द्रवित 
करनेवाली वातें करते हुए, अपने उपायो तथा हाव-मावों से उनको मोह-मुग्ध कर लिया 
और उन्हें अगन्देंश में इस प्रकार ले आईं, जैसे शिकारी पक्षी किसी नये शिकार को पकड- 
कर ले जातें समय विस्तृत पथ के भय से उसे बचाने के लिए अपने हस्तपललव-रपी 
पालकी में (चंगुल में) ले जाता है । उस ऋष्यश्ग के आते ही अग-राज्य में घोर वर्षा 
होने लगी और जझस्य बढ़ने लगे । राजा सकल सौभाग्य से युवत हो सतुप्ट हुए । उन्होंने 
वी भक्ति से उस मुनि की पूजा की और अपनी पुत्री जानता का विवाह उनके साथ 
कर दिया | वें मुनि उसी राजा के यहाँ रहते हे । यदि दशरथ उस मुनि को अपने यहाँ 
ले आकर उनसे पुत्र-कामेप्टि यज्ञ करायें, तो वे (दशरथ) चार बहुश्रुत तथा महान पुत्र 
तथा भमृद्धि प्राप्त करेंगे । इस प्रकार मुझसे पहले सनत्कुमार ने कहा था । इसलिए आप 
उस ऋषप्यश्षग से भक्तियुक्त प्रार्थना कर उन्हें यहाँ ले आयें ॥7 

इस प्रकार कहकर सूत चले गये । उनके जाने के बाद मन में हर्ष तथा भक्ति 
का जनुभव करने हुए चतुर दशरथ उस राजा रोमपाद के यहाँ गये जौर मुनिश्वेप्ठ ऋष्यश्वग 
को प्रणाम करके कहा--हें पवित्र आत्मा मुनिराज, आप मेरी विनती सुनें | में अपने,मन 
में पृत्र प्राप्ति की इच्छा लेकर आपके यहाँ आाया हूँ । आप मुझे अपनाइए । राजा ने 
उनकी कूपा प्राप्त करने के लिए इस प्रकार उनकी स्तुति की और उनसे यज्ञ का ऋत्विक्‌ 
बनने की प्रार्थना की । फिर अनुपम पालकी में उन्हें ब्ठिकर अयोध्या के लिए 
रवाना हुए । उन्होंने दूतो के द्वारा अपने नगरनिवासियों को यह आदेश भेज दिया कि नगर 
इन्रपुरी के समान सुन्दर सजाकर रखा जाय । दतो ने नगरनिवासियों को यह आदेश 


ब/7लठकोछ र३ 


सुनाया । उन्होंने नाना प्रकार से नगर को सजाया और जहाँ-तहाँ दुदुभि, णशख, आदि का 
तुमुल नाद करने लगे । उसी समय राजा ने भी नगर में प्रवेश किया और मगलवाद्यों के 
बजते हुए, विघ्ननाशक (ऋष्यश्वग) को शाता देवी के साथ, बड़ी चतुरता से अयोध्या में लाये । 

राजा ने ऋष्यश्वग को लाकर अन्त पुर में ठहराया । अध्य-पादादि देकर विधिवत्‌ 
उनकी पूजा की और अपने को कहतार्थ मानकर प्रसन्न हुए । उसी समय कौसल्या आदि 
रानियो ने राजा की आज्ञा लेकर वडे हर्ष से शार्न्ता देवी को श्रेप्ठ भूषण, वस्त्र, माला 
आदि देकर बहुविधि से उनका सत्कार किया । 


बिक 


कुछ दिन के पश्चात्‌ सस्नार के प्राणियों को आनदित करने हुए वसन्‍्त ऋतु आई । 
तव राजा बडे उत्साह से ऋष्यश्ग के पास गये और बडी भक्ति से प्रणाम करके विनय 
किया--है सयमीग्रवर !' आप मुझसे यज्ञ कराके मेरा उद्धार कीजिए ।' तब उन्होने-- 
ऐसा ही हो, कहकर रविकुलोत्तम राजा दशरथ से आगे कहा--हे राजन, यज्ञ के लिए 
विधिवत्‌ आवश्यक सामग्री शीघ्र मेँगवाइए !! तब राजा ने योग्य व्यक्तियों को उन सब 
वस्तुओं का सचय करने के लिए भेजा और सब सामग्री मेंगवाई । (उन्होंने) सुमत्र को 
भेजकर कीत्तिमान्‌ केकयराज, अप्रतिहत तेजस्वी काणिराज, जनक महाराज, अगराज आदि 
पुण्यचरित्र नरेशों को यज्ञ देखने के लिए सविनय आमत्रित किया । (इसके पदचातृ) 
उन्होने सुमत्र से कहा--तुम शीघ्र जाकर पुण्यवान्‌ वेदवेदाग-पारगत, गृहस्थ, निपुण एव 
महिमा-समन्वित ब्राह्मणों को तथा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, महात्मा वसिष्ठ तथा वामदेव 
आदि (पुरोहितो) को लिवा लाओ । 


सुमत्र बडी प्रसन्नता से गया और बडी श्रद्धा से उन सबको लिवा लाया। (राजा ने) 
उन्हें अध्यं, पाद्य आदि देकर (उनका स्वागत-सत्कार किया) । वे अपने निर्मल ब्रत 
की निष्ठा के अनुकूल धघर्मसम्मत तथा उचित वचन यो बोलें-- है मुनिश्रेष्ठ, पुत्रहीन होने 
से अत्यन्त दुखी हूँ, पुत्र-प्राप्ति की इच्छा बलवती होने के कारण मित्रो के परामर्णग से 
अद्वमेब यज्ञ, तथा पुत्र-प्राप्ति के लिए पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करने के लिए इन ऋष्यश्षगजी 
को आमत्रित किया हैं । (अब) आपके अनग्रह का प्रार्थी हैँ ।” 

राजा की बातो से प्रसन्न होकर वसिष्ठ आदि तपोधन सुनियों ने कहा--हे रवि- 
कुलोत्तम, लोकहितार्थ पूत्रो को प्राप्त करने की आपकी इच्छा सर्वथा सगत हैँ । अब अव्व 
को छोडिए । इस अश्वमेंध से आपके विश्वरक्षक एवं उज्ज्वल परातक्र्मी चार पुत्र होगे ॥” 

इससे बहुत सतुष्ट होकर राजा ने यज्ञ के लिए योग्य जवनाश्व (तेज जानेवाला 
घोडा) को चुनकर, भुवनपावन मूत्ति की पूजा करके, उस घोड़े के ललाट पर अपना 
तामाकित एक पद्ट बाँवकर, एक साल तक उसे अपनों इच्छा से घूमने के लिए 
छोड दिया । उस अश्व की रक्षा के लिए पराक्रमी सेना तथा सामत नरेश भी सेजे । उसके 
वाद वसिष्ठ आदि मुनियों की अनुमति से अनुपम जिल्पकारों को बुलाकर सरयू नदी की 
उत्तर दिशा में बवेंद-विधि के अनुसार एक्र यज्ञ-शाला का निर्माण करने के लिए भेजा 
और सभी देश के राजाओं तथा उन देशो में निवास करनेवाले विप्न, क्षत्रिय, बैर्य तथा 
शूरों को भी आमत्रित किया । 


श्छ रंगनाथ रएयायणग 


इनने में एक वर्ष पूरा हुआ जौर मथुमास आया | तव राजा ने चिर तपोनिधि 
ऋष्यश्यूग की अनुमति तथा गुर की आज्ञा लेकर एक अच्छे मुद्त्तं में बडे उत्साह से जानता 
तथा ऋष्यश्वृग के साथ, यज्ोपकरणों तथा हवन-कुड्द से युक्त, इक्कीस सुन्दर यूपों से 
शोभायमाल, श्रौतधर्म-क्रियाचार-विहित, मायाप्रवीण, राक्षसो से रहित तथा समस्त पाप- 
रहित यज्ञ-शाला में प्रत्रेश किया । 


5. दशरथ का यज्ञ-दीक्षा लेना 

यज्ञाव्व के आते ही, यनरनदीक्षा ग्रहण कर, यतिजुद्धि प्राप्त करके, वसिप्ठ आदि 
श्रेष्ट मुनिजनो को ऋटत्विको के रूप में वरण कर, अपनी इच्छा से सवनत्रय को पूरा करके, 
विमल यूपकाप्ठो से बेचे हुए जलचर, वतचर, विहग, उरग आदि तीन सी पशुओं तथा 
प्रद्यात यज्ञाव्व का वध करके श्रुतियों में जिन-जिन मत्रो के साथ, जिन-जिन आहुतियो को 
देने को विधि बताई गई है, उन मत्रों के साथ ऋत्विको ने उन आहुतियों का हवन 
किया । अग्निदेव सपन-जिह्लाओं से प्रज्वलित हुए । देवता उन आहुतियो से तुप्त हुए । 
उस यज्न के दिनों में न कोई भूखा रहा, न कोई सतप्त रह गया । सभी भिष्टान्न, वस्त्र 
स्वर्ण, मणिभषण आदि से सत्तृप्त किये गये । 

जब किसी भी विध्न के विना यज्ञ समाप्त हुआ, तब ज्योतिप्टोम, विध्वजित्‌ आदि 
महान्‌ यज्ञ-क्रियाओं को साग रूप से पूरा कया और यज्ज-दक्षिणा के रूप में अध्वर्यू (यज्ञ- 
करानेवाले चार ऋत्विको में से एक) को (अपने राज्य का) दक्षिण का भाग, होता को 
पश्चिम का भाग तथा उद्गाता को उत्तर का भाग दिया । अयोध्या को छोड वाकी सभी 
देशों को (दान में) दें दिया, जिससे ऋत्विक्‌ प्रसन्ष होकर कहने लगे---“कव हम आपके 
दिये हुए राज्य का शासन करें और कब अपने अनुष्ठान का पालन करें । हम कहाँ और 
देश का गासन कहाँ ? हे राजन, आप हमें इस राज्य का मूल्य दे दें ।” तब राजा ने 
दस करोड़ ख्वर्ण-मृद्रएँ, सोते की चौगूरी चाँदों और एक लाख गार्ये उन्हें दी । ऋष्यश्वग 
आदि ऋत्विक्‌ उस बन को आपस में बॉटकर सतुप्ठ हुए । उस विमल यज्ञ-कर्म में 
प्रवृत्त परिचारको को राजा ने एक करोड स्वर्ण-मुद्राएँ दी । मॉँगनेवालो को श्रेष्ठ आभूषण दिये । 
जिसने जो कुछ माँगा, राजा ने प्रेम से उसे वह दे दिया | उन्होनें सभी कब्र,ह्मणो 
को भक्ति से प्रणाम किया और क्रप्मण उनके आजोीर्वाद पाते हुए उन्हें दिव्य वस्त्राभरण 
देकर जअकलक चित्त से यज्ञात स्नान किया । (उबर) ऋष्यश्वग के द्वारा कराये गये पुत्र- 
कामप्टि यज्ञ में आकर क्रप्रण अपने-अपने यज्ञ-भाग प्रष्प्त करनेवाले देवता रावण के सम्बन्ध 
में अपने मन में विचार करने लगे । 


९. रावण के अत्याचारों के वारे में ब्रह्मा से देवताओं की शिकायत 
ब्रह्म के पास पहुँचकर (देवताओं ने) उनको प्रणाम किया और यो विनती की-- 
हे प्रमो ! आपके वर को शक्ति से दशकबर, पुण्यात्मा आचार्यों ब्रह्मर्धियों, देवताओं तथा 
मुतियों को दुच दे रहा है | हैं कमलासन | हमारा खयाल है कि आपके वर की प्रचण्ड 
शक्ति के कारण ही हम उसको जोत नहीं सकते । वह देवताओं के साथ इन्द्र को भी 
पकड़कर उतका अपमान करता हैँ और उन्‍हें दुख देता रहता है। (अपने) भुजवल के दर्प से 


ह4, 


बालकाोंड ९९ 


वह गंघर्व, यक्ष आदि देवगणो, मुनियों तथा साधुओं को पंकेंडकर कप्ट दे रहा हैं। 


सभी कुल-पर्वत उसके नाम से डरते हे । सूर्य भी ताप फैलाने से डरता हैं। वह जिस 
नगर में रहता है, वहाँ पवन भी अपनी पूरी शक्ति के साथ चलने से डरता है । उसके 
अतिशय प्रताप से डरकर समुद्र अच्छी वरह गर्जन नहीं कर पाता है । दीख पडने पर हमें 
भी दुख देता हैँ । ऐसे पापी दशकंधर क्रा अन्त करने का उपाय आपको सोचना चाहिए ।” 

तब ब्रह्मा ने उन सारी बातो को हृदयगम करके देवताओं से कहा--“ (रावण) 
अमरो के हाथ नहीं मरेगा, राक्षसों से नप्ट नहीं होगा, गधर्वों से मिटेगा नहीं, रजनीचरो 
से समाप्त नहीं होगा, भुजगों से मारा नहीं जायगा, यक्षो से हत नहीं होगा, पक्षिसमृह से 
पराजित नहीं होगा । मेरे वर देते समय उसने नरो का नाम नहीं लिया था, इसलिए 
वह नरो से ही मरेगा । स्पप्ट सुनो, हिरण्यकशिपु जब सारे ससार को दुख देता था, तब 
नारायण ने स्वयं नरसिह का रूप धारण कर उसे चीर डाला था । उसी ने अब विश्ववसु 
के यहाँ जन्म लिया हैँ ! इसलिए नारायण ही अब इसका नाजञ करेंगे । अब हमें उस विष्णु 
से अभयदान के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ।” 

ब्रह्मा के इस प्रकार कहने पर सभी लोग तुरन्त क्षीर समुद्र के निकट गये और 
अच्युत को देखकर पवित्र हृदय से उनकी स्तुति की । हाथ जोडकर बडी भक्त से प्रणाम 
किया और विष्णु से इस प्रकार विनती की । 


१०, देवताओं का विष्णु की स्तुति करना 

हे त्रिलोकीनाथ, कमलालय-वक्ष, वसुमतिरक्षक, वनजाक्ष, आपके अतिरिक्त हमारा 
कोई (सहायक) नहीं, यह सत्य हे । हे गोविन्द, परिपूर्णगुण चिदानन्द, हे देव, जगन्मय, 
देवाधिदेव, देवो के रक्षक, दिव्यावतार, अमृतसागर में पहले आपकी गरण में आये हुए हमें 
(आपने ) अपना अभयदान दिया था । हे दानवदलन, आपके भृजवल-विक्रम से ही समस्त 
लोको की रक्षा होती है । हे भक्‍तव॒त्सल, भक्तियोग को छोड अन्य उपायो से आपको 
पहचानना असभव है । हे मधुसूदन, मन में आपका ध्यान करनेवालो को क्‍या कभी कोई 
विपदा सता सकती है ? जगत्‌ की सृप्टि, स्थिति, लय आदि आपकी लीलामात्र हूँ । 
समस्त लोक आपकी माया का आधार लेकर ही आपका महनीय तनु धारण करते हे । 
हे शेबशायी, आपका वैभव तथा आपकी महिमा अवाड्मानसगोचर है । हैं शरणागत 
रक्षक, हे लोकेश, हम आपकी शरण में आये है । हम शरणार्थियो की रक्षा आपको करनी 
ही चाहिए । आप त्रिलोक-कटक रावण का वध करके हमारी रक्षा कीजिए । हे लोकक- 
स्तुत्य, विना विलव हमारा काये सपन्न कीजिए और यञ पाइए । निर्मेलचित्त, नि३चलब्रती, 
धर्मात्मा, उत्तमगुण-समन्वितन, राजा दशरथ अच्वमेध यज्ञ पूरा करके पवित्र मन से युक्त 
हुए है । उस काकुत्स्थ-वशी (राजा दशरथ) की स्त्रियो का विचार करें, तो कोई भी स्त्री 
उनकी वरावरी नहीं कर सकती । हे कमलगर्भ, आप अपने चारों अशो के साथ नर के 
रूप में जन्म लीजिए । बर के प्रताप से जो देवताओं के लिए अवध्य है, जो लोकत्रासक हे 
जिस पापी ने गधर्व एवं किन्नरों का वध किया है, हे पुण्डरीक, ऐसे दशकधर का वध 
करके यज्ञ-सपादन कराइए और सयम-बनी पुरषो की तथा ससार की रक्षा कोजिए ।” 


श्द सथनाथ २५२।५२/ 


इस प्रक्नार विनती करनेवाले देगताओ को देखकर वनजाक्ष (विप्णु) ने घन-गर्जन 
के समान गनीर व्वनि में कहा--हि देवताओ, तुम लोग सुखी होओ । में मत्तयेलोक में 
बवतार लगा और उसके पच्चात्‌ दशकंवर का वंबु, नित्र, अमात्य, पौच तथा बचुओं के 
सग्धय वाथ करके, ग्यारह हजार वर्ष तक निबमानुकल इस पृथ्वी का पालन करूँगा । ब्नह्मा 
क॑ वर से ही रानसेद्र इस अवनीतल पर जीवित है ॥ थो कहते हुए असुरारि (विप्णु) 
ब्रह्मा तबा देवदाओं को विदा करके चले गये । 

११. दशरथ को यज्ञ-पुरुष का पायस देना 

उधर विमल हवनाग्नि से नीले बगवाले, अरुणावरघारी, सूर्य के समान तेजस्वी, 
महान्‌ विक्रमी ठथा पुण्यात्मा एुक दिव्य मूत्ति अपने हाथ में पायस (खीर) से भरे एक 
स्वर्ण-पात्र को लिये वाहर बाये । उन्हें देख राजा अदुभुत जाच्चर्य में पड गये और विनय 
के साथ उठकर खड़ें हो गये । राजा को देखकर (यनर-पुरुष ने) कहा--राजन्‌ में यज- 
पुरुष हूँ। तुम्हें पुत्र-दान देने की इच्छा से आया हूँ । इस पायस को ग्रहण कर भक्ति के 
के साथ अपनों रानियो को दो ॥” इसपर राजा ने वडी भक्ति के साथ उनकी पूजा की 
और पायस यो यहय किया, जैसे जचीपति ने सुवा-क्लश ग्रहण किया था । अग्निदेव 
के अन्तर्द्धाव होने के वाद राजा जउनन्‍्तपुर में गये, तो रानियो ने बड़े आवन्द से उसका 
स्वागत किया । (राजा नें) देवताओं से बनायें गये उस पायस का आधा भाग कौसल्या 
को दिया, थेप आधे जय जावा सुमित्रा को दिया, बचे हुए भाग का आधा क्केयी को और 
डगय पुन. प्रसन्नता से सुमित्रा को दिया । 

उस परायस को भक्ति से ब्रहण करने के वाद रानियाँ गर्भवती हुईं । उन्हें देखकर 
राजा आनन्द-मन्न दिखाई देते लगे। निदान, राजा ने ऋष्यश्वृग आदि मुनियों तथा अन्य 
राजाजो को बड़े जादर-सत्कार के साथ विदा किया और रानियो के साथ परम अनुरागवुक्‍त 
हो नगर में लोट जाये । 

१२. देवताओं को वानरों के रूप में जन्म लेने के लिए ब्रह्म की सलाह 

अपना-अपना यज्ञ-माग लेकर जब देवता अपने लोक को जाने लगे, तब ब्रह्मा ने 
इन्‍्द्रादि देवताओं को देखकर क्हा---लोकरकणार्थ विप्णु इस पृथ्वी पर अवतार ले रहे हे । 
इसलिए तुम्हें भी उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाना चाहिए । इसलिए - तुम लोग 
लोकहितावी चक्तिमान्‌, पराक्रमी, वल तथा पराक्रम में अपने समान शक्तिमान्‌ कई वानरों को, 
किन्नर, गयर्व, खेचर, यक्ष, पन्मनग, अमर, तथा सिद्ध स्त्रियों (के गर्भ) से उत्पन्न करो । 
में अत्यन्त बलनिधि जाम्वचान्‌ को पहले ही जन्‍म दे चुका हूँ । मेरे जेभाई लेने समय उसने 
जन्म लिया हैँ । वह चिरजीवी है ॥” 

इस तरह ब्रह्मा का वादेश पाकर देवता लोग प्रसन्न हुए । इच्ध ने वालि को, 
अग्नि से नील को, नूर्थ ने सुग्रोव को, बृहस्पति ने ताह को, वरुण ने सपेण को कुबेर ने 
गवमादन को, विव्वकर्मा ने नल को, अच्विनोकुमारों ने हिविद-मेंद को, पजेन्य ने गरभ 
को और वायुदेव ने हवुमान्‌ को इस पृथ्वी पर जन्म दिया । अन्य देवताओं “ने भी अपने- 
अपने तेज से क्रमित पराक्रमी तथा श्रेप्छ वानरो को जन्म दिया। वे (सभी) वानर जगत्‌ के 


बालकांड १७ 


आप्त बधु, दावाग्नि-तुल्य विक्रमी, आकार तथा शक्ति में पर्वत की समानता करनेवाले, 
बंडे साहसी, कामरूपी, समुद्रो को भी पार करनेवाले, पहाडो को भी उखाड फेंकनेवाले, 
नख ओर दाँतो में अमित शक्ति रखनेवाले, अलौकिक शक्तिवाली तथा पृथ्वी को भी चीर 
डालनेवाली क्षमता रखनेंवाले थे । ऐसे होने पर भी, आइचर्य |! उनमें कुछ लोग सुग्रीव 
की, कुछ हनुमान्‌ की, कुछ नील की, और कुछ मैदकुमूद की सेवा करते थे । वे सत्र 
सिद्ध होते हुए अपना शौय॑ प्रकट करते हुए, मलय, दर्दूर, गधमादन, तथा विंध्य पर्वत एवं 
काननी और बहुत-से जल-नद-नदी प्रान्तो में बडे आनन्द के साथ विचरण करते थे । 

उस महिमायुकत पायस के प्रभाव से राजा की कुलवधुओ ने गर्भ धारण किया । 
गर्भधारण के समय से (उनकी) क्षीण कटियाँ पुष्ट होने लगी । अमृतमय भोजन की रुचि 
लगातार कम होने लगी । सुन्दर देह की कान्ति पाडु रंग धारण करने लगी, मानों ये 
सभी रावण की सामज्य-लक्ष्मी की नाक में कालिख लगानेवाले चिह्न हो । उनके कुचाग्र 
(इस प्रकार) काले होने लगे, मानो अनपत्यता-दोष (शरीर से) बाहर निकल रहा हो । 
कपोल पतले हो गये । दोहद (मचलो आदि) दीखते लगे | नाभियाँ उभरने लगी, 
त्रिवलियो की रेखाएँ मिट गई और (अनेक प्रकार की चीजों को पाने की ) इच्छाएँ उत्पन्न 
होने लगी । घीरे-घीरे नौ महीने पूरे हुए । 


१३. श्रीराम आदि का जन्म 


प्रशसनीय मधुमास के श्रेष्ठ शुक्ल पक्ष में, पूर्ण नवमी तिथि, वुधवार, पुनर्व॑सू नक्षत्र 
में मध्याक्षु के समय ग्रह-पचको के उच्च स्थिति में रहते समय, गुरु और चन्द्र का योग 
रहते हुए, ललित कके लग्त में, सर्वतोकाधार, जगदेकवीर, इंद्रादि देवताओं से स्वुत्य, दिव्य 
लक्षणों से देदीप्यमान, अव्यय, असमान, कात्तें-त्राण-परायण, भव्य, चिदानन्द, परम कल्याण- 
मूत्ति, देवताओं के रक्षक, दीनात्तिहरण, गुणो से अलकृत, महान कीत्तिवानू, शेषशायी, श्रीपति, 
हृषीकेश, उस कमल-गर्भ (विष्णु) के अर्द्धाश के रूप में, काकृत्स्थवशी श्रीराम कौसल्या 
के गर्भ से उत्पन्न हुए | जिस प्रकार अदिति ने इन्द्र को और प्राच्य-मती ने चन्ध को जन्म 
दिया था, वैसे ही पुण्य-वक्षत्र युक्त मीन लग्न में कैकेयी ने भरत को जन्म दिया | स्तुत्य 
आइलेबा नक्षत्र-युकत कर्क लग्न में कमलदललोचनी सुमित्रा ने समान-चरित्रवाले लक्ष्मण 
तथा झत्रुष्च को जन्म दिया । देव-दुदुभियों से सारा आकाश गूंजने लगा, देवस्त्रियाँ नृत्य 
करने लगी, पुष्पो की अत्यधिक वृष्टि होने लगी, ब्ह्मादि देवता परितुष्ट हुए, अयोश्या में 
छोटे-बडे सभी निवासी उत्सव मनाने लगे । 

तब दशरथ ने पुण्यात्मा वसिप्ठ को बुलाकर (वालको का) जातकर्म आदि करवाया। 
फिर,पुत्र-जन्मोत्सव ऐसा मनाया कि देवताओ तथा पुरजनों का नेत्रोत्सव हो गया । जात- 
शौच समाप्त होने के पश्चात्‌ एक पुण्य दिन को राजा ने उन वज्ञोद्धारक पुत्रों का चाम- 
करण-संस्कार करने की प्रार्थना वसिष्ठ से की । उन्होने अपने मन में विचार करके कहा 
कि “रम्‌', अर्थात्‌ क्रीडा' नामक घातु से 'रमयति” अर्थ देनेवाला राम नाम से कौसल्या- 
सुत अभिहित होगा । कैकेयी का पुत्र महान्‌ वलझाली, सुकुमार शरीरवाला तथा सुकीरत्ति- 
वान्‌ है, इसलिए वह भरत के नाम से विख्यात होगा । विचार करके देखने से सुमित्रा के 

डरे 


शर्ट रंगनाथ रायाायरे 


पुत्र सुन्दर तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त है, इसलिए उनके लिए लक्ष्मण तथा श्षेत्रुघ्त नाम 
उचित होंगे । (राजा ने) उन लक्ष्मी-समन्वित (राजकुमारों को) राम, भरत, लक्ष्मण तथा 
अत्रुध्न जैसे सुन्दर नाम देकर नामकरण-सस्कार सम्पन्न किया और अपरिमित घन 
दान में दिया । 


१४. श्रीरासादि का वचपन 

वे (वालक) माताओं तथा घाइयों के स्नेह तथा ममता-यबुक्‍त पालन-्योपण में 
(फलस्वरूप) बढने लगे । (वें) भोली-भाली हेंसी के साथ आँखें खोलने लगे । धीरे-धीरे 
अठ्पटाकर चलते हुए अपनी तोतली वोली से धवको आनन्द पहुँचाने लगे । उनकी लटो में 
(प्रोई गई) मोती तथा रणियों की लड़ियाँ कप्रोलो तक फैली थी । उनके भाल (रूपी) 
इन्दु पर अशोक के पत्ते के समाव एक मेंगटीका डोल रहा था । मणिखचित वहुत सुन्दर 
वघनखा की श्रेष्ठ कान्ति उनके हृदय पर विराज रही थी । शरार पर जहाँ-तहाँ मरकंत 
मणियों के आभरण शोना दे रहें थे, कटि को करपनी से घूंघरू के शब्द हो रहे थे तथा 
घुँघलूदार दूपुर पैरो में व्वनि कर रहे थे। वे राजा के सामने हँसते हुए अपनी बालक्रीडाएँ 
करते ओर उन्‍हें अपनी मोहनाकृति से मुग्ध कर देते थे । वे चारो (कुमार) धघीरे-घीरे 

वढने लगें और समान रूप से उनका मम्तसिक विकास होने लगा । 
वे दगस्थात्मन आपस में जोडियाँ बना लेते । रमणाय आकृतिवाले राम और लक्ष्मण 
की एक जोडों वनती और भरत-शत्रघ्त की दूसरी जोड़ी बततो । उनके चूडाकरण 
तया यज्नोपवीत-सस्कार कराये गये और बे सुन्दर (राजकुमार) तरह-तरह के खेलों में 

मग्त रहने लगे । 
एक वार रघुराम अपने मित्रो के साथ बडे प्रेम से (अपने-अपने) गुइयाँ चुनकर, 
गेंद तथा डंडा लिये फ़ुर्ती से खेल रहे थे । उसी समय कैकेयी की दासी मथरा वेग से 
वहाँ आई और कौतुक से गेंद को रोक लिया । इस पर राम ने बडे क्रोध से डडे से 
उसपर प्रह्मर किया, जिससे तुरन्त उसकी टाँग टुट गई । (इसके पच्चात्‌ भी) श्रीराम 
को अधिक उत्साह से खेलते हुए देखकर उनपर कुद्ध हो, लेंगडी टाँग से वह कैकेयी के 
महल में गई और सारा वृत्तान्त कह सुनाया । कैकेयी ने तुरूत यह समाचार दशरथ को 
सुनाया । सारी वातें जानकर राजा ने वसिष्ठजी को अयोध्या में वुलवाकर उन्हें भक्ति से 
प्रणाम किया और कहा--हें श्रेष्ठ मुनिचन्द्, आप इन बालकों को वेदादि समस्त विद्याएँ 
सिखायें / बह कहकर राजा ने वालको को वसिष्ठ को सौंप दिव्य । उस मुनीच्वर ने भी 
वैसा ही किया । राजकुमारों ने उस सयमी मुनि की कृपा से हाथी-घोडे को सवारी, रथ- 
सचालन आदि को क्रियाएँ सीख लो । समस्त वेदो, शास्त्रो और जस्त्रास्त्रो के प्रयोग भी 
सीख लिये । उनमें श्रीराम तो विप्णुदेव ही थे। इसलिए अपार शो, विवेक तथा सदू- 
गुणों में सबसे श्रेप्ठ थे । 
१४, विश्वामित्र का आगमन 

(राजा) बपने पुत्रों के विवाह की वात सोच रहे थे कि (एक दिन) विश्वामित्र 
मुनि आ पहुंचे । द्वारपाल ने आकर महाराज दणरथ से निवेदन किया--टदिंव, व्बिवामिक्त 


बा/लकाड ९6 


मुनि द्वार पर आये हैँ । तब दशरथ अपने वधु-वर्ग तथा वसिष्ठ मुनि के साथ बडी 
प्रसन्नता से, परमेष्ठी की अग॒वानी के लिए जानेवाले इन्द्र की तरह, उनका स्वागत करने गये । 
उनकी अमित शक्ति को जानते हुए उनको लिवा लाये और अध्य, पाद्यादि देकर 
उनकी उचित रीति से पूजा की । तब मुनि ने पूछा-- (हें राजन) तुम्हारी प्रजा कुशल 
से तो है, हे पूजनीय ब्रती वसिप्ठ, आप कुशल से हे न ? हे मुनियो, आप कुशल 
है ?' (तब राजा ने कहा)--'हमें किसी बात का अभाव नहीं है | हम घन्य हैँ । 
परम मुनीद्र, आप हमारा गृह पवित्र करने की इच्छा से यहाँ पधारे । इस कृपा से में 
समस्त लोको में प्रख्यात हुआ और सभी राजाओ में आदरणीय हुआ । आप अपने आगमन 
का कारण कहें । आपका जो भी कार्य होगा, मे उसे सम्पन्न करूँगा । 


१६, यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम को भैजने के लिए राजा से विग्वामित्र की प्रार्थना 

तब विद्वामित्र ने राजा को देखकर कहा--हे राजन, दसरात्रि-पर्यत यज्ञ करने 
की इच्छा से में (यज्ञ ) करने लगा, तो भयकर आकारवाले राक्षस हमारी यज्ञशाला में 
लगातार रक्‍त-मास की वर्षा करते हुए प्रवल विध्न डालने लगे । यज्ञ करते समय हमें 
क्रोध नही करना चाहिए, इसलिए तुम्हारे पुत्र महाबली श्रीराम को यज्ञ-रक्षणार्थ ले जाने के 
लिए आया हूँ । वे क्रूर राक्षत उनके सिवा अन्य किसी से नहीं मारे जायेंगे । उनकी 
(राम की) महत्ता में जानता हूँ, (और) ब्रह्मा के पूत्र ये वसिष्ठ भी जानते है । हे 
अनघ | राम बालक हु” ऐसा विचार मत करो | वे मेरे पुत्र हैं, ऐसा लोभ छोड दो । 
वे स्वय यज्ञ-कर्ता, यज्ञ-मूत्ति तया यज्ञ-भोक्ता हैँ । उन्हें लोकाराध्य मानकर भेजो । में 
उन्हें अतुल्य शस्त्रास्त्र दूँगे । उनसे ही हमारे यज्ञ की रक्षा होगी ।” 

मुनि के ऐसा कहते ही राजा मूच्छित हो गये । बडी देर के बाद उनकी मूर्च्छा दूर 
हुई । वे फोके पड गये और दोन नथा दुखी होकर गद्गद-कठ से विश्वामित्र की विनती 
करते हुए बोले---“राम अभी बालक है, वह बच्चा हैं । वह युद्ध-कला नहीं जानता । वह 
पन्द्रह साल का ही हैं । हिलती हुई शिखावाला है (अभी उसमें दृढ़ता नही आई हूँ ) । 
अपने तथा शत्रुओं के बल का विचार करने को क्षमता उसमें नहीं हैं। हाय! आप दया- 
मय होते हुए ऐसे बच्चे को क्यों माँगते हे ? राक्षस तो कई दिव्य दास्त्रासत्र रखनेवाले है । 
वे युद्धकला में निपुण होते है। वे विपुल बाहुबलवाले हैं । उनके साथ लडने की 
योग्यता राम में कहाँ है ? कहाँ वे और कहाँ यह ? हे श्रेष्ठ मुनीश्वर, साठ हजार साल 
तक पृथ्वी का शासन करने पश्चात्‌ असमय वृद्धावस्था में मेने इसे प्राप्त किया हैं । में 
इसे भेज नही सकता। यज्ञ रक्षा की चिन्ता आपको क्यो हैं ? आप जाइए, में आज ही सेना के साथ 
आपके पीछे-पीछे चला आऊँगा । हे मृनिनाथ, आपके यज्ञ में बाधा डालनेवाले राक्षसो की 
शक्ति कितनी है ? वे कौन है ? उनके नाम कया हे ? यह राघव उन्हें कैसे जीत सकेगा ?” 

तब विद्ायवामित्र ने राजा से कहा--परुलस्त्य ब्रह्मा का पोता, विश्ववस्‌ का पुत्र, 
अखिल लोक का कटक, पापी रावण के आदेश से बल प्राप्त करके घमण्ड से भरे 
मारीच तथा सुवाहु नामक (राक्षस) उग्र रूप धारण कर यज्ञ में विष्न डालते हे । राम 


के सिवा अन्य कोई भी रणभूमि में उनका सामना नही कर सकेगा ॥” 


रण 


थे 
से 
हे 

9०. 


९७० र्एनायथ रयायण 


ऐसा मुनि के कहते पर, उन बातो पर विश्वास न करके राजा ने मुनिनाथ से 
विना सकोच कहा-- वह (रावण) चौथा ब्रह्मा है, महान्‌ साहसी हैं और ब्रह्मा से वर 
प्राप्त किये हुए हैं | ऐसे रावण के भेजे हुए वीरो को जीतने में यह (राम) कैसे समर्थ 
होगा ? उन (राक्षसो) की शक्ति जाने विना में आने की वात कही थी । अब आप लौट 
जाइए ।॥” 
यो राजा के कहते ही विश्वामित्र (क्रोध से) जलते हुए, रोष-रवत नेत्नो से देखने लगे । 
उनके गड़स्थल अत्यधिक वेग से हिलने लगे, सारा शरीर काँपने लगा | वें राजा 
को देखकर वोले---काकुत्स्थ-बणजो को रोति पर विचार किये विना ही ऐसे कुवचन क्यो 
कह रहें हो ? (तुमने) मेरे आगमन का कारण वताने के लिए कहा । यह कहा कि में 
आपका कार्य अवध्य सिद्ध करूँगा । अब तुम मुकर रहे हो । यज्ञ-रक्षा क लिए म॑ंनते राम 
को भेजने की प्रार्यना की । पर तुम हिम्मत हारकर कहत हो नहीं भेजूंगा । हें असत्य- 
भाषी, तुम्हारा तो मूंह देखना भी नहीं चाहिए । इसलिए में जा रहा हूँ ।” 
मुनि के इस प्रकार कहते ही समुद्र सूख गये, पृथ्वी धैस गई, समस्त लोक व्याकुल 
हो उठे । दिग्गजों ने घुटने टेक दिये, देवता सहम गये, दिश्ञाएँ सिमट गई । सभी भूत 
जवण हो गये । मुनि के क्रोवावेश की कल्पना करके वसिष्ठ ने दशरथ को देखकर यो कहा- 
१७, राम-लक्ष्मण को विव्वायित्र के साथ मैजने के लिए वस्िष्ठ की सम्मति 
(वसिष्ठ ने कहा)--हें राजनू, सूंवजी इस ससार में कभी असत्य भाषण नही 
करते । यदि तुम असत्य कहोगे, तो तुम्हारी श्रेष्ठ कीत्ति और तुम्हारे पूर्वजों की कीत्ति 
नष्ट हो जायगी । देंने का वचन कहकर नही दोगे, तो शुद्ध (मन से) किये हुए सभी धर्म 
नष्ट हो जायेंगे । दशरव महाराज बडें घर्मात्मा हें--ऐसे तुम इस पृथ्वी में विख्यात हो। 
लोकरक्षा के सिवा राजाओं का धर्म और क्‍या है ? इसलिए, हे राजनू, राम को 
माननीय गावि-युत्र के साथ जाने दो । ऐसी ञका क्यो करते हो कि मेरा पुत्र बालक हैं, 
वह युद्ध में महावली राक्षसों की वरावरी नहीं कर सकेगा। कौशिक के रहते किस बात का 
भय है ? राजनू, विद्वामित्र का उग्र तप और उनकी शक्ति विचित्र हे । ये पुृण्यात्मा देव, 
दानव, गवर्व तथा दैत्यो से भी अधिक दिव्यास्त्रो के प्रयोगो को जानते है । कोई भी ऐसा 
विपय कही भी नही है, जिसे ये नहीं जानते हो । हे जननायक, दक्ष (प्रजापति) के जया 
तथा सुप्रभा नामक दो पुत्रियाँ थी । उन जया और सुप्रभा के द्वारा भृशाइव ने राक्षस-वघ 
के लिए अस्त्र के रूप में पचास पुत्र प्राप्त किये । वे सव (पुत्र) कामरूपी हे । हे राजन, 
उस भृशाइव ने (उन सभी अस्त्रशस्त्रो को) इन्हें दे दिया । इसलिए ये मुनि सभी शास्त्रास्त्रो 


अे, 


के ज्ञाता है । तुम डरो मत । इन मुनि की शक्ति तुम नहीं जानते । इनको वचन 
देकर क्यों टाल रहे हो ? इनके साथ जाने से राम का हित ही होगा, उनकी जय अवश्य होगी । 
क्या ये (स्वयं ) राक्षकों को जीत नहीं सकते थे ? राजन (तुम्हारे) हित-चिन्तक 
के रूप में, तुम्हारे पुत्र उज्ज्वल चरित्रवान्‌ (राम) को शस्त्रास्त्र विद्या में निपुण सिद्ध करने 
के उद्देश्य से ही ये यहाँ पवबारे हे । जत यज्ञ की रक्षा के लिए राम को भेजो । इन्हें 
(राम को) देने में 


० 


ही (तुम्हारा) कल्याण होगा । 


ब7/लकांछ ् 


१८, विश्वामित्र के साथ राम-लक्ष्मण को भेजना 

इस प्रकार वस्तिष्ठ के कहने पर, उनकी वातों पर विश्वास करके राजा ने रामचन्द्र 
को बुला भेजा । उनका बालकपन देखकर राजा की आँखों में आँसू भर आये । उन्होने 
उन्हें गले से लगाया, प्रेम से आशीर्वाद दिये, उनके कंशों पर हाथ फेरा, कपोलो को प्यार 
से छुआ, थोडी देर सोचते रहे, फिर पुण्याह वाचन पुण्यत्नत, पुण्य हवन और ग्रहों की पूजा 
करके सुन्दर वस्त्र तथा भूषण प्रेम से दिये । फिर स्वय, कौसल्या तथा वसिष्ठ ने (उन्हें) 
उचित आशीर्वाद देकर, पुण्य मुद्त्ते में अपने पुत्र-रत्न को पुण्यात्मा गाधि-पुत्र को सौपा | प्रेम 
और त्याग, इन दोनो का सघर्ष (मन में) चलते रहने पर भी (राजा ने) उस मुनि का 
सत्कार करके उन्हें विदा किया | तब लक्ष्मण भी उस राम से प्रार्थना करके उनके साथ गये । 
( उस समय ) वृष्टि हुई, अनुकूल पवन चलने लगा, श्रेष्ठ मगल वज उठे । 
आकाश से देवता बडे प्रेम से घनुष, उत्तम शस्त्र, महान तृणीर, खड़ग आदि सहज 
रीति से धारण किये हुए, बडे उत्साह से जानेवाले राघव को देखने लगे । अक्षय 
तूणीर, पहुँचा तथा अगुली-ब्राण पहने कटि से लटकनेवाले कृपाण के साथ दिव्य शर तथा 
चाप लिये हुए राघव उस मुनि के पीछे बडे उत्साह से इस प्रकार जा रहे थे, जैसे अश्विनि- 
देवता भक्त से ब्रह्मा की सेवा करते हुए जा रहे हो । बे पुण्य-चरित आधा योजन चलकर 
सरयू नदी के तट पर (पहुँचते-पहुँचते) थक गये । तब कौशिक ने राम-लक्ष्मण को वुलाकर 
उन्हें बल, अतिबल, नामक महामत्रो का उपदेश दिया, जिन्हें उन्‍होंने घोर तपस्या के 
उपरान्त प्राप्त किया था और जो ब्रह्मा की पुत्रियाँ थी और सभी मत्रो की मूलाधघार थी 
तथा सदा सुखग्रदायिनी थी । राम-लक्ष्मण ने उस मत्र-शक्ति के प्रताप से सूर्य का-सा तेज 
प्राप्त कर लिया । थकावट, भूख और प्यास आदि सकट से वे मुक्त हो शक्ति से शोभायमान 
हो गये । उस रात्रि को दाशरथि सरयू नदी के किनारे, तरुण कोमल कुंश-शय्या 
पर, कौशिक से पुण्य-कथाएँ सुनते हुए बडे आनन्द से सो गये । 

गाधिपुत्र-प्रभात के समय शीघ्र ही उठे और वहाँ तृण-शय्या पर आँखें बन्द किये 
हुए राघवों को देखकर बडे कौतूहल से कहने लगे--हें अनघ, अरुणोदय हो चला । प्रात 
काल के नित्य कर्मों का पालन होना चाहिए । इसलिए तुम्हें अब जागना चाहिए । यह 
सुनते ही (वे उठे और ) सध्यावन्दन से निवृत्त होकर प्रफुल्लचित्त से कौशिक को 
प्रणाम किया । (उसके पश्चात्‌) नदी-धारा के किनारे-किनारे चलकर वे सरयू तथा गगा के 
सगम के पास पहुँचे और वहाँ कई सहस्न वर्षों से नियमवद्ध हो तपस्या करनेवाले परम 
सयमी मुनियो को देखकर, बहुत ही हर्षित होकर दशरथात्मज ने गाधि-पुत्र से 
यो कहा-- 


है 


१९, अनंगाश्रम का वृत्तान्त 
हैं सयमीद्र, यह किसका आश्रम है ”? इस तपोभूमि में कौन रहते हे ?”' तब 
मुनि ने कहा--“यह अनगाश्रम के नाम से लोक में विस्यात है। इस आश्रम में बडे धैर्य के 
साथ तप में लीन शिव को देखकर कदर्प ने बडे दर्प के साथ चन्रशेखसर पर (प्रुष्प) वाण 
चलाया था और उस देव के भाल-नतेत्र की अग्नि से भस्म होकर अनग नाम पाया था । 


ष 


सर रंग्नाथ रयायर 


(उसके) जयो से सवबित यह आश्रम-भूमि तव से अगदेंश कहलाने लगी! ॥ इस आश्रम 
भूमि में कठिन तपस्या करनेवाले पृण्वात्मा छतायबे हो जाते हूँ ।” 
इस तरह विश्वामित्र ने सादा वृत्तान्त कह सुनाया । रघुवीर तथा मुनि वहाँ ठहसकर 
स्तानादि अनुप्ठान पूरा करके संतुष्ट हुए । उस स्थान के आश्रमवासी मुनीशवरो ने दिव्य 
दृष्टि ने यह वात जान ली । वे रमणीब रूपणले राम-लक्ष्मण तथा अमित तथोधनी 
कौनिक को अपने आश्रम में लिवा ले गये और अत्बन्त उत्साह से अर्य, पाद्यादि देकर 
उनका सत्कार किया । पृष्य-क्रधाओं के कथन से वह रात्रि पृण्परात्रि हो यई । दूसरे 
दिन जढ वें पुण्य सबमी उस नदी में नित्य कर्मो से निवृत्त हो चुके, तब विदवामित्र ने 
कहा-- हमें इस नदी का पार उतारने के लिए यह नाविक समर्थ हैं । यह नाव सूरये- 
वद्जजों के लिए लायक हैं !/ यह सुनकर राम-लक्ष्मण ने उन मुनियों को प्रणाम किया । 
मुनियों ने उनको विदा किया । तब वें विव्वामित्र के साथ नाव पर चढ़कर सरयू नदी 
पार करने लगे । जब नाव वीच वार में पहुँची, तव (रामने) आइचर्य के साव हाथ जोड- 
कर पूछा--बह कैसी ध्वनि आकाण तक बूंज रही हैँ । कंपा करके बताइए ।' 
मुनि ने कहा--कैलास पर्वत के मानसरोवर सें जन्म लेकर, समृद्ध साकेतनगरी 
को चारो बोर से घेरने के वाद गंगा नदी में मिलनेवाली सरयू नदी की लहरो का यह 
घोष हैं । इस पर (राम-लक्ष्मण) ने बड़ी श्रद्धा से उसे प्रणाम क्या । उन पुण्यात्माओ ने 
नदी को पार किया और हाथी, सुअर, नेसा, हिरण, चरभ, अजगर, वाघ, रीछ, सिंह से 
भरे हुए जगल में प्रतरेभ किया । तव राबव ने कहा--हि सुनीझ्वर, खदिर (कत्या), 
तिन्‍्दुक, पूण, खजूर, निम्व, वदरी, छ्ट, अग्ोक, पादलि आदि तर्ओो तथा वहुकटक एव 
लतानसर्विष्टित वृक्षों से युक्त, यह निर्जेज वन किसका आश्रम हैं ? कृपया बताइए ।” 
तव विव्वामित्र श्रीराम से सादा वृत्तान्त यो कहने लगे-- प्राचीन काल में इन्द्र वृत्रासुर 
का वव करने से मल-कलृव-प्राप्त तथा मलिनाग हुआ । तव देवता तथा मुनि इन्द्र को पाप- 
मुक्त करने के लिए यहाँ ले आये जौर पुण्यसलिल तथा पवित्र मत्रो से पुण्याभिसेचन 
किया । इससे उसके घरीर पर लगे मल-कलुय दोनो यहाँ के प्रदेशों में भर गये जोर 
इच्ध चुद्ध हो गया । इसलिए इन्द्र ने इन प्रदेंगो को, मल युक्त होने से मलद' तथा क्लेश- 
कलित होने से करुप तथा 'पापध्न' नाम दिये । वृत्रासुर के वध से लगे हुए पाप की 
मुक्ति इस प्रदेश सें होते से इन्द्र ने इन नगरो को घन-वान्य-वैभव से समृद्ध रहने का वर 
दिया । हे रघुराम, एक बात और सुनो । 
२०, विव्वामित्र का शीरामचन्द्र को ताड़का का वृत्तान्त सुनाना 
“इस पृथ्वी पर ताडका नाम की एक राक्षसी, एक हजार हाथियो का वल रखती हुई, 
बडे साहस के साथ, इन दोनों प्रदेशों में प्रवेश कर स्वेच्छा से लोगो को तग करतीहेँ ।” 
इसपर राघव ने पूछा--डैस क्त्री को किसने इतनी शक्ति दी ? यह दुष्टवृद्धि 
किसकी लड़की है ? यह पापिन क्यो इन दो प्रदेशो को पीड़ा पहुँचा रही है ? कृपया वताइए ।' 
“पू क्क्मीकि कौर कालिदिस ने भो अनंगाश्रस का वर्णन किया है, पर वह अंग- 
देश में हूँ था । वह तो सरयू नदी के किनारे था। जंग्र-देश तो वत्तंमाव भागलपुर 
झौर मुंगेर जिले माने गये हैँ, जिसमें सरयू नदी नहों हूँ ।--सम्पादक 


दे/्लकाड २३ 


इस पृथ्वी पर सुकेत नामक एक यक्ष ने पूर्व में ब्रह्म की तपस्या की थी और 
अत्यधिक भवित से उनको तृप्त किया और उनसे एक पुत्र माँगा । (तब ब्रह्मा ने कहा) 
में तुम्हें पुत्र नही दूँगा । एक हजार हाथियों का वल रखनेवाली एक पुत्री दूँगा ।! उस 
वर से उसे एक लडकी प्राप्त हुई। उसने विचार करके अपनी उस लडकी का विवाह 
सुद (नामक व्यक्ति) से कर दिया । उसने (सुद ने) उस स्त्री से मारीच' तथा सुवाहु' 
नामक दो भयकर शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किये । इसके पश्चात्‌ उसकी मृत्यु हो गई । वह 
स्त्री अपने पुत्रों के साथ बडे गर्व से अगस्त्य के आश्रम में जाकर बार-बार उनवो तग 
करने लगी । अगस्त्य ने इन पापियों को देखकर क्रोध से उन्हें राक्षस वन जाने का ज्ञाप 
दिया । उस विन से राक्षस-रूप धारण कर निर्दयी हो वह मनुष्यो का आहार करती हुई 
यही रहती है और पृथ्वी को दु ख देती है । तुम्हारे अतिरिक्त कोई इसे मार नहीं सकता । 
सिवा तुम्हारे हाथ के किसी से यह नहीं मरेगी । यह मत कहो कि यह स्त्री है, इसलिए 
इसे मारना नहीं चाहिए । यदि गोन-्ब्राह्मणो का हित हो, तो यही कारण स्त्रियो को मारने 
के लिए राजाओ को पर्याप्त है । प्राचीन काल में सारे ससार का नाश करने के लिए 
उद्यत, मतिमान्‌ विरोचन की दुष्टा पुत्री को क्‍या इन्द्र ने क्रोध से नहीं मारा था ? क्‍या 
वह कार्य (ससार में) स्तुत्य नहीं हुआ है ? पहले दृढ़ ब्रतवाली भृगु-पत्नी के ससार में 
अशान्ति फैलाने का उपक्रम करने पर क्‍या विष्णु ने (स्वयं) उस स्त्री का वध नही किया था ? 
इसलिए हे पुण्य-चरित्र, लोकहित के लिए स्त्रियों का वध करना भी पुण्य ही है ।” 


२१. ताड़का का वध 


विश्वामित्र के ऐसे अनुपम वाक्‍्यों तथा अपने पिता के आदेश का विचार करके 
राघव ने , उस ब्रह्मर्षि के वचन की अवहेलना नही करते हुए कहा कि में ताडका को 
दण्ड दूंगा । उन्होने (अपने) धनुष की टकार से सारे आकाश को गुंजा दिया। (उसे सुनकर) 
ताडका क्रोध से उबल उठी । कर्ण-कठोर धनुष की टकार सुनकर उसका चचल लाल नेत्रो 
वाला मुख विक्ृत हो उठा । वह अपने दोनो हाथो को ऊपर उठाये हुए इस प्रकार आने लगी, 
जैसे पखोवाला पहाड बडे वेग से आ रहा हो । प्रकट अट्टहास से उसके बड़े-बड़े 
दष्ट्रो की काति चारो ओर बिखर रही थी । (चलते समय) वह अपने पदाघात से अपनी 
अमित शक्ति का परिचय पृथ्वी को दे रही थी | सारा आकाश एकदम हिलन्सा गया । 
इस प्रकार आनेवाली ताडका को देखकर दाशरथि राम ने सभुम-चित्त से अपने भाई से 
कहा-- देखा तुमने इसका ढंग, इसका रूप और इसकी भयकर दृष्टि । इसको देखने पर 
किसे भय नहीं होगा ? से अवश्य इसका वध करूँगा ।” 

इस प्रकार (श्रीराम) कह ही रहें थे कि (अपने) गर्जन से समस्त आकाश को 
कॉपाती हुईं, अपनी पद-धूलि से समस्त (ससार) को ढकती हुई वह भयकर राक्षसी वडी- 
बडी शिलाओ की वर्षा करने लगी । इससे क्रुद्ध हो राघव ने अपने अनुपम अस्त्रों से 
उन शिलाओ को काट डाला और उस (राक्षसी) के दोनो हाथ भी काट डाले । तब 
लक्ष्मण ने उसकी नाक और कान इस प्रकार काट डाले, मानो वे यह बतलाना चाहते हो 
कि आगे में उस असुरूराज की वहन की भी यही दशा कर दूँगा । 


492 रंगनाशथ एायायर 


हर | हि 


आक्चय की दात है कि तव वह कामरूपिणी, माया का रूप घारण॑ करके, 
कई अस्त्रों की वर्षा करने लगी । तब विब्वामित्र ने कहा--हें अनव, संध्या हो रही हैं 
सब्या के सम्य राक्षमों को जीतना कठिन हुँ | अव तुम उसपर दया करना छोड दो 
और लोक-हितार्य इसे तुरत मार डालो ॥' 

तब गावेय का आदेश मानकर (राघव ने) बब्द-वेघी वाणों से उस मायाविनी की 
मायाओों को दूरकर, भबकर गर्जन करती हुई विजली के समान आनेवाली राक्षमी को 
(उन्होंने) देखा । ठव उन्होंने एक महान्‌ अस्त्र उसके कुचाग्र पर ऐस्ता चलाया कि रक्त 


ब्ध 


निकली मानो रामचद्र असरो कक दण्ड >>- का उपक्रम नल करते 
की कई बाराऐँ वह निकला, माता रामचत्र ससुर का दण्ड दन का उपक्रम करत समय 


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हि । 


4 


शरो को (रक्त का) उपहार दें रहे हा । 


तव वह (राजक्नसी) पृथ्वी इस तरह गिरी, मानों प्रलब-्मारुत से संघ्या को 
आऊकाञ् दूटकर पृथ्वी पर गिर गया हो । समस्त प्राणी आनंडित हुए। देवता तथा मुनि 
हर्षपित हुए । कौशिक ने राम को गले से लगाकर आज्नीर्वाद दिये । 

तब देवता तथा गवर्षो के साथ देवेन्र वह्हाँ जाबा और श्रीराम के दर्शन करूकें, 
उनकी पूजा तथा प्रार्थना की | फिर देव-मक्‍त गावेय को देखकर इन्द्र ने कहा--- हमारी 
रल्ला करने के लिए इस पृथ्वी पर जवतार लिये हुए इस महापुरुष को जाप भृज्ाइव की 
संतान-छपगी सभी अस्त्र-शक्त्र प्रदान करें ॥7 इस प्रकार कहकर इन्द्र देव-लोक को लौट गये। 
इतने में सूर्यात्त हो गबा । वे लोग वही ठहर नये । 

२२. विश्वामित्र का श्रीराम को मुशाइव-संतान-रूपी शस्त्र देना 
दूसरे दिन विध्वामित्र ने राम को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर कहा-- 


है राम! तुम्हारा रण-कौशल देखकर हम वहुत जसन्न हुए । बब हम तुम्हें ऐसे अस्त्रास्त्र 
देंगे, जो अमर, उरग, अनुर तथा यक्षो के साय बुढ़ों में श्रेप्ठ सिद्ध होगे ॥7 

यो कहकर तन बौर मन से शुद्ध हो, मुनीब्बर ने राम को पूर्वाभिमुख विठाया, 
व्यान किया और क्रमण दइ-उत्र, वर्म-चक्र, काल-चक्र, विष्णु-चक्त, इन्द्र का वजत्ष और 
खड़॒ग, वदग-पात्य, वर्म-पाण, काल-पाच, परमकशिव का भयकर चूल, वक्तियुग्म (विष्णु- 
शब्ति तथा दद्व-बक्ति), भयकर उप्य तथा जनुप्ण बचनियाँ (शुप्काननि तथा आद्द्राशनि), 
कक्नल (जिन्हें राक्ल धारण करते हे), भयकर करवाल, मूतल, ककण और ऋरौचवाण 
आदि चस्त्र (श्रीराम को) ठिये । इसके पह्चात्‌ (उन्होंने) वडी प्रसन्नता तथा प्रेम से 
आततेयान्त्र, ब्रह्मास्त्र, तेजअभास्त्र, ऐन्धास्त्र, ब्रह्मणिर, प्रस्थापन, नारायग, पैसाक, जिणिर, 
दाहण, शौर्य तथा सुदामनू प्रशमन, विलापन, विद्यद प्रभावाला व्याधर, वाबब्य, 
सौम्य, संठर्त्त आदि नामक अस्त्र तवा मायाबर, मानव, मदन, सौमन, रुद्र, सतापन, मौसल, 
दर्पण, हयभिर आदि अन्त्र, मायाओ का प्रयोग कर विजय दिलानेवाले गावर्व तथा सम्मोहनास्त्र, 
बत्य॑ंत विष्ठा-नमस्वित तबा चोणित्तारव्य अद्विवोय आस्नेवास्त्र, गरुहास्त्र, कौबे रास्त्र, 
नर्निहान्त्र, नागास्त्र, अवार्य वैष्णवास्त्र, सतत स्तुत्व वैद्यावरास्त्र, रौद्रास्त्र, राक्षसास्त्र, कल्याण- 
प्रद. पाशुपतास्त्र, कत्तेरीचक, मेबाल्तव जेसे अगणित अस्त्रसमूह, अखिल दारुण मोदकी, 
जझिल्नरी नामक गदाएँ, वामन, पैश्ाच्र तग्ा वायब्य अस्त्र, सोम, सौम्ब, सदर्दध, साम, मदन, 


. ब/श/लकाड 52८ 
संतापन, तामस, जैसे दारुण अस्त्र, ककोल, करवाल, मूसल आदि धारण-योग्य अस्त्र राम 
को दिये । उन्हें लेते हुए राम ने उस महात्मा को देखकर कहा “हे मुनिनाथ, आपकी 


कृपा से अभी अस्त्र प्राप्त करके में कृतार्थ हुआ | अब आप मुझे उपसहार के अस्त्र प्रदान 
कीजिए ।” 


ने 
मे 


इस पर प्रसन्न हो उस मुनि ने उन्हें सत्यवत, रभस, परामुख, सत्य-कौत्ति, दशाक्ष, 
अवाइमुख, प्रतिहारतर, मारण, शुचि, शतवकक्‍त्र, देत्य, धृष्ट, लक्ष्य, कृशन, करवीरक, दश- 
शीर्ष, शतोदर, ज्यौत्तिय, विमल, मकर, विरुचि, निष्कुलि, प्रमथन, सुनाम, सर्वनाम, दुदुनाभ, 
पद्मनाभ, तृणनाभ, नैराश्य, का रूप, योगधर, सैमन, निद्रा, सधान, मोहन, विषमाक्ष, महानाभ, 
बाहुविभूति, जुम्भक, घन, धान्य, वृत्ततत, रुचिर, सार्चिर्माली, धृतिमाली नामक कामरूपवाले 
महान्‌ अस्त्रो का उपदेश राजकुमार को दिया । इनके अतिरिक्त भी (मुनि ने) उस रघु- 
वश प्रभु को अनेक हास्त्रास्त्र-समूह दिये, उनकी शक्ति बताई, उनसे सवध रखनेवाले मत्र 
बताये, उनके प्रयोग की तथा उपसहार की विधि बताई । शस्त्रास्त्र-सवधी सभी 
मर्म बताये । 

तब राम के आगे वे सभी ( इस्त्रास्त्र ) तरह-तरह के रूप धारण करके 
प्रकट हुए । उनमें कुछ अग्नि-सदृश थे, कुछ भयकर थे, कुछ धूमिल काति के थे, कुछ 
अनुपम दीप्तिमान्‌ थे, कुछ दिव्य शरीरवाले थे, कुछ चद्र-प्रभा-विलसित थे, कुछ भानु- 
दीप्ति-विलसित थे, कुछ अधकार-विलसित थे, कुछ भयकर अदूटहास कर रहें थे और 
कुछ पवित्र रूप धारण किये हुए थे । उन सब ने मुकुलित करो से (राम के आगे) खडे 
होकर कहा--हे राजनू, हम कौन-सा कार्य करें, हमें क्या आदेश देते हैँ ? हमें कहाँ 
भेजेंगे ?” तब राम ने कहा--मेरे स्मरण करने पर तुम चले आना, अभी तुम जा 
सकते हो ।” यह सुनकर सभी शस्त्रो ने उस वसुवेश की प्रदक्षिणा की और नमस्कार 
करके चले गये । 

तब राघव ने मुनिनाथ के सामने हाथ जोडकर विनय, भक्ति तथा विश्वास प्रकट 
करते हुए कहा--हे अनघ, आपकी कपा से में छतार्थ हुआ ।' 

उसके पदचात्‌ वे विश्वामित्र के पीछे-पीछे चलने लगे । चलते-चलते उन्हें वामनाश्रम 
का सुदर प्रदेश दिखाई पडा । उसे देखकर काकुत्स्थवशी राम ने कहा-- हें सयमीद्र, इस 
पर्वत के निकट, नाना मृगो की ध्वनियो, सुदर पक्षियों तथा मृगो से भरा यह दर्शवीय तथा 
सुदर वन किसका आश्रम है ? यहाँ सब मृग वडे सुख से रह रहे है । हे सर्वज्ञ, आपकी 
यज्ञ-मूमि यहाँ से कितनी दूर है ”? चचल तथा उद्धत राक्षस आपके यज्ञ को अपवित्र करने 
के लिए कहाँ से आते हे ? से अपने तेज बाणों से उन समस्त राक्षसों को मार डालूँगा 
और यज्ञ की रक्षा करूँगा ।/ 

तव कौशिक ने जगदभिराम राम के कपोल स्तेंह से छूकर वडे प्रेम से कहा-- 
है अनघ, क्या कोई ऐसा विषय है, जिसे तुम नहीं जानते ? यदि मुभसे ही सुनने की 
इच्छा है, तो सुनो ।॥' 

४ 


९६ एंग्च/थ एराया/शय् 
२३, कौशिक का श्रीराम को सिद्धाश्रम का वृत्तांत सुनाना । 


“प्राचीन काल में विप्णुदेव बड़े आनद से तपस्या करने के लिए यहाँ अनेक युगों 
तक रहे । इसलिए हैँ जनथ, इसे वामनाश्रम कहतें हे । उसके पहले यह सिद्धाश्रम नाम नें 
विख्यात था । हे जननाथ, विरोचन का पूत्र वलि अपने विद्याल राज्य-वैभव के कारण 
घमड से प्रवल होकर देव तथा सुरो को यातनाएँ देने लगा। तब मुनि तथा देवता इस 
आश्रम में आये और कमलनाम को प्रगाम करके कहा--हे भरणागत-प्रिय, हैं लोकेग, 
कमलगर्भ, हमारी रक्षा कीजिए । हमें गरण दीजिए । हमें त्रास देवेवाला वलि यज्ञ कर 
रहा हैं । उस राजक्षस-वज्ञ-भूमि में जो कोई भी जो कुछ माँगता है, वह दे रहा हैं । उस 
यज्ञ की समाप्ति के पहले ही आप हमारा हित सिद्ध कीजिए । 

उसी समय उज्ज्वल ब्रत-निर्प्ठ कक्यप ने अदिति के साथ एक सहत्न वर्ष का तप 
पूरा किया । उसके उपरात संवुप्ट हो विप्णु ने उन्हें दर्गव दिये । तब (उस दपति ने) 
प्रायंना की--हे रवि-्जणि-लोचन, आप अपने शरीर में हमें समस्त लोको के दर्शन 
कराइए । हें आचन्त-रहित और वेद-वेच्य, हम आपकी चघरग में जाये हे ।' 

“विष्णु ने छृपा-दृष्टि से कब्यप को देखकर कहा--आप अपने इच्छानुसार कोई 
वर माँग लीजिए, में दें दूँगा । कश्यप ने वह़ी प्रसन्नता तथा भक्ति से हाथ जोडकर 
कहा--हे भगवन्‌, आप अत्यत तेज-समन्वित होकर मेरे तथा अदिति के पुत्र होकर जन्म 
लीजिए तथा सुरो की रक्षा कीजिए । यहीं मेरी तथा देंवताओ की इच्छा हैँ । हम सब 
की इच्छा बाप पूर्ण कीजिए ॥” 

“कच्यप के इस प्रकार कहने पर विप्णु ने अपने अनुपम तेज से युक्त हो अदिति 
के गरभे में जन्म लिया । उन्होंने वामन का रूप थारण कर उस दानव (वलि) से तीन 
पृग बरती माँगरी । फिर, दो पयो से पृथ्वी तथा आकाण को नाप लिया और उस धन्यात्मा 
(वलि) को वॉविकर इन्द्र को तीनों लोक देते हुए कहा--ठुम इंने पर आासन करो ।' 
इसीलिए यह स्थान वामनाश्रम कहलाता है । यही हमारा जाश्रम है । इस पुण्यभूमि के 
निवासी तवोसिद्ध हें, अत यह सिद्धाश्रम भी कहलाता है। तुम्ही वामन होकर त्रिविक्रम 
का अवतार लेनेवाले विप्णु हो । उन दिनों में भी यह तुम्हारा ही वन था | हें राम, 
जाज नी उसी रीति से यह तुम्हारा ही वन है । इस प्रकार, कहते हुए कौदिक अपने 
आश्रम में गये और (वहाँ जाकर) राम-लक्ष्मण का सत्कार किया । 

२४, विव्वामित्र का यज्ञ 

वहाँ के मुनियों नें बड़े प्रेम के साथ राम की पूजा की । तव राघव ने विद्वामित्र 
देखकर बढ्े हर्ष से क्हा--हें मुनीश्वर, आप निश्चित होकर आज ही भन्न-दीक्षा 
लीजिए | यन्न के झत्रुओं का सहार में अवदय करूंगा ।' 

तव्॒विव्वामित्र अत्यत हर्पित हुए जौर मुनियों को बुलाकर स्वय यज्ञ-दीक्षा लीं । 
मुनियों ने बन्न की वेदियाँ तैयार कर दी और यज्न के आवश्यक अयो से यज्ञ-वेंदी सपन्न 
हो गई । घी की आहुतियाँ पड़ने लगीं और जब्नि की ज्वालाएँ जाकाश् तक फैलने लगी । 
हवन की अग्नि के प्रज्ज्वलित होने के साव-ही-साथ साम आदि वेंदो के आनन्द-घोष, निरतर 


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( सुनाई पडनेवाली ) देवताओं का आह्वान करनेवाली ध्वनियाँ तथा होताओ के पृण्य- 
मत्रो के शब्दों से दिज्ञाएँ अत्यधिक गूँजने लगी | एक ओर बडे आइचर्य के साथ यज्ञ के 
कार्य हो रहे थे, दूसरी ओर रामचद्र धनुष धारण कर, भाई सौमित्र के साथ, वडी सतकंता से, 
राक्षतों के आरनें का मार्ग पहले ही जानकर उस मुनि विद्वामित्र की रक्षा इस प्रकार 
करने लगे, जैसे समस्त विश्व को अधकार से आवृत होने से बचाने के लिए चद्र और सूर्य 
अपनी झ्ारवत प्रभा फैलाते हे । बडी भक्ति के साथ पाँच दिनो तक वे (उस यज्ञ की) 
रक्षा इस प्रकार करते रहे, जैसे पलकें पुतलियों की रक्षा करती है । छठे दिन मारीच तथा 
सुबाहु अपना समस्त बल इकट्ठा करके, उद्धत गति से आकाश में ऐसे व्याप्त हो गये, 
मानो (उन सबके शरीर) काले मेघों की राशि हो और उनके श्रेष्ठ खड़्गो की काति 
विजली हो । वहाँ खड़े होकर वे गर्णन करते हुए घमड से फूलकर यज्ञ-भूमि में लगातार 
रक्‍्त-मास की वर्षा करने लगे । तब होताओ में कोलाहल होने लगा । उपस्थित 
सदस्यों में कल-कल ध्वनि प्रारभ हो गई । परिचारको के दीन वार्त्तालाप सुनाई 
पडने लगे । 

यह सुनकर रामचद्र ने क्रोध के आवेश में लक्ष्मण से कहा--हे लक्ष्मण, अब तुम 
मरी शक्ति देखो । उनके घनुष की टकार विजय-लक्ष्मी के धनुष की टकार के समान थी। 
उन्हीने खडे होकर अपनी दृष्टि आकाश पर केंद्रित की और अत्यव बेग के साथ वायब्य 
वाण चलाया । वह वाण मारीच को द्रुतगति से शत योजन तक उठा ले गया और उस 
क्रर राक्षस को समुद्र में फेंक दिया । वज्ञ के प्रहार से समुद्र में गिरे हुए मैनाक की तरह 
वह असुर समुद्र में गिरा, फिर किसी तरह तट तक पहुँचा । उसने उस सूर्यवशी (राम) 
के उज्ज्वल पराक्रम की प्रशसा जहाँ-तहाँ की, (अपने) राक्षस-दल को छोड दिया, अपना 
शौय॑ त्याग दिया, आसुरी वृत्ति को दबा दिया और आसुचद्राश्रम-भूमि में सतत तपस्या 
भें लीन रहने लगा | 


हि. 


उसके पह्चात्‌ रघुराम ने सुबाहु के हृदय पर अग्नि-बाण चलाकर उसका सहार 
कर डाला । एक मानव-शर से अन्य राक्षस-सेना का वध कर दिया। (यह देखकर) देवता 
बडे हर्ष से पुष्प-वृष्टि करने लगे। मुनियों ने (राम की) स्तुति की। जिस प्रकार वृत्रासुर का 
वध करने पर देवता लोग इन्द्र की प्रशसा करने के हेतु उनके चारो ओर एकत्र हुए थे, 
वैसे ही (आज) राम अपने भुज-बल के प्रताप से यज्ञ के शत्रुओं को दड देने के कारण 
(मुनिजनों के बीच) शोभायमान हो रहे थे । 

विश्वामित्र बडी निष्ठा के साथ यज्ञ की सभी क्रियाओ को समाप्त करके आये 
और राम को बड़े हर्ष से गले लगाकर उनकी प्रशसा की और आशीर्वाद देकर बोले-- 
'रघुराम, तुम्हारी कृपा से में विना किसी कठिवाई के यज्ञ सपूर्ण करके कृतार्थ हुआ ।' 

इस प्रकार, उस पुण्यात्मा विश्वामित्र मुनि का अनुराग प्राप्त करके राम ने वही 
रात्रि विताई और बडे सबेरे, प्रातकाल की सभी विधियो से निवृत्त होकर, सब मुनियों 
को प्रणाम करके, गाधि-युत्र से कहा--हे तपोनिष्ठ, अब हमारे लिए क्‍या भाज्ञा है ? 
हम आपके दास हुँ और आपकी कूपा के पात्र है ।” 


र्८ र॑ंगनशथ एगायर 


तव वहाँ के सभी मुनि गावि-पुत्र को आगे करके इस प्रकार कहने लगें--- हैं रवि- 
कुल श्रेप्ठ, महाराज जनक वडे सुदर ढग से बन्न कर रहें है । हम वहाँ चलें । उनके पास 
परमणिव का ब्व्य घनप हैं । गवर्व तथा राक्षस आदि कई वीर उसे उठाने मे असमर्थ 

हो चुके हूँ । ऐसे धनुप को उठाकर उस पर प्रत््वचा चढानेवाल श्रप्ठ वीर के साथ ही अपनी 
पुत्री का विवाह करने की प्रतिज्ञा राजा जनक कर चुक हूँ । इसलिए उस श्रेप्ठ धनुप 
को तथा जनक के यज्ञ को देखने आपको अवश्य जाना चाहिए 

इस प्रकार विश्वामित्र तथा अन्य मुनियों ने उन वीर, पुण्यात्मा, दाभरथियों को 
मिथिलापुरी चलने की प्रेरणा दी । सव लोग बडे हर्प से प्रस्थानकर गगा के उत्तर तठ पर 
पहुँचे! और हिमाचल तथा सिद्धाश्रम को दक्षिण में छोडकर* उत्तर की ओर बढ़े । 
उस मार्ग से यात्रा करते हुए वे उस दिन तीसरे पहर तक तीन योजन चले । वहाँ शोण 
नदी के किनारे वे ठहरे और वहाँ के पुण्य तीर्थ में स्तान आदि क्रिया से निवृत्त हुए 
(उसके पच्चात्‌) उस रम्य स्थल में मुनियों के साथ बडे आनद से रहते हुए राम ने कौणिक 
से यो कहा-- 

२४, कौशांबी का वृत्तांत 

(श्रीराम ने कहा)--हे मुनिनाथ, अत्यधिक प्रजा-समृद्ध यह देश किसका हैं ? 
कृपया बतलाइएु ४ तब विष्वामित्र ने कहा--हे राजन, सुत्तो, ब्रह्म के मानस-पुत्र कु 
नामक एक बजणस्व्री मुनि पूर्व काल में रहते थे। उन्होंने वैदर्भी नामक स्त्री से रूपवान्‌ 
तथा जात प्रकृतिवाले अधूत्तं रज, वसु, कुआव और कुशनाभ नामक चार पुत्र प्राप्त किये । 
चारो पुत्र जत्यत साहस तथा चूरता के साथ अपने क्षत्रिय-धर्म का पालन करने लगे । 
अपने पुत्रों के चरित्र तथा सद्युण देखकर कुश ने बडे हर्ष से कहा---इस पृथ्वी पर तुम 
लोगो को प्रजा का पालन करना चाहिए । इससे तुम्हारी कीत्ति व्याप्त होगी ।! 

“तब कुचल कुशाव ने वहुत प्रसन्न होकर कौबजांवी नाम से एक नगर का निर्माण किया । 
है दणरस्‍्थात्मज, कुगनाभ ने महोदय नामक नगर बसाया | शूर अधृत्तेरज ने घर्मा- 
रण्य नामक सुंदर नगर का निर्माण किया और वसु नें गिरिवत्व नामक एक अत्यत दर्शनीय 
नगर वबसाया । यह प्रदेश , जहाँ हम हे, महाराज वसु के राज्य में हैँ ; इस प्रदेश के 
चारो दिल्लाओ में पाँच पर्वत है । उन पव॑तो के मध्य मागधी नामक एक नदी बहती है । इस 
सारे मगव देंग पर वसु महाराज अत्यत धर्म की रीति से प्रजा का पालन करतें हें । 

“कुशनाभ ने घृताची नामक एक अप्सरा से प्रेम करके (विवाह किया)। मन्मथ-शर 
जसे नेत्रवाली सौ रूपवती पुत्रियो को प्राप्त किया । एक दिन कमनीय कातिन्युक्त तथा 

मनोहर यौवन-सपन्न वे युवतियाँ उद्यान में गईं । 

१ गंगा के दक्षिण तट से चल; क्योकि उत्तर तट पर पहुंचकर चलने से शोण 
नदी नहीं मिलगी । “-प्तम्पादक 

२० हिमाचछ तो “जनकपु' से भी उत्तर हैं, उसे दक्षिण में छोड़कर “सिद्धाअम 
से चलना अमंगत हेँं। वाल्मीकिरामायण में लिखा हे कि सिद्धाअरम हिमालय की ओर 
उत्तर विश्ञा सें जलने के उद्देश्य से वे चले ।--तम्पादक 


बएालकीड र्‌€ 


“वहाँ अपने मजीर, मेखला तथा ककणों को मधुरमधुर मुखरित करती हुई ताल- 
गति के साथ लास्य करने लगी । कुछ युवतियाँ मृदु-मधुर रीति से मृदग आदि वाद्यों को 
बजाने लगी, कुछ अपने कर-पल्‍लवो से वीणाओ को क्वणित करने लगी, कुछ अन्य 
युवतियाँ आमू-मजरी के मधु-पान से मस्त कोकिल-कठ से गान करने लगी। इस भ्रकार वे 
सभी कन्याएँ उस उद्यान में क्रीडाओं में मरंन हो गईं । 

उन सुदरियो को देखकर काम-पीडा से व्याकुल होकर पवनदेव ने उन मानिनियो से कहा--- 
है मानिनियो, आप किड्चित्‌ मेरी वात पर ध्यान दें । हे पद्माक्षियों, आप मुझे (अपना 
पति) वरण करें और अमरत्व को प्राप्त करें। इस तरह आप अजर-अमर होकर 
सतत यौवनावस्था में रहती हुई उन्नत कीर्ति प्राप्त करेंगी ।' 


“तब उन कन्याओ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया--हे अनिल, आप सब के हृदयो 
में सचार करनेवाले हे । आप हमें जानते हे । हाय ! आप अपनी महत्ता का भी विचार 
किये विना क्‍या कह रहें हे ? हम उस कुशनाभ की पुत्रियाँ है, जो नीति-तय-सपन्न तथा 
धर्मानुरक्त हे । हमारे पिता के रहते हुए हम अपने-आप किसी का वरण कर लें, तो इससे 
हमारे कुल को कलक लगेगा । हमारे पिता हमें (विवाह में) जिन्हें देंगे, वे ही हमारे 
पति होगे ॥ 

“यह सुनकर पवन अपने क्रोध को सँसाल नहीं सका । उसने उनके अगो में प्रवेश 
करके उन्हें कृब्जाओ के रूप में परिवत्तिंत कर दिया । खिन्न होकर वे सभी (क्न्याएँ) 
अपने पिता के सामने गईं और सिर भूकाये आँखों में आँसू भरे खडी रही । कुशनाभ 
अपनी पुत्रियों की दशा देखकर सहम गये और पूछने लगे--हे पुत्रियो, तुम्हें ऐसा रूप 
कैसे प्र/प्त हुआ ? किसने ऐसा किया ? तुम बोलती क्यो नहीं हो ? इसका क्या कारण है ?” 

“तब उन धवलाक्षियों ने हाथ जोडकर अपने पिता से कहा--'पिताजी, हमें देखकर 
पवन ने निर्लज्जता से कहा कि हे सुदरियो, तुम लोग मुझे वरो । हमने उसका प्रस्ताव 
स्वीकार नहीं करको कहा कि आप यह बात हमारे पिता से जाकर कहिए | इसपर उस 
क्रूर ने कामाध होकर हमें कुब्जा बना दिया ।” 

यह सुनकर उन्होने उन कमलाक्षियो से कहा--हे कनन्‍्याओ! ओऔचित्य और धर्म 
का विचार करके (कुल की मर्यादा का उललघन करना) अनुचित समभकते हुए तुम लोगो ने 
उस मर्यादा का पालन किया । तुम्हारे इस गौरवपूर्ण कार्य से मेरे कुल की प्रतिष्ठा बढ़ 
गई हैं । देवताओं के सबंध में क्रोध करने का साहस तुमने तहीं किया । इस प्रकार 
तुम्हारा सहन कर जाना ही उत्तम हैँ । क्षमा (सहनशीलता) ही सत्य है, शील है, तप हैं, 
घमं है और कीत्ति है । वही समस्त लोको की रक्षा करनेवाली है 

“इस प्रकार (सात्वना देकर) राजाने अपनी कनन्‍्याओ को विदा किया । [ 
परचात्‌) उन्होने अपने मत्रियों से परामर्श करके पुण्यात्मा चूली नामक मुनिवर के पूत्र 
सद्गुण-सपन्न ब्रह्मदत्त को बुलावा भेजा और निर्मल मति से उस महात्मा की धर्म पत्नियों के रूप 
में अपनी कन्याओ को दे दिया । चूली-पुत्र के उन्हें स्वीकार करते ही उन कन्याओ की 
त्रिकृति दूर हो गई ।” 


रंगनाथ रशयायण 


रब] 
कि 


8. 


है अवनीण, उस ठिन से वह उत्तम नगर कन्याकुव्जा के नाम से इस पृथ्वी पर 
विख्यात हुआ । तव कुमननाभ अपनी पुद्धियों के कमनीय रूप देखकर बहुत प्रसन्न हुए और अपनी 
पत्रियों तथा जामाता को विदा किया । तब कुथ ने अपने पुत्र कुचनाभ को सवोबित करके 
कहा-- तुम पुत्रकामेप्डिय्यन करो' तो तुम्हें जमित कीत्तिमान्‌ तथा पुण्यात्म गाधि नामक 
पुत्र होगा । यो छह्ककर वें ब्रह्मतोक सिवारे ” 

“कु के पौत्र रूप में गाथि ने जन्म लिया। हे द्रवात्मज, में उसी गावि का पूत्र हूँ । 
क्य वंच्ज होने के कारण मुझे कौणिक भी कहते हे । गुणवती तथा धर्म-निष्णाता 
वडी वहन सत्ववती, अपने प्राणेब्वर ऋचिक के साथ सणरीर इन्द्रलोक में गई और 
सम लोक का कल्याण करने के लिए प्रालेब-पर्बरत में स्वव कौथिकी नाम से नदी के रूप 
में वह रही है । सिद्धाश्रम में प्रवेश में करने के कारण सच ही में तप सिद्ध हुआ । प्राचीन 
काल से में अपना नाम तथा इस देच के निर्माण के सवव में यह वृत्तात सुचता आ रहा हूं । 
जब हें राजन, वद्ध-रात्रि हो गई । तुम ठहुत थर्क हुए हो, अत- विश्लाम करो । 


। 
| 


) 


6. -प/ (3 
£| 


“मनी वृक्ष स्थिर हो गये है, इस वन-प्रान्त में मृग-समूह का संचार अब नहीं रहा, 
विहग बअमबने घोसले में पहचकक्‍न अपनी मीठी वॉलिसय्गे को भूले हुए पड़े हैं, अव निश्ाछ र, 


वक्ष तवा राक्षण अपने इच्छलुसार इस पृथ्वी पर सचरण_ ऋन्‍्ंगे, समस्त दियाएँ तथा 


आकाश कालिख बोले हुए-पे अवज्ासम्य दीख रहे हे, ब्रह्मण्ड-त्ती गृह के लिए चीलावर 
में लगाये 


हुए मोतियों से युक्त तव्‌ के सम्रान यह आकाञ नक्षत्रों से युक्त होकर बोभा 

तवा जन-जन को आनदित कस्ते हुए सल्नत्र-पति अमी-अझी उदित हो रहा है । 

उन वचतों से प्रसन्न होकर सबथमी मुनियों ते विब्वासित्र से कहा--हे अनघ, आपका 

व्य अमल हूँ । आपके वच्चज बतुलनीय म्गह्मत्म्मगने हैँ । आप ब्रह्मा के समान हे | आपका 

ब्रह्म-तेज स्तुत्व हैँ । तव विव्वामित्र ने उन मुनीज्वरो को बन्यवाद दिये । फिर राजकुमार 
हे! 


तथा मुनिजनों ने उस रात्रि को वही णबन किया । 

“प्रात काल होने पर ऋषियों तथा विच्वामित्र ने (राजकुमारों से) कहा--हें राज- 
कुमारों, जब तुम निद्रा तजों ।! वे जग॒ पड़े और प्रातःकाल की क्रियाओ से निवृत्त होकर 
कौशिक से कहा--“ग्ह ग्ोण नदी-रत्न कितना जगाव और सुंदर हैं ? मछलियों से परि- 
पूर्ण, अत्यत रमणीय सैंकत स्थल, मबुर जल तथा परिचित हस आदि खगब-कुल से जोमायमान, 
मद-मद पवन (के कारण ) तरल तरंगो से युक्त यह नदी बडी ही रमणीय हैं। 
हैं जनव, हम कहाँ और किस प्रकार इस नदी को पार करेंगे ?” 

तठ विद्वामित्र ने कहा--मुनिलोग प्राय जिस स्थान से होकर इसे पार करते हैं, 
उसे जानकर हम भी वहीं से इसे पार करेंगे ॥ 

इस प्रकार कहते हुए वे सव लोग कुछ दूर आगे चले । (वे ऐसी जगह पहुंचे), 
जहाँ कुल हम, सारस, कारइग आदि जल-सक्षियों का कलनाद ऐसा मीठा सुनाई पड रहा था, 
मानों वें लोगों का क्वायनत कर रहें हो । ताम ने उस ध्वनि को सनकर, मध्यात्ष 

समय सिद्ध मुनियुगवों से सुसेवित, छझुद्ध तथा पृण्य जल से पूर्ण, पथ्ची में श्रेष्ठ नदी के 


नाम से विख्यात जाक्वदवी को देखा और उसको प्रयाम करके कहा--हें गावेब, वह जो 


ब/लकाड ३४ 


अगाथें श्रेष्ठ नदी दिखाई पड रही है, वहाँ तक हम कैसे पहुँचेंगे ?” तब मुनि बोलें--- 


फि 


हैँ नरताथ, शोण नदी को पार करके तीन योजन आगे जाने पर हम उस महानदी के 
पास पहुँच सकते हैँ । तब तक हमें मार्ग में जल और फल आदि बहुत मिल जायेंगे ।' 

यो कहकर वे (शोण) वदी पार करके चलने लगे । (निदान) वें उस गगा नदी 
के तट पर पहुँचे, जो सारस-समूह्‌, पृण्य-सलिल, विकसित-कमल, फेन तथा सुदर मछलियों 
से युक्‍त हो नित्य गभीर गति से बहती थी। वे वहाँ घन-लता-कुजों से युकतत एक समतल 
स्थान पर ठहर गये । वहाँ राजकुमार मध्याक्ष की (संध्या आदि) पूजाओ से निवृत्त हुए, 
वडे आनन्द से उचित आहार ग्रहण किया और मुनियो की सगति में बैठकर वार्त्तालाप 
करने लगे । 

(उस समय) राजहसो द्वारा (कमल-पुप्पो को) हिलाये जाने से गिरे हुए कमल- 
रज से पूर्ण तथा राजीव-राजित तरगों से युक्त गगा नदी को देखकर क्षत्रिय-तिलक रामचद्र ने 
कौशिक से पूछा--हे महात्मा, गगा नदी इस पृथ्वी पर कंसे आई, यहाँ से वह स्वर्ग- 
लोक में कंसे पहुँची ” पाताल को वह कंसे प्राप्त हुई ? कंसे वह समुद्र में जा मिली ? 
उस महानदी का जन्म कैसे हुआ ? कृपया बताइए ।' 
तब उस पृण्यधनी विश्वामित्र ने राम से कहा--हिमवानू (हिमालय) के कमनीय 


दीप्तिवाली दो पृुत्रियाँ है । देवता लोग हिमालय से प्रार्थना करके उन दोनो में से बडी 
पुत्री पुण्यशीला गगा को यज्ञ के लिये स्वरगगलोक में ले गये । दूसरी कन्या परम सुदरी 
पार्वती को भाल-लोचन (शिव) की घोर तपोनिष्ठा से सतुप्ट हो, उन्हें पत्नी के रूप में दिया । 
गगा सुरुचिर गति से स्वर्ग में गई और वहाँ सुरतदी के नाम से विख्यात हुई ।' 

इतना कहने के बाद मुनिवर ने राजकुमार को देखकर कहा--“और एक वृत्तात है, 
सूनो । पार्वती से विवाह ,करने के पदचात्‌ चद्र-शेखर (शिव) वडी अनुरक्ति के साथ 
एक सौ दिव्य वर्षों तक रति-क्रीडा में निमग्न रहे। तव ब्रह्मा से लेकर समस्त देवता अपने-आप 
सोचने लगे कि इन दोनों (शिव-पावंती) का विषम तेज कौन धारण कर सकेगा ? इनके 
द्वारा उत्पन्न पुत्र की विषम शक्ति के सामने कौन टिक सकेगा ? इसलिए वे सब महादेव 
के पास जाकर बडी भक्ति से विंनम्न हो कहने लगे--हे देवाधिदेव, हे महेश, हे सर्वेश, 
आपकी महिमा सभी देवता जानते हे । हे सर्वज्ञ, आप हम पर प्रसन्न होइए । आपके 
महान्‌ तेज को धारण करने की क्षमता किस में है ? इसलिए आप यह क्रीडा छोड दें । 
आप कृपा करके तपोवृत्ति ग्रहण कर ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए । इस पर गौरीश ने 
उनकी वात स्वीकार कर ली और कहा-- (किन्तु) अब तो तेज अपने स्थान (रेत स्थान) 
से विचलित हो चुका है । अब आपमें से कौन इस तेज को धारण करेगा ? तब उनकी 
बात मानकर हर ने अपने (तेज का) विमोचन धरती पर कर दिया । तब देवताओ ने 
अग्निदेव को देखकर कहा--हे पावक, तुम पवन के साथ, घरती पर पढे हुए तेज में 
प्रवेश करो ।” अग्नि तथा वायु उस तेज को धारण करने में असमर्थ रहे । तव गंगा नदी ने 
उस तेज को बडी श्रद्धा के साथ धारण किया । लेकिन अपने प्रभु का तेज धारण 
किये रहना उसको लिए भी असभव हो गया । वह भय से कॉँप उठी और उसकी लहरें 


2 रंगर्नाश्यं एर्येगण्यर्ण 


> जज 2 उसने क्षमित से उस नेज के ने तठ 
नय प्रन्द अन्त हुएु उसने ठव गई ॥। तब उसने नह्षानत चित्त से उस तेज को अपने त 
६5 


| ्ज तिय्ठिद 2 ..... दया शिव का दा उस सरकडे जो 
पर उननेदाल सरखड्ा के बन में अ्तिख्ठझय जभु दिया ॥ वधिव का तंज उस सरकंड के 


हुज्ञा 
£> झपतस -_. नित्ण ब्>जज+ निवत्त ७०. >> ञा पन्ची उन्द्दोने +> 
एुजल दिन ऋषिझ्ऊत्नियाँ अपने नित्ण इृत््यों से निवृत्त होने व्हाँआ पहुँची । उन्हों 
व्क 


> पं विचार क्थिा हम ठच हि ठिठर य्ही >> सन्‍कड़ो 
स्तान दसते समय आाउस में विद्वर क्या कि हम ठड से ठिदुर रही है, इसलिए सनन्‍कड 


की उस कड़ी में त्रेतान्तिरों के समाच प्रज्वलित होनेगाली उन अन्नियों की हम चरण 
लेंगी (उसने पास ऊाजर अपनी ठड् दूर करेंगी)। इस प्रकार सोचकर वे ऋषि-पत्तियाँ 
उन अग्नियों के उास जा पहुँची । 

जो स्त्रिणँ उव अग्नियो के पास गई और उिन्होने बड़े उत्साह से उन्हें देखा, वे 


न ट 


द 
नि टिक मििनिि मे हि अ्त्यत रे भीत कप उठी और हद पच्चात्त रे करती हि 
संत गर्भठती हो गई। (इस व बत्यत मात हा उठी और पच्चात्ताप करती हुुू 


न्ज्ज >> छआनतच्चि ल्ज्पि्ज्जिलज >> अजाजईी- नअभ योग: जाप जप कि वत्तान्त . जान लिया 
बर उडी । झावहित मृतियों ये अण्नी योन-दृष्टि से उस सारे वृत्तान्त को जान लिया 


ठ च्द 
लए अ वि स्द्रियो 5 पुल सब्र तम्तार > गर्व ८ तथा सख्र ० इच्छा फल खेत 
द्वार इच अन॒च्द्या त् तह्ा-शणथतु लब तुम्हार नव तथा सुद्ध का इच्छा का फल हू । 
> उठउद्छान ञ>5 स्त्रियो छर क्राधोन्मतच >> >>: सारी ०2... _. 9 -अमिि हुए.  -+- _-. बोले प्त्म 
(इसके द्छ् तर) व चस्त्िय « क्रावन्मद् हा, सात पृथ्वा का कपात॑ हुएनस वाल-- तु 


बे तम्हें का 0.9. नही करनी चाहिए ब अपने कप पतियों बिक पथक #य्छो जायो कक डर 
सब वाद्टहाच हा, तुम्ह क्षमा नहा द रवा चाहिए | तुम जपने पांतियां से वक् हा जे | 


तह प्र -5 प्र >--+>- नदी किमीयय पास गईं 2 और >>. 5 लगी. मु न क्या हि यद्वी ०० तम्जे ० करना 
दस 4५ वे कक पेजों सदा के वीस जद बार कहन लगा-- हूं माता क्‍या, यही तुम्हें करन 
चाहिए ” क्या (हमारी एसी दया कर दना) तुम्हें चोभा देंता हे ट्ः 


ल्च्ी >>» स्त्रियाँ जपने गर्भ पर वपतने >> हाथो कण ताइन करने लगी 
इस अक्नार चलता हुई व ल्व्ियाँ अपन गे पर के हाथ से ताड़न करने लगी । 


गर्भ विच्छिन्न हो छह खडो में पथ्ठी पर गिर गये । वे 


प्‌ 
<........5 गिर ह्ए न उन खंड़ो ० अनकर > 5 _+ ८ तप करने >> 
( स्त्र्या पर हुई उप सोडा का चुनतक्र उन्ह सरकंड के वन में रखकर त कर 
चली गई । 
उद्र ऊपर नें रद्धई एक >->>-_. एक्त्र >. होज्र बहनें + लगा और ४ पर 
“छह उन्र ठेज वहाँ एक पट ऐुक्त्र हाज्र बहने ल* र वहा इस पृथ्वचा पर 


ब्वेठाद्ि के नाम से व्ल्वात हुआ | उस पर्वत पर परम छिव के तेज से कुमार वा जन्म 
जन्न-स्थन सरकडो दे भरा प्रदेश था, इसलिए वें गरजन्मा 


(धरहमनव) ल्हलाये । इस पृथ्वी पर जन्म लेने के पच्चात्‌ कृत्तिकाअ्ं ने उन्हें स्तन्य-पान 
लतक्र शातालोडा, इसलिए उनका नाम कात्तिक्े पड़ गया | वे माताएँ (छत्तिकाएँ) 
छह थी | ब्लएव उन्हें सतुप्ट करने के लिए कुमार ने छह मूह धारण करके स्तन-पान किया, 
इसलिए वें पत्मुख ( बौर पाणप्मातुर ) कहलाये । अउच्द्रमौलि के वीर्य॑-स्कंदन (पतन) से 
उनका जन्‍म हुआ, इसलिए के स्कठ क्हलाये । 


के न 


“(किन) वहाँ देवठा भिव-पाव॑ती की स्तुति करने लगे । (पत्रोत्पत्ति में बाबा डालने 


के करा देवताओं पर) कद्ध होकर लाल-लाल नेत्रो से उन्हें देखती हुईं पार्वती ने कहा--- 
देखताओं कि तम द53...- वन बरा संतानहीन ् जाओ पु पु 
है देवताओं, ठदुन आर यह वनुवरा संतानहीन हो जाओ । जाये से इस पश्ची को बहु- 
पद्ित्व प्राप्त होगा । (बह सनकर) देवता व्याक्ल > रः पार्वती 
दित्द आप्त होना । (बह सुनकर) देवता व्याकुल हुए । उसके पब्चात्‌ चिवजी पार्व॑त 
>> 5 ्ब जे 5 
के साव तपस्ण करने हिमाचल पर चले गये । 
“इन्द्र के साथ सभी देदता ब्रह्मा के पास गये और उनसे विनती की-... 8 
न्द्र्कछ्य साथ सन दता ब्रह्मा के पास गय र उनसे न की-- हें जलज- 


+ त्यत भजदर एक सेनावति ह 
चइनव, हसन कर हवदा छुक सनावांद प्रदान कीजिए 7 तब उन्होने देवताओं को देख- 


ब/लकाड ३३ 
देखकर कहा--गौरीश के पुत्र कात्तिकेय तुम्हारी सेना का नायकत्व ग्रहण करेंगे ।” देवता 
बहुत प्रसन्न हुए और कात्तिकेय उनके सेनाषिपति हुए । इससे इन्द्र को उन्नति तथा सुख 
प्रपप्त हुए ॥” 

इस प्रकार मुनि के कहने पर रघुराम अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें देखकर कहा-- 
है सयमीश्रेप्ठ, इस महानदी (गगा) के त्रिपथगा होने का क्‍या कारण है ?' 


२६. गंगा नदी का वृत्तान्त 

तब कौशिक श्रीराम से उसकी कथा यो कहने लगे--“पुण्यवान्‌ सगर अयोध्या 
के विख्यात सम्राद थे । पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने (एक बार) हिमाचल में भृगु 
की तपस्या की । उनकी तपस्या से सतुष्ट होकर भूगु ने उन्हें देखकर कहा--हे राजन, 
तुम्हारे बहुत-से कीत्तिवान्‌ पुत्र होगे । तुम्हारी एक स्त्री एक वशोद्धारक पुत्र का जन्म 
देगी और दूसरी स्त्री साठ हजार अतिवलशाली पुत्र उत्पन्न करेगी । यह वरदान प्राप्त 
करके रानियो ने हाथ जोडकर बडे विनय से मुनि को प्रणाम किया और पूछा--हे मुनीश्वर, 
हम (दोनो) में से किसके एक पुत्र होगा और किसके साठ हजार पुत्र उत्पन्न होगे ?! 
तब मुनि बोले--तुम्हारी इच्छा जेसी हो, वैसे ही पुत्रों का जन्म होगा । इससे प्रसन्न 
होकर बडी रानी ने राजा से (अपने) नाम को सार्थक करनेवाले एक ही पुत्र पाने की 
इच्छा प्रकट की । दूसरी रानी ने साठ हजार पुत्रों को प्राप्त करना चाहा । फिर उन्होने 
बडे हर्ष से उस मुनिश्रेष्ठ की परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और नगर को लौट आये । 

“कुछ दिनो के पश्चात्‌ बडी रानी केशिनी ने असमजस (अश्वमज) नामक एक पुत्र को 
जन्म दिया । (दूसरी रानी) सुकृति ने लौकी के आकार का एक गर्भ-पिड उत्पन्न किया, 
जिसमें से बडे आइचयें से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए । तब धाइयो ने उन शिशुओ को 
घी के पात्रों में रखकर कुछ दिनों तक उनका पालन-पोषण किया । वे क्रश रूप तथा 
यौवन प्राप्त करने लगे । ज्येप्ठ पुत्र बडे दर्पष के साथ अपने छोटे भाइयों को बलातू पकड- 
पकडकर सरयू नदी में फेंक देता था और (उन्हें डूबते देख) बहुत हर्षित होता था । 
ऐसे दुष्ट असमजस के अशुमान्‌ नामक एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । असनजस को अति- 
दुष्ट जानकर राजा ने उसे निर्वासित कर दिया और शाइवत-घर्म-निष्ठा में तत्पर हो अश्व- 
मेध-यज्ञ करने का यत्न करने लगे ।॥” 

मुनि के यो कहने पर श्रीराम ने कौशिक से कहा--हें मुनिनाथ, मुभे अपने पूर्वजों 
के चरित सुनने की बडी इच्छा हो रही है । कृपया विस्तार से कहें ।' 

तब विश्वामित्र कहने लगे--हिमाचल और विंध्याचल के मध्य की भूमि में सगर ने 
अपना अद्वमेध-यज्ञ प्रारम किया । यज्ञाइव की रक्षा करने के लिए अशुमान्‌ नियुक्त 
किया गया । उस समय इन्द्र राक्षत का वेश धरकर अहव को चुरा ले गया और पाताल- 
लोक में प्रवेश करके वहाँ तपस्या में लीन कपिल मुनि के निकट यज्ञाइव को बाँधघकर स्वय 
स्वर्गंलोक को लौट आया । अइव का पता न लगने से कऋ्रुद्ध होकर राजा (सगर) ने अपने 
पुत्रो को सबोधित करके कहा---अइव का कही पता नही हैँ । कोई कुटिलात्मा उसे चुरा 
ले गया हैँ | अत तुम लोग तुरत जाओ और जिस किसी के पास वह अश्व हो, उसका 

4 


३8 संगनाथ रायायफों 


बव करके अब्व को जीघ्र ले आबजो ।॥ साठ हजार सगस्पुत्र अपने भुजन्वल का प्रदर्शन 
करते हुए, निकल पडे । उन्होंने पहले स्वर्ग, फिर भूलोक में अच्छी तरह उस अच्व को 
ढूँढा । जब कही भी उसका पता न चला तब वे पृथ्वी को टुकडे-टुकडे करने लगे । हममें 
से प्रत्येक्त एक योजन पृथ्वी को खोद डा्लेगे--ऐसा निध्चय करके वे प्राच्य दिशा से 
प्रारम करके, वडी-वड़ी कुदलों और घूलो से पृथ्वी को रसातल तक खोदने लगे । इस 
प्रक्रित में सामने आनेवाले पात्तालवासी तथा अन्य प्राणियों के समूहों का सहार भी वे 
करते जाने थे । 

४इस प्रकार उन अतुल वलग्याली राजकुमारों ने साठ हजार योजन भूमि सहज ही 
खोद डालो | इस प्रकार अम्नख्य प्राणियों से युक्त जबद्भगीप को सतत खोदतें हुए, उपद्रव 
करनेवाले समस्यपुत्रो को देखकर अमर गवर्व तथा सिद्ध घबरा उठे और ब्रह्मा के पास 
जाकर भक्ति से प्रणाम करके बोले--हे जलजसभव, वन, पर्वत तथा द्वीपों से युक्‍तत इस 
पृथ्वी को समस्झपुत्र खोद रहे हें । जो कोई भी उनकी दुष्टि में पड जाता है, उसे इसीने 
यन्न में वाद्य डाली है, यही अच्चहर हैं, ऐसा कहते हुए व्यर्थ हो उसका वव कर डालते हैं । 
इस प्रकार उन्होने कितने ही जक्ति-सपन्न जलचरों का सहार कर डाला । आप कृपया 
इसकी निवारण का कोई उपाय कीजिए । 

“तब ब्रह्मा ने उनसे कहा--अव्यय दामोंदर (विष्णु) कपिल मुत्ति-के रूप में-तप कर 
रहे है । उस मुनि की क्रोवास्नि में वे सब भस्म हो जायेंगे 

“सगर-ुत्रो ने वज्ञ के समान भयकर गर्जन करते हुए इस पृथ्वी को चारो ओर से 
खोद डाला, किन्तु उन्हें कही भी घोडे का पता न चला | तब वे अपने पिता के पास 
लोठ आये और बोले--हे देव, हमने समस्त पृथ्वी छान डाली, किन्तु कही भी हमें अहव 
के चोर का पता नहीं चला | जब जैसी आपकी आाज्ञा हो 

“तब राजा ने अत्बन्त क्रोव से अपने पुत्रों से कहा--तुम लोग समस्तः विश्व में 
व्याप्त होकर घोंडें की खोज करों | विना अब्ब के तुम लोग यहाँ मत आना।।' 

#“सगरयपुत्रों ने पिता की आज्ञा विरोवारण करके वडी भयकर गति से रसातन में 
प्रवेश किया । वहाँ वे पूर्व से लेकर दक्षिण की तरफ खोदने लगे । पूर्व दिशा-भर में खोजने 
पर उन्हें कही भी घोडा दिखाई नहीं पड़ा । उन्होनें वहाँ पर एक श्रेष्ठ गजेन्द्र को देखा, 
जो चारो ओर से प्थ्वी-तल को इस प्रकार सभाले हुए था, जैसे विष्ण ने अपनी सन्दर 
भुजाओं से पुथ्वी को ऊपर उठाया था । सगर के पुत्रो ने उस गजराज को देखकर उसकी 
पूजा की बौर विना विलब किये आग्नेंय दि्या में चल पडे । वहाँ खोजने पर भी उन्हें 
उन अब्बव का पता नही लगा । वहाँ निरतर वहनेवाले मदजल की सुगवि से आक्ृष्ट, 
जअनरा से युक्त 'पुण्डरोकः नामक गज को देखकर उसकी पूजा तथा स्तुत्ति की और दक्षिण 
द्य्यि में चल पट़े । वहाँ भी उन्हें अजब का कोई समाचार नहीं मिला । किन्तु वहाँ 
उन्होने वामन' नामक श्रेष्ठ गजकों देखकर उसकी अर्चना की और नैऋती दिलणा-में खोज 
करने लगे । वहाँ भी अब्व का पता नहीं लगा । वहाँ उन्होंने कुमुंद-समान कोमल तथा 
कुमुद-पुष्प क वर्णबवाले कुमुर्दा नामक कुजर को देना । उन्होंने उसको प्रणाम करके परिचम 


न्कालकाड ३२ 


:की- ओर. प्रस्थात किया । वहाँ खोजने पर भी अद्व नही मिला । पर -वहाँ उन्होने अजन- 
पर्वत के समान, मदजल से युक्त अजन” नामक हाथी को देखकर उसकी वदना की । 
-वे वहाँ से -वायव्य दिशा में निकल पडे, पर बहुत समय तक खोजने पर भी 
ल्‍्ञभइव - का - पता नहीं लगा सके । वहाँ 'तमुचि'- नामक राक्षस का सहार करनेवाले हाथी के 
-समान दाँत रखते हुए भी पुष्पदन्त' नाम से अभिहित गज को देखकर बडी भक्ति से 
“उसको प्रणाम किया और वहाँ से कुबेर की दिशा (उत्तर) में खोजने निकले । वहाँ भी 
उन्हें अशबव नहीं दीख पडा । वहाँ उन्होने समस्त गज-लोक के चक्रवर्ती के समान विराज- 
“मान सावंभौम' नामक गजेन्द्र को देखा और वडी भक्ति से उसको प्रणाम किया । वहाँ से 
ऐशानी दिशा-में चले । उस समय उन्होने निकट ही नेत्र बद किये हुए एकात तपोनिष्ठा 
में लीन हवनाग्नि के समान ( पवित्र ) अनघात्मा महामुनि कपिल को और उनके पास 
-ही अछ्व को (वँधा हुआ) देखा । सगर-पुत्र उन्हें कष्ट देने लगे | जब मुनि ने 
-क्रोध में आकर उनकी ओर दृष्टि डाली, तब वे साठ हजार सगर७>जयुत्र वही भस्मीभूत 
हो गये । 

“अश्व के लाने में विलब होते देखकर 'सगर” बहुत दुखी हुए और उन्होने अपने 
पोते अशुमान्‌ को भेजा । अशुपान्‌ भी उसी मार्ग से गया और पूर्व दिशा में रहनेवाले 
'विरूपाक्ष। नामक हाथी को देखकर उसकी परिक्रमा की और उससे विनयपूर्वक पूछा-- 
है .गजराज, क्या आप बता करते है कि मेरे चाचा किस दिलख्षा में गये है, कहाँ हे और 
अश्व का चोर कहाँ छिपा है ?' 

तव उस गजराज ने अशुमान्‌ को बडे स्नेह के साथ देखते हुए कहा--हे राज- 
कुमार, तुम किसी स्थान में अवश्य अश्व को देख सकोगे ।' वहाँ से चलकर प्रत्येक दिग्गज 
से इसी प्रकार प्रश्न करते हुए और इसी प्रकार का उत्तर प्राप्त करते हुए अत में उसने 
कपिल मुनि के निकट यज्ञाश्व को देखा । वहाँ सगरपुत्रो के शरीरो की भस्म-राशियो को 
देखकर वह शोक-सतप्त हो गया । उसने अपने पितरों की तिलोदक-क्रिया करने के विचार 
से जल की खोज की, प्र वहाँ जल कही भी नहीं मिला । 


२७ गंगावतरण की कथा 


“उस राजकुमार पर दया करके उस समय वहाँ गरुड आये और राजकुमार से कहने 
लगे-हे पुत्र, कपिल को क्रोधित करके उनकी क्रोधाग्नि से सर्भी सगर-पुत्र भस्म हो गये हे. । 
“इस तरह ' 'शोक-सतप्त क्यो होते हो ”? यह जोक करने का समय नही हैं । एक बात सुनो । 
सरसिजासन ([ ब्रह्मा ) के लिए वद्य, अरविद-चरणवाले, अरविददल-नेत्रवाले, आदि- 
पुरुष (विष्णु) ने दानव-राजा वलि को बाँवते समय, त्रिविक्रम का रूप धारण करके, 
अपनी अगणित शक्ति से दो पादों में ही समस्त पृथ्वी को समेट लिया था और जलजात, 
'जलचर,- तथा शख-चक्र के लिए परिचित तीसरा चरण ब्रह्मतोक तक फैलाया था । तब 
-बअह्या शीघ्र चहाँ आये और बडी भक्ति के साथ अपने कमडल के जल से उनके चरण- 
“कमल धोये । वह जल स्वर्गलोक में मदाकिनी के नाम से वह रहा है । तुम बडी भवित 
के साथ ब्रह्मा की कृपा पाने के लिए तपस्या करो और स्वर्गलोक की उस गगा को इस 


३६ रंगनाय एयायणग 


पथ्वी पर ले आओ । उस पवित्र जल से इन भस्म-राणियों को सीचने से ही सगर-पुत्रो 
को स्वरगेलोक का सख प्राप्त होगा । इसलिए तुम पहले इस अश्व को लेकर जाओ । 


“अगमान जब्व को अपने साथ लेकर गया और अपने दादा को सारी कथा कह 
सनाई )! सगर अन्यत दुखी हुए । उन्होने पुण्य-यज्ञ समाप्त किया और उसके पश्चात 
मदाकिनी को पृथ्वी पर लाने के उद्देब्य से तीम हजार वर्ष तक सतत तप करते रहे और 
(विना सिद्धि प्राप्त किये ही) स्वर्ग सिधारे । उस राजा का पोता जज्चुमान्‌ भी मदाकिनी 
को पृथ्वी पर लाने का दुढ सकल्प करके लगातार तीस हजार वर्ष तक तपस्था करने 
के वाद स्वर्ग-लोक को प्राप्त हुआ । उसका पुत्र राजा ब्लीप भी मदाकिनी को पृथ्वी 
पर लाने के उद्देश्य से तीस हजार साल तक तपस्या करता रहा और अत में वह भी 
रोग-पीडित होकर दिवगत हुआ । उसके पुत्र पुण्यवान्‌ भगोरथ् ने अपना राज्य अपने मत्रियों के 
हायो में सौपकर धघर्मात्मा तथा सद्गुण-ज्रपन्न पूत्रों की प्राप्ति तथा पृथ्वी के समस्त 
पापों को दूर करने की इच्छा से जाकाण-गगा को पृथ्वी पर ले आने का दुढ सकल्प कर 
लिया । उन्होने अत्यत्त भक्ति के साथ गोकर्णाश्रम में दस हजार वर्ष तक अनुपम रीति से 
तपस्या की । उनकी तपस्था से सतुप्ट होकर ब्रह्मा ने उन्हें दर्णन देकर कहा कि तुम कोई 
वर माँगो । 

ध्तुव भगीरव ने हाथ जोडकर कहा--हे भ रती-ब्ल्लभ, हे लोक-बल्रप्टा, हे सर्यलोक- 
रक्षक, हे सत्यसपन्न, हे व्विता हमारे पूर्वज अपनी उद्दण्डता के कारण कपिल की क्रोध/रिति 
में भस्मीभूत होकर सौ सहस्न वर्षो से परलोक-गति से वचित हो भब्म के रूप में पढ़ें 
हुए हैं। उस भस्म को मदाकिनी के पवित्र जल से सीचे विना उन्हें मुक्ति नही मिल सकती ।' 

#इस पर ब्रह्मा ने कहा--परमणिव के अतिरिक्त अन्य कोई उस गगा को धारण 
नहीं कर सकेंगे । इसलिए, तुम निप्ठा के साथ शिव की तपस्या करो कि वें गगा को 
घारण करें । इतना कहकर ब्रह्मा ने भगीरथ को उनकी इच्छा के अनुसार पुत्र-प्राप्ति का 
वर दिया और ब्रह्मलोक को चले गये । 

“उसके पच्चात्‌ भगीरब ने एक अगूठे पर खडे होकर शिवजी के प्रति घोर तपस्या 
की । उनकी तपस्या से सतुप्ट होकर जिवजों ने उन्हें दर्शन देकर कहा--- तुम गगा को ले 
जाओ, म॑ उसे जपने सिर पर घारण करूँगा । तव भगीरव ने गया की प्रार्थना की । 
गगा गगन-मडल तथा नक्षत्र-मइल को भेदकर समस्त लोको को अपने गुरु गर्जन से 
गुंजाती हुई, सारे जगत्‌ को भयभीत करती हुई, यो प्रवाहित होने लगी, मानो वह कुल- 
पर्वतों से युक्त पृथ्वी के साथ महादेव को भी पाताल तक वहा ले जाना चाहती हो । 
शिवजी ने उसका गवे-भग करने के लिए अपने जटा-जूट को ऐसा बढाया कि गरगा उसमें 
उलभकर बाहर निकलने में असमर्थ हो गई । 

/तव भगास्थ जाइ्वर्य करने लगे, उतनी विज्ञाल जल-धारा कहाँ छिप गई होगी! 
उन्हें भय हाने लगा । इसलिए, वे फिर शिवजी के प्रति उग्र तपस्या करने लगे । भगीरथ 
के तप से सतुप्ट होकर (शिव ने) अपन जटा-जूट मे बची हुई गगा 


कहा-- अब तुम 
भूलोक में चली जाम 


बालकांड ७ 


धतव गगा उनके जटा-जूट के दक्षिण भाग से बाहर निकली । उस मदाकिनी की 
धारा में मुकुलित कमल ऐंती शोभा दे रहें थे, मानो वह (मदाकिनी) पाताल की ओर 
देवकर अपनी दिव्य-दुप्टि से वहाँ के कपिल मुनि को पहचानकर, उनकी महिसा पर 
आइचय॑े करती हुई हाथ जोडे उनसे प्रार्थना करती हो कि (हे मुनि) आपको जिन भयकर 
व्यक्तियों ने दुख दिया था, उन्हें सुगति प्रदान करने के लिए में आ रही हूँ, आप क्रोब 
न करें । उस घारा में भँवर ऐसे पड रहे थे, मानो उस मुनि के क्रोव की कल्पना करके 
मदाकिनी भय से व्याकुल हो रही हो । धारा के वीच कमल-पुप्पों के भीग जाने से उनमें 
बैठे न रह सकने के कारण अ्रमर आकाश में व्याप्त हो, इस प्रकार गृजार कर रहे थे, 
मानो सग्रुपुत्रो के पाप, वेग से आनेवाली मदाकिनी की घारा को देखकर इधर-उधर 
भागते हुए शिवजी से विनती कर रहे हो कि (हे शिवजी) गया हम पर आक्रमण करने 
के लिए आ रही है, हम अब भागकर कहाँ जायें ? हतत आकाभञ्-पथ में ऐसे मेंडरा रहे थे 
मानो शिव के जटा-जूट से पृथ्वी पर उतरनेवाली गया को घूप से बचाना चाहते हो। 
उस नदी की सुदर तथा उत्तुग लहरें ऐसी जोभा दे रही थी, मानों वे सगरुपुत्रो 
के पाप-समूह को मिटानेवाले उस (नदी के) हाथ हो । धारा इतने अधिक फेन से 
व्याप्त थी, मानों भगीरथ की अनुपम क॑त्ति समस्त ससार में व्याप्त होने के लिए एकत्र 
हो रही हो । उस नदी का अतुल घोष क्रमश वढता हुआ सारे ब्रह्म ण्ड तथा आकाश में 
व्याप्त हो गया । इस्त प्रकार ठह जिव के जटा-जूट से विदु-सरोवर में यह कहती हुई 
उतरी कि में इत्त सत्तार के पापियों को पुण्य प्रदान करने के लिए आ रही हूँ । ब्रह्मा 
आदि देवता उसकी स्तुति करने लगे । सुर तथा खेचर बडे उत्साह से यह दृश्य देखने लगे । 
गरुड तथा गवर्नर उसकी प्रशसा करने लगे । 

“मदाकिनी की घारा की सात शाखाएँ हुई । पावती, ह्लादिनी, और नलिनी नामक तीन 
शाखाएँ पूरव की ओर गईं । सीता, सुचक्षु तथा सिंधु नामक तीन जालाएँ पद्चिचम की 
की ओर गईं । एक शाखा राजा भगीरथ के पीछे भूलोक की ओर चली । वह श्रेप्ठ 
तथा विश्ञाल जल-घारा आकाश-मार्ग में शरत्काल के वादल के समान ज्ोभित हो रहीथी । 
वह जल-धारा, पृथ्वी की तरफ इस प्रकार उतर रही थी, मानों स्व्गकाक्षी भूलोक- 
निवासियों के लिए सीढी लगी हो । उसकी तरगो की ध्वनि पृथ्वी तथा आकाञ्य को गूँजा 
देती थी । उस घारा में ऐसे भेंवर पड रहे थे, मानो वह यह वताना चाहती हो कि में 
(पृथ्वी) के समस्त पापों को उसी तरह नचा दूँगी (ध्वस कर दूंगी) । 

“पृथ्वी पर उसके उतरते समय जल की वूंदें आकाश की तरफ ऐसे उछल रही थी, 
मानो वे नक्षत्रों से मित्रता करना चाहती हो । उसका स्वच्छ फेन-समूह ऐसा सुधोभित 
हो रहा था, मानो वह नदी (वर हर्ष से) हँसती हुई यह कह रही हो कि मे वर्मात्माओं 
की पवित्र कीत्तियो के लिए योग्य स्थान हूँ । उस घारा में क्रीड़ा करनेवाली 
मछलियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो नदी कह रही हो कि में अपने अनसस्य नेत्रो से पृथ्वी 
की श्रेप्ठता देखूंगी । इस प्रकार भिन्न-भिन्न जलचरों से बृवत हो, वह नदी पृथ्वी पर 
उतर आई । 


झट रंगना/थ -शयहायण 


धतव सौ-सौ सूर्थों की कान्ति के समान प्रकाशित होनेवाले, वहु-रत्न-खचित 'आभूषणों 
की कान्ति से सारे आकाश को दीप्तिमान्‌ करते हुए, गज तथा विमानों -में आरूढ होकर 
अमर, गवर्त तथा सिद्ध वडे कौतुक से इस दृश्य को देखने आये । उस प्रवाह -की- चचल 
गति को देखकर महानागो ने भी उसके सामने घुटने टेके ।-देवताओं ने -जप आदि-करके 
उस सदी में स्तान किया और बहुत ही प्रसन्न. हुए । अप्सराओ ने नृत्य किया, देवो तथा 
मुनियो ने बडे हर से उस नदी की पूजा पुष्पो से की । उस पुण्य-्नदी की धारा में 
अमित पापी तथा श्ाप-पीडित जन स्तान करके स्वर्ग जाने लगे । देवता, अप्सराएँ, गबर्वे, 
दनुज, पन्नग, यक्ष, किन्नर आदि बडे उत्साह से भगीरय के रथ के पीछे-पीछे चले । 

मतब वह गगा बडे-बडे पर्वतों को भेंदती हुई भगीरथ के पीछे-पीछे जाने लगी । 
उसी मार्ग में जल्लु नामक ऋषि की वज्ञ-भूमि थी | गगा ने अपने अतुल प्रवाह से ' उस 
आ्राश्नम-मूमि को घेर लिया | यज्ञोपकरण सभी गगा के प्रवाह में वह गये । यज्ञ में विष्न 
त्ड्मा हुआ देख, जहू कऋ्रछ हुए और उद्धत गति से आनेवाली उस गगा का सारा जल 
गो गये । तब देवता तथा मुनियों ने भगीरब से कहा--हें राजनू, यह मुनि क्रोघ ममें 
आकर गया को पी गये हे । आप उनसे अपना क्रोध त्यागनें तथा गगा को 'मुक्त करने 
की प्रार्थना कीजिए । मुनि प्रसनन्‍्त होकर अयपकी प्रार्थना स्वीकार करेंगे ।/ तव भगीरथ 
बडी भक्ति तथा विनय के साथ हाथ जोडकर उस मुनि से प्रार्थना करने लगे । 


व 
१4४ ्ऊ 


है मनिचन्द्र, हें विमलात्मा, में इस श्रेष्ठ गया को घोर तपस्या के उपरास्त पृथ्वी 
पर ला सका हूँ । कितु, यहाँ आने के वाद में उसे खो बैठा । हें धन्यचरित, हे सयमीख्ध, 
आप क्ृपाकर उसे मुक्त कर दें ।” (राजा की बात सुनकर मुनिवर के मन में दया उत्पन्न 
हुई) वे वोलें--हें भगीरथ, गगानदी को इस प्रकार पृथ्वी पर ले आने में आपकी तपस्या, 
आपके महत्त्व तथा आपकी कीत्ति का वर्णन में कैसे करूँ ? अब में गगा को मुक्त कर दूंगा । 
इस ससार में आपके यत की व्याप्ति होगी ।' 

“इस प्रकार कहकर, गगा को मूह से छोडकर उसे जूठा न करने की 'इच्छा से 
उन्होंने अपने कान के मार्ग से उसे बाहर छोड दिया । पूर्व की तरह गगा प्रवाहित 
होने लगी । तभी उसका नाम जाह्नवी पड़ गया । 

/जिस प्रकार पूर्वकृत पुण्य जीवन के विध्नों को दूर करता हुआ जाता है, उसी 
प्रकार जाह्ववी राजा के पीछे चली ओर समुद्र में प्रवेश करके रसातल में पहुँच गई । 
वहाँ सगसयुत्रो की भस्म-राशियो को अपने पुण्य-सलिल से सीचा। तब कमलासन ([पत्रह्मा) ने 
बड़े हर्ँ से भगीरय से कहा--हे राजनू, जवत्तक समुद्र में "जल रहेगा तबतक ये 
सगर-पुत्र॒दिव्य चदन, वस्त्रामृूषणों से अलकृत 'हो स्वर्ग-लोक में दिव्य भोगो का अनुभव 
करेंगे । हे अनध, आज से यह नदी:भागोरथी, त्रिपयगा तथा जाक्लवी के नामों से “समस्त 
लोको में विस्यात होगी । तुम्हारे पूर्वज सगर, अच्ुमान्‌ तथा दिलीप ने 'जो-सकलप किया था, 
वे उसे निद्ध नहीं कर सके | तुम बड़े प्रयत्न के उपरान्त गगा को “इस पशथ्वी पर ले 
आये हो, (अतएव) तुम गगाजल के निर्मल तथा कमनीय पद को प्राप्त करके "चिर कीत्ति- 
वान्‌ होकर निवास करो । काकुत्स्य-वज की प्रतिप्ठा तथा गौरव के आधारबनस्वरूप पुत्रो 


बालक $९ 
को प्राप्त करो । तुम सुदर धर्मो' के आधार हो गये । अबः तुम इस पुण्य-सलिल में विधिवत्‌ 
पुण्य-्स्नानन करके उसका फल प्राप्त करो । यो कहेकर कमलसभव (त्रह्मा) अपने 
लोकः को चले गये । 

“उसके पश्चात्‌ भगीरथ ने गया में स्तानः करके: बडी निष्ठा के साथ साठ” हजार 
सगर-पुत्रो की तिलोदक-क्रिया की । उस पृण्य-क्रिया के फलस्वरूप सगर-पुत्रों ने अमरत्व 
प्राप्त किया' और भगीरथ को आशीर्वाद देकर स्वर्गलोक सिघारे। पृण्यवान भगीरथ अयोध्या 
लौटकर सुख से राज्य करने लगे । 

“पापों का नाश करनेवाला यह उपाख्यान जो कोई भक्ति से पढेगा या सुनेगा, वह अनत 
पुण्य प्राप्त करता हुआ घन-धान्य तथा यश से समृद्ध हो चिरजीवी होगा। उसपर सभी देवता 
प्रसन्न 'होगे, उसके सभी कार्य सिद्ध होगे, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी तथा उसके पितरो को 
सद्गति मिलेगी ।” 

इस” प्रकार राघव 'ने गगावतरण की कथा कौशिक से सुनकर उनकी: प्रशसा 
करते हुए कहा--हे मुनीन्‍्द्र ' में आपसे पृथ्वी पर गगावतरण की कथा बडे आइचर्य के साथ 
सुन प्रसन्नः हुआ ।' 


(उन्होने) वह रात्रि वही बिताई और प्रातकाल ही उस प्रसिद्ध नदी में स्तान 
करके सध्या: आदि कार्यों से ॉनिवृत्त होकर जाह्नवी नदी को पार किया । नदी के उत्तर 
तट” पर निवास करनेवाले मुनियो की बडी 'भक्ति के साथ पूजा की और उस स्थान को 
छोडकर आगे चले । 


थोडी दूर जाने पर उन्हें विशाला' नामक सुदर नगर दिखाई पडा । तब राम ने 
गाधेय को सबोधित करके पूछा--हे मुनि, इस नगर का नाम क्‍या है ? किस वश का 
राजा यहाँ राज्य करता है ” आप क्पाकर 'बतलाइए ।' 


२८. अमृत-मंथन की- कथा 


तब कौशिक ने राघव से कहा--“मंने बहुत पहले यह कथा इन्द्र से सुनी थी । 
प्राचीन काल में दिति के अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी पुत्र तथा अदिति के बडे धमत्मा 
पुत्र उत्पन्न हुए । उन्होने सोचा किः क्षीरसागर को पहले रस तथा औषधियों से भरकर 
उसका मथन करें और उस जलराशि से उत्पन्न होनेवाली'“श्रेप्ठ तथा कान्तियुक्त वस्तुओ को 
बडी प्रसन्नता से ग्रहण करें । (इस प्रकार सोचकर) वे मदर”पर्वत को मथनी और 
वासुकी को रस्सी बनाकर मथन करने लगे । “उस' समय समुद्र में से समस्त लोको को, 
मन्‍्मथ-समुद्र में डुबोने- की क्षमता रखनेवाला' सौद्य, क्वणित होनेवाली करधनी से युक्त 
गुरु नितम्ब, क्षीण कटि, सुन्दर कुच, कोमल अ्रू-लता-रूपी कोदण्डवाले कामदेव को वाणों के 
समान (तीक्ष्ण) , कटाक्ष; भव्य भुजन्लता-विक्षेप, अमर नव-यौवन तथा कमनीयता से 
सुशोभित साठ हजार अप्सराएँ तथा' उन सुन्दरियों के योग्य हाव-भावों से युक्त परिचारिकाएं 
उत्पन्न हुईं । उन अप्सरान्युवतियो को देवता «तथा दैत्यो ने क्रश ले लिया । उसके 
पश्चात्‌ भी समुद्र-मथन चलता रहा ।' तव वरुण की पुत्री वारुणी का जन्म हुआ । दिति के 
पुत्रो ने उसका वरण करना स्वीकार नहीं किया । इसलिए वे असुर कहलाये । अदिति 


86 रंगनाथ रायायपय 


पत्रों ने उसे स्व्रीकार कर लिया । इसलिए, वे सुर के नाम से विस्यात हुए । उसके 
पब्चात उच्चै श्रद्य नामक अच्व, चब्वेत गज (ऐरावत) तथा कौस्तुभ-मणि का जन्म हुआ । 
कौस्तुभ-मणि के बाद अमृत उत्पन्न हुआ । असृत के वाद सुवा-कमण्डल को लिये धन्वन्तरि 
का जन्म हुआ । फिर विप उत्पन्न हुआ । जब वह (विष) अत्यन्त भयकर अग्नि के 
समान व्याप्त होने लगा, तव जिव ने उसका पान किया । इसके उपरान्त अमृत के लिए 
मर और असर परस्पर बृद्ध करने लगे । उस समय उन सुरासुरो को देखकर सुरो पर 
कृपा करते हुए, विप्ण एक सून्दरी का रूप घारण कर आये और अमृत का वितरण करने 
लगे । उस समय राहु तथा केतु नामक राक्षस (विप्णु के मन को बात जानकर) सुरो 
की पक्ति में जाकर चैंठ गये और अमृत के लिए हाव फैलाया । उनके शरीर की कान्ति 
देखे विना ही उस सुन्दरी ने जमृत दे दिया | रवि तथा जश्नि ने वड़ी घवराहट के साथ 
इसे देखा और सनन्‍्दरी को आँख के सकेत से यह बताया। तब विष्णु ने ऋुद्ध होकर अपना 
चक्र उन (राक़मों) पर चलाकर उनके सिर काट डाले । उन्होंने उन राक्षसो के शिरो को 
ग्रद्दों के रूप में आाकाच में प्रतिप्ठित क्या । अमृत-पान करने से वे मृत्यु को प्राप्त हुए 
विना रहने लगे । उसी दिन से वे (राक्षस ) पुण्य के दिनो में सूर्थ और चन्द्र को 
पीड़ा पहुँचाते जा रहे 


2ि+% 


“मुच्दरी ने असुरो की जाँख बचाकर नसुरो को ही अमृत दिया और युद्ध में उनको 
विजय भी प्रदान की । इच्द्र ने सभी देत्यो का नाज् किया और तीनो लोको का अधिपति 
वनकर राज्य करने लगा । 

“अपने सभी पुत्रो की मृत्यु से दुखी होकर दिति ने बड़ी दीनता से अपने पति कह्यप 
से कहा--हे महात्मा, आप मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए, जो इच्ध को भी मारने 
की थक्ति तथा पराक्रम रखता हो । उसकी प्रार्थना स्वीकार करके कच्यप ने कहा--हें 
भरे, यदि ठुम एक हजार साल तक जुद्धात्मा तथा पवित्र रह सकोंगी, तो तुम्हें तीनो लोको को 
जोततेवाला तथ्य इन्द्र का अन्त करनेवाला पुत्र मुझसे प्राप्त होगा ।! यो कहकर उन्होने 
अपने कर-कमल से दिति के चरीर का मृदु गति से परिमार्जन कर दिया । उसके परचात्‌ 
वे तप करने चले गये । 

“उनकी चले जाने के वाद दिति कुशप्लव” (नामक स्थान में) उम्र तपस्या करने 
हक गई | कक वृत्तान्त जानकर इन्द्र माता दिति के पास शविप्य के रूप में पहुँच गया 

र वहा भक्ति के साथ उनकी पूजा-अर्चचा करने के लिए आवश्यक कुण 
फल, कद-मूल, जल वादि बस्नुएँ जुटाने हुए सतत उनकी सेवा-परिचर्या करता रहा । दि 
जब जो वस्तु चाहती, वह उसके सकेत-मात्र से ही वह वस्तु वहाँ प्रस्तुत कर देता था । इस 
प्रकार नौ सौ निन्‍्यानवे वर्ष बीत गये 


“एक दिन दिति अपने मन की वात छिपा नहीं सकी । उन्होंने इन्द्र से कहा--- 
है इन्ध, मेने तुम्हारे पिता से एक पुत्र की प्रार्थना की थी । एक हजार वर्ष के उपरान्त 
मुक्त एुक पुत्र होगा, छसा वर उन्होंने मुर्के प्रदान क्या हैं। आज से दस वर्ष के पश्चात 
तुम्हारे भाई क्ा जन्म होगा | बुम ओऔर वह दोनो तीनो लोको का राज्य करोगे और 
यद्दस्दी बनोंगे 


ढं/तठकोड है 9९ 


उस दिन मध्याक्ष के समय दिति थकावट के कारण, अपने केश विखेरकर (खाट 
पर) पायताने की तरफ सिर रखकर सो गईं । उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र बहुत प्रसन्न 
हुआ और सोचा कि यही मेरे लिए अच्छा अवसर है । उसने अपनी योग-शक्ति से दिति के 
गर्भ में प्रवेश किया और अपने वज्ायुध से अपने शत्रु-शिशु के खण्ड-खण्ड करने लगा । 
शिशु का रुदत सुनकर दिति जाग पडी । तब इन्द्र धीरे-धीरे कहने लगा---मा रुद मा 
रुद (मत रोओ, मत रोओ) । दिति चिल्लाने लगी--शिज्षु का वध मत करो। दिति का 
क्रदन सुनकर इन्द्र गर्भ से बाहर आ गया और हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ 
दिति से कहा--माता, आप मुक्तकेशी होकर पायताने की ओर सिर किये सो रही थी । 
इससे आपकी पवित्रता में भग पड गया । इसलिए मेने अपने कार्य की सिद्धि के लिए 
आपके गर्भ में प्रवेश करने का साहस किया और मेरा नाश करने के लिए उत्पन्न होने- 
वाले गर्भस्थ शिश््‌ के सात खण्ड कर दिये । नन्‍हा शिशु मेरा शत्रु था, इसलिए मेने उसका 
वध किया । हे माता, धर्म का विचार करके आप (मुझे) क्षमा कीजिए ।” इस प्रकार 
इन्द्र दुख प्रकट करने लगा । 


“इन्ध को दुखी देखकर दिति ने कहा--हे स्वर्ग के स्वामी, इसमें तुम्हारा कोई 
दोष नही है । सारा दोष मेरा ही है । ये सातो खण्ड मरुत नाम से तेजस्वी बनकर 
उत्पन्न होगे । तुम उन्हें इच्छानुसार सारे ससार में विचरण करने देना । तुम मेरे इन 
सातो पुत्रो को सप्त मारतो के गण-तायक बनाना । यही तुमसे मेरी विनती हैं । 


“इन्द्र उनकी प्रार्थना स्वीकार करके इन्द्रलोक को चला गया । वे सातो शिशु क्रमश 
इन्द्र की मित्रता प्राप्त करके मरुदगण तथा देवता बन गये । इसी पुण्य-अ्रदेश में देवेन्द्र ने 
दिति की परिचर्या की थी । वही पर इक्ष्वाकु नामक राजा ने अपनी रानी अलवुषा से 
'विशाल' नामक पुत्र उत्पन्न किया था । उस विद्वाल ने यहाँ विशाला' नामक नगर का 
निर्माण किया । उस विज्याल के हेमचद्र नामक पुत्र हुआ। उसने सुचन्द्र को, सुचच्ध ने 
धूम्राशव को, धूम्राइव ने सृजय को, सृजय ने कुशाइव को, उसने सोमदत्त को, सोमदत्त ने 
ककुत्स्य को और ककुत्स्थ ने सुमति को जन्म दिया । वह सुमति अभी इस नगर में रहते 
हुए भत्यन्त धर्म-बुद्ध होकर राज्य कर रहा है । हैं अनघ, धर्म तथा वैभवसपन्न ये राजा 
ससार में वैशालिक' के नाम से विख्यात हे । हम यहाँ आज की रात्रि वितायें भौर 
प्रात काल होते ही राजा को देखने चलेंगे ।” 

वहाँ का राजा सुमति विश्वामित्र के आगमन का समाचार जानकर अत्यन्त श्रसन्न हुआ । 
वह अपने पुरोहित तथा बधु-जनों के साथ नगर के बाहर आया ओर विधिवत्‌ सयमीस्ध 
विद्वामित्र की पूजा करके उनसे हाथ जोड़कर बडी श्रद्धा से कहा-- है मुनीरद्र, में आज 
इस पृथ्वी पर घन्य हुआ । मेरा जन्म सार्थक हुआ । 

परस्पर कुशल-प्रश्नो के पश्चात्‌ सुमति ने विद्वामित्र को सवोधित करके कहा-- 
हे मुनिनाथ, आपके साथ रहनेवाले असमान रूपवान्‌, विशालवाहु, दिव्य-पराक्रमी, गज की 
गतिवाले, सिह-सम शक्तिशाली, ललित तथा प्रफुल्ल अरविद-सम नेत्रवाले, धनुष तथा करवाल- 
घारी, आकाश जैसे रवि-शहि के सचार से अलकृत होता है, वैसे ही आपके पदल्यास को 


६ 


क्र एंग्न/थ एम7वणग 
अलक्ृत करनेवाले, दर्शक्नो को दोनो ही सव प्रकार से समान दीखनेवाले ये कुमार कौन हूँ ? 
किसके पूत्र हे ? कृपया बताइए ॥' ॒ 

तव विच्ठमित्र ने उसे देवकर कह्य--हि राजकुल-अन्द्र, हें सदुगुण-सागर, में इसका 
वृचान्त तुम्हें सुवाता हूँ, तुम सुदो । सस्यू नदी के किनारे कोगल-देग में अयोध्या नामक 
नगर हैं । उस नगर में अत्यत्त प्रीति से प्रजा का पालन करनेवाले नाजा द्ान्थ राज्य 
करते हैँ । यह उनका श्रेप्ठ पुत्र राम हैं । बह उसका अनुज लक्ष्मण है । मेरी प्रार्थना 
पर राजा ने यन्-स्क्षणार्य इन दोनो को मेरे साथ भेजा है । मेरे साथ आाकर (इन दोलतोंने) 
मेरे बन्च की सका की, बुद्ध में बद्दे पराक्रम के साथ लूवाहु का वव किया और 


5 ता 


मादीच को परास्त दिया। उसके पच्चात मिथिला जाने के उद्देच्य से गया पार करक यहाँ आब हैं । 


ये राजचस्ध सर्व-बअ-निलक हूँ । उनके सामथ्ये की कथा आच्चर्य में डालनेंवाला हैं । 
विच्वामित्र के वचन सनकर राजा समान आच्चण-चक्ति हुआ । उसने उन राज- 


कुमारों का आाइर-सत्कार क्णि । उन्होंने फ्रेम से राजा का आतिथ्य ग्रहण किया । सुवन 
रात्रि वही ठिताई और प्रभात होने पन राज्य ने उन्‍को वहाँ से छव्लि क्या | 


२९. गीतम के आश्रम का वृत्तान्त 

(व्ाँ से चलकर) मार्ग में चलसे-चलते राब्व ने गाँतम के आश्रम को देखकर 
गावि-पुत्र को सोधित करके कहा-- हि मुनीष्बर, ललित पललणो से युवत, आमु, कटहल 
नारगी, जबीर, नारिकेल, देगदार, विजीरी, नीवू, वेल, सुपारी, केला, अग्ोक, लाख, दाड़िम, 
तेंदू, सेमल, चंदन, कर्पूर, मीठे आम, शिलावॉ, गुग्युल, आदि पेडो स सुोभित, सिंवुवार, पुन्नाग, 
मौलसिरी, चमेली, छुद, कर्रूर आदि पूण्रों की चुनथि से परिपूर्ण, सर्वत्र व्याप्त लौग तथा 
एला की लताओ से बुक्त, सरोवरों से सुझोभित, रम्य पक्षिणों के कल-कूजन से सुखरित 
यह गाश्वरम-मूमि आज निर्जन क्यों हूँ ? इसके एहलें कौन मुनि यहाँ तपस्या करते थे ? 
कृपया बतलाइए ॥ 


 आीक 


तब मुन्ति ने कहा--क्िसी समय गौतम गम मुत्ति अहल्या के साथ इस आश्रम में 
बत्यन्त निप्ठा से घोर तपस्ण करते थे । यह देख इन्द्र ने उनकी तपस्या में बाबा डालनी 
चाही । एक दिन उसने मुर्मे के रूप में पर्णणाला के पास पहुँचकर वाँग दी। मनि (प्रात - 
काल हो गबा समझकर) जनुप्ठान करने के लिए (नददी-तट पर) चले गये । तब इत्ध् 
गालमस का झूव बारग केसे जाबा और बहल्या को देखकर कहा---अभी रात्रि बहुत 
वाकी है। हें सुन्दरी, वह तुम्हारा ऋतु-काल हैं । इस समब रति-बक्रीड़ा करने की इच्छा 
से ही में बाग हूँ । इस पर (सा्ी दार्ते जानकर) वहत्या ने कहा--'मे जानती हे कि 
तुम इच्ध हो, बदर चले आाबो । यो कहती हुई वह इन्द्र को पर्णगाला में ले गई 
और उसके साथ रति-जटीया की । जब इन्द्र किमक तथा भय से वहाँ से जानें लगा, तभी 
गौतम मुनि वहाँ पहुँच गये । (इन्द्र को देख) उन्होंने भाप दिया--रें पापी, क्या यह 
तुम्हारे लिए उचित हैँ कि तुम मेरा रूप बारण कर मेरी पत्नी से मिलो | इस पाप-कर्म 
के लिए तुन अडकोम-रहित हो जाओ । गौतम का जाप अप्रतिहत होकर उसे लगा और 
तुरंत उसके अणग्डकोश भूमि पर गिर गये । 


बा/लकीड डे 


“इसके पव्चात्‌ गौतम ने अहल्या को देखकर कहा--हे नारी, तुम पापाण होकर 
इस भूमि पर पड जाओ और प्रचण्ड धृप में लोटनी रहो ।' तब अहल्या ने उनसे पूछा-- 
है देव, आपके जश्ञाप का अत केसे होगा ?” तब गौतम ने कहा--वैकुठवासी, अवाप्त- 
कामी, लोक-रक्षक और पुराण-पुरुष (विष्णु) राम के रूप में जन्म लेंगे । कौणिक के 
यज्ञ की रक्षा करने के वाद वे सूर्यवशतिलक इसी मार्ग से आयेंगे। यदि उनके चरणों का 
स्पर्श तुमसे होगा तो तुम झ्ाप-मुक्त हो जाओगी ।” यो कहकर वें जीताद्वि के लिए 
चल पडे । वही मूनि-पत्नी यहाँ पाषाण के रूप में पडी हुई है । 

“जब सुरराज (इन्द्र) ने अपनी दुर्गति का समाचार देवताओं से कहा, तब उन्होनें 
मेष (भेड) का अडकोश लाकर इन्द्र के ऋरीर में जोड दिया । इसी कारण से पुण्यवान्‌ 
लोग यज के समय मेषों का व करते हे । 

“इस प्रकार मूनि के शाप से पीडित अहल्या इसी तपोवन में पडी हुई है । हे 
राम, हें पृष्यधाम, तुम उस अहल्या का दुख-मोचन करो ।” 

यो कहकर विश्वामित्र (राम-लक्ष्मण के साथ) गौतम के आश्रम में आये । श्रीराम 
का चरण छूते ही, बादलो के हटने पर प्रकाणित होनेवाले चन्द्र के समान, धुआँ से मुक्त 
होने पर हवन-कुड की अग्नि-ज्वाला के समान, कलक-रहित कमलिनी के समान, मलिनता 
से रहित स्वर्ण के समान, राम के चरण-कमलो के रज का स्पर्श होते ही पाप-मृकत होकर 
उस स्त्री (अहल्या) ने जिला का रूप तजकर निज रूप प्राप्त कर लिया । वह पहले ही 
अपने पत्ति से राम की महत्ता के विषय में सुन चुकी थी, इसलिए उस गजगामिनी ने 
उस महापुरुष का आतिथ्य किया और कहा--आपके शुभागमन से में इतार्थ हो गई । 
आपके चरण-कमलो ने मेरा उद्धार कर दिया । हें त्रिलोकीनाथ हे रघुनाथ ! आपका 
चरणोदक ही आकाश-गगा के रूप में धरती के समस्त पापों को दूर करने (पृथ्वी पर) 
आया है । आपने अपने एक चरण से पृथ्वी को और दूसरे चरण से आकाश को नाप- 
कर बलि को दवाया था, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर वेदों के शिरोभाग में विचरण 
करनेवाले आपके चरण यदि मुझे शाप-मुक्त कर दें, तो इसमें आश्चर्य ही क्‍या है ?' 
इस प्रकार अहल्या ने राम की स्तुति की । इतने में गौतम मुनि भी वहाँ आ पहुँचे । 
उन्होने रघु रामचन्द्र की पूजा की और पूर्व-जन्म की सुकृति-रूपी अहल्या को स्वीकार करके 
पूर्वंवतू उसी आश्रम में रहने लगे । तब कुभ-वृष्टि (घोर वृष्टि) हुई और देव लोग 
दृदुभियाँ बजाने लगे । 


३०. मिथिला में आगमन 
वे पृण्यचरित वहाँ से चलकर जनक की राजधानी मिथिला नगर मेँ पहुँचे, जो 
गगनचुवी प्राकारो, सौध-समूहो, रत्न-खचित गृहो, रमणीय राजमार्गो, दुर्गों, मनोहर उद्यानो, 
सुन्दर वनस्पतियों तथा समस्त शुभो से परिपूर्ण था । 
जनक की यज्ञ-भूमि में कलिंग, नैपाल, कर्णाटक, लाट, मालव, सोबीर, मगघ, 
पाचाल, कुरु, पाण्ड्य, वर्बल, कुतल, अवती, मरु, तरुप्क, आभीर आदि देशों के राजा 
विराज़मान थे । वह यज्ञ-भूमि, यज्ञोपक्रणो तथा उसके अनुरूप पशुओं, यूपकाप्झठ, दवि-क्षीर से 


2050 रंग्नाथ एयायण 


भरे पूर्ण कुभो, समिधाओ से भरे सुदर स्थलो, पक्तियों में सजे हुए दर्भासनो, उचित 
आसनो पर विराजमान तपोनिधि मुनियों, अत्यन्त रमणीय रत्त-पल्लव तोरणो, सामादि वेदों 
के घोषो, सतत यज्ञ के दर्णनार्थ आनेवाले तपस्वियो, आकाण तक व्याप्त होनेवाला हवन 
का धुआँ, देवताओं का आह्वान करनेवाली घ्वनियों, पूजाओ को ग्रहण करनेवाले पुण्य 
सयमी (मुनियो) तथा पूजाओं को प्राप्त करने में न थकनेवाले ब्राह्मणों से परिपूर्ण था । 

(गाधि-पुत्र को आया जानकर) जनक महाराज बड़े उत्साह से उनके सम्मुख गये, 
मुनिनाथ को दडवत्‌-प्रणाम किया और उन्हें ले जाकर उनकी उचित पूजा की और कुशल- 
प्रश्न पूछे । उसके पच्चात्‌ वें उस मुनीन्द्र की प्रशसा करते हुए कहने लगें---आपके आगमन 
से में परम पवित्र हुआ । मेरा यज्ञ समृद्ध हुआ । इस प्रकार कहने के उपरान्त उस 
मुनीन्द्र के पीछे सुभोभित विज्ञाल वक्षवाले, काकपक्षघधारी, महाघनुर्धर, कोमल शरीरवाले, 
सुभग, यणस्वी, भूसि पर अवतार लिये हुए देवताओं के समान दीखनेवालें दयालु, सतत 
प्रसन्नवददनवाले, भुवतत-पावन चरित्रवालें, सूर्य तथा चन्द्र की-सी कान्ति से विलसित, आजानु- 
बाहु, अच्विनीकुमारों के समान दीखनेवाले, अतुल पराक्रमी और कमल-लोचनवाले, राम 
तथा लक्ष्मण को देखकर जनक ने विदश्वामित्र से पूछा--हें महात्मा, ये, धरनुर्वाणधारी 
तथा चतुर वालक किनके पुत्र हे ? ये नव-पल्‍लव के सदृच् अरुण तथा कोमल चरण-कमल 
यहाँ तक कैसे पैदल आये ?! 

तव विब्वामित्र ने कहा--हें राजन्‌ ये अनघ महाराज दशरथ के पुत्र हे । इन्होने 
अपनी अमित जक्ति से मेरे यज्ञ की रक्षा की । कृपा करके अहल्या का उद्धार किया 
और आपके घर में रखे हुए जिव-वनु को देखने यहाँ आये हैं / मुनीण्वर की इन बातो 
से प्रसन्न होकर जनक ने उन (राजकुमारो) का स्वागत-सत्कार किया । 

फिर गौतम मुनि के जिष्य शतानन्द ने कौशिक को सबोधित करके कहा-- है 
महात्मा राघव को अपने साथ ले आकर आपने हम पर बडी कृपा की है। इस विदश्वप्रभु 
को यहाँ तक ले बाने का कार्य किसके लिए सभव था ? राघव के चरण-रज ने मेरी 
माता अहल्या के पापों का शमन कर दिया । गौतम मुनि के ज्ञाप से मुक्ति प्राप्त कर 
मेरी माता फिर मुनि से मिल गई हे । रामचद्र के चरण की महिमा का वर्णन मे किन 
शब्दों में करें ?! 


३१. विश्वामित्र की शक्ति का परिचय 

इसके पश्चात्‌ शतानद ने राम की ओर देख कर कहा--“हे रामचद्र, सुनते हे कि 
यह पुण्यात्मा कौशिक, इस पृथ्वी पर, आपके अभिभावक हे । अब आपको किस वात की 
कमी है ? विश्वामित्र की असमान क्षमता का वर्णन करना कठिन है । फिर भी आप 
सुनें । हे दण्नस्थात्मज, कुश नामक मुनि ब्रह्मा के पुत्र थे, कुश ने कुशनाभ को जन्म दिया । 
गावि उस कुशनाभ के पुत्र थे। ऐसे पवित्र गाधि के ये (विद्वामित्र) पुत्र हे | ये घर्म- 
निरत होकर, अमित पराक्रम के साथ पृथ्वी का शासन करते थे । एक दिन विनोदार्य 
मृगया खेलने के लिए अपनी विद्याल सेना के साथ निकले । बहुत समय तक वन में मृगया 
खेलने के पचश्चात्‌ बहुत ही थकके-माँदे होकर वे वसिष्ठ के आश्रम में पहुँचे । वसिष्ठ का 


ब/लकोड ४ 


आश्रम नाना प्रकार की सुगधित पृष्प-मजरियों से तथा विविध प्रकार के फलो से लदे 
वृक्षों से भरा था । पक्षियों का कलर तथा वेद-धबोषो से सारा आश्रम गूंज रहा था । 
उसमें कई सरोवर तथा यज्ञ की वेदियाँ थी । भिन्न-भिन्न जाति के मृग अपने स्वभाव-सुलभ 
वैर को भूलकर वहाँ विचरण कर रहे थे । उनका आश्रम वायु, जल तथा (वृक्षों से 
गिरे) पाडु-पत्रो पर जीवन व्यतीत करते हुए तप करनेवाले मुनियो, योगियो, पुगवों, पन्नगो, 
खेचरो, सिद्धो, सुपर्वों तथा किन्नरों से युक्त होकर ब्रह्मतोक के समान सुशोभित था । 
विश्वामित्र ने बडी प्रसन्नता तथा भक्ति से वसिष्ठ को प्रणाम किया । उन्होने आश्नीर्वाद दिये 
ओर उचित आसन पर बिठाकर उनका सत्कार किया और सुस्वादु फल, मूल आदि 
प्रस्तुत किये । 

“विश्वामित्र ने उन सबको ग्रहण करते हुए हाथ जोडकर बडी भक्ति के साथ 
पूछा-- है अनघात्मा ! लोकहितार्थ चलनेवाले आपके तप तथा हवन आदि अच्छी तरह 
हो रहे हे न ? आप, आपके शिष्य और आश्रम के सभी व्यक्ति प्रसन्न तो है ?! 


“तब वसिष्ठ ने कहा--हम सब प्रसन्न हे । आप नीतिग्युक्त हो राज्य कर 
रहे है न ? स्‍्तेह के साथ अपने भृत्यो का पालन करते है न ? राज्य के सभी अगो का 
( उचित रीति से ) पर्यवेक्षण कर रहे है न ? आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को आप 
पराजित कर तो रहे है न ? आप स्वय सकुशल तो है ? आपके पुत्र और पत्लियाँ 
कुशल से हे न ?' 

“तब कौशिक ने वसिष्ठ से कहा--महात्मा, आपकी कृपा से हम सब कुशल-मगल 
से है ।! तब वसिष्ठ ने कहा--राजन्‌ में आपसे अनुरोध करता हूँ कि आप मेरे यहाँ 
भोजन करके यहाँ से जाये ।” 


“कौशिक ने उनका निमत्रण स्वीकार किया । वसिष्ठ ने विद्वामित्र तथा उनकी 
सेना को भोजन देने के उदृह्य से अपनी काम-बेनु का स्मरण करके उससे प्रार्थना की कि 
राजा तथा उनकी सेना को विविध मिष्ठान्न तथा भोजन से तृप्त करना हैँ | इसके लिए 
आवश्यक वस्तुओ का तुम प्रवध करो । 

#तब कामधेनु विभिन्न प्रकार के भात, शाक, मिष्टान्न, अचार, विविध फल, खीर, 
मक्खन, चीनी, ताजा घी, कई प्रकार के मद्य और मास आदि से युक्त बढिया भोजन का 
प्रबथ किया । जिसकी जो इच्छा होती, वह उसे विना माँगे ही मिल जाता था । 
गाधेय तथा उनके सैनिक भर-पेट भोजन करके सतुष्ट हुए । 


“इसके पश्चात्‌ गा७थि-पुत्र ने मन में सोचा कि इस कामधेनु को किसी भी तरह 
मुनि से ले लेना चाहिए । वे मृनि के पास जाकर वोले--हें मुनिवर, में आपको एक 
लाख अश्व, एक लाख हाथी, एक लाख गायें जऔर कई हजार मणियाँ दूँगा । आप 
यह गाय मुझे दे दें ।” इस पर मुनि अत्यन्त दुखी होकर बोले--हे राजनू, यह गाय मेरा 
जीवन है, मेरा प्राण है, मेरी तपस्या का साधन है । हव्य-कव्य तथा अतिथि-सत्कार इसी 
गाय के कारण विना विघ्न के सपन्न होते हे । अत इस पृण्य-घेनु को में तुम्हें दे नही 
सकता ॥' 


कष्ट रंगना/थ ए्यायणग 


“तब महावली विव्वामित्र क्रोव में आकर बोले---में आपसे यह गाय देने की प्रार्थना 
क्यो करो ?” यह कहकर उन्होने अपने हजारो सेवकों की सहायता से वलातू उस गाय को 
पकडकर ले जाने का प्रयत्न किया | तव उस गाय ने उनके पीछे न जाकर मुनियुगव को 
देखकर कहा--हें अनघ, वसिष्ठ, हे सयमीन्द्र | कोशिक (अपने वल के) मद में मुझे 
बलात्‌ ले जाने का यत्न कर रहा है | हाय! आप दुर्वार होते हुए भी उसे रोकते क्‍यों 
तहीं ? निर्विरोध मुझे उसके हाथों में सौपना, क्या आपको उचित जचता हैं ? हें 
अनघात्मा ! मेने आपके प्रति कोई अपराध नहीं किया हैं, फिर भी मेरी उपेक्षा करना 
क्या आपके लिए उचित हैँ ?! 

“घेनु की वातें सुनकर वसिष्ठ दयाद्रचित्त होकर कहने लगे--'मे तुम्हें क्यो छोडने 
लगा ? राजा अपने भुज-बल से बलात्‌ तुम्हें ले जा रहे है । यदि क्षत्रिय उद्ृण्ड हो 
जायें, तो ब्राह्मण उनका निवारण किस प्रकार कर सकते हैँ ? यह गाघधि-पुत्र इस पृथ्वी .के 
अवीज्वर हैँ । इनके पास अक्षौहिणी सेना है । में इन्हें कैसे जीत सकूगा ?' 

तब थेनु ने मुनि से कहा--हें मुनिनाथ ! ससार में ब्राह्मण-तेज, क्षत्रिय के तेज 
से अधिक बलवान्‌ होता है, इसलिए में यह वात जानती हूँ कि कौशिक किसी भी दशा में 
आपसे अधिक श्रेप्ठ नहीं हों सकता । आप मुझे आज्ञा दीजिए, में इसकी सारी सेना को 
एक ओर से नणप्ट कर दूँगी ।” तब वसिप्ठ ने गाय से कहा--अच्छा, तो तुम सेना 
उत्पन्न करके (राजा की सेना का) नाश करों । 

“वभिष्ठ की आज्ञा मिलते ही घेरु ने हुकार भरी । उसके हुकार भरते ही उसके 
कान, पूँछ, ढाँत, रोम, खुर, जाँधघ, आँख, घुटने, इवास, गलकवल, और रोम-कूपो 
से भयकर आकारवाले असरूय किरात, पल्‍लव, काम्मोज तथा यवन वीर उत्पन्न हुए। वे 
प्रचण्ड विक्रमी, अदभुत आकार तथा विचित्र आयुध घारण किये हुए थे । उनके नेत्र और 
हुकार अनोखे ढंग के थे । योद्धाओ का वह समृह हाथी तथा अच्चबो पर (आरूढ होकर) 
विद्वामित्र की सेना का सहार करने लगा यह देखकर विद्वामित्र के पुत्र विविध आयुवों 
से सुसज्जित होकर वसिप्ठ का व करने जाये । किन्तु घेनु के हुकार-मात्र से भस्म 
हो गये । 

“अतुल पराक्रमी वीरो से पूर्ण अपनी सेना को मृत्यु का ग्रास बनते देखकर तथा 
अपने सो वीर पुत्रो की मृत्यु का विचार करके विश्वामित्र दुःख तथा शोक से सतप्त हो उठे । 
वें अपने एक पुत्र को अपना राज्य सौपकर तप करने के लिए हिमालब में चले गग्मे । 

वहाँ उन्‍होंने जल में खडे रहकर त्रिपुरातककत (शिव ) के प्रति घोर तपस्या की । 
शिवजी प्रत्यक्ष हुए और विष्वामित्र ने उनसे विविध दिव्यास्त्र प्राप्त किये । 

/इसके पबच्चात्‌ विव्वामित्र बडी ज्ीक्रता से वसिष्ठाश्रम के पास आये और (उस 
बआश्चम पर) जार्नेय वाण चलाने लगे । उनके वाणों के तेज से वसिप्ठ के आश्रम में 
क्षरिन की ज्वालाएँ फंल गई । यह देखकर वसिप्ठ, काल-दड लिये हुए यमराज के समान 
क्रोघोन्नत्त हो अपने हाथ में अथारी लिये हुए बाहर आये और वोले--ह पापी, हें विश्वा- 


रर्‌ 


मित्र, क्या इस प्रकार कही पुण्य-भूसि तपोवन को जलाया जाता हैं ? तुम्हारी भक्ति कितनी हैं, 
बोर मेरी भक्ति कितनी ? (क्या इसका भी तुम्हें ज्ञान हैं ?)' 


] 


ढएलकोडं कं 

#तब अत्यधिक क्रोध से उन्मत्त होकर कौशिक ने उनपर, रौद्रास्त्र, पशुपतास्त्र, गवित- 
मान्‌, वज्, ब्रह्मपाश, पैगाचास्त्र, काल-पाश, विष्णु-चक्र, कालचक्र, वास्णास्त्र, गावर्वास्त्र, वायव्यास्त्र 
आदि कई शक्तिशाली अस्त्रों को चलाया । किन्तु वसिष्ठ ने अपने ब्रह्मदद की सहायता 
से उन सबको व्यर्थ कर दिया । इन शस्त्रो से केवल अग्निकण विखर जाते ये । इससे 
और भी कुद्ध होकर विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके उसे वसिपष्ठ पर चलाया। 
(यह देखकर) सब देवता, सयमी, गषव, पद्नग, भूत, दिक्‍्पाल, सभी नक्षत्र, ग्रह, सूर्य, 
चन्द्र और समस्त लोक क्षुब्ध हो उठे । सभी दिशाएँ प्रज्वलित होने लगी । सारे ब्रह्माण्ड 
में व्याप्त होकर प्रचण्ड वेग से ब्रह्म-दण्डकी शक्ति का अतिक्रमण करके उस ब्रह्मास्त्र को 
अपनी ओर आते देखकर ब्रह्मादि देवताओं के लिए भी दुर्वार उस अस्त्र को वसिप्ठ ने 
सहज ही पकडकर निगल लिया । वसिष्ठ की मूत्ति प्रभापुज ब्रह्म-तेज से दीप्त हो उठी । 
उनके रोम-रोम से अनेक बाण, ज्वाला उगलते हुए, निकले और विश्वामिन्न को जलाने लगे। 
यह देखकर कौशिक अधीर हो उठ, उनकी सारी शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई । वे सोचने 
लगे कि इस एक ब्रह्मदण्ड के कारण मरे सभी श्रेष्ठ अस्त्र-समूह व्यर्थ हो गये । इनका 
( वसिष्ठ का ) बक्रह्म-तेज अत्रस्त तथा अचल है। क्षत्रिय-तज ( इसके आगे ) किस 
काम का ? 

“इस प्रकार परास्त होने के पण्चात्‌ विश्वामित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ (दक्षिण की 
ओर जाकर) घोर तप करने लगे । इसी समय उन्होने दुष्यद, मधुष्यद, दूढनेत्र तथा 
महारथ नामक चार शक्तिशाली पुत्र प्राप्त किये । अविचल निष्ठा के साथ कई वर्षों तक 
तपस्या करने के उपरान्त ब्रह्मा ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया और 
बोले-- है अनघ, में तुम्हारे तप से सतुप्ट हुआ । जाओ, में तुम्हे राजर्षि का पद देता हूँ ।' 

“गाधेय अत्यन्त विनम्‌ होकर वबोले--इतने दिनो तक घोर तपस्या करने के वाद 
भी मे ब्रह्मषिं नही बन सका । मेरा उग तप विफल हो गया है । में राजर्षि का पद नहीं 
चाहता । यह कहकर वे पुन घोर तपस्या में निरत हो गये । 

“इसी समय इधद्ध्वाकु-बश के त्रिशकु नामक यहास्वी राजा ने सबरीर स्वर्ग जाने के 
लिए यज्ञ करना चाहा | उसने बडी भक्ति से वसिष्ठ को बुलावा भेजा और अत्यन्त विनय 
से उनसे कहा--हे अनघ, सशरीर स्वर्ग में जाने के निमित्त आप मुझसे एक यज्ञ कराने 
की कृपा कीजिए । आप (इसके लिए) मुनियों को यहाँ बुला भेजिए ।/ तब वसिष्ठ ते 
कहा--हे राजन्‌, पृथ्वी के निवासियों का सभरीर स्वर्ग में जाना असभव हूँ ।' 

“इसके पदचात्‌ राजा दक्षिण दिगा में घोर निष्ठा से तपदचर्या में लीन वसिप्ठ के 
पुत्र के पास गया और प्रणाम करके कहा--महात्मा, सथभरीर स्वर्ग में पहुँचने के निमित्त 
आप मुभसे एक यज्ञ कराइए । तव उन्होने कहा--अगर वसिष्ठजी इस प्रकार का सज्ञ 
कराने का आदेश दें, तो में अवश्य ऐसा यज्ञ कराऊँगा ।' तव राजा ने कहा--हें मुनि, 
वसिष्ठ मुनि ने तो कहा है कि ऐसा यज्ञ कोई राजा कर ही नहीं सकता । इसीलिए तो 
में आपकी शरण में आया हैं । आप मुझण्र कृपा करके मुझसे ऐसा यज्ञ कराइए । 
पुरोहित ही तो राजाओं के लिए घधर्म-साधक होते है ॥' 


क्ष्षे रंगनाथ एयायण 


“दूसपर वसिष्ठ के पुत्र ने कहा--राजन्‌, तुम्हारें-जैसे दुमंतियों के अतिरिक्त दूसरां 
कोई निर्मल चित्तवाला व्यक्ति ऐसे यज्ञ की वात सोच भी सकता हैं ? मुनि-पुत्र के यह 
कहने पर राजा ने उपेक्षा से कहा--आपके पिता ने यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है, 


जे 


और आप भी अस्वीकार करते हैँ । मेरे हित की चिता न करनेवालो से अब मेरा क्‍या 
सबंध ? में किसी और से यह यज्ञ कराऊंगा ।' 

“तब रुप्ट होकर उस पुण्यात्मा ने कहा--तुम चाडाल हो जाओ । तुरत राजा का 
रूप ऐसा विकृत हो गया, मानो उसका दीप्तिमान्‌ तेज वासिष्ठ की क्रोधारिति से भस्म हो 
गया हो । उसका शरीर काला हो गया । उसके शरीर पर के वस्त्र काले हो गये । उसके 
केश विखर गये । उसका रूप इतना मलिन हो गया, मानों उसके स्पर्श-मात्र से दूसरा भी 
मलिन हो जायगा । उसके शरीर पर रहनेवाले कान्तिमान्‌ मणिमय स्वर्णामरण लोहवत 
हो गये । उसके रूप, रग, वाणी आदि चाडाल-जाति के अनुरूप हो ग्रये । 


“इस प्रकार राजा को भयकर चाडाल-रूप धारण क्ये हुए देखकर नागरिक, सेवक, 
अमात्य तथा वबु-वर्ग ने उसे त्याग दिया । तब राजा अत्यन्त भयभीत होकर लोगो (के 
मार्य) से वचता हुआ अपने-आपको छिपाता हुआ धीरे-धीरे महातेजस्वी विद्वामित्र 
मृनि के पास जा पहुँचा । उसे देखकर गाघि-पुत्र का हृदय दया से उम्ड आया | वे 
बौले--अयोध्या का शासन करनेवालें, तुम्हें यह चाण्डालत्व कैसे प्राप्त हुआ ?' 

धतव राजा ने हाथ जोडकर कहा--हें महात्मा, मेने वसिष्ठ से सशरीर स्वर्ग- 
गमन का यज्ञ कराने की प्रार्थना की थी, तो उन्होनें अस्वीकार कर दिया। उनके पुत्र ने 
कहा कि जब वसिष्ठ की ऐसी सम्मति हैं, तब यज्ञ हो नहीं सकता । इसपर मेने दूसरों 
से यज्ञ सपन्न करवा लेने का विचार प्रकट किया, तो अत्यन्त कुद्ध होकर उन्होने मुझे चाण्डाल 
बन जाने का शाप दिया । इसी कारण मुझे यह रूप मिला है । मेने जो यज्ञ करने 
का सकलप किया है, उसे अवश्य पूरा करूँगा । विपत्ति में भी में असत्य नहीं बोलता । 
भविष्य में भी किसी भी प्रकार से में सत्य का पालन करूँगा । मेने अबतक कितने ही 


बिक 


यज्ञ किये, कितने ही धर्म-सवधी कार्य किये और सुख-समृद्धि प्राप्त की । मेने गृरुओ से 
प्रार्थवा की, परन्तु उनकी कृपा न रहने से यह धर्म-कार्य पूर्ण नही हो सका । दैव-बल के 
अभाव में पुरुषार्थ में भी दोष आ जाता हैं| हे अनघ, आप मेरे लिए ईइ्वर-तुल्य हे । 


किसी भी प्रकार आप मेरी रक्षा कीजिए ॥ 


#तव विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा--हें राजनू, अब तुम दुःख मत करो । तुम्हें 
दीन जानकर में त्रिकरण शुद्धि (पविन्न मन, वचन एवं शरीर) से तुम्हें शरण दे रहा हे । 
में मूनियो को बुलाकर तुमसे यज्ञ कराऊंगा और तुम्हें सशरीर स्वर्ग भेजूगा, जिससे तुम्हारी 
प्रतिज्ञा कूठी न हो । मे तुम्हें पवित्र बनाऊंगा ।” इस प्रकार कहकर उन्होने अपने शिष्यो 
से कहा--तुम लोग तुरत जाओ और बिशकु के यज्ञ के लिए ऋत्विजों तथा मुनियो को 
लेकर झोप्न आमो ॥ 

सभी शिप्य तुरत गये और श्रेप्ठ मुनियो को साथ लिये हुए विब्वामित्र के पास 
आकर बोले--हे अनघात्मा, हम सभी मुनियों को बडी प्रसन्नता से ले आये हैं। वरिष्ठ के 


बालकाड 96 


आश्रम के मुन्रियो के अतिरिक्त शेष सभी मुनि आ गये हे । वस्तिष्ठ के पुत्रो ने जो 
जो अपशब्द कहे, उन्हें सुन लीजिए। उन्होंने कहा--यह कितने आश्चर्य की वात है कि यज्ञ 
करानेवाला एक राजा हैं और यज्ञकर्त्ता एक चाडाल! भला चाडाल के यज्ञ में भाग लेने- 
वाले मुनि किस प्रकार वहाँ भोजन करेंगे ? देवता अपने ह॒विर्भाग लेने किस मूँह से 
आयेंगे ? विश्वामित्र की शरण प्राप्त करने-मात्र से कही नर स्वर्ग-लोक प्राप्त कर सकेगा ?* 

“इन बातो को सुनकर विश्वामित्र क्रोध से जल उठे । बोलें--अत्यत निष्ठा के साथ 
तपस्या करनेवाले मुझे, अपशब्द कहनेवाले सभी पापी ससार में सात सौ वर्ष तक राक्षस- 
भाव धारण किये हुए, मानव तथा कुत्तो का मास खाते हुए, नीच होकर रहेंगे । दर्प से 
मेरी निंदा करनेवाला वह महात्मा पृथ्वी पर निषाद होकर जन्म लेगा ।” इस प्रकार, शाप 
देकर सयमी मुनियों को देखकर उन्होने कहा--हे मुनियो, ये राजा त्रिशकु उच्चकुलीन, 
कीत्तिमानू, धर्मत्न तथा सत्यनिष्ठ हे । इसलिए इनसे आप यज्ञ कराइए, जिससे ये शरीर के 
साथ इंद्रपुरी को जा सकें ।' 


“ऋषि के वचन सुनकर वे सभी मुनि परस्पर यो विचार करने लगें--यदि हम 
गाधि-पुत्र के वचनो को टाल दें, तो वे क्रोध में आकर हमें घोर शाप देंगे । अत उनके 
कहे अनुसार हम राजा से यज्ञ करायेंगे । यो सोचकर सभी मुनि यज्ञ-कर्म में लग गये । 
विद्वामित्र ऋत्विक बने और मत्रो के उचारण के साथ उन्होने यज्ञ-भाग लेने के लिए 
देवताओ का आह्वान किया । देवताओ ने उच्च स्वर में कहा कि हम नही आयेंगे । 

“तब क्रोधाग्नि से भभकते हुए, कुश की पवित्री हाथ में लिये हुए, खुबवा उठाकर 
कौशिक में कहा--हे त्रिशकु यदि मेने बाल्यावस्था से नियमों का पालन करते हुए तप 
किया हो, तो तुम सशरीर स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे । अब तुम जाओ ।/ 


रे 


“इसपर त्रिशकु स्वर्ग में पहुँच गया । किन्तु (वहाँ जाने पर) इन्द्र ने कहा--वुम 
चाण्डाल हो, हम तुम्हें यहाँ रहने नही देंगे । और उसने त्रिशक्‌ को स्वर्ग से नीचे ढकेल 
दिया । 

“त्रिशकु सिर के वल नीचे की ओर गिरते हुए चिल्लाने लगा--हें विद्वामित्र, 
मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए । तब विद्वामित्र का हृदय दया से भर गया ॥ 
उन्होने कहा--हे राजन, तुम आकाश में ही ठहर जाओ । यो कहकर उन्होने चिशकु 
को आकाश में हो ठहरा दिया और बडे क्रोव में आकर इन्द्र से प्रतिरोध लेने के उद्देश्य 
से उन्होंने दक्षिण दिशा में अपर स्वर्ग का निर्माण किया । उसमें उन्होने (नये) सप्त 
ऋषियो तथा नक्षत्रों का सर्जन किया | इतना ही नहीं, वे उस स्वर्ग में दूसरे देवताओं 
तथा अपर इद्र को भी उत्पन्न करने का सकलप मन-ही-मन करने लगे । 

“यह समाचार मिलते ही सभी मुनि तथा देवता विश्वामित्र के पास आकर बोले-- 
हे मुनिनाथ, यह त्रिशकु ग्रुर्ठ के शाप से पीडित है। यह स्वर्ग में रहने योग्य नहीं हैँ ।' 
इस पर विश्वामित्र ने कहा--हे देवताओं मेने त्रिशकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन 
दिया है । मेरा वचन व्यर्थ नही होना चाहिए। इसलिए इस राजा को इसी स्वर्ग में रहने दो । 
जबतक यह ससार रहेगा, ये नक्षत्र, देवलोक से भी ऊपर आसमान में तेज से प्रकाश- 

| 


6० रंगनाथ एयायफे 


मान रहेंगे । उन नक्षत्रों के वीच त्रिचकु को इसी दशा में (सिर नीचा किये) देवताओं 
के समान रहने ढो और पुण्वात्मा तथा बणस्वी बनने दो । इस व्यवस्था को स्वीकार कर 
मुनि तथा देवता विच्वामित्र की प्रजसा करते हुए अपने-अपने स्थान को लौट गये । 

ध्तत्॒विब्वामित्र ने (अपने आश्रम के) मुनियो को देखकर कहा--यह स्थान अब 
तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं हैं । यहाँ जब लोगों की भीड एकत्र होने लगी हैं । अत 
हम यहाँ से किसी दूसरे स्थान में चले जायेंगे । यो कहकर वे उस स्थान को छोड़कर (पश्चिम 
दिशा में) वि्याला के निकट पुष्कर-नतीर्थ में जा पहुँचे । वहाँ केवल जल और फल का 
ही आहार करते हुए वहुत वर्ष तक वे तपस्या करते रहे । 

“उस समव अयोध्या के राजा, मन्‍्मथ के समान रूपवान्‌ अवरीष ने एक बचन्न करने 
का निश्चय किया । उस यज्नाव्व को इन्ध ने चुरा लिया । राजा ने यज्ञाव्व को कई 
स्थानों में ढूंढा, किन्तु अच्ब के न मिलने से उसके प्रायदिचित्त-स्वरूप व्धि पूरी करने के 
निमित्त नस्पौत्नु की माँग करते हुए वह कई जआश्रमों में गया । निदान भूयृतुग में अत्यत 
तपोनिप्ठा में सलग्त रुच नामक मूनि के पास पहुँचकर राजा ने मुनि को प्रणाम करके 
कहा--हे करुणानिधि, मेने यज्ञ करने का यत्न किया था, किन्तु यजाब्व कही खो गया हूँ । 
आप कूंपया अपने एक पुत्र को यज्न-पञ्ु के रूप में मुझे दें । उसके बदले में एक लाख 
गायें में आपको दूंगा ।” तब मुनि ने कहा--में अपने जेप्ठ पुत्र से अत्यधिक स्नेह रखता हूं 
इसलिए में उसको नहीं दे सकता । तब मुनिपत्नी ने कहा--नें कनिप्ठ को बहुत 
चाहती हूँ । म॑ उसे दे नहीं सकती । उन दोनो की वार्ते सुनकर च्ुनजषेप ने राजा से 
कहा--ज्थेप्ठ पुत्र को मेरें पिता चाहते हे और कनिप्ठ पुत्र को मेरी माता चाहती हैं । 
अत- उनकी वात छोड दीजिए, में आप के साथ चलूँगा । इसके लिए जाप मेरे माता- 
पिता को सहत्त गावें दीजिए ।” राजा ने वैसा ही किया और चुन जेप को रथ पर बिठा- 
कर जीघ्र वहाँ से चल दिया । 

“इस प्रकार राजा घुन जेप को साथ लेकर पुप्कर-प्रदेश में स्थित आश्रम में पहुँचा । 
वहाँ अमित तपरोनिष्ठा में लीन, अचल रीति से तपस्या करनेवाले अपने मामा विच्वामित्र 
को देखकर शुनशेप ने उनको प्रणाम किया और कहा--हें जनघ, मेरे माता-पिता ने मुझे 
इस राजा को बन्न-पक्षु के रूप में वेच दिया है । आप कृपया इस राजा के यज्ञ को सफल 
वनाकर में प्राणों की रक्षा कीजिए। आज आप ही मेरे माता, पिता, गुरु और ववबु हे ।! 

“इस प्रकार अत्वत दीन होकर जब जुनज्षेप ने कहा, तव विव्वामित्र ने अपने पुत्रो 
को सवोधित करके कहा--प्रुण्वात्मा लोग परलोक में सुगति प्राप्त करने के लिए ही पुत्र 
उत्पन्न करते हें । इस बालक ने मेरी चरण ली हैँ, इसलिए इसकी प्राण-रक्षा करना ही 
अब मेरे लिए स्वर्ग हैं। यह मेरा भानजा है । तुम लोग इसकी रक्षा करो और तुममें से 
कोई सके लिए अपने प्राण दो ॥' 

“मुनियुत्रों में से कोई नी उनका आदेश पालन करने के लिए सन्नद्ध नहीं हुआ, तब 
अत्यत क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें ज्ञाप दिया--तुम एक हजार वर्ष तक कुत्ते का मास 
खाते हुए दुःख भोगों ।॥' 


बालकोंड ९ 


“इसके पद्चात्‌ विश्वामित्र ने उस शुनशेप को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर 
कहा--मे तुम्हें दो मत्र देता हैँ | तुम सतत उनका जप करते रहो । वे (मत्र) तुम्हारी 
रक्षा करेंगे और अवरीष का यज्ञ भी सफल हो जायगा । यो कहते हुए उन्होने उसे दो 
मत्रो का उपदेश किया । 


“दूसरे दिन राजा अपनी यज्ञ-भूमि में पहुँच गया। उसने उस निर्मल आत्मा (शुत - 
शेप) की पूजा आदि करके उसे यूपकाप्ठ से बाँध दिया । तव वंह मुनि-पुत्र अत्यत शात 
तथा निशवचल चित्त से उन मत्रो का जप करने लगा । तब देवेन्द्र नें वहाँ आकर अवरीष 
का यज्ञ सफल बनाया तथा रुचि मुनि के पुत्र को चिरजीवी बनाकर देवताओ के साथ 
(अपने लोक में) चला गया । 

“एक हजार वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त ब्रह्मा ने विश्वामित्र को दर्शन दिये, 
और बोले--तुम्हारी तपस्या सफल हुई । तुम्हें ऋषित्व प्राप्त हो गया । 

“उनके चले जाने के पह्चात्‌ भी विश्वामित्र अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करने 
में ही सलग्न रहे । तब कामरूप धारण करने में चतुर, कामदेव का कमनीय वाण ही 
अप्सरा के रूप में प्रकट हुआ हो, ऐसा दिखाई देनेवाला ललित यौवन-कला-विलास से युक्त 
मेनका (अ'सरा) जलक्रीडा करके वहाँ आई । उसका जूडा शिथिल हो रहा था । मनोहर 
नेत्र, स्तिग्ध कपोल, मत्रमुग्ध करनेवाला मुख, माणिक्य के-से ओठ, मधुर-मद मुस्कान, स्वर्ण 
कलश के समान कुच, सोलहो कलाओ से परिपूर्ण काति, स्वर्ण-चर्ण करनेवाले बाहुमूल, 
ललित रोमराजि, सिंह की-सी कटि, पुल्नाग के पुष्प के सदृश नाभि, गुरु नितव, तथा काम- 
विकारों को उद्गीपन करनेवाले उरुभाग से युक्त वह सुदरी विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई। 
अपने जरीर की काति को विकीर्ण करनेवाली उस अप्सरा को देखकर विश्वामित्र 
में काम-वासना प्रबल हो उठी । उन्होने अपने ध्यान, मौन-न्रत तथा तपस्या को तिलाजहि 
देते हुए कहा--हे सुदरी, तुम मेरे साथ रतिक्रीडा में अनुरक्त हो जाओ ।” उनका आदेश 
स्वीकार करके मेनका ने दस वर्ष तक उस मुनि को रति-क्रीडा से परितृष्त किया । तब 
विश्वामित्र ने मन-ही-मस विचार करके जान लिया कि मेरे तप में विघ्न डालने 
के लिए ही देवताओ ने इस सुदर रमणी को भेजा है । इसलिए उन्होने उस कामिनी को 
देवलोक में भेज दिया और कामदेव को जीतने का विचार करके आप उत्तर पर्वत में 
कौशिकी नदी के तट पर निवास करते हुए एक सहस्न वर्ष तक बडी निष्ठा से घोर तपस्या 
करते रहे । उनके कठोर तप से देवता भीत होकर ब्रह्मा के पास पहुँचे और बोले-- 
है कमलासन, विश्वामित्र अब आपसे महर्षि मान लिये जाने की अहँता (योग्यता) रखते हैं । 
ब्रह्म भी विश्वामित्र के तप से सतुष्ट हुए और कौशिक के पास जाकर बोले--हे 
मुनि आज से तुम ससार में महषिं के रूप में विख्यात होगे ।” तब मुनिनाथ कौशिक ने 
कहा-- है कमलासन, जबतक आप सतृप्त होकर मुझे ब्रह्मर्षि घोषित नही करेंगे, तबतक 
में तपस्या करता ही रहूंगा । ब्रह्मा ने कहा कि ऐसा ही करो” और वे अपने लोक को 
चले गय । विद्वामित्र ने सकल्प कर लिया कि में ब्रह्मा को सतुप्त करके ब्रह्मर्षि का पद 
अवश्य प्राप्त करूँगा । इस प्रकार दुढ निदपचय करके वे अन्न-जल त्यागकर ऊद्ध्वंवाहु हो, 


4र्‌ रंगनाथ रायायण 


वायु-मक्षण करते हुए ग्रीप्म ऋतु में, आश्रम के बाहर, तथा जाड़े में जल-कुडो में खडे 
रहकर अत्यत उग्र तप करने लगे । 

“इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये । एक दिन इन्द्र ने रभा को देखकर 
कहा--है सुदरी, में तुमसे एक ऐसा कार कहूँगा, जिसमें देवताओं का हित निहित है । 
किसी तरह तुम कौजिक को काम-पीडित करके उनके तप में विघ्न डालो । तव रभा ने 
क्हा--हे देव, कौणिक क्रोब में मुझे झ्ञाप दे देंगे । इसीका मुझे भय होता हैं । 
ऐसे उम्र तप में लीन उस मुनि के पास पहुँचना क्‍या मेरे लिए सभव है ? हें शचीनाथ, 
में आपसे क्षमा चाहती हूँ | मे ऐसे महामूर्ख की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकती, 
आपके चरणो का सौगध खाकर कहती हूँ । ऐसा मूर्ख कौन होगा, जो जान-वूककर आग में 
कूद पड़े ?* 

यह सुतकर इन्द्र नें कहा--बदि तुम्हें इतना भय है, तो मनन्‍्मब और वसत भी 
तुम्हारे साथ जायेंगे, तुम जाओ ।' इन्द्र की इच्छा की अवहेलना न कर सकते के कारण वह 
सुदरी, मन्मब तथा वसत की सहायता से कीर, कोकिल से युक्त हो, मयूर तथा सारिकाओं 
को साथ लेकर अपनी सखियो के साथ उस तपोवन में गई, जहाँ गाथि-पुत्र तप कर रहे थे । 

वहाँ पहुँचकर रभा मनोहर गति से लास्थ करने लगी । कौणिक कछुद्ध होकर बोलें-- 
हैं पद्ममुखी, तुम दस हजार वर्ष तक पायाण वनकर पड़ी रहो । उसके वाद एक श्रेष्ठ 
तपोनिधि ब्राह्मण के द्वारा नुम्हारा झाप-मोचन होगा । 


“मुनि के जाप देते ही रभा पापाणवत्र गई । मन्मय भीत होकर वहाँ से भाग गया। 
शाप देने के कारण गाधथि-पुत्र ने देखा कि उनके तप का एक भाग नप्ठ हो गया है । 
उन्होंने सोचा पहले काम-वासना के कारण मेरा तप नप्ट हो गया था और अब कोघ 
से मेने अपनी तपस्या खो दी । इस प्रकार चिंतित होकर उन्होंने काम तथा क्रोध दोनों 
का त्यागकर निराह्ार तथा जितेन्द्रिय हो एक हजार वर्ष तक तप किया । ब्रह्मा उनपर 
बहुत प्रसन्न हुए । (तव विष्वामित्र ने) ब्रह्मर्षिं कहलाने की अदम्य इच्छा लिये उत्तर दिशा 
को छोडकर पूर्व दिया की ओर प्रस्थान किया और वहाँ इन्द्र के असस्य विध्तों से विचलित 
न होते हुए अठल भाव से तप किया । उसके परचात्‌ सिद्धाश्रम में पहुँचकर वहीं घोर 
तप करते हुए रहने लगे । 

“इस प्रकार श्रेप्ठ तपोनिप्ठा में एक सहस्न वर्ष बीत गये । विद्वामित्र तपस्या की 
पूत्ति के पद्चात्‌ पारण करने के लिए नींवार-धान्य एकत्र करके ले आये, उसे पकाया 
और देवताओं को जरपंण करने के उपरांत भोजन करने ही वाले थे कि इन्द्र एक बूढ़े 
ब्राह्मण का रूप घरकर वहाँ आया जौर भोजन माँगा। विब्वामित्र ने सारा भोजन उस 
ब्राह्मण को दें दिया । इन्द्र नें विना एक दाना छोडें सव खा लिया | इस पर 
विव्वामित्र फिर एक हजार साल तक अविचल निष्ठा से तपस्या करते रहे । 

“इस घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके सिर से घुआँ निकलकर सारें लोक में फैल 
गया । सभी समुद्र छ्ुब्ध हो गये । पृथ्वी काँगने लगी । कुलपर्वत थर्रा उठे । विद्याएँ 
उलक गई । अमर, गवर्व तथा सभी मुनि ब्रह्मा के पास जाकर बोले--हे कमलनर्भ॑, 


बा/लकाड ९३ 


कौशिक बडे उत्साह से उग्र तपकर रहे हे । उनका मनोरथ पूर्ण करके यदि उनकी तपस्या 
को वद नही करायेंगे, तो उस पुण्यात्मा विद्वामित्र के तप से उत्पन्न अग्नि से सभी लोक 
भस्म हो जायेंगे ।! 

“उनकी बातें सुनकर ब्रह्मा उनको साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास आये और 
बोले--- है कौशिक सुनो । अब इस उग्र तप की आवश्यकता नहीं है | आज से तुम 
ब्रह्मिं हो गये ।' 

“तब कौशिक ने ब्रह्मा आदि देवताओ को देखकर बडी भक्ति तथा आइचये के साथ 
कहा--यदि मेने सच ही ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया है, तो ब्रह्मा के पुत्र, चिर- 
पुण्यात्मा, लोक-पावन वसिष्ठ आकर मुझे ब्रह्मषिं कहें | तभी में विश्वास करूँगा ।' 

“तब ब्रह्मा तथा देवताओ की प्रार्थना पर वसिष्ठ वहाँ आये और बोलें---अपने 
उग्र तप से तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें कोई सदेह नहीं हैं | तृम प्रसन्न होकर जा सकते हो ।' 
तब विश्वामित्र ने वडी भक्ति से वसिष्ठ की पूजा की । सभी देवता विदश्वामित्र को अज्ञीववादि 
देकर देवलोक को चले गये । 


“विश्वामित्र की महिमा इन अद्भुत कार्यो से आपको विदित होगी ।॥” 
शतानद के इस प्रफार कहने पर राम, लक्ष्मण, जनक तथा उनके सभासद अत्यत प्रसन्न हुए 
(इतने में ) सूर्यास्त हुआ, मानों सूर्य रसातल में यह समाचार देने जा रहा हो कि कल राघव जनक 


पे 


के निवास में रखे हुए जिव-धतृष को तोडकर सीता का पाणि-ग्रहण करेंगे । 


जनक को विदा करके गाधथि-पुत्र ने राम तथा लक्ष्मण के साथ अपने निवास में 
बडे आनद से रात विताई । सूर्योदय होते ही स्वान, पूजा आदि से निवृत्त होकर 
विद्यामित्र राम के साथ जनक के यहाँ गये और वोलें--हे जनक, कोटिसूये-प्रभा-समच्वित, 
पुण्य-चरित, अनन्य-गोचर तथा विश्वमृत्ति आपके यहाँ स्थित शिव-धनुप के दर्शनार्थ आये हें । 
आप कृपया उस धनुष को मंगावें ।' 


३२ शिव-धनुष का वृत्तांत 

तव जनक बड़े आइचर्य-चकित होकर बोले--हे नियतात्मा, शिवजी ने अवकासुर, 
भस्मासुर आदि राक्षसों को इसी घन्‌ष से मारा था । पूर्व काल में उसी घनुष से उन्होने 
भयकर राक्षसों का सहार किया था । शकर ने अत्यन्त क्रोध करके इसी धनुष से त्रिपुर- 
दुर्गों को जीता था, इसी घनुष से उन्होने देवेन्द्र आदि देवताओं को भगाकर दक्ष के यज्ञ का 
ध्वस किया था । शिवजी ने हमारे पितामह नीति-सपन्न निमि चक्रवर्त्ती से छह पीढी पूर्व के 
हमारे पूर्वज देवरात को यह घनुष सौपा । तब से यह अतुल शक्ति-सपन्न धनुष हमारे 
घर में है | मैने यज्ञ करने का सकलप करके भूमि को शुद्ध करने के लिए जब उसमें 
हल चलाया, तो मुझे हल की फाल-रेखा में एक मजूषा (पिटारी) मिली। हर्ष-पुलकित हो 
जब मैने उसे खोला, तो मेरे आइचर्य की सीमा न रही । उसमें एक अत्यत प्रभा-समन्वित 
कन्या निकली । मेने उसका नाम सीता रखा और उसे अपनी पुत्री मानकर बड़े प्रेस से 
उसका लालन-पालन करने लगा । वसत ऋतु में वढनेवाली लता के समान तथा दिन-ति- 
दिन वृद्धि-पानेवाली चद्रकला के सदृश वह कन्या बढने लगी । क्रमश यौवनावस्था को प्राप्त 


8 रंग्नाथ ए्यशयर 


हो गई । यह देखकर इस पृथ्वी के कई नरेशो ने उस कन्या के साथ विवाह करने की 
प्रार्थना की । तब मेने उन से कहा--इस चन्द्रमुखी को प्राप्त करने के लिए एक कन्या- 
शुल्क नियत है । (वह शुल्क) यह जिव-घनुष हैं | जो नरेंश इस घनुष पर शत्यचा चढाकर 
अपने भुज-वल का परिचय देगा, उसी को में अपनी पुत्री बडें हर्ष से दूंगा । बहुत-से 
राजा आये, किन्तु कितने ही राजा उस घनुष को उठाने में भी असमर्थ होने के कारण 
लज्जा से अपना सिर भी न उठा सके । इसलिए उन राजाओं ने सोचा--पुत्री को देने 
का वचन देकर, कोदण्ड का दुस्साध्य प्रतिवव लगाकर जनक ने हमें अच्छी तरह भ्रम में 
डाल दिया हैं । हम उन्हें युद्ध में परास्त करके उनसे प्रतिशोध लेंगे । इस प्रकार सोचकर 
वे अपनी विशाल सेना के साथ एक वर्ष तक हमारे किले पर घेरा डाले रहे । जो अन्न 
तथा खाद्य-सामग्री हमने पूर्व से किले में सचित करके रखी थी, सब समाप्त हो गई 
अत. मेने मन में विचार करके देवताओं की प्रार्थना की । उनकी हपा से प्राप्त चतुरगिनी 
सेना के साथ मेने झत्रु-लेना पर आक्रमण किया । इस सेना का सामना न कर सकते 
के कारण कुछ लोग भीत होकर भाग खडे हुए तथा कुछ मेरे साथ घोर युद्ध करके 
हार गये और तितर-वितर हो गये । यदि राम अपनी आइचयेजनक शवित से उस शिव- 
धनुप का सवान कर सकें, तो में अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूँगा ।” 


३३ शिव-धनुर्भग 

इसके पच्चात्‌ जनक ने घतुष की पेंटी ले आने के लिए दस हजार वलिष्ठ सेवकों 
को भेजा । वह लोहे की पेटी वहुत ही विज्ञाल तथा आठ पहियो से युक्त थी । वें सभी 
वलवान्‌ उस पेटी को अपना सारा वल लगाकर इस प्रकार खीचकर लाने लगे, मानो मेरु 
पर्वेत को ही लिये आ रहे हो । यह देखकर जनक के अन्त पुर के परिचारक तथा परि- 
चारिकाएँ, जानकी, उर्मिला तथा जनक की पत्नी के निकट जाकर वोली--दिवियो, हमारा 
एक निवेदन सुनें । हमारी राज-सभा में गराधि-पुत्र कौणिक के साथ दो आजानुवाहु, देवों 
तया गरधर्वों से भी अधिक तेजस्वी, दो उत्तम नर-रत्नो को आया हुआ देखकर महाराज 
जनक ने भूुनि से प्रइन किया कि ये कौन है ? तब कौशिक ने अत्यन्त हर्ष से कहा--हें 
राजन, ये दशरथ के पुत्र हे । जिव-घनुष पर प्रत्यचा चढाने के लिए यहाँ आये हे । 
इसलिए आप योग्य व्यक्तियो को भेजकर धनुष को मेँगवाइए ।” तब राजा ने अपने मत्रियो 
को वुलाकर धनुष को लाने के लिए भेजा है | हम वह दृष्य गवाक्ष से देख सकती हे । 
आप भी ज्ञीत्र चलकर देखिए ।” 

परिचारिकाएँ जब राम के कुल, रूप, शौय तथा गुणों का वर्णन कर रही थी, 
तव सीता को ऐसा भान हो रहा था, मानो उनके कानो में सृधा की वर्षा हो रही हो । 
उन्हें रोमाच हो जाया । उन्हें प्रीति तथा भय का अनुभव होने लगा । वे सिर भाकाये 
खड़ी रही । लज्जा से अभिभूत उस सुन्दरी को चुपचाप खडी देखकर सखियाँ उनकी परि- 
चर्या करने लगी । ग्रुलाव-जल में कुकुम घोलकर एक ने उनके कपोलो पर सुन्दर ढग से 
“मकरिका-पत्र' की रचना की (चित्र बनाये) । दूसरी ने जवादियुक्त चदन का लेप किया । 
एक दूसरी परिचारिका ने माथे पर कस्तूरी का तिलक लगाया और एक उनके सामने 


बालकेडें, शी 


दर्पण लिये खडी रही । एक युवती ने उनके केशो को कधा करके उनका जूडा बाँध दिया, 
तो अन्य एक ने उसे निराले ढग से पुष्पो से अलक्ृत कर दिया । एक रमणी ने उन्हें 
सृगधित बीडा दिया । किसी ने उनकी कटि-तट पर किकिणियुकत करघनी बाँधी, तो किसी 
सुन्दरी ने उनके कुचों पर डोलनेवाले मोतियो के हार पहनाये । एक सखी ने चद्र-काति- 
सम धवल वस्त्र उन्हें उत्तम ढग से पहनाये । इस प्रकार सभी सखियाँ सीता को एक स्वर्ण- 
पीठ पर विठाकर उनका अलकरण कर रही थी । अलकरण समाप्त होते ही जनक की 
पत्नी उस कल्याणी राजकुमारी को साथ लेकर कनक-सौध के गवाक्ष के निकट आई | 
उन सब रमणियो के मन में सूर्यवश्ष में उत्पन्न राघव को कब देखेंगे ऐसा कुतृहल भरा था । 
उन्होंने गवाक्ष से लोकाभिराम दिव्य धाम, अत्यत रूपवान्‌ू, विष्णु के समान तेजस्वी, 
धनुर्धर, प्रत्यचा के चिह्न से अकित कर-कमलवाले राम को देखा । उनको देखकर सखियाँ 
मन-ही-मन सोचने लगी, रूप और रण में ये अद्वितीय है । ये विष्णु के अशज हे और 
राजपुत्रो के रूप में जन्मे हें । जानकी रामचन्द्र के लिए योग्य हे और उमिला सौमित्र 
के लिए । इस प्रकार सोचती हुईं वे अत्यन्त आसक्ति के साथ सभा की ओर देखती 
रही । 


किक 


इन्द्रसभा के समान सुशोभित उस राज-सभा में धनुष की पेटी लाई गई । तब 
महाराज जनक ने शुभमूत्ति गाधि-पुत्र को देखकर कहा--हे मुनि, किन्नर, यक्ष, गधर्व, 
देवता, पन्नग, तथा राक्षस आवियो में से कोई इस घनुष की डोरी को न चढा सका । 
फिर नरो की कौन कहे ? यह धनुष आप राम-लक्ष््ण को दिखाइए । तब मुनि ने 
रामचद्र की ओर देखकर कहा--हे रघुवश के वीर, इस महान्‌ धनुष को उठाकर उसकी 
प्रयचा चढा दो । आदिवराह का अवतार लेकर समस्त भूतल को सहज ही उठाकर अपनी 
शक्ति का परिचय देनेवाले तुम्हारे लिए यह धनुष क्‍या वस्तु है ? 

इस प्रकार मुनि का आदेश प्राप्त करके राम, लक्ष्मण के साथ उठे । उनके मन में 
प्रेम तथा उसग का सघर्ष हो रहा था । उन्होंने अपना दुकूल उतार दिया और कमरबद 
कसकर बाँधा । उस समय उनके मोहक रूप की काति सभी दिशाओ में बिखर रही थी । 
उस कमल-लोचन तथा अद्वितीय साहसी की करघधनी की छोटी-छोटी घटिकाओ का सौदे 
अद्भुत था । उनकी नव-रत्नमालिका बाहुओ तक डोल रही थी । उनके ककण और 
अंगूठियो की काति चारो ओर छिटक रही थी । कर्णाभूषणो की काति स्तिग्ध कपोलो पर 
प्रकाशित हो रही थी । उनके केश पीठ पर नृत्य कर रहे थे और कनक वर्णवाला उनका 
शरीर चारो ओर अपनी आभा विकीर्ण कर रहा था । करोडो मन्मथो का-सा सौदर्य 
लिये हुए वे मनुवश-तिलक गभीर गति से जनक की सभा में सब के सम्मुख आये और 
धनुष की पेटी खोली । समस्त घरा को अपने ऊपर धारणकर चिरनिद्रा में सुख से सोने- 
वाले शेषनाग के समान, काले बादलों के मध्य अपनी पूरी कान्ति को समेटकर अचल भाव 
से रहनेवाले विद्युत-दड के समान अनुपम सौदर्य से समन्वित धनुष को राम ने पेटी में से उठाया । 

वह अनुपम धनुष अरुण रत्त-प्रभा कीन्सी दीप्ति विखेरनेवाली अग्नि-ज्वाला के समान 
ऐसा खडा था, मानों वह उसे उठाने के लिए बडे गये के साथ प्रयत्न करनेवाले राजकुमारो के 


4६ रंगनाथ एायाय्ी 


वल को आहुति के रूप में निगलने के लिए उद्यत हो । राम जब उस धनुष को डोरी 
चढ़ाने का उपक्रम करने लगे, तब विश्वामित्र वोले--राम अपनी समस्त शक्ति से सपन्न 
होकर शिवजी के धनुष की प्रत्यच्य चढा रहे हैं | हे धरती, तुम दोलायमान मत होओ । 
हे शेषनाग, तुम विचलित मत होओ ॥। हें दिग्गजों, तुम सावधान रहो । 

इसी समय राधव ने घनुष की डोरी चढाई और अपने भुज-बल का परिचय दिया। 
वे जनक से वोले--हे भूपाल, यह धनुष बहुत ही पुराना, कमजोर, और घटिया है । 
यदि वाण का सधान किया जाय, वो यह टिक नहीं सकेगा । इसी धनुष को आपने इतती 
प्रगणा की थी ”/ 

इस प्रकार कहते हुए (राम ने) सुर, खेचर, भूसुर, किन्नर, नर तथा नृपतियों के 
समक्ष घनुष की ऐसी ठकार की, मानों वह सब दिशाओं में उनकी विजय की धोषणा कर 
रही हो । इसके पश्चात्‌ उन्होने चाप के गुण को (धनुष की प्रत्यचा को) आकर्णात्‌ इस 
प्रकार खीचा, मानों सीता के गुण उनके कानों तक पहुँच गये हो । (फिर) उन्होने 
अपनी मुट्ठी की पकड इस तरह ढीली कर दी, जैसे राक्षतों की पकड़ (शक्ति) ढीली 
पड गई हो । तुरत वह धनुष अरराकर टूट गया । दिश्वाएँ उस ध्वनि से यूज उठी । 
धनुष के टूटते ही सभी राजाओ का अभिमान भी चूर-चूर हो गया, सारी पृथ्वी में दरारें 
पड गईं, दिग्गज कुचल गये, शेषनाग घँेंस गया, समस्त भूत भीत हो गये और सभी 
लोक थर्रा उठे । उस कठोर ध्वनि को सुनते ही जनक, राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्र को 
छोडकर शेष सभी लोग मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पडे । जनक महाराज हे तथा 
विस्मय के साथ कौशिक को देखकर वोले---मे अपने वचन के अनुसार बिना विलव के 
ही अपनी पुत्री का विवाह इस महान्‌ व्यक्ति से कर दूंगा | महाराज दशरथ को विवाह 
के लिए सादर निमत्रण भेजूगा । 

इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उन्होंने तुरत अपने प्रिय मत्रियो को बुलाकर दशरथ 
को सारा समाचार सुनाकर उन्हें शीघ्र लिवा लाने के लिए भेजा । वे भी जवनाइवो (तेज 
घोडो) पर रवाना हुए और तीन दिन की यात्रा के उपरान्त साकेत (अयोध्या) पहुँच गये । 
वहाँ अपने पुत्रो की कुशल की चिता में निमग्न राजा (दशरथ) को देखकर जनक के 
मत्री बोले--हे राजश्रेप्ठ, आपके पुत्र शीयनिधि रामचन्द्र ने कौशिक मुनि के यज्ञ की रक्षा 
की और जनक महाराज का यज्ञ देखने (मिथिला) आये । वहाँ मुनि तथा अन्य राजाओं 
के समक्ष उन्होंने उस शिव-घनुष का सधान करके उसे सहज ही तोड डाला, जिसे उठाना 
सुरो तथा असूरो के लिए भी असभव हैं। इसपर महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता का 
विवाह राम के साथ करने का निश्चय किया हैँ । उस विवाह में आपको सादर आमत्रित 
करने के लिए हमें भेजा हैं । इसलिए आप शझीक्तन पधारें ।' 

यह समाचार सुनकर राजा आनन्द-सागर में डूव गये । उन्होने नगर-भर में विवाह 
की सूचना देने के लिए दूत भेजे और महाराज जनक के मत्रियों को श्रेष्ठ रत्न, आभूषण 
कनकाबर (सोने की पोबाक) आदि बडी प्रसन्नता से भेंट किये । उन्होने तुरत अपने कुल- 
गुरु वसिष्ठ, घीरात्मा वामदेव, जावालि, कश्यप, मार्केग्डेय, महिमावान्‌ कात्यायन (आदि मुनियों) 


) 


बालंकाड 4७ 


तथा अपने अमात्यो को वडे आदर के साथ बुला भेजा और अत्यन्त नमृता से बोले-- 
“राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ विदेह के घर में हे । राम ने राजाओ की प्रश्मसा 
प्राप्त करते हुए इन्दु-शेखर (शिव) का कठोर धनुष तोड़ा हैँ । अत महाराज जनक ने 
सोता का विवाह राम के साथ करने का निश्चय करके, विवाह के लिए हमें आमत्रित करने 
के लिए इन्हें (मत्रियों को) भेजा हैं । क्‍या जनक के साथ (हमारा) सबंध प्रजा को 
स्वीकृत होगा ?” तब सबने उस सबंध की प्रशसा की । 

दूसरे दिन वसिष्ठ आदि मुनियो, बधु-मित्र तथा अन्य राजाओ के साथ राजश्रेप्ठ 
दशरथ ने रथ में बैठकर बडे आनन्द से मिथिला के लिए प्रस्थान किया । उतके साथ 
रमणीय दिव्यावर, कमनीय रत्न-समूह, हाथी, रथ, तुरग तथा पदचर सेना, परम आप्त 
मत्री तथा पवित्र स्त्रियों के समूह थे । राजा के पांव में उनके पुत्र भरत तथा शत्रुध्त 
हाथियों पर, मोतियो के छत्र की छाया में चल रहे थे । मगल-वाद्यो के घन-नाद से 
सभी दिशाएँ मुखरित हो रही थी । इस प्रकार, जहाँ-तहाँ ठहरते हुए, चार दिन की यात्रा 
के पदचात्‌, दशरथ (अपने परिवार के साथ) मिथिला पहुँच गये । 


तब महाराज जनक सूर्यवश्ञ में श्रेष्ठ राजा (दशरथ) की अग॒वानी करने आये और 
बडे उत्साह एवं आदर के साथ उन्हें ले जाकर उनका उचित रीति से आदर-सत्कार 
किया । उसके बाद सभी मूनियों को प्रसन्न करते हुए वे बड़े हर्ष से बोले--“भहाराज, 
अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करने का निश्चय करके मेने आपको निमत्रित 
किया है । आपके आगमन से में कृतार्थ हुआ । इन वसिप्ठ, वामदेव आदि मुनियों के 
आगमन से मेरी इच्छाएँ पूर्ण हो गई । मेरा जन्म सफल हुआ। मेरा वश पवित्र हुआ । 
रविकुल के उत्तम नरेश के साथ सबंध करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। कल ही विवाह का 
शुभ मुहत्त है । आप अपने इष्ट-मित्रों को बुलाकर उचित तथा आवश्यक कार्य सपन्न कीजिए ।” 

उनके वचन सुनकर दशरथ ने बडे प्रेम से कहा--ऐसा ही हो” और जनक के 
द्वारा सपन्न कराये गये जनवासे में प्रसन्न-चित्त से ठहरे । तब विश्वामित्र राम तथा लक्ष्मण 
के साथ वहाँ आ पहुँचे । दशरथ ने उस मुनि को प्रणाम करके बडे विनय से कहा--हें 
अनघात्मा, आपकी कृपा से में धन्य हुआ ।” तब कौशिक बोले---हे राजन, तुम अकलक- 
चरित्र हो । अपने पुण्य-कार्य से तुम पवित्र हो गये हो । रविकुलोत्तम राम को पूत्र के रूप 
में प्राप्त करके तुम विशेष रूप से पवित्र हुए हो | उस दिन तुमने यज्ञ की रक्षा करने 
के लिए सद्बुद्धि से अपने पुत्र राम-लक्ष्मण को मुझे दिया था | यह लो, तुम्हारे पुत्र कुशल- 
मगल से हे । उन्हें स्वीकार करो ।” इतने में दोनो (राम-लक्ष्मण) ने राजा को प्रणाम किया । 
राजा ने उन्हें आाज्ञीर्वाद देकर वडे स्नेह से गले लगा लिया । 

दशरथ उस दिन अपने नित्य-नैमित्तिक वैदिक कर्मो से निवृत्त हुए । दूसरे दिन 
जनक अपने मत्रियो के साथ विवाह-मडप में आ विराजे । अपने पुरोहित शतानन्द को 
देखकर कहा--हे अनघात्मा, मेरे भाई कुशध्वज को भी इस विवाह में अवश्य आना 
चाहिए । वह इक्षुमती के किनारे साकाश्यपुरी में रहता है ।! यो कहकर उन्होने (अपने 
भाई को) बुला भेजा । 

पु 


८ रंग्नाथ एश्पायर 


बच्े कौतृहल के साथ कुञध्वज वहाँ आबा और जतानन्द तथा महाराज जनक को 
बडी श्रद्धा से प्रणाम किया और महाराज की आजा पाकर उच्ति आसन पर बैठा | तव 
जनक नें सुदामन नामक अपने मत्री से कहा--वुम्त ्ीत्र जाकर महाराज दशरथ को 
उनके सचिव, पुत्र, वसिप्ठ आदि मुनियों के साथ सादर लिवा लाओ ।” उसने दशरथ के सम्मुख 
पहुँचकर निवेदन किया--महाराज, राजा जनक ने सूझे आपकी सेवा में भेजा हैँ । आप 
कृपाकर अपने पुरोहित, पुत्र तथा अमात्यों के साथ विवाह-मडप में पधारे । राजा दशरथ 
सपरिवार वहाँ पहुँचे और (उचित आसन पर) जआासीन होते के पश्चात्‌ जनक से बोले-- 
महाराज, हम इक्ष्वाकुओं के लिए मुनि वसिप्ठ गुरु तथा देवता हे । वे सर्व तथा 
जितेच्द्रिय है । वे ही हमारे पुरोहित रहकर सस्कार करायेंगे ।॥ 

३४ दशरथ का वंद-क्रम 

तब म॒नि वसिप्ठ दशरथ के वश का वर्णन करते हुए कहने लगें--है राजन, निर्गुण 
ब्रह्म ने सगण रूप घारण करके, अपनी लीला प्रसारित करने के निमित्त, अपने नाभि-कमल में 
ब्रह्मा को उत्पन्न किया । इस प्रकार हरि के पुत्र ब्रह्मा उत्पन्न हुए । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए । 
मरीचि के पूत्र कश्यप हुए और उनसे सूर्य उत्पन्न हुआ | सूर्य का पुत्र था वेवस्वत मतु । 
उसका पृत्र इक्ष्वाकु नामक राजा वहुत विस्यात हुआ। इक्ष्वाक का पुत्र कुक्षि हुआ, 
और कुक्षि का पुत्र विकुक्षि उत्पन्न हुआ । विकुक्षि के पुत्र वाण के सनरण्य नामक पुत्र हुआ । 
उसके पृथु नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र त्रिजक्ु हुआ, जो वडा ही चतुर राजा था । 
उसके पुत्र हरिवचन्द्र के रोहिताब्व नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र दुदुमार हुआ । दुदुमार का 
पुत्र युवनाइव था, उसकी दी रूपवती रातियाँ थी। किन्तु उसके सतान नहीं थी | इसलिए 
राजा ने सतान की प्राप्ति की इच्छा से वहुत-से श्रेप्ठ मुनियों को व॒ला भेजा और उन 
महान्‌ आत्माजों की अर्ध्य-पाद्य आदि से पूजा की और उनसे निवेदन किया--हें महात्माओ, 
आप कृपा करके मुझे सतान-प्राप्ति का वर दीजिए । तब बडी प्रसन्नता से मुनि वबोले-- 
हैं राजनू, तुम भक्तिबयुक्त हो ऐल्-यज करो, तो तुम्हें सतान-प्राप्ति होगी ।' 

“राजा ने यज्ञ के लिए आवश्यक उपकरणों को तुरत एकत्र कराया । सयमी 
मुनियों ने वडे हर के साथ राजा के सतान-प्राप्ति हेतु ऐन्द्र नामक यज्ञ प्रारभ किया । 
यज्ञ पूरा हुआ औौर मुनियो ने अभिमंत्रित जल से पूर्ण कुभो को यज्ञ-शाला में एक ओर रखा। 
उसी दिन रात्रि के समय राजा ने प्यास से पीडित होकर, भूल से यज्ञ-झ्वाला में रखे हुए 
कलओशो में से लेकर अभिमत्रित जल पी लिया । 

(दूसरे दिन) जल-रहित कलणो को देखकर मुनि कहने लगे-'कलणों का जल 
किसने पी लिया ? जल कहाँ गया ?! जब उल्होनें ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें ज्ञात हुआ 
कि राजा ने ही जल पीया है । इस विचित्र दैव-माया को देखकर सभी मनि आइचये- 
चकित हो गये । राजा ने गर्भ घारण किया और एक वालक को जन्म देकर मर गया ऋषि अत्यन्त 
द्‌ ली हुए और मत्र झक्ति के प्रभाव से युवनाब्व को फिर सजीव बनाया | युवनाब्व जीवित हो उठा। 

“चक्रतर्त्ती के शुम लक्षणों से युक्त उस बालक को देखकर ऋषियों ने चिंचार किया 
कि वह सप्तद्वीपो पर राज्य करेगा | इससे वे बहुत प्रसन्न हुए । युवनाश्व ने बड़ें प्रेम से 


बालकों ९९ 


उन ऋषियों को अतुल घन देकर उनका सम्मान किया और वे विदा हुए | मातृहीन 
वह शिशु भूख से व्याकुल होकर जब रोने लगा, तब इन्द्र वहाँ आया और उसकी भूख 
मिटाने के लिए अपना अगृठा उस शिक्षु के मूँह में दे दिया । शिशु उससे अमृत-पान करने लगा। 
सुधा-पान करने के कारण इन्द्र ने बुधजनों के द्वारा उस शुभलक्षण का नाम 
मान्धाता रखवाया और इन्द्रलोक को लौट गया । 


“मान्धाता पूर्ण-चन्द्रप्रभा-सम दीप्तिमान्‌ होकर बढने लगा । यौवन के जाते ही वह 
अत्यन्त ज्ञौर्य-सपन्न हुआ और रावण आदि (बलशाली) राजाओ को कई युद्धों में परास्त कर 
समस्त भूमडल का शासक बन बैठा । विष्णु की भक्ति करते हुए इन्द्र का वल प्राप्त करके 
उसने बहुत-से यज्ञ किये । उस राजा के विमलागी नामक स्त्री से अत्यन्त तेजस्वी मुचुकुद 
और सुसधि नामक दो पूत्र और पचास पृत्रियाँ उत्पन्न हुईं । कन्याओ के युवावस्था को 
प्राप्त होते ही राजा ने उनका विवाह सौभरि नामक मुनि के साथ कर दिया । उन कन्याओ का 
अग्रज हरि-भक्ति में जीवन व्यतीत करते हुए स्वर्ग सिधारा । उसके भाई सुसधि ने पुण्य- 
कार्य करते हुए (चिर काल तक) राज्य का पालन किया । उस सुसधि के प्रुवसधि नामक 
पुत्र उत्पन्न हुआ । उसके पुत्र प्रसेनजित्‌ के भरत नामक पुत्र हुआ और भरत के असित 
नामक पूत्र हुआ । 

“असित के राज्य-काल में अत्यत पराक्रमी हैहय-बण में भयकर आकारवाला ताल- 
जघ नामक वीर उत्पन्न हुआ | उसने असित के साथ घोर युद्ध किया और युद्ध में पराजित 
करके उसका वध कर डाला | राजा की दोनो रानियो ने अत्यन्त दुखी होकर 
राज-काजका सारा भार मत्रियो को सौंप दिया और शान्ति से जीवन विताने लगी । उन दोनो 
रातियो में कालिदी नामक रानी गर्भवती थी । सौतिया डाह के कारण दूसरी रानी से 
यह सहा नहीं गया और उसने उस गर्भ को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से विष का प्रयोग किया । 
विष-प्रयोग से गर्भ-पात तो नहीं हुआ, किन्तु उसके प्रभाव से वह कड़ी बेदना का 
अनुभव करने लगी । तब कार्लिदी हिमालय में च्यवन ऋषि के यहाँ गई और बडी 
भक्त से उन्हें प्रणाम करके अपना सारा वृत्तात कह सुनाया । मुनि ने उसके दुख की कथा 
सुनकर कहा--बेटी, तुम मेरी पुत्री के समान हो, डरने की कोई बात नही हैँ ।” उन्होने 
उसे स्नेह से उठाया और अपनी दिव्य-दृष्टि से सारी स्थिति को समभकर कहा--हे 
कारलिदी, तुम्हारे अत्यत घार्मिक, अतुल तेजस्वी, महान्‌ चेता, कीत्तिवानू, वशच्योद्धारक, रूपवान्‌ 
तथा शत्रुदमन पुत्र उत्पन्न होगा । इस प्रकार मुनि का आशीर्वाद प्राप्त करने के परचात्‌ 
वह रमणी मुनि को प्रणाम करके अपने घर लीटकर प्रप्तन्न-चित्त रहने लगी । 

“पनिदान शुभ मुहत्त में उस शुभागी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कालिदी अत्यन्त हर्षित हुई। वह 
अपने शत्रुओ का दमन करके बडे आनन्द से राज करने लगा । उसका नाम सगर था। उसका पुत्र 
असमजस था। असमजस का पुत्र अशुमान था, जिसका पुत्र राजा दिलीप था । दिलीप के पुत्र पुण्यात्मा 
भगी रथ थे, जिन्हें ककुत्स्थ नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्र रघु महाराज के पुरुषादक नामक पुत्र हुआ । 
उसके उज्ज्वल कीत्तिमान्‌ नामक पुत्र हुआ | उसके पुत्र शरण था, जिसके पुत्र सुदर्शन के अग्निवर्ण नामक 
पुत्र हुआ, जिसका पुत्र ऋतुपर्ण था। ऋतुपर्ण का पुत्र मर था और उसका पुत्र ज्ीघ्रग था। शी घ्नग के 


६0 रंयनाथ एशायायर 


पुत्र॒ मनु के अवरीय नामक पुत्र हुआ । अवरीष का पुत्र जनवदित नहुप था, जिसका पुत्र 
ययाति नामक वीर था । ययाति के पुत्र नाभाग था और उसका पुत्र अज था | अज के 
पुत्र ही ये दचर्थ है, जो पृुण्यात्मा तथा सफल मनोरथ है । इन्ही दशरथ के पुत्र राम हे । 
इनके विपय में अधिक क्या कहूँ ? इनके पूत्र को ही तुमने अपनी पूत्री देने का 
निश्चय किया है | तुम इकृतइत्य हो । तुम्हारा वज (इससे) मगलमय हुआ । 

इस प्रकार वसिप्ठ को रघुवण की प्रजसा कस्ते हुए सुनकर पवित्रात्मा गतानन्द जनक 
की अनुमति लेकर बडे हर्प से सभी सभासदों के सुनते हुए यो कहने लगे--हे मुनीच्द, 
हमने बडे हर्ष से अनघात्मा दशरथ के वच्च-क्रम का वर्णन आपसे सुना । में अब आपको 
प्रगससनीय जनक की वंजावली सुनाऊँगा ।॥” 


३४ राजा जनक की वंशावली 

“पद्विजो तवा परमहयो के जन्मदाता अद्वितीय ब्रह्म अच्युत के वाभि-कमल में बह्या का जन्म हुआ 
और उनका पूत्र हुआ मरीचि । मरीचि का पुत्र कव्यप था | कब्यप के सूर्य उत्पन्न हुआ । 
उसका पुत्र था मतिमान्‌ू, जिसके मन्‌ नामक पुत्र हआ। मनु ने व्यान-मग्न अवस्था में कभी छीका, 
तो (उस छीक से) वैवस्वचत का जन्म हुआ । उस वैवस्वत का पुत्र निमि था, जो निर्मल 
आचारवानू, नीतिकोविद, धर्मनिरत, विमल मूर्तिमान्‌ तथा यजस्वी था ।- उसका पुत्र मिथि था, 
जिसके जनक नामक पूत्र उत्पन्न हुआ | जनक के उदावसू नामक पुत्र हुआ, जिसका 
पुत्र॒नन्दिव्धत था । नन्दिवद्धन का पुत्र सुकेतु था, जिसका पूत्र देवरात था | देव- 
रात के वृह्द्रथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके महाविभू नामक पुत्र था | महाविभु का पुत्र 
नुवृति था, सुवृतति का पुत्र धृप्ठकेतु और उसका पुत्र हर्य॑व्व था । ह॒र्यब्व के मरु नामक 
पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके प्रतीवक नामक पुत्र हुआ । प्रतीवक का पुत्र कीत्ति रथ था, जिसके 
देवमीढ नामक पुत्र हुआ । देवमीढ का पुत्र विवध और विवृध का पूृत्र महान्नक था । 
महाप्रक के कीत्तिरात नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र महारोम था। महारोम कें स्वर्ण- 
रोम नामक पुत्र हुआ, जिसके हृस्वरोम नामक गुणवान्‌ पुत्र हुआ । हृस्वरोम के दो पुत्र हुए 
“महाराज जनक और कुशध्वज । ये दोनो सौजन्य की सूत्ति हें । जब जनक महाराज राज्य 
करते थे, तव साकाध्य का पराक््मी राजा सुधन्वा अपनी सेना के साथ आया और मिथिला 
तथा मीता-समेत जिव का बनुष माँगतें हुए एक दूत भेजा | जब उसकी माँग की उपेक्षा 
कर दी गई, तब उसने जिव-घनुप तथा सीता को प्राप्त करने के लिए घोर यद्ध किया । 
जनक ने युद्ध-मूमि में उनका सहार किया और अपने अनुज को उस राज्य का राजा वनाया । 
जनक से लेकर उस वच्य में उत्पन्न सभी राजाओं के नाम जनक के कारण प्रशस्त हो गये है । 
निमिन्रज् में जन्म लेनेवाले सभी नरेश योगज्जान-मम्पन्न तथा चिरजीवी 
होते है ।” 

इस प्रकार, जनक के वच्य के सदाचरण तथा सीता के नसद्गृणों की प्रशसा करने के 
पसचातू, अत्यत प्रतापी तथा विमल-भाषी दन्चरव को सवोधित करके (शतानन्‍्द ने) कहा-- 
हे महाराज आप बपने नित्य जभिराम पुत्र राम का विवाह सीता के साथ सपन्न करके 
चिर-कीत्ति प्राप्त कीजिए 


ब/लेकोड 4 


दशरथ ने इन बातो को सुनकर बडे उत्साह से वसिष्ठ तथा गाधि-पुत्र को देखकर 
कहा--आप जनक महाराज से कहिए कि वे उर्मिला का विवाह सौमित्र से तथा राजा 
कुशध्वज की कन्याओ का विवाह उत्तम गृण-सपन्न भरत तथा शरत्रुष्त के साथ कर दें ।' 
तब उन्होने राजा जनक को सारी वातें कह सुनाई और उनकी सम्मति प्राप्त करके बड़े 
हर्ष से राजा दशरथ को जनक की स्वीकृति कह सुनाई । 


दूसरे दिव विवाह के लिए अनुकूल शुभ लग्न था । अत जनक ने उत्तर फान्गुनी 
नक्षत्र में विवाह का शुभ-मुहूर्त ठहराया और नगर तथा अत पुर को सजाने के लिए परि- 
चारको को भेजा । उन्होने चदन-कस्तूरी-मिश्रित जल से (नगर के) मार्गों पर छिड़काव 
करके उन्हें सुगधमय बनाया । चीनाशुको (रेशमी वस्त्र) के वितान सजाये, मणि-तोरण- 
ध्वजाओ से सारा नगर अलक्ृत किया, फलो के भार से अवनत कदलो के पेडो तथा सुपारी 
के पत्तों से प्रत्येक घर तथा कक्षो के ढ्वारों को सजाया और विज्ञाल चबूतरो को जवादि 
से लोपकर उनपर चौक पूरे । मणिकचन-कलशो से युक्त सौधों के गोपुरों का समूह 
अगणित सूर्यों का भ्रम उत्पन्न कर रहा था । सारा नगर मणि-दीपो, वारभी (धूप) के 
धुएँ तथा पुष्प-कलापो का भार वहन कर रहा था । इस प्रकार नगर को अलक्ंत करने 
के, पदचात्‌ उन्होने अतपुर को बडी निपुणता से सजाया । फिर उन्होंने शिल्पकारों द्वारा 
विवाह-वेदी का निर्माण कराने का आदेश दिया । शिल्पकारों ने मरकत की भूमि पर सोते 
के स्तभ स्थापित किये, उनपर नोलमणि के कार्तिस लगाये और उनपर माणिक्य की धरव 
(शहतीर) बैठाई । सुदर ढग से नकक्‍्काशी करके बनाये गोमेदक के छज्जे बनाये और 
ऊपर वज्ञ (हीरे) का गारा किया । (उस मडप के) चार विशान क्वाड बनाये गये, जो 
मणि तथा स्वर्ण के बने थे । (मण्डप में) सोने के सुन्दर चित्र बनाये गये । नीलमणि 
के हाथी तथा स्फटिक के सिंहो से सुसज्जित सोपान रचे गये | उशीर (खस) का विशाल शामियाना 
बनाया गया, जिसके मध्य में फूलों की लडियाँ लटकाई गईं। विवाह के लिए 
मरकत की वेदी बनाई गई। उसे कस्तूरी से लीपकर उसपर मोतियो के चौक पूरे गये। 
इस प्रकार सुसज्जित वह विवाह-मण्डप दर्शकों को नेत्रोत्सव प्रदान कर रहा था । 

तब वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अन्य पुण्यात्माओं को देखकर जनक ने कहा--आप 
लोग ही मिथिला तथा अयोध्या के कर्त्ता (विधाता) हे । अब आगे जो कार्य करना 
उचित हो, उन्हें कराइए ।! 

निरतर बजनेवाले मगल-वाद्यो के कलनाद तथा सुमगली स्त्रियो के मधुर गीतो 
के बीच महाराजा दशरथ तथा उनके चारो पुत्र मणिपीठो पर बैठे । उन्हें तैल तथा उबटन 
लगाकर उनका मगल-ल्तान कराया गया । उसके उपरात माथे पर तिलक देकर उन्हें 
चीनाशुक (रेशमी वस्त्र) तथा आभूषणों से अलकृत किया गया । (उन्हें देखकर) दशरथ 
तथा उनकी पत्नियाँ आनन्द से फूली नहीं समाती थी । इसके पश्चात्‌ उन्होने पवित्र मन से 
अपने पुत्रों के शुभ अभ्युदय के निमित्त गो-दान देने का निश्चय किया । प्रत्येक पुत्र के 
हितार्थ उन्होने वेद-विधि के अनुसार सोलह हजार गायें श्रेप्ठ ब्राह्मणो को दान दी । वे 
गायें घोत-खुर, कनक-श्वग, ताम्र-पुच्छ से अलकृत थी ओर सुन्दर दीखती थी | उनके साथ 


क्र रंगन/थ रॉयायण 


उनके वछडे भी थे । ये गायें श्रेष्ठ वस्त्रों से सज्जित थी । गायो के साथ उनको दूहने 
के लिए काँसे की दोहनी भी राजा ने दात में दी । इनके अतिरिक्त राजा ने स्वर्ण, भूमि 
तथा रत्नादि दक्षिणा के साथ अलग-अलग (पुत्रों के हितार्थ अलग-अलग ब्राह्मणो को) दिये । 

इसी समय भरत का मामा युवाजित्‌ वहाँ आा पहुँचा । वह अपने पिता कैकब- 
नरेश की आज्ना से भरत को ले जाने के लिए अयोध्या आया था। किन्तु पुत्रों के विवाहार्थ 
द्स्थ को मिथिला गये हुए जानकर वह सीधे मिथिला आ गया । दजरथ ने बडें 
प्रेम से उसका आदर-सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछे । 

दूसरे दित स्नातक आदि विधियों को पूर्ण करने के पश्चात्‌ (राम) अपने भाइयों 
के साथ दशरथ के सम्मुख उपस्थित हुए । दशरथ ने उनका अलकार करने का आदेश दिया । 
(परिचारक राम का अलकार करने लगे) उनके सिर पर मुकुट, उद्याद्वि के शझग 
के समान गजोभा दे रहा था । उन्होने हाथो में ककण घारण किये, मानों वे भकतो की 
रक्षा के लिए वद्ध-ककण (कृत-सकल्प) हो रहे हो । 

उनके वक्ष पर हार ऐसे शोभ रहे थे, मानो उनके वक्षःस्थल से उत्पन्न चन्द्रकिरणें 
चारो ओर छिटक रही हो । कटि-प्रदेश में कनक-वस्त्र ऐसे गोभित हो रहे थे, मानो पृथ्वी ने 
उनके कनकावरत्व को घारण कर लिया हो । उनके कानो में कुडल ऐसे शोभ रहे थे, 
मानों रावण के अत्याचार से पीडित अप्ट-दिकूपालो का यश दोनो ओर मोतियो के बहाने * 
अपनी विनती (श्रीराम को) सुना रहे हो । ऐसे सौदर्य से सपन्न उनके मुख की कान्ति 
को बढाते हुए कस्तूरी-तिलक जोभित हो रहा था । उदित होनेवाले भानु के तेज के समान 
विलसित, एवं कुडल केयूर, मुकुट तथा हारों से मडित लक्ष्मण, भरत तया बअत्रुघ्न के बीच 
राम ऐसे सुझोभित हो रहे थे, मानो दिकपालको के मध्य इन्द्र विराज रहा हो । 

वहाँ (जनक के अत पुर में) जनक ने (अपनी) चारो कन्याओ को सुसज्जित करने 
के लिए दासियो को आदेश दिया । उन्होने उन कन्याओ को दीप्तिमान्‌ मणिपीठ 
पर विठाया, सुमगलियों के मगल-गीतो और जारिका तथा कौरो के कलरव के बीच प्रत्येक को 
कुकुम, कस्तूरी, गोरोचन तथा जवादि की सुगधि से सुवासित उबटन लगाया । ककणों 
की मृदु ध्वनियों से मुखरित कर-पलल्‍लवो से उनके कंशो में चपा का तेल लगाया, हरिचदन 
का लेप किया और घनसार की सुगधि से युक्‍त कुनकुने जल से उन कन्याओ का 
स्नान कराया, महीन कपडो से (उनके जरीर को) पोछा और गुलावी रग के लहगो पर सुनहली 
जरीदार अचलवाले वस्त्र पहनाये । (उसके बाद) उन्होने उनके जूडे ऐसे सुदर ढग से बाँघे 
मानों समस्त झ्डंगारों की राणि एकत्र कर दी हो । उन जूडो में जूही की कलियाँ 
सजाई । कर्पूर तथा गुलाव-जल में कस्तूरी घोलकर (सारे शरीर पर) लेप किया, सुनहली 
जरीदार कचुकी पहनाई तथा उनके वक्ष पर मरकत-मोतियों के हार पहनाये । फिर 
उनके (कन्याओ) के कमनीय मुखो के सौदर्य की वृद्धि करते हुए तिलक लगाये, कपोलो पर 
मकरिका-पत्रों को रचा, नाक में बेसर पहनाये, रत्नो के कर्णफूल, मोतियो की वालियाँ 
ओर माणिक्य के कुण्डल सजायें । सके पद्चात्‌ (उनके पैरो में) मरकत के कड़े, पदुम- 
राग जड़े नूपुर तथा ग्रोमेदक-जडे पाजेव पहनाये । 


दालठकाोड 4ई 


ईस प्रकार, -हारो तथा आभूषणों से अलक्षत होने पर उन्हें देख सव स्त्रियाँ आइचये 
करने लगी कि ये दुलहिनें शरत्‌-पूर्णिमा के चद्ध है, वसत-काल की पुष्प-लताएँ हू या 
खराद पर चढे हुए श्रेष्ठ रत्न है, श्री-समन्वित कुदन की शलाकाएँ है, धौत मुकताएँ है, 
अथवा सुगध से परिपूर्ण चदन की प्रतिमाएँ हे । उनमें सीता तो स्वय लावण्य की मूत्ति, 
श्रेष्ठ गुणवतती, जगन्माता, आदिलक्ष्मी का अवतार थी, उस देवी के सौंदर्य का वर्णन करना 
किसके लिए सभव है ? वे भूषणो के लिए आभूषण थी, भूदेवी के समान थी, रत्नाकर 
की मेखला थी, गधवती (पृथ्वी) थी और वसुमती थी । 

शुभ मुहत्त निकट आते देखकर वसिष्ठ जनक से परामर्श करके आये और दशरथ 
को इसकी सूचना दी । तब महाराज दशरथ कौशिक, वसिष्ठ आदि गुरुओ को साथ लेकर 
अमरेनद्र के वैभव से युक्त हो, उचित वाहनों पर सवार होकर जनक के अत पुर की ओर 
चले । -उनके पीछे-पीछे उनके पुत्र तथा सुसज्जित हो रमणियाँ चलने लगी । उनके पीछे 
राजा के सामन्‍्त, मगलप्रद द्रव्यों को लिये हुई पुण्यवती स्त्रियाँ, याचक, अलकृत अश्व तथा 
गज, मत्री, वेद-पाठ करते हुए विम्र तथा प्रसन्न-चित्त मुनिगण चलने लगे । 


३६ सीता और रास का विवाह 


बरात को आते देख जनक ने अत्यन्त उत्साह से उनकी अग्रवानी की थी । कमल- 
लोचनी सुहाग्रिनो ने उतकी आरती उतारी । जनक ने उन्हें विवाह-मडप में नवरत्न-खचित 
पीठो पर आसीन कराया । उसके पद्चात्‌ उन्होंने अविलब अपने पुरोहित के द्वारा स्वर्ण- 
वेदी में अग्नि की प्रतिष्ठा कराई और वेदोक्त विधि से हवन-कार्ये सपन्न किया । उसके 
उपरान्त उन्होने देव-कन्याओ की-सी दीखनेवाली, लावण्यवती अपनी कन्याओ को बडे स्नेह 
से बुलवाया । उन्होने मधुपके की विधि पूरी की और अपनी त्रिय पुत्री विद्युत्‌ अग॒वाली, 
स्त्री-रत्न, कमललोचनी सीता को परदे के पीछे खडा किया । फिर उन्होने वाछित फल 
की सिद्धि के हेतु सकल्प-पूर्वक राम से कहा--हे राम, मेरी पुत्री, सद्ध्मचारिणी सीता को अग्नि 
के समक्ष ग्रहण करो ।” इस प्रकार कहते हुए उन्होने (राम के हाथो में) सीता को सोपा । 
(उस समय) अजख्र पुष्प-वृष्टि हुई तथा देव-दुदुभियाँ बजने लगी । सुंदर रमणियाँ दीपो 
की थालियाँ लिये खडी थी, स्वर्ण के थालों में मगलाक्षत लिये सुमगलालियाँ पाइर्व-भाग 
में खड़ी थी | गुड तथा जीरा मिलाकर वधु-वरो के सिर पर रखा गया। 

तब सुमुहत्त जानकर (मुनि ने) परवा हटाया । सीता का भव्य मुख सामने 
देखकर राम की आँखें पूर्णिमा के चन्द्र के प्रकाश में विकसित कुमुद-पुष्प के समान प्रफुल्लित 
हो गईं । सीता की दृष्टि पति के चरण-कमलो पर इस प्रकार स्थित हुई, जैसे पद्म पर 
अमर बंठे हो । 

रामचन्द्र की दृष्टि इस प्रकार दीखने लगी, मानो वह उस परम सुन्दरी के लावण्य- 
रूपी सागर में तैर रही हो । वधू की दृष्टि वर के शरीर के कान्ति-हपी अवाह के मध्य 
विकसित पद्म (कमलो) के सदृश शोभायमान हो रही थी । पत्नी तथा पति की आँखें थोडी 
१ आंध्र-देश में विवाह के समय शुभ मुहूत्त में वर-कन्या फे सिरो पर गुड़ तया जीरा 

मिलाकर रखने को प्रथा है। यह शुभ माना जाता हूँ । 


69 एरंग्कशथ एयायण 


देर के लिए आपस में इस प्रकार मिली, जैसे रति तथा मन्मथ के सुन्दर रूप वडी झोभा- 
युक्त गति से परस्पर मिले हो । उसके पश्चात्‌ रघुवीर ने सीता के लाल कमल के समान 
कर को अपने हाथ में लिया और पुलकित मात्रो से दोनो एक ही पीठ पर आसीन होकर 
बडी प्रीति से हवन का कार्य सपन्न करने लगे । जनक ने बडी प्रीति से श्रेष्ठ युवती 
उर्मिला का हाथ लक्ष्मण के हाथ में दिया, कुशध्वज की पुत्रियों में से कमल केसे विशाल 
नेत्रोवाली माडवी का कर भरत के हाथ में सौपा और चद्धमुखी श्रुतकीत्ति का हाथ 
जन्रुघ्त को दिया । 


इस प्रकार वेद-विधि से पाणिग्रहण-सस्कार समाप्त करके दशरथ के पुत्रों ने अन्नता- 
रोपण-विधि पूरी की और लाज-होम (धान का लावा अग्नि में डालनें की क्रिया) सपन्न 
करके मुनियों के आश्ञीर्वाद प्राप्त किये । स्वर्ग के देवो ने दुदुभियाँ वजाई, पुष्प-वृष्टि की, 
देवता सतुप्ट हुए, मुनि प्रसन्न हुए, गधर्व अत्यन्त हर्षित होकर गाने लगे तथा आनन्द से 
अप्सर।एँ नृत्य करने लगी । तव वसिप्ठ ने वैव.हिक हवन के उपरान्त राजकुमारों को 
अग्नि की परिक्रमा कराई और सप्तर्षियों की पूजा कराई । सव मुनि तथा पुरोहितों ने 
बडे हपँ से वर-वधुओ को आशीर्वाद दिये । दूसरे दिन सदसि (त्राह्मणो की सभा, जिसमें 
वे बेदोच्चारण के साथ वर-वधू को आजीर्वाद देतें हे) सपन्न किया गया और सबने शुद्ध 
चित्त से आशीर्वाद दिये । 

इस प्रकार, विवाह के चार दिन बड़े समारोह के साथ व्यतीत हुए । समस्त शुभ 
सस्कारो का दर्शन करके, महाराज दशरथ तथा समुद्र-सदृश शीलवान्‌ जनक को आशीर्वाद 
देकर कौशिक ने हिमाचल की ओर प्रस्थान किया । मिथिलेश के आनन्द की सीमा न 
रही । इसके परचातू (जनक तथा दशरथ) दोनो राजाओ ने अपने विभव के अनुकूल 
विवाह में आये हुए राजाओ को श्रेष्ठ बस्त्राभरण देकर विदा किया और सभी याचको को 
अपरिमित धन देकर सतुप्ट किया । 

जनक ने अपनी पुत्रियों को बड़े स्‍्तेह से उचित सीख दी और उन्हें श्रेष्ठ रत्वा- 
भूषण, चित्र-विचित्र के चीनावर तथा दासियाँ भेंट में दी । अपने जामाताओ को रथ, गज, 
तुरग, पदचर, सैनिक तथा आभूषण भेंट किये । वसिष्ठ आदि सयमियो तथा महाराज दशरथ 
को विविध रत्नामरण देकर उनका सत्कार किया और अपनी पुत्रियो को उनके साथ विदा किया । 
अपने पुत्र तथा पुत्र-चधुओ के साथ राजा दशरथ अयोध्या के लिए रवाना हुए । 
किन्तु मार्ग में अचानक बड़े वेग से प्रतिकूल पवन चलने लगा । इसके अतिरिक्त कितने 
ही अपणकुन भी होने लगे । राजा ने वहुत व्याकुल होकर वसिष्ठ से पूछा--हे मुनीश्वर, 
ये अपणकुन किस कारण से हो रहें हे ?” तव वडी अनुकपा से वसिष्ठ ने राजा को 
देखकर कहा---राजन्‌, आगे एक बडी विपत्ति आनेवाली है, पर वह देखते-देखते दूर हो 
जायेगी ॥ चिता मत करो 7 

मुनि इस प्रकार कह ही रहें थे कि पवन प्रचण्ड गति से चलने लगा, सारे आकाश 
में धूल छा गई । हाथी, घोड़े तथा रथो पर सवारयोद्धा तथा अन्य लोग चकित-से रह गये । 
सारी सेना तितर-वितर हो गई । सूर्य का तेंज मलिन हो गया । उसी समय 


बॉलकाोड 4९ 
पराक्रमी परशुराम कंधे पर परशु धारण किये आते दिखाई पडे, जिन्होने इक्कीस बार इस 
पृथ्वी को निक्षत्रिय कर दिया था । उनकी आँखें ऐसी लाल थी, मानो अपने जटा-जूट में 
स्थित गगा की आर्द्रता से ललाट को भाद्र बनाये हुए, अत्यत भयकर रूप से जलनेवाले 
तथा अपने कठ के विष को क्रोध से दैत्यो के ऊपर उगलनेवाले परम शिव के ललाट- 
नेत्र की प्रज्वलित वह्ति को (परशुराम) अपनी दोनो आँखों में लिये हुए आ रहे हो । 
उनकी बिखरी हुई लाल-लाल जटाएँ ऐसी दीख रही थी, मानो उनके भीतर की क्रोधाग्नि प्रज्वलित 
होकर बाहर तक लाल-लाल ज्वालाएँ फैला रही हो। उनके कधे पर रहने- 
वाला परशु ऐसा शोभा दे रहा था, मानो उत्को भुजा रूपी लक्ष्मी ने नाल-युकत विकसित 
कमल हाथ में धारण किया हो । ऐसे भयकर रूप में आतनेवाले परशुराम को देखकर 
राजा दशरथ तथा मुनिगण भयभीत होकर भय-निवारक मत्रो का जप करते हुए अध्य- 
पाद्यो के साथ परशुराम के सामने आये । 


३७ परशुराम का गर्व-मंग 

परशुराम ने अर्ध्य-पाद्य ग्रहण नहीं किया और राजा दशरथ को डरा-घमकाकर राम 
के आगे आकर खडे हुए । भार्गव राम (परशुराम) को देखकर राम ने बडी भक्ति से 
प्रणाम किया और हाथ जोडे बडे विनय से खडे रहे । उन्हें देखकर परशुराम ने कहा-- 
हे राजनू, तुम कितना भी विनय दिखाओ, तोभी में तुम्हें क्षमा नहीं करूँगा । तुम मुझसे 
युद्ध करो ।” तब राम ने कहा-- हे भूसुरोत्तम, आपने कश्यप आदि ब्राह्मणों को सारी 
पृथ्वी दान कर दी हैं और महान्‌ जितेन्द्रिय द्वो वनो में रहकर घोर तपस्या में सलग्न 
रहते है । अत आपकी वदना करना उचित है । हैं मुनीश्वर, यही विचार करके मेने 
आपको प्रणाम किया है, आपसे भीत होकर नद्दी । क्‍या यह उचित हैँ कि आप व्यर्थ 
ही मेरी निदा करें ? / 

परशुराम बोले-- तुम मुझे तपस्वी कहते द्वो ? जानते हो, मेने युद्ध में सहस्तवाहु 
को मार डाला और इक्कीस बार पृथ्वी पर के सभी क्षत्रियो का नाश कर डाला हूँ तथा 
(उनके) रक्‍त से अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया की हैँ । हमारे पितर राजाओ के शवों 
का सोपान बनाकर स्वर्ग में चले गये हे। हे अनघ, ऐसे भार्गव राम को विना जाने तुम 
इस ससार में राम होकर कैसे जन्मे ? क्षत्रिय के नाम से जो जन्म लेता हूँ, में उसका 
नाश करूँगा । (ऐसी दशा में) राम का नाम धारण करनेवाले क्षत्रिय को क्‍या में कमी 
छोड सकता हूँ ? राज-वह्य में जन्म लेकर 'राम का नाम घारण करनेवाले तुम्दें में कदापि 
क्षमा नही करूँगा । राजा होने के कारण तुम्हारे पिता को युद्ध में मार डालने के उद्देश्य 
से में आया था, लेकिन स्त्रियों की आड में शरण लेने के कारण मेने उसे छोड दिया था । 
इसीलिए वह गर्वाघ हो यहाँ फूला-फूला विचर रहा है । आज भले ही वह कही 
छिप जाय, पर में उसे जीवित नहीं रहने दूँगा ।” 

तब दशरथ अत्यन्त भीत होकर बडे विनय से भार्गव से बोलें--हिें भारगव, आप 
ब्राह्मण हे, आपको इतना रोष क्यों ? मेरे पुत्र बालक है । उनपर क्रोध करना आपको 
शोभा नहीं देता । में जानता हूँ कि आप समस्त शास्त्रों एवं पुराणों में पारगत हैँ । ऐसा 

& 


द् एंगनाथ रायायण 


कौन धर्म है, जिसे आप नहीं जानते | आपका सामना करके आपसे युद्ध करने की क्षमता 
शिवजी में भी नहीं है । ऐसी दशा में दूसरो की जक्ति की वात कौन कहें ? हे पंरम- 
पावन, देवेन्द्र भी आपकी कठोर प्रतिज्ञा को व्यर्थ नहीं कर सकता । जाप हम सबको 
क्षमा करके प्रसन्नता से गमन कीजिए ।” 

दशरथ ने इस प्रकार कहकर प्रणाम किया और सिर भुकाकर चुपचाप खडे हो गये । फिर 
भी परशुराम की आंखें क्रोव से लाल ही रहीं । उन्होंने अपनी प्रशसा में कहे हुए वचनों 
को अनसुनी कर दिया और मन-ही-सन उन सबका दमन करनें का विचार करके 
अत्यंत क्रोव के साथ वोले---जिस समय में शिव के साथ घनुविद्या का अभ्यास कर रहा था, 
उस समय कार्तिकेब ने मुझसे युद्ध आरभ किया, पर वह मुझसे हार गया । तब शिव ने 
भी मेरी शक्ति की प्रणसा की थो । उस जिव के घनुप का तोड़ना में कैसे सहन केर 
सकता हैं ?” 

तव रघुराम ने हंसते हुए कहा--मैने विनोदाथ॑ उस घनुष का सघान किया, तो 
वह टूट गया । इतना ही नही, मेरें सघान करने से भला वह पिनाक कही टिक सकता था * 
मेरी भुजाओं की शक्ति ही इतनी अधिक है। इक्ष्वाकु-बशी युद्धों में कभी पशुओं 
तथा ब्राह्मणों का वव करना नहीं चाहते । आपने जो वारतें कही, वें सव आपके लिए 
उचित हे । आप ब्राह्मण है, में जापका वव करना नही चाहता । यह मेरी गर्दन है, वह 
आपका परशु है । विना दया दिखाये जो उचित समझें, करें ।” 

रघुराम को ऋओडद्धोदीप्त देखकर भागव राम घवराकर वोले--ुम्हारी वातो से 
भुंके ज्ञात होता है कि तुम्हें इस वात्त का गवें है कि मे ब्राह्मण हूँ और तुम क्षत्रिय हो । 
तुंम ऐसां मत सोचो । में अभी अपने प्रताप का तेज तुम्हें दरसाऊंगा। उस जनक राजा के 
घर में जिस धनुष को तुमने तोड़ा है, उसे तथा इस घनुष को (जो मेरे पास है) पहले 
देवताओ ने बड़े प्रेम से विश्वकर्मा के द्वारा एक साथ वनवाया था । उसमें से एक उन्होने 
त्रिपुर-विजय के लिए जाते समय गिव को दिया । रुद्र ने उसी धनुष से त्रिपुरो को 
विजित किया ॥” उसके पर्चात्‌ वीर-गर्व की मुद्रा वारण करके वे कहने लगे--मेने विना 
किसी की सहायता के ही त्रिपुरासुरों का वव किया है | मेरे समान शक्तिशाली इस ससार 
में कौन है ? 

(उनके वचनों को खुनकर) देवता, मुनि, सनकादि, विष्णु के पाश्वंचर कहने लगे 
कि विष्णु त्रिपुरासुर के वब में शिव के सहायक बने, अन्यथा रुद्र से यह कार्य कैसे सघता ? 
यह वार्त्ता रुद्रगण ने सुनकर जिव से कह दिया । शिव ने अत्यत क्रोष करके विष्णु को 
युद्ध के लिए ललकारा । (यह वात जानकर) सुर, गरुड़ तथा उरगादि देवता ब्रह्मा के 
पास गये और उनसे परामर्श करने के वाद यह निश्चय किया कि हरि तथा हर कौ 
परीक्षा के लिए दोनों में युद्ध होना ही चाहिए। अत उन्होनें कामुक नामक धनुष विष्णु 
को दिया । हरि तथा हर दोनो अछुल रीति से युद्ध करने लगें | नारायण द्वारा की गई 
भयकर वाण-वर्षा के कारण जिव के घनुप का थोडा-सा भाग टूट गया । तब देवताओं ने 
निर्णय क्या कि हरि की अक्ति ही प्रवल हैं और उन्होने दोनो का युद्ध वद करवा दिया। 


बालकाोड 2 


देवताओं का मनोभाव जानकर शिव ने अपना धनुष देवरात को दिया । उन्होने वह घनुष 
जनक को दिया । विष्ण ने अपना धनुष रुचिक को दिया, रुचिक ने जमदग्नि को दिया 
और जमदग्नि ने कृपा करके मुझे यह धनुष दिया | शिव का धनुष पहले ही थोड़ान्सा 
दूटा हुआ था, इसलिए तुमने उसे तोडा होगा । हे राजन, मेरें हाथ का यह घनुष उसी 
धनुष के जोड का हैं । इसपर बाण-सधान करके अपनी शक्ति का परिचय दिये विना 
में तुम्हें यहाँ से हटने नहीं दूँगा ।” 

इन वचनो को सुनकर दशरथात्मज अत्यत कुद्ध हुए | उनकी आँखों से अग्वि-कण 
निकलने लगे । राम ने भार्गव राम से, जो उनकी शक्ति से अनभिज्ञ थे, कहा--में जानता 
हैं कि आपमें अतुल वल हैँ । में यह भी जानता हूँ कि आपने क्षत्रियों को परास्त करके 
उनका वध किया है । किन्तु, आप मुझे भी दूसरों की तरह समभकर, निर्भय होकर डीग 
मार रहे है । आपको मेरे भुज-वल का ज्ञान नही हैं । भला, आपकी शक्ति ही कितनी है ” 
आपका यह बनुष क्‍या चीज है ? लाइए, देखूँ तो सही । 

इस प्रकार कहकर उन्होने (परशुराम के हाथ से) घनुष लेकर, उसकी प्रत्यचा 
चढा दी और एक उम्र बाण-सधान करके कहा--'में आपके पैर काटकर आपका गरवे- 
भंग करते हुए आपका क्रोध दूर करूँगा ।” 

परशुराम भयभीत हो गये । उनका घमड चूर-चूर हो गया। उनकी हेँकडी जाती रही । 
तुरत्त वडी नमृता से प्रार्थनापू्वक कहने लगे--हे राजेचद्र, हे राम, मानवाबीश 
मुझे क्षमा करो । मेरी रक्षा करो । मेने सारी पृथ्वी कश्यप को दान में दे दी है । अत- 
में रात के समय इस पृथ्वी पर ठहर नहीं सकता । मूझे रात तक महेचद्धाचल पर पहुँच 
जाना चाहिए। इसलिए तुम मेरे पैर मत काटो । (तुम चाहें तो) मेरे समस्त सचित 
पुण्य पर यह बाण छोड दो ।” 

तब राम ने वह वाण परशुराम के (सचित) पुण्य पर छोड़ दिया । देवता, सिद्ध, 
खेचर आदि जड़वत्‌ खडे भार्गव राम तथा कुद्ध काकुत्स्थ राम को देखते रहे । तब पुष्प- 
वृष्टि हुई । स्वर्ग में रहनंवाले ब्रह्मादि देवता आनन्दित होकर राम की प्रशसा करने लगे । 

भागव राम राम को देखकर मन-ही-मन उनकी महिमा का विचार करके बोले-- 
“है अनघ, मेने तुम्हारी शक्ति को देख, मन-ही-मन विचार करके जान लिया है कि तुम 
विष्णु हो । हे काकुत्स्थ, इसलिए युद्ध में हार जाना मेरे लिए स्वाभाविक ही हैँ । तुम 
मेरे बल हो, मेरी आत्मा हो, मेरे वधु-वाधघव सब तुम ही हो । हे रामचन्द्र, तुम मेरे 
कुवचनो का खयाल मत करो । हे रघुकुलाधीश राम, तुम मेरी रक्षा करो ।” 

इस प्रकार उन्होनें राम की स्तुति की, मन-ही-मत रघुराम की महिमा ग्रुनते हुए 
उनकी परिक्रमा की और भक्ति से हाथ जोंडकर, अत्यन्त विनय से राम की कृपा प्राप्त 
करने के उद्देश्य से बोलें--हे राघव, हें जानकीनाथ, अब मुझे जाने की आजा दो । मेरी 
त्रुट्यो का ध्यान न करके उन्हें क्षमा कर दो, मेरी रक्षा करो और स्नेह से मुझे जाने की 
अनुमति प्रदान करो । में एकनिप्ठ होकर, अविचल रीति से नेत्र बद करके तुम्हारे प्रति 
तपस्या करूँगा और ज्ञान प्राप्त करूँगा, जिससे सभी मुनिलसमाज हर्पित हो जाय । 


दर्द रगनाथ एयायर 


इस प्रकार राम की स्तुति करके, बडे प्रेम से वे वहाँ से प्रस्थान करते हुए वोलें-- 
'राम, तुम्हारी शक्ति अनुपम हैं । उसके पद्चात्‌ वे महेन्द्राचल पर चले गये । वरुण की 
प्रायंना मानकर रघुराम ने उसी क्षण परशुराम का धनुष उन्हें दे दिया । 

तब अनुकूल पवन चलने लगा । सेना में फिर से उत्साह छा गया । नर तथा सुरो 
की प्रश्सा प्राप्त करते हुए विजय-श्री में युक्त हो राघव ने अपने पिता महाराज दशरथ 
तथा पुण्यात्मा वसिष्ठ को प्रणाम किया । राजा ने बडे आनन्द से उन्हें गले से लगाकर 
बाशीर्वाद दिया और वोलें--“मेरा पुनर्जन्मन्जेसा हुआ है । तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करक 
इस पृथ्वी पर में देवराज इन्द्र के समान वन गया । परम पावन परशुराम जब शिव की 
तरह (भयकर रूप लेकर) यहाँ आये, तब भय से मेरा सारा शरीर काँपने लगा और मेने सोचा 
कि अब कोई उपाय नहीं हैँ | इसलिए मेने उनसे विनती की । जब उन्होने मेरे विनीत 
वचनो को दुकरा दिया, तब पुत्र-ल्नेह से वि्चल होकर में चुप हो रहा । (तुम्हारा) उनको 
जीतना मेरे लिए वडे आइचर्य का विषय है । मेने आज अतुल वैभव प्राप्त किया हैं । 
तुम्हारे प्रताप के फलस्वरूप सारा भय दूर हो गया है । मे इस ससार में यशस्वी हुआ ।” 

इस प्रकार, राम का अभिनदन करने के उपरान्त राजा ने वसिष्ठादि मुनियो और सभी 
सेनाओो को साथ लिये हुए बडे आनन्द से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया । 

३८ अयोध्या सें प्रवेश 

मगल-चिह्नो तथा पुण्यात्माओं के साथ, मगल-वाद्यो की ध्वनि होते हुए, दशरथ ने 
अपने पृत्रो-सहित बडी प्रसन्नता से अयोध्या में प्रवेश किया । अलकृत राजमार्ग में, राज- 
कुल के लोग तया अन्य मित्र-वर्गग सौधो पर से उन सुन्दर राजकुमारों को देखकर उनपर 
पुप्पनवृष्टि करने लगे । भूसुर आाजीर्वाद देंने लगें। तव राजा ने अत्यन्त सुन्दर ढंग से 
अलक्ृत अतपपुर में प्रवेश किया । कौसल्यथा कैकेयी तथा सुमित्रा आदि रनवास की सभी 
स्त्रियाँ अत्यन्त हप॑ से उनके स्वागतार्थ आईं । उन्होंने उनपर फूलों की वर्षा की और उनकी 
आरती उतारी । पुत्र तथा पुत्र-वधुओं ने उनके पैर छुए, तो उन्होने उन्हें गले लगाकर 
बाज्ञीवाद दिये | सीता आदि पुत्र-ववुओ का मधुर स्वभाव एवं कुशलता देखकर सभी सतुष्ट हुए । 

दगरय अपने चारो पुत्रो की सेवाएँ प्राप्त करते हुए, चतुर्मुज विष्णु के समान, 
चार श्गोवाले स्वर्ग के हाथी (ऐरावत) के समान विलसित होते थे और बड़े आनन्द से 
पुण्य की रक्षा करते हुए राज्य करने लगे । एक दिन दशरथ ने उचित समय देखकर 
शुभ लक्षणों से सपन्न अपने पुत्र मर्त को बुलाकर कहा-- है वत्स, तुम्हारे मामा कैकय 
तुम्हें अपने यहाँ ले जाना चाहते हे, अत तुम शत्रुध्व के साथ उनके यहाँ जाओ और 
उनकी इच्छा पूर्ण करो । हे वत्स, (वहाँ) अपने नाना, नानी, मामा तथा ब्राह्मणों के प्रति 
भक्ति-युक्त विनय दरसातें रहना । उनकी परिचर्या करते हुए उनसे रथ चलाना, शस्त्र 
चलाना, वबेद-शास्त्र, नीति-शास्त्र तथा अन्य सभी कलाओ को सीखने में रुतत तत्पर रहना । 
एक क्षण भी व्यर्थ न विताना और (समय-समय पर) अपना कृशल-समाचार मेजते रहना।” 

राजा का आदेश पाते ही मरत ने माता-पिता तथा रघुराम को विनय से प्रणाम 
किया और भगुघ्त को साथ लेकर अपने मामा के साथ राजगृह की राजवानी के लिए रवाना हुए। 


बालकोड 4९ 


राजकुमारों ने अपने आगमन का समाचार अपने नाना को भेज दिया । उस राजा ने 
अपने नगर को फूल-मालाओ, तोरणो तथा पताकाओ से सुदर ढग से सजाया । सुग्धित 
जल से मार्गों का सिंचन करवाया तथा पुष्प एवं धूप आदि से राजमार्ग को सुगधित किया । 
(फिर) मत्रियो, स्त्रियों तथा परिचारकों को साथ लेकर तरह-तरह के वाद्य, 
नृत्य, गीतो से युक्त हो राजा ने उनकी अगवानी की और वदी, सूत तथा भागध-जन की 
स्तुति-वचनो के साथ अपने नाती को बडे स्नेह से अतपुर में ले आये । भरत ने अपने 
नाना से लेकर ऋ्रश सभी गृरुजनो को प्रणाम किया और उनके आश्वीर्वाद प्राप्त किये । 

यूवराज राम बडी कुशलता तथा एकाग्रता से, अपने पिता की सेवा करते हुए, 
भी प्रजा को एक समान मानते हुए धर्म-निरत हो, सीता के साथ नव-वैवाहिक जीवन का 
आनन्द प्राप्त करने लगे । वें अट्टालिकाओ पर, क्रीडा-सौधो में, चन्धकान्त शिलाओ पर, शीश- 
महलो में, सोने के शयनागारों में, जूही की पुष्प-शय्याओ पर, चपक, पूणर, नारियल, रसाल, 
नारगी आदि वृक्षों से युक्त उपवनों में, क्रीडान्पवंतों पर, सरोबरों में, लतागृहों में, घवल 
वितानो में, बालुकामय भूमि पर, आमोद-प्रमोद के साथ रहते हुए, समस्त सुख-भोगो का 
अनुभव करते रहे । 

इस प्रकार, आघध्नर के भाषा-समाट्‌, काव्य तथा आगमो के ज्ञाता, आचारवानू, अपार 
ज्ञान-समुद्र, भूलोक के लिए निधि-सम दीखनेवाले गोनबुद्ध राजाने अपने पिताश्रेष्ठ, धैय॑वा,न्‌ 
शन्रुओ के लिए काल-स्वरूप, महापुरुष, श्रेष्ठ शूर, दयालू, गृुणवान्‌ विद्वुलराजा के 
नाम, आचन्‍्द्राकं विलसित होनेवाली, समस्त भूमडल में अत्यत पुज्य, अनुपम, ललित शब्दार्थो 
से युक्त रस-सिद्ध रामायण को कला एवं भावों से परिपूर्ण बालकाड की रचना की । 

आपग्रत्थ, आदि काव्य, रसिको को आनद देनेवाले तथा झाइवतत, इस पुण्यचरित्र 
को जो कोई पढेंगे या सुर्नेगे, वे सामादि वेद-समूहो का निवास-स्थान, रामनाम चिंता- 
मणि, समस्त भोग, परहित आचरण, ऊँचे विचार, पूर्ण शक्ति, राज-सुख, विमल यश, चिर 
सुख, धर्म-निष्ठा, दान में आसक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य, समृद्धि आदि अवश्य ही भ्राप्त करेंगे । 
उनके पापों का नाश होगा, पुत्र की प्राप्ति होगी, शत्रुओं का नाश होगा और घन-धान्य की 
वृद्धि होगी । बिना किसी प्रकार के विध्न-बाधाओ के, उन्हें लावण्यवती घर्म-पत्वी का सह- 
वास प्राप्त होगा । उनके भाई भी उद्नति प्राप्त करते हुए बडे स्नेह से हिल-मिलकर रहेंगे । 
देवता तथा पितर सदा तृप्त रहेंगे । यह रामायण मोक्ष-साधक है, पापहारी हैं, 
दिव्य तथा भव्य है । शुभप्रद है । इस रामायण की पूजा नियम-पूर्वक करने से पुण्य प्राप्त होगा, 
इसकी रचना करनेवालो कौ शुभ उन्नति होगी और स्वरग-लोक का निवास प्राप्त होगा । 
जबतक कूल पर्वत, समुद्र, रवि-चद्र, नक्षत्र, वेद, दिलश्ञाएं तथा ससार शोभायमान रहेंगे, 
तृबतक यह कथा शाइवत आतनद -समूह का निवास-स्थान वनी रहेगी । 


, बालकांड सामप्त : 


श्रीरंगनाथ रामाथण 


(अयोध्या कांड) 


१ राम-राज्यामिषेक का संकल्प 


महाराजाः दशस्थ अत्यत' शुभप्रद रीति। से राज्य का पालना करते थे । एक दिन 
उन्होने विचार किया, मेरा, पुत्र- सम, मेरे चारो। पुत्रों में शुभ-गुणनसपन्न, अतुल; यशस्वी,, 
सदा' दीन-दुखियो) की” चिता। करनेवाला; परहित का विचार करनेवाला, समस्त/ प्राणियों पर 
दयाः दिखानेवाला, चारो! पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए: यत्न करनेवाला, सतत सतुष्ट, प्रशसा- 
के योग्य गुणो से युक्त उचित क्रोध तथा प्रसाद गुणों से पूर्ण, शासन-शक्ति से समन्वित्त: 
गजन्तुरग” आदि/ के आरोहणः में दक्ष, विजयलस्मी से समन्वित, चतुर, इच्छित कार्यों को 
अविलब सपन्न करनेवाला, दीघे कोप से, रहित;, सेवक्ो: पर कृपा रखत्तेवाला, अतिस्थी, 
ईर्ष्या रहित, करुणा-सिधु, दूसर! के अच्छे- गुणो का आदर करनेवाला, वुद्धि में बृहस्पति- को 
भी परास्त करनेवाला, शुद्ध तेज में सूर्य के सदृश दीखनेवाला,, प्रजारजक, चंद्र के समान- 
शोभायमान, धनुर्वेद: तथा वेदशास्त्रो में- पारणत, न्याय! के मार्ग से ही धनाज॑न करने में निपुण, 
क्षमा में पृथ्वी! के समान औरु सकल-सद्गुण-सपन्न है। उसका राज-ठिलक कर देना चाहिए ॥? 
ऐसा विचार करके उन्होने वसिष्ठादि महामुनि, सुमत्र आदि, सचिव, पास-पडोस के- सजा, 
मित्र, वधु, नागरिक, जनपद के लोग; आश्वित, बुद्धिमानूु, सामत राजा, योद्धा, राजनीतिन्न 


धै 


छ्2 संगनत्थ एयश्यर 


आदि लोगो को राजसभा में वला भेजा । उनके समक्ष राजा घन-गर्भ र स्वर म बोल-- 
हमारे पूर्व इध्वाकु-बच्य के राजाजो ने बडी उत्तम रीति से इस पृथ्वी पर जासन किया था । 
उनके समान मेने भी इस राज्य-्मार को वडी क्षमता से वहन किया और आपके 
सहयोग से निजकुल-वर्म में निरत होकर मेने इसका पालन किया । यह विषय तो आपको 
ज्ञात ही है | मे आपस और एक वात कहना चाहता हूँ । साठ “हजार वर्ष तक मेने इस 
राज्य का पालन किया, सदर ब्वेत छत्र की छाया में रहते हुए वृद्ध हो गया हैं । भूमि- 
भार की अपेक्षा वृद्धावस्था का भार मुझपर अधिक हो गया हूँ । विकसित कमल के सदृथ 
मेरा शरीर कौमुदी के समान (पाडुर) हो गया है । केवल प्रताप बचा हुआ है | अत, 
प्रजा का पालन करने के लिए म॑ अपने प्ुश्र॒कल्याण राम, देवता-हितकाक्षी घीमानू, इदीवर- 
इयाम, कोटिसर्यप्रभावानू, सौदर्य में मन्‍्मथ को भी जोतनेवाले, जगदभिराम, राम का 
राजतिलक कर देना चाहता हूँ और राज-भार से अवकाश लेना चाहता हूँ । क्‍या आप 
इसको स्वीकार करेंगे ? 

घन-गर्जेव को सुनकर हर्पित होनेवाले वन-मयूरों की भाँति सभासदों में अत्यधिक 
उत्साह छा गया । कल-कल व्वनि होने लगी । प्रजा में प्रमुख भूसुरो ने परस्पर परामर्श 
करके सूर्यवशी राजा से कहा--हे राजन, आपके श्रेष्ठठचन सब लोगो के लिए हितकर, 
हृदयरजक तथा अभीष्टदायक हूँ | वे सव लोगो के लिए अग्नददययक हूँ । राजनीतिज्न, 
निर्मेल-धर् निपुण, जगत्‌ के बबु, दीनो के लिए कृपा-सिवु, गाति-सपन्न, सत्यत्रती, सतत 
विप्र-पृजा-निरत, सच्चरित्रवानू, नीति, प्रीति, निपुणता, क्षमा, ल्‍्याति, ऐंब्वयें, काति, दाति 
शाति आदि कितने ही सदुगुणों से आपसे भी श्रेष्ठ, लोकाभिराम राम को राजा बनाना 
सर्वेधा उचित है । वे तीनों लोको का ज्ञासन करने में समर्थ है, फिर इस लोक का शासन 
करना इनके लिए कौन बड़ी वात हूँ ? हमारी भी यही इच्छा है कि आप उनका राज- 
तलक कर दें । 

राजा ने ये वातें सुनी, तो उनका हर्ष दूदा हो गया । हर्पातिरेक से प्रफुल्लित 
होकर वे वसिष्ठ तथा वामदेव को देवकर बोले---हे अनघ, यह मथुमास अभीप्टप्रदायक है । 
अत, हम इसी मास में राम को समस्त साम्राज्य-लक्ष्मी का राजा बनायेंगें | आप उचित 
रीति से उसके लिए आवश्यक वस्तुएँ सचित करावें |” ये गतें सुनकर ऋषियों ने अभिपेकार्थ 
आवश्यक वस्तुओं का सचय करने के लिए बादमी भेजे | 

वसिप्ठ ने राजा की आज्ञा के अनुसार परिचारकों से कहा--तुम लोग, श्रेप्ठ 
स्वर्ण, रत्त, समस्त ओपविय, चदन, धवल पुष्प, मथु, घृत, खील (घान का लावा), नव 
ललित-बस्त्र, राजा के लिए योन्‍्य श्रेप्ठ रब, स्वर्ण-रत्नजटित जायुव, शुभ लक्षणों से युवत 
भद्रगज, झ्वेत अणश्च विजन घवल छत्र, चामर, श्रेप्ठ पताके, एक सा स्वर्ण कलण, स्वर्ण 
ख्गो से युक्त श्रेप्ठ वषम, व्याप्न-चर्म और अन्य आवशच्यक मगल- हवन-शाला में 
ले बातो । नगर के द्वार, राज-पव तथा सौध-बिखरो का अलकार करो। समस्त नगर को 
फूल-मालाओ, पताकाओ तथा तोरणो से सजाओों । कमन्ते-कम एक लाख भूसुरो (ब्राह्मणों) 
के भोजन की व्यवस्था करों । दान-्दक्षिणा आदि के लिए आवशध्यक घन प्रस्तुत रखो । 


उायोध्य/कांड ९ 


पूजा तथा उपहारो से नगर-देवताओ की अर्चना करो । नगर के सभी निवासी तथा वेश्याएँ, 
नगर के दूसरे फाटक के पास ढग से आकर खडे रहें। नगर के सभी सेवकों को सेवा के 
लिए उपस्थित रहने को सूचना दो ।” परिचारको ने वसिप्ठ के आदेशो का पालन करके 
उसकी सूचना वस्िष्ठ को दी । 
राजा ने सुमत्र आदि उत्तम सचिवों तथा स्गे-सवधियो को अलग-अलग बुलाकर 
उन्हें सकलप कह सुताया । उन्होने भी राजा के निश्चय का अनुमोदन किया । तब उन्होंने 
शीघ्र रघुराम को बुला भेजा और अपनी आँखों से स्नेंह-सुधा की वृष्टि करते हुए कहा-- 
है बत्स, प्रजा की प्रशसा प्राप्त करते हुए मेने दी्घ काल तक राज्य किया । दान, धर्म 
तथा यज्ञादि बडी निष्ठा से मेने पूरे किये और अत में तुम जैसे सद्गुण-सपन्न को पुत्र के 
रूप में प्राप्त किया । अब में राज का भार सँभालने में असमर्थ हो रहा हूँ । इसलिए 
में तुम्हारा राज-तिलक कर दूंगा। परसो ही राज्याभिषेक के लिए उपयुक्त शुभ मुहर्त्त है । 
सलिए तुम और सीता भक्ति के साथ उपवास करो ।' 
तब राम ने राजा को देखकर विनय तथा साहस के साथ कहा-- हें महाराज, मेरे 
लिए आपके चरण-कमलो की सेवा से बढकर कोई दूसरा राज्य इस ससार में हो नही 
सकता । आप अपने इन बिचारो को त्याग दीजिए ।' तब राजा ने कहा--हे वत्स, तुम 
पुण्य-चरित्र हो, पुण्य-धनी हो, सूर्यकुल के रत्न हो । तुम्हारें सिवा इस पृथ्वी का पालन 
करने के लिए योग्य और कौन हो सकता है? अत , हे अद्वितीय वीर तुम इस राज्य- 
भार को अवश्य संभालो ।' 
राम ने उनकी आज्ञा के सामने सिर झुकाया और अपने महल में चले गये । राजा 
भी सामत राजाओं, नागरिको तथा अन्य नातेंदारों को विदा करके अपने महल में गये । 
(वहाँ पहुँचकर) उन्होने सुमत्र के द्वारा श्रोराम को बुलवाया, उन्हें अपने पास 
विठाकर, आनदाश्रु बहाते हुए बोले--हे मेरे भाग्य-निधि, हे मेरे पुण्य-स्वरूप, मेरे तप के 
फल, हे मेरे पुत्र, मेने कुछ बुरे स्वप्न देखे है। मेने दुष्ट ग्रहों को तथा उल्का- 
पात होते देखा हैं। अत मेरा मन बहुत व्याकुल हो रहा है । अभी तुम इस पुण्य-योग' 
में ही राज-तिलक कर लो । इससे मेरी इच्छा पूर्ण होगी । विलब क्यो ? तुम्हारी उन्नति 
का समस्त ससार इच्छुक है ।' 
रामचद्र ने पिता की आज्ञा शिरोधारण करके, उन्हें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा 
लेकर वहाँ से विदा हुए । उन्होने अपनी माता, सुमित्रा तथा जानकी तथा लक्ष्मण को यह 
समाचार सुनाकर उन्हें आनद-सागर में डुबो दिया । उसके पद्चात्‌ पूर्ण-चन्द्रसदृश राम, 
सीता के साथ प्रफुल्लचित्त से अपने महल में गये । 
इसके पश्चात्‌ राजा ने वसिष्ठ से कहा कि आप राम के उपवास के लिए विधिवत्‌ 
सकलप कराइए । तब वसिष्ठ ब्रह्म-रथ पर आरूढ हो रामचन्द्र के महल के लिए रवाना हुए 
और अपने आगमन का समाचार देने के लिए एक शिष्य को पहले ही भेज दिया । 
उनके तीसरे फाटक तक पहुँचते-पहुँचते राम उनके स्वागतार्थ आ पहुँचे और वडी भक्ति 
से उस पुण्यात्मा को प्रणाम किया और बड़े हर्ष से उन्हें अत पुर में ले गये । वहाँ उन्होने 


'५६ एंग्नाथ रख्यापणग 


उस लोकम्व्य का उच्चित आदरन्सत्कार किया । वसिष्ठ ने पुण्याह-वाचन कराया और पुण्य- 
गसकल्प-पूर्वक उपवास ब्त का प्रारभम कराया.। -दक्षिणा के रूप «में *राम -से दस -हजार -यग्रायें 
लेकर वर्सिप्ठ “ने सारा समाचार राजा को कह सुनाया -और घर चले गये । 
राम ने बडे प्रसन्नचित्त से सीता के साथ स्तान आदि से निवृत्त होकर विष्णु -की 
रीति >के “लिए हवन किया, हुृवन-शेष को ग्रहण किया ज्औौर वसिष्ठ के आदेश के अनुसार 
सविष्णुगृह “में कुशासन पर 'एकनिष्ठ हो विष्णु का ध्यान “कस्ते हुए उपवास करते रहे । 
। अयोध्या “में -लोग बडे हहर्ष से आनदोत्सव की -तैयारी में -लग गये । कोई -मोतियों 
पसे चौक पूर रहा था, तो कोई न्अपने खरो का अलकार -कर रहा था :। कोई -मणिमय .ततोरण 
स्सजा रहा था,त्तो कोई फूलो से वितान बना रहा था । कुछ लोग “कड़े लग्रा रहे थे.) 
ज़ुछ ज़हाँ-तहाँ प्फूलन्मालाएँ लटका रहे थे,। कुछ एक दूसरे के अलकरण में मग्न थे .। कही 
लोग -दशस्थ की प्रशसा कर रहे थे, तो -कही इष्ट .देवताओो की पूजा -कर रहे थे । कुछ 
दान-पुण्य कर रहे थे और पुण्य |कथा-यगोष्ठियो -में -भगग ले रहे थे । जहाँ-तहाँ लोगी की 
“मीड़ “एकत्रित (होकर राम के गृुणो का गान कर रही -थी । -लोग उनकी सेवा करने के 
अलिए आतुरता प्रकट करते थे और भगवान्‌ से राम को -ही -राजा बनाने -की “प्रार्थना कर 
रहे थे । 
२ 'मंथरा “की *कुमंत्रणा 
उसी समय कैकेयी की दासी मथरा ने रनवास की छत पर से न्‍नगर का यह 
आनदोत्सव देखा । वह सोचने लगी--क्या कारण है कि आज नगर अद्भुत साजस्सज्जा ससे 
परिपूर्ण है । सभी नगरवासी सजे-घजे तथा प्रुफुल्ल दिखाई "पड़ रहें है '। कौसल्या के 
अत पुर की सभी स्त्रियाँ सुसज्जित होकर आनद-मग्न हो रही हे । जाने किस कारण ससे 
-आाज कौसल्या अगणित घन व्यय कर रही है । उसने आनद में न्मग्न राम की घाय से 
उूछकर यह जान लिया कि राम के राज-तिलक के लिए ही सारे नगर में उत्सव मनाया 
जा रहा हैं । तव उसने निश्चय किया कि वाल्यथावस्था “मैं रामने जो मेरी टाँग तोड दी थी, 
उसका बदला लेने का यही अच्छा अवसर हैं । इस प्रकार सोचकर वह “रानी ककेयी 
को सारा वृत्तात सुनाने के लिए उनके महल में गई । उस समय 'पद्मलोचना कैकेयी 
अपने क्रीडा-धर में हिडोले पर लेटी थी । मथरा ने उससे कहा--उँठिए महारानी, आपके 
किसी बात की चिंता ही नहीं हैं । यो कहंते हुए उसेने कैकेयी का हाथ पकड़कर उसे 
“उठाकर वैठाया ओर त्रिया-चरित्र रचती हुई बोली--आप तो श्वह कहंते हुए फूली रत 
समाती थी कि राजा मुझसे ही अधिक "प्रेम रखते हैँ '। वह 'भूठा सिद्ध हो गया हैँ '। 
महाराजा ने अपनी बड़ी रानी के भय से आपके अम में डालकर, -मरत को -“परदेश भेज 
“दिया है और 'रघुराम का 'राज-तिलक “करने की वात स्सोच रहे है । यंदि “यही वात हुई, तो 
“आपका जीवन निरथंक हैँ । राजाओं का पिव्वास कभी नही करना चाहिए । आप “कूली- 
' फूली क्यों फिरती है ? ऐसा कर, चचक और कपटी पुरुष 'मेने कही देखा नही है । “वे 
कीसे आपके पंति हे ? वे तो आपके क्र बत्रु हें '। यदि जाप अपनी सौत के पुत्र की 
समस्त ' पृथ्वी का राजा बनने देंगी, त्तो आपको, आपके पुत्र "को तथा मुझे, दुःख के सिवा 


फ्योषध्य/कोड है 


'सुख नहीं मिलेगा । आपकी भलाई का विचार करके आपके पिता ने मुझे भेजा, तो स्नेह 
के कारण म॑ यहाँ आई हूँ । आपकी भलाई मेरी भलाई है, आपका अभाव मेरा अभावन । 
मेने आपकी भलाई की बात आपसे कह दी। आप ऐसा कोई यत्न कीजिए जिससे कि 
आपका पुत्र इस ससार में जीवित रहे 
कैकेयी ने ये वातें सुनी तो अत्यन्त हर्ष से उसकी प्रह्मसा करते हुए उसे गले से 
“लगा लिया औ” कहा--हे सखी ! राम के राज-तिलक का शुभ समाचार देकर तुमने मेरे 
कर्णपुटो -में सुधावृष्टिली कर दी । तुम्हारे साथ मेरी मित्रता आज सफल हुई | अब तुम 
अपने वक्र वचनो को छोड दो । भरत की अपेक्षा उसका अग्रज मेरे प्रति विशेष *श्रद्धा 
रखता हैँ । तुमने यह शुभ-समाचार मुझे देकर बहुत अच्छा किया ।' इस प्रकार कहकर 
उसने मथरा को नवरत्त-खचित अपने सोने का कड़ा उपहार के रूप में दिया । किन्तु, उस 
'कपट स्त्री ने उस कडे को दूर फेंककर अपने पापपूर्ण हृदय का क्रोध एव जलन अकट 
करते हुए कहा--हे कंकेयी । आप मन-ही-सन फूली हुई है, मानो कोई उत्तम कार्य 
हो रहा है । आपने यह उपहार मुझ्के किसलिए दिया ? आपकी भलाई के लिए जो परामर्श 


ह 


मेने दिया, उसके विषय में विचार किये बिना ही आप ऐसा अलाप क्यो करती है ? में आपके 
स्वभाव के बारे में क्‍या कटँं ? क्‍या अपना अहित करनेवाला धर्म, कोई घधर्म है ? 
आँखो को हानि पहुँचानेवाला काजल किस काम का ? कही इस ससार में ऐसे भी लोग हे, 
जो सौत के पुत्रो के हित की कामना करते हे ? यदि आपकी सौत का पूत्र सामाज्य 
का स्वामी हुआ, तो सभी राजा, -नावेदार, प्रजा तथा मत्री राम की सेवा में लगे रहेंगे । 
गज, तुरग आदि सेना उनके वह्य में हो जायगी । उसके पद्चात्‌ दशरथ भी स्वतत्र नहीं 
रह सकेंगे। तब शशिमखी कौसल्या-समस्त ऐश्वर्य का उपभोग करेगी और -आप उनकी सौत 
“होती हुई एक पगली की -त्रह कैसे रह पार्येगी । इतना ही “नही, आपको उनकी आज्ञा 
'का पालन 'क़रते हुए उनकी दासी बनकर रहना पडेगा । भरत को उस रघुपति से भय 
खाते हुए एक भृत्य के समान रहना पडेगा । आपकी पृत्रवध्‌ -को राज-रावी सीता की 
सेवा करनी पडेगी । यदि यही हुआ, तो आपका जन्म निरथंक हुआ । इसका उपाय यह है 
कि राम को वनवास के लिए भिजवा दीजिए और भरत का राज-तिलक करवाइए ।॥' 
तब कैकेयी बोली--हाय, महाराज “मुझे :इतनी स्वृज़त्रता क्‍यों देने लगे ? में उनसे 
ऐसी शआर्थना कैसे करूँ ? नकरूँ भी तो वे भेरी प्रार्थना क्यो मानेंगे ? यह कैसी बात हूँ ? 
तुम जो -भी कहो, यह काम नहीं होने का । में राम से से कहेँ कि त्तुम वन में जाकर 
निवास करो ।! 
नतब मथरा ब्ञपनरी पपाप-बुद्धि “को प्रकट करती हुई बोली--हे सुन्दरी, क्या आप 
“इस न्‍बात क़ो भूल गई कि हावरासुर और इंद्र के युद्ध में इद्र की सहायता करने के लिए 
अपनी सेनाओ के साथ जाते समय राजा आपको भी अपने साथ ले गये थे । महाराजा 
दशरथ ने रात्रि के -समय “उस राक्षस का सामना किया था । राक्षस ने क्रोध में आकर 
विभिन्न अकार की भायाओं से राजा का वध करने का प्रयत्न किया था, किन्तु आपने 
घवलाग न्नामक मुनि की कृपा से प्राप्त शक्ति की सहायता से उस राक्षस की मायाओरो को 


छ्८द स्यनाथ एयायर 


दूर कर दिया था और राजा को उस राक्षस के तेज वाणों से आहत होने से बचाया था । 
राजा ने सतुप्ट होकर आपको दो वर दिये थे । जापने ही खुद यह सारा वृत्तात मुझे 
सुनाया था । भले ही आप इसे भूल जायें, में कैसे भूल सकती हूँ ? अत आप राजा से 
दो वर माँगिए--एक तो बह कि कौसल्या का पुत्र राज-पाट छोडकर चौदह वर्ष तक मुनियों 
का-सा जीवन व्यतीत करते हुए भयकर वनो में रहे, और दूसरा, आपका पुत्र इस पृथ्वी 
पर ज्ञासन करे । आपके वर माँगने पर राजा बहुत गरिडगिड़ायेंगे । फिर भी, आप सूर्खे 
के समान मत रहें । सत्य की दुहाई देकर दृढ सकल्‍प से आप इस कार्य को सिद्ध 
कर लीजिए । आपके पति असत्य से डरते हे, उसपर भी आपसे उनका अत्यधिक प्रेम है । 
इसलिए वें आपके वचनों का अतिक्रमण नही करेंगे । अवध्य आपकी वात मान लेंगे ॥” 
इन वातो से प्रसन्न होकर कैकेयो ने मथरा से कहा-तुम्हारी जैसी सखी, साथिन 

और गुणवतो को मेने कही नही देखा है । हें उत्तम नारी, जिन वरो के सबंध में मेने 
तुमसे कहा था, उन्हें तों में भूल ही गई थी । तुमने जैसे सोचा, वैसे मेरा पुत्र यदि इस 
समस्त पृथ्वी का राजा वनेगा, तो में तुम्हारे कूबड़ को शुद्ध स्वर्ण से अच्छी तरह सजाऊँगी, 
तुम्हारे मुख-चन्द्र पर कस्तूरों-तिलक करूँगो और तुम्हारे गरार पर असख्य आभूषण पहनाकर 
तुम्हें अलकृत करूँगी । हे सखी ! इस प्रकार सज-वजकर तुम मन्मथ की स्त्री के समान 
विचरोगी, तो सभी दासियाँ तुम्हारी आजा का पालन करती रहेंगी । में ऐसी व्यवस्था 

कर दूँगी ।' 
स॒ प्रकार, मथरा से प्रिय वचन कहने के पद्चात्‌ कैकेयी अपने कक्ष में चली गई। 
उसने अपने समस्त आभूषण उतार दिये, माथे पर कस्तूरी का गाढा लेप लगाया, मलिन 
वस्त्र पहने और अत्यन्त क्रोध घारण किये फर्ण पर पड़ी रही। अपनी मत्रणा की सफलता 
से सतुप्ट होनेवाली मथरा को देखकर कैकेबी वोली---जवतक राजा राम को बुलाकर 
उसे वन में जानें की आाज्ञा देकर नहीं भेजेंगे और भरत का राज-तिलक पही 
करेंगे, तवततक मे अन्न-जल नही ग्रहण करूँगी । जितने भी स्वर्णामूषण दें, में उन्हें नहीं 
लूंगी और यहाँ से हदूँगी भी नही । यो कहते हुए वह मन-ही-मन बहुत कुद्ध होकर 
पडी रही । 
३ केकेयी के महल में दशरथ का आगमन 

राबव के राज-तिलक का समाचार कंकेयी को सुनाने के उद्देश्य से दशरथ उस दिन 

रात को वहाँ (कैंकेयों के महल में) आये । स्वर्ण-रत्वजटित किवाड़ो तथा कक्षो, कस्तूरी, 
चंदन, कर्पूर की सुगधि से युक्त तथा नाना रत्नों की कान्ति से सुशोभित सौधो को पार 
करके वे रग-महल के निकट पहुँचे । कैकेयी को वहाँ न देखकर दशरथ ने सेवक से पूछा । 
उसने दु.ख प्रकट करते हुए हाथ जोडकर कहा--देव ! देवी न जाने किस कारण से 

कोप-भवन में चली गई हे ॥ 

ये बातें वच्चरथ के कानों को घनप की उग्र टकार की भाति भयकर लगी । उनका 

मुंह पीला पड़ गया । कैकेयी के प्रति उनका प्रेम हिगुण हो उठा । घीरे-घीरें उन्होंने 
क्ोप-भवन में प्रवेश किया गौर स्वर्गं-्लोक से पृथ्वी पर उतरकर वहाँ लेढी हुई अप्सरा 


् 


अयीध्यशकैडे ७६ 


की भाँति, कंशों को फैलाये फर्श पर पडी हुई कमलमुखी कैकेयी को देखकर राजा सन्न 
रह गये । उन्हें बडी वेदना का अनुभव हुआ । वडे दीन भाव से वे उसके निकट पहुंचे, 
उसके शरीर का स्पर्श करके देखा और काम-पीडित होकर उससे प्रार्थना करने लगे-- 
“हें कमलाक्षी, हे चन्द्रवदनी, हे भूमरो केसे केशवाली, इतना कोप क्यो ? अत्यत मुद्ु 
पर्यक पर लेटनेवाली, तुम्हें लेटनें के लिए यह कडी भूमि क्यो ? कोमल दुकूलो के रहते, 
तुमने ऐसे मेले वस्त्र क्यों पहने हे ” कनकशलाका-सी अपनी देह पर तुमने आभूषण धारण 
क्यो नहीं किये ? उदधि-सुत चंद्रमा की चाँदनी के समान उज्ज्वल तुम्हारे ललाट पर यह 
लेप क्यो ? तुम्हारे मन में ऐसा विचार क्यों उत्पन्न हुआ ? प्रतिदिन की भाँति तुम अपने घने 
तथा नीले केशो में माँग काढकर उन्हें सजाती क्यो नहीं ? पद्मराग मणि की लालिमा 
को परास्त करनेवाले अपने अरुणाघरो को ताबूल-चवण स अलकृत क्यो नहीं करती ? 
तुम्हारे मुख-चद्र में स्वर्ण-पुष्पो के समान प्रफुल्लित होनेवाली मुस्कान क्यो नहीं दीखती ? 
हे प्रियेिं, किसलिए तुम मन छोटा किये हुए हो ? इतनी सतप्त क्यों हो ? क़िसने तुम्हें 
कंटुवचन कहे ? किसने तुम्हारी बातो का विरोध किया ? हे कमलनयनी । उनके नाम 
बताओ । चाहे वे कोई भा हो, में उन्हें दण्ड दूंगा ।” इस प्रकार कहते हुए आँखों में 
उमडनेवाले आँसुओ को पोछते हुए वे. बोले---हे सुन्दरी, एक अनाथ की तरह तुम इस 
प्रकार भूमि पर क्यो लोट रही हो ” बताओ कि यह काम-पीडा है अथवा किसी भयकर 
रोग का प्रकोप है ? क्यो सकोच कर रही हो। कहो तो वैद्य आकर तुरत तुम्हें स्वस्थ करेंगे । 
है ललितागी ! तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो, में उसे पूरा करूँगा । तुम्हारे 
लिए में अवध्य पुण्यात्माओ का भी वध करूँगा । वध्य दुर्जनो को दण्ड देकर तुम्हारी 
बात रखूंगा । यदि तुम चाहो, तो रक को राजा बनाऊँगा। तुम्हारे क्रोध का पात्र घनी को भी 
दरिद्र बनाऊँगा । जब में और मेरे परिवार के अन्य लोग तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने 
के लिए तैयार हे, तब इस प्रकार क्यो रहती हो * हे सुन्दरी ! मेरी बात सुनो, किचित्‌ 
मूँह उठाकर मेरी ओर देखो, ताकि मुझे शाति मिल जाय । तुम चाहो तो में अपने प्राण 
भी देने को प्रस्तुत हूँ ॥” 
दशरथ की ये बातें सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई । वह अपने पति का प्रेम जानती 
ही थी इसलिए उसने क्षीण स्वर में राजा से कहा--हे देव ! यदि मुझे यह वचन दें 
कि आप मेरे कथन के अनुसार कारें करेंगे, तो में अपने मन की इच्छा कहूँगी ।' 


राजा ने कहा--जो धनुरविद्या में असमान है, जो धर्म का पालन करता हैं, जिसे 
विना देखे में एक क्षण भी जी नहीं सकता और जिसको में निरतर भक्ति से भजता 
(हता हूँ, उस राघव की सौगध खाकर कहता हूँ कि मे तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा।' 

कैकेयी ने पवर, अग्नि, शशि तथा नभ को साक्षी के रूप में मानते हुए दशरथ 
के मन की आतुरता का ज्ञान रखते हुए निष्ठर होकर कहा--हे राजन्‌ आपने देंवासुर- 
पुद्ध में मुके दो वर दिये थे । कदाचित्‌ आप उन्हें भूल गये हे । मे अब उन दोनो वरो 
को माँगना चाहती हूँ ।' 


रद रंगना/थ सशायायणे 


४. दशरथ से केकेयी का वर माँगना 

आप'रविकुल में उत्पन्न महाराज है । उस कुल के प्रथम' राजाओं की अपेक्षा आप 
अधिक पुण्यात्मा हे। आप असत्य नहीं कहेंगे और अपना वचन भी नही छोडेंगे | अंत, 
मुझे वे दोनों वर दीजिए । पहले वर से आप भरत का' राज-तिलक कर दीजिए, और 
दूसरे” वर से'आप राम को चौदह वर्ष तक तपस्वी के रूप में वन में निवास करने के लिए 
भेज दीजिए ॥! 

इस. वचनो को सुनते ही राजा स्तभित रह गये । दुखसे वे तुरत मूच्छित' 
हो गये । बहुत समय के वाद उनकी चेतना लौटी तो वें वोले--'हे कोमलागी, कैकय-वद् 
में जन्म लेकर इस प्रकार के वचन तुम्हारे मूह से कैसे निकले ? रामने तुम्हें क्या हानि 
पहुँचाई है कि तुम राम को अरण्य-वास देना चाहती हो ? वह कौसल्या की अपेक्षा तुम्हें 
अधिक मानता है, तुम्हारी सेवा करता है और तुम्हारा आदेश मानता है । ऐसे सद्गुणः 
सपन्न राम, को' निप्ठुर होकर वन जाने का आदेश कंसे देती हो ? तुम्ही कहो, में उसे वन! 
जाने का आदेश कैसे दे सकता हूँ ? ऐसे महापुरुष राम को जगल भेजने के वाद मेरे प्राण' कैसे 
टिंके रहेंगे ” तुम राजपुत्री हो; ऐसा समझकर मेने तुम्हारा पाणिग्रहण किया था।। कितु 
तुम काली नागिन सिद्ध हो रही हो । तुम चाहो, जो में अपना सारा राज्य और अपने 
प्राण दे दूँगा, किंतु राम को वन जाने का आदेश न दे सकूंगा | इस वृद्ध, दीन, अनाथ 
तथा दुर्वबल को दु'ख से. बचाओ । में तुम्हारे चरणों को प्रणाम करता हूँ। में राम/के वियोगा 
में जीवित नहीं रहँगा । इसलिए इस पाप-कल्पना को छोड़ दो ॥” 

तब कैकेयी क्रोध में आकर कहनें लगी --हे राजन ! आप सत्यनिष्ठ, परात्रमी 
और ओजस्वी हैं ॥ ऐसे, आपको असत्य कहना क्या: शोभा देता हैं ? आपने इतने सारे 
देवताओ के समक्ष सोगध खाई है । आप कैसे राजा हे ? एक कबूतर के लिए शिवि ने 
अपने शरीर का सारा' मास काटकर बाज को दे दिया था | क्‍या आप इसे नही जानते ? 
क्या अलक नामक राजा ने बड़े प्रेम से क्षोणिदेव को अपने नेत्र नहीं दिये थे ? क्‍या 
उत्तुग लहरो से युक्त समुद्र, वेला की मर्यादा के भीतर आवद्ध नहीं हुआ ? उनको छोड़ 
दीजिए । आपके पूर्वज कौतुक के लिए भी, स्वप्न में भी, कभी भूठ नहीं वोले । आप 
इक्ष्वाकु-च्रश के होते हुए भी कौसल्या के भय से असत्य-भाषण करते हे । असत्यभाषी 
कही पुरुष कहलाने योग्य हैं ? आपने असत्य कहा । अब आप मुझे पा नहीं सकते । में 
अब स्वतत्र होकर विष-पान करूंगी और मर जाऊंगी । उसके पदचात्‌ आप भरत का वध 
करा दीजिए और राम का तिलक करके कौसल्या के साथ सुख से रहिए ।” 

इस प्रकार के ककेयी के कटुबचनों से राजा अत्यत सतप्त हो गये । उनके मुख 
की काति जाती रही, उनका विवेक जाता रहा । वे कैकेयी से वोले--हे कैकेयी ! तुम्हारे 
मन में ऐसी पाप-कल्पना और ऐसी मन्द बुद्धि कंसे उत्पन्न हुई ! ज्येष्ठ के रहते हुए कही 
कनिष्ठ अविनीत होकर पृथ्वी का पालन करेगा ” इतना क्यों, तुम्हारा घर्म-निर्त भरत 
तुम्हारे इस पाप-पूर्ण वचन को कंसे स्वीकार करेगा ? हमारे कुल की रीति का विचार करो ॥' 
शोक-पीड़ित मुझे निप्ठुर होकर मत मारो । सतत गृहिणी-धर्म का पालन करते हुएं, 


ऋ/योध्य/कांड दए 
भंक्ति और हित का विचार करते हुए सखी की तरह, माता के समान, दासी की 
भाँति, बहन की-सी, भिन्न-भिन्न प्रकार से मेरी सेवा करनेवाली कौसल्या अपने पुत्र के 
वियोग में कस्ते जीवित रह सकेंगी ” सौदामिनी तथा लता-सदृश शरीरवाली वैदेही किस 
प्रकार यह दुख सह सकेगी ? सौमित्र तथा उसकी माँ इस दुखद समाचार को कैसे सहन 
कर सकेंगे ” राम के राज-तिलक की अपेक्षा करनेवाले नागरिक जब उत्सव मनाने में 
सलग्न हे, तब यदि मे राम को वन भेज दूं, तो क्‍या वे नागरिक मुझे अपशब्द नही कहेंगे ? 
अपनी इस प्रार्थताी से समस्त लोगो का अहित करते हुए तुम कौन-सा सुख भोगोगी ? 
एक वात और है । हे रमणी! तुम उसे अवश्य सुनो । कमल केसे नेत्रवाले, मधुर 
मुस्कान से युक्त मुखवाले, बलिष्ठ, आजानुबाहु, चद्र-प्म सौंदर्यवाले, नीलोत्पल की- 
सी दारीर-कान्तिवाले, शीतल दृष्टियो को विकीर्ण करनेवाले, सुधा-सम वचन बोलनेवाले, 
सदा बुधजनों का हित ही सोचनेवाले, सतत मेरी सेवा में सलग्न रहनेवाले, धर्म-रूपी, 
भार्गव राम को जीतनेवाले, सदुगुण-सपन्न, सौदर्यवानू, शातधाम, रवि-सम उज्ज्वल, राम को 
छोडकर में एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूगा । हे कमलाक्षी ! ऐसे राम को क्‍या तुम 
नही जानती ? उस उत्तम पुरुष को वन भेजते ही मेरे प्राण निकल जायेंगे । तुम कितनी 
पापिन हो ? कितनी कठोर हो ? कितनी मूर्खा हो ” कितनी भयकर राक्षसी हो ? हृ 
क्रर नारी तुम्हारे मन में इतना कल्मष क्‍यों हैँ ? साध्वी होते हुए मूर्खा की तरह क्‍यों 
ऐसी इच्छा करती हो ” तुम प्राणापहरण करनेवाली काह्ररात्रि हो, स्त्री नहीं । 
राम कैसे पैदल वन में जायगा ? सबसे विलग होकर वन में कंसे रहेगा ? सुकोमल 
दय्या पर शयन करनेवाला पुरुष तृण-शय्या पर किस प्रकार सो सकेगा ” बधबुओ के साथ 
पक्ति में बैठकर अपना इच्छित भोजन करनेवाला राम, कदन्‍मूल का आहार कैसे पसंद 
करेगा ? हे रमणी ! तुम अपने परम भक्‍त राम का बुरा मत सोचो । उसे क्षमा करो ।” 


इस प्रकार प्रार्थना करते हुए दशरथ बडे दुख के साथ उसके पैरो पर गिर पडे । 
लेकिन उसने अपने पैर हटाते हुए उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की । तव राजा भूमि पर 
गिर पडे और लोटने लगे । किन्तु कैकेयी ने उसकी भी परवाह किये विना ही राजा 
दशरथ को देखकर कहा-हे राजन्‌' अब इन कपट-वचनो को बद कीजिए । अब व्यर्थ 
के छल-कपट से कोई लाभ नहीं होगा । धर्म को त्यागिए, सत्य को छोड दीजिए और 
अपने निर्मल यश को मिट्टी में मिलाकर असत्य वचन कहिए कि मैने तुम्हें वर नही दिये । 
उसके बाद आप अपने पुत्र तथा पत्नियों के साथ सुख से रहिए । में अपने पुत्र भरत 
के साथ प्राण तजूंगी ।' 

तब राजा विना प्रत्युत्तर दिये, मन-ही-मन दुखी होते हुए, सिर भुकाये बैठे रहे । 
इनने में प्रभात हो गया । मगल-वाद्य बजने लगे । वन्दी-जन के स्तुति-पाठ होने लगे । 
राम-सीता ने कर्पूर-चन्दत की सुगधि से सुवासित जल में स्नान किया, दिव्य वस्त्राभरण 
पहने और शची-समेत इन्द्र के समान पूर्ण तेजस्वी दिखाई देने लगे । अभिषेक-मण्डप में 
वस्तिष्ठ आदि मुनि अछवती आदि सुमगलियाँ, घीमान्‌ मत्री तया अन्यान्य चक्रवर्त्ती राजा 
व्राजवान थे । वसिष्ठ ते परयललव, पचवल्कल, पचामृत, भद्गगज ( राजा का हाथी ), 


९६ 


८२ र॑ंग्नाथ ए/यि!यप 


भाठ कन्याएँ, हेम ऋक्ष, औदुम्बर (यूलर) की पीठिका, गगादि तीर्थों का जल तथा अन्य मंगत- 
वस्तुओो को मेँगाबा, श्रेष्ठ रत्ताभूषणा को वेद-विधि से दान कराया, एक लाख कन्याएं, 
एक लाख गायें, एक लाख ऊँट मेंगाये, जप आदि कराया, गाति-पाठ कराया, हवन भादि 
सपन्न किया और शुभ मुहूर्त को आसन्न देखकर राजा को लिवा लाने के लिए सुमत्र को 
भेजा । 

सुमत्र कैकेयी के अंत-पुर में गया जौर झयन-कक्ष के किवाड़ के पास खडे होकर 
निवेदन किया --हे देव ! सूर्योदय हो रहा हैं । श्रीराम के राज-तिलक का मुहूत्ते निकट 
जा रहा हैं । अत. आप ज्ञीन्न पचारें | हे राजन्‌ ! अभिषेक-मण्डप में मुनि, राजा तथा 
अन्य महात्मा उपस्थित है । पुरजन विवुध तथा नातेदार आपके आगमन की शअ्रतीक्षा कर 


इन बातों को सुनकर राजा सोचने लगें--जव तुम भी मुझे दु.ख पहुचान चाने के लिए 
आये हो, मानों अब तक मृभे कोई दुख ही नही हैं । यो सोचकर वें चुपचाप लेटे र रहे । 
तव कैकेयी ने सुमत्र से कहा--तुम जीघ्र जाकर राम को यहाँ ले आगजो । यह राजा 
का बादेश हैं । तुरत सुमत्र वहाँ से चला गबा । 

समत्र कैकेयी के अत-पुर से उस राज-मार्ग से जाने लगा, जो जीतल चदन-जल से 
सिचित आँगन, ध्वजाजओों से अलकृत गुृहो, चदन, अगरु तथा धूप से सुगधित वायु, मद पवन 
से डोलनेवाली पुप्प-मालाओ, प्रत्येक गृहद्धार पर स्थापित कदली-बृक्षो, अतुलित मणि-तोरणों 
और उत्साह-पूर्ण पुरजनो से भरा हुआ, दुर्गम दीख रहा था । उस मार्ग से होकर वह 
रामचन्द्र के उस अतथुर के पास जा पहुँचा, जो इच्द्रमवत का भी परिहास करता हुआ 
कुबेर के महल के समान अतुल वेमव-लक्ष्मी से समन्वित था । वहाँ पहुंचकर उसने राम 
को अपने आने का समाचार कहला भेजा और उनकी जनुमति पाकर भीतर गया ॥ वहाँ 
उसने तारा से समोभित शशि के समान दीखनेवालें, सीता से युक्त रामचद्र को देखकर 
उन्हें प्रणाम किया जौर कहा-- हैं देव ! महाराज दशरय देवी कैकेयी के गृह में आपको 
लिवा लाने के लिए मुझे भेजा हैँ । 

राम मुस्कराते हुए जानकी को वही छोड़कर लक्ष्मण के साथ रथ पर आहूढ़ होकर 
कंकेयी के महल की ओर रवाना हुए । उनके पीछे चतुरग्रिणी सेना चली । अतुल वाद्य 
बजने लगे, वन्दीजन स्तुति-पाठ करने लगे और सुमग्लियाँ पुप्प-वर्षा करने लगी । नगर- 
निवासी जयजयकार करने लगे । इस प्रकार, वे बढ़े वेग से राजा के अतपुर के पास जा 
पहुँचे, ओर स्व से उतरकर उन्होंने कैकेयी के भवन में प्रवेश किया । 

४ केकेयी के मवन में राम का दशरथ से सेंट करना 

कैकेयी के भवन में जाकर राम ने देखा कि महाराज दशरथ सिर भुकाय, पाडुर- 
मख में सखनेवाले जोठो को बाद्र करते हुए, सारा तेंज खोकर सतत अश्ु-धारा बहावे हुए 
शोक-सतप्त बैठे हे | राम ने उनके निकट पहुँचकर अत्यत शकाकुल-चित्त से उन्हें प्रणाम 
किया और उसके पबच्चात्‌ कैकेयी को प्रणाम किया । फिर, अत्यतव सभूमित तथा व्याकुल 
होकर, भय तथा विह्वलता से द्यमचद्र बोले--हे देवी, यह कया बात हैं कि महाराज 


अयोध्य/कोड द्र्३ 


मेरी ओर देखते भी नही हे । मेरा क्या अपराध है ? यह खिन्नता, यह चिंता जौर दुख 
राजा को किस कारण से हो रहे है ” तब कैकेयी ने कहा--हे राम, यदि तुम मानोगे, 
तो में राजा की इच्छा तुम्हें बतलाऊँ ।” रघुराम ने कहा--हे माता, आप क्षपया विस्तार 
से सुनाइए कि वह कौन-सी बात है ? में पिता के आदेश से भयकर अग्नि-ज्वालाओ में 
या विष के समुद्र में कूद सकता हूँ या विष भी खा सकता हूँ । इसको सत्य मार्नें और 


विना सकोच के कहें ।' 


तब कैकेयी राम को देखकर किचित्‌ भी ममता-मोह के बिना बोली--दिवासुर- 
सग्राम में राजा ने दया करके मुझे दो वर दिये थे । अब मेने उन दोनो वरो को देने की 
प्रार्थना 'की । एक वर से मेने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य माँगा और दूसरे से तुम्हें 
चौदह वर्ष तक वन-वास देने की प्रार्थना की । राजा ने वर देना तो स्वीकार किया, 
किन्तु तुम्हें अपना आदेश सुनाने में हिंचक्तें है । यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे पिता को 
'असत्य-भाषण का दोष न लगे, तो तुम तुरत राजकुमार का वेब त्याग दो और वल्कल 
तथा जटाएँ धारण करके तपस्वी के रूप में वनवास के लिए चले जाओ ।' 

इन बातो को सुनकर राम के मूृखपर मद हँसी लास्थ करने लगी । उनके बचनों 
म किसी भी प्रकार का मालिन्य नहीं आया । दया, त्याग और गरिमा दिखाते हुए परम 
पुण्यात्मा रामचद्र बोले--हे माता, इस प्रकार की भाज्ञा देनेवाले सू्यंवश के तिलक मेरे 
पिता हुँ और राज्य का अधिकारी होगा मेरा भाई । फिर, आपकी इच्छा में बाघा क्यो पडे ? 
हाय ! आप कितनी भोली हैँ! इस छोटी-सी बात के लिए सूर्यवशी राजा को मन 
में चितित होने की क्‍या आवश्यकता हैँ ”? अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करने- 
वाला कही पुत्र कहलाने योग्य हैं ” वह तो ' एक ज्ञाति-विरोधी है । मेरे और मेरे भाई 
में कोई भेद नहीं हैं । इस पृथ्वी का भार वहन करने के लिए जिस पुण्यात्मा को आपने 
(नियत किया है, उस भरत के लिए म॑ अपने प्राण भी देने के लिए प्रस्तुत हूँ, इस राज्य 
की क्या गिनती * 

राम की बातो से अत्यत हित होकर कैकेयी बोली--हे राजकुमार, तब में भरत 
को बुला भेजूंगी । तुम तुरत वन के लिए रवाना हो जाओ । यहाँ से तुम्हारे जाने तक 
महाराज न भोजन करेंगे, न बोलेंगे, न उठेंगे ही । वे इसी प्रकार पडे रहेंगे ।' 

कैकेयी के इस प्रकार कहते ही राजा ने कहा--हाय, ऐसी कट्क्तियाँ भी क्‍या 
उचित है ? और वे तुरत मूच्छित हो गये । तब राम ने तुरत उन्हें पकड लिया और 
शैत्योपचारों के उपरान्त, जब उनकी चेतना लौटी, तब उन्हें अच्छी तरह समभात हुए 
कैकेयी की ओर देखकर अत्यत हर्ष से बोले--आपको इतनी चिता क्यो हो रही है ? 
मेरे लिए यह कौन बडा काम है ? आप मन में किसी प्रकार का सदेह मत कीजिए । 
मे तो विवेक के साथ धर्म का पालन करूँगा, कभी धर्म का उल्लघन नहीं करूँगा | राजा 
की आज्ञा यदि मुझे नहीं मिलेगी, तो में आपकी आज्ञा का पालन करूँगा | यह सच 
भानिए । शीघ्रगामी अब्वारोही दूतो को भेजकर इसी शुभ मुदहत्ते में भरत को वुलवाकर 
उसका राज-तिलक कर दीजिए । में अभी वन के लिए प्रस्थान करता हूँ ।' 


८9 रंगन/थ एयायण 


इस प्रकार कहने के उपरान्त ग्रफुल्ल-मुखचद्र से राम ने कंकेयी की परिक्रमा की 
और कहा--में अपनी माता, माता सुमित्रा तथा जानकी को यह समाचार सुनाऊंगा और 
उन्हें सात्वता देकर अवश्य वन में चला जाऊँगा । आप मन में सदेह न कीजिए । यो 
कहकर उन्होने राजा तथा कैकेयी को प्रणाम किया और लक्ष्मण के साथ वहाँ से 
चल पड़े । 

राम ने राज-तिलक के लिए संचित सभी मगल-द्वव्यों की परिक्रमा करके उनको 
प्रणाम किया । अचल तथा विकार-रहित चित्त से वे अपनी माता को यह समाचार सुनाने 
के लिए चले । तबतक अन्त पुर में यह समाचार फैल गया कि लोकवद्य राम राजन्पाट 
छोड़कर वन जा रहे हे । दशरथ की अन्य स्त्रियाँ आपस में कहने लगी--राम अपनी 
माता कौसल्या के प्रति जो भक्ति दिखाते हूँ, वही भक्ति हमारे प्रति भी रखते हैँ । ऐसे 
सद्गुणालकार, महान्‌ उदार-चेता, हिमाचल के समान घीर, उस महान्‌ वीर पुत्र-रत्न को 
हाय | राजा ने वनवास की आज्ञा कैसे दी ? पागल की तरह राम को वनवास के दुखो 
में भेजना कहाँ तक उचित है । इस प्रकार, महाराजा की निंदा करते हुए सभी स्त्रियाँ 
शोक करने लगी | 

उसी समय राम ने कौसल्या के अत-पुर में प्रवेश किया । उससे पूर्व कौसल्या ने 
अभिषेक के निर्विष्न सपन्न होने के निमित्त जप, शञाति, हवन आदि को एकनिष्ठ होकर पूरा 
किया था और भक्ति-युक्त हो जनाद॑न से प्रार्थना कर रही थी । राम के आगमन से वे 
अत्यत प्रसन्न हुईं । सुमगलियों के साथ फूल लिये हुए वे सामने आईं और विधिवत्‌ 
मगलाचार आदि पूरे किये । रामचंद्र ने उनके चरण छुए। उन्होने राम को उठाकर गले से 
लगा लिया और आश्ञीर्वाद दिया--हे पुत्र, तुम चिरायु, सुयज्ञ एवं राज्य-लाभ करो । 


६. कौसल्या का दुश्ख 

अपनी माता कोसल्या को देखकर राम अत्यत दीन होकर बोलें--हें माता, आपको, 
माता सुमित्रा को तथा मैथिली को भय उत्पन्न करनेवाली एक घटना घटी है । में उसे 
आपको सुनाऊंगा । आप घैर्य के साथ सुनिए | किसी समय युद्ध में माता कैकेयी ने 
महाराज से दो वर प्राप्त किये थे। उन्होने अभी वे दोनो वर राजा से माँगे है | एक वर 
से उन्होंने अपने पुत्र का राज-तिलक माँगा और दूसरे से मेरा वन-वास चाहा हैं। इस पर 
महाराजा अत्यत शोक-सतप्त हो गये हे । पिता के वचनो की रक्षा के लिए मेने चौदह 
वर्षों तक वन में रहने का निश्चय किया हैं ।' 

इन बातो को सुनकर कौसल्या मन-ही-मन दुखी होकर, स्तभित हो गईं । उनके 
मुख की कान्ति उतर गई और गला रुँंच गया । वे काप्ठ की तरह चेष्टाहीन हो गईं 
और चीत्कार करती हुईं जड़ से उखाडी हुई लता के समान मूच्छिंत होकर गिर पडी । 
राम ने घवडाकर बड़ी भक्ति से उन्हें उठाया, उनके शरीर पर लगी हुई धूल पोछी और 
उन्हें एक सुन्दर आसन पर विठाया । इसके पह्चात्‌ लक्ष्मण और राम ने उनका उचित 
उपचार किया ) जब उनकी चेतना लौट आई, तब वे अपने ओठों को आदर करती हुई 
कहने लगी---हे अनघ राघयव ' तुम्हें वत्त में रहने का आदेश देना, मेरे कानो को अत्यत 


हयोध्याकाड ८५ 


विचित्र-सा मालूम होता है । महाराज तुम्हें बुलाकर इस प्रकार का भादेश कैसे दे सके ? 
भले ही भरत का राज-तिलक करके उसे पृथ्वी का स्वामी बना दें, किन्तु काकुत्स्थ-वच्ी 
राजा को तुम्हें वन भेजने की आवश्यकता क्‍यों हुई ? न वे विवेक-शून्य है, न अधम हे । 
फिर सौत की बातो में आजा उन्हें कैसे शोभा देता है ? क्‍या हितैषी मत्री तथा कुल-गुरु 
वसिष्ठ ने भी तुम्हारे हित का विचार करके यह नहीं कहा कि अमुक कार्य धर्म-सगत है 
और अमुक काय उचित है ? मेरे प्राणनाथ ने इतना बडा अपराध कभी नहीं किया था 
ओर कैकेयी ने कभी ऐसा पाप नहीं किया । तुम्हें देखकर वन जाने का आदेश देने के 
के लिए कंकेयी का मुख कैसे खुला ? हे राम, प्रेम से प्राण भी माँग लेनेवाली, महाराज 
की प्रेम-पात्री कैकेयी के गर्भ से जन्म लेकर, पृथ्वी का पालन करने का सौभाग्य प्राप्त न 
करके तुमने मेरे गर्भ से क्यो जन्म लिया ? यदि तुम मेरे गर्भ से जन्म नही लेते, तो तुम 
पर यह विपत्ति क्यों आती ? हाय ! पृत्रहीन वध्या की अपेक्षा भी मुझे आज अधिक दु.ख 
मिल रहा है । दीघ॑ काल तक सतानहीना होकर रही और उसके पश्चात्‌ ईश्वर की 
कृपा से तुम्हें पुत्र के रूप मेँ प्राप्त किया, तो मन को बडी श्ाति मिली, किन्तु मेरा सारा 
तप आज व्यर्थ हो गया है । हे राजकुमार, जिस दिन तुम मुझे छोडकर साहस के साथ 
घोर वन में चले जाओोगे, उस दिन मेरे लिए मृत्यु को छोडकर अन्य कोई शरण नहीं 
दीखती । तुम मुझे छोडकर कैसे वन में जाओगे ? में कैसे अपने दुख को शान्त कर 
सकूंगी ? पच्चीस वर्ष तक मेने तुम्हें बडे प्रेम से पाला-पोसा। यह सारा ससार जानता है। 

तुम मुझे इस दा में छोडकर कैसे जाओगे ? हे पत्र, मैने तुम्हारे लिए जो विविध 
व्रत रखे तथा विविध दान दिये, वे सब ऊसर भूमि में डाले गये बीजो की तरह निष्फल 
हो गये । यदि भरत राजा बन जाय, तो परिजन क्रूर कैकेयी के भय से मेरी सेवा करने 
के लिए कैसे आयेंगे ? राजा के प्रेम से वचित तथा सब प्रकार के राजभोगो तथा वैभवों 
से रहित होकर में अपनी सौतो के मध्य कौन-सा मूँह लेकर रहेंगी ? कैकेयी का अधिकार 
में कैसे सहूंगी ? में नहीं जानती थी कि सारा कार्य इस प्रकार चौपट हो जायगा । इस 
अशुभ समाचार के सुनने के पहले ही मैं क्यो नहीं मर गई ? हे सूर्यवश-तिलक, भले ही 

कैकेयी सारा राज्य लेकर अपने पुत्र को उसका अधिकारी बनाकर उसे भोग ले । हे तात, 

तुम वनो में क्यो जाओगे ? तुम मेरे पास वैसे ही रहो । तुम्हारी वाल्यावस्था में वसिष्ठ 

आदि मुनियो ने तुम्हारें चरण-कमलो में, पद्म, हल, वज्च, ध्वजा, कलश आदि चिह्नो 

को देखकर कह। था कि यह बालक समस्त विश्व का पालन करेगा । आज कंकेयी ने 

उनके वचन को असत्य सिद्ध कर दिया ।” 


७ लक्ष्मण का क्रोध और राम का समभ्राना 
इस प्रकार विविध प्रकार से विलाप करनेवाली कौसल्या को देखकर लक्ष्मण दुख 
और क्रोध से व्याकुल हो गये । उनका मुख तमतमाने लगा और उनकी भौहें तन गईं । 
क्रोधाग्नि में जलते हुए तलवार चमकाते हुए वे राम तथा राम की माता से बोले--“हाय ' 
पौरुष तथा अभिमान को तिलाजलि देकर, क्षत्रिय-धर्म को त्यागकर, तेजोहत हो, ऐसे दीन 
वचन भाप क्‍यों कह रहे हे ? मदमति पिता का आदेश आपको ठुकरा देना चाहिए । 


८६ रंग्नाथ एयायण 


कामातुर, पापकर्मी तथा वृद्ध का इतना आदर करने की क्‍या आवश्यकता हैं ? जब कैकेयी 
को दिये हुए वचन का भग करना वें लही चाहते, तो आपको राज्य देने का वचन देकर 
वे -कंसे मुकर रहे हे ? वसिष्ठ आदि सब सज्जनो के समक्ष ही तो उन्होने कहा कि में 
“राम को राज्य गा। क्‍या इस वचन का पालन नहीं करना चाहिए । सबसे पहले यह 
असत्य हुआ कि नहीं ? कहाँ के दशरथ और कहाँ के वर ? कौन भरत और कौत कैकेयी ? 
“यदि में हाथ में बनुष लूँ, तो मेरा सामना करने की क्षमता किसमें हैँ? भरत से लेकर 
भें सभी शत्रुओं का वध करके इस नगर को मिट्टी में मिला दूँगा। हरि, हर, ब्रह्मा आदि 
युद्ध में मेरा सामना करें, तो भी में उनसे युद्ध करके उनपर विजय प्राप्त करूँगा.। सुदर 
केयूर-ककणो से अलकृत तथा चदन-चर्चित अपने इन हाथो से में आपका राज-तिलक करूँगा 
और सभी झत्रुओ का वध कर दूंगा। मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपको सारा साम्राज्य 
त्यागनें की क्‍या आवश्यकता हैं ? वन जाने का विचार छोड दीजिए और अपनी शक्ति 
के प्रताप से राज्य ग्रहण करके प्रजा का पालन कीजिए और माता कौसल्या को प्रसन्न 
कीजिए 7 
राघव ने अपने अनुज की वातों पर मन-ही-मन विचार करके बड़े स्नेह से उन्हें 
देखकर कहा--हे लक्ष्मण ! शौय॑ं-प्रदर्गन के लिए यह उचित अवसर नहीं हैं । 
हमारा कल्याण नहीं होगा । अब हमें राज्य-पालन करना नही है । हमें दूसरे काम करने हे 
जीये यहाँ दिखाने की क्या आवश्यकता है ? उसे तो शत्रुओ के प्रति दिखाना चाहिए ।' 
तब कौसल्या ने राम से कहा--हे उत्स ! तुम अपने अनुज की इन विमल वचनों 
को सुनो । शौये का आश्रय लो गौर आये-सम्मत रीति से राज्य का पालन करते हुए 
प्रजा की प्रणसा प्राप्त करो । क्‍या तुम्हें यह उचित हैँ कि मेरी सौत की बातो के कारण 
राज्य छोडकर वन में निवास करो । मेरे यहाँ रहो, मोर मेरी सेवा-शुश्रृूषा करो | इससे 
वढकर इस पृथ्वी पर तुम्हारा कौन-सा घर्म हैं ? तुम पिता की आज्ञा का पालन करने के 
लिए उद्यत हो, पर क्या, तुम्हें माता की आज्ञा कम मान्य हो गई हैं ?! 
तव दुखित होनेवाली माता को ढाढस वबँचाते हुए राम उनसे बोले---हे माता ! 
आप कैसी वातें कर रही है ? आप इतनी दुखी क्यो हो रही हे? क्‍या अपने पिता की 
आज्ञा मानकर भार्गव ने अपनी माता का वध नहीं किया था ? क्‍या पिता की आज्ञा पाते 
ही कुडिन ने एक गाय का वध नहीं किया था ? पुरूरवा ने अपना यौवन अपने पिता को 
देकर बुढापा ग्रहण नही किया था ? अपने पिता के आदेश से क्‍या सगर के पुत्रो ने 
समुद्र-तल को खोद नहीं डाला था ? तब पिता की आज्ञा से वन में निवास करना मेरे 
लिए कौन वड़ा काम है ? आपके पति के वचन का पालन “करना आपके और मेरे लिए 
परम घर्म हैँ । लक्ष्मण तो अभी बच्चा है, वह वीरो के समान सोचने के सिवा दूसरा कुछ 
नही जानता ॥” इस प्रकार कहकर वें हँसते हुए अपने अनुज से बोलें---हे लक्ष्मण, तुम्हारे 
भुजवल, पराक्रम, धनुर्विद्या, बुद्धि तथा पौस्ष ये सब किस काम के हे ? मेरे प्रति श्रद्धा 
से प्रेरित होकर तुम कितना दुस्साहस करना चाहते हो ? तुमने मुझे कैसा उपदेश दिया ? 
माता ने वन जाने का आदेश दिया है औौर राजाने ममता त्याग करके वन जाने की आजा 


अयीध्य/कांड: ८७ 


दी है । मेरा भाई इस समस्त राज्य पर शासन करनेवाला है । अब तुम किसपर क्रोषः 
करते हो ? ऐसे समय में अपने बल का घमड दिखाना कया तुम्हें उचित है ” पिता की 
आज्ञा का पालन करने से बढकर दूसरा धर्म कौन-सा हैं ” पिता की आज्ञा का उल्लघन 
करने से बढकर दूसरा पाप कौन-सा है ? चाहे तुम किसी भी रीति से विचार करो, 
राजा की आज्ञा का पालन करना मेरे लिए, तुम्हारे लिए और माताओ के लिए धर्म-सगत है ।' 
उनकी आज्ना के अनुसार मुझ वन जानेवाले को मत रोको | परम पवित्र रविकुल के 
वशजो के चरित्र का तो तुम्हें विचार करना चाहिए। जो होता है, वह होकर ही रहेगा । 
विधि का लेख कौन मिटा सकता हैं ?” इन बातों को सुनकर लक्ष्मण ने अपना क्रीघ- 
दान्त कर लिया और रामचद्र का रुख देखकर भीत हो चुप रह गये ।, 


5. राम का कीसल्या को धेर्य देना 

सती कौसल्या अपने पुत्र का त्याग देखकर अत्यत दुखी हुई और षोडश कलाओ से 
युक्त, पूर्णचद्र के सदृश, प्रकाशमान राम का भूख देखकर बोली--हे. मेरे कुल-दीपक, 
हे मेरे प्रिय पुत्र, हे मेरे तात, वत्स (बछडा) को खोनेवाली गाय की तरह म॑ तुम्हें छोडकर 
चौदह साल तक यहाँ नहीं रह सकूंगी । में भी तुम्हारे साथ घत्तें वन में आकर रहूंगी ।' 
इस प्रकार विलाप करती हुई माता को सात्वना देते हुए बडे अनुनय-विनय से तथा अत्यत 
दीन भाव से राम बोले-- हि 

“हें माता, ऐसा कहना क्‍या आपको उचित है ? विचार करके देखिए । स्त्री के 
लिए पति ही प्राण है, नातेदार है और देवता है । ऐसे पति को त्यागकर मेरे साथ जाते 
के लिए जो आप कहती है, क्‍या यह आपको उचित हैं ? यदि महाराज ने राज-पाट 
भरत को देने की आज्ञा दी है तो इसमें दोष क्‍या हैं ? राजा ने जो वर देते का वचत 
दिद्ना था, उन्हें माँगना क्या कंकेयी की भूल है ? असत्य कहने से डरकर राजा का वर 
देता क्या अनुचित है ? अपने पिता की आज्ञा मानकर मेरा इस प्रकार वन जाने के लिए 
प्रस्तुत होना क्‍या दोष हैं ” सत्य तो यह है कि पति के आज्ञा-पालन में बाधा देना आपकी 
भूल कही जायगी । मेरे वन जाने के पश्चात्‌ आपको दीन तथा दुखी राजा की सतत 
सेवा-परिचर्या करते हुए, उनके मन का दुख दूर करते रहना चाहिए। पाप-रहित तथा 
बधु-प्रेमी भरत मुझसे अधिक भक्ति-युक्‍तत होकर आपकी सेवा करेगा । आप श्लोक नर करें । 
स्वप्न में भी महाराज दशरथ के सबंध में कटु विचार मत लाइए । आप कैकेयी के साथ 
स्नेहयुबत होकर रहिए । मेरें कुशल का विचार करके आप मुझे वत जाने की आज्ञा 
दीजिए ॥” 

इस प्रकार कहते हुए राम ने माता को प्रणाम किग्रा । कौसल्या ने राम को हृदय 
से लगा लिया । उनकी आँखो से दुख के अश्रु उमड-उमडकर राम की पीठ पर गिरने लग्रे । 
उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए वें गदूगद स्वर से बोली--हाय, तुम वन में जाओगे ?* 
इसके पद्चातू उन्होने किचित्‌ धैयें धारण करके अपने कपोलो पर भरनेवाले अश्षुगो को 
पोछ लिया । पवित्र जल से हाथ तथा मूँह का प्रक्षालन किया और पुण्याह-वाचन कराया और 
कहा--सुर, खेचर, यति, गिरि, वृक्ष, वेद, शान्ति, दान्ति, चदी, निधि, समुद्र आकाश, जल, 


ट८ र॑गनणर्थ एाप्पारयंण 


वायू, पृथ्वी, अग्नि, दिकृपाल, दश दिद्याएँ, सूर्य-चन्द्र, तथा ब्रह्म आदि सभी सदा तुम्हारों 
कल्याण करते रहें ।” इस प्रकार स्वस्ति-वचन कहकर कौसल्या ने देवताओं की पूजा करके 
राम के दाहिने हाथ में रक्षा-क्कण वाँधा और कहा-बृत्रासुर का वध करने के 
लिए जानेवाले इन्द्र को देवताओं ने जो कल्याणप्रद कामनाएँ की थी, वे सब तुम्हें प्राप्त हो । 
स्वयं से अमृत लाने के लिए जानेंवाले गरुड़् को विनता ने जो शुभ आश्ञीर्वाद दिये थे, 
है राम, वें सब तुम्हें प्राप्त हो 

इस प्रकार, आशीर्वाद देकर कौसल्या ने राम को हृदय से लगा लिया, सिर सूंधा 
और उन्हें जानें की अनुमति दी । तव माता का चरण-स्पर्ण करके वें अनुज के साथ वहाँ 
से अपने अत पुर के लिए इवेत छत्र-चामर-रहित हो पैदल रवाना हुए । अभिषेक में विध्व 
पड़ा हुआ जानकर राज-सभा के सभासद, सामत राजा, मत्री तथा नगर-निवासी अत्यंत दु.खी 
होने लगे ॥ 


९. राम का अभिषेक-संग का वृत्तांत सीता को सुनाना 

रामचद्र अपने अतपुर में पहुँच गये, तो सीता अपनी सहेलियो के साथ उनकी 
अग॒वानी के लिए आई । सीता को देखकर राम का मुख मलिन हो गया । यह देखकर 
सीता का मुख भी मलित पड़ गया। उन्होने कहा--े प्राणनाथ, यह कैसी विचित्र वात हैं 
कि आपका मुख-कमल आज सुरकाया हुआ है ? क्‍या राजा ने पुण्यन्योग का मुहूर्त 
बीतता जानकर आपका राज-त्तिलक कर दिया ? चद्र-मडल की समता करनेवाला श्वेत 
छत्र आपके मुख-कुमुद पर क्यो छाया नहीं कर रहा है ? क्‍या कारण है कि चामरघारी 
आपके पारवं-भाग में नही है ? भद्रगज क्यो नहीं दीख रहा है ? आपके सिर पर मत्राक्षत 
क्यो नही दीख रहे है ? नगर-जन आपकी सेवा में प्रवृत्त हो क्यो नही आ रहे है ? दुदुभी 
तथा पटह-नाद क्यों नहीं सुनाई पड़ रहे हे ? बदी-मागथों के स्तुति-पाठ कहाँ ? हे प्रभु ! 
आज तो राज-तिलक का दित हूँ। आपमें कोई राज-चिक्न नही दीख रहा है ! 
क्या कारण हैं कि सौमित्र का वदन प्रफुल्ल नहीं है ? इन सबका क्या कारण है, आप 
कृपया बतलाइए ॥” 

सीता के ये भोले वचन सुनकर राम मन-ही-मन दुखी हुए और उस मानिनी सीता 
को देखकर बोले--“भला मुनियों को राज-चिह्लो से क्या मतलब ? सुनो, इसका कारण 
वताता हूँ । माता कंँकेयी ने पहले मेरे पिताजी की सेवा करके उनसे जो वर प्राप्त 
किये थे, उन्हें आज माँग लिया है । एक वर से उन्होंने भरत का राज-तिलक और दूसरे 
वर से मेरा वन-वास माँगा है । अत राजा ने राज्य का पालन करने के लिए मेरे अनुज 
का राज-तिलक करनें का वचन दिया हैं और मुझे पिता की आज्ञा से चौदह साल तक वन 
में रहना हैँ । माता-पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले वीर के हाथ में ही ऐड्वर्य, 
यश, नाना लोक ओर नाना पुण्य रहेंगे । इसलिए हे कमललोचनी ! जवतक में महाराज 
की आज्ञा के अनुसार वनवास पूरा करके न लौदूँ, तवतक तुम दुख त्याग कर गुरुजवो 
को भक्तिपूर्वक परिचर्या करती रहो । मन-द्वी-मन मेरे कुशल की कामना करती रहो और 
उत्तम भाचरण से अपने धर्म का पालन करती हुई माताओं के पास रहो ” 


अयोध्य/काड ८ 


इन बातो को सुनकर जानकी सभूम-चित्त हो उठी । प्रचंड प्रायु से कपायमान 
होनेवाली कदली के समान वह थरथर काँपने लगी और अत्यधिक दुख से कातिहीन 
होकर गद्गद स्वर में बोली--हे प्राणेश, यदि यह सच है, तो में भी अवश्य इसी क्षण 
आपके साथ चलूँगी । में आपके त्रियोग में जोवित नहीं रह सकूँगो । मेरे प्राण मुझमें 
नही रहेंगे । आप मुझे अपने साथ अवश्य ले चलिए । 
राघव वोले--'हे कमलाक्षी, यह कैसे सभव हैँ कि तुम जगलो में कद-मूल खाते, 
पयरीले रास्तो में पैदल चलते, वन्‍्कल पहने, कडी घूप तथा प्रचंड वायु को सहते तथा 
कडी भूमि पर शयन करत हुए पर्णशाला में जीवन विताओ । तुम तो कोमलागी हो और 
कष्ट का नाम तक नहीं जानती | ऐसी कोमलागों तुम आइचर्यजनक हाथी, बाघ, रीछ, 
-भेडिये, हिरत, साँप तथा लाल चीटियो से पूर्ण गिरि, गुफा, तथा घाटियों में कैसे 
रह सकोगी ? भयावने लता-मार्गो पर, अत्यत दुर्गम, लता, कटक, वृक्षों से भरे हुए पथों से 
युक्त भयकर वनों में कैसे चल सकोगी ? हे सीते ! इसलिए तुम माता कौसल्या के पास रहो । 
उनकी इच्छा के अनुकूल तुम उनकी सेवा करती रहो । गृह-देवताओ की पूजा करती 
हुई मन में मेरी भक्ति करती रहो । दिन-रात पिता की सेवा में निरत भरत माता के 
समान तुम्हारी सेवा करता रहेगा । हे अबले, कभी उसे कदु वचन मत कहना । है मुस्वे, 
चौदह वर्ष पूरा करके में गीघ्र ही लौट अऊँगा । चिता मत करो ।' 
राम के इन वचनों को सुनकर सीता शोक-सतप्त होकर बोली--हे नाथ, पति 
का भाग्य ही सती स्त्रियों की रक्षा करने में समर्थ है । आप मेरे प्रभु है, मेरे देव हें 
तथा मेरी पृण्य गति है । श्रेष्ठ स्वर्ग-छुख का उपभोग करने की अपेक्षा निश्चल मत से, 
अत्यत भक्ति-युक्‍क्त होकर आपके चरणारविन्दों की सेवा करना ही मेरे लिए सुखदायक है । 
है राजनू, विष्णु-सदृश्ठ जगदेकवीर आपकी रक्षा में रहते हुए, इन्द्र भी मेरी तरफ 
सिर उठाकर देख नहीं सकेगा । में' आपके साथ वल्कल घारण करके पैदल चलूंगी ओर 
पर्वत तथा नदी-सरोवरो को देखूँंगी । चाहे कुछ भी हो, आप मुझे अपने साथ अवश्य 
ले चलिए । 
राम बोले--हे वनजाक्षी अविरल दुर्गंभ वनवास की इच्छा तुम क्‍यों करती हो ” 
में सतत तुम्हारी याद मन में रखते हुए राजा की आज्ञा का पालन करके लौठ आऊँंगा । 
कहाँ तुम और कहाँ घोर वन ! कौतुक से विहार करने के लिए सर्वथा अनुपयुकत घने 
वन के दुर्गंग तथा कुटिल मार्गों में तुम्हें ले जाना कहाँ तक उचित है ? अत्यत क्रूर भेडिया, 
बाघ, रीछ, सिंह आदि सृगों के हुकार तथा उलूक, कनकौआ एवं भझिल्‍ली की ककंश 
भेकार से तुम अवश्य भीत हो जाओगी । इसलिए तुम्हारा वहाँ जाना ठीक 
नही है ।' 
इन बचनों को सुनकर सीता बोली--'हे नाथ, आपके रहते मु्े किसी प्रकार का 
भय नही होगा । वेदविदो (ज्योतिषियों) ने कहा है कि मेरे भाग्य में वनवास लिखा 
इसलिए हे भानुकुलाधीश, मे आपके चरणों की सेवा करती हुई आपके साथ ही रहेंगी । 
मुझे मत छोडिए । मेरी भक्ति का विचार कीजिए ।' ् 
श्र 


० रंग्नांथे एंय/यण 


यो कहती हुई वें राम के चरणों पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर भी राम 
को विचलित होते नहीं देख अत्यत दीन स्वर में वें बोली-- हें नाथ यदि जान-वूककर, 
या अनजान में मेने कोई अपराध किया हो, तो आप मुझे क्षमा कर दीजिए । कर्कंश 
शिलाओ से आशकीर्ण प्रदेशों में भी आपकी सेवा करते हुए मुझे कोई थकावट नहीं होगी । 
आप जो कद-मूल कृपा-पूर्वक देंगे, वे मेरे लिए अमृत-तुल्य होगे । आप ही मेरे आप्त-बध है । 
अत, में आपके साथ अवद्य चलूँगी । न में अपने पिता का स्मरण करूँगी न माता 
का, न इष्ट वधुजनो का । | हे प्राणेश आपने अग्नि के समक्ष मेरेपिता से सुझे सह-धर्म- 


्क 


चारिणी के रूप में ग्रहण किया था । आप लोकवद्य हे, सत्यनिष्ठ हे । मुझे यही छोडकर 


क्त 


वनवास के लिए आपका चला जाना क्‍या उचित है ? वहाँ जो भी कष्ट हो, वह आपकी 
कृपा से मेरे लिए सुख ही सिद्ध होगा । आपके विना ये राजभवन, ये वधु-वाधव, यह 
ऐव्वयं और जीवन भी सार-हीन हो जायेंगे । में कंसे यहाँ रह सकगी ? जैसे पुण्य सती 
सावित्री अपने पति की अनुगामिनी होकर रही, में भी आपकी परछाई की तरह आपके 
पीछे-पीछे चलूंगी। मेरी जैसी साध्वी के लिए यही घर्म है । आपको छोडकर में यहाँ 
एक क्षण भी नहीं रह सकती । आपके साथ चौदह वर्ष क्‍या, हजार वर्ष तक जगलो में 
रहकर आपकी सेवा करती रहेंगी । आप ऐसे आदर्श का पालन कीजिए, जो ससार में पति- 
पत्नियो के लिए अनुकरणीय हो । इतना ही क्यो ? यदि आप मुझे छोडकर वन चले 
जायेंगे, तो मेरे प्राण भी उड जायेंगे अथवा से स्वयं अग्ति, जल या विष से अपने प्राण 
त्याग दूंगी । मुझे छोडकर मत जाइए, मेरी मृत्यु देखकर जाइए ।” यो अत्यत शोकात्ते 
हो जानकी विलाप करने लगी ।' 
१०, राम का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलन की अनुमति देना 

सीता की यह दशा देख राम का हृदय दया से पिघल गया । उन्होंने अपने कर- 
पललवो से उस सुंदरी को उठाकर कहा--हे सुदरी, तुम्हें यहाँ छोड़कर अकंले वन में निवास 
करना में भी नहीं चाहता । में केवल तुम्हारा हृदय परखना चाहता था। तुम मेरे साथ 
चलो, तो सब तरह से मेरा कुबल ही होगा । मे तुम्हें अपने साथ ले चलेगा । तुम चलते 
से पूर्व आवश्यक दान आदि कर लो । कृपालु राम के अनुमति देतें ही सीता ने स्वर्ण- 
रत्नादि आभूषण अपने प्रिय परिजनों को दान कर दिये । 

तत्पश्चात्‌ राम ने सौमित्र को अपने पास बुलाकर कहा--“यदि तुम भी मेरे साथ 
वन में चलोगे, तो मेरे साथ तुम्हें भी खोकर हमारी माताएँ कौसल्या तथा सुमित्रा 
अत्यत दुखी होगी । उनका दुख कौन दूर करेगा ? हम दोनो चले जायें, तो पिताजी की 
देख-भाल करनेवाले कोन हैं ? पहले से ही माता कैकेयी सौतिया डाह से प्रेरित है । 
अब राज-मद भी उन्हें हो जाय, तो न जाने वे अपनी प्रभुता दिखाती हुई उन्हें दुख देंगी 
या धर्म का विचार करके (चुप) रह जायेंगी । अत मेरे लौटने तक तुम्हारा यहाँ रहना 
सर्वथा उचित हैं । 

इन वातो से दुखी होकर लक्ष्मण ने अपने भाई से कहा--में आपके साथ 
अवश्य वन चलूँगा । यदि आप मना करेंगे, तो यही अपने प्राण त्याग दूँगा । यह मेरा दृढ़ 


ऋषोध्य/कोड पर 


निएंचय है । अनुज का यह दृढ़ निश्चय सुनकर राम से उन्हें अपने साथ चलने की 
अनुमति दे दी | 
११. राम-लक्ष्मण का संपत्ति-दान 

फिर राम ने अपने अनुज लक्ष्मण को भेजकर वसिष्ठ के पुत्र उत्तम गुण-सपन्न सुमज्ञ 
को बुलवाया और उचित रोति से उनका आदर-सत्कार करके उन्हें हार, कुडल, वलय, 
अगद आदि सभी आमूषण, मामा का दिया हुआ मत्त गज, ख्याति, शत्रुजय आदि नामवाले 
सहख हाथी, सुन्दर वस्त्र आदि दान में दिये । इनके अतिरिक्त राम ने उन्हें दस करोड सुवर्ण- 
मुद्राएँ तथा अन्य अनृषम वस्तुएँ भी बडी श्रद्धा से दी । उन्‍हें ग्रहण करके सुयज्ञ ने हित 
होकर आइचर्य-चकित हृदय से उस राज-दपती को आशीर्वाद दिये। उसके पश्चात्‌ उन्होंने 
अपने राज-कोष का समस्त घन मेंगाकर, याचको, निर्धनो तथा दीन-जनो में वितरित 
कर दिये। अगस्त्य तथा कौशिक मुत्रियो को रत्न-राणियाँ दान कर दी । वसिष्ठ आदि मुनियों, 
तथा तपस्वियो को उचित दान दिया । वदी-मागध जादि, परिजन तथा अन्य निर्धनों को 
अमित धन दिया । तत्पश्चात्‌ ब्राह्मणों तथा बधु-मित्रो को भिन्न-भिन्न प्रकार के दान देकर 
उन्होने सौमित्र की ओर देखकर कहा--ठतुम भी दान करो ।” तब उस राजकुमार ने बड़े 
आचनद से कौशिक, गारग्यं तथा शाडिल्य को बुलवाकर उन्हें अमित धन दिया । जिस किसी ने 
जो कुछ माँगा, उसे उन्होंने दे दिया | सीता ने परम कल्याणी अरुधती तथा सुयज्ञ की 
पत्नी को अपने आभूषण, अपना धन, तथा अपने अत पुर के सभी वस्तु-समूह दान में 
दे दिय । तब अरुपती ने वसिष्ठ को देखकर कहा--हाय । इक्ष्वाकु के वश्जों की ऐसी 
दक्षा देखकर चुप रह जाना क्या आपको उचित लगता है ?” मुत्ति ने अच्छी तरह विचार 


करके कहा--यह भगवान्‌ की इच्छा है, किसी भी तरह यह टल नहीं सकती । तुम चुप- 
चाप देखो ।! ह 


१२, त्रिजठाझ्य को राम का गार्यों का दान देना 

उस समय त्रिजटारूथ नामक एक विप्र अपनी जीविंका चलाने के उद्देश्य से खेत 

जोनते हुए मन-ही-मन अपने दारिद्रय का विचार करके दुखी हो रहा था । उसकी स्त्री 
अपने बच्चो के साथ अपने पत्ति के पास गई और काम में व्यस्त पति फो देखकर कहा--- 
है नाथ, अभी आप हल चलाने में क्‍यों व्यस्त है, हल को वही छोडकर आइए, में एक 
बात कहती हूँ । आज रामचद्र बडे आनद से सभी याचको को असख्य घन दान कर रहे है। 
जो कोई जो कुछ माँगता है, उसे वे दे रहे है । आप अपना कुल तथा अपना नाम 
ततलाकर उस काकुत्स्य पति से अपने इच्छानुसार घन प्राप्त कर लीजिए । आप ज्षीघ्र 
जाइए ।! ह 
, है सुनकर उस विप्र की इच्छाएँ प्रवल हो उठी । चह तुरत रामचद्र के निकट 

'हुंचकर उन्हें आशीर्वाद देकर बोला--हे राजन, मे निपट दरिद्र हूँ । मेरे कई बाल-बच्चे हे । 
से अत्यन्त निर्धन हूँ । आप मेरी रक्षा करें । तब रघ्राम बोले--अभी मेरे पास 
गायो के कई समूह है । आप अपनी सारी शक्ति लगाकर कोई ढेला फेंकिए । आपका 
ढला जितनी दूर तक जायगा, उतनी दूर तक की भूसि में जितनी गायें हैं, वे सब आपको 


दर रंग्नाथ एयायण 


मिल जायेंगी । मन-ही-मन हर्षित होते हुए उस विप्र ने अपनी घोती तथा शिखा कसकर 
बाँध ली, सभी ताडियो को कस लिया, दाँत पीसे और हाथ में ढेला लिये हुए श्रीरमापति 
विष्णू तथा श्रीराम का नाम-स्मरण करके अपनी मुट्ठी जोर से घुमाकर ढेला सरयू नदी 
तक फेंक दिया । सरयू नदी तक की भूमि में जितनी गायें थी, उन्हें ब्राह्मण ने ले लिया । 
ब्राह्मण के इस बाहुबल को देख राम को आइचर्य हुआ । उन्होने ब्राह्मण से कहा कि यदि 
आपकी इच्छा हो, तो में विना किसी सकोच के आपको और एक हजार गायें 
तथा वस्त्र आदि दूँगा । तब विप्र ने कहा--आप मुझें एक यज्ञ के लिए आवश्यक घन 
द॑ सकें, तो अच्छा होगा । राम ने उसकी इच्छा के अनुसार उसे धन देकर सतुष्ट किया । 
ब्राह्मण घन आदि लेकर अपनी पत्नी के साथ सतुप्ट मन से घर लौट गया । 

तव रघुराम अपने-आपको कृत-इत्य मानतें हुए अत.पुर के भीतर आये और गृह- 
देवताओं की पूजा की, भक्ति के साथ मुनियों को श्रगाम किया और याचरको को मुँह-माँगा 
दान दिया । उसके पश्चात्‌ उन्होने अपने गुरु के घर में रखे हुए तथा घनुष-यज्ञ के समय 
वरुण से प्राप्त कोदड, तृणीर, खड़ग आदि अपने अनुज के द्वारा मेंगाये और उन्हें घारण 
करके सीता तथा लक्ष्मण के साथ राजा के दर्शन करने चले । नगर की प्रजा उन्नत सोच- 
जशिखरो तया चौपालो से राजचिकह्ल-रहित राम को जाते हुए देख अत्यत झोक-सतप्त होकर 
कहने लगी--क्या राम ऐसी दु्ंशा को प्राप्त होने योग्य हे ? वे जहाँ जायेंगे, हम भी 
वही जायेंगे । कुछ लोग कहतें----हम सव इस राजकुमार के साथ वन चले जायें और 
उजडे हुए नगर पर कंकेयी राज्य करे । इसी तरह कुछ दूसरे लोग कहतें--यह तग्र 
घीरे-घीरे भालू, वाघ, सिंह, लोमड़ी, पिशाच तथा असख्य भूत-प्रेतों का निवास-स्थान बन 
जायगा और वन में जहाँ राम रहेंगे, वही एक नगर वस जायगा ।' इस प्रकार लोगो के 
रोने-पीटने से सभी दिश्वाएँ गूंज उठी ! 

१३, सीता-लक्ष्मण-सहित राम का दशरथ के दर्शनार्थ जाना 

लोगो की आत्तें ध्वनियो को बडे घैरथे के साथ सुनते हुए राम महाराज के अत पुर 
में पहुँचे । उन्होनें सुमत्र के द्वारा राजा को अपने आगमन की सूचना भेजी । सुमत्र ने 
शोक-सतप्त राजा को देखकर कहा--महाराज, राम-लक्ष्मण पूज्यशीला सीता के साथ 
जाये हें ।” वह सवाद सुनते ही राजा मूच्छित हो गये। जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे 
धीरे-धीरे उठकर आसन पर बैठ गये और घैयँ धरकर गद्गद कठ से बोले--'मेरी सभी 
रानियाँ रघुराम को देखने के लिए आवें ॥! 

सुंमत्र॒ राजा के वचन सुनकर रनवास में गये और राजा की तीन सौ पचास रानियो 
को अत्यत विनय के साथ बुला लायें। तत्पण्चात्‌ वे महानू तेजस्वी रामचद्र को सीता 
ओर लक्ष्मण के साथ महाराजा के सामने ले गये। राजा राम को हृदय से लगा लेने 
के लिए उठे, किन्तु उनके पैर आगे नहीं वढह़ सके । वे वही लडखडाकर भूमि 
पर गिर पड़े । तब राम नें उन्हें उठाया और उतका सिर अपनी गोद में रखकर दुख प्रकट 
करने लगे । थोड़ी देर बाद राजा की चेतना लौट आई जौर वे उठ बैठे । पिता 
को एकटक अपनी ओर ताकते हुए देखकर लोकवन्य राम बोले--हे अनघ, आपके वचन 


ऋयरोध्य/कोड 6 


किक किक 


की रक्षा करने के हेतु मुझे वन-गमन के लिए उद्यत देखकर साध्वी जानकी तथा सौमित्र, 
मेरे मना करने पर भी मेरे साथ वन जाने के लिए प्रस्तुत हो गये हे । उन्हें भी वन जाने 
की अनुमति प्रदान कीजिए ।' 

इन वचनों को सुनकर राजा ने कहा--मति$ प्ट कैकेयी की वातों में आकर मैने 
तुम्हे वन जाने का आदेश देकर बडी निर्दयता की हैं । किन्तु तुम्हें उसका पालन करने 
की आवश्यकता ही क्‍या है ? तुम अपने ढग से राज्य करो । 

इस पर राम ने हाथ जोडकर कहा--हे राजनू, आप मेरे गृरु है, पृथ्वीपति हे, 
प्रेम से मेरी रक्षा करनेवाले आप्त-वधु हे । अत , आप अपनी आज्ञा का पालन करने की अनु- 
मति मुझे दीजिए और जाने की आज्ञा भी दीजिए । सत्यनिष्ठ होकर आप सदा समस्त 


लोको का पालन कीजिए ।॥ 


दशरथ बोलें--हैं वत्स ! तुम चिरायू, अमितशुभ, सुयश, पराक्रम, निष्कलक धर्म- 
बुद्धि प्राप्त करो | तुम्हें किसी प्रकार का कप्ट न हो । हे पुत्र, तुम आज रात को यही 
रहकर कल वन के लिए प्रस्थान करो ।! इस पर राम ने कहा--हे महाराज, हमारा 
अब यहाँ रहना उचित नहीं है । आज और कल में विशेष अतर नहीं पडता । अत , आप 
हमें स्नेह से जाने की अनुमति दीजिए । मेरे अनुज भरत को राज्य-पालन करने दीजिए । 
अब आप शोक मत कीजिए ।॥ 

राम की त्याग-बुद्धि देखकर महाराज दशरथ को अत्यधिक दुख हुआ । वे वीलें-- 
तुम्हारे जैसे सुपुत्र को घोर जगलो में निवास करने की अनुमति में किस मुंह से दूँ ? 
हाय |! कैकेयी की बातो में आकर में धोखा खा गया ।' यो कहते हुए वे करुणोत्पादक ढग 
से विलाप करने लगे । अत पुर की सब नारियाँ भी रोने लगी । इसी समय कौसल्या 


तथा सुमित्रा दु ख-सतप्त हृदय से वहाँ आई और राजा के साथ विलाप करने लगी । 


उन रमणियो तथा राजा का विलाप सुनकर सुमन्न अपार दुख से पीडित हुए और 
क्रोध से कैकेयी की ओर देखकर कहने लगे---आपके कारण ही राजा को तथा हम सबको 
यह सताप हो रहा है । में आपको क्या कहूँ ? आप पति के हित का विचार न करने- 
वाली राक्षसी है । आप भी अपनी माता के समान ही पति की हृत्यारिन है । आपके 
पिता सभी भाषाओं के ज्ञाता थे । एक दिन वें और आपकी माता शब्या पर लेटे हुए थे । 
तब उन्होने किन्‍्ही कीडो को आपस में बोलते हुए सुना और उसका विचार करके 
हँस दिया । तब तुम्हारी माँ ने अपने पति से कहा--बतलाइए कि आप क्यों हँस रहे 
रहें है ?” तब उन्होने कहा--यदि में इसका कारण तुम्हें बतला दूँ, तो मेरी मृत्यु हो 
जायगी ।' किन्तु आपकी माँ ने कहा कि में आपकी मृत्यु से नहीं घबराती, आप अवश्य 
अपनी हँसी का कारण बतलाइए । तब उन्होंने निर्देय होकर आपकी माता को नगर से 
निर्वासित कर दिया । भला, ऐसी चडी की पुत्री, आपको अपने पति के हित का विचार 
कैसे होगा ?' 

कैकेपी सिर भुकाकर थोडी देर तक सोचती रही और फिर दशरव को देखकर 
बोली--हे राजन्‌, प्राचीन काल में आपके वशज महाराज सगर महान्‌ यणस्वी होकर 


68 रंगन/थ एतल्यायणग 


राज्य करते थे । क्‍या उन्होने अपने ज्येप्ठ पुत्र असममजस को विना किसी क्रिकक के नगर 
से वाहर नहीं कर दिया था ? तव आप भी यदि राम को वन में भेज दें,वो इसमें 
दोष ही क्या है ”'* 

झोक-तमृद्र में डूबे हुए दगरथ इसका प्रत्युत्तर नहीं दे सके । तब सिद्धार्थ चामक 
मंत्री ने कपटी कैकैयी को दखकर कहा--असमजस दर्प से उद्ृण्ड होकर नगर के बालकों 
को वॉव-वाँवकर सरयू नदी में फेंक देता था । जव प्रजा ने राजा से इसकी शिकायत की, 
तव जन-हित का विचार करके उन्होंने अपने पुत्र को नगर से निर्वासित कर दिया | क्‍या 
रामचद्र में कोई दोप है ? वें तो उत्तम गृण-सपन्न हें । 

तब कैकेयी बोली--राम तो पिता के दिये हुए वचनो का पालन कर रहा हैं । 
वह सुकृति है ।' कैकेयी की निप्ठुरता देखकर दघारथ बहुत दु खी हुए और सुमत्र को देखकर 
वोले--हे सुमत्र, तुम राज्य के धन, मणियाँ, गोवन, वबुजन, अत पुर के निवासी मित्र, 
मंत्री तथा विजय-चिह्नो से अलकृत गज, रथ, तुरग आदि सब को रामके साथ भेज दो । 
इस थून्य नगर पर ही कैकेयी का पुत्र राज्य करेगा । 

इन वचनो को सुनते ही कैकेयी क्रोध से जल उठी । वह अपने पति को कोसती 
हुई वोली--हे राजनू, आप रामचद्र को राज्य का ऐब्वर्य देकर उजडा हुआ नगर भरत 
को क्यो देना चाहते हे ? ऐसी वातें क्‍यों करते हे ? यदि राम, सौमित्र तथा जानकी के 
साथ वल्कल पहनकर सतुष्ट मन से सारे ऐब्वर्य को त्याग कर मेरे देखते हुए वनवास के 
लिए नही जायगा, तो आपका वचन पूरा नहीं होगा । आपका वचन भूठा होगा । हें राजन्‌, 
में आपके वर नहीं चाहती । निच्चय ही आपका वचन भग हुआ 

कैकेयी की बातें सुनकर दच्धरथ मूच्छिंत होकर भूमि पर गिर पड़े । उस दबा में 
पृथ्वी पर पड़े हुए पिता को देखकर घोर परिताप से पीडित होकर राघव वोले-- 
हैं माताजी | जाप वार-वार महाराज की निंदा क्यों करती है ? मेरे गुरु, महाराज, मेरे 
पूज्य पिता, मेरे परमदेव, मुझे आज्ञा दें, तो में प्रेम से विप-पान भी करूँगा । श्रचंड 
अग्नि या विष के समुद्र में भी प्रविष्ट होऊँगा । वनो में जाकर मुनियों के साथ रहना 
कौन-सा वडा काये है ?! 

दशरथ उन वचनों को सुनकर कैकेयी को देखकर वोले--सुनो, में भी राज्य छोड- 
कर राम के साथ बन में जाऊँगा । तुम समस्त वैभव के साथ भरत को अयोध्या का राजा 
वनाकर राज्य क्रो । अब अधिक विवाद क्यो ?” तब राम ने राजा से कहा--महाराज, 
निर्जन वन मेरे लिए योग्य रहेगा । मेरे साथ और कोई क्‍यों आये ? मेरे लिए वल्कल 
मेंगाइए । में उन्हें घारण कर चौदह वर्ष तक वन में रहते हुए आपकी आज्ञा का पालन 
करूंगा । माता, आप अजीघ्र हमें वलकल दीजिए ।' 

तब कैकेयी निर्लेज्ज होकर मन-ही-मन प्रसन्न होती हुई सबके सामने वल्कल ले 
आई और उन्हें राम को देकर वोली--हे राजकुमार ! इन्हें घारण कर लो ।' 

राम ने बडी प्रसन्नता से माता से वलकल ले लिये और अपने कपडे उतारकर 
वल्कल पहन लिये । राम के समान ही लक्ष्मण ने भी वल्कल पहले । कैकेयी ने सीता को 


अयोध्याकाँडे 6९ 


दो वल्कल दिये । तब सीता ने मन-ही-मन व्याकुल होकर राम से कहा--वन में रहनें- 
वाले मुनि, न जाने इन वल्कलो को कैसे पहनते होगे ।” उन्होने एक वस्त्र को अपने के 
पर डाल लिया और दूसरे को हाथ में लिये पहनने में असमर्थ हो खडी रही । राम ने 
यह ढंग देखा तो उच्होनें स्वयं सीता को वह वल्कल पहना दिया । सभी रानियों ने राघव 
को देखकर कहा--हे राजकुमार ! इस श्रेष्ठ राजकुमारी सीता को इतना निप्ठुर होकर 
तपस्विनी की तरह घने जगलों में क्यो ले जा रहे हो ? हमारी बात मानकर तुम सीता 
को हमारे पास छोड दो और लक्ष्मण के साथ तुम वन जाओ।! 


१४, केकेयी पर वस्निष्ठ का क्रोध 

तब वसिष्ठ कैकेयी को देखकर अत्यत क्रोध से बोले--'तुम कुलनाणिनी हो । 
तुमने राजा को धोखा दिया हैं। तुमने जैसा पाप किया, वैसा पाप कही भी किसी ने नहीं 
किया है । रघुराम की आज्ञा से जानकी को रानियो के साथ रहने दो । तुम इसे स्वीकार 
क्यो नहीं करती हो ? यदि बेंदेही बन में चली जायगी, तो हम भी नगर-निवासियो के 
साथ वन चले जायेंगे । इतना ही नहीं, भरत तथा शत्रुघ्न अत्यत प्रसन्न मन से रामचन्द्र 
की सेवा करने के लिए बन जायेंगे । तब तुम इस निर्जन नगर में रहोगी । राम पुण्यशील है । 
उसके रहने से इस नगर की शोभा है । उसके चले जाने के वाद यह नगर उजडा 
हुआ दीखेगा । पाप-पूर्ण मन से तुमने पति को धोखा दिया । अधिक लोभ से प्रेरित हो, 
तुम राम को बन में भेजकर मरत का राज॑-तिलक करके चिर काल तक राज्य करने की 
वात सोच रही हो । भरत कभी अपने पिता की आज्ञा नहीं टालेगा । वह अपने भाई 
रामचद्र को पितृ-तुल्य मानता है । तुम्हारी बात सुनकर, धर्म-निप्ठा को त्यागकर, रामचन्द्र 
को दुकराकर क्या वह राज़्य ग्रहण करेगा ? वह दशरथ का पुत्र है। तुम्हारा दोप 
सिद्ध होने पर, क्‍या वह तुम्हे मन से माता मानेंगा ? क्या राम के वन में रहते हुए वह 
साम्राज्य का भार वहन करेगा ? तुम भरत का हृदय नहीं जानती । अगर उसे यह बात 
मालूम हो जाय, तो वह तुम पर कुद्ध होगा । किसके लिए तुम इतने निष्ठुर बन रही हो ? 
क्या भरत इसके लिए अपनी स्वीकृति देगा ? कदापि नहीं । इसलिए इसे तुम 
शुभप्रद मत समझो । इतना ही नहीं, राम तथा सीता को बल्कल देने के लिए तुम्हारे 
हाथ कैसे आगे आये ? वलल्‍्कल छोडकर नवरत्न-खचित आभूषण तथा चीनाम्वर पहने जानकी 

परिचारिकाओ के साथ वन में जाय ॥* 
इस प्रकार कहते हुए उस सयमीश्वर ने सीता को सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण दिये । 
सीता ने उन्हें ग्रहण किया और वल्कल वही छोड दिये । सब लोग कैकेयी की निंदा करने लगे । 
राजा सवकी निंदा सुनते रहे और अत में कैकेयी को देखकर बोले--तुमने मन 
में पाप का सकल्‍प करके राम के लिए वनवास माँगा था । लेकिन क्‍या तुमने मुभसे 
यह भी माँगा था कि सीता को वल्कल पहनने चाहिए ? क्‍या यह मानवती इसके लिए 
योग्य है ? मेने क्या पाप किया, जो तुम इतनी क्रूर बनी हुई हो ? विनवाभिराम राम को 
तपस्वी के रूप में वन भेजने से वढकर कोई और पाप है ? उसे यहाँ से भगाकर भी तुम्हें 
चैन क्यो नहीं मिलता ? ऐसी पापिती का पति मेरे पापों का अत ही नहीं है बया :* 


९६ रंगनोॉथ एयोयण 


तव राम ने दशरथ से कहा--महाराज, मेरे वियोग से जोक-सतप्त मेरी माती 
कौसल्या को सात्वना देते हुए आप उन्‍की रला करते रहें ।' 

तव दवरथब ने अत्यत दु खी होकर कहा--हिें राम, न जाने मेने पूर्व जन्म में कौन-सा 
पाप किया था ? उसका फल तो मुझे भोगना ही चाहिए । माताओ से पुत्रो को अलग करके 
तुम्हारे हृदयों को दु ख देता पड रहा हूँ । हाय, कैकेयी के वचनों के कारण तुम्हें बन में कप्टो को 
सहने के लिए निष्ठर होकर भेजना पड रहा है । हे पुत्र, हे राम, यह कैसा अनर्थ है !' 

यो कहकर दगरथ मूच्छित हो गये | उपचार के उपरात जब वे कुछ सँभले, तव 
उन्होंने चौदह वर्ष के लिए आवशच्यक श्रेष्ठ वस्त्र तवा आभूषण सीता को दिलवायें । 
सीता ने उन श्रेप्ठ वस्त्रो तथा जाभूषणों को घारण किया । 

१४. रास का दशरथ को सांत्वना देना 

तव दशरथ को देखकर राम नें कहा--महाराज में चौदह वर्ष की अवधि चौदह 
दिन की तरह विताकर गीघ्र ही लीट आऊंँंगा । मेरी अपेक्षा भरत आपका प्रिय भक्‍त है । 
आप दुख मत कीजिए । भरत का राज-तिलक कर दीजिए । माता कैकेयी के कत्य को 
सोचते हुए आप मन-ही-मन ब्ुब्ध मत होइए । मेरी माँ आपकी सेवा अच्छी तरह करती 
रहेगी । उन पर आप भी हृपा-दृष्टि रखिए ॥ 

यो कह्रकर उन्होनें सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनकी परिक्रमा की और प्रणाम 
किया । तब राजा ने अपने पुत्रों तथा बहू को आशीर्वाद दिया--तुम वन जाकर कुशल- 
पूर्वक लौटों ।” उसके पदचात्‌ उन तीनो ने कौसल्या के चरण-कमलो का स्पर्श किया । 
राघव की वेश-भूपा देखकर माता ने क्रूर विधि की निंदा करती हुई विलाप किया और 
फिर राम ठथा लक्ष्मण को आनजीर्वाद दिये । 

१६, सीता को सीख देना 

फिर जानको को देखकर कौसल्या अत्यत दु र्खा होकर बोली--राम को योग्य राज- 
पुत्र समककर विना हमारे माँगे ही तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह उसके साथ कर दिया । 
किन्तु आज दैवन्योग से तुम्हारी यह दया हो गई । तुम्हें तापस-वृत्ति ग्रहण कर अपने 
पति के साथ वनो में निवास करना पद रहा हैं। इसके लिए चिन्ता मत करो । राघव 
अवध्य बाद को पृथ्वी का पालन करेंगा । चाहे पति निर्वन ही क्यो न हो जाय, फिर भी 
स्त्री को उसे त्यागना नहीं चाहिए। यही सती स्त्रियों का धर्म हैं। पति की आज्ञा पालन 
करनेवाली स्त्रियों का दोनों लोकों में झुम होगा ॥' 

तव सीता ने कौसल्या को देखकर कहा--हे माताजी, में अवब्य पति के अनुकूल 
होकर भक्ति के साथ उनकी सेवा करूँगी और वर्म के मार्ग पर चलेगी । पति की प्रसन्नता 
जिस रमणी को प्राप्त नही है, वह चक्र-हीन रथ के समान और तार-हीन वीणा के समान है | 
वह पूत्रोवाली पुण्यवत्ती होने पर भी अत्यत दुखी रहेंगी । अत, यदि पति को प्रिय हो, 
तो में अपने प्राणों को भी बडे हर्ष से निछावर रूर देगी । 

तब कासल्या ने साता से कहा-- भू-ताता का पुत्रा हाकर तुम्हारे रेयेगण तुम्हारे 
अनुकूल ही हूं हे 


। 


£ | लक्ष्मण, उज्ज्वल गृण-सपन्न तुम्हारें पति का आप्तनवधु हैँ । उसके प्रति 


कयोध्याकांड 69 


स्नेह रखना । आपकी आज्ञा शिरोबार्य है--सीता ने कहा और उन्हें प्रणाम किया । 
कौसल्या ने उन्हें हृदय से लगा लिया और आश्ञीर्वाद दिये । 

फिर कौसल्या ने राम को सवोधित करके कहा--हे राजकुमार, मैथिली तथा 
सौमित्र का सतत ध्यान रखना । राम बोले--माता, आपकी आज्ञा का पालन अवश्य 
करूंगा । लक्ष्मण तो मेरा दाहिना हाथ है और सीता मेरी गति के समान हैं। क्‍या में 
कभी इनके प्रति असावधान रह सकता हूँ ? यदि में धनुष धारण करूँ, तो (इन्हें) कौन-सा 
भय हो सकता है । चाहें त्रिययन ही क्यो न आ जाये । अब आप शोक मत कीजिए । 
हम तीनो, आपको, पिताजी को और सब माताओ को प्रणाम करते है, आप हमें आश्यीर्वाद 
दीजिए ।' 

इस प्रकार कहते हुए उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ तीन सौ पचास माताओो 
की प्रदक्षिणा की । यह दृष्य देखकर सभी माताओं का हृदय पिघल गया और वे विलाप 
करने लगी । 

जब तीनो ने माता सुमित्रा को प्रणाम किया, तव उन्होने उन्हें हृदय से लगा लिया 
और राम तथा सीता को आशीर्वाद दिये । उसके पच्चात्‌ वें महाराज के अनुचित कार्य 
का बिचार करके दुखी हुई और लक्ष्मण को पास बुलाकर अत्यत गभीर स्वर में वोली-- 
है वत्स ! तुम राम को ही अपने पिता दशरथ के समान और जानकी को मेरे समान 
सानना । वन को ही अयोध्या समझना और अत्यत भक्तियुक्त होकर राम की सेवा करते हुए 
अत्यधिक विजय तथा उन्नति प्राप्त करो । उसके बाद वे राम को देखकर वोली-- 
है रघुवीर, लक्ष्मण सतत तुम्हारे कल्याण का विचार करनेवाला, कल्मष-रहित सखा तथा 
अनुज है । वन में तुम इसकी रक्षा करते रहना । रामने माता की आज्ञा को बडी नम्नता 


0 


से स्वीकार किया । 


१७, रास का वन-गसन 

तत्पश्चात्‌ राम ने गृह-देवताओ, मुनियो तथा माताओं को प्रणाम किया और सीता 
तथा लक्ष्मण के साथ शर-चाप-तुणीर से युक्त हो वे वन के लिए रवाना हुए | तव दगणरथ ने 
मन-ही-मन दुखी होते हुए सुमत्र को देखकर कहा--वह देखो, राम वन जा रहा है, 
उसके लिए रथ ले जाओ । 

राजा को आज्ञा मानकर सुमत्र रथ को लिये राम के पास पहुँचे और भवित से 
प्रणाम करके बोले--हे रघुराम, राजा ने यह रथ भेजा हे । इस पर आरूढह़ होकर आप 
वन के लिए प्रस्थान कीजिए ।” राजा की आज्ञा को मानकर राम ने सीता को पहले रथ 
पर विठाया, फिर अपने शस्त्रों को रखने के वाद लक्ष्मण के साथ स्वयं भी उस विशाल 
रथ पर चढकर वन के लिए रवाना हुए । 

नागरिक, वृद्ध, आप्त, मत्री, स्त्रियाँ, बालक, मित्र, आश्रित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य 
तथा शूद्र अत्यधिक दुख प्रकट करते हुए रथ के आगेनन्‍रोछे तथा दोनो ओर भीड लगाकर 
चलने लगे । कुछ लोग मथरा को कोस रहे थे कि उसने इश््वाकु-तरण के गौरव को नप्ट 
कर दिया, कुछ कैकेयी की निंदा करते हुए कह रहे थे कि क्या रघुराम को तपस्वी का 

कु 


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रूप देना उचित था, दूसरे कुछ लोग दशरथ पर क्रोध प्रकट करते हुए कह रहे थे कि 
राजा का इस प्रकार अपनी पत्नी से भीत होना उचित नहीं था, कुछ लोग दु खी होकर 
कह रहे थे कि आज राम तथा सौमित्र अधिकार-रहित होकर कितने अनाथ हो गये ? 
ऐसे भी लोग थे, जो कह रहे थे कि प्राप्त होनेवाले साम्राज्य का भार वहन किये विना 
व्यर्थ ही ये लोग वन में जा रहे हैं ” कुछ कह रहे थे, चौदह वर्ष तक ये लोग कसे 
विपत्तियो को भेलतें रहेंगे ” कुछ मन-हीं-मन सोच रहे थे कि न जाने इस राजकुमारी ने 
किस ब्रत का अनुप्ठान किया है ? कुछ कह रहे थे कि अत्यत दुखी होकर राम के 
वन चले जाने के पण्नात्‌ वुद्धिमान्‌ भरत कंसे राज्य करेंगे ? कुछ सीता की प्रशसा कर रहे थे 
कि कोमलगात्री भूमिन्सुता को पति ने यही (अयोध्या में ही) क्यो नहीं छोड दिया ? 
कुछ आच्चर्य कर रहे थे कि ऐसे पुत्र को वन जाते हुए देखकर न जाने कौसल्या कंसे 
धैयेँं रख सकी ? इस प्रकार, कहते हुए सभी लोग गोक-सतप्त मन “से रथ के पीछेनीछे 
जाने लगे । 
कौसल्या तथा सुमित्रा अत्यत दुख के प्रवाह में डूबी हुई (उनके पीछ) जा रही थी। 
उनके हाथो का सहारा लिये हुए, भुके हुए, दुख से लडखडाते महाराज दशरथ 
रनवास की स्त्रियों के साथ अविरल अश्लु-जल से भरे नेत्रों से, हें राम ! हे राम ! 
का आत्तंनाद करते हुए अत पुर से वाहर निकले । तव रवि का प्रकाश मद पड गया और 
अवकार चारो ओर से आकाश में व्याप्त होने लगा । अग्नि ने अपना सहज वहनन्यूण 
त्याग दिया । पृथ्वी में दरारे पड गई । नक्षत्रों का प्रकाणग मद पड गया । आकाश में 
हू एक दूसरे से टकरा गये । हाथियों का मदजल सूख गया । अबवों की आँखों से अश्रु 
टपकने लगे | छोटे, बडे, बडे, दच्चे, सभी की विलाप-ध्वनि सारे आकाश में व्याप्त हो गई। 
सुर-लोक की कामिनियो का अत्यधिक जआत्तंनाद नगर-निवासियों को सुनाई पडने लगा। 
तव दशरथ ने अश्रुपूरित नेत्रो से रथ की ओर देखा, मगर उन्हें कुछ भी दृष्टि- 
गोचर नहीं हुआ | तव वें उच्च स्वर में चिल्लाने लगे--हे सुमत्र, रथ लौटा लाओ । 
रामचद्र का चद्रविव-सदृश मुख एक वार देखने दो ।” इस तरह नगर के वाहर भी झीघ्र 
गति से आनेवाले महाराज को देखकर रामचद्र सुमत्र से बोले---वह देखो, सूर्यवआधिप 
भा रहे है । रथ की गति तीव्र कर ढो | जीघ्रता करों ।' 
उनकी आज्ञा के अनुसार सुमत्र ने रथ की गति तीत्र कर दी। तब वसिष्ठ राजा से 
मन-ही-मन दुखी होते हुए बोले--हे अनघ, इस प्रकार दुखी होकर तुम्हें 
(अपनी सतान को) भेजना नहीं चाहिए । से सब तुम लौट चलो ।' तब दबघरथ 
रुक गये और अपने पूत्र के रथ की ओर अपलक -दृष्टि से देखते रहे । जब वे आँखों से 
ओमल हो गये, तव उस रथ की घूलि की ओर देखते रहे । जब वह भी दिखाई नहीं पडी 
तव वे ऊँचे स्वर में--हा राम ! हा राम ! का आत्तताद करते हुए पृथ्वी पर गिर- 
कर लोटने लगे । 
“जब उनकी मूर्च्छा छूटी, तब वे अत्यत क्रोव-भरी दृष्टि से कैकेयी को देखकर बोले-- 
तुम्हारी पाप-मत्रणा से अनभिन्न होकर में अपने पृत्र-रत्त को खो बैठा । तुम्हारे साथ 


अयोध्य/कोड 66 


विवाह करके में पत्तित हो गया । सब ' बातो में श्रेष्ठ होते हुए भी में अब दीन-हीन 
हो गया हूँ । में सभी की निंदा का पात्र बन गया । जीवन के अतिम समय में मेने काकुत्स्थ- 
वश की कीत्ति को कलकित किया । हे दुप्टे ! तुम्हारा स्पर्ण भी नही करना चाहिए, तुमसे 
वार्त्तालाप तक नहीं करना चाहिए, तुम्हारा मूँह भी नहीं देखना चाहिए । 


मे 
मे 


इस प्रकार राजा के कहते ही सभी रानियाँ कैकयी को कोसने लगी । कंकेयी सब 
सुनती हुई सिर भुकाये खडी रही । दशरथ तब सतप्त-चित्त से अयोध्या नगर में लौट आये । 
उजड़े हुए-से दीखनेवाले राज-मार्ग में जहाँ-लहाँ ठहरते हुए वे निदान राजभवन 
में वापस आये । कौसल्या भी रनवास में पहुँच गई और धूलि-धूसरित मूँह से थय्या पर 
गिरकर लोट-लोटकर विलाप करने लगी । वें पथराई हुई आँखों से चारो ओर देखती थी 
और वास्वार हा राम ! हा राम ! का आत्तनाद करती थी। वे इस प्रकार भगवान्‌ 
को कोसती हुई, अपने-आपको दोप देती हुईं असह्य दु खका अनुभव करने लगी । वे कह 
रही थी--किचित्‌ भी दुख से अनभिन्न मेरे पुत्र और पृत्रवधू न जाने अब कितनी दूर 
पहुँचे होगे ” न जाने वे कहाँ हैं ? न जाने उन्हें मन-ही-मन कितना दुख हुआ होगा ? 
न जाने वे कैसे वन में निवास करेंगे ? कैसे वे कद-मूल खा्येंगे ?” यो मन-ही-मन वे 
राम तथा सीता के कष्टों की कल्पना करके अत्यत दुखी हो रही थी । सुमित्रा उनको 
सात्वना दे रही थी । 


रामचद्र थोडी दूर जाने के पश्चात्‌, अपने पीछे आनेवाले नगरवासियो को देखकर 
बोलें--- हे सज्जनो, आप सब लोग अयोध्या लौट जाइए और मेरी विजय की कामना 
करते रहिए । भरत की आज्ञा का अनुसरण करते हुए आप सुख-पूर्वक जीवन व्यतीत 
कीजिए ।” तब सब लोगो ने एक स्वर से कहा--हे राम, आप का इस प्रकार कहना 
क्या आपको उचित है ? जब आप वन-वास करने जा रहें हे तव हमें भरत की क्‍या 
आवश्यकता हैँ ? नगर, भवन, वाहन, सौध, स्त्री आदि हमें क्यो चाहिए ? आप जा 
रहे है, तो हम भी आपके साथ वन में चलेंगे । यदि आप हमें मना करेंगे, तो हम प्राण 
त्याग देंगे । इसमें तनिक भी सदेह नहीं है । इस प्रकार सभी प्रजा राम के रथ के 
पीछे-गीछे चलने लगी । 

इस प्रकार, चलते-चलते सध्या तक वे तमसा नदी के तट पर पहुँच गये । उन्होंने 
उस रात को वही ठहरने का निश्चय किया और सध्या समय की पूजावदना आदि से 
निवृत्त हुए । 

राज-प्रासाद में, राजकुमारों के लिए योग्य मृदु शब्या पर घयन करनेवाले मोहना- 
कार राम ने उस दिन, पेड के नीचे, पर्ण-जय्या पर सीता को साथ विश्लवाम किया । उनके 
चारो ओर उनकी प्रजा अपने स्त्री-पुत्रो और घर-बार को भूलकर राम के साथ वन जाने 
का दृढ निर्चय करके गाढनिद्रा में लेट गई । उन्हें नगर लौटाने का कोई और उपाय 
न देखकर, राम ने वद्धें“रात्रि के समय सुमन्न से प्रजा को भुलावा देकर वहाँ से चल देने 
की बात उन्हें समकाकर कहा कि रथ नैयार करके ले आओ । रथ के आते ही उन्होंने 
पहले उसे अयोध्या की तरफ थोड़ी दूर चलाया, फिर उसे लौटाकर तमसा नदी को पार 


९00 रंगनशथ एयायण 


कराया और वृण तथा शिला-आवृत भूमि पर अत्यत वेग से उसे चलाने का आदेश दिया । 
उनका गमन तथा महाराज के आदेश की कथा सुनकर मार्ग के ग्राम-वासी अत्यत दु खी 
हुए और घैयं तजकर रुदन करने लगे । ऐसे कितने ही ग्रामवासियो का रुदन वार-वार 
सुनते हुए माय के विविध वन-दृश्यो को सीता को दिखाते हुए, प्राचीन काल में सूर्य-वश- 
मणि इक्ष्वाकु को मनु के द्वारा दी हुई भूमि का अवलोकन करते हुए अत्यत शीघ्र गति से 
उन्होंने सरयू नदी! को पार किया और दूसरे दिन सध्या तक गगा नदी के तठ पर 
पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने एक इगुदी-वृक्ष के नीचे बडी शान्ति के साथ विश्राम किया । 

वहाँ, तमसा नदी के तट पर अयोध्या की प्रजा ने प्रभात के समय उठकर चारो 
ओर देखा, तो वे सश्रमित तथा आज्चर्य-चकित रह गये। वहाँ न राम-लक्ष्मण थे, न रथ 
का कही पता था । उनके शोक की सीमा नहीं रही । रथ के पहियो के चिह्न देखकर 
उन्होंने सोचा कि कदाचित्‌ महाराज की आज्ञा पाकर राम राज्य-भार को वहन करने 
अयोध्या लौट गये हें । वे अयोध्या को लौट आये, किन्तु वहाँ भी राम को न देखकर वे 
शोकाग्ति में तपने लगे और कहने लगे--हाय ! राम हमें भुलावा देकर चले गये। 
वे राम की दयालुता, उनकी सत्यतिप्ठा तथा सद्व्यवहार की प्रशसा करते हुए उनके वियोग 


ब््क 


में दुख का अनुभव करने लगे । 


१5, गुह से राम की सेंट 

निषादराज चुह को जब यह समाचार मिला कि राघव गगा-तट पर ठहरे हुए है, 
तव वह राम-लक्ष्म्ण की सेवा में कदमूल-फल आदि खाद्य पदार्थ, सुनहले वस्त्र तथा 
विविध उपहार लेकर आया और वडी भक्ति से उन्हें प्रणाम करक॑ सब वस्तुओं को उनके 
चरणों में अर्पित करके कहा--हे देव, क्या कारण हैं कि आप राज-पाट छोडकर वनवास 
के लिए पचारे हे ? हे सूर्य-बण-तिलक, मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपकी ऐेसी दशा क्यों ? 
जिस दुष्ट ने आपकी यह दशा कर दी हैं, उस नीच का मे युद्ध में वध कर डालूँगा ।' 

उसकी सद्भक्ति, शक्ति तथा घीर वचनों को सुनकर राघव अत्यत प्रसन्न हुए और 
उसे गले से लगाकर अपना सारा वृत्तात कह सुनाया । सारी कथा सुनने के पच्चात्‌ 
गृह मन-ही-मन चिंतित हुआ और कैकेयी की करनृत पर दुःख प्रकट करने लगा । उसने 
दगरथ की सरलता पर खेद प्रकट किया और दणरथात्मजो की दुर्दशा का विचार करके 
झोक-पीडित हुआ । राम अत्यत स्नेहातुर हुए और आप तथा लक्ष्मण दोनो ने उचित रीति 
से गृह के दुख का शमन किया । 

इतने में सूर्यास्त हो गया । राजकुमारों ने सध्या-बदन आदि से निवृत्त होकर गगा- 
जल से अपनी क्षुत्रा जात की । उसके पश्चात्‌ राम, जानकी तथा लक्ष्मण तृण-शय्या पर 
विश्वाम करने लगे । सूत (सुमत्र) तथा श्यगवेरपुर का स्वामी गृह उनकी सेवा में लगे रहें। 
झ__ 2 ते ॒ाे/  घखफ०हढल्‍लइसउल्आ् ॒ञट/ट ३७ ३ _उ ३ ३ ९३९ृउृउ_रट् ए#॒£ः 


१ सरयू नदी तो अयोध्या से उत्तर होकर बहती है ओर फिर बिहार में प्रवेश 
करती है । राम दक्षिण की ओर चले थे, उन्हें सरयू नदीं कैसे मिलती ? वाल्मीकि ने 
गंगा के निकट पहुँचने के पहले राम को वेदश्रुति और गोमती नदी को पार 
उत्तरवाया हैँ ।--सम्पादक 


ऋयोध्यशकोीड १०९ 


लक्ष्मण ने चौदह वर्ष तक अपने भाई की रक्षा में सलग्न रहने के उद्देश्य से दिन- 
रात कभी नही सोने की प्रतिज्ञा की और घनुष-बाण धारण किये अपने भाई की जअय्या से 
थोडी दूर पर खडे हो गये। उस रात को निद्रा देवी स्त्री का रूप धारण करके आई 
ओर लक्ष्मण से बोली-हे मानधनी, मे निद्रादेवी हूँ । विधि के निर्दश का पालन तो मुश्मे करना ही 
होगा। आप मेरे लिए क्‍या व्यवस्था देते है, जिससे मे आपको छोड़कर चली जाऊं ?' 

तब लक्ष्मण बोले--ठतुम दिव-रात ऊर्मिला पर हावी होकर रहो । अवधि पूरा 
करके में तुम्हें ग्रहण करूँगा ।' उनका आदेश शिरोधाय॑ करके निद्रा चली गई और लक्ष्मण 
भी निद्रा देवी की कृपा प्राप्त करके सतुष्ट हो गये । 

उसके पश्चात्‌ लक्ष्मण ने सुकुमार यौवन-शोभा-सपन्न तथा धीरचेता राम एवं 
सीता के दुख का वृत्तात गृह को कह सुनाया और कहा--हस-तूलिका-तल्प (हसो के 
पखो से बनाई हुई कोमल गद्दी) पर शयन करनेवाले (भोगी) आज खुरदरे पत्थरों पर 
बिछी पललव-शय्या पर पत्थरों के चुभते रहने से परेशान होते हुए किसी तरह गाढ निद्रा 
में खर्राटे भर रहे है । इसके पश्चात्‌ उन्होंने गृह को माता कौसल्या और सुमित्रा के 
शोक का वृत्तात सुनाया और दोनो अत्यत शोकमग्न हो गये । 


इतने में अरुणोदय हुआ । राघव ने निष्ठा से प्रात काल के सब विधि-विधान 
पूरा किये । उसके पदचात्‌ उन्होंने गृह के द्वारा वट का दूध मेँगाया, लक्ष्मण तथा अपने 
कोमल तथा दीघे केश खोलकर उन्हें उस दूध से जहाँ-तहाँ भिगोकर उनकी जटाएँ वनाई। 
वेदेही विवश तथा क्षुब्ध हो देखती रही । फिर अनुज के साथ राम ने वडी निष्ठा से वैखानस- 
वृत्ति (वानप्रस्थ की एक शाखा) ग्रहण की । 

तत्पण्चात्‌ राम ने सुमत्र को पास बुलाकर कहा--हे सुमत्र अब हमें रथ पर चढना 
नही चाहिए । अत , तुम रथ को लेकर अयोध्या को लौट जाओ और राजा की सेवा में 
प्रवृत्त हो जाओ । महाराज को तथा माताओं को हमारे प्रणाम कहना । तब सौमित्र ने 
क्रोध से कहा--अब भी ऐसी बातें क्यो ? (शात्तिपूर्ण बचन क्यो ?) उनसे मेरी ओर 
से कहना कि अपनी स्त्री की प्रेरणा से उन्होंने नीति-अ्रप्ट होकर, किसी बात का विचार 
किये विना ही हमारी ऐसी दशा कर दी । अब वे अपनी स्त्री तथा प्रिय पुत्र के साथ 
राज-भोग का अनुभव करें । अब तुम जा सकते हो । लक्ष्मण की बातो से अप्रसन्न होकर 
राम ने कहा--सौमित्र, तुम अपनी वार्ते बन्द करो । और, सुमत्र को सवोधित करके 
कहा-- तुम ये बातें राजा से मत कहना । यदि वे ये वातें सुनेंगे,तो और अधिक दुख से 
पीडित होगे । तब सुमत्र ने अत्यधिक शोक-सतप्त तथा अत्यत भीत होकर कहा-- 
है देव, आपको वन में छोडकर मे दीन की तरह अयोध्या कैसे जाऊँ ? में प्रजा से यह 
समाचार कैसे कहें ? में यह रिक्त रथ किस मूह से ले जाऊँ ? कौसल्या को मे कैसे 
सात्वना दूँ ? कैकेयी का मूह में कैसे देखूँ ” नहीं, यह मुझसे नहीं हो सकता । में भी 
आपके साथ चलूँगा ।॥' 

तब राम हँसकर बोले--हमने गगा पार करके वन में प्रवेश किया है, यह समाचार 
तुम जब जाकर कैकेयी से कहोगे, तभी वे उसे सत्य मारनेंगी । इसलिए तुम शोक न 


९0९ रंगन/था एागयायर 


करके लौट जाओ । मेरे बदले तुम राजा को वार-बार घैये देते हुए, उनकी सेवा करते 
रहना ।' तब अत्यत दीन होकर सुमत्र साकेत नगर के लिए रवाना हुए। 


१९, राम का गंगा पार करके वन में प्रवेश करना 

राघव ने बडी भज्ित के साथ मन-ही-मन अयोध्या नगर को प्रणाम किया और गुह 
की लाई हुई नाव में वेठकर गगापार करने लगे । बीच वारा में पहुँचने पर सीता ने 
गगा नदी को भक्ति के साथ हाथ जोडकर प्रणाम किया और अत्यत विनीत भाव से 
प्रार्थना करने लगी--हे माता गगे ! दशरथ नृप की आजा से राज त्यागकर दु्दंगा को 
प्राप्त मेरे पति घोर कानन में चौदह वर्ष तक निवास करने जा रहे हे । में उनके साथ 
अ्मण करती हुई (अवधि-समाप्ति पर) यदि राम-लक्ष्मण के साथ सकुशल लौट आऊंगी, 
तो आपकी सेवा में असख्य गायें, वस्त्र, मिप्टान्न आदि विविध चढावें समर्पित करूँगी और 
भूसुरो को दान दूगी ।' इस प्रकार उन्होंने भव-भग (ससार के पापो का नाश करनेवाली ) 
घवलाग (धवल शरीरवाली) भवमौलिसग (जिव के जटाजूट में निवास करनेवाली) 
गगा की प्रार्थना की । 

गगा नदी पार करने के पण्चात्‌ राम ने गृह का आभार मानकर उसे विदा किया 
और उसके बताये हुए मार्य से सीता को वीच में करके आगे-आगे लक्ष्मण तथा पीछे-्यीछे 
स्वयं चलने लगें । इस प्रकार तीन योजन का मार्ग तय करके सुधर्मद नामक सरोवर के 
निकट पहुँचकर उस दिन वही ठहर गये। उस भयकर कानन में अकेली सीता को सोती 
हुई देखकर, अपनी दजया; अपनी साताओ का जोक कैकंग्री की इच्छा की पूर्ति, महाराज की 
सत्य-निप्ठा, प्रजा का दुख--इन सब के वारे में अपने अनुज से कहते हुए रामचन्द्र की 
माँखो से अश्चु बहने लगे । 

रात्रि व्यतीत हुई । प्रभात- होते ही राघव वहाँ से रवाना हुए और तीत योजन 
चलकर पवित्र गगा तथा यमुना के सगम-स्थल पर प्रयाग पहुँचे । वहाँ निवास करनेवाले 
मुनिलोक-वद्य भरद्वाज मुनि को देखकर राम ने उन्हें प्रणाम किया और सारा समाचार उनसे 
निवेदन किया । उस तपोंधन ने रघुवशज उन दोनो भाइयो को आशीर्वाद दिये, रघुराम 
की सुथोलता पर आच्चर्य प्रकट किया और तथ्य को जान गये । उन्होंने कद-मूल-फल 
आदि से उन्हें सतुप्ट करके बडे प्रेम से उनका सत्कार किया । वहाँ उन्होने बडे आराम 
से रात विताई और प्रात काल ही वडी निप्ठा से सध्योपासना करके मुनियो के आगीवदि 
प्राप्त क्येि । इसके पश्चात्‌ पुण्यात्मा भरद्वाज से अनुपम चित्रकूट पर्वत का मार्ग जानकर 
वे वहाँ से विद्या हुए | वन के बीच राम अपने घतुव की टकार-मात्र सुनकर भागनेंवाले 
मृग-समूहो को सीता को दिखातें हुए उनका मनोरजन करते जाते थे । जब वें थक जाते 
या सीता थक जाती थीं, तो थोडी देर के लिए ठहर जाते और फिर चल पडते । इस 
प्रकार कई दुर्गम स्थलों को पार करके वे यमुना के तट पर पहुँच गये । यमुना को पार 
करते ही उन्होंने सिद्ध-वट्वृक्ष (अक्षय वट) को देखा । सीता ने बड़ी भवित से अपनी 
कायसिद्धि-हेतु हाथ जोडकर उस वृक्ष की प्रार्थना की । वे उस रात को वहीं ठहर गये। 
और, दूसरे दिन घोर जगलो में मुरक्षित मार्ग से होते हुए उन्होंने माल्यवती से घिरकर, 


आयोध्याकाड ९०३ 


श्रेष्ठ सयमी मुनियो के निवास-स्थान से होते हुए सुललित तरु-लताओ के समह से भरे 
चित्रकूट को देखा । उस पर्वत पर निवास करनेवाले तपोधन मुनियो को देखकर उन्होंने 
प्रणाम किया और उनसे उचित आदर-सत्कार प्राप्त किया । फिर, उनकी आजा प्राप्त 
करके राम और उनके अनुज दोनो थे एक स्थान पर बडे उत्साह से पंडो की गाखाओं 
को 'काटकर अनोखी पर्णशाला बनाई । एक काले हिरन का वब करके गृह-शान्ति तथा 
हवन-आदि विधिवंत्‌ पूरा किये । उसके पछचातू राम और सीता ने उस पर्णशाला की 
प्रशसा करते हुए उसमें प्रवेश किया और मूनियो की प्रञसा प्राप्त करते हुए उनकी चरित्र- 
चर्चाओ में आनद लेते हुए वहाँ रहने लगे । 


२०, काकासुर-बृत्तांत 

एक दिन सीता की जाँघ प्र सिर रखे राम सोये हुए थे । सीता भोजन के लिए 
कद-मूल-फल आदि तैयार कर रही थी । तब निर्भय गति से एक दुष्ट कौआ पर्णशाला में 
प्रवेश करके उसका नाश करने लगा । सीता ने उसे भगाने का प्रयत्न किया, फिर भी वह 
भागा नहीं । वह इधर-उधर देखकर अत में सीता के स्तन पर बंठकर चोच मारनें लगा । 
जब रक्‍त की धारा वहने लगी, तब राम जाग पडे । उस दुप्ट कौए की करतूत पर कऋ्रद्ध 
होकर राम ने उस पर एक बाण चलाया । उसने कौए का पीछा किया । कौआ काँव-काँव 
करता हुआ (उस बाण से बचने के लिए) तीनो लोको का चक्कर काटने लगा । मगर कही 
कोई रक्षक-नही मिला। उसने विकपाल, ब्रह्मा तथा शिव की शरण माँगी । किन्तु उन्होंने कहा--- 
यह श्रीराम का शर हैँ । इसे हम रोक नहीं सकते । तब वह कौआ फिर राम की 
शरण में आया । तब अत्यत कृपा से उस कौए को देखकर राम ने कहा--मेरा बाण कभी 
खाली नहीं जायगा । अत तुम अपना कोई अग उसे देकर अपनी जान बचाओ । तब 
कौए ने बडी भक्ति से अपनी एक आँख उस अस्त्र को भेंट की और वहाँ से चला गया । 
तब राम ने देवताओ को सीता के तैयार किये हुए फल आदि का भोग चढ़ाया और उसको 
पश्चात्‌ सब लोगो ने उन फलो को ग्रहण किया । * 


२१. सुमंत्र का अयोध्या पहुंचना 
वहाँ सुमत्र राम की गति-विधि जानने के लिए तीन दिन तक गुह के साथ रहे । 
फिर दूसरे दिन उन्होने घोर दुख से पीडित होते हुए अयोध्या नगर में प्रवेश किया । 
सहज श्रो से हीन उस राज-मार्ग में जब वह जाने लगा, तब नगरवासी रथ की ध्वनि 


। 


सुनकर यह कहते हुए सुमत्र के पास आये कि देखो, रामभद्र आ गये है । किन्तु रथ में 
रघुराम को न देखकर वे सुमत्र से कहने लगे--हे क्रकर्मी, राम के विना यह रिक्त 
रथ यहाँ कयो लाये हो ?” इस प्रकार लोगो की भीड एकत्रित होकर उनकी निंदा 
करने लगी । सुमत्र उन्हें रामचन्द्र का वृत्तात सुनाते हुए राजा के अत पुर के निकट आ 
पहुँचे । वहाँ रथ से उतरकर वे राजा के निवास की “ओर “गये । उन्होंवे घूलि-घृसरित 


कक 


शरीर तथा अश्रु-पूरित नयनों से, नन-ही-मन कुढनेवाले राजा को अविस्त दुख से अभि- 


ध्शु 


भूत द्वोकर कौसल्या के घर में पडे और विलाप करते हुए देखा । उन्होने राजा को प्रणाम 


१०9 रंगनाथ एश्यायपे 


करके कहा--हे राजनू, आपके पुत्र-रत्न सत्यनिप्ठ राम तथा लक्ष्मण, दोनो ने जठाएँ 
धारण किये, गया को पार किया और पैदल चित्रकूट पर्वत की ओर चले गये हे ।' 

इन वचनो को सुतकर राजा अत्यविक शोक करने लगे । उन्होंने सुमत्र को अपने 
निकट बुलाकर अपने पुत्र का समाचार विस्तास्थ्ूर्वक जाव लिगय्य और उसके पछचात्‌ 
गोले-- हैं अनथ, सुमत्र, हें मतिमान्‌, तुम्हारे कारण में अपने रामभद्व का कुशल-समाचार 
जान पाया । नंत्रो का दुख तवा मन का जोक दूर करनेवाले उसे (राम को) जी भरकर 
देखे बिना मेरे ये प्राण चरीर में रहतें नहीं दीखते | तुम मुझे राम के पास 
ले चलो ।॥ तब सुमत्र वोले--राजन्‌, णदि आप श्रीराम के पीछे जायेंगे, तो प्रजा को दुख होगा 
और कैकेयी आपकी निद्य करेंगी | अत यह आपके लिए उचित नही है 
मानवेंद्र,, आप इतना दुख मत कीजिए, बैयें धारण कर धर्म का पालन करते हुए पुण्यवान्‌ 
वनिए । समस्त दुख भूलकर विवा किसी अभाव का जबुभव किये आपके पुत्र कानन में 
सुख-यूवंक रहते हैं ।' 

इसके पब्चात्‌ सुमत्र ने लक्ष्मण के वचन राजा को लुनाये, तो राजा जत्यधिक ग्लानि 
का अनुभव करते हुए वोलें--सौमित्र के वचन सत्य है । मे वसा ही कामाव हूँ । क््र- 
कर्मी तबा पापी हूँ ।” इस प्रकार कहते हुए राजा ने सुमत्र को भेज दिया और स्वय मत- 
ही-मन कुढने लगे । उन्हें देवकर कौसल्या बोली--हें राजनू, अब है राम, हे राम, का 
बआात्तंनाद करते हुए चिंतित क्‍यों हो रहे हैँ ? क्यो ऐसा स्वाग भरते हे ? इस तरह झोक 
का अभिनय क्यो कर रहें हैँ ? क्‍या में सब वातें नहीं जानती ? लोक-निंदा के भय से 
आपने स्वय कैकेयी कोसारी वार्तें सिखा दी थी । फिर जपने राम का राज-तिलक करके 
उसे समस्त पृथ्वी का पालन कराऊँगा, ऐसी घोषणा करके आपने उसे वन भेज दिया है । 
आप महादुटट है । आप का भी कोई धर्म हूँ ? निंदा के भय से आपने मेरे पुत्र का राज-तिलक 
रोकने के लिए उसे वन भेज दिया हैँ । निस्लकोच होकर यदि कैकेयी राम का ववद 
करने के लिए भी कहें, दो आप उसका वव भी कर देंगे । वहुत समय तक सतानहीन 
होकर में दुखी रहती थी। निंदान कितने ही जप-तप और क्रत्तो के उपरात मेने इस इकलौते 
पुत्र को प्राप्त किया था और इससे मेरा चित्त कुछ जात हुआ था । आपने मुझे शात 
रहने भी नहीं विया !' 

इस प्रकार निदा करनेवाली कौसल्ण को देखकर राजा अपनी पूर्व-क्था उन्हें 
सुनाने का विचार करके वोले--है कौसल्वे ! तुम जो कुछ कह रही हो वह सत्य ही है । 
में निग्चच हो पापक्तर्मी हूँ | ज्व बहुत समय तक मेरे झरशौीर में प्राण नहीं रहेंगे, इसलिए 
चिढा-चिढाकर मुझ्के मत मारो । मेने जो पाप-कर्म पहले क्ये थे, वें वैसे ही नही टर्लेंगे 
देवताओं को भी अपने कर्म का फच अवध्य भोचना ही पडता है । में अपनी एक कया 
सुनाऊँगा । तुम उसे सुनो 7 

२२. दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना 

प्र मेरी यढावस्थाकी वात हैं। में सारे राज्य पर शासन करता था । एक दिन 

अर्द्धरात्रि के समय में मगया की इच्छा से बनुयनवराण लिये सरय्‌ नदी के किसी अनुपम 


अयोध्याकोड ९०१ 


वाट के निकट भ्राडियो में छिपा बैठा था । विविध मृग-समूहो के पानी पीने का झब्द 
मुझे सुनाई पडने लगा । जैसे-जैसे शब्द सुनाई पड़ने लगा, वैसे-वैसे मैने शब्दवेधी वाण 
चलाकर उनका वध कर डाला । मेँ इससे सतुप्ट न होकर वही ताक में बैठा रहा । उस 
समय यज्ञदत्त नामक एक मुनि-पुत्र वहाँ आया और अपना जल-कलश पानी में डुबोया । 
कलज के डूबने से जो गठ्गट' की ध्वनि सुनाई पडी, उसे सुनकर मुझे भ्रम हुआ कि वह 
कोई मत्त गज है । नुरत मंत्र (बब्दवेघी) वाण चलाया । उस तीक्र शर के लगते ही-- 
है पिता, हे माता, का जआत्त॑नाद मेरे हृदय को चौरकर निकल गया । वह मुनि-पुत्र पृथ्वी 
पर गिरकर कहने लगा--हाय, में वनों में कन्द-मूल-फल खाते हुए तपस्त्री का जीवन 
व्यतीत करते, अपने माता-पिता की सेग करता रहता हूँ । मेने किसी का अहित 
नही चाहा । मुझे ऐसी घोर मृत्यु क्योकर प्राप्त हुई ? कोई पापी रात के समय, रति- 
केलि में प्रवृत्त मुगो का वध नहीं करता | कौन है वह मदाध, जिसने अद्धं-रात्रि के समय 
मुकझपर वाण चलाया है । न जाने उसकी क्या दुर्गति होगी ? अब मेरी मृत्यु को वह 
कैसे रोक सकेगा 2? हाय सेरे अधे, दीन तथा वृद्ध माता-पिता इस पुत्र-शोक को कैसे 
सह सकेंगे ”? 'रात अधिक बीत गई है, अकेले गया हुआ है, उसके आने में इतना, विलव क्यों 
हो रहा है--ऐसे सोचती हुई न जाने मेरी माता कितना दुगब करती रहेगी ? मेरे पिता 
मेर नहीं लीठने का समाचार मेरी माता से कहकर न जाने शकाकुल मन से कितने व्याकुल 
होते होगे ? वे सोचते होगे कि बाल-सुलभ-कौतृक में व्यस्त, हमारा पृत्र अभी तक लौटा 
नही है । या सोचते होगे कि शायद जल लाने में असमर्थ होकर वह वही रह गया हैं । 
यदि वे मेरी मृत्यु का समाचार सुन लें, तो न जाने उनकी वया दश्शा होगी ? उन्हें कौन 
जल ले जाकर देगा ? उनकी रक्षा आगे कौन करेगा ? हाय, इस एक शर से हम 
तीनो की मुृत्य्‌ू एक साथ हो गई । विधि के क्रूर विधान को में क्या दोष दूँ ?” 

“उस मुनि-पुत्र का आत्तनाद सुनकर में : अत्यत क्षोभ-यूवत्त हो, उस महापुरुष को 
देखने की तीत्र उत्कठा लिये हुए अधकार के दूर होने की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में 
उस वनधि (वन) में मेरी शोक-वनधि (शोक-समृद्र) उमडाते हुए चद्रोदय हुआ । तंब मेने 
सरय नदी को पार किया और उत्तर की दिशा में ढदने लगा | वहाँ मेने एक स्थान पर 

नि-कुमार को अपने हाथ में जल-कलश को नीचे रखकर अपना कपोल कलश के मृह पर 
टेककर पड़े हुए पाया । उसके वक्ष तथा पीठ से वहनेवाली रकत-धाराओ से सारा शरीर 
भीग गया था । उसकी शिखा खुल गई थी और अत्यधिक पीडा से उसका मुख काति 
हीन हो गया था । शर के भीतर प्रवेश करने से वह इस प्रकार पडा हुआ था, जैसे कोई 
योगी आत्मचितन में लीन हो और वह दैहिक व्यापारों को रोक, इद्रियो की गति का दमन 
करके अतिम योग-त्रिण में विस्मत होकर पडा हो । 


“उस सदर आछक्लतिवाले मुनि-क्ुमार को तथा अपने ज्ाण को देखकर में घबडा गया। 
तुरत मेने नदी से ज्ल लाकर उस मुनि-वुमार की आंखे पोछी त्था ज्ररूका सारा 
दरीर पं.छ डला और फिरवल्ने लगा--हाय मुन्निथ | प्रमादव्श मेरे शर ने आपका वध 
कर डाला। इस नदी में जल के लिए आप व्यो आये ? में अब इस पाप से कंसे मुवत होऊंगा ? द 

९४ ्््ि 


66 रंगनशथ एया/यगी 

“इस प्रकार में अपना दुख प्रकट कर रहा था कि मुनि-कुमार ने आँखें खोली । 
उसने अपनी ओर, फिर मेरी जोर देखा, और मेरें भय को देखकर कहा--हे राजन ; 
आप क्‍या करेंगे ? आप क्यो दुखी होते है ? मुझे मारते की शक्ति आपमें कहाँ है ? 
दैवयोग से ही मेरी ऐसी गति हुई है । इसके लिए आप क्‍यों ज्ञोक करते है ? आपने 
तो हाथी समझकर वाण चलाया था | जान-वूभकर तो नहीं चलाया । ब्रह्म-हत्या का दोष 
भी आपको नही लगेगा; क्योकि मे ब्राह्मण नहीं हूँ । में वैश्य-पिता और बूद्ग-माता से उत्पन्न 
हुआ हूँ । मेरी मृत्यु देखकर आप विचलित मत होइए । आप मेरे माता-पिता को मेरी 
मृत्यु का सवाद न भी दें,तो भी वे योग-दृष्टि से सभी वातें जान लेंगे | तब यदि वे 
ऋ्रद्ठ होकर आपको ज्ञाप देंगे, तो उससे रघुकुल का क्षय हो सकता है । हे राजेन्द्र, इस 
पहाड़ के निकट पश्चिमी कोने में एक वटवृक्ष है । उसी वटवृक्ष के पास में एक काँवर में 
विठाकर बडी श्रद्धा से उनकी सेवा-शुश्रूपा में लगा रहता हूँ । आज रात भी में उन्हें 
उत्त वृक्ष के कोटर में विठाकर आया हूँ । आप ज्ञीत्र इस कलश का जल लेकर वहाँ 
जाइए औकौर उन्हें सावधानी से नीचे उतारकर निर्भय होकर उन्हें सारा वृत्तात सुनाइए । 
हे राजन ! इस अस्द्र के साथ मेरी मृत्यु अनुचित है । इसलिए धीरे-धीरे यह वाण निकाल 
दीजिए । शरीर की पीडा जब मुभसे सही नहीं जाती । मेरे प्राण जब नहीं रहेंगे ।' 

“मुन्ति कुमार के इन वचनो को सुनकर म॑ धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचा ।' अत्यविक 
आत्म-नलानि से पीड़ित होते हुए मेने उस शर को निकालने के लिए हाथ वढाया, किन्तु 
भय से मेरा हाथ रुक गया । फिर साहस बटोरकर काँपते तथा दुखी होते हुए मेने उस 
शर को निकाल दिया । उसी क्षण मुनिकुमार की मृत्यु हो गई । 


“मन-ही-मन दु खी होते हुए में जल-कलश लेकर भुनि के आश्रम में पहुँच गया और 
वहाँ अपने सुत की प्रतीक्षा करते हुए पर-कटे पक्षियों की तरह पडे हुए बुद्ध तथा अधें 
पुण्यात्माओं को देखा । निकट सुनाई पड़नेवाली आहट सुनकर मुनि कहने लगे--हें पृत्र, 
इस प्रकार कही विलम्व किया जाता है ? मे तुम्हारी माता के साथ यही सोच रहा था 
कि इतना विलब करने का क्‍या कारण हैं ? क्‍या तुम एक ही स्थान में इतने समय 
तक ठहर सकते हो ? तुमने कहाँ इतनी देर लगाई ? तुम्ही तो हमारी आाँखें हो । 
हम अत्यत वृद्धों के लिए तुम्ही आधार हो । हम गतिहीनों के लिए तुम्ही सदगति हो । 
भला, तुम बोलते क्यो नही ? मेने तुम्हें कहा ही क्या है ? हे पुत्र, मे तो केवल जल 
माँग रहा हूँ ॥ 

“मुनिके ये वचन मेरे मन के भय और जोक को बढाने लगे । मंने शीघ्र वृक्ष पर 
चढ़कर काँवर नीचे उतारा और अत्यत दीन होकर थर-बर काँपतें हुए, एक क्षण तक इस 
दुविधा में पडा रहा कि सारा समाचार कहूँ या न कहूँ । फिर यह सोचकर कि किसी 
भी तरह मु्भे कहना द्वी पडेंगा, मेने गदगद स्वर से कहा--हें उत्तम तपस्वी, मे राजा 
दशरथ हैं । में आपका पालक हैं, पुत्र नहीं हूँ । मेतरे आज एक ऐसा नीच कर्म किया है, 
जिसे सुनकर नीच व्यवित भी मेरी निंदा करेंगे | किसी भी युग में किसी और ने जो पाप 
मही किया होगा, वैसा पाप करके में आज आपके पास आया हूँ । में कैसे कहें ? विधि ने 


आअयोध्य/काड ९०७ 


ही मुझसे ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित किया है । सरय्‌ नदी के तट पर मे अँबेरी 
निज्ञा में मृया के लिए गया था और मूृगो के आने के स्थान के पास छिपकर उनकी 
आहट सुनकर उनपर शब्दवेधी बाण चलाकर उनका शिकार करता था । संयोग की वात, 
उसी समय आपके पूत्र ने नदी के प्रवाह में जल के लिए कलश डुवोया । उसकी ध्वनि 
सुनकर मुझे हाथी का भ्रम हुआ और मेने बाण चला दिया । हे अनघ, मेरे उस शक्ति- 
शाली बाण ने आपके पुत्र के प्राण हर लिये । 

“इतना सुनना था कि मुनि का हृदय घक्‌ से रह गया और वे मूच्छित हो गये । 
मुनि-पत्नी 'हाय पुत्र !” कहकर भूमि पर निश्चेष्ट हो गिर पडी । थोडी देर के बाद मेरा 
बविलाप सुनकर उनकी मूर्च्छा छुटी, तो उन्होंने मुझे देखकर कहा--हे दशरथ ! तुमने हमको 
शोकारिन में जलाने के लिए हमारे पुत्र को कहाँ छिपा रखा है ? वन में तपस्या करते हुए 
हम अधे तथा वृद्ध को मारकर तुमने घोर पाप किया है । तुम्हारा बाण लगते ही 
न जाने हमारे पुत्र ने क्‍या कहा होगा ? कौन जाने कि उस हृदय-पीडा से उसके प्राण 
मिकल गये या अभी तक वह तडप रहा है । क्‍या मृत्यु का कोई कारण नहीं होना चाहिए 
क्या वाण विना कारण ही मुनि-पुत्र के प्राण हर सकता है ? वानप्रस्थ-आश्रम में जीवन 
व्यतीत करनेवालो का वध, चाहे इन्द्र भी करें, तो उसका भी नाश हो जाता है, तो राजा 
की क्‍या गिनती ? हे राजन, तुमने अनजान में हमारे पूत्र का बव किया है, इपलिए तुम 
पर क्रोध करना उचित नहीं है । अपने पुत्र को देखे विना हमारी श्ोकाग्ति ज्ञात नहीं 
होगी । हमें अपने पुत्र के पास ले चलो ।' 

“इस प्रकार शोक-विह्‌ वल उन वृद्ध तपस्वियो को ले जाकर उन्हें उनके पुत्र को 
दिखाकर मेने कहा--यही आपका पुत्र है। मुनि-पत्नी हाथो से टटोलतें हुए कहने लगी, 
कहाँ है वह दयालू, उदार और विमलचेता ? कहाँ है वह तपोधन तथा पुण्यवान्‌ ? 
कहाँ है वह विद्वानो की प्रशसा के योग्य आचरणवाला ? कहाँ है वह सतत वेदाध्ययन 
में तत्पर ?” यो कहती हुई वह अपने पुत्र पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर उन्होने 
उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके भीगे हुए केशों पर सिर रखकर रोती हुई 
कहने लगी--हे विमलात्मा, हे यज्ञदत्त, हे सदाचरणवाले, हे धर्म-निपुण, तुम हमसे कहे विना 
कभी कही नही जाते थे । आज तुमने ऐसा क्यो किया ? आज स्वर्गलोक की यात्रा 
के लिए जाते समय तुमने मुभसे क्यों नही कहा ? हे मेरे वश-तिलक ! में बडी पापिनी हूँ । 
अद्धं-रात्रि के समय मेने तुमसे (जल के लिए) जाने को कहा । गृरुजनो की भक्ति 
में ससार में अद्वितीय पुत्र को मैने खो दिया । मेरे लिए अब तपस्या किसलिए ? तुम्हारे 
साथ परलोक जाने में ही मेरी सदुगति है | कहाँ तीक्षण बाण और कहाँ तुम्हारे प्राण ? 
कहाँ राजा दशरथ और कहाँ तुम ? हाय ! अन्त में तुम्हारे कर्म-फल ने इन सबका 
संयोग करके तुम्हारे प्राण ले लिये है ।' 

“शोक-सतप्त माता के इस तरह के आत्तेनाद को सुनकर मुनि अपने पुत्र पर गिरकर 
कहने लगे--हाय पुत्र ! तुम तो मेरे पास आकर मेरी सेवा करते थे । आज मे तुम्हारे 
पास आया हूँ, तो भी तुम मेरी सेवा-शुभूषा नहीं करते हो, क्‍या तुम्हें यहु उचित है ? 


ढ़ 


९०८ रंग्ना/थ एयायर 


इस ' बाण से जो घाव तुम्हे लगा, उसके द्वारा क्‍या तुम्हारा सारा निर्मल गृण-समह निकल 
गया ? से अब किसे बेद पढाऊँगा ? किसे अब णास्त्र समभाऊँगा ? किसे धर्म सुनाऊँगा ? 
काव्य किसे समभाऊंगा ? हमारी आवश्यकता पहचानकर हमें कौन फल तथा जल 
लाकर दंगा ? मेने सदा तुम्हें चिराय रहने का ही तो आाज्ञीर्णद दिया हैं ? कव मेने वद्नसम 
शवित॒णाली वाण से तुम्हारी मृत्यु की कल्पना की थी ? हें पुत्र, तुम मुझे भी अपने साथ 
ले चलो, तो से भी पृत्र-भिक्षा देने की प्रार्थना करूँगा । ससार की यही रीति है 
कि पुत्र अपने माता-पिता के परलोक-सवधी क्िया-कर्म करते है । जाज विधि ने उस 
क्रम को उलठ दिया जौर तुम्हारे क्रिया-कर्म करने के लिए हमें नियोजित किया । जबतक 
तुम रहें, तुमने बडी भवित से हमारी सेवा करके हमारी रक्षा की । हे पुण्यचरित्र ! 
में किस युग में तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करूँगा ? तुम पाप-रहित हों, श्रेष्ठ तपोनिधि 
गुरुभक्त, परमार्थी, आय, धर्मनिष्ठ, दानी, पर-दु खनिवारण करनेवाले, अन्न आदि महादान 
करनेवाले जो पुण्य लोक प्राप्त करते है, वही तुम भी प्राप्त करो । 

“इस श्रकार शोक करते हुए उन्होंने अपने पुत्र का यथाविधि अग्नि-सस्कार किया । 
यन्नदत्त ने देवताओं के विमान में आरूढ हो आकाश की ओर प्रस्थात करते हुए कहा-- 
है गृहजनो, मेने स्वर्गलोक का भोग प्राप्त किया है. आपकी सतत सेवा करते हुए पुण्य- 
वानू हुआ हूँ | अब मेरी मृत्यु का आप जोक मत कीजिए.) जिस समय जो होता चाहिए, 
वह हुए कना नहीं रहता । होनहार होकर ही रहता है । आप इन पर (राजा पर) 
क्रोव न कीजिए ।” इस प्रकार कह उसके स्वर्गलोक चले जाने के वाद, उन्होने पृत्र-ओ्रेमजत्य 
दुख-से प्रेरित होकर मुझे ज्ञाप दिया--हे राजनू ! लो, हम पुत्र-्शोक से मर रहे हें, 
तुंम भी हमारे समान ही पृत्र-्ञोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे ।! इस प्रकार, कहकर 
उन्होने वही अपने प्राण छोड दिये । 


२३. दशरथ का स्वर्गवास 


यही मेरा कर्मं-फल है, जिसे भोगने का समय आसच्न है । अग्तिसम पवित्र उन 
तपस्वियो का अग्नि-सस्कार करके में नगर में लौट आया । मेरा घैर्यं छूट गया है । मेरी 
वृद्धि श्रमित हो रही है, कठ सूख रहा है, आँखें देखने में असमर्थ हो रही है, दूसरे के 
गब्द सुनाई नहीं पड रहे हे, अब मेरे प्राण रोकने पर भी इस झारीर में नहीं रुकेंगे । 
मेरे लिए कल्पतरु, बुद्धिमान्‌, पराक्रमी, गुणगन्‌, मेरा भाग्य-अ्रद, शुभ-गुण-सयुवत राम को 
इस समय में नहीं ठेख पा रहा हूँ । बजाज सात दिन हुए, मेने राम को नही देखा । राम 
को छोडकर में कैसे रह सकता हूँ ?! इस प्रकार हा राम ! हा राम !' का आत्तंनाद 
करने हुए दशरथ का स्वर्गवास हो गया । 

शोक से अत्यधिक पीछित होकर राजा सो गये है, ऐसा सोचकर कौसल्या भी 
सो गई । प्रभात होते ही वदी तथा मागव स्तुति-पाठ करने लगे, मगल-वाद्य बजने लगे और 
नगर-निवासी एकत्रित होकर राजा के वर्णनार्थ उत्कठा से प्रतीक्षा करने लगे । प्रतिदिन 
की तरह राजा बवतक जगे क्यों नहीं, यह सोचते हुए परिचारक राजा की शशब्या के 
निकेट गये और राजाको सोई हुई दणा में देख उन्हें कुछ भय हुआ । लवी साँस भरतें हुए 


अयोध्याकाड ९०6 


उन्होने राजा के हाथ-पैर छकर देखे । उन्हें अब ज्ञात हो गया कि राजा के बरीर में 
प्राण नहीं है । तव वे रुदन करने लगे । कौसल्या हडग्डाकर उठी, सुमित्रा भी जागकर आई। 
उन दोनो ने राजा को देखा और ऊँये स्वर में विलाप करने लगी--हाय प्राणनाथ, 
हाय महाराज ! आप हमें छोड़कर चले गयें। यह विलाप सुनकर कंकेयी दीडी हुई आई। 
दोनो ने सर पोटते हुए कैकेयी को देखकर कहा--हाय कैकैयी ! आज तुम्हारी 
इच्छाएँ पूरी हुई । तुमने कात्स्थ-वश का सर्वनाश किया । राम को वन में भेजकर 
अपयश का सहन करते हुए तुमने दशरथ के प्राण ले लिये । आज से तुम अपने पृत्र के 
साथ समस्त पृथ्वी का उपभोग करो । 

इस प्रकार, कीसल्या आदि रानियाँ कैकेयी को घेरकर रोनें-कलपने लगी । वह सर 
भुकाये अत्यधिक शोक से अपने पति के शरीर पर मिरकर कई प्रकार से विलाप करने लगो। 
कौसत्या की चेतता जब लौट आई, तब उन्होने कहा--हे राजन्‌ ! क्या आप 
जैसे धर्मात्मा की ऐसी मृत्यु होती चाहिए ” आपके आदेश का उललघन न करके म॑ धोखा 
सा गई । आपकी सत्यनिष्टा ने आपकी यह दशा कर दी । अत्यत क्र स्त्री कैक्रेपी को 
देखकर और राम के वनवास के दुख से अभिभूत होकर में आपको उचित परिचर्या न 
कर सकी । आपकी इच्छा का पालन करते हुए वन में निवास करके राघव महायश का 
भागी वना । सत्य का पालन करके आपने स्वर्ग-सुस को प्राप्त किया । अब मुझे केवल 
आप जैसे उत्तम पति को कटुवचन सुनाने का पाप मिला ।॥' 


इस प्रकार, कौसल्या को विलाप करते_देख सुमित्रा आदि रानियाँ ऊंचे स्वर में रुदन 
करने लगी । वात-की-बात में यह समाचार सारे नगर में फैल गया । स्त्रियो के विलाप 
से सारा आकाश गूंजने लगा । सूर्योदय के होते ही अत्यत भीत हो राजा के मित्र, 
नातेदार, सामत-राजा, वसिष्ठ आदि मुनि, ब्राह्मग तथा नगर के प्रतिप्ठित व्यवित, आकर 
शोक व्यक्त करने लगे । वसिष्ठ मुनि मत्रियो के परामर्ण के पथ्चात्‌ महाराज दशरथ के 
शरीर को तेल में डुबोकर मणिमय सिंहासन पर उसे बैठा दिया, मानो वे दरबार में बैडे 
हुए हो । उसके पश्चात्‌ उन्होंने सामत राजाओं को तथा मत्री और राजनीतिज्ञो को सवोधित 
करते हुए कहा--महाराज साम्राज्य का पालन करके सुरधाम चले गये । पिता का वचन 
पालन करने के लिए राम अपनी स्त्री के साथ वन-वास करने गये। उससे पूर्व ही अन्रुष्न 
के साथ भरत अपने मामा के नगर गये है । यदि हम रामचन्द्र को बुला भेजें, तो वे नहीं 
आयेंगे । वे अपने प्रण के पालन में पटु हैँ । इसलिए हमें राजकाज को नेंमालने के लिए 
भरत को शीघ्र वुलाना चाहिए। राजा के विना कोई भी देश, नगर या राष्ट्र शोभा 
नही देता । दण्डनीति, दान-धर्म आदि की व्यवस्था वियड जायगी । झत्रु प्रवल हो जायेंगे । 
जार-चोर आदि की वृद्धि होगी । दुजेन सज्जनों को दुख देने लगेंगे । सामत, दुर्ग-रक्षक 
आदि कर नही हेंगे । 

ऐसा निश्चय करके उन्होने धीमानू, जयन्त आदि चार मत्रियो को बुलाकर कहा-- 
तुम लोग भिन्न-भिन्न वस्त्राभरण लिये हुए वज्पुर जाओ और भरत को यहाँ की घटनाओं 
का पता दिये विना सिर्फ इतना कहो कि गुर वनिष्ठ ने आपको लिब्रा लाने के लिए हमें 


११० रंगनाथ एयायस 


भेजा है | तुम उन्हें अपने साथ बवच्य लिवा लाना, भींच्र जाओ । वें मत्री घोड़ो पर सवार हो 
स्‍स्थ की गति से चलते हुए विभिन्न नयरो, जनपदो, नदियों, काननो, पहाडो तथा भाड़ियों 
को पार करते हुए केंकयराज के नगर में जा पहुँचे । दजरथ की मृत्यु के सातवें दिन 
रात को वहाँ उन्होंने (मरत बौर बत्रुघ्त) स्वप्न में देखा कि उनके पिता गोवर तथा 
कीचड मे भरे विज्ञाल बड़े में गिर पडे हैँ । समृद्र सूल गया हैं, चन्द्र पृथ्वी पर गिर गया हे , 
भद्रगण का एक दाँन दृद गया हैँं। ऐसे दु.स्वप्त देखकर वें जाग पडे और जत्यत 
भीव होकर बण्नें इप्ड-मित्रो को स्वप्न का वृत्तांत सुनाकर, उसका फल जानना चाहा । 
इसी सम्य अयोब्या के दूत वहाँ पहुँचे और भरत को प्रणाम करके साथ लाई हुई मेंठ उन्हें 
वेंक्र छत्वंत विनीत भाव से बोलें--हिें देंव, किसी कार्यव्य वसिप्ठजी ने आपको शीघ्र 
लिता लाने के लिए हमें मेंजा हैँ | अत. बाप ज्षीत्र प्रस्थान कीजिए । 
क्त्रिम हाग्-माव देखकर वें और भी भीत हो गए । उन्होने अपने 
मामा से याद्य वृत्तात कह सुनाया बौर सादर उनकी आज्ञा प्राप्त करके रथ पर आहूइ हो, 
मंत्री ता चतुरग्रिणी सेना के साथ चल पड़े । उत्यंत वेग से यात्रा करते हुए वे सात 
दिनो में अबयोब्या पहुँच गये । 
२४. भरत का अयोध्या में प्रवेश 

अयोध्या में प्रवेश करते ही उन्होने ठेखा कि सारा नगर पतिहीना पत्नी के समान 
तथा चअच्धहीन रात्रि के समान श्रीहीन होकर उजड़ा हुआ दीख रहा है । यह डग दंखकर 
वे मन-ही-मन व्याकुल होकर सोचने लगे कि आज सारा नगर ब्ून्यन्सा लग रहा हैं । 
नगर-निवासी मुझे देखकर बाँखों से वाँगू वहा रहें हे । मुभसे कतराते हुए जा रहे है 
क्या कारण हूँ कि दूकानों में कोई भी चीज सजाकर नहीं रखी गई हैं ? यो सोचत 
हुए अतपुर के फाव्क पर वे रथ से उतर गये बौर बाप बौर भत्रुघ्त बून्य-से दीखनेवाले 
अंत-पुर में पहुँचे | उनको देखते ही कैकेयी बड़े प्रेम से उनके सामने आई बौर 
हृदय से लगा लिया | तब उन्होनें वड़ी भक्ति से उनको प्रणाम कया और अपने मामा 
की दी हुई भेंट उन्हें देक्षर उनका कुझल-समाचार कह सुनाया । उसके उपरात भव्त नें 
मात्रा श्र पूछा--हें माता, बह कैसा बाच्चर्ण हुँ कि सारा अतपुर वैमवहीन होकर शून्यन्धा 
लग रहा हैं । राम-लब्मण और महाराज सनकुचल तो हे ?*” तब वहुत चिंतित होती हुई 
कैकेयी ने भन्‍त के सन्चम को वडाती हुईं मद हास के साथ कहा--हे वत्स, किसी दिन 
तुम्हारे पिताजी ने ढडें प्रेम से मुझे दो वर विये थे। मेने एक वर से भरत का राज- 
दिलक ओर दूसरें वर से राम के वनवास की प्रार्थना की । पिता की आज्ना के अनुत्तार 
राम, जानकी-लक्ष्मप-ममेत वनवास के लिए उला दया । पुत्र के वियोग से महाराज 
स्वर्स सिवारे । ईध्ष्याविश्न मैने तुम्हारे लिए यह व्यवस्था कर ली ॥ अब राज्य सेमालो, प्रजा 
कया पालन करों, ऐब्वर्य प्राप्त करो कौर अपने वाहुइल से राज्य की रक्षा करो । इसके 
विप्टीत कुछ मत्त कहो ॥ 

इन बातों को सुनते ही मस्त मूृच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । थोडी देर के 


३ | 


वाद सैनलकर उन्होंने अर्त्यत्त कोव से कंकेयी को देखकर कहा--“हे माता ! मेरी माता 


कम 


0॥ 


है. >«+ 


- ऋयोध्य7काड है (५४ 


होती हुई तुम निर्देयता से ऐसा कठोर आचरण कैसे कर सकी ? राम को मुनि-येष में 
वनवास की आज्ञा तुम सकी ? निर्मल धर्माचरण करनेवाले रघुवशियो की रीति 
तुम्हें क्या मालूम नहीं है अपने पिता की मृत्यु पर कैसे शोक कर सकता हूँ ? कौन- 
सा मूंह लेकर राम को देख सकता हूँ ? हाय ! न जाने मन-ही-मन राम कितने व्याकुल 
हुए होगे ” न जाने लक्ष्मण को कितना क्रोध आया होगा ? वन के लिए जाते समय 
सीता ने न जाने मुझे कितने अपशब्द कहे होगे ? कौन जाने, माता कौसल्या की क्‍या 
दशा हुई ? माता सुमित्रा तथा अन्य रानियाँ न जाने कितनी दु खी होती होगी ” इनके 
सामने विलाप करने के लिए में कहाँ योग्य रहा ? में उनके मन की व्यथा दूर कंसे कर 
सकूँगा ? मुभो अब यह नगर किसलिए ? मुझे राजभोग किसलिए ? निश्चय, वन ही 
अब मेरे लिए शरण है। घोर पापिनी तुम्हारी माता ने एक राक्षस से तुम्हें जन्म 
दिया होगा । तुम महाराज केकय से उत्पन्न पुत्री नही हो । अब में तुमसे क्‍या कह ?” इन सब 
बातो को आड में खडी छिपकर सुननेवाली मथरा को देखकर लोगो ने कहा--इसीनें 
इतने सारे पाप कराये यह सुनते ही शत्रुध्त ने उस वृद्ध स्त्री की ठाँग पकडकर एकदम 
उसे उठाया और बडे जोर से उसे घुमाकर इस तरह नीचे फेंक दिया कि उसकी कूबड 
जाती रही, केश बिखर गये और सभी भूषण तितर-बितर होकर गिर पडे । सभी स्त्रियाँ 
देखती रह गई । कैकैयी आदि अन्य रानियाँ भागने लगी । कैकेयी का वध करने के लिए 
शन्रुष्न को जाते हुए देख भरत ने कहा--इस पापिन को मारकर हम पाप क्यो कमायें ? 
रामचन्द्रजी सुनेंगे, तो मातृहृता कहकर हमसे घृणा करेंगे। इसलिए तुम यह काम मत करो | 


से 
कैसे दे 
? में 


२५ मरत का कौसल्या के घर जाना 


वहाँ से निकलकर भरत अनुज के साथ कौसल्या के यहाँ गये और उनके चरणो में 
सर नवाकर शोक-सतप्त हृदय से दोनों भाई उच्च स्वर से बिलाप करने लगे | तव भरत 
को देखकर कौसल्या बडे क्रोध से इस प्रकार बोलने लगी--पति को खोकर, सुत से अलग 
रहते हुए अत्यत दुख से पीडित मै रोती हैं, तो वह स्वाभाविक ही है । तुम क्यों रो रहे हो ? 
तुमने जैसा चाहा, तुम्हारी माता ने कर दिया । हें वत्स, अंब तुम राज्य सेभालो । 
यह सुनकर अत्यत भीत हो, हाथ जोडे कौसल्या के पीछे चलते हुए भरत कहने लगे-- 
माताजी-यदि मेने मन, वचन तथा कर्म से श्रीराम का अहित किया हो या पृथ्वी 
का पालन करना चाहा हो, कैकेयी के मन की इच्छा मुझे मालूम रही हो, एक भी अहित 
मेने सोचा हो, तो में उस पापी की गति प्राप्त करूँ, जिसने मद्य पिया हो, निर्धन ब्राह्मण 
का वध किया हो, गुरु-पत्नी से व्यभिचार किया हो, युद्ध में अपजय प्राप्त की हो, दुष्टता 
से सोना चुराया हो, गाय की हत्या की हो, न्याय-रहित होकर राज्य-पालन किया हो, 
वरावर चुगली खाई हो, शरणार्थी को शरण नहीं दी हो, माता-पिता को अपशब्द कहे हो, 
श्रेप्ठ धर्म को बेचा हो, स्वामी से द्रोह किया हो, गुझजनो को अपशब्द कहें ही, सतत 
पापी होकर असत्य कहा हो, दूसरों के घन की इच्छा की हो और परस्त्री गमन किया हो । 
में रामचन्द्रजी का अहित क्यो करूँगा ? में कहाँ और ये नीच कर्म कहाँ ?” इस 
प्रकार विलाप करनेवाले भरत के शोक का आधिवय समभक्कर कौसल्या आत्म-लानि का 


९९ एंगना/थ एयायमग 


अनुभव करती हुई सोचने लगी--हाय ' मेने ऐसे पुण्य-चरित को क्यो कोसा ?” फ़िर 
उन्होंने भरत तथा शद्रघ्न को हृदय से लगा लिया और परिताप से विलाप करने लगी । 

तब सयमी वसिष्ठ उन्हें लेकर राजा के अत पुर में गये । वहाँ रत्न-पी० पर राजा 
का भव रखा था । राजा की आँखें वन्द थो, मानो राजाने यह विचार कर लिया हो कि 
यह पापिन कंकेणी का पुत्र है, इसे नहीं देखना चाहिए | पिता का शव देखकर भरत 
मृच्छित हो गये । थोडी देर में मंमलकर अत्यधिक पीडित हो आत्तंनाद करने लगे-- 
हैं राजनू, में कैकेयराज के यहाँ से अनुपम झणि-मूषण आपके लिए ले जाया हूँ । इन्हें 


हक. 


स्वीकार क्यो नहीं करते ”? आप नेरी ओर देखते क्यो नहीं है ? मेरा दोष क्या है ? 
पापिन कैकेयी का पुत्र हूँ, क्‍या इसलिए जाप मुझे ठेखना नहीं रहते ? हें महाराज ! 
इस सुमित्रा-पुत्र को तो देखिए | वह दुख से कैसे तड॒प रहा है । झत्रुध्न को उठाकर उसके 
शरीर पर लगी धूल को आप पोछतने क्यो नहीं ” इस पर कृपा कीजिए । इससे वोलिए । 
इसने क्‍या किया हैं ? इसे अपने हृदय से लगा लीजिए । आपके सदगुण, आपकी दया 
और आपका स्नेह कहाँ छिप गये हूँ । हे पिता, क्या कैकेयी ने आपकी बुद्धि को कलुपित 
कर दिया है ? क्या ऐसी मृत्यु ही आपके भाग्य में लिखी थी ? राजाओ की मृत्यु तो 
होती ही है, किन्तु ऐसी मृत्यु कही नहीं होती । में इन कपष्टों से कैसे पार पाऊेगा ? 
हाथ, में क्या कहे ?! 

इस प्रकार विलपतें हुए भरत को देखकर वस्िष्ठ ने कहा--तुम्हारे पिता ने साठ 
सहस्न॒ वर्ष तक पृथ्वी पर शासन किया और मनु के धर्म-पथ पर चलतें हुए समस्त घर्मो 
का पालन किया । अत में तुम जैसे पुत्रो को प्राप्त किया । इसलिए तुम शोक मत करो। 
इनकी देह का अग्निन्‍-सस्कार करो 7“ 

मुनि की आज्ञा गिरोवारण कर भरत ने दूसरे दिन, मूनियो, राजाओं तथा अन्य 
महात्माजो को बुलाया । दशरथ के णव को तीर्घ-जलो से स्तान कराया और श्रेष्ठ वस्त्र, 
तथा भूषणों से उसे सजाया । वेदोक्त विधि से दान आदि देने के पण्चात्‌ उस शव को 
अरथी पर रखा । इतके उपरान्त मत्र-पुत अग्नि को लिये हुए वे (भरत) अनुज तथा मुनिजनों के 
साथ अरबी के आगे-आगे चलने लगे । जरथी के अगल-वगल में उच्च स्वर में रुदन करती 
हुई कौसल्या आदि रानियाँ लड़खडाती हुई चलने लगी । सरयू के निकट व्मशान में चिता 
सजाई गई । उनमें जत्रेताग्तियो को प्रतिप्टित करके बेद-विधि से (भरत ने) महाराज 
दशरथ के शव का अग्नि-सस्कार किया, तिलोंदक दिया , पिंडदान किया और फिर अतपुर 
में लौट आये । उन्होंने वारह दिन तक विवि-युकत क्रिया करते हुए ब्राह्मणों को दान आदि 
देकर मतुप्ट किया । 

अत्येप्टि-क्रियाओं की समाप्ति के पज्चातू इक््वाकुओ के कुलगुर मुनि वसिप्ठ आगे 
होने योंग्प कार्यो का विचार करके, सामत राजाओं तथा मत्रियो को साथ लिये भानु-सम 
उज्ज्वल भरत के निकट पहुँचकर बोलें--हे वत्स, तुम्हारे पिता परलोक सिवार ग्रये हे । 
गौर तुम्हारे भाई राम वनवास के लिए रुये है । राज्य में कोई राजा नहीं -रहे, तो राज- 
काज चल नहीं सकते । प्रजा उच्छृूघल हो जायगी, पृथ्वी विचलित होगी और समस्त 


ऋयोध्याकाोंड ३ 


धर्मों का पतन हो जायगा, जत्रु प्रवल होगे और वर्णसकर पैदा होगे । राज्य को राजा- 
रहित नहीं रहना चाहिए | तुम विमलमतिमान्‌ हो, तुम राज्य का भार समालों । 
मुनि के उपदेश सुनकर भरत ने हाथ जोडकर कहा--हें मुनिनाथ, क्या में इतना 
मूर्ख हूँ कि अपने कुल की रीति न जानूँ ? मेरी माता ने मेरे अग्रज को वन भेजकर 
मेरे पिता के प्राण ले लिये हैं । क्या यह (दड) मेरे लिए पर्याप्त नहीं हैं ? क्‍या अब 
राज्य करने की बात भी में सोच ? आप आगे कुछ मत कहिए । में कंकेयी का पुत्र हें, 
इसीलिए तो आप मुभसे ऐसी बातें कहते हे । अन्यथा आप मेरे सव॑ंध में ऐसे विचार मन 
में नही लाते | में तुरत अपने भाई राम के पास जाऊँगा । उनसे प्रार्थना करके उन्हें 
लौटा लाऊंगा और उनका राज-तिलक कराऊँगा। यदि में ऐसा नही कर सका, तो जैसे मेरे भाई ने 
मुनिवृत्ति ग्रहण की, वैसे में भी मुनि-वृत्ति लूंगा। इसके सिवा मेरे लिए और कोई मार्ग नही है ।' 
- २६. मरत का राम के पास जाना 
इस प्रकार निश्चय करके भरत ने मत्रियों को देखकर कहा--हमें अपने बडे भाई 
के दर्शनार्थ जाना है। मार्गों को ठीक करो और सभी नगरवासियो को मार्ग में जहाँ- 
तहाँ ठहरने के लिए उचित व्यवस्था करके आवश्यक वस्तुओ का सग्रह करो । मत्रियों ने 
उनकी आज्ञा का पालन किया । दूसरे दिन वदी-मागघ, मत्री, सुकुमार नत्तेकी, चट, नौ 
सहल्न हाथी, एक लाख अद्व, साठ सहख्र रथ और असख्य पदचर सेना, सभी नगरवासी 
तथा धन एवं रत्नराशियो को साथ लिये वसिष्ठ आदि मुनि, राजा, मत्री ओर प्रतिष्ठित 
जनो के सग, भरत, शत्रुघ्न तथा उनकी माताएँ विविध वाहनों पर सवार होकर चले । 
इस प्रकार, चलकर सब गगातट पर पहुँचे और वहाँ पडाव डाला । अत्यत बाहुबलो 
गृह को यह मालूम हुआ कि कैकेयी-पुत्र सेना के साथ राम पर आक्रमण करने के लिए 
जा रहें हे, तो वह अत्यत कुद्ध हुआ और अपने दल-बल-सहित भरत के पास पहुँचकर 
बोला--हे भरत, जब रामचन्द्र आपको अपना सारा राज्य ठेकर वन में रहते हैँ, तव क्‍या 
आपको यह उचित है कि आप अपनी सेना के साथ उनपर आक्रमण करने चलें ? में राम 
का सेवक हूँ । में आपको जाने नही, दूँगा । मे आपकी सेना का सहार कर डालूंगा । 
आपसे युद्ध करते हुए में मर जाऊँगा । तभी आप राम पर आक्रमण कर सकेंगे ।' 
गृह के इन रोषपूर्ण वचनो को सुनकर भरत विमल मन से हंसते हुए बोलें-- 
हैं गृह, में परमात्मा रामचन्द्र से प्रार्थना करके उन्हें अयोध्या लौटाकर उनका राज-त्तिलक 
सपन्न कराने के उद्देश्य से ही उनकी सेवा में जा रहा हैं । तुम अपने मन में अन्यथा 
समभकर ऐसे वचन मत कहो । इस प्रकार कहकर भरत ने गृह को हृदय से लगाया 
और उसके मन की राम-भवित समक गये । गृह ने भरत के चरणो पर मस्तक नवाकर 
अनुपम वन-वस्तुओ की भेंट की । फिर वह भरत को उस स्थल पर लें गया, जहाँ, पहले 
राम गगातट पर ठहरे थे । भरत ने अपना पडाव वही डाल दिया । उसके पश्चात्‌ गृह 
उन्हें उस स्थल पर ले गया, जहाँ राम ने जठाएँ घारण की थी । उस स्वल को देखकर 
सभी नगरवासी, मुनि, मत्री तथा भरत अत्यत दुखी हुए। तव भरत ने अत्यत दीन होकर 
बट का दूध अँग्रवांकर अपने भाई शत्रुघ्न के साथ जढठाएँ धारण कर ली | 
१५ 


22 रंगनाथ राया्यर 


दूसर दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर भरत ने गुह के द्वारा मेंगाई गई पाँच सौ 
विध्ञाल नावो में चढ़कर माताओ, मुनियो, मत्रियों तथा सेवा के साथ ग्रगा नदी पार को । 
वहाँ से गृह को साथ लिये हुए, उसके बताये मार्ग पर चलते हुए भरद्वाज के उस आश्रम 
के पास पहुँचे, जहाँ से निकलनेचाले यज्ञे-धूम से सारा आकाश व्याप्त होकर बादलों का 
भ्रम उत्पन्न कर रहा था तथा जिन्हें देखकर मोर अपने पखो को फैलाकर आनंदोन्मत्त हो 
ताच रहे थे । उनके पंखो के समूह से सारा आश्रम-स्थल ऐसा दीख रहा था, मानो 
विचित्र रत्त-तोरणो से सारा आश्रम अलक्ृत किया »या हो । 

२७, सरत का मरद्वाज के आश्रम में पहुँचना 

भरत ने अपनी सारी सेना आश्रम से चहुत दूर पर ठहराकेर आप स्वयं उस 
पुण्यात्मा भरद्वाज मुनि के दर्जनार्थ गये और मुनि को देखकर प्रणाम किया | भरद्वाज 
'बड़े रुप्ट होकर बोलें--हें भरत जब राम-राघव वन में निवास कर रहे है, तव तुम 
अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर उनप्रर आक्रमण करने क्यो जा रहे हो ?” मुन्रि का क्रोध 
समभकर भरत भय तथा विनय के साथ बोले--हे मुनीश्वर, में तो रामचन्द्रजी से राज्य 
ग्रहण करने की ब्रार्थना करने जा रहा हैं । दूसरे. किसी उद्देव्य से नहीं । आप अन्यथा 
न समझे । | - ' . 

भरत की वातो से हर्षित होकर भरद्वाज बोलें--हे अनघ, तुम अपनी समस्त सेता _ 
के साथ आज हमारे आश्रम में ठहरकर हमारा सत्कार- स्वीकार कैरी । इसके पश्चात्‌ 
मुनि-ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा--ठुम तुस्त एक .सुदर सग्र का निर्माण करो, जिसमें 
सभी लोगों के लिए उनकी 'योग्यता के अनुसार निवास रहें । विश्वकर्मा ने तुरत पाँच 
योजनः विस्तार में एक विशाल नगर बनाया, जो भूमि-देवता के चरण के आमृषण-सा विराज 
“रहा था । उसमें एक स्वर्णयय राजमवन भी था । उस भवन में इवेत छत्र-सपन्न 
सिंहासन रखा हुआ था और एक रमणीय समा-मवन भी था । मुनि की आज्ञा से भरत ने 
-उस राजभवन में प्रवेश किया | वहाँ सिहासन को देखकर भरत ने उसे राम का सिंहासन 
कहकर उसका नमस्कार किया और उसके निकट ही एक पीठ पर आसीन हुए । मुनि की 
भाज्ञा से किन्नर, गधर्व तथा खेचर रमणियो ने भरत के सामने आकर नृत्य-गान किया । 
इस प्रकार, मूनि की आज्ञा से सभी निवासो में नृत्य-गीत आदि, पृथ्वी पर जितने मनोरजन 
हो सकते थे, वे सब वहाँ सपन्न हुए । (अयोध्या की) प्रजा ने स्वान आदि से निवृत्त होकर 
स्वच्छ वस्त्र पहने, मदारनपुष्प-मालाएँ पहनी, चदन का लेप किया और विविष आमूषण 
पहने । इसके पश्चात्‌ 'कामथेनु द्वारा श्रस्तुत किये गये चार प्रकार के भोजन ग्रहण करके 
परितृष्त हुए । त़ब सुरांगनाओ के साथ _ रति-क्रीड़ाओं में मग्न होते हुए वे अपने जन्म को 
सफल मानने लगे । इस. प्रकार, मुनि का आश्रम स्वर्ग का भी तिरस्कार करता हुआ-सा 
दीखने लगा ॥ - 

- भरत तथा उनकी! सना ने मुनि भरद्वाज की पश्रणसा करते हुए रात वही विताई। 

प्रात:काल होते ही उत्होंने देखा कि वहाँ न कोई नगर था, न भवन, न सुरागनाएँ । भरत 
के आश्चर्य की सीमा न रही । वे श्रेष्ठ तपस्वी भ्रद्वाज के सम्मुख जाकर बोले-- 


ह/यरेध्याकाड ५484 


| 


हे महात्मा, आपके तपोबल की महिमा की प्रशसा करना ,ब्रह्मां के लिए भी कठिन है । अब 
हम सू्यंवश-तिलक रघुराम की रोंवा में जायेंगे । हमें भाज्ञा दें।- यो कहकरः भरत ने 
अपनी माताओ से मुनि को प्रणाम करवाया । मुनि बोले--'ये कौन-कौन हैं ? अलग-अलग 
इनका परिचुय मुझे दो ।” तब भरत ने कहा--हें महात्मा, ये राजा की ज्येप्ठ रानी 
सफलजुन्मा कौसल्या हे, जिनन्‍्होने सब लोगो में कीत्ति तथा प्रशसा-पाई-है । राम 'को पुत्र- 
रूप मे प्राज़् कर अपनी कोख को सफल बनाया हूँ, पर उनके (राम के) वियोग की 
अग्नि में तप्त हो रही है । ये लक्ष्मण को जन्म देतेवाली पुण्यशोीला सुमित्रा हैँ, जो कीसल्पा 
के बाय हाथ की तरह रहती हैं । पुष्प-रहित कर्णिकार की शाखा के समान अलकारंहीना 
होकर राम के वियोग-दुख से दुखी है । ये हतपुण्या मेरी माता कैकेयी हैं, जिनके कारण 
मर अग्रज वनवास के लिए गये है, जिनके कारण मेरे पिता का देहात हुआ और जिनकी 
इच्छा ने मेरी ऐसी दुर्गंति कर दी है । इतना कहकर उमडते हुए शोक से विह्नल तथा 
गदुगद हो वे चुप 'हो रहे । मुनि ने उन्हें सात्वना देने हुए आगे के कार्य का विचार करकें 
कहा--कैकेयी ने लोकहित किया है । यह तुम लोगो को आगे स्पष्ट "होगा !! इतना 
कहकर उन्होने भरत को राम के निवास-स्थान का मार्ग बताया और उन्हें आशीर्वाद देकर 


विदा किया । , 


भरत ने अत्यत श्रद्धा से युक्‍तत हो सेना के साथ चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान 
किया । हाथियो के चिंघाडने, अश्वो के हिनहिनाने, सेना के वार्त्तालाप करने, तथा रथो के 
चलने से जो विपुल रव होता था, उससे भीत होकर जंगली मृग चारो दिशाओं में 
भागने लगे। विशाल सेना के चलने से उठी हुई धूलि से आवृत होकर सूर्यमडल भी मलिन 
दीखने लगा । 
वहाँ चित्रकूट में कुटिल-कुतला सीता के साथ राम बडे आनद से वार्तालाप कर रहे थे। 
सीता का ध्यान पर्वत की श्ोमा की ओर आक्ृष्ठट करते हुए वे कह रहे थे-- 
हैं बिवाधरवाली, देखा तुमने पर्वत की शोभा, हमारे नेत्रो को कितना अपूर्व आनद पहुँचा रही है । 
इस पव॑त की महिमा का वर्णन करना वक्‍्या शेषनाग के लिए भी सभव है ? 
निर्भोरो की घन गभीर ध्वनियो को मेघ-गर्जन समभकर अत्यत आनद से तुम्हारं कंश 
की समता रखनेवाले अपनी पखो को फैलाकर नाचनेवाले उन मयूरो को देखो । क्या, 
इन भीलनियो को तुमने देखा, जो अपने कुच-कुभो को गज-कुभों की समता प्रदान करने 
क॑ लिए, गजो के कुभस्थल को चीरकर उसमें से निकले हुए मणियो को घारण कर रखा है। 
देवताओं का सकेत-स्थान होने के कारण इस घाटी में दिव्य सुगधि फैल रही है । 
वहाँ देखो, वह गधर्वों का कीडा-स्थल उनके पदतलो के महावर-्वर्ण से प्रकाशमान दीख 
रहा है । हे किन्नर-कठवाली, यह गिरिग॒फा देखो, जो किन्नर-किन्नरियों के सग्रीत से 
मुंखरित है । हें कोकिलकठी, इस सहकार-बृक्ष को देखो, जो कोयल की कलध्वनि तथा 
पल्‍लवो से युक्‍त हैँ । हे कोमालागी, मलयानिल विभिन्न प्रकार के फूलों की सुगधि को 
एकत्रित करते हुए मद-मद गति से चलकर हम पर अपना प्रभाव डाल रहा हैं । वहाँ 
उस मंदाकिनी को देखो, जो लाल तथा सफेद कमलो के समूह से अलकृत है, जिसके कूल 


श्श्् र॑ंगर्नाथ राय 


पर तमाल, रसाल, कपिला, ताल, हिताल, लसोडा आदि वृक्ष सुशोभित हैँ, जिसके पवित्र 
- तट पर,मुनियों का समूह विराज रहा है और जिसका प्रवाह हसो के मद गमन से हिल- 
सा रहा, है । इस प्रकार कहते हुए ब्रे विभिन्न प्रकार के वृक्षों के नीचे, लता-कुजो, परत के 
शिखरो पर, तराइयो में तथा गृफाओ में अत्यन्त प्रसन्नता से विचरण कर रहे थे । 
- इसी समय उन्होने भरत की सेना का कोलाहल सुना । भयभीत होकर चारो ओर 
भागनेवाले हाथी, वराह आादि मृगो को तथा उड़ती हुई अत्यधिक ,घूल को देखा । तेंब 
उन्होने लक्ष्मण से कहा कि तुम पता लगाओ कि इस प्रकार घूल क्यो उड़ रही है ? 
लक्ष्मण ने -तुरत एक ऊँचे वृक्ष के शिखर पर चढकर देखा कि उत्तर की दिशा से सूर्यवश के 
चिह्नो से युवत पताकाएँ फहराती हुई एक विश्ञाल सेना आ रही है । उन्होने मन-ही-मन 
निश्चय कर लिया कि भरत राम पर आक्रमण करने के लिए आ रहे हैँ । पर्वत पर 
वृज्ञपात होने के समान तुरत वे पेड से उतर पडे और दौडते हुए राम के पास पहुँचकर 
अत्यधिक रोप से बोलें--हे देव, आपको वन भेजकर समस्त राज्य को हस्तगत करने से 
तृप्त न होकर, आज कैकंयी का पुत्र सारी सेना लेकर आप पर आक्रमण करने आ रहा है। 
वह देखिए, कचनार (जैसी लाल) ध्वजाएँ ! वह सुनिए सैनिकों के वीर वचन ! 
आप शर, चाप तथा कवच घारण करके भरत का सामना कीजिए । नही, नही, आप और 
सीता यहाँ से हट जाइए । आपकी सज्जनता ने ही इतना (अनर्थ) किया हैँ | में अब 
सहन नहीं करूँगा | यदि भरत यहाँ आया, तो में उसका वध कर डालगा । 
* राम बोले--हे लक्ष्मण, मेरा अनुज होकर जन्म लेने पर भी तुम ऐसे अविनीत 
क्यो हो रहे हो ! श्रातृ-प्रेम की मूत्ति, परम पवित्र, नीति-कोविद तथा धर्म-तत्पर भरत, 
तुमसे भी अधिक मेरा भक्‍त है । भरत के मन में कोई पाप नही है | मुझसे अयोध्या 
लौट चलने की प्रार्थना करने के लिए वह आ रहा है | तुम शका छोड दो । राम के 
मादेश का उललघन न कर सकने के कारण लक्ष्मण चुप हो रहें । 
२८. सरत की राम से सेंट 


भरत ने नगरवासियो मित्रो, तथा सेचा को एक जगह- ठहरा दिया, माताओ के 

साथ आते के लिए वसिष्ठ मुनि से प्रार्थना करके, स्वय शत्रुघ्त, सुमत्न और गृह के साथ 
उस पर्वत पर चढने लगे । जगल में मार्ग को पहचानने के लिए लक्ष्मण ने जो सकत 
वना रखे थे, उन्हें पहचानते हुए, चारो ओर दृष्टि डालते हुए (उन्होनें) समस्त शास्त्रास्त्र- 
समूह से युक्त विशाल आऑँगनवाली सुदर पर्णशाला को देखा । वहाँ पर मुनि-वेष धारण 
किये हुए अत्यत हर्ष से विलसित होनेवालें राम को देखकर भरत मन-ही-मन अत्यत 
दुखी हुए और शरत्रुष्त से कहने लगे--हे बन्रुघ्त, देखा तुमने ?] स्वर्ण-सौधो में रहनेवालें 
/ राम आज एक पर्णशाला में निवास कर रहें हैँ । पृप्प-शय्या पर विराजनेवालें आज घूलि- 
युवत पर्णशाला में रह रहे हैं। मुकुट घारण करनेवाले, प्रेम से जटाएँ घारण क्ये हुए है । 
राजाओ की सेवाएँ प्राप्त करते हुए .रहनेवाले आज मृगों के मध्य रहते हूँ । दिव्य 


वस्त्र धारण करनेवाले आज मुनिय्रों के वल्कल पहने हुए है । सुस्वादु भोजन करनेवाले, 
भान करचे फलो पर दिन ब्यतीत कर रहे हैं । हाय, शुभप्रद मृत्तिवाले राम आाज इसंआु 


5 


अयोध्य/कोड ९१७ 


प्रकार का दुःख का अनुभव कर रहे हैं। कैकेयी के पापी गर्भ से जन्म लेने के कारण 
ही मुझे उनकी यह दुर्दशा देखनी पड रही है 

इसके पद्चात्‌ उन दोनो ने (राम के निकट पहुँचकर) उनको प्रणाम किया । राम ने 
उन्हें गले से लगा लिया और नेत्रो से आनदाश्रु बहाते, हुए बडे स्नेह के साथ उनकी पीठो 
पर हाथ फेरा और उन्हें आश्ञीर्वाद दिये । तब सुमत्र तथा गुह ने उस सूर्यवशी को बडी 
भक्ति के साथ प्रणाम किया । भरत तथा शत्रुष्न ने तब जानकी तथा लक्ष्मण को प्रणाम 
किया । उसके पश्चात्‌ उन्हें कुशासन पर बैठने का आदेश देकर राघव वार-बार पिता तथा 
माता का कुशल समाचार पूछते हुए बोले-- हे भरत, तुम क्यो इतनी दूर चलकर आये ? 
राजा की आज्ञा से राज्य-भार ग्रहण करके नीति के साथ राज-काज चला रहे 
हो न ? सत्यनिष्ठ महाराज दशरथ की सेवा नित्य प्रति करते हो न ? माताओं को 
सात्वना देते हुए बडे आदर के साथ उनकी देखभाल करते हो न _? हमारे कुलगुर तपो- 
निष्ठ वसिष्ठ की पूजा करके सध्या के समय अग्तिहोत्र की विधि का नियमपूर्वक पालन 
करते हो न ? सज्जन मत्रियो का परामर्श लेकर विजय-साथक मार्ग को समझ रहे हो न? 
प्रतिदिन रात्रि के पिछले पहर में जागकर तुम अर्थ-सिद्धि का चितन करते हो न ? उत्तम, 
मध्यम और अधम, जनो का विचार करके उनको योग्यता के अनुसार उन्हें काम में लगाते 
हो न ? अपराध का विचार करके अपने लोगो के सवध में भी न्‍्यायदड का पालन 
ठीक तरह से करते हो न ? मतिमान्‌, लोकंग्रिय, स्वामिभक्‍त तथा पराक्रमी को तुमने अपना 
सेनापति बनाया है कि नहीं ? सेवको के वेतन विना विलब के उन्हें देते हो न ? दूतो 
के द्वारा राज्य का समाचार तथा छात्रुओ की गति-विधि कां ज्ञान रखते हो न ? गर्व 
त्यागकर दीन तथा निर्घत व्यक्तियों की पुकार सुनते हो न ? वर्णाश्नम-धर्म में किसी 
प्रकार का व्यतिक्रम लाये विना आवश्यक व्यवस्था करते हो न ? चोरो और जारों की 
बढती को रोककर उन्हें कारावास में रखकर उचित दड देते हो न ? समय-समय पर 
चतुरगिणी सेना की. पटुता का निरीक्षण करते हो कि नहीं ? दुर्गों को धन-धानन्‍्य तथा 
सेना से युक्त रखते हुए उनका बल बढाते रहते हो न ? अन्याय से (पर) घन-सचय 
न करके, किसानो की प्रेम से साथ रक्षा करते हो न ? घन-लोभ में पडकर विप्रो की 
जागौरो का किचित्‌ भाग भी अपहरण नही करते हो न ? सतत गो-ब्राह्मणो के हित की 
कामना करते हुए घम्म-निष्ठा में तत्पर रहते हो कि नहीं ” जो राजा (इच्छा, क्रिया, 
ज्ञान) जक्‍्तित्रय का, चार उपायो (साम, दाम, भेद, दड), पचागो, पड्गुणो तथा राजा के 
चौदह दोषो का ज्ञान रखते हुए, दयालु होते हुए, मनु-धर्मशास्त्र के अनुसार देवताओ, 
पितरो तथा ब्राह्मणों की पूजा करते हुए अपना जोवन व्यतीत करता है, वही स्वर्ग प्राप्त 
करता है । तुम भी उसी प्रकार राज्य करते हो न ?” 


२९. मरत का -राम को दशरथ की मृत्यु का समाचार देना 
तब भरत गद्गद कठ'से-हाथ जोडकर बोले--हे राजकुलाधीश, में यह घर्म-मार्ग 
कुछ नहीं जानता । हे घर्ननिपुण, और एक समाचार सुनिए । कैकेयी ने निर्दयतापूर्वक 


भाषको वूला भेजा और आपको “वन जाने का आदेश दिया । आप विना बिलव किये 


श््ष र्यनाथ रसायायस 


यहाँ चले आये। आपके दुख में तड़पते हुए सातवें दिन महाराज दशरंथ ने. अपन प्राण 
छोड़ दिये । म॑ पितृ-कर्मो को पूरा करके आपके दर्शनार्थ यहाँ आया हूँ / * 
यह समाचार राम को वज्र के सेमान लगा, और वे तुरत मूच्छित होकर पृथ्वी पर 
गिर पड़े । सीता तथा लक्ष्मण्र- भी मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर गये । थोडी देर के पश्चात्‌ 
राम कुछ सेभले और वार-वार- विलाप करनेः लगे | तब उन्हें देखकर भरत ने कहा-- 
है देव, धीर होते हुए भी जड़ के समान इस प्रकार विलाप करना आपको शोभा 
नही देता । आप, लक्ष्मण तथा सीता महा राज की परलोक-क्रिया विधिवत्‌ पुरा कीजिए । यही 
उचित है ८८ 
तव राम मदाकिनी नदी के तट पर पहुँचकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर वडी 
निप्ठा से अपने पिता की तिलोदक-क्रिया कौ, पिंड-दान किया और अत्यधिक जोकाकुल 
चित्त से पर्णशाला में लौट आये । उस' समय वसिष्ठ, कौसल्या आदि अवरोध-जन (रनवास 
की स्त्रियाँ), नगरवासी, नातेदार, सुशील मत्री आदि के साथ पर्णशाला में पहुँच गये। 
झोकारिन से सतप्त होनेवाले राम, सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनके चरणों में गिरे और 
रोने लगे । यह देखकर वे सब भी रोने लगे । तव वसिष्ठ ने सात्वना के शब्दो से उन्हें 
शांत किया । ' 
तव॒ वनवास के कारण विवर्ण दीखनेवाली सीता को देखकर कौसल्या मन-ही-मन 
| विधि को कोसती हुई अत्यत दुखी होने लगी । उसी समय उस पर्वत पर रहनेवाली 
किन्नर, यक्ष, गरुड, उरग तथा अमर-कामिनियाँ वहाँ आ पहुँची और कौसल्या से कहने 
लगी--राम की पत्नी, दशरथ की बहू, महाराज जनक की पुत्री (यहाँ) विविध सकटो 


०. 


का अनुभव कर रही हैँ । विधि-विघान के लिए कोई बात असभव नहीं है ॥' 
उसके पच्चात्‌ राम ने सीता के साथ अनघ वसिष्ठ के चरणों की वदना की, मुनियो 


माताओं, नातेदारो, मित्रो तथा मत्रियों को कुशासनो पर विठाया और आप भी कुशासन 
पर बैठ गये। तव भरत की वेग-भूषा देखकर राम वोले---हे वत्स, तुम जढाएँ तथा 
वल्कल क्यो घारण किये हुए हो ” राजा की आज्ञा का पालन करते हुए तुम शीघ्र जाकर 
राज्य-मार ग्रहण करो । इन वबचनो को सुनकर भरत ने राम के मुख-कमल को देखते हुए 
हाथ जोडकर कहा--हे देव, हे राघव, कैकेयी ने असहनशोला हो, आपके महत्त्व से 
अनभिन्न हो, आपको वन जाने का आदेंश देकर महान्‌ पाप किया, तो क्या आपको यह 
डचित था कि आप तुरत यहाँ चले आये ? आपके वियोग से दुखी हो, महाराज दशरथ 
भी स्वर्ग सिधारे । मेरी माता ने ऐसे घोर पाप किये हे | क्या इसके कारण वे नरक-कृप 
में नहीं गिरेंगी ” राज्य आपका है | में उसे संमालने में असमर्थ हें | आज ही आप 
अयोध्या को लौट चलिए और शुद्ध मन से राज़्य-मार ग्रहण कीजिए । पति को खोकर 
अत्यधिक शोक से पीड़ित होनेवाली माताओं को सात्वना -दीजिए । मित्रो, मत्रियो, बधुओ 
तथा प्रजा-जन पर कृपा दृष्टि रखते हुए उनको अपनाइए । हे दयामय, में आपका दास हें 
मुझे अपनाकर मेरी विनती को स्वीकार कीजिए । ईंस प्रकार कहते हुए भरत राम के 


घरणो पर गिर पड़े | ह्ः 
जप 


डयोषध्याकांड - ९९ 


ए 


ह १ 
ता | 


राम अपने भाई को उठाकर हृदय से लगाते? हुए बोले-- हे भरत, यह कैसी वात 
कि तुम बालकों की तरह घर्म-मार्ग को छोडने की सलाह दे रहो हो ? माता कैकोयी 
को अपशब्द क्यों कह रहें हो ” अब तुम स्वय पिता की मृत्यु के लिए- क्यों दुख 
कर रहे हो ? मिट्टी, मिट्टी में मिल गई हैं। ऋंणानुबध (पूर्वजन्म का ऋण) रूप में 
पुत्र, मित्र, कलन्न प्राप्त होते तथा विछुडते .रहते हूं । मनुष्य के लिए पृथ्वी पर जन्म लेते 
ही मृत्यु निश्चित है । यह जानकर जो नर अपने कुलोचित धर्म के मार्म में प्रवृत्त रहता है, 
वह परम भव्य ह्वोता है । हमारे पिता ने संत्यनिष्ठा से नीतिनय-सपन्न होकर महान्‌ 
यज्ञ-दान आदि कितने ही सत्कार्य किये, राजभोग का प्रचुर अनुभव किया, हम, जैसे पृत्रो 
का मूंह जी भरकर देखा, और तब वे प्रजा .की प्रशसा प्राप्त करते हुए स्वर्ग सिधारे हे । 
उनके लिए श्लोक करता उचित नहीं है । उनके आदेश को ठुकराना ठोक नहीं है । 
पितृ-वचन का पालन करना पुत्र का प्रिय धर्म होना चाहिए । जो पुत्र ऐसा करता है, 
वही विख्यात होता है । पिताजी ने मुझे चौदह वर्ष तक वन में रहने तथा तुम्हें राजसुल्ष 
का भोग करने का आदेश दिया हैँ । ,अत , हम वैसे ही रहें | इसके विरुद्ध तुम और कुछ 
भी न कहो ।” . 

तबतक सूर्यास्त हो चला था ५ रात्रि; अत्यत प्रीति से कटो । दुसरे दिन प्रात काल 
ही सध्या आदि से निवृत्त होकर रघुराम कुशासन पर विराजमान हुए । वसिष्ठ आदि मुनि 
तथा अन्य मत्री चासे ओर बैठे । सभा में भरत उठे और हाथ जोडकर बोले--“हे देव, 
आपकी आज्ञा को शिरोघारण कर पिता के वचन के अनुसार सारा राज्य-भार मेंने ग्रहण 
कर लिया हूँ । में अपना वह राज्य आपको दे रहां हूँ । अब आप और कुछ न कहें । 
समस्त पृथ्वी का भार अपने सिर पर घारण करने की क्षमता आदिशेष को हो सकता हैं, 
किन्तु जल-सपं का बच्चा उसे कैसे वहन कर सकता है ? में वैसा ही एक बालक हूँ। 
इतनी विशाल पृथ्वी का भार कहाँ और में कहाँ ”? क्‍या सतृपुरुषो की रक्षा का भार में 
संभाल सकता हूँ ? बालारुण से सुशोभित होनेवाले उदयाचल पर जुगनू का- प्रकाश जैसा 
दिखाई देगा, आप श्रीनिधि के सिंहासन पर मेरा 'बैठना भी वैसा ही दिखाई देगा । 
इसलिए, आप मुनि-वेश को त्यागकर अयोध्या लौट चलिए और अपने शोल से राज्य करते 
हुए सारी प्रजा की इच्छा पूर्ण कीजिए । आप इसके विरुद्ध कुछ मत कहिए । यदि आप 
इसे स्वीकार नही करेंगे, तो मे आपके सम्मुख ही प्राण-त्याग कर दूँगा या सौमित्र की तरह 
आपकी सेवा करते हुए यही रह जाऊँगा ।” इस प्रकार कहते हुए भरत दर्भासन पर (प्राण 
त्याग करने को) लौट गये । 

राघव ने अपने अनुज को उठाकर कहा--“भरत, यह कैसी वात है ? ऐसा कहना 
क्‍या तुम्हारे लिए उचित है ? अपने पिताजी की आज्ञा का विचार तुम विलकुल करना 
नही चाहते हो ?. महारांज दशरथ के साथ तुम्हारी माता का विवाह करते समय तुम्हारे 
नाना ने महाराज से यह वचन माँगा था कि आप मेरी पुत्री द्वारा उत्पन्न सतान को ही 
राजा बनायेंगे । राजा के वचन देने पर ही विवाह सपन्न हुआ था । उस वचन को दृष्टि 
में रखकर ही कैकेयी ने देवासुर-युद्ध में राजर के, द्वारा दिये गये वरी को माँग्रा । उुम्ह 


£२० रंगनाथ एत्पायण 


पृथ्वी और मुझे वनवास देनेवाले राजा ने अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा करने के लिए ही 
ऐसी व्यवस्था दो है । इससे उनकी कीत्ति शाइवत हो गई । इसलिए हम भी महाराज की 
आज्ञा का पालन करते हुए महान्‌ यज्ञ को प्राप्त करें | सभी पिता इसीलिए पुत्र प्राप्त 
करते है कि वह गया की यात्रा करें, कन्‍्यादान करें और वृषभ छोडे । पुन्नाम वरक से 
(पितरों की) रक्षा करनेवाला होने से ही वह पुत्र कहलाता है | यदि में ही अपने पिता के 
वचन का पालन नहीं करूँगा, तो इस पृथ्वी पर पिता के आदेश का पाकून कौन करेगा ? 
यथा राजा तथा प्रजा वाली उक्ति के अनुसार प्रजा भी हमारे समान हो आचरण 
करेंगी । मेने जो ब्रत लिया है, उसको पूरा करके लीटंगा । तुम हठ का त्याग करो । 
मेरी वातें मानो और मेरे कथन के अनुसार राजा वनो । अब तुम नगर को लीट जाओ |” 

तब सभा म उपस्थित मुनि, सुर तथा ब्राह्मणों ने (मन-हींमनन) निश्चय कर 
लिया कि अव युद्ध में रावण की मृत्यु निश्चित है । ऐसा सोचकर उन्होने भरत से कहा--- 
है उज्ज्वल घर्म-निरत भरत, तुम राम के आदेश का पालन करो । 

३०, श्रांराम को जाबालि का उपदेश 


तब मूनि जावालि ने राम को देखकर कहा--यह तुम्हारा कैसा व्यर्थ विचार है ? 
तुमने मुनि-वरेश घारण किये, नृप-वेश छोड दिया, राजभोग त्याग दिया और नियमो का 
पालन करते हुए इस ढंग से जीवन व्यतीत करते हो ? -कहाँ के माँ-बाप और कहाँ के 
पुत्र ? कहाँ का सत्य और कहाँ का पुत्र-धर्म ? यह सब भिथ्या हैं | माता-पिता अपने 
सुख के लिए आपस में मिलते है । शुक्र तथा रक्त के सयोग से मनुष्य-का जन्म होता है । 
पिता केवल बीज का दान देता है । बहुत क्यो, बुझे हुए दीप में तेल देवा जितना 
निरर्थक हैँ, वेद-विधि से परलोक-क्रियाएँ करना भी उतना ही निरर्थक हैँ । इसलिए मेरी 
वात मानकर तुम अयोवग्या लौट जाओ भऔर राज्य ग्रहण करो । 

जावालि के इन वचनों को सुनकर रघुवीर ने क्रोध में आकर कहा--हें मुनीद्र, 
ऐसे नास्तिकतापूर्ण विचार आप किसी दूसरे को समभावें । हमारे लिए वही आचरणीय है 
जिसे हमारे पृर्वजों ने किया हैं । सव धर्म सत्य के आधार पर निर्भर हे । सत्य से 
वढकर दूसरा धर्म और क्या हो सकता है ? ऐसे सत्य का पालन करने के लिए मेरे 
पिताजी ने मुझे वन में भेजा हैँ । यदि उनके आदेश का तिरस्कार करूँ तो मुझसे वढकर 
नीच और कौन हो सकता हैँ ? ज्ञानियो का कहना हैं कि सत्य, घम्में, शम, दम, भूत-दया, 
नीति, विक्रम, प्रिय वचन तथा देव-पितृ-पूजन स्वर्ग के साधन है । इन सब को मिथ्या 
घोषित करनेवाले आप अग्रजन्मा कैसे कहला सकते हे ? आपको क्यो दोष दूँ ? आप 
जैसे नास्तिक का आदर करनेवाले मेरे पिता ही दोषी थे । 

राम के वचनो को सुनकर जावालि ने बड़े स्नेह से कहा--हें राजन, मेने आपको 
नास्तिक मानकर ऐसा विचार इसलिए प्रकट किया है, कि आप किसी प्रकार भी अयोध्या 
लौट चलिए | इसलिए आप घधरर्य घारण करें । 


ट ३१. पादुका-दान 


॥. $ 


- तब सयमी वसिप्ठ ने इक्ष्वाकु से सूयवेश तक के सभी राजाबो - को चर्चा 


- झयरेध्ययकाड श्र 


करते हुए कहा--हे अनघ, तुम्हारे वश में ऐसा कभी नही हुआ कि अग्नमज को रहते हुए अनुज 
राजा बने । पूवेंजों की परपरा के अनुसार तुम्हारा राज्य ग्रहण करना ही उचित हैँ । 
किन्तु पिता के आदेश का उल्लंघन न करने का तुम्हारा दृढ सकलप है, तो जैसे भरत प्रेम॑ 
से तुम्हारी सेवा करता रहा है, वैसे वह तुम्हारी पादुकाओ की पूजा करते हुए शाति से रह 
सकेगा । अत , तुम अपनी पादुकाएँ उसे प्रदान करो ।' 

तब माता, मित्र, आश्रित, मत्री, प्रजा आदि सबने कहा--हे राम, ऐसा 
करना ही उचित हैं । वुरत भरत ने स्वर्ण-विलसित पादुकाएँ राम के सामने रख दी । 
तव राम ने उत्फुल्ल अरुण कमल के गर्भ के वैभव को भी परास्त करनेवाले मुनि-बधू के शाप॑ 
का मोचन करनेवाले, सृति-शिरोभाग पर विलसित होनेवाले, सतत सनकादि मुनिजनों के 
विवाद के कारणभूत, अपने चरण उन पादुकाओ पर रखकर उन्हें भरत को दे दिया । 
उन दोनो को सिर पर धारण किये हुए भरत राघव से वोले--हे देव, नृप-्वेश त्योग 
करके, मुनि-वेश धारण किये हुए, राज्य का भार इन पादुकाओ पर रखकर, में चौदह वर्ष 
तक राज्य की रक्षा करूँगा । आपके चरणो की सौगध खाकर कहतो हैँ कि यदि अवधि 
के समाप्त होते ही आप अयोध्या नही लौटेंगे, तो में अग्नि में प्रवेश करूँगा ।! यो कहकर 
उन्होने अत्यत भवित से अपने अग्रज को प्रणाम किया । राम ने उन्हें हृदय से लगाकर 
आशीर्वाद दिया । उसके पश्चात्‌ उन्होने अपनी माताओ को सात्वना दी और पृुण्यात्मा 
मुनि-पुगवो, मित्रो, मत्रियो, बषु-बाधवों तथा सभी प्रजा को बड़े प्रेम से बिदा किया | 
अत्यधिक उमडते हुए शोकाकुल हृदय से भरत ने पादुकाओ की परिक्रमा की, उन्हें भद्रगज पर 
प्रतिष्ठित किया और आप तथा शत्रुघ्न छत्र-चामर लिये हुए उसके पार््व में खडे हो गये । 
सब लोग वहाँ से रवाना हुए । भद्गगज के चारो ओर सेना चलने लगी । 


भरत इस प्रकार चित्रकूट से चलकर भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचेट। वहाँ 
उन्होने भरद्वाज मुनि को प्रणाम करके सारा वृत्तात उन्हें कह सुनाया | उनकी आज्ञा लेकर 
आगे चले और गगा नदी पार करके श्युगवेरपुर पहुँचे । बडे आदर से वहाँ गृह को 
विदा करके, वे अयोध्या नगर पहुँच गये ! रनवास में माताओ को छोडकर . उन्होने अत पुर 
की रक्षा के लिएं सेना रख दी । मणि-रहित रत्न-मजूषा की तरह तथा सूर्य-रहित दिन की 
तरह रामचन्द्र-रहित शून्य अयोध्या को देखकर उन्हें उस नगर में रहने की किंचित्‌ भी 
इच्छा नही रह गई थी थ इसलिए बे नदीग्राम में जाकर निवास करने लगे । रघुराम की 
पादुकाओ पर समस्त राज्य-भार रखे हुए, राम के समान ही उनकी सतत सेवा करते हुए, वल्कल 
तथा जटाएँ धारण किये हुए, राघव के पुनरागमन की कामना करते हुए और उनके सदृगुणो 
की प्रंशसा करते हुए सरस सज्जन मत्रियों के परामर्श से भरत राज-काज सेँभालने लगे । 

यह अयोध्याकाड समस्त लोक में विख्यात होते हुए विह्ृज्जनों की प्रजसा का पात् 
बन जाय । आश्र-भाषा के अधीश्वर, विमलचेता, आचारवानू, अनुपम घीमानू, भूलोकनिषि 
गोनवुद्ध राजा ने, कमनीय गुण तथा घैयें में मेरुपर्वत, शत्रु के लिए भैरव-रूप, महात्मा, 
अपने पिता विट्ुल-नरेश के नाम पर आचद्रार्क ससार में पूज्य रहने योग्य रीति से, 
असमान भाव तथा ललित छात्दार्थों से युवत रामायण के अयोध्या-काड की रचना की । 

१६ 


श्र र॑ंग्न/थ एाशथ्यायए 


ऋषि-आदिकाव्य और रसिकजनो के लिए आनददायक होकर पृथ्वी पर विलसित इम 
पुण्य-चरित्र को जो पडते हे, या सुनते हे, उन्हें साम आदि बहुव्ेदो का धाम, रामनाम- 
रूपी चितामणि की महिमा से समस्त भोग, परहित बुद्धि, उदार विचार, परिपूर्ण शक्ति, 
साम्राज्य, विमल बच, नित्य सुख, वर्मनिप्ठा, दान में प्रेम, चिरायु, ऐश्वर्य तथा स्वास्थ्य, 
अक्षय कल्याण, पापो का क्षय, श्रेष्ठ पुत्रों की प्राप्ति, शत्रताश और घन-बान्य-समृद्धि 
आदि प्राप्त होगे । उन्हें विना किसी विघ्न-बाबा के लावण्यवती स्त्रियों का प्रेम तथा पुत्रो 
के साथ जीवन प्राप्त होगा । उनके सब सकट दूर होगे । नातेदारों से उनका प्रेमपूर्णं 
मिलन होता रहेगा और उनको सब कामनाएँ पूर्ण होगी । उनके ग्रहों -में देवता तथा 
प्ति-देवताओ की तृप्ति होती रहेगी । यह (रामायण) मोक्षसाघक है, पापनाशक है, 
दिव्य है, भव्य है, श्रीकर है । इसके रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी और वे 
इद्र-भोगादि को प्राप्त करेंगे । जबतक कूल-पर्वत, नक्षत्र, रवि, चन्द्र तथा दिश्वाएँ रहेंगी, 
जवतक वेद रहेंगे, पृथ्वी तथा समस्त लोक रहेंगे, तवतक -यह कथा अक्षय आनद-समूह 
को देने में समर्थ होगों । ह 


चर 


: अयोध्याकांड समाप्त : 


श्रीरंगनाथ रामाथण 


(त्ररएयकरांड ) 


१. चित्रकूट से प्रस्थान 


बित्र-विचित्र वस्तुओ के आगार चित्रकूट” में निवास करते हुए और मुनियों की 
प्रशसा प्राप्त करते हुए राम ने भरत के आगमन की बात सोचकर निद्चय किया कि अब 
मुझे यहाँ निवास नहीं करना चाहिए । वे सोचने लगे कि अगर में यहाँ रह, तो अयोध्या- 
वासी यहाँ पर अक्सर आते रहेंगे । अब भी गज, रथ तथा अइवो के आने से वन का 
बहुत-सा भाग नष्ट हो गया है । इसके अतिरिक्त परम सयमी मुनि मुझसे अनुरोध कर 
रहे हे कि में खर-दृषण आदि राक्षस-समूह के अत्याचार दुर करें । (इसलिए मेरा यहाँ 
से चला जाना आवश्यक है ।) 


हि 


इस प्रकार सोचकर दूसरे दिन उन्होनें चित्रकूट के मुनियों की आज्ञा प्राप्त की और 
वहाँ से चलकर अन्रि मुनि के आश्रम में पहुँच गये । मुनि ने अपने शिप्यो के साथ वे 
स्नेह से राम की अगवानी की और उन्हें आश्रम में ले जाकर कई प्रकार से उनका आदर- 
सत्कार किया । मुनि-पत्नी अनसूया ने बडे प्रेम से सीता का आतिथ्य किया । उन्होंने 
सीता को पातित्रत्य-धर्मं का उपदेश किया, अपने सर्गे-सव्धियों को छोडकर पति के साथ 
वन में रहने के उनके निश्चय की प्रशसा की । इसके पहचात्‌ अनसूया ने सीता को विभिन्न 
प्रकार के अगरायग, कभी ते मुरकानेवाले फूल और कभी मैले न होतेवाले वस्त्र दिये । 


श्र रंगनातथ रायायण 


फिर उन्होने सीता से कहा--हे स्मणी, तुम मुझे यह बताओ कि स्वयवर में राघव ने 
तुम्हें कैसे प्राप्त किया ।! तव (सीता) अपने पति की जोर देखकर ब्रीड़ा से अभिभूत हुई 
और मंद-मद मुस्कुराती हुई वोली--हे माता, सुनिए । मिथिला के अविपति जनक के, 
यन्-भाला के लिए भूमि जोततें समय मेरा जन्म हुआ । इस कारण मेरा नाम सीता पड़ा। 
सतानहीन होने के कारण राजा ने वड़े स्नेह से मेरा पालन-योपण किया । युव्वस्था 
को प्राप्त होनेवाली मुझे देखकर उन्होंने सोच-विचारकर घोषित किया कि हमारे 
घर में स्थित छिव-बनुप का जो सवान करेगा, उसी के साथ में इस कन्या-रत्न का विवाह 
क्लेंगा । इस समाचार के पाते ही बनेक राजा वहाँ आये, विन्‍्तु वे शिव-वनुष को उठाकर 
उसका सघान न कर सकने के कारण वापस चले गये । कुछ दिनो के पद्चात्‌ विश्वामित्र 
की सेवा करने के उपरान्त राघव वहाँ आय । उन्होंने भिव-धनु को इस प्रकार तोड़ दिया, 
जैसे हाथी ईंख को तोड़ डालता हैं । तब उन्होने मेरा पाणि-श्रहण किया ।॥' 
इस प्रकार सीता के अपने विवाह का वृत्तांत सुनाने पर बनसूया हर्षित हुई । 
तब्तक रवि पद्चिम समुद्र में डूबनें लगा । राम नें सध्या आदि नित्य-कर्मों को पूरा किया 
और छत्रि का सत्कार ग्रहण किया तथा उनकी सत्सगति में रात वही विताई । 


२. राम का दण्डक-वन की यात्रा करना 


इसरे दिन प्रात काल ही संघब्या आदि कर्मो से निवृत्त हो जत्रि की आज्ञा लेकर 
राम ने उस दण्डक-वन में प्रवेश किया, जो सरल ताल, तमाल, साल, कपिला, कुखक, 
जगर, कुटज आदि वृक्षों से भरा हुआ था, जो सूर्य के समान तेजस्वी मुनियों का निवास- 
स्थान था और जो गेड़ा, सिंह, हाथी, नीलगाय जैसे मृगो तथा “गंड भेरुण्ड' (दो शिरो- 
वाला एक पक्षी) जैसे पक्षियों से पूर्ण था । ऐसे बन में प्रवेश करके बेद-घोष से प्रति- 
घ्वनित होनेंवाली तथा हवनकूंडो से पवित्र पर्णणानाओ में पवन, जल तथा सूखे पत्तो 
क्यू आहार करते हुए तपच्चर्या में लीन मुनियो के निवासों तथा तपस्वियों के आश्रमों 
के दर्शन करते हुए, राम अपने जनुज के साथ मुनिणे का आत्तिथ्य ग्रहण करने हुए यात्रा 
करते रहे । 


३. विराध का वध 

इस प्रकार उस दण्डक-बन में जाने समय, पर्वत के समान आकार, भयंकर आँखें, 

वडा मुंह और नासिका तथा दीर्घकाय विराध नामक भयकर राक्षस, अपने अट्टहास से सारे 
आकाश को केपाते हुए जौर वन को चीरते हुए जाया और जपनी वलिप्ठ तथा पैनी चोच 
तथा बाहुओ मे कुचित केझोवाली सीता को इस प्रकार आकाण की ओर उड़ा लें गया, जैसे 
गरुड पक्षी सेपोले को उड़ा ले जाता है | फिर, जानकी की दण्मा देखकर दुखी होनेवाले 
राम तथा लक्ष्मण को सवोधित करके उसने कहा---क्यो रे, तुम्हारा कितना साहस है कि 
तुम वीरी की तरह निर्मण होकर घनुप-बाण धारण क्यि इस वन में विचर रहे हो, जिसमें 
में रहता हैँ । आखिर तुम्हारा भनुजबल क्तिना हैं ? मेरी माता झतहंद है और मेरे 
पिता जय हैं। किसी भी आयुव से न मरने का वर मेने पहले ही ब्रह्मा से प्राप्त किया हैँ।* 


ऋ%0९यकांड ७ 


में ब्राह्मणों को ख़ानेवाला हूँ । मेरा नाम विराध है । में क्रोध में आता. हूँ, तो इन्द्र आदि 
देवताओं को भी निगल जाता हूँ; फिर मनुष्यों की क्या वात ? अब तुम्हारा कुशल इसी में हूँ 
कि इस रमणी को मुर्भे सौपकर, तुम यह वन छोड़कर चले जाओ । अन्यथा मेरे हाथ:के 
शूल के वार की प्रतीक्षा करो ।' 

सौमित्र ने सीता की भीति, तथा राक्षस का गवे देखकर कहा--हे राक्षस, ये 
पृथ्वी की पुत्री, पुण्यवती, साध्वी, राम की पत्नी है, उन्हें ले जाना तुम्हारे लिए उचित नही है । 
अब तुम ले भी कहाँ जा सकते हो ? में अभी तुम्हें पकडकर तुम्हारा वध कर डालूंगा ।' 

इस प्रकार कहते हुए उन्होंने क्रोध से धनुष पर वाण-सघान करके उसके 
वक्ष स्थल पर चलाया । तब विचित्र ढग् से अट्टह्मयास करते हुए बडे क्रोध से उसने गूल को 
घुमाकर उनपर फेंका । घने बादलों से छूटकर नीचे गिरनेवाली विजली के समान 
आवनेवाले उस शूल को राम ने अपने दो वाणों से काट दिया। इसपर ओर भी कुद्ध होकर 
उसने सीता को पृथ्वी पर गिरा दिया । उस राक्षस के हाथो से मुकत होकर बादलों से 
निकलकर आकाश-मार्ग से पृथ्वी की ओर विजली की तरह आनेवाली छटपटाती हुई सीता 
को राम ने गरुड-अस्त्र की सहायता से पृथ्वी पर उतार लिया । 

इसके पद्चात्‌ राम ने उस राक्षस पर कई वाण चलाये, किन्तु वह उनकी जरा 
भी परवाह न करके अट्ृहास करने लगा । वह वड़े वेग से आया और अपने हाथो से 
राम और लक्ष्मण को उठाकर अपनी पीठ पर लादकर वहाँ से शीघ्रता से जाने लगा । 
जानकी यह देखकर विलाप करने लगी । राम और लक्ष्मण ने अत्यत कोध से बिजली के 
समान चमकतेवाले अपने खड़्गो को म्यान से निकालकर उसके दोनों हाथो को काट डाला । 
तब घराशायी होनेवाले पहाड़ की तरह वह राक्षस पृथ्वी पर लोटने लगा । फिर भी 
उसे जीवित देखकर राम-लक्ष्मण ने अपने पदाघात तथा मुप्टियो के प्रहार से उस राक्षस 
को घूर-चूर कर दिया । (यह देखकर) सभी मुनि साधुवाद देते हुए उनकी प्रशसा 
करने लगे । 

इसके पश्चात्‌ राक्षस गधर्व का रूप धारण किये हुए विमान में बैठकर राम से 
बोला--'में गर्व हूँ, मेरा नाम तुबुर हैं। रभा के साथ रतिन्क्रीड़ा में तललीन रहते हुए, 
कुबेर की सभा में उपस्थित न हो सकते के कारण कुबेर ने मुझे राक्षस का जन्म लेने का 
शाप दिया था । आपके वबाहुबल के प्रताप से मेरा शाप-न्मोचन हुआ । अव में जा रहा हूँ । 
भाप मेरे शरीर को यही गाडकर शरभग मुनि के आश्रम में जाइए ।' 

इस प्रकार कहकर प्रणाम करके वह वहाँ से चला गया। उसके शरीर को वही 
गाडकर श्रीराम ने सीता को बडे स्नेह से गले लगा लिया और उनका भय दूर किया । 
उसके पद्चात्‌ उन्होंने अपने अनुज से कहा--क्या इस पृथ्वी में ऐसे दुर्गंग वन कही हो 
सकते है ? हमें शीघ्र ही सीता को लिये हुए इस वन को पार कर जाना चाहिए । 


४. भीराम क्रा शरमंग के आश्रम में पहुंचना 


३, 


इस प्रकार सोचकर, शरभग के दर्शाश करने की अभिलापा से दाम उनके आश्षम 
की और चले । उस समय उन्होने उस आश्रम के ऊपर से उदित सूर्य को भाँति प्रकाशमान 


श्श्ड र॑ंगनाथ रायायपए 


बरह्वो से युवत, इवेत छत्र से आवेप्टित, देवताओं से भरे एक विमान को चारो और उज्ज्वल 
मणियो की आमा विकीर्ण करते जाते हुए देखा । उस विमान में विराजमान कल्याण॑गुष- 
सपन्न व्यक्ति को देखने की इच्छा से राम तेजी से आगे बढ़े, किन्तु इतने में वह विमान 
आँखों से ओकल हो गया । 


राम ने मुनि के आश्रम में पहुँचकर, मुनि को प्रणाम किया और मुनि का सत्कार 
ग्रहण करने के पद्चात्‌ बड़े प्रेम से मुनि को देखकर पूछा--हें मुनीश्वर आपके देशेनार्थ 
हमारे आते समय एक विंमान अपना प्रखर तेज विकीर्ण करते हुएं यहाँ से निकल गया था । 
वह यहाँ क्यो आया था और कहाँ चला गया हैँ ? उस विमान में कौन विराजमान थे ? 
आप कृपया बतावें ।॥' 


तव मुनि बोले-हे देवेन्द्रतवु | वह देवेन्द्र था । हे देव, ब्रह्मतोक जाने की 
आमंत्रण देने के लिए वह देवताओं के साथ देवलोक से यहाँ आया था । हे रामचद्र, 
मुझे मालूम था कि आप॑ यहाँ पवारेंगे । आपका पूजा-सत्कार करने के पदचात्‌ जाने का 
निएइचय करके मेने उससे कह दिया कि में अभी नही आऊँगा । तुम चाहो तो जा सकते हो । 
इन्द्र भी वहुत दुखी होर्कर, वनवास (के दूख) से खिन्न आपको न देख सकने के 
कारण, यहाँ से चला गया है | इतने में आप भी यहाँ आ पहुँचे । हे राजनू, आपके 
प्रसाद से मेने बड़ी निष्ठा से, अपना तप निर्विध्न समाप्त किया है । यज्ञ भी सफल हुआ । 
में आपके दर्शन कर सका | आप अब सयमी सुतीछरण के दर्शन करके उनके यहाँ रहिए । 
में अब ब्रह्मलोक में जाऊँगा ।! इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उस मुनौश्वर ने राम के 
सम्मृख ही अपने शरीर को मत्र-रत करके, अग्नि में दहन कर दिया और इन्द्र आदि 
देवतामो की सेवाएँ प्राप्त करते हुए ब्रह्मलोक को चले गये ! 


तव॒ उस आश्रम के निवासी संयमी, वायुसेवी, बैखानस, मौनब्रती, पर्णशाला-विहीन, 
भूमिशायी, मननशील, उदात्त मुनि, एकातवासी, अनशनब्रती और पचाग्नियों के मध्य 
तपस्या करनेवालें, सभी तपस्वी भुड-के-क्रुड- दयालु रामचद्र के पास आये और वोलें-- 
हैं राम, आप पिता की आज्ञा का पालन करने में अत्यत तत्पर हे, सत्यव्रती हे और 
निर्मेल यश के आगार है । आप जैसे राजा के रहते हुए क्‍या हमें रक्षसों के उपद्रवो से 
पीड़ित होना चाहिए ? ब्नत॒ की रक्षा करनेवाले राजा को भी उस ब्रती के पुण्य का एक 
चौथाई भाग मिलता हैँ | अव आप सभी देत्यो का सहार करके हमारे तपोतन्रत को सफल 
बनाइए । हम आपकी जरण में आये हे ।! शरणागत के रक्षक होने के कारण राम ने 
उन आश्रमवासी मुनियों को अभयदान दिया और कहा--आपकी कृपा से बलवान्‌ 


कि 


राक्षमो के उपद्रवों को में दूर करूँगा । आप दुःखी मत होइए ॥! 


५. ओीराम का सुत्तीक्ष्ण मुनि के आश्रम में पहुँचना 
इसके पद्चात्‌ वे भयकर वन-प्रात में से होते हुए महान्‌ मतिमान्‌ सुतीक्षण मुनि के 
आम्नम में पहुँचे । उस मुनि की परिक्रमा की और अपना नाम कहकर उन्हें प्रणाम किया ! 
सुतीक्षण मुनि ने राम को आशज्ञोर्वाद देकर उनका उचित आदर-सत्कार किया और उसके 
पदचात्‌ बोले--“हे अनधघ, जबसे आपके मुनि-वेश धारणकर चित्रकूट में पहुँचने का समाचार 


करण्यकाड (२6 


हमने सुना, तबसे हम आपके आगमन की उत्कट इच्छा लिये हुए थे । आखिर आप 
यहाँ आ ही गये हे । आपके दर्शन कर सके, इससे हम अपने को धन्य मानते है । 
दुरात्मा, अत्यधिक बाहुबली राक्षस गवन्मित्त होकर हमारे आश्रम में आये, और हवन- 
वेदियो का नाश किया, यूप-काष्ठो को उखाडकर फेंक दिया, पेडो को उखाड डाला, जप- 
मालाओं को तोड दिया, हमारे वस्त्र फाड़ डालें, फलो को चुन लिया, फूलो को गिरा दिया, 
सरोवरो का पानी गदा कर दिया, कई प्रकार के दुख दिये और कई मुनियो को मार 
भी डाला । हमारी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है । हे देव ! आप हमारी रक्षा कीजिए | 
हमें दुख देनेवाले इन राक्षसों को हम अपनी क्रोधपूर्ण दृष्टि से देखकर, चाहें तो भस्म कर 
सकते हे । किन्तु पृथ्वी पर आपके जैसे राजा के रहते हुए हम क्रोध नही करते हूँ । 
अत , आप इन दुष्ट राक्षतों का सहार करके हमारे तप की रक्षा कीजिए |” तब राम ने 
उन्हें सात्वना दी कि में युद्ध में इत राक्षमों का वध करूँगा, आप खिन्न मत होइए । 
इसके पश्चात्‌ उन्होने शरभग के आश्रम के निवासी मुनियो को अपने अभयदान का वृत्तात 
सुनाया, राक्षसों का वध करने की प्रतिज्ञा की और उनकी सगति में वही रात विताई । 
दूसरे दिन बहुत-सें मुनि वहाँ आये और राम से अपने-अपने आश्रमों में आने की 
प्राथना की । तब राम सुतीक्षण मुनि से आज्ञा लेकर अन्य मुनियों के पुण्याश्रमो को देखने 
की अभिलाषा से वहाँ से रवाना हुए । मार्ग में जानकी ने राम को देखकर कहा-- 
“हे अनघ, (हम) राज्य छोडकर वन में आये हे, जटाएँ तथा वल्कल धारण किये सुनियो की 
तरह जीवन बिता रहे है, ऐसी दशा में आप राक्षसों पर क्यो क्रोध करते है ? विचार 
करने पर यह सगत नहीं मालूम होता है । हे काकुत्स्थ-तिलक, जबसे आपने मुनियों को 
राक्षयों का वध करने का आइवासन दिया है, तबसे मेरा मन बहुत ही खिन्न हो रहा है । 
यह कार्य ठीक नहीं है, इसलिए आप यह कर्म छोड दीजिए | हे प्राणेइवर, क्‍या 
प्राणियो को मारने से पाप नहीं लगेगा ? किसी समय एक मुनि अत्यत तपोनिष्ठां से 
जीवन-यापन करते थे । इन्द्र ने उन्हें एक खड़्ग देकर कहा--इसे आप रखिए, में फिर 
आकर इसे ले जाऊँगा । तदनतर उस मुनि ने उस खड्ग से लता, वृक्षों को काटतें हुए, 
हिंसा में श्रवृत्त हो, जडमति बनकर तपरचर्या त्याग दी और अत को दुर्गति को प्राप्त 
हुआ । इसलिए हें देव, कहाँ तप और कहाँ राजघर्म तथा अस्त्र-शस्त्र ? आप ऐसा कार्य 
ते कीजिए ।॥” 
तब रामचद्र ने हँसकर सीता से कहा--हे साध्वी, तुम्हारा बताया हुआ मार्ग 
ब्राह्मणों का है, क्षत्रियों का नही । मेरा हृदय जानते हुए भी मसुझपर अत्यधिक अनुराग 
रखने के कारण तुम ऐसा कह रही हो । हे तरुणी, उत्तम राजधम का पालन करनेवाले 
इसीलिए तो घनुष-वाण धारण करके विचरण करते हे कि शरणागतों की रक्षा कर सकें । 
तुम इस परम धर्म का विचार क्यो नहीं करती हो ” में उन महामुनियों को दिये गये 
वचन का अवश्य ही पालन करूँगा। प्रही मेरा दृढ सकलप है । में अपने प्राण भले ही 
छोड दूं, तुम्हें भी त्याग दू", या लक्ष्मण को भी छोड दूं, कितु अपना प्रण नहीं ढाल 
सकता । इन बातो को सुनकर जानकी चुप रह गई और लक्ष्मण विस्मित हो गये । 
१७ 


१80 रंयनाथ ए्यायण 


4६. मंदकर्णी का वृत्तांत 
इसके पच्चात्‌ रामचद्र प्रत्येक आश्रम में, कही तीन महीने, कही चार महीने, आराम 
रहते हुए, पुण्याश्रमों के दर्शव करते हुए आगे बढ़े । मार्ग में उन्होंने एक स्थान पर 

एक तड़ाग देखा, जिसके जल के मध्य से सगीत का निनाद अत्वबिक सुनाई पड़ रहा था। 
अत्यंत विस्मव-चकित होकर वे उस तड़ाग के किनारे पहुँचे और उसके निकट निवास करने- 
वाले धर्ममृत नामक मृनि को देखकर ठोले--हें मुनिनाथ, यह कैसी विचित्र बात है 
कि इस तड़ानग के जल में से ऐसा अच्द सुनाई दें रहा है ? तव बर्ममृत ने अत्यत 
उत्साह से रामचंद्र से कहा--किसी समय मदकर्णी नामक मुनि इस तडाग के जल के वीच 
खडे होकर बड़ी निप्ठा से अनेक वर्ष तक अत्युग्र तपस्या करते रहे । उस तप को देखकर 
इन्द्रादि ढेग्ता भयनीत हो गये | उस मुनि के मह्त्व को क्षीण करने के लिए उन्होने 
पाँच अप्सराजों को भेजा । वे अप्सराएँ मुनि की परिणीता वघुएँ वन गई और वे जल के 
मध्य मूनि के द्वारा निर्मित स्वर्ण-सौथों में, मुनि के सम्मुख बड़े मोद-मग्त हो नृत्य कर 
ही हे । इसी कारण से यह सदोवर पत्ाप्सर के नाम से विल्यात है । जो मधबुर ध्वनि 
जब सुनाई पड रही है, वह उनके वाद्यों की ध्वनि हैँ 

इन वचनों को सुनकर राम ने बअत्यत भक्त से पुण्यात्मा मंदकर्णी को प्रणाम किया 
ओऔर उस घोर वन के मार्ग से आगे बढ़े । मार्ग में उन्‍होंने कई मुनियो का दर्शन करके 
उनको प्रणाम किया । बहुत-से पुण्य तपोबनों को देखकर मुग्ब हुए, कमल और कमलिनियो 
से भरे सरोवरों में स्नान किया; मदन्मद गति से चलनेवाले पवन की प्रणसा और 
क्िल्लियों की क्रकार की निंदा की । शुक, मयूर आदि पक्षियों को पकड़ते हुए, वे हाथी 
वराह आदि मृगो का शिकार करते जातें थे । कभी मेघास्त्र का प्रयोग करके गर्मी को 
दूर करते और कभी अपने दर्शन करनेवाले के पाय मिटातें । कभी बौवन को प्राप्त लताओं 
से फूल चुनते, कमी करार करनेवाले श्रमरों को दूर भगाकर गगनचुवी पर्वत-शिखरो 
पर चढ़ जाते | जब जानकी थक जाती थी, तव उचका परिहास करते हुए वडी मृदुल गति 
से गुफाओं को पार करते हुए, चढाव पर चढ़ने की क्रिया (जानकी को) सिखातें । वहाँ 
की भीलनियों के साहस की प्रचंसा करते हुए, अभेद्य भाड़ियो में प्रवेश करते हुए ऐसी 
घाटियों में श्रमण करने लगे, जहाँ सूर्य की क्रि्णें भी नही पहुँच पाती थी । इस तरह 
राम, लक्ष्मण तथा जानकी के साथ पुण्य तीर्थों, पृण्य नदियों तथा पुण्य तपोवनों में 
भ्रमण करते हुए दस वर्ष के उपरान्त फिर से सुतीक्षण मुनि के आश्रम में लौठ आये 
ओर उस मुनि के यहाँ वे जआाराम से कुछ वर्ष तक रहें । 

७. अगस्त्य से मेंट 

एक दिन रामचद्र ने अगस्त्य के दर्शन की इच्छा से प्रेरित होकर (सुतीक्ष्ण) मुनि 
को देखकर पवित्र भक्ति से साथ क्हा--हें महात्मा, मुनिश्रेष्ठ, अगस्व्थ कहाँ रहते है 
उनका आश्रम कहाँ हैं ? कृपया बत्तलाइए । सुतीध्ण ने उन्हें उस आश्रम के मार्ग की 
दिशा तथा चिह्न बताये और बाशीर्वाद देकर उन्हें विदा किया । अपने प्रिय अनुज तथा 
पत्नी के साथ दक्षिय की ओर चार योजन का रास्ता तब करके, बहुतनतें जगलो, पहाड़ 


अरण्यकांड ९३९ 


तथा नदियों को पार करते हुए वें अगस्त्य के भ्राता के आश्रम में पहुँचे | वहाँ बडी श्रद्धा 
से उस यतीश्वर के चरणों में सिर भुकाकर वे उस रात को वही ठहरे । मुनि के सत्सग 
में रहते हुए राम ने उनसे प्रइत किया--हे यतीश्वर, पहले इस स्थान पर अगस्त्य ने 
वातापि का सहार कैसे किया ?” तब वह मुनीद्र रामचद्र को देखकर उस पृण्य-क्था को इस 
प्रकार कहने लगे--“वक्सी समय वातापि और इल्वल नामक दो प्रचंड राक्षस इस पृथ्वी 
पर रहते थे । उनमें वातापि मेष का रूप धारण कर लेता था और इल्वल ऋषि के 
रूप में मार्ग में अडा रहता था । वह मार्ग में जानेवाले ब्राह्मणों को श्राद्ध के बहाने 
अपने घर में आमत्रित करता था और बडे प्रेम से घर बुला लाता था । उसके पर्चात्‌ 
उस मेष को मारकर बड़े प्रेम से उसका भोजन वनाकर उसे अतिथियों को खिलाता था । 
भोजन के पश्चात्‌ वह बातापि का नाम लेकर पुकारता था--हें वातापि । जल्दी चले 
आओ ।' तब वह ब्राह्मणो का पेट चीरकर बाहर निकल पठता था । इस प्रकार, उन्होने 
कितने ही मुनियो को मार डाला । एक दिन कुभसभव (अगस्त्य) उस मार्ग से आये, 
तो उसने कपट से उन्हें भी भोजन कराया और भोजन के पश्चात्‌ वातापि को पुकारा । 
तब्र अगस्त्य ने कहा--अब वातापि कहाँ से निकलेगा | वह तो कभी का पच गया हैं 
इस पर क्रूद्ध होकर इल्वल ने राक्षस का रूप धरकर उनपर आक्रमण करने के लिए 
निकला, तो कुभसभव ने अपने हुकार-मात्र से देखते-देखते उसको भस्म कर दिया और 
सव मुनियो को हर्षित किया । इतना ही नही, उन्होंने विध्याचल को दवा दिया, अद्वितीय 
ढंग से समस्त सागर को पी गये और नहुष को साँप वन जाने का ज्ञाप दिया । ऐसे 
पुण्यमृत्ति अगस्त्य केवल मुनि नही है । वे मुनि के रूप में (रहनेवाले) शिवजी हैँ ।” 


इन वातो को सुनकर रघुराम ह्षित हुए । दूसरे दिन मुनि ने रामचन्द्र का उचित 
आदर-सत्कार करने के वाद उन्हें आशीर्वाद देकर अगस्त्य मुनि के आश्रम का मार्ग बताया 
उस मार्ग से एक योजन तक जाने के पर्चात्‌ उन्होंने अगस्त्य के उस रमणीय आश्रम को 
देखा, जो कटहल, दाडिम, शमी, बेर, अश्वत्थ, साल, द्राक्षा (केशमिग), रसाल, तमाल, 
वेल, खर्जूर, मदार आदि वृक्षों से और उन वृक्षों पर लदे हुए सुगधित फूल, और 
उन फूलों के मकरद पर आसक्त अश्रमर, सुन्दर पुप्पो के पौधे, और उन पौधों के मध्य 
मित्रता के साथ विचरण करनेवाले मृगो, कोकिलो का कल-कूजन, जास्त्र तथा वेद-ध्वनि, 
तथा विविध तपोविनोदों से दीप्तिमान्‌ था । 


आश्रम में पहुँचकर राम ने एक मुनि के द्वारा अपने आगमन का समाचार अगस्त्य 
मुनि को जनाया, और उसके पश्चात्‌ उनके सम्मुख उपस्थित होकर उनके चरण-कमलो में 
वही भवित से बदना की । अगस्त्य ने उन्हें हृदय से लगाया, आश्षीर्वाद दिये और विविध 
प्रकार से सतुप्ट किया । तदुपरान्त मुनि बोले--हे शुभ नामवाले राम, हे उत्पलब्ध्याम, 
है गृुणघाम, तुम क्रूर दानवो में भय उत्पन्न करनेवाले द्वो । मुनियो का सौभाग्य हैँ कि 
तुमने मुनि-वेश में तपस्वी की तरह वन में निवास करते हुए, मुनियों को अभयदान दिया है 
कि तुम राक्षतों का सहार करोगे, ञत वे दुखी न हो। तुम्हारे इन दयापूर्ण वचनो को 
सुनकर मु्के परम हर्ष हुआ । 


श्र रंगनएथ एयायण 


इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उत्होने बडे प्रेत से उनका अतिथि-प्रत्कार किया और 
असमान दिव्यास्त्र, जस्त्र, कोदड तथा कवच आदि प्रदान किये । उन सबको ग्रहण करके 


9०५. 


रामचद्र ने वही उनके सत्सग में रात्रि बिताई । 


दूसरे दिन सध्या आदि से निवृत्त होने के परचातू परमात्मा राम ने उस मुनिश्रेष्ठ 
को प्रणाम किया । तव उनको आशीर्वाद देकर भविष्य के कार्य की सभावना करके उस 
धीमान्‌ू कुभसभव ने अत्यत आदर के साथ रामचद्र को संबोधित करके कहा--है राम ! 
तुम उस पचवटी में जाकर रहो, जिसके प्रागण में गोदावरी नदी के पुण्य जल से शीतल 
बनाये गये तथा मद-मंद चलनेवाले पवन के प्रभाव से लता-रूप्री नत्तंकियाँ नृत्य करती 
रहती है, और जो जटाधारी धूजंटि के लिए पृज्य हैं। कृभसमभव की आजा लेकर रघुवर 
उस स्थान के लिए रवाना हुए | 


5. जठायु से मित्रता 
मार्ग के मध्य में उन्होते एक खगराज को देखा, जो पश्चो से युक्त कुल-पर्वत के 
समान था । राम ने सोचा कि यह भी कोई राक्षस होगा, इसलिए उससे प्रश्त किया कि 
तुम कौन हो ? तब वह पक्षी बडे हर्ष से कहने लगा--हे राम, मेरे पिता, गछूंड के 
अग्रज, कश्यप के पुत्र तथा सूर्य के सारथी महात्मा अरुण है । सपाति मेरे अग्रज हे । 
म॑ आपके पिता का मित्र हे, आपका हितैपी हूँ, पराया नही हूँ और में महान्‌ साहसी हूं। 
मेरा नाम जठटायु है। यह वन असुर-राजा के अधीन है, इप्तलिए (आप) सीता की 
रक्षा सावधानी से करते रहिएगा ।! तब राम ने उसे अपने पिता दशरथ के समान 
मन में मानकर बडे स्नेह से उसकी पूजा की और वहाँ से चलकर पचवदी में जा पहुँचे । 
वहाँ के श्रेप्ठ तपस्वी तथा मुनियों को बड़ी भक्ति से प्रणाम करके राम ने उनका सत्कार 
ग्रहण किया और फिर लक्ष्मण तथा सीता को देखकर वबोले--- हमने कई प्रकार के पुण्य 
आश्रमों को देखा है, किन्तु ऐसी ग्रौतमी गगा (गोदावरी), ऐसे सरोवर, ऐसे वृक्ष और 
ऐसे आश्रम कही नहीं देखे | हम आज से यही रहेंगे ।॥' 
इस प्रकार वे अत्यत हर्षित हुए और वहाँ के मुनियो की अनुमति प्राप्त करने के 
पदचात्‌ स्वयं तथा लक्ष्मण ने उसी दिन बडी तत्परता से एक सुदर पर्णशशाला बनाई । 
तत्पश्चातू आप और लक्ष्मण ने उसकी पूजा की और भूसुता (सीता) के साथ उस पर्ण- 
शाला में प्रवेश किया । इस प्रकार वे छह मास तक बडे सुख से वहाँ रहे । 


९ हैमंत-वर्णन 
तब समस्त पृथ्वी को तथा दसो दिग्याओ को कुहरे से आच्छादित करते हुए हेमत 
ऋतु का आगमन हुआ । एक दिन शत काल ही सीता के साथ स्तान करने के लिए 
जाते समय राम ने लक्ष्मण को देखकर कहा--हे लक्ष्मण, तुमनें गीतकाल की महिमा देखी है ” 
चारो ओर हिम इस प्रकार आच्छादित हो गया है, मानो सभी दियाएँ ठड से 
भीत होकर बवेत कौशेय धारण किये हो । सारी पृथ्वी पर गिरी हुई ओस की बूंदें जमकर 


ऐसी दिखाई दे रही है, मानों हेमत ऋतु-छुप्री वादल ने समस्त आकाश में व्याप्त ह्वीकर 


ऋएण्यकीड श्व्ड 


अत्यधिक ओले बरसाये हो । कही-कही ओस-कण दूर्वाकुरो के सिरो पर ऐसे दिखाई पड 
रहे है, मानो मरकत की शलाकाओ की पक्तियों पर सदर ढंग से पिरोये गये मोतियों की 
लडियाँ हो । उस पुप्ण-लताओ को देखो, जो कामदेव क॑ सम्मोहनास्त्र के समान, स्पर्श करनेवाले 
पवन से भयभीत होकर, मानो विरहिणियो की तरह चचल गति से डोल रही हैं । 
ओस में रहनेवालें कमल, आँसुओ में निमग्न विरहिणियों के मुखो का उपहास कर रहें हैं । 
वहाँ देखो, पानी के ऊपर तैरनेवाले कमलो के पराग पर मटरानेवाले भ्रमर और लाल 
कमल, ठड से पीडित सरोवर के देवताओ के लिए धुएँ से यूकतत अगीठियों के समान दीख 
रहे है । ह अनुज, वहाँ देखो, जगनी हाथी प्यास से ध्याकुल होकर मद गति से दौडते 
हुए इस नदी में आते हैं, नदी के जल को अपनों सूडो में भरकर चिघाडते हुए अपनी 
सूडो को समे्ट हुए भाग रहे है । अब भरत भी मेरे प्रति भक्ति रखने के कारण राज' 
गरीग छोडकर, वल्कल तथा जटाएँ घारण करके, मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए तडप 
रहा होगा । न जानें, वह महान्‌ व्यक्ति, परम पाग्न श्रातृ-प्रेमी, अपने पिता तथा अग्नज 
की आज्ञा का पालन करनेवाला परम यशस्त्री, आश्नितो का रक्षक भरत, उष काल में कैसे 
सरयू-नदी में स्नान करता होगा ? न जाने, वह मुनि की तरह क॑से पृथ्वी पर सोता होगा ? 
मेरे पिता के सत्य वचन तथा मेरा दृढ सकल्प उनके कारण ही सभी लोको में इतने प्रख्यात हुए । 
जिस माता की आज्ञा के कारण में सभी सयमी मुनियों के आश्ीर्वाद प्राप्त कर सका, ऐसी 
माता को न जाने कटु वचनों से वह कितना दुख देता होगा । नहीं, भला वह पुण्यात्मा 
ऐसा क्यो करने लगा ? राज्य के अधिकार से अलग होकर में तपस्वी हुआ, कितु राज्य 
का अधिकारी होते हुए भी वह तपस्वी हुआ । उस पुण्यात्मा को देखकर दूसरों को सीखना 
चाहिए कि भाइयो में परस्पर कैसा व्यवहार उचित है । ऐसे भरत तथा स्लेहपूर्ण 
माताओ, तथा अन्य नातेंदारों को न जाने हम कब देख पायेंगे ।” इस प्रकार उनके सबंध 
में सोचते हुए बडी श्रद्धा से उन्होंने गौतमी नदी में जी भरकर स्नान किया, सूर्य को अध्य 
दिया, गायत्री-मत्र का जप करने के पदचात्‌ ब्रह्म-यज्ञ किया और पर्णशाला को लौटकर बडी 
प्रसन्नता से रहने लगे । 


१०, जंबुमालि का वृत्तांत 


एक दिन लक्ष्मण प्रात काल ही उठे और बडे पविन्न चित्त से अपने भाई को प्रणाम 
किया और कद, मूल, फल आदि लाने वन में चले गये । वनों में घूमते-घामते उन्होनें एक 
ऊँचे पहाड को देखा और उसके निकट विचरण करने लगे । इसी समय समस्त पृथ्वी को 
देदीप्यमान करते हुए सूर्य से उत्पन्न एक खड़्ग आकर भीषण जलद के गभीर गर्जन की-्सी 
वाणी में कहने लगा--हे राक्षस-कुमार, तुम्हारे तप से प्रमन्न होकर सूर्य ने शत्रुओं का 
नाश करने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है | तुम मुझे ग्रहण करो।' तब उस राक्षस- 
कुमार ने कहा--सूर्य ने स्वय तुम्हें मुझे न देकर, मेरा अनादर किया है। मे तुम्हें 
प्रहण नहीं करूंगा । मेरे सारे तप पर पानी फिर गया हैं। हे सूर्य के खड़्ग, तुम 
जहाँ चाहो, जा सकते हो ॥” यो कहकहू वृह पूर्ववत्‌ू अचल समाधि में लीन 
हो गया / 


९३9 रंगनाएयथ एयायण 


(यह देखकर) लक्ष्मण विस्मित हुए और उस खड्ग की ओर देखकर बडी कुशलता 
से उसके निकट पहुँचे और उसे हाथ में लेकर देखने लगे | फिर यह सोचकर कि 
तपस्वियो के आधार इन फल-वुक्षो को काटना नहीं चाहिए । वें जहाँ-तहाँ भटकते हुए एक 
विशाल बाँस की भाडी के निकट पहुंचे और उस भाडी पर खड़्ग चलाया। खड्ग चलाते ही 
उस फ्राडी के मध्य में तपस्या में लीन एक मुनि कटकर भूमि पर लोटने लगा । यह 
देखकर लक्ष्मण मूच्छित-सें हो गये । कुछ समय के उपरान्त वे सभले और विलाप करने 
लगे-- हाय, यह मेने वया कर डाला ? अनजान में मेने एक ब्राह्मण का वध किया और 
समस्त लोको की निंदा का पात्र बना । ब्रह्म-हत्या का पाप मुझे प्राप्त हुआ है । हाय, 
में इतनी दूर क्यो आया ? मेने यह खड़ग लिया ही क्यों ? अनुपम धर्मात्मा रामचद्र के 
अनुज मुझे ऐसा घोर पाप लग गया है । यह मुनि न जाने कौन है ”? (अनजान में) 
मेने उनका वध कर डाला । जानकीनाश्र सुनेंगे, तो न जाने मुझे क्या कहकर तज देंगे । 
क्या जाने मुनिजन कैसा श्ञाप देंगे | में यह वृत्तात (राम से) कह भी नहीं सकता, कहे 
विना रह भी नहीं सकता । हाय भगवान्‌ ! सर्वनाश हो गया है ।' इस प्रकार भय-विह्वल हो, 
दुख करते हुए धीरे-धीरे पैर घसीटतें हुए ये चले । मन-ही-मन सोचते जाते थे कि 
महाराज दशरथ को पितृ-भवत (श्रवणकुमार) के वध का पाप लगा था । पृथ्वी के लोग 
कहेंगे कि पिता के समान पुत्र को भी पाप लगा । 

इस प्रकार चिंतित होते हुए वे अपने अग्रज के सम्मुख पहुँचे और थर-थर काँपते हुए 
ग़दुगद कठ से युवत हो उन्हें प्रणाम किया । राघव ने अपने अनुज को उठाकर गले 
से लगाया, (उनके) अश्रुओं को पोछा, और दयाद्रंचित्त से कहा--हे अनघ, मेरे रहते 
तुम वयो भयभीत हो रहे हो ? तुम धर्म के अनुसार आचरण करनेवाले हो, उदार हो 
निर्मल आत्मा हो, नीतिवान्‌ हो, महाराज दशरथ के मान्य पुत्र हो शिव के समान पराक्रमी 
तथा शूर हो | भाई, तुम्हारा मूँह ऐसा क्यो उत्तरा हुआ है ? स्पष्ट रूप से सारा हाल कह 
सुनाओ ।' 


तब जयशील लक्ष्मण ने कहा--हे भयत्राता, आपकी आज्ञा लेकर में वन से कद- 
मूल, फल लिये आ रहा था | तव एक क्र सडग॑ को आकाश से आता हुआ देखकर म॑ने 
उसे हाथ में ले लिया और एक वाँस की घनी भाडी पर उसे चलाया । उस भाडी में 
(तपस्या में लीन) एक श्रेष्ठ मुनि तुरत भूमि पर लोट गये। अपने अपराध के लिए 
चिंतित होते हुए, आपके सामने आने का साहस न रहते हुए भी मुझे आना ही पडा ।' 

यह सुनकर राघव अत्यधिक आइवचर्य में पडकर आगे के कत्तंव्य के सबध में सोचते 
हुए चुप हो रहे । उसी समय वहाँ के सब मुनि सारा वृत्तात (राम को) सुनाने का 
निशचय करके आये और रामचद्र को जाशीर्वाद देकर अत्यत कोमल स्वर में यो 
बोले-- 

हें अखिलेश, आपके अनुज ने अभी अखिललोक-शअत्रु रावण के भानजें, जबु नामक 
एक दुष्ट का सहार किया हैं । इसमें कोई दोष नहीं हैं । हें राजनू, उनके इस डंत्य से 
सभी मुतरि सतुप्ट हो गये हैं ॥' 


ऋएण्यकोॉड १2९ 


 कध्य 


तब राघव ने उन मुनियों से पूछा--'हे महात्मा, कृपया बतलाइए कि उसने किस 
देवता के प्रति इतना घोर तप किया और वह खड्ग कहाँ से आया ?' तब मृनियों ने 
राम से कहा--पूवंकाल में अपने बल-विक्रम से सभी दिश्ञाओ को जीतने के लिए जाते 
समय दशकठ ने किसी दूसरे पर विश्वास न करके, अपने बहनोई, पराक्रमी विद्युज्जिह्न 
को बुलाकर कहा था--सावधान होकर लका की रखवाली करते रहना । इस प्रकार 


उसे लका की रखवाली करने के लिए नियुक्त करके वह चला गया । 
“इसके पश्चात्‌ विद्युज्जिल्न ने मन-ही-मन सोचा--मे सभी मायाओ को जानकर 


दशकंठ को लकापुर में प्रवेश नहीं करने दूँगा और खुद लका को हस्तगत कर लूँंगा । यो 
सोचकर वह पाताल-लोक में चला गया और वहाँ प्रमुख राक्षसों के पास रहते हुए महान्‌ 
माया-युक्त मत्र-तत्र, ग्रहवाद, अखिलवाद, गारुड क्रियाएँ, विषयाद, रसवाद आदि विद्याएँ 
सीखी और वही रहते हुए तरह-तरह की मायाओ को मीखने में तत्पर रहा । इधर रावण 
सभी दिकृपालो को जीतकर लका लौट आया । विद्युज्जिक्न का सारा हाल जानकर वह 
अत्यत क्रुद्ध हुआ और आँखों से अग्निन्‍वर्पा करते हुए कहने लगा--मेरी आज्ञा का पालन 
किये विना ही यह (विद्युज्जिल्ल) मायाओ के जानने गया है । में भी देखंगा, उसकी 
समस्त मायाओ को आज में मटियामेंट कर देगा । यो कहते हुए वह पाताल-लोक में 
गया तो अस्मय' नगरवार्सी सभी राक्षस भयाकुल हो गये । रावण ने अत्यधिक क्रोध से 
अपनी तलवार को म्यान से निकालकर, इसका विचार भी नहीं करके कि यह मेरा बहनोई है, 
मेरी बहन का पति है, विद्युज्जिद्ना का पीछा करके उसका वध कर डाला । 


“इसके बाद वह लका लौट आया और अपनी बहन शूर्पणखा को बुलवाकर उसे 
सात्वना दी और कहा--वतुम अपनी स्वेच्छा से विचरण करती हुई, अपनी इच्छा के अनु- 
कूल किसी भी पति का वरण करके निर्भय ससार में रहो ।! उस समय शर्पणसा को 
छह मास का गर्भ था । यथासमय उसने जबुकुमार नामक एक भयकर तथा बलशाली 
पुत्र को जन्म दिया । वह जब बडा हुआ, तब उसने अपनी माता से अपने पिता की मृत्यु 
का समाचार जान लिया और अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का निश्चय किया । 
उसने सोचा--यदि में ब्रह्मा की तपस्या करूँ, तो वे मेरी इच्छा पूरी नहीं करेंगे, शिव की 
तपस्या करूँ, तो रावण शिवभकक्‍त होने के कारण वे उस पर क्रोध नही करेंगे, यदि विष्णु 
की तपस्या करूँ, तो न जाने कब बे प्रसन्न होगे और कब में प्रतिशोध ले सकूंगा । कहते है 
कि हूरि, हर तथा ब्रह्मा ये तीनो सूर्य के रूप में रहते है। इसलिए मे सूर्य के प्रति 
तपस्या करके उनकी कृपा प्राप्त करूँगा तथा दनूजो के नेता दशकठ का वध करूँगा । 
यो सोचकर वह सूर्य की तपस्या करने लगा । 
ु “सूर्य ने उसकी तपस्या से सतुष्ठ होकर प्रतिशोध लेने के लिए उस राक्षस के पास 
एक खड़्ग भेजा । कि्तु गर्वान्‍्ध होकर उसने वह खड़्ग नहीं लिया | इस तरह वह खड्ग 
आपके अनुज को मिल गया । ऐसा न होकर यदि वह राक्षस के हाथ में पड जाता, त्तो 
वह सभी , लोगो को त्रास देता । दैवयोग से वह राक्षस नष्ट हुआ । हे सूर्यवश-तिलक, 
अव्‌ इसके बारे में चिंता क़ैयो करते है. ? युद्ध में कात्तंवीयं ने रावण को जीता था । 


९३६ रंयनाथ रामायण 


भारगव ने उसे मार डाला । ऐसे भार्गव राम को आपने युद्ध में हराकर उनका मद चूर्ण 
किया । ऐसे (अक्ति-सपन्न) आपके द्वारा राक्षस युद्ध में अवश्य ही मारे जायेंगे ।” इन 
बातो को सुनकर रघुराम आइचर्य-चकित हुए और विनम्र होकर मुनियों को प्रणाम करके 


उन्हें विदा किया । न 
११. शूर्पणख्रा का वृत्तांत 

गर्पणखा प्रतिदिन के जैसे बढ़िया भोजन, विविध मिप्टान्न आदि से भरा हुआ टोकरा 
लिये हुए आई और कटी हुई वास की काडी के वीच खड-खड होकर गिरे अपने पुत्र को 
देखकर मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पद्दी । समलने के बाद वह उन खडो को एकत्र 
करके बडी देर तक विलाप करती रही । उसके पह्चात्‌ वह कहने लगी--हे कुमार, 
तुम्हारे लिए क्या यह उचित है कि तुम अपनी आाँखें खोलकर मेरी मोर न देखो और 
मुझे ने अपनाओ । रावण तुम्हारे मामा है, इसका भी विचार किये विना तुम उस प्रतापी 
(रावण) का वध करना चाहते थे, किन्तु वह तुम से नहीं हो सका । क्‍या तुम ऐसा 
कर सकोये ? क्‍या वे (रावण) कात्तंवीयय॑ से पराजित हुए थे ? क्‍या अनरण्य की शापाग्नि 
से वे नप्ट हुए ? क्‍या ब्रह्मा के पनृष की अग्ति से उनका अत हुआ ? क्या नलकूवर से 
वे पराजित हुए ? क्‍या वे शिव के वाहन नदीब्वर के क्रोध का शिकार बने ? क्‍या 
शाण्डिल्य मुनि का क्रोध उनका नाश कर सका ? इतना क्यो, क्‍या कुबेर लका में रह 
सका ? तुमने वात पर ध्यान नहीं दिया कि बलवान्‌ से विरोध करना उचित नहीं । 
उनकी मृत्यु अब नहीं होने की । कया पापी चिरायु की लोकोक्ति झूठी होगी ? (अर्थात्‌ 
पापी चिरायू होता है, यह लोकोक्ति प्रचलित है) ? मेने तुम्हें कितना समझाया कि (उन 
से) वैर मत ठानो, किन्तु तुमने मेरी वातों की परवाह न की, और इस प्रकार नप्ट 
हो गये। भला, रावण तुम्हारे हाथ क्योकर मरने लगे ? कहते हे कि माता का वचन 
घर्म-देवता का वचन होता हैं । हे निर्मलात्मा, तुमनें उसकी (माता के वचन की) परवाह 
न की । ग्रधवं, सुर, सिद्ध आदि (रावण के) कारागार में रहते-रहते अंधे हो गये हे । 
क्या कही राक्षसों को जीता जा सकता है ? हे विद्युज्जिक्न के कुल-दीपक, हे महातपस्वी, 
है पुण्यवानू, तप के सिद्ध होते समय तुम्हारी वुद्धि अ्रप्ट हो गई थी । अब भगवान्‌ की 
निंदा क्यो करें ? मे तो पतिहीना पापिनी हूँ । यदि सुत का मुँह देखती रहती, तो शोक 
कुछ कम हो जाता | स्त्रियों के लिए कुल का उद्धार करनेंवाली सतान बहुत हरी 
आवश्यक हैं ।” 


इस प्रकार विलाप करती हुई उसने अपने पुत्र के शरीर का अग्निन्‍सस्कार किया | 
उसके पश्चात्‌ थोडी दूर पर तप करतें रहनेवाले महात्माओ के पास जाकर वोली--हे नीच 
तपस्वियों, तुम शिर पर जटाएँ घारण किये, शरीर पर विभूति मले हुए, जनेऊ धारण 
करके, आँखें बद किये, घोर निष्ठा-युक्त तपस्या का वहाना करते हो । सबलोग मिलकर 
वकरों का सिर काठते हो, उन्हें मच्छी तरह पकाकर पेट भर खा लेते हो और उनकी 
सूखी खालो को पहनकर कपट-वेष धारण किये निरपराधों की तरह रहते हो । हे गर्व 
से अघें, तुमलोगों ने पाप-वुद्धि से प्रेरित होकर मेरे पुत्र को किस प्रकार और क्यो मारा ? 


अरण्यकांड '१३७ 


थंदि यह नहीं बताओगे, तो में तुम्हें अवश्य निगल जाऊँगी और अपना क्रोध शान्त करूंगी । 
आज मे तुम्हें छोडनेवाली नहीं हूँ । 
इस प्रकार गरजती हुई वह उन मुनियो के निकट पहुँची । मुनि भयभीत होकर 
उससे बोलें--हे शूपंगखा, सुनो । मुनि-वेष धारण किये हुए एक मानव, तुम्हारे पुत्र का 
वध करके, फल आदि इकट्ठा करके, उस पर्णशाला में जाकर अविचलित मन से रहता हूँ । 
वहाँ जाओ, तो तुम्हें सभी बातों का पता चल जायगा । 
तब वह दुर्मति राक्षसी क्रोध से लक्ष्मण को चरण-चिह्न का अनुसरण करती हुई 
(राम की पर्णशला की ओर) चली । इधर मुनि लोग हर्पित होने लगे कि यह बाघ 
को छेडेगी और अवश्य ही रघुवशी इसे उचित दंड देकर भेजेंगे । सभी देत्यो के नाश 
का यह मूल कारण बनेगी न्‍ 
तब राक्षस राजा की बहन क्रूपंगएखा ने समय का विचार करके ऊँची नाक, उम्र 
भाव, बडी-बडी आँखें, दाढों से युक्त जबडे, विशाल उदर, बिखरे कंश, खुला हुआ मुंह, 
काला शरीर, लबवी जीम, विद्ञाल काया और क्र दृष्टि आदि घारण क्ये और स्टत्री- 
रूप में राम के निकट इस प्रकार पहुँची, मानो वह अत्यत भयकर गति से आनेवाला विष हो 
या समस्त लोको को निगलने के निमित्त आनेवाला भूत हो, या देत्य-वश के नाश का 
समय आसन्न जानकर पृथ्वी पर उतर आई हुई मृत्यु ही हो । 
उसने जब इदीवरदयाम, सूर्य-प्रभा-सम तेजस्वी, सौदय्य में काम को भी लजानेवाले, 
जगदभिराम, दैत्यो का नाश करनेवाले, राम को देखा, तो तुरत वह काम-पीडित हो गई । 
वह अपने-आपको भूल गई और तमोगुण से प्रेरित होकर अपने को समस्त लोक की सुदरी 
मानने लगी । उस राक्षसी ने अपने चौडे सुख से उनके (राम के) मनोज्ञ मुख की, 
अपने विशाल उदर से उनके क्षीणः उदर की, और अपनी तिरछी आँखो से उनके 
विशाल नेत्रो की तुलना करके अपने में और रामचन्द्र में बिलकुल समानता देखने लगी । 
तब उसने निव्चय कर लिया कि यही मेरे लिए उचित पति है । तदुपरान्त उसने सूप- 
जैसे अपने मुख पर हेंसी प्रकट करते हुए कहा--घनुष-वाण धारण किये, पत्नी के साथ 
तुम इन अगम्य वनों में क्यों भ्रमण कर रहे हो ? इस वेश में तुम क्यो रहते हो ? तुम 
कौन हो और तुम्हारा नाम क्‍या है ? 
इत वचनों को सुनकर राम ने मद-मद हँसकर उस राक्षस-रमणी से कहा-- 
मनोहर सुदरी, मेरा नाम राम है । मेरे पिता महाराज दह्वर्थ है ।इस पर्णकुटी में रहने- 
वाला मेरा अनुज है । यह पदमाक्षी मेरी पत्नी सीता हूँ । पिता की आज्ञा से में इस 
चन में तपस्वियो की तरह रहता हूँ । हे युवती, तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्‍या है ? 
आज हमारे यहाँ तुम क्यो आई हो ? तुम्हारे हाव-भाव, तुम्हारा यौवन-रूप तथा तुम्हारी 
सुदरता, क्या अन्य किसी रमणी में हूँ ?! 
इन बातो को सुनकर शूर्पणखा ने राम को संबोधित करके कहा--में विश्ववसु के 
पुत्र, समस्त ससार का छात्र, विक्रम-यशोधन, अमित शक्तिशाली रावण की बहन हूँ । 
मेरा नाम शूर्पणखा है । मेन तुम्हारे रूप की अंपने रूप के साथ तुलना की हैं और मुझे 
(ध 


झट रंग्नाएथ राये|य् 


विश्वास हो गया है कि मेरा और तुम्हारा प्रेम उचित होगा । इसलिए में तुम परे 
आसक्त हूँ । म॑ अपनी इच्छा से कोई भी रूप घारण कर सकती हूँ, कही भी जाने की 
क्षमता रखती हूँ, किसी भी वस्तु को प्राप्त कर सकती हूँ, कोई भी सुख पहुँचा सकती हूँ । 
अब तुम्हारे साथ जो (स्त्री) है, वह किस काम की हैं ? मेरा सौदर्य देखो और मेरा 
पाणि-प्रहण करो । यह (सीता) कुल तथा गुण से हीन है, विक्ृृतरूपिणी है, यह तुम्हारे 
लिए कहाँ योग्य है ” हे राम, में अभी इसे निगल जाऊँगी भौर तुम्हारी इच्छा के अनुसार 
तुम्हारे साथ रति-क्रीडा में प्रवृत्त हो जाऊंगी ।' 

इस प्रकार कहते हुए जब वह राम के पास आने लगी, तब राम ने सीता को 
अपने निकट बुला लिया । तरुणी की इच्छा को सुनकर, उसका परिहास करने के उद्देश्य 
से उसको रूप को देखकर हँसते हुए बोले--हें सुदरी, से पत्नी के साथ रहता हूँ । यह 
मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में आई है, इसलिए इसे तुमको सौपना उचित नहीं हैं । 
इतना ही नहीं, तुम सोत के साथ सुख से कंसे रह सकोगी ? अगर यह नही होती, तो 
में पहले ही तुम्हें ग्रहण करता । अब भी कुछ बिगडा नही हैँ । वह देखो, मेरा भाई है, 
श्रेष्ठ तपोधन हैँ, वह मुझसे भी अधिक सुदर है । वह सदा अपने लिए अनुकूल, 
चचल तथा विज्ाल नेत्रवाली स्त्री की अभिलाषा करता रहता है । इसलिए वही तुर्म्दे 
ग्रहण करने में समर्थ है 

इस पर शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई और कहने लगी--हे लक्ष्मण, में तुम पर 
आसकक्‍त होकर तुम्हारे साथ विवाह करने के लिए आई हूँ । मुझे तुम ग्रहण करो ।' 
लक्ष्मण समझ गये कि राम के भेजने पर यह मेरें पास आई है । इसलिए वे बोले-- 
हे सुदरी, पहले तुमने अपने मन से मेरे भाई से प्रेम किया था । अत, तुम्हें ग्रहण करना 
मेरे लिए उचित नही है | सौदय॑ में सीता तुम्हारी समता नहीं कर सकती । तुम्हारा प्रेम 
ओर तुम्हारे हाव-भाव आदि यदि एक बार और राघव देखेंगे, तो वें सीता को छोडकर 
तुम्हें अरहण करेंगे । हे रमणी, इसलिए तुम राम से ही प्रार्थना करो ॥' 

सौमित्र की बातों पर विश्वास करके वह तमोगुण-सपन्न स्त्री, अपने भद्देषन 
का विचार न करके पुन राम के पास गई और रति-न्रीड़ा के लिए प्रार्थना करनें लगी । 
तब राम ने कहा--हे सुंदरी, तुम उसी (लक्ष्मण) के पास जाओ ।” तब युवती पुन 
लक्ष्मण के पास जाकर प्रार्थना करने लगी । इस प्रकार अनुज अग्नमज को, अग्रज अनुज को 
दिखाने लगे । वह युवती विक्रल मन के साथ बडी अनुचित आशा लिये मन्मथ के सूत्र 
के द्वारा नचाई जान वाली कठपुतली की तरह, यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ, आने-जाने लगी । 
अत में वह उन दोनो की रसहीन वातो से तग आकर क्रुद्ध होकर बोली-- 
हैं मानव, एक अकिंचन स्त्री को समान मुझे तग करना कया तुम्हारे लिए उचित हैं ? 
अगर में क्रोध करूँ, तो मानवों की कौन कहें, इद्रादि देवताओं को भी खा जाऊँगी । अब 

इस स्त्री के साथ समस्त ससार को पीसकर खा जाऊंगी ॥ यो कहती हुई उसने वडा 

भयकर रूप धारण कर लिया भऔर मृत्यु के समान' अट्टहास करती हुई वह (सीता के) 
निकट जाने लगी । तव राघव वोले--हैं सौमित्र, यह जानकी के ऊपर आक्रमण करने 


ऊरणयकोड १३९ 


आ रही है । अब इससे परिहास छोडकर, इसे दण्ड दो । तब लक्ष्मण ने वाँवी से 
निकलने वाले विष-ज्वालाओ से युवत साँप-सा अपना खड्ग म्यान से निकाला और उस 
राक्षती की नाक और कान काट लिये । तब वह रोती-कलपती, विवश्ञ हो, दूटे हुए श्गवाले 
लाल पर्वत के सदृश (ताक-कान से) रक्त वहाती हुई, वहाँ से भाग गई । वहाँ 
से भागकर वह चतुर्देश सहस्न श्रेष्ठ निशाचरों के निलय, खर के निवास-स्थान में पहुँची । 


१२ खर-दृषण का वध 
खर ने जब उस (शूपंणखा)का रूप देखा, तव वह डर गया और पूछा--किसने 
निर्भध होकर तुम्हारा रूप ऐसा विक्रत कर दिया है ? काले नाग को जानकर भी किसने 
उसे पर से कुचला हूँ ? किसने मृत्यु को इस प्रकार छेडा है ? मुझे उसका नाम बताबो । 
में शीघ्र उसका रक्त और मास तुम्हें ला दूंगा । इस प्रकार प्रइनो की वर्षा करनेवाले 
खर को देखकर वह स्त्री भर्राई हुई विकृत आवाज में रोती हुई, अत्यधिक लज्जा से सर 
भुकाये हुए, इस प्रकार कहने लगी--वन में जहाँ में रहती हूँ, मेरा पुत्र सूये के प्रति 
अत्यत निष्ठा से तप कर रहा था । तब मुनि-त्रेशधारी अत्यत साहसी, मोहनाकार राम- 
लक्ष्मण नाम के राजकुमारों ने विना भय के उसका वध कर डाला । मंने अपने पुत्र की 
अत्येष्टि-क्रियाएँ की और वन में रहनेवाले उन सुन्दर आकारवाले राजकुमारों के पास 
गई और उनपर मोहित हो गई | उन्होने अपनी अमित शक्ति के प्रताप से मेरी ऐसी 
दुगंति कर दी है । में दुखी होती हुई तुम्हारे पास आई हूँ । तुम तुरत उनके पास जाओो 
ओर अपनी पूरी शक्ति लगाकर उनका वध करके उनका मास ला दो । इस तरह मेरे 
हृदय को शात्ति पहुँचाओ ।' 
इन बातो को सुनकर ख़र ने कहा--इस छोटी-सी बात के लिए मेरें आने की 
आवश्यकता ही क्‍या हैँ ? उनकी शक्ति ही कितनी है ? में अपने अनूचरो को (तुम्हारे 
साथ) भेजूगा । उन्हें ले जाओ । इस प्रकार कहकर उसने यम के-से उम्र तेजवाले (भटो) 
को बुलाकर कहा--तुम इस शूपंणखा के साथ जाओ भौर उन मानवों फा वध करके 
मेरी बहन शूपंणएखा को उनका रक्‍त पिला दो ।' 
वे राक्षस वायू के साथ आनेवाले दुर्वार मेघो के समान, विजलियो के-से शूल 
घुमाते हुए राम और लक्ष्मण-रूपी सूर्य-चद्रो पर आक्रमण करने लगे, और घोर गर्जन करने लगे । 
तब राम ने अपने दीप्तिमान्‌ घनृष तथा अन्य आयुधों से युक्त हो उनका सामना 
किया । उन्होने राक्षसों से फेंकी हुई बिजली तथा शूलो को अपने शास्त्रों से काटकर पृथ्वी 
पर गिरा दिया । उसके पश्चात्‌ (राम ने) भयकर वज़-से वाणों से उनके कठो को काट 
डाला वौर तब उनके सिर पक हुए फलो के समान गिर पडे और वे अनुपम वाणों के 
आधात से सीधी शिलाओ के समान पृथ्वी पर लुढ़क पडे । 
तब शूर्पणखा अत्यत वेग से भागकर सभी लोकों को भयभीत करनेवाले खर से 
उन राक्षसों की मृत्यु का तथा रघुराम की महिमा-समन्वित युद्ध का समाचार कहा । 
आहुति के पडने से उत्तेजित होकर भभक उठनेवाली अग्नि के समान क्रुद्ध होकर खर 
अत्यधिक आवेश से भरे दूषण, त्रिशिर आदि चौदह सहस्न वबलशालो राक्षस वीरो को साथ 


९8० रंगनाथ राथायर 


लेकर चला । यह देखकर देवताओ के साथ सारा स्वर्ग कौप गया और सभी पहाड़ो से 
युक्त पृथ्वी हिल उठी । खर नें रण-भेरी वजाई भर सुमेरु-पवंत की आमा के समान 
दीखनेवाले चितकवरें रग के अच्चो से युक्त, मणिमय कूवर तथा दस स्वर्णमय चक्रो से 
समन्वित, रण में विजय प्रदान करनेवाले, घनुष-वाण गौर खड़गों से भरे, किकिपि-ध्वनि से 
मृखरित होनेवाले रथ पर चढ़कर वह "ण-विद्या-विद्ञारद राम पर आक्रमण के लिए निकल पड़ा । 
(उसके पीछेयीछे) बाज के पंखो के समान बाणवाला, बिजली की समता रखनेवाला, 
व्रिशिर (नामक राक्षस) सभी दिशाओो की काति को मलिन करता हुआ, सूर्य की 
काति के समान उज्ज्वल, श्रेष्ठ गधों के समूह से खीचे जानेवाले स्वर्ण से आच्छादित रथ 
पर बैठकर बड़े गवे के साथ उस महायुद्ध के लिए रवाना हुआ । उसके आगे-आगे मयूर 
की छठा को मात करनेवाले, पवन की गति का भी तिरस्कार करनेवाले, काति-युक्त शीघ्र- 
गामी अश्व-समूह के द्वारा खीचे जानेवाले उत्तम रथ पर ब्रेठकर, अत्यधिक उत्साह से बड़ें 
ठाट-वाट के साथ (खर) जा रहा था | पृयुग्रीव, इयेनगामी, विहगमुख, मेघमाली, महामाली 
अलयकाल की कालाग्नि की समता करनेवाला सर्पेमृखी, कालकार्मुक, दुर्जय, यज्ञ-दत्रु, परुष, 
करुणा-रहित, करवीरनेत्र और रुघिराशन नामक वारह प्रतापी राक्षस वीर, बारह आदित्यो 
के समान, बड़ी श्रद्धा से खर के पीछे जा रहें थे। त्रिशिर, प्रमाथी, रणकुशल, महाकपाल 
बौर स्वूलाक्ष, (भांदि राक्षस) उस रण-मदमत्त सेना के साथ चारो ओर सावधाव होकर 
चहेयथे। 


ना (इस प्रकार जब राक्षस-सेना निकली), तव भयकर गज-समूहो के चिंघाड़ने, घोड़ो 
के हिनहिनाने, रथो के चलने तथा पदचरो के हुँकारने की ध्वनि तथा पताकाओ के फड़फड़ाने 
की ध्वनि से पृथ्वी बेस गई, दिद्याएँ चूर-चूर हो गई, समुद्र उमडने लगे और सभी भूत 
धर-यर काँपने लगे । सेवा के चलने से जो घूल उडी, उसने आकाश को ऐसा ढक दिया 
कि सदेह होने लगा कि रवि-मंडल हैं या नहीं | इसी समय खर की पताका पर चील 
वंठने लगे । घोड़े घुटने टेकने लगे, रक्त की वर्षा होने लगी, सियार रोते हुए सेना के 
बीच से दौड़ने लगे, नक्षत्र टूटने लगे, पक्षियों की ध्वनि चारों ओर सुनाई पड़ने लगी: । 
इसी प्रकार के कितने हो उत्पात पृथ्वी और आकाश में होने लगे । फिर भी खर विना 
भयभीत हुए आगे बढ़ता गया और दण्डक-वन में पहुँच गया । अनू पम आकारवाले राम उस 
कोलाहल को सूनकर पर्णशाला के वाहर आकर खड़े हुए और पृथ्वी तथा आकाश में दीखने- 
वाले अपछणकुन को देखकर, शीघ्र अपने अनुज को वुलाया गौर कहा--सौमित्र, युद्ध-सूचक 
चिंह्ृन कितने ही दिखाई पड रहे हे । कदाचित्‌ वह निद्य बौर नकटी राक्षसी अपने सार्थ और 
सेना ला रही है । वह सूनो, सेना का रणघोष सुनाई पड रहा है । वहाँ देखो, सेनाओं 
के चलने से घूल भासमान में छा रही हैं | जानकी का अब यहाँ रहना ठीक नहीं । 
इसलिए सावघान होकर तुम शीघ्र ही उसे अपने साथ ले जाकर पर्वत की गुफा में ठहरो । 
तब लक्ष्मण ने कहा-हें सूयंवन्न-तिलक, आपको यहाँ छोड़कर में कैसे जा सकता हूँ ” 
आप ही सींताजी के साथ पर्वत की युफा में जाकर देखते रहिए । मे आपकी कृपा 


चर 


भइन दुर्वार राक्षत्रों का वध करूँगा । ये वातें सुतकर रामने कहा-- इनसे युद्ध करना 


- अरयकाड ९9! 


मेरें लिए कौतुक का विषय होगा । इसलिए तुम यहाँ मत रहो । जानकी को स्लाथ लेकर 
जाओ ।' (इन बातो को सुतकर) लक्ष्मण सीता को साथ लेकर परवव॑त-गृफा में चले गये । 


तब राम प्रलयकाल के रुद्र के समान कुद्ध होकर अपना प्रताप प्रकट करते हुएं, 
कृपाण, कवच, धनृष-बाण धारणकर, श्रेष्ठ तूणीर-युगल (पीठ पर) बाँधकर और पर्वत 
को भी धनुष के आकार में भुकानेवालें शिव की तरह, अपने धनुष पर प्रत्यचा चढाकर, 
उस प्रत्यचा की टकार करने लगे । उस धनुष की टकार की भ्वरनि सारे «काश में गजने 
लगी । इन्द्र, दिकुपाल और अन्य देवता अपने रत्न-खचित विमानों पर आसीन हो यह 
देखने की उत्सुकता प्रकट करने लगे कि राम अकेले खर तथा दूषण आदि अत्यन्त प ।क्रमी 
चौदह सहस्र राक्षतों का वध कैसे करते हे ? सभी देवर्षि स्वर्ग से कई गर आशीर्वाद 
देने लगे कि महात्मा राम इन म्गयावी राक्षमों का वध करने में सकल हो । राम का तेज 
सभी वन, वृक्ष, पृथ्वी तथा शाकाश में ऐसा व्याप्त हुआ, मानो दस सहल्ल कोटि सूर्यों का 
तेज समस्त लोको में व्याप्त हो गया हो । 

इस प्रखर तेज के कारण जडवत्‌ हो, »भी उत्साह को खोकर, आँखें चौधिया जाने 
के कारण अत्यत दीन दीखनेवाले दान्नस-स्मृह को देखकर, खर ने दृूषण से रहा-- (हे 
भाई), क्‍या कारण हैँ कि हमारी सेना की गति मंद पड गई हैं । क्‍या शब्ु-सेना ने 
उसका सामना किया है ? या कोई नदी बीच में पड़ गई हूँ ?” 


तब पूषण ने सारा समाचार जानकर कहा--हें दनुजेश्वर, राम का उदृण्ड तेज 
सारे संसार में व्याप्त हो गया हैँ | इसलिए हमारी सेना की गति मद पड गई है ।॥ 


यह वात सुनकर खर अ्षत्यत कुद्ध हुआ और सेना को डॉट-फटकार बताते हुए, 
भयकर रीति से सारी सेना का सचालन करते हुए वह आगे बढा । अत्यधिक भुजबल, 
जआाटोप तथा पराक्रम से समन्वित उस राक्षस-सेना ने गज, रथ, तुरग आदि से युक्‍त हो, 
अत्यत वेग से काकुत्स्थ-वशज राम को इस तरह घेर लिया, जैसे अग्नि-समूह एक साथ 
प्रचड दावानल पर आक्रमण कर दे । (इस प्रकार राम को चारो ओर से घेरकर) वे 
उन पर, शर, खड्ग, जिशूल, करवाल, भालें, मुद्गर, परशु, गेंडासा, गदा, पाश, चक्र आदि 
विविध आयुधो की वर्षा करने लगे । देवता भयभीत हो उठे । मेघो से आच्छादित भास्कर 
के समान थोडी देर के लिए राम दिखाई भी नही पडे । किन्तु तुरन्त उन्होने ऐन्द्रजालिक 
की तरह राक्षसों के द्वारा चलाये गये सभी विविध हस्त्रास्त्रो को नष्ट क्र दिया । इससे 
हषिंत होकर सभी देवता उनकी प्रशता करने लगे । »निरल गति से शरक्षसो के द्वारा 
बरसाये जानेवाले शस्त्रास्त्रो को बीच में ही नष्ट करते हुए (राम ने) परिवेश (मडल) 
से घिरें हुए मध्या ह्ृन-सूर्य कं समान अपने चारो ओर अपने प्रखर तज वा घेरा बनाये हुए, 
कोदड को कुडलाकार में भुकाकर, युद्ध के उत्साह से फडकनेवाली भुजाभो से युवत हो, 
अपने तूणीर के अनगिनत दाणों का एक साथ सधान करके, अपने आगगे-पीछे तथा 
दोनो पाव॑-भागो में व्याप्त राशस-सेना पर उनका प्रयोग किया । उनके इस द्ार-प्रयोग से 
मत्त द्ाथी भौर योद्धा वट मरे, अइबव और घुडसवारों के टुकड़े-टुकडें हो गये, पदचर 
सैनिक और उत्तके आयुध नप्ट-अप्ट हो गये । शिर और छर उनके सामने कंट-कटकर 


तप 


श््ट्र रंगनाथ रायायर 


गिरने लगे, योद्धाओं के अभग बौर रथो के भाग पृथ्वी पर गिरने लगे, गुण-सहिति धनुष 
तथा कवच चूर-चूर हो गये, रवी और सूत पृथ्वी पर लोटने लगे, दवेत छत्र और पताकाएँ 
टूठने लगी, और मांस-खड छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । इस प्रकार युद्ध ने भयकर रूप 
घारण किया । 
सूर्य के प्रकाञ् से जिस प्रकार अंवकार तितर-वितर हो जाता हूँ, वैसे ही राम के 
समान पराक्रम से नप्ठ होते के वाद दची हुई राकस-सेना दर्य श्वोकर खर की - शरण 
में पहुँची । खर ने उनको प्रोत्साहित क्रिया और दूषण को युद्ध करने के लिए मेंजा । 
बची हुई सेना के साथ वह अपनी छकक्‍्ति दरसातें हुए, शीघ्र ही राम क निकट आ पहुँचा 
ओर उनपर ताल, साल (आदि वृक्ष), गिलाएँ तथा विविध अस्त्रो की वर्षा करने लया । 
(इत अस्जो के लगने से) राम के शरीर से रकत-प्रवाह होने लगा । तव क्रोध से आँखे 
लाल किये हुए राम ने उन राक्षसों पर गांवर्व-अस्त्र चलाया । उन 5ःक्ति-संपन्न अस्त्र के 
तेज के आगे गज, रव, तुरग, पदाति राक्षस-सेना टिक न सकी । वह अस्त्र अपने भयकर 
तेज से दनुज-वर्ग को नष्ट-अ्रप्ट करके, उनका संहार करने लगा । रण-भूमि में जहाँ देखो, 
अब्व तथा गज के घड़, मुदद, जाँत, भेजा तवा जदत्र वा प्रवाह दिखाई पड़ने लगा । 
शाह्रिनी, भूत, पिचाऊ, वैत्ाल वाद्ि क्ुडनके-कुद वहाँ पहुंचकर कहने लगे--यहं लो, राम 
के युद्ध-छपी घर्मझाला म हाथियों के गिर-रूपी घट में मोती-रृपी चावल का भात पकाया 
गया हैं । चलो हम सब खायें ॥' 
वें सब भूत-प्रेत वत्यंत हवप॑ से पक्तियों में बैठ गये; रक्त-चंदन, नवरकत-अक्षत 
रक्‍त-सकल्पपूर्वकत घारण किया; चमड़ा-रूपी केले के पत्ते विछाये, खोपडी-रूपी दोने 
सजाये, श्र. की अग्नि में पकाये गये मांस को जात, मस्तिप्क को दाल, चर्बी को घुत, 
विभिन्न अग्रो के मांस को जाक, छोटी बाँतो को पायस, हृदय-पिंड को मिठाई, नये रक्त 
को मीठा जल मानते हुए, उसे सब प्रकार से विप्रोचित भोजन समककर छककर खाया | 
भोजनोपरांत सव एकत्रित हुए कुछ ने आश्ञीर्वाद दिये कि---श्रीरामचन्द्र ! ते विजयोश्त्तु। 
-तो कुछ ने पीछे से कहा--तिवास्तु । कुछ भूतो ने हाथियों के दाँत छडी की तरह हाथ 
में धारण कर लिया, तो कुछ ने अस्थियो की मालाएँ कठाभरणो के रूप में घारण कर ली 
ओर हाथियों की घटिकाओो का ताल देते हुए -वड़े जानंद से अपना निदनीय रूप श्रकट 
करना शुरू किया । 
तव मदमत्त वैरियों के लिए भयकर झरूपवाला दूषण अत्यत दु.खी होकर अपने 
समान वलश्ाली पाँच सहख्र योद्धाओं को राम पर आक्रमण करने के लिए भेजा । उन्होने 
तीनों लोकों को केपाते हुए, राम पर बाक्रमण किया, तो राम ने अपनी घनुर्विद्या की 
कुशलता प्रदर्शित करते हुए, अत्यते छुद्ध दृष्टि धारण किये हुए एक-एक राक्षस पर एक-एक 
बाण का प्रयोग कर उन सव का व कर दिया । कुछ लोगो को एक साथ इकट्ठा करक 
भी उनका सहार किया । यह देखकर दूपण अत्यंत कोब से रान को कदु वचन कहते हुए, 
अपना रथ राम के सम्मुख लें गया और उनपर वज्ञ तबा काल-नाग की समता करनेवाले 
दाणो की वर्षा करने लगा । राम ने उन वायो को बीच ही में तोड़ दिया, उसके 


ऋ्/एएए्कांड 88३ 
धनुष के टुकडे-टुकड़ें कर दिये । रथ से विहीन होन से टूपण क्रोधोन्मत्त होकर भयकर, 
प्राणातक, विजयशील यम की गदा की समता रखनेवाले मुदूगर को घुमाते हुए राम 
पर दौडा । तब राम ने दो तेज वाणों को चलाकर उसके दोनों हाथ काट डाले और एक 
घातक तीर उसके हृदय में मारा । तब वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसे गिर पडा, जैसे मत्तगज 
दाँतो के टूटने से ढेर होकर पृथ्वी पर गिरता है । उसको गिरा देखकर प्रमाथी, महा- 
कपाल तथा स्थूलाक्ष नामक तीन दण्ड-नायकों ने परशु, कृपाण तथा भाला उनपर चलाये, 
तो राम ने उनके अस्त्रों तथा उनके मस्तको को एक-एक करके गिरा दिया । 

तब खर ने अपने बारह सेनापतियों को उत्तेजित किया । उन वारहो सेनापतियो ने 
अपने दुर्वार शौर्य से वीर राघव पर आक्रमण किया और अलग-अलग उनसे युद्ध करने 
लगे । तब राम ने वज्ञ की धार के समान पैने तथा भयकर बाणों के प्रयोग से अपनी 
शक्ति दरसातें हुए इयेनगामी का अत कर डाला, कालकार्मुक का वध किया, करवीरनेत्र 
को गिरा दिया, सर्पास्थ का गर्व-भग किया, विहगम का सहार. किया, यज्ञज्षात्रव की 
शक्ति को नष्ट करके उसे दण्ड दिया, डुर्जय तथा महामालों का वध किया, मेघसाली 
का सहार किया, रुघिराशन का अत किया और खर तथा त्रिशिर को छोड़कर अन्य सभी 
राक्षो का सहार कर डाला । 

इस प्रकार पवन के चलने से गिरनेवाले पर्क पत्तों के समान सारी सेना नष्ट 
हुई देखकर त्रिशिर ने अत्यत क्रोध से राम के निकट अपना रथ चलाया और सिंह-गर्जन 
करते हुए, राम पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे मत्त हाथी सिंह पर आक्रमण करता हैँ । 
धनूष की ठकार करते हुए उसने एक साथ असख्य बाण राम पर चलाये । राम ने बडे 
क्रोध से प्रतिरोधक बाण चलाकर उसके बाणो को बीच में ही नष्ट कर दिया । तब उसने 
अपने नाम के प्रताप के अनुरूप राम के ललाट पर तीन वाण छोडे | जब वे तेज बाण 
राम के ललाट पर लगे, राम हँसने लगे और त्रिशिर के वे तीनो बाण कुसुमो की दशा 
को प्राप्त हो गये । तब राघव बोले--अब में ऐसे चौदह दारुण बाण तुम पर छोड“गा, 
जो चतुर्देश भुवनों में प्रवेश करने पर भी तुम्हें पकड़कर तुम्हारा वध कर देंगे। अब 
तुम उनका सामत्ता करो । इस प्रकार कहते हुए राम ने चौदह वाण छोडे-। वे वाण उस 
राक्षस के हृदय को पार करके पृथ्वी में जा गडे । तव राघव ने चार और वाणो का 
प्रयोग करके उसके रथ को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और तत्क्षण ही दस अस्त्र उस राक्षस के 
उर पर चलाये । उस सुरवैरी (त्रिशिर) ने क्रोधोन्मत्त हो राम पर शूल चलाया, किन्तु 
राम ने चार वाणो से शूल को काट दिया । इसके पदचात्‌ उन्होनें तीन भस्त्र चलाकर 
उस राक्षस के तीनो सिर काट डाले | त्रिशिर पृथ्वी पर ऐसे गिरा, जैसे कोई वृक्ष तीन 
शाखाओ के साथ समूल कटकर, शोभा-रहित हो, पृथ्वी पर गिर पडता हैं । 


त्रिशिर को गिरते हुए देखकर, खर राम के प्रताप का विचार करके विस्मित 
हो गया । वह तुरुत अत्यधिक क्रोध से अपना रथ राम के सामने ले गया और राम पर 
भयकर वाण-वर्षा करने लगा । राम भी अस्त्र चलाने में अपना कौशल दिखाते हुए खर 
पर प्रतिचाण चलाने लगे । खर के तथा राघव के वाणो से पृथ्वी तथा आकाण भर गये। 


ऑल बा 


१88 रंगनाथ रामायर 


सूर्य क्री दीप्ति मदनसी हो गई और दिल्ाओ में अधकार व्याप्त हो गया । न खर 
राघव से भीत था, न राघव ही खर से भीत थे । दोनो विजय की आगकाक्षा से 
दो हाथियों के समान, दो सिंहो के समान और महिष-द्य के समान आपस में जूक गये गौर 
अपने वाहुबल को प्रदर्शित करने लगे | तब खर ने एक बद्धंचद्राकार बाण से राम के 
हाथ के धनूष को काट डाला, उनको कवच को छिलन्न-भिन्न कर दियां, और उनके शरीर 
को शर-वर्षा से भर दिया । उन बाणो की परवाह किये विना ही सूर्यवशी राम ने 
अगस्त्य से प्राप्त वैष्णव-चाप का तुरत सघाच किया, धनूष की ठकार की और तेज बाण 
चलाकर उस राक्षस को पताका को काठ डाला | तब उस राक्षस ने राम के हृदय का 
विदारण कर सकने की शक्ति रखनेवाले चार बाण चलाये । रक्‍त-सिक्‍त अग्ो से.राम ने 
उस राक्षस को विविध वाणों से परीडित करते हुए एक प्रबल अस्त्र से उसका धवृष 
तोड़ दिया, चार वाणो से घोड़ो को मार गिराया और सारथी को मार डाला । उनका धवुष 
ऐसा दीखने लगा, मानों वह अपनी वाणाग्ति में रथ की पूर्णाहुति देवा चाहता हो । तब 
रय से वचित हो खर प्रलयकाल के रुद्र की भाँति हाथ में गदा लिये हुए राम की ओर आने लगा 
तो पहाड़ो के साथ पृथ्वी काँप गई । उस दुष्ट दैत्य को देखकर रघुराम ने बडे 
दर्प के साथ कहा--हे राक्षस, हें नीच, अब भी तुम्हारी शूरता किस काम को ? तुम्हारी 
सेता नष्ट हो गई; तुम्हारे बधु कठ मरे; तुम्हारी अस्त्र-संपत्ति समाप्त हो चली, इस 
दण्डक बन में अपने अद्वितीय श्ौयें से बढ़ते हुए, यहाँ के पुण्यात्मा मुनियो को मारले «के 
पाप-फल को भोगने का (तुम्हारा) समय जा गया हैँ। उसे अब भोगो, में अभी तुम्हारा 
वध करता हूँ ॥ ५. ८ 
इन वचनो को सुनकर खर क्रोव से जलतें हुए बड़े घमड के साथ बोलॉ-- 
हुं राघव, ऐसा गव॑ क्‍यों करते हो ? युद्ध में कुछ क्षुद्र राक्षतों को मारने से (गर्व से) 
फूलकर अपनी प्रशसा आप क्यो कर लेते हो ? कुलीन जन कही अपनी प्रश्यसा आप करते है ” 
यह लो, में गदा लिये हुए आया । मुझसे भिडो और मेरी शक्ति देखो । देवता तथा 
छंसुर मेरी ओर दृष्टि तक नही उठा सकते, तब क्‍या तुम मेरे आगे खडे रहने योग्य शूर हो ” 
भे एक-एक करके तुम्हारी मास-पेशियों को काटकर अपनी बहन को दें दूँगा ।' 
इस प्रकार कहकर उसने अपनी गदा घुमाकर उसे राम पर फेंका । पवन की शीघ्र 
गति, सूर्य का तेज, अग्नि का ताप, मौर बिजली की कठोरता मानो उस गदा के रूप में 
-आ रही हो । उस गदा को, अत्यन्त प्रचड वेग से अपनी तरफ आते देखकर राम ने उस 
गदा के लबें काड (भाग) को खड-खड कर दिया और बोलें--क्यो रे, तुम्हारी 
गर्वोक्तियाँ तथा घमड चूर हुए कि नहीं ?” तब उसने (ख़र ) गर्जन करते हुए एक वृक्ष को 
उखाडकर अपने बाहुबल से उसे घुमाकर लो, मरो--कहते हुए राम पर फेंका । राघव ने 
पुरत उस वृक्ष को काटकर सूर्य की सहद्न किरणों की आभा के समान उज्ज्वल सहस्त 
धारो को उस पर छोडा, जिससे वह अत्यत व्याकुल हो उठा । उसके शरीर से रक्त की 
धाराएँ बहने लगी । फिर भी वह अपना समस्त साहस एकत्रित करके राम के आगे आया | 
उसे देखकर राम ने, दया त्यागकर, समस्त मुवनो को ब्याकुल करते हुए, ऐन्द्रास्त्र का संघान करक 


4 


९रंक्कांड ९84 


उस पर चलोया । तब वह राक्षस (खर) अपना सारा अकड खोकर वज़पात से 
चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिरनेवाले पर्वत के समान गिर पडा । डेढ मुहूत्त 
के अतर (तीन घडियो) में अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले खर-दृपर्णांदि चौदह सहख 
राक्षतों का (राम ने) इस प्रकार वध किया, यह देखकर सु रो ने राम की भूरि-भूरि प्रशसा की । 
मुनियो ने आश्ञीवादि दिये, देवताओ ने पृष्प-वृष्टि की । पर्वत की ग्रफा से शीत 
जानकी को साथ लिये हुए लक्ष्मण बाहर आये, राम को प्रणाम किया और उनकी प्रशसा 


करते हुए, उनके हाथ में शोभायमान होनेवाले वनुष को ले लिया । हर्ष से भरे हृदय 


से जानकीरमण पर्णशाला में गये और युद्ध में मरे हुए राक्षसों का वृत्तात सीता को सुनाते हुए 
बडी प्रसन्नता से रहने लगे । 


१३ लंका में अकंपन तथा रावण का वार्त्तालाप 

तब अकपन नामक राक्षस प्रकपित हो आत्तंनाद करते हुए, बडे वेग से लंका गयां 
और रावण को देखकर कहा--हे असुराधिपति, चौदह सहस्र राक्षस वीर तथा खर-दृषण 
आदि काकुत्स्थ राम के शरोकी अग्नि में भस्म हो गये हे । यह सत्य है ।” यह सुनकर रावण आइचरय्य- 
चकित हुआ और उस अकपन को रोपपुर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा--क्यो रे, कैसी बात 
कर रहा है ? कौन है वह राम ? क्या वह कोई कुबेर है, या इद्र है, या यम धर्मराज है ? 
व तीवो मिलकर भी तो हमारे खर-<दृषण को जोत नहीं सकते । ऐसी दश्ा में वह 
अकेले उन प्रतापी वीरो को किस प्रकार जीत सका, स्पष्ट रूप से समकाओो। हम तुम्हें 
अभय-दान देते है।! तव अकपन निर्भय होकर राघव का वृत्तात, उनके साहस और शौर्य, 
खर-दूषण आएदे राक्षप्रों का वध, सोडित्र ओर जानकी का वृत्तात झादि से अत तक कह 
सुनाया । 

तब रावण अत्यत क्रूद् हुआ और युद्ध करने के लिए उद्यत होने लगा । उससे 
घनिष्ठ मित्रता रखने के कारण अकपन ने रावण से कहा--हें राक्षसराज, रघुराम को 
जीतना क्‍या पक्षिवाहन (विष्णु) या शूलपाणि (शिव) के लिए भी सभव हो सकता है ? 
वह निपुण (व्यक्ति) बात-की-बात में आकाश तथा पृथ्वी को जोडने अथवा तोडने की 
शक्ति रखता हैँ, दावाग्नि का या पवन का अवरोब करने तथा गुक्‍त करने में वही समर्थ हूँ । 
सभी लोको का नाश करने या उनका पोषण करने की शक्ति उसी में हैं, समस्त 
ब्रह्माण्णट की रक्षा करने की क्षमता उसी में है, इसलिए में आपको एक उपाय 
बताता हूँ । युद्ध की कोई आवश्यकता नही हैं । उस काकुत्स्थ राम की देवी, लावण्य का 
समुद्र (सीता) को यदि आप ला सकें, तो राम उसके वियोग की अग्नि में भस्म हो जागगा। 

यह सुनकर उस राक्षसराज ने उसी को उच्चित समककर अकपन की भूरि-भूरि 
प्रशसा की और स्व्णं-रथध पर आरूढ होकर समुद्र पार किया और धुरधर मत्री ताडका- 
पुत्र मारीच के पास पहुँचा । उसने उसे खर-दृषण आदि राक्षसों के वध का वृत्तात सुनाया 
और कहा--'में राम की स्त्री सीता को हरकर लें जाने के उद्देश्य से तुम्हारे पास आबा हूँ ।' 

तब मारीच ने कहा--हे रावण, यह कैसी इच्छा हैँ ? किसी अभाव के विना, 
समस्त भोगो का अनुभव करके भी ऐसी दुष्ट वृद्धि तुम में कैसे उत्पन्न हुई ? किस दुप्ट-पुद्धि 

१६ 


श्श्द रंगनशथ रायायेफे 


मंत्री ने तुम्हें ऐसा परामर्ण दिया है ? तुम उसे अपना बत्रु जानो । में तुम्हारा हित 
चाहनेवाला मत्री हूँ, अन्‍य नहीं हूँ । यह तुम्हारे लिए उचित नहीं हैँ । इस पृथ्वी पर 
किसी भी पतित्रता स्त्री को प्राप्त करने की इच्छा अनुचित ही है । ऐसी इच्छा तुम करोगे 
तो तुम्हारे वण् का सना हो जायगा । इसलिए हे दानवनाथ, तुम लका को लौठ जाबो 
और प्रसन्नता से रहो । अपनी स्त्रियो के साथ सूख-भोग प्राप्त करो । मारीच की इन 
बातों को सुनकर रावण लका लौट गया । 


१४ शूर्पणस्रा का रावण से दीनाछाप 

खर, दूषण बादि राक्षसों को राम की गर-वक्ति में भस्म हुए देखकर शूर्पणत्ा 
बत्वत नतप्त होती हुई लका पहुँची । देव-सभा के वीच चितामणि से निर्मित सिंहासन पर 
विराजनेवाले इंद्र के समान, सस्माननीय सभा-मडप के वीच सिंहासन पर सासीन, 
गरुड़, उर्ग, अमर तथा गवर्ब-युवतियों की संवाएँ प्राप्त करनेवाले, ऐरावत के भबकर 
दाँतो के अग्नमाग से रगड़ खाये हुए उर को श्रेप्ठ आभूषणों से आच्छादित रखनेवाले, 
सारे ससार में एकमात्र भीषण बाकारवाले, सग्राम में भयकर रूप से गर्जन करनेवाले, 
घत्रुओ का सर्वताज करनेवालें रावण को देखकर जर्पणखा रोती हुई हाथ जोड़कर अपने 
हृदय के विपाद को अक्ट करती हुई वबोली--हे असुरेन्द्र, तुम समझते हो कि में समस्त 
लोको में बद्वितीय गक्तिजाली हूँ, तुम गर्व करते रहते हो कि मेने तीनो लोकों के 
बत्रुओं का सर्वेनाग किया हैं। तुम प्रसन्नता से फूले रहते हो कि मरा राज्य 
अकटक है । वही समस्त लोकों का स्वामी कहला सकता है, जो गुप्तचरो के 
द्वारा (अन्य) राजाजो का, (उनके) राजकोंपो का, उनकी इच्छाओं का, तथा रहस्वो 
का पठा लगाकर कार्य करता रहता है । तुम्हारी भयकर मायाओ की दावक्ति, तुम्हारा 
प्रताप, तुम्हारा वाहुबल और तुम्हारा वैभव--ये सब इसके पहले सफल होते थे, अब 
नहीं । इसका कारण भी सून लो । भानृकुल का पावन व्यक्ति राम तपसवी के रूप मे 
अपने पिता महाराज दशस्थ की आज्ञा से अपने प्रिय अनज लक्ष्मण तथा पत्नी सीता के 
साथ दडक वन में आया है और मुनियों पर दया करके उन्हें अभव-दान देकर पचवटी में 
बड़े जआानद के साथ रहता हैं | में उस पर आसक्त होंकर उसके निकठ पहुँची, तो क्रोव मे 
आकर उसने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी । मैने खर से सारा वत्तात कहा, तो उसने बत्यत 
क्रुद्ध होकर प्रलयकाल के रूद्र के समान भयंकर रूप घारण कर, दूपषण तथा त्रिशिरों के 
साथ चौदह सहस्त मानव-भक्षक वीर राक्षस-सैनिको के सहित राम पर आक्रमण किया और 
रबुराम के वाण-रूपी अग्नि-झिखाओं में भस्मीमूत हो गये । इसलिए अब मेरे अपमान 
को दूर करनेवाले तुम्हारे सिवा और कौन है ? मेरे मुख की विकृति देखो और मेरा 
दुख तुम अपना दुख मानों 

उसकी वालें सुनकर दानवनाथ विस्मित हुआ और (थोडी देर तक) सोचने के 
वाद उस राक्षसी से क्हा--मैने अपने ज्ञातियों का वव तथा तुम्हारे वहाँ पहुँचने आदि 
का समाचार सुना हूँ । उसे रहने दो । तुम तो मुझे यह वताओं कि उस राम की शक्ति 
कसी हूँ ? उसका कैसा रूप है ? उसकी क्‍या अवस्था हैं ? उसका आकार कैसा हूँ ? उसके 


अएरयकोड ९98 


भाई का रूप कसा है ”? उसकी स्त्री सीता का रूप कैसा हैँ ? तुम अपनी देंखों हुई वातो 
का पूरा विवरण दो, तो में उनको रक्‍त-धाराओ से तुम्हारी प्यास बुकाऊंगा ।' 

तब शूपंणगखा वडी प्रसन्नता से यो कहने लगी--रामचद्र उन्नत वक्षवाला, 
श्यामालोत्पल वर्णवाला, सभी लोको में श्रेष्ठ रूपवात्‌, सूर्य-ययडल के तेज को परास्त करनेवाला 
तेजस्वी, धीर, आजानुवाहु, महान्‌ पराक्रमी और कमलो के समान नेत्रवाला है । उसी योद्धा ने 
मेले खर, दूषण आदि राक्षसों को परास्त किया था । सोमित्र हेंमवर्णवाला हैँ और 
दूसरी बातों में अपने भाई के समान ही सभी गुणों से सपन्न हैँ | उसी ने मेरी ऐसी गति 
कर दी हैँ । अब सीता की सुदरता के सवध में भी जान लो। मेने देवताओ की स्त्रियों को, 
राक्षस-स्त्रियों को, किन्नर-अगनाओ को, भोगिनी कामिनियो को, गधर्व-पत्नियो को, 
यक्ष-काताओ को अच्छी तरह देखा है । मेने पावंती, लक्ष्मी, सरस्वती तथा रति को भी 
देखा हैं । मेने रभा, शची तथा त्रिभुवनों में रहनेवाली सभी स्त्रियों को देखा है, मुनि- 
पत्नियो को देखा है और ब्राह्मण-स्त्रियो को भी देखा है । किन्तु वैसे कुच, वैसी आँखें, 
वैसी मधुर बोली, वैसे कपोल, वैसी नाक, वैसा सोदय, वैसे चिकुर, वैसे कटाक्ष, वैसे उर, 
वैसे हाव-भाव, वैसी मद हँसी, वह मद-गमन, और वह विवेक किसी भी स्त्री में नही 
देखा । में कैसे सीता की प्रशसा करूँ ? वह स्त्री सभी लोको पर राज्य करनेवाले तुम्हारे 
जैसे पति के लिए ही योग्य है, अन्यो के लिए योग्य नही है । वह चद्रमुखी, वह 
चकोराक्षी, वह नवयुवती, वह कुद-सम दाँतवाली, वह गजगामिनी, वह नवल-लतिका, वह 
मानिनीमणि, वह प्रुष्पगधि, वह स्त्री, तुम्हारी स्त्री होकर रहे, तो हे दनुजेश, तुम्हारे राज्य 
की शोभा बढेगी ।' 


१४ रावण का पुनः मारीच के पास जाना 


कामातुर रावण ने जब देखा कि इस स्त्री की वातो तथा अकपन की वातो में 
कितनी समानता है, तो वह अत्यत विस्मित हुआ । उसने राजसभा स्थगित कर दी और 
भाग्य से प्रेरित होकर एकान्त में चला गया और सारथी को बुलाकर रथ लाने की आज्ञा दी । 
सारथी के रथ लाते ही वह सूर्य-किरणो के सदृश् अनुपम आयुधों से परिपूर्ण उस 
रथ पर आरूढ होकर करोड सूर्यो की दीप्ति से विलसित होते हुए आकाश-मार्ग से समुद्र 
के मध्यभाग से जाते, विविध वस्तुओ को देखते समुद्र पार कर गया और पू्गीफल, मिर्च, 
अगरु, नारिकेल, साल, हरेणु, रसाल, विशाल आदि वनो को बडे कौतुक के साथ देखता 
हुआ चला। पहले, गरुड के सुधा-कलणश को लाने के लिए जाते समय, गज-कच्छपो को 
खाने के लिए, जिस वृक्ष पर अपना पैर रखा था, उस वृक्ष को, तथा उस पर पक्षीद्र के 
द्वारा कृत चिह्न को और शत योजनो तक फंली हुई शाखाओं से विलसित, मुनियों से घिरे 
हुए सूभद्र नामक वटबृक्ष को बडी प्रसन्नता से देखा भौर महान्‌ महिमा-समन्वित 
मासुचद्र आश्रम में जटा-वल्कल घारण किये हुए, शात चित्त तथा सीम्य भाव से अत्यधिक 
तपोनिप्ठा से रहनवाले मारोच के पास पहुँचा और उससे आदर-सत्कार प्राप्त करने के 
पश्चात्‌, अत्यत दीन होकर उससे अपने आगमन का कारण यो कहने लगा-- हे मासझाच, 
तुम मेरे अतरग मत्री हो, इसलिए में यहाँ आया हूँ । सूर्यवशी रामचन्द्र अपने पिता की 


रधे८ं एंगनाथ रएयायण 


आज्ञा से अपने अनुज तथा पत्नी के साथ तपस्वी की तरह जीवन विताने के लिए दडक-वन 
में आया है और अपने सहज स्वभाव के कारण यहाँ के मुनियों को अभ्य-दान देकर यही 
रहने लगा है । उसने निर्भध होकर अकारण ही हमारी शूपंणखा की नाक और कान काट 
लिये हे तथा खर-दृषण आदि राक्षसों का वध किया हूँ । उस युद्ध में मरे हुए चौदह सहस्न 
राक्षस-वधुओ का प्रतिशोध लिये विना मेरे मन की पीडा दूर नहीं होगी । तुमने इसके 
पहले मुर्के अच्छा उपदेश तो दिया था, किन्तु उसका अनुसरण करने से मेरा मान-भग 
होगा । इसलिए में उस रामचद्र की स्त्री का माया से अपहरण करके ले जाने के लिए 
जा रहा हूँ । मेने एक उपाय सोचा है । यदि तुम चाहो, तो वह सिद्ध होगा । तुम अत्यधिक 
प्रयत्न से उस आश्रम के पास जाना और माया-मृग का रूप धारण करके विचरण 
करते रहना । सीता तुम्हें देखकर तुम्हारे प्रति आक्ृष्ट होगी और राम तथा लक्ष्मण से 
तुम्हें लाकर देने की प्रार्थना करेंगी । तुम मृग-सुलभ कौशल से उन्हें भुलाते हुए घने वन 
के मध्यभाग में ले जाकर अतर्थान होकर अपने आश्रम में पहुँच जाना । में यहाँ सीता 


को बडे हर्ष से लका ले जाऊँगा । में चाहता हूँ कि राम सीताजी की विरहाग्नि में ही 
भस्म हो जाय । इसलिए तुम ऐसा करो, में अपना आधा राज्य तुम्हें दे दूँगा ॥” 


१६ मारीच का पुनः उदबोधन 


उस नीच के वचनों को सुनकर मारीच अत्यत भयभीत हुआ ओर दुख-सागर 

-की लहरो में डूबते-उतराते सौजन्य छोडकर कहा---हे दनुजेश्वर, ऐसा विचार तुम्हें कैसे 
उत्पन्न हुआ ? ऐसा अनुचित मार्ग तुम्हें कैसे शोभा देगा ? किसे तुम्हें ऐसा उपदेश दिया ” 
सुख-चैन से रहनेवाले तुम, अपने सभी वधघु-मित्रों के साथ क्‍यों मरना चाहते हो ” 
न जाने तुमने कुटिल राक्षस-बरण का नाश करनेवाले राम को क्या समभ रखाहँ * 
में उनको वाल्यावस्था का थोडा-सा हाल जानता हूँ । वे नित्य कल्याणगुण-सपन्न है, 
असमान साहसी है । विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के लिए जब वे आये और 
यज्ञ की रक्षा कर रहे थे, तव मे और सुवाहु ने अपनी समस्त शक्ति के साथ उससे युद्ध 
किया था । तब उन्होने ऋद्ध होकर एक ही घर से सुबाहु का वध कर दिया और दूसरे 
वाण से मो समद्र के मध्य में फेंक दिया । अस्त्रहीन होते हुए भी, वालक होते हुए भी 
वाल्यावस्था में ही उस अकलक साहसी ने वैसा शौर्य दिखाया था । आज वे प्रवल अस्त्रो 
से सुसज्जित शौरयनिधि हे । आज उनके प्रताप के आगे कौन टिक सकता हैँ 

उनके वर्तमान गौर्य का भी थोडा-सा हाल में जानता हूँ, तुम अवश्य सुनो । पहले 

की जजन्रता से प्रेरित होकर में दो और भयकर राक्षसो के साथ वाघ का रूप धारण किये हुए 

उनके तप में अपने-आपको नप्ट करने के उद्देश्य से गया | तब की वात कंसे कहू 

उन्होने तीन बाणों से हम तीनों को गिरा दिया । किन्तु हमर्मे से दो ही मरे । न जान 

मेरी शेप आय की कितनी गक्‍्ति हैं ? में यहाँ आकर गिरा और अपने-आपकों सजीव 

पाया । तब से राम के अतुल पराक्रम का विचार करके मेने अपना समस्त पौरुष त्याग 

दिया और “रकार' (“र' ध्वनि) से प्रारम होनेवाले-रव, रथ, रमणीय, रवि, रति 
आदि अब्दमात्र के सनने से उनका क्‍्मरण करके भयभीत होता हुआ इस प्रकार तपस्वी 


ऋएएयकांड ४: (4 


का जीवन व्यतीत कर रहा हूँ । हे रावण, तुम राम की शक्ति को नही जानते । हमारी 
शूपंणखा अपने भद्दे रूप का विचार नहीं करती, अपनी दशा के बारे में नहीं सोचती । 
उन अनुपम गुणधाम, अभिराम, रामचद्र पर यो फूली-फूली आसक्त होना क्‍या उचित था ? 
उसने स्वयं ही (अपने अपराध से ही) अपना रूप ऐसा विक्रेत करवा लिया । इसपर 
क्रद्ग होकर खर ओर दूषण रघुराम पर आक्रमण करने गये और उनकी वाणाग्नि की 
ज्वालाओ में दग्ध हो गये । उनके कारण तुम क्यों मतिश्रष्ट हो राम का बत्रु बनकर 
अपने को नष्ट करना चाहते हो । यह न उचित हैं, न नीतिसगत हैं । इसलिए तुम 
अपना विचार छोड दो और लका लौटकर प्रसन्नता से रहो । किसी भी प्रकार तुम विचार 
करो, यह अनुचित काय॑ ही हुँ | यदि में प्रयत्त करके जाऊँ भी, तो राम के बाण से मरे 
प्राण नही बचेंगे । में तुम्हारा अपकार कभी नहीं करूँगा । में अपने मन में कभी तुम्हारे 
अहित की इच्छा नहीं करता । इसलिए तुम अवश्य मेरी वात मानों । में जो कहता हूँ, 
उसे हित-वचन मानो । तुमने तो कहा था कि यदि तुम यह कार्य करोगे, तो में अपना आधा 
राज्य दूंगा । किन्तु कौन कह सकता हैँ कि रघुराम को छेडक़र में जीवित लौट आ सकूगा ?” 

मारीच के इन वचनों को सुनकर रावण क्रोघ-विवश होकर बोला---एक साधारण 
मानव क़ो तुम लोकरक्षक, तीनो लोको को भयभीत करनेवाला, तथा मुभसे श्रेष्ठ बतलाते हो । 
तुम अपने प्राणों के भय से ऐसा प्रलाप कर रहे हो और मुभे भयभीत करने के 
लिए बातें बना रहे हो | तुम नही सोचते कि में राजा हूँ । मेरी आज्ञा की तुम अब- 
हेलना करते हो । अब मूभे तुम्हारी आवश्यकता ही क्‍या हैं। साथ कर लेने 
के लिए तुम्हें वुलाया भी, तो मेरी ऐसी दशा हुई ।' 

इस प्रकार कहकर रावण मारीच का वध करने के लिए उद्यत हुआ । उसका 
क्रोध देखकर मारीच ने मन-ही-मन सोचा--इस नीच के हाथ से मरने की अपेक्षा उस 
राम के हाथो से मरना ही भला हैं ।” इसके पश्चात्‌ उसने राक्षसराज को देखकर 
कहा-- उचित वात कहने पर तुम ऐसा क्रोध क्यो करते हो ? अच्छा उपदेश देनेवाले 
मत्रियो का वध करनेवाले राजा कही हो सकते हूँ ” ठीक है, तुम जो कहो, में उसके 
अनुसार करूँगा । तब रावण ने बडे स्नेह से उसको क्षमा कर दिया और उसे अपने 
रथ पर बैठाकर अत्यत वेग से उप्तकें साथ पचवटी में पहुँच गया । कामातुर की बुद्धि 
ऐसी ही होती है । बुरे मार्ग को वह क्‍यों त्यागने लगा ? 

१७ मारीच का माया-मृग के रूप में आना 
मारीच रथ से उतर गया और उस राक्षसराज की प्रार्थना के अनुसार, (स्वय 


मायावी होने के कारण) अच्छी तरह सोच-विचारकर राक्षस-शवित के प्रभाव से सुदर 
माया-मृग का रूप धारण किया । उस माया-मृग का शरीर सुनहला था, उसका विशाल 
नेत्रयुग्स इन्द्रनील मणि के समान था, उसकी भौीहें प्रवाल की-सी और कान उज्ज्वल वज्ध 
के-से थे, नीले खड॒ग के समान उसके मरकत के सीग थे, मोतियो कान्सा उसका पृष्ठ- 
भाग था, रत्त-विदुओ के समान (उसके शरीर पर) धच्वे थे, नव पद्मराग के समान 
उसका ज्दर था, और उसके खुर रजत के समान चमकते थे । वह मृग ऐसा प्रतीत होता था 


९4० रंग्नांथ रयायण 


मानो रोहणाचल का समस्त सौदयें मृग का रूप धारण किये हुए पृथ्वी पर विचर रहा हो, 
अयवा अकेले राहु से भोत होकर चद्रमडल पृथ्वी पर घूम रहा हो, बबवा 
राक्षस-क्षय करने के हेतु ब्रह्मा ने समस्त सौंदर्य को एकत्रित करके मृग का निर्माण किया हो 
और उसे कपट (मन) से भेजने पर यहाँ वह आ गया हो, अथवा जानकी नें 
अपनी कुटिल वेणी से इन्द्रतोल मणियों का, दाँतो से मोतियो का, अरुण ओपष्ठो से 
प्रवालों का, कपोलो से वज्यो का, गरीर की काति से वैड्य का, उदर के ऊपर की रोम- 
राजि से मरकत-मणियो का, पाणि-्युति से पद्मरागो का, और नख-द्युति से ग्रोमेदको का 
परिहास किया था । इसलिए सभी रत्न, रत्नगर्भा की पुत्री-खपी रत्न को सताने के लिए 
मृग का रूप धारण करके आये हो, अथवा रघुराम ने सीता के लिए मेरा धनुष तोडाथा। 
जव म॑ उन्हें व्याकुल कखरूँगा--यो सोचकर हर के भेजने पर उनके हाथ का हिरन 
इस प्रकार आया हो, अथवा सीता के मुख की काति से पराजित होकर, चद्र के भेजने 
पर जाया हुआ मायान्मृग हो । इस प्रकार का वह हिरण चित्र-विचित्र वर्णों की कांति 
से समन्वित हो, कपट-रूप घारण किये हुए, अनुपम सौदर्य को प्रकट करते हुए, दूँढ-दूंढ- 
कर तृण चरने लगा । कभी वह अपनी पूंछ की रमणीय काति से वन के मयूरो को 
नचाता, कभी अपने जरीर की कान्ति को विकीर्ण करके सारे वन को सुनहला बना देता था, 
तो कमी चौकडी भरकर इच्धधनुपष का-सा दृश्य प्रस्तुत करता था, कभी तो आकाश 
की ओर उछनत्रकर विद्युल्लता की-न्सी ज्योति उत्पन्न कर देता, तो कभी अपने पाइवंभाग 
की काति से चद्रकात मणि को लज्जित कर देता; कभी मृगो के कूंडो के साथ मिलकर 
चरने लगता, तो कभी उन्हें डराता, कभी छिप जाता, तो कभी प्रकट हो जाता, कभी 
अति निकट पहुँच जाता, फिर इतने में डरकर चौकड़ी भरकर दूर निकल जाता, कभी 
पेंडो की छाया में चला जाता, कभी पर्णगालाओ में घुस जाता, कभी सिकुडता, फिर 
तुरत ही छलाँग मारकर निकल जाता, कमी वह पृथ्वी को सूंघने लगता, पूँछ हिलाता, 
कान खडे करके कुछ सुनता और तुरत अत्यत वेग से दौडने लगता । कभी निकट पहुँचता, 
सिकुडे हुए अपने शरीर को हिलाता, घास पर लेट जाता, और बड़े स्नेह से मुनियों के 
निकट चला जाता, कभी अपने खुरो से अपने कानो को खुजलाता और सीगो से पुप्प- 
लताओ को हिलाकर उनके सभी फूलों को गिरा देता । इस प्रकार वह हिरण उस सुन्दर 
पर्णशाला के आगे बड़े जानद से विविध कौतुक करने लगा । 


उसी समय सीता फूल चुननें के लिए आई और उस पर्णशाला की सूुदर भूमि 
को अपने मजुल नूपुरो की मृदु ध्वनि से भरती हुई, सौरभ से महकनेवाली पुप्प-लताओं की 
फ्राडियों के निकट पहुंचकर फूल चुनने लगी । तव वह मन को आच्चर्यंचकित कर 
देवेवाले उस हिरन को देखकर विम्मित हुई भौर सूर्ववज्ञाविष राम को देखकर वबोली-- 
हैं नाव, यह देखिए निकट ही एक अद्भुत मृग दीख रहा हैँ । हमने इतने वर्णो का, 
ऐसा सुदर मृग अवतक किसी भी वन में नहीं देखा । इसके चर्म पर सुख से शयन 
करने की वडी इच्छा हो रही हूँ । इसलिए हे प्राणेश, इसका पीछा कीजिए औौर इसे मारकर 
मुझे इसका चर्म ला दीजिए । नहीं, नहीं, किसी भी उपाय से इसे जीवित ही पकडकर 


5%7एएयकाड ९4९ 


लो सकें, तो और भी अच्छा होगा । हमारा वनवास तो समाष्त होनेवाला है। हम इस स्वर्ण- 


मृग को अपने नगर में ले जायेंगे और सासो तथा भरत आदि को इसे दिखाकर उन्हें 


आनंद दे सकते हूँ ।' - 

सीता के इन वचनो को सुनकर लक्ष्मण रामचद्र को देखकर बोले--हें प्रभु, जब 
पृथ्वी पर मृगराज का भी ऐसा (सुन्दर) शरीर नही है, तो भला मृग का ऐसा घरीर 
कहां हो सकता है ? यह माया-मृग हैं, इसका विश्वास मत कीजिए । राक्षस मायावी 
होते हे और कदाचित्‌ यह उनकी माया ही हैं । यही नहीं, क्या आपने मुनियो के वे 
वचन नही सुने कि क्र मायावी मारीच इस प्रात में घूमता रहता है । प्राय वही हमें 
अम में डालने के लिए इस प्रकार आ गया है। इस पर आसवकत होकर, उतावले हो आप 
इसे पकड़ने का विचार मत कीजिए । वैदेही तो भोली-माली है । हे प्रभू, आप भी वैसे 
थोडे ही है ?' 

यह सुनकर रामने सीता का मुख-कमल देखा और हँसते हुए लक्ष्मण को देखकर 
बोलें--हे लक्ष्मण, ऐसे विचलित क्यो होते हो ? क्या पृथ्वी पर राक्षसों की माया मेरा 
सामना कर सकेगी 7? में या तो इस मृग को पकडकर ले आऊंँंगा या इस प्रचंड राक्षस 
का वध करूँगा ? इन दो वातो को अच्छी तरह जानकर ही में इसका पीछा करूँगा और 
इसे मारकर, इसका चर्म लाकर जनकजा को दूँगा । इतने दिनो के बाद सीता ने यह 
छोटी-सी इच्छा प्रकट की है, तो क्‍या में इसे भी पूरा न करूँ ? तुम सावधान होकर इस 
पर्णशाला का तथा सीता की रक्षा करते रहो ॥' 


१८ राम का माया-सृग का पीछा करना 


इस प्रकार उन्हें यह भार सींपकर, रघुराम ने उनके हाथ में स्थित धनुष को 
लिया और उस पर डोरी चढाकर, ऐसे चल पढे, जैसे पूर्वकाल में यज्ञ-मुग का पीछा करने- 
वाला गजासुर-वैरी गया था । वे कही धीरे-बीरे किसी काडी के पीछे छिपते, कही भुकते, 
कही दौडते, फिर खडे होकर देखते, किसी आड में छित्ते (मृग का) पीछा करते, उसे 
पकडने के लिए आतुर होते और धनुष-बाण को पीछे छिपाकर दवे पाँव चलने लगते । 

वे उस मृग को पकडने के लिए, अवसर देखकर, उसके निकट पहुँचते, अब 
पकडा, लो, यह आया, अब हाथ में आ गया--ऐसा सोचते हुए उसका पीछा करते 
जाते । वह हिरन भी कभी निकट ही दिखाई पडता, उनके पास पहुँच भी जाता, किन्तु 
पकडने का यत्न करते ही भाग निकलता । कभी राम को क्रोव में आया जान (वह) 
खडा हो जाता, फिर चारो दिशाओं में मनोहर ढंग से चौकडियाँ भरने लगता । लार के 
साथ घास के टुकड़ों को (वह अपने मूँह से) गिराता, एक छलाँग में निकट पहुँच जाता, 
तो दूसरी छलांग में दूर निकल जाता, (जहाँ-तहाँ) सूंघ-सूंघकर चौकडी भरता और 
विजली की तरह अपनी जीभ को (एक क्षण के लिए) बाहर निकालकर घुमाता, मानो 
कोई मशाल घुमा रहा हो । (वह) कभो कुम्हार के चाक के समान चक्कर काटता, कभी 
धथके हुए की भाँति, घुटनो के बल खडा रहता, किन्तु निकट पहुँचते ही बाज की तरह 


आकाश की ओर छलाँग मारकर निकल जाता । थकके-माँदे जब राम आश्यचयंचवित होकर 


£4५२ र॑ंग्नाप रायायप 


खडे हो जाते, तब उनके पार्ब्वभाग में ही दिखाई पडता और तुरत छल करके दूर 
हो जाता । जब राम तंग आकर उसपर वाण चलाने के लिए सन्नद्ध हो जाते, तव वह अदुश्य 
हो जाता । इस प्रकार वह माया-मृग राम को थकाते हुए, वहाँ से दूर घने वन में जा 
पहुँचा और उनकी आँखों से ओभल होने का यत्न करने लगा । अब राम समझ गये कि 
चह माया-म॒ग हैं और मन-ही-मन कहने लगे--दिखाई देकर अब कंसे बचोगे ?' उन्होने 
न्रह्मासत्र का सवान किया, और पर्वतो को कँपाते हुए, समुद्र को आदोलित करते हुए, सभी 
लोकों को भयभीत करते हुए और दिशाओ को थर्रातें हए, उस अस्त्र को मृग पर चलाया। 
वह माया-मुग अपना कपटरूप छोडकर, असुर का दीघे आकार धारण किये हुए 'हाय 
लक्ष्मण” का आतर्तनाद से दिशाओं को गुंजाते हुए, प्राण छोडकर पृथ्वी पर ऐसे गिरा, मानो 
राक्षयों की लक्ष्मी ही नष्ट हो गईं हो, रावण का ही सर्वनाण हुआ हो, अथवा लकापुरी ही 
विध्वस्त हो गई हो । उस माया-मृग को पृथ्वी पर गिरते देख, जानकीनाथ ने अत्यत हर्षित होकर 
उस राक्षस को देखा और निश्चय कर लिया कि वह मारीच ही है । उन्हें अपने भाई के वचन 
याद आये और वे अपने भाई की प्रणसा करने लगे । वे मन-ही-मन सोचने लगे--इस मायावी 
राक्षत का आत्तंनाद सूनकर न जाने सौमित्र और सीता कितना भयभीत होते होगे । 


(राक्षत के) उस आर्तंनाद को सुनकर सीता भयभीत हो गई और मूच्छित हो 
पृथ्वी पर गिर पडी । चेतना लौटते ही फटी-फटी आँखों से चारो ओर देखती हुई घैय॑ 
खोकर तड़पने लगी और ऊँचे स्वर में लक्ष्मण को देखकर वोली--हे सौमित्र, यह कैसी 
वात हूँ कि राम तुम्हें आत्तंध्वनि में पुकार रहें है ? हे अनघ, क्‍या तुम उनकी आवाज 
नही सुन रहे हो, या सुनना नहीं चाहते हो, या तुम्हें सुनाई नहीं पडती ? तुम वो 
किचित्‌ भी विचलित नहीं हो, भयभीत नहीं हो, दुखी नहीं हो ? यह कैसी वात हैं ” 
मेरा हृदय विविध प्रकार के दुखो से उवल रहा है | वे व्न में अकेले चले गये हैं । 
वहुत बविलव हो चुका है, फिर भी नहीं आये हे । कही राक्षसों के साथ युद्ध करते-करते 
उनके हाथो में फेंस तो नहीं गये ” इसीलिए हे लक्ष्मण, तुम अपने भाई के पास विना 
विलव किये चले जाओ ।॥/ 


इस प्रकार कहती हुई और आँखों से आँसू वहाती हुई जानकी को देखकर लक्ष्मण 
बौले-- हे माता, आप क्‍यों विचलित होती है ? क्‍या, प्रभु राम पर कही भी कोई विपत्ति 
आ सकती है ? क्‍या आप अपने प्रिय हृदयेहवर के प्रताप को नहीं जानती ? जानती हुई 
भी आप ऐसा क्‍यों कहती हे ? किसी दैत्य ने आपको इस प्रकार से व्याकुल करने के 
लिए ऐसा आत्तंनाद किया है । जगदीश राम ऐसी छोटी बातो के लिए कही भयभीत हो 
सकते है ? आपको इतना द॑नन्‍्य क्‍यों हो रहा हैं ”? यदि रघुराम युद्ध के लिए सन्नद्ध 
हो जायें, तो क्या राक्षम उनके सामने टिक सकते हैं ? गव॑ से फूलकर दावानल पर आत्रमण 
करनेवाला गलभ-समृह क्या भस्म हुए विना रह सकता है ? इसलिए राम की आजा का 
उललघन करके आपको यहाँ छोडकर जाना मेरे लिए उचित नहीं है । इसे घने वन में 
आपको छोड़ जाऊँ, तो न जाने आप पर कैसी विपत्ति आ पडेगी । इसलिए, में जाने से डरता हूं । 
मेरी बातों का विव्वास करके आप व्याकुल हुए विना रहें ।॥ 


$एंरय्काड ९१३ 

तैव धरणिजा (जानको) ने रोपागर्ति से जलते हुए सौमित्र की निंदा करते हुए 
कहा--“हे लक्ष्मण, तुम तो रामचद्र के परम भकक्‍त हो, आज तुम इतने नीच कैसे हो 
गये ? श्रीराम के पुकारते रहने पर भी भयकर बात्रु के समान तुम चुप क्‍यों हो ? 
क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? मेरा अनुज वृुद्धिमान्‌ है, उत्तम है, यो सोचकर, तुम्हारा 
विश्वास करके, जब तुम्हारे भाई यहाँ से गये हे, तुम ऐसा पापमय व्यवहार क्यो करते हो ? 
हाँ, में जानती हूँ, असुरो की माया से राम का वध होगा, इसे अच्छी तरह जानकर 
अनुचित वृद्धि से, निशक हो, अपने भाई को दिये हुए वचन की अवहेलना करते हुए मुभे 
प्राप्त करने का विचार कर रहें हो, या कदाचित्‌ यह सोचते हो कि में इसको कंकेयी- 
सुत को सौप दूँगा । अपने इस शरीर में मु्े अब प्राणो को रखना उचित नही प्रतीत होता । 
में तुरत गोदावरी में डूबकर अपना प्राण-त्याग करूँगी । अब अन्य बातो से कोई 
प्रयोजन नही हैं ।” 

सीता के ऐसे कठोर वचन कहने पर लक्ष्मण अत्यत क्षुब्ध हो गये । उन्होंने राम 
का नाम लेते हुए अपने कर्णपुटो पर हाथ रखे तथा चारो ओर देखते हुए वोलें--हे वन- 
देवताओं, क्या तुम लोग सुन रहे हो ” सीता कठोर होकर मुझे कैसे पापपूर्ण कटु वचन 
सुना रही है ।! इस प्रकार कहकर उन्होने आँखों में आँसू भरे हुए, अब यहाँ रहना 
अनुचित समभकर, सीता से कहा--'माता, में अभी जा रहा हूँ । में आपके पति को शीघ्र 
ही लिवा लाऊँगा । आप दुखी मत होइए ।' 

इसके पश्चात्‌ उन्होने पर्णशशाला के चारो ओर सात रेखाएँ खीच दी और कहा-- 
माता, इन रेखाओं को पार करके बाहर मत जाइए । यदि कोई इन रेखाओ को पार 
करेगा, तो उसका सिर उसी क्षण चूर-चूर हो जायगा ।” तब उन्होने अनल से प्रार्थना की 
और उन्हें सीता की रक्षा का भार सौपकर, जानकी को बडी भक्ति से प्रणाम करके वहाँ 
से राम की खोज में चल पड़े । 


१९, मसिक्षुक के वेश में रावण का सीता के पास आना 


उसी अवसर की प्रतीक्षा में, अत्यत उद्विग्न होकर रहनेवाला रावण कपट सन्यासी 
का वेश घारण करके वहाँ आया । उसके हाथ में दड और कमडल थे | विद्याल ललाढ 
पर तिलक था, उंगलियों में कुश की पवित्री थी, विशाल उर पर जनेंऊ था, दायें हाथ 
में रुद्राक्ष की माला थी, और वह गेरुए रंग के वस्त्र पहने हुए था । कई प्रकार की 
जपमालाएँ घारण करने से उसकी गरदन एक ओर भुकी हुई थी । उसका गात्र कृश था 
और उसके हाथ में एक जीर्ण छत्र था | उसकी बँधी हुई शिखा पीछे की ओर लटक 
रही थी । सन्‍्यासी का ऐसा छम्म-त्रेश धघरकर वह उगलियों को गिनता हुआ, कुछ मत्रो को गुन- 
गुनाता हुआ, कही मुनि उसे पहचान न जायें, ऐसा मन-ही-मन भयभीत होता हुआ, जरा- 
पीडित वृद्ध के समान सिर को किचित्‌ हिलाता हुआ, भर्क हुए के समान जहाँ-तहाँ ठहरता 
हुआ हरि-हरि' शब्द का उच्चारण करके मानो शाति प्राप्त करता हुआ-सा, धीरे-धीरे 
पर्णशाला के निकट पहुँचा । वनदेवताओं ने जब देखा कि जगद्रोही वहाँ पहुँच गया हैं, 
तब वे अत्यत भयभीत होकर एक ओर सटककर रह गई । 

२० 


2 रेगर्नीप ए्यायेण 


. . पर्णशाला के सम्मुख खड़े हुए उस कपटवेशघारी को देखकर सीता ने उसे एक 
सयमी मुनि समझा । तुरत अत्यत भव्ति-युकत हो, कर-कमलो को जोड़कर उसे प्रणाम किया 
और सौमित्र की खींची हुई रेखाओ को पारकर बड़ी भक्ति के साथ उस अभ्यागत का 
पूजन-सत्कार किया । तव उस कल्याणी सीता को देखकर उसने कहा--हे सुदरी, तुम 
एँसे दुर्गम कानन में किस प्रकार अकंली रहती हो ? पता नहीं, तुम रति हो, या लक्ष्मी 
हो, या भारती हो ? नहीं तो पृथ्वी तथा स्वर्गलोक की स्त्रियों में ऐसा सौदये कहाँ ? 
तुम्हारा मुख पूर्ण चद्र की राका का उपहास कर रहा है, तुम्हारे अधर पद्मराग मणियो 
को परास्त कर रहे हँ; तुम्हारा शरीर विद्युल्लता को लज्जित कर रहा हैँ, तुम्हारी वाणी 
सुधा से भी अधिक पवित्र है, तुम्हारी वेणी जलद की वेणी को परास्त कर रही हैं, 
तुम्हारे साँदयं का वर्णन करना मेरें लिए असभव है । हे तरुणी, तुम्हारे आलिग्रव-पाश् में 
बधकर सुख-भोग करनेवाला व्यक्ति ही पुरुषों में श्रेष्ठ है। तुम्हारा साहवचर्य्य 
प्राप्त करनेवाला व्यक्ति ही पूर्णकामी तथा नित्यकल्याणसपन्न है । हे कमलाक्षी, तुमको 
यहाँ रहते देखकर, हमें आश्चर्य तथा दुख हो रहा हैं । हें सुदरी, तुम - कौन हो ” इस 
कानन में किस लिए तुम रहती हो ? हमें सारा समाचार कहो 
तव सीता ने बड़ी भक्ति से कहा---हे अनघ, में रघुराम की पत्नी हूँ । मेरे 
पिता महाराज जनक हैँ । महाराज दशरय मेरे ससुर हे । मेरा नाम सीता हैँ । उन्नत 
कात्तिवान्‌ रामचद्रजा अपने पिता की आज्ञा के अनुसार गृह त्यागकर वनवास के लिए 
आये, तो में और लक्ष्मण उनके साथ चले बाये है । इस आश्रम में हम तीनो तपस्वियों का-सा जीवन 
व्यतात करते हे । जाज हमने अपने आश्रम के सामने एक स्वर्ण-मृग को चौकड़ी भरते देखा, तो मेने 
अपने पति से उसे किसी तरह ला देने के लिए कहा । इसी हेतु वे गये हे | उसके पश्चात्‌, 
हाय लक्ष्मण” का आात्तंनाद झूल की तरह मेरे कानों को चुमाते हुए सुनाई पड़ा । भयभीत हो 
मेने लक्ष्मण को भेजा । वह गया हुआ है, किन्तु न जाने अब तक वह क्यो नहो लौटा ।” 
इतना कहकर, उन्होनें उस कपट मुनि को सवोधित करके कहा--है अनघ, आपका 
शुभ नाम क्‍या हूँ ? और आप यहाँ क्‍यो आये हे ?” तव लकाघिपति ने अपना कंपट 
तंजकर उनसे कहा--हे वनजाक्षी, में समुद्र के मध्य में स्थित लका का राजा हूँ । राक्षस 
में श्रेष्ठ हैँ, विश्ववसू का पुत्र हूँ, यक्षेश का अनुज हें, दिग्विजयों हैँ | मेरा नाम रावण है, 
युद्ध में देवता तथा राक्षसों में किसी को भी मारने की क्षमता रखता हूँ । हे सुन्दरी, 
मेंने तुम्हारे रूपन्सोंदर्य की प्रशसा सुनी थी, इसलिए बडे हर से तुम्हें देखने आया हूँ । 
इस अकिचन मानव के साथ तुम इन घोर वनो में क्यो रहती हो ? हें विज्ञालाक्षी, ठुम 
अपनी इच्छा से शासन करती हुई अपनी 'मनोज्ञता को प्रकट करती हुई, अत्यधिक आदर 
के साथ, पुष्पक आदि विमानों तथा ऊँची अट्टालिकाओ में सुर, गरड़, उरग, असुर तथा 
सिद्धो की श्रेष्ठ कन्‍्याओ की सेवाएँ प्राप्त करती हुई निवास करो । तुम्हारे चरणों की 
काति मेरे महलो का मणिमय कुद्टिम (फर्श) वन जाय । हें सुदरी, तुम्हारे कटाक्ष की झोभा 
मेरे अतस्ुर-की कुमुदिनियों के साथ होड लगावे । तुम्हारा मद हास प्रतिदिन मेरे प्रेम-सागर 
के लिए चद्रिका वन जाय । तुम मेरी लकापुरी को चलो ।' 


ऋएतयकांड १4५4 


हि 4 


इन बातो को सुनकर सीता अत्यत भयभीत हुई । किन्तु वे धीरमना थी, इसलिए 
एक तृण हाथ में लिये हुए वे उसे सबोधित करके उसकी बातो का उत्तर देने लगी, मानों 
वे उस रावण को तुृणवत्‌ मानती हो । वे कहने लगी--क्यों रे, मुझे श्रेष्ठ पतिब्रता 
न मानकर, इस प्रकार कहना, कया तुम्हें उचित है ? तुम्हारी इच्छा ऐसी दुलभ है, जैसे 
देवताओ को प्राप्त करने योग्य धूर्णाहुति किसी कुत्ते के लिए दुर्लभ हूँ। तुम श्रीरामचद्र 
को प्राप्त मु पर आसकक्‍त होने का साहस करते हो ? चुपचाप तुम अपने नगर को लौट 
जाओ । यदि ऐसा न करके तुम कोई दुराचरण -करने का विचार करोगे, तो मेरे पति 
राघव, जो, विविध हास्त्रास्त्रो के प्रयोग में निपुण हे, जो अनायास ही, देखते-दंखते शिव- 
धनुष को भग करने में सफल हुए, और खर-दृषण आदि राक्षसो के शिरच्छेदत करनेवाले हे, 
तुम्हें तथा तुम्हारे वश को नष्ट-अ्रष्ट कर देंगे । तुम्हारे और उन सूर्यवशी में उतना 
ही अतर है, जितना सियार और सिंह में, मशक तथा दिग्गज में, नाले और समुद्र में, 
कौआ और गरुड में अतर होता हैं । इसलिए अब तुम सुबृुद्धि के साथ लका लौट जाओ ॥ 

इन बातो को सुनकर रावण ने अत्यत क्रोघावेश से अभिभूत हो, भयकर दृष्टि से 
जानकी को देखा--और कपट रूप तजकर निज रूप धारण किया । उसके मन में मन्मथ 
दीप्त हो रहा था और उसको दस अवस्थाएँ मानो रावण के दस मणिमय जटा-जूटो से 
युक्त सिरो के रूप में दिखाई देने लगी । उसकी बीस भुजाएँ ऐसी दीखने लगी, मानों 
मनन्‍्मथ की <दस' अवस्थाओं क्री इच्छाएँ दुगूनी होकर प्रकट हो रही हो । उसके कमल केन्से 
वीस हाथ ऐसे दीख रहे थे, मानो उसकी (मदन-प्रेरित) इच्छाएँ पललवित हो गई हो । 
इच्छा के उन पल्‍लवो में फूलो के समान शस्त्रास्त्र दिखाई देने लगे । उसके शरीर के विविध 
आभूषणों की काति सदनाग्नि की ज्वालाओ के समान दीखने लगी। इस प्रकार भयकर आकार 
धारण करके खडे हुए रावण को देख सीता का घैयँ छूठ गया और वे भयभीत हो मूच्छिंत 
हो गई । तेज आधी के प्रहार से (पेड से अलग हो) नीचे पडी हुई वनलता के समान 
पृथ्वी पर पडी हुई चारुलोचनी सीता को, निर्दयी हो दशकठ ने, अपने रथ पर 
ला रखा । सीता को आँखो से अश्ुु-धारा वह रही थी, बाहु-लताएँ भय से काँप रही थी, 
उनकी वेणी खुल गई थी, कुच हिल रहे थे, रत्न-हार जहाँ-तहाँ दूटकर उसके रत्न 
विखर रहे थे, और भय तथा शोक से उनका सारा शरीर काँप रहा था । ऐसी स्थिति में वह 
राक्षस सीता को अपने रथ पर विठाकर आकाश-मार्ग से यो जाने लगा, मानो देैव-प्रेरित 
हो मृत्युदेवता को साथ लिये जा रहा हो । रास्ते में सीता की चेतना लोट आईं, तो 
उन्होने आँखें खोलकर देखा और (सूखे हुए) होठो को आद करती हुई, अपने विखरे 
हुए आँचल को ठीक कर लिया और ऊंचे स्वर में शिशु-कोयल की-सी वाणी में विधि को 
कोसती हुईं, अपने प्राणेश्वर को पुकारती हुई क्रोध तथा विषाद से सतप्त होकर विलाप 
करने लगी । * - .- 


२०. जानकी का शोक * 
सीता कहने लगी--हे राघवेश्वर, हे रामचद्र, हे सयंवशी, हाय !' आपकी पत्नी-- 
मुझे एक अनाथा बनाकर यह कुटिल राक्षस उठाकर ले जा रहा हैं| भाप शीघ्र आकर 
रे > * > * >> 


९५६ रंगनाएशथ एयायपं 


इसका नाग कीजिए और मेरी लाज बचाइए और मेरी रक्षा कीजिए । बरे राक्षस, यह 
निंदा तुम अपने ऊपर क्यो लेते हो ? तुम स्वयं अपनी लका को क्यो भस्म कर देना 
चाहते हो ? तुम्हारे लिए यह भयकर अन्याय उचित नहीं है | क्रोघ में राघव तुम्हारा 
वघ कर डालेंगे । हाय, मेने स्वर्ण-मृग देखा ही क्यो ? मैने अपने प्राणेश को क्यो जाने के 
लिए कहा ? (लक्ष्मण के) मना करने पर मेने उसकी वात क्यो नहीं मानी ? प्रभु मृय 
लाने के लिए क्‍यों गये ? मेने उनकी शक्ति का विचार क्यो नहीं किया ? लक्ष्मण को 
कोसकर जाने को लिए मेने उससे क्यो कहा ? हाय ! होनहार मुझे क्यो चुप रहने देगा ? 
इन वातो से क्या प्रयोजन है ? हे भाई लक्ष्मण, तुम अभिमान-धनी हो, मूझे माता के 
समान माननेवाले उन्नत गुणवान्‌ हो । सौजन्य की मूत्ति हो । ऐसे तुम्हें जो अपशब्द मेने कहे, 
उनका फल में अब भोग रही हूँ । क्रोच तज दो और जीघ्र आकर मेरी रक्षा करो । 
हाय कैकेयी | आपने जो वर माँगे, वे जागे चलकर सफल होगें | आप अपने पुत्र के 
हाथ एकच्छत्राधिकार का अनुभव करते हुए राजभोग कीजिए । ह 

इस प्रकार सीता उस राक्षसराज की निंदा करती हुई, रामचद्र को पुकारती हुई, 
भगवान्‌ को कोसने लगी । वह काकृत्स्थवज्ञी लक्ष्मण की प्रणसा करती और कैकेयी की 
निंदा करती हुई अत्यधिक गोक से कहने लगी--'मे मिथिलेश्वर की पुत्री, दशरथ की 
पुत्रवघू और राम की पत्नी हूँ, ऐसी मुझे रक्षा करनेवाले जहाँ अनुपस्थित हें--उस 
स्थान से एक राक्षस मुझे उठाकर ले जा रहा है । हे वृक्षों, हे मेरे सहोदरों, आप घरणी- 
इवर (राम) से सारा वृत्तात कह सुनाइए । हे सुरो, आप सुरवैरी का सामना करके 
किसी उपाय से मुझे कद से छुडाइए । हे गोदावरी, वडी भवित के साथ में आपके आश्रय 
में रहती थी, अब आपको मेरी रक्षा करना उचित है । कम-से-कम आप जाकर भूषति 
से यह वृत्तात सुनाइए । में दुप्ट के हाथो में फेसकर विपत्ति में पडी हूँ । हें माता, क्या 
आपको मेरी रक्षा नहीं करती चाहिए ? हे भूमाता, आप रघुराम भूपालमणि से मेरी 
इस दुरवस्था का समाचार बतलाइए । सब प्रकार के लोगों को पुकारतें हुए मेरा कठ 
सूख रहा है; घैय॑ छूट रहा है, प्राण दुखी हो रहे है । हे किन्नरो, हे पुण्यात्माओ, हे 
महात्माओं, हे तपस्वियो, हे खेचरो, हे ब्रतियों, हे यतियों, हे वन-पक्षियो, हे सिंहो, हे गरर्वों, 
है नरो, हे सुरो, हे नागेंद्रों, आप (सब) मेरी रक्षा कीजिए ।' 

भूसुता विविध प्रकार से व्यर्थ ही शोक करने लगी । पृथ्वी भी काँप उठी, गौतमी 
(गोदावरी) ने अपनी गति रोक दी । समस्त प्राणी शोकाकुल हुए | मुनि लोग यह अन्याय है, 
अन्याय है, कहते हुए, कपट सनन्‍्यासी रावण का स्वभाव जानकर, परिताप करने लगे 

और शोकाश्नु बहाने लगे । मृग उनका (भआरत्तिनाद) सुनते हुए चरना मूल गये, पक्षी कन्‍्दन 

करन लगे, पवन की गति मद पड गई; वृक्ष सूखने लगे, सारा आकाश क्षुब्ध हो उठा, 
धर्म-देवता यह सोचकर कि अब मेरी रक्षा कौन करेगा, दु खी हुए, वन-देवता शोक-सतप्त हुए, 
साधुजन जानकी को देख रोने लगे । 


२१. जठायु और रावण का युद्ध 
उस समय वरुण का पुत्र, पक्षिराज तथा महान्‌ साहसी जटायु ने एक पहाड़ पर से 


आएएयकोड ९५9 


हाय रघुराम' का आत्तनाद स्पष्ट रूप से सना । यह आत्तंघ्वनि सुनकर उसने भय तथा 
आइचयंचकित हो, सिर उठाकर सारे आकाञ तथा सभी दिशात में अपनी दृष्टि दौडाई 
ओऔर मन-ही-मन कहने लगा--दया-रहिेत हो रावण उस राम की पत्नी को अपने यहाँ 
ले जा रहा हैँ । उस दिन जैव से मुझे राम ने देखा, तब से वे मेरे साथ घनिष्ठ मित्रता 
का व्यवहार कर रहें है । अब इस राक्षस के दुष्कर्मों को सहना ठीक नहीं हैं । अपना 
शोयं दिखाकर में अकेले ही इस राक्षस का वध करूँगा और वैदेही को छुडा लाऊँंगा या 


चर 


सूर्यवशाधिप राघव के लिए युद्ध में अपने प्राण छोड दूँगा ।' 


ऐसा निश्चय करके, उसने अपने सुदृढ शरीर को वढाकर आकाश की तरफ ऐसे 
उछल पडा, जैसे वज्च के वार का सहन न कर सकने के कारण महापर्वत आकाश में उड 
रहा हो । (उसके उडते समय) पव॑त-श्वग (उसके पैरो का टक्कर खाने से) चूस्चूर 
हो गये । उसने अपने मूँह में रखे हुए मास-खडो को पृथ्वी पर थूक दिया | भयकर रूप 
से उसके नखो में फंसे हुए करि, सिंह, शरभ आदि मृगो के सिर (उसके पैरो से छूटकर 
पृथ्वी पर) लुढकने लगे । उसकी बलिप्ठ चोच की दीप्ति तथा पखो की आमा (चारो 
ओर) विकी्ण होने लगी । अत्यधिक कोघ से उसकी माँखें प्रचड दीखने लगी, पखो के 
द्वारा उत्पन्न पवन से परव॑ंत-शिखरो पर रहनेवालें वृक्ष टूटकर दिशाओ को भरने लगे । 
वह रावण की ओर इस प्रकार आने लगा, मानो रावण के (मन के) तम को दूर करने 
के लिए आनेवाला भध्याह्ल का सूर्य हो, या वली रावण-रूपी सूर्य को निगलने के लिए 
बडे भयकर रूप से आनेवाला राहु हो, या रावण-रूपी राहु को निग्लने के लिए अत्यधिक 
वेग से आनेवाला ताक्ष्य (एक मुनि) हो । जठायु कहने लगा--हें कुटिल राक्षस, ठहर, 
ठहर, आगे मत बढ़ । तू रघुराम नृपचद्र की देवी को कहाँ लिये जा रहा हूँ ? अब कहां 
ले जा सकेगा ? कहाँ जायगा ”? किस ओर जायगा ? यदि तू जाना भी चाहे, तो जाने 
न दूँगा, तुझे में मारूँगा, काटूगा, खड-खड कर दूँगा, दड दूगा और पोली लकडी के समान 
(तेरे) सिरो को काट दूंगा । इसके पच्चात्‌ वह सीता को देखकर कहने लगा--हे देवी, 
दुखी मत होइए । इस भयकर राक्षस का वध करके में आपको इसके हाथो से छुडाऊंगा ॥' 


भयकर निदाघ के मध्य वादलो का गर्जन जैसे मयूरो को प्रसन्नता पहुँचाता हैं, 
वैसे ही इन वचनों से सीता को कुछ सात्वना मिली । कुम्हलाये हुए मुँह से, अत्यत दु ख 
से कुढती हुई सीता वोली--हे जटायु ! हे भाई ! देखो यह सुरवेरी राम-लक्ष्मण को वचित 
करके घमड से मुझे उठाकर ले जा रहा है । इन वातो को सुनकर अरुणनदन (गझड) 
क्रोघोन्मत्त होकर रथ के आगे आकर खडा हो गया और प्रलय-काल के बादलों के निर्घोष 
की भाँति कठोर वचनो से वार-वार दशकठ को डाटते हुए अत्यधिक साहस के साथ कहने 
लगा--हे रावण, तू परम पवित्र ब्रह्मा का पोता हैं, पुण्यात्मा विश्ववसु का पूत्र हैँ, 
कुबेर का भाई है और दानवश्रेष्ठ है, क्‍या तेरे लिये ऐसा काम उचित है ? तू जगदेंकपति 
नूप राम की पत्नी को बलात्‌ लिये जा रहा है, यह उचित नहीं है । तुझे तो राम 
से लडकर उसके पश्चात्‌ उनकी स्त्री को लाना चाहिए था । उनको घोखा देकर, उनकी 
स्त्री को इस प्रकार लाया हैँ | क्या यह कोई झूरता हैँ ? बरे, राम की क्रोघार्न तुर्े 


रद्द एंगनत्थ एएयायप 


तेरे ववुजनों तथा तेरी-लका को भस्मीभूत कर देंगी । जान-वूककर क्यो विष पी रहा है ? 
क्रीघी सं के ऊपर पैर क्‍यों रखता हैं ”? साठ सहस्त वर्ष की आयवाले मे जानता है 
या नहीं ? में जटायू हैँ । इस प्रृण्य साध्वी को मुझे सौपकर चला जा, अन्यथा में तेरा वध 
कर दूँगा, अपनी चोच से तेरे बतुष के टुकड़ें-टुकडे कर दूँगा और वर्म तथा मर्म को 
भेदकर तेरे प्राण ले लूंगा और साथ ही जानकी को मुक्त करूँगा ।' 
तब उस भयंकर राक्षसश्रेष्ठ ने अपना रथ रोका, क्रोबोन्मत्त हो घतुष की टकार की 
ओर लक्ष्य साधकर जठायू पर घोर अस्त्र चलाये । किन्तु उस चीर विहग ने रुष्ट 
होकर उसके ढाणों को तोड़ दिया और अपने पखो से उसके वक्ष पर आघात किया, ललाट 
पुर चोच मारी, कंबो पर पद-शहार किया और अपने तेज नखो से उसे अत्यधिक पीड़ा 
प्रहुंचाई । तव उस राक्षसकुलेब्बर ने उस खगराज के पखो का लक्ष्य करके दस उद्र 
वाण चलाबे । जटायू ने अपनी चोच से रावण के घतुष के-टुकड़े-टुकडें कर दिये, उसकी 
ध्वजाओीं को नीचे गिराकर उसके मुकुट को भी पृथ्वी पर गिरा दिया, सारथी से जूककर उसका 
प्रेट -चीर दिया, जागे वढकर उस राक्षस के रथ के. अच्चो को मार डाला और अत्यधिक 
क्रोध से उसके रथ को नप्ट-अप्ट कर दिया । तब राक्षसराज कपित होकर पृथ्वी पर 
गिरकर फिर उठा और घरणिजा (सीता) को उठाये हुए अपनी माया की शक्ति से आकाश 
और - भी ऊँचा उड़ गया । उसे जाते हुए देखकर जटाय ने उसको रोका और 
आकाञ-मार्ग में महान्‌ वेंग से उस पर आक्रमण किया और. कहने लगा--हे प्रापी, तू 
लुक-छिपकर भले ही किसी भी लोक में चला जा, में तुझे तिनके की तरह पकड़कर तरा 
वध कर दूंगा । - - 

- तब अत्यंत रोप से दैत्वराज ने अति भयकर मुद्रगर उस पर फेंका | जठायु थे 
उसे अपनी चोच से तोड़ दिया और उसके सिर पर चलते हुए उसे कुचल-सा दिया और 
उसक सर के कंशो को चुनने लगा । रावण ने क्रोध से, विना भय या सकोच के, उस पक्षी राज 
को दृढता से पकड़कर नीचे अपने सामने रखा, और अपनी भयकर आवित को प्रकट करते हुए 
अपनी मुप्टियों के प्रहार से उसे पीड़ित करने लगा । दनुजेन्द्र और विहयेंन्र के वीच 
के उस युद्ध को देख देवता आवब्चर्यचकित हुए | तव रावण अपने अद्वितीय पराक्रम को 
प्रकट करते हुए अपने अति भयकर खड्ग को खीचकर जटठायु के पंखो और पैरों को 
काट दिया । तुरत खगपति घरती पर गिर पड़ा । 

उसे इस प्रकार गिरते देख वैदेही दु खी हो किसी वृक्ष -के नीचे खडी होकर राम का 
नाम ले-लेकर विलाप करने लगी | रावण उस परम पतित्नता को उठाकर बडे हर्ष से 
आकाञय के मार्ग से बत्गत जीघ्र जाने लगा | ब्रह्मादि देवता तथा मुनि आपस में यह कह- 
कर ह्षित होने लगे कि अब दशकठ अवब्य ही राम के हाथों मारा जायगा और हमारे 

मनोरयय सफल होगे ॥ * 


कप 


- आकाअ-मार्ग से जब रावण अत्यधिक वेग से जाने लगा, तव सीता के चरण का 
नूपुर इस प्रकार पृथ्व्री पर गिरा, मानो सुख्ेरी के लिए उत्पात की सूचना देवनेवाली 
उल्का हो । उस रुमर्णी के कुचों पर विहार करनेवाले हार दृटकर इस प्रकार जहाँ-सहाँ 


77 झरएेयकॉडि - (22६ 


पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो जाक्नवीं की जल-धारा हो । सीता हाहाकार करती हुई मन- 
ही-मन कुढती जाती थी । ऋष्यमूक पर्वत पर सीता ने पाँच बलिष्ठ वानरों को देखा, तो 
तुरत अपने वस्त्र का थोडा सा भाग फाडा, उसमें अपने आभूषणों को बाँधा और सोचने 
लगी कि कमस्से-केम ये मेरे आभूषण रास भूपाल को मेरे हरण का समाचार देंगे, तो 
राम के द्वारा दशकठ का वध शीघ्र होगा । इस प्रकार सोचकर उन्होंने उस पोटली को 
उनके बीच गिरा दिया । उन (वानरो) ने उस पोटली को तुरत छिपा दिया । 

दनुजाधिपति (यह सोचकर) भय से व्याकुल हो रहा था कि दशरथात्मज उसका 
पीछा करेंगे । इसलिए वह पीछे की ओर देखते हुए, भय-विह्लल होते हुए, शीघ्र ही समुद्र 
पार कर गया और लका में जा पहुँचा । उस समय कितने ही मृत््युसचक अपशक्रुन दिखाई 
पडने . लगे । वह लका पहुँचकर अनुपम तथा विविध भोगो का आगार अपने महल में गया 
ओर बडे गर्व के साथ जानकी को अपनी सारी सपत्ति दिखाई । 


२२. जानकी को अशज्ञोक-वन में रखना ु 

तत्पश्चात्‌ रावण ने बडें_ हर्ष से सीता से कहां--हे कमललोचनी, ये मेरे भवन हे , 
यह मेरा घन है, ये मेरे तुरग है, ये मेरे गज है । यह वें मेरे दिव्य आभूषण है, 
जिन्हें मेने सभी देवताओं को परास्त करके प्राप्त किया था, यह पृुष्पक-विमान है, जिसे 
मेने कुबेर को जीतकर प्राप्त किया था, ये चारण, अमर, सिंद्ध तथा साधको की पत्नियाँ हैं, 
जो अलग-अलग मेरी सेवा करती रहती हे । थे स्त्रियाँ वे हे, जो घमडी होकर मेरी 
बात स्वीकार नहीं करने के कारण कारागार में तड़प रही हैँ । वह देखो, नाट्यशाला है , 
वह क्रीडा-वन है, ये चन्रशालाएँ है । तुम इन सब की «स्वामिनी होकर अनुपम गति 
से समस्त वैभवों का उपभोग करो ।' 

तब सीता एक तुण-खड को हाथ में लेकर, रावण की उपेक्षा करती हुई कहने 
लगी--भरे मूर्ख, तुम्हारा यह पाप तुम्हें यो ही नहीं छोडेगा । वह भयकर अग्नि बनकर 
तुम्हें दगध कर देगा । तुम और तुम्हारे बधु-बाधव अब बहुत दिनो तक ज़ीवित नहीं 
रह सकेंगे । अवश्य ही नप्ट हो जायेंगे । यह सत्य है । जबतक राम की वाणारिति की राशि 
में गिरकर तुम्हारा शरीर जल नहीं जायगा, तबतक तुम्हारे ये पाप कंसे कटेंगे ?' फिर 
सीता बार-बार परिताप करती हुई बोली--तुमने आज मुझे ऐसे केलुषित वाक्य सुनाये, 
जिनसे मेरा सारा महत्त्व जाता रहा । मेरे गव॑ ने मुझके ऐसा कर दिया, में अपने भाग्य 
को कंसे रोऊँ ?” यो कहती हुई वह उच्च स्वर में रुदत करने लगी । (यह देखकर) 
राक्षस-वल्लभ मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ और निजटा आदि स्त्रियों को वुलाकर उन्हें 
सीता को दिखाते हुए कहा--तुम लोग बर्डी सावधानी से इसकी रक्षा करती रहो भौर 
मुझसे विवाह कर लेने का उपदेश देती रहो । उचित यत्न के साथ इस रमणी को अशोक- 
वैन में रखो ।” यो कहकर उसने उन्हें मेज दिया और काम-पीडित भन से व्याकुल रहने लगा। 

२३. श्रीराम का दुःख 

माया-मुग का वध करने के पद्चात्‌ रास ने और एक हिरत का वध किया और 

उसके मास, तथा चर्म को लेकर बडे हुए से लौट रहे थे | सियारो का चिल्लाना सुनकर, 


१६० रंगनाथ ए/ग्रीएयी 


-(मन-ही-मन) वे व्याकुल होते हुए बडी तेजी के साथ निद्वास भरते हुए आ रहे थे कि 
वन के मध्य में उन्होनें लक्ष्मण को देखा । लक्ष्मण को देखते ही वे अत्यत भय-विह्नल 
हुए और बोले---हाय लक्ष्मण, अत्यत धीर तथा विवेकी होकर भी मेरी आज्ञा के विना, 
सीता को वन में अकेली छोडकर तुम कैसे आये ? तुम इस तरह क्यो आये ? क्या, तुम 
नहीं जानते कि इस पृथ्वी पर रहनेवाले सभी राक्षस हमारे शत्रु हे ? भाई, क्‍या तुम्हें 
वश-मर्यादा, धर्म तथा ग्रुरुजनों की हानि का विचार नही करना चाहिए था ?! 


इन बातो को सुनकर लक्ष्मण अत्यत भयभीत हुए । काँपते हुए उन्होंने हाथ जोडकर 
कहा--हें प्रभो, तिलोकीनाथ, में जानता हूँ कि मेरा इस प्रकार चला आना उचित नही है । 
जिस कुटिल राक्षस ने माया-मृग के रूप में आपको भटकाकर निदान आपके दिव्य 
वाणों की अग्ति-शिखाओ से प्राणत्त्याग किये, उसने मरते समय हाय लक्ष्मण” कहकर 
जात्तंनाद किया । वह आत्तंनाद जब सीताजी के कानो में पडा, तब वे अत्यत भयभीत हुई 
ओर आपकी श्रेष्ठता को सर्वया भुलाकर कहने लगी--भाई लक्ष्मण, क्या वात है ? कुछ 
पता लगाओ । हें सौमित्र, तुम्हारे भाई कभी ऐसा दीन आलाप नहीं करते । तब मेने 
उनसे कहा--माताजी, हमारे मन में भय उत्पन्न करने के निमित्त ही क्र राक्षस ने ऐसी 
पुकार मचाई होगी । कहाँ सूर्य-नश के अघीश्वर और कहाँ दीन वचन, माताजी आप 
विचलित मत होइए । तब देवी मुझे अपशब्द सुनाती हुई कोसने लगी और में मन ही मत 
दुखी हुआ और वन-देवताओ के सरक्षण में उन्हें छोड़कर यहाँ चला आया । इसलिए प्रभो, 
आप इसे मेरी त्रुटि न मारते । 

इस प्रकार कहते हुए अश्वुपुरित नयनो से लक्ष्मण ने अपने भाई को प्रणाम किया । 
राम ने अपने अनुज को बड़े स्नेह से उठाया, आँखो से गिरनेवाले अश्ुजल को पोछा, और 
अत्यत दु.खी होते हुए बोले--हे तात, आजन्म पवित्र, सर्वज्ष जनक महाराज की पुत्री होती 
हुई, उस प्रस्यात पुण्यशोला सीता का ऐसे वचन कहना ही सभी विपत्तियो का 
कारण है--ऐसा विचार करके तुम्हें तो वही ठहर जाना चाहिए था । तुम्हारे जैसे व्यक्ति को 
विंचलित नहीं होना चाहिए था ।' 

इस प्रकार, सौमित्र को सात्वना देकर राम ने अपनी आश्रम-भूमि में प्रवेश किया और 
(उसे सर्वेया नि स्‍्तब्व पाकर) बोले--हे लक्ष्मण, यह कंसी वात है कि यह आश्रम सर्वथा 
शून्य दीख रहा है । वन-देवताओ के हर्ष भरे वचनों की ध्वनि सुनाई नहीं पड रही हे ” 
पक्षियों का कलरव नही सुनाई पड़ रहा हैं। मुनिजनो का सचार यहाँ नहीं दीख 
रहा है ? सीता (मेरे स्वागतार्थ) आगे आती नहीं दीख रही है ? मेरा मन अत्यत दीन 
तथा व्याकुल हो रहा है । आज मेरी बाई आँख न जाने क्यो फड़क रही हैं| हाथ, 
इस बन में न जाने हम दोनो कैसा दुख भोगेंगे ?' 

इस प्रकार कहते हुए वे पर्णशाला के पास पहुँचे और दिनकर-रहित दिन-लक्ष्मी के 
समान, निशाकरूविहोन रात्रि के समान, सारिका-रहित पिजडें के समान, कोयल-रहिंत 
आज्-वृक्ष के समान, देखने में विवर्ण तथा कातिहीन दीखनेवाले उस पर्णशाला को देखकर 
वे मन-ही-मन बहुत अघीर हुए । व्याकुलता के कारण उनका मुख विवर्ण हो गया, 


अएएयकाड ९६९ 


आँखो से अश्वु ऐसे बहने लगे, मानों शोक-रस ही प्रवाहित हो रहा हैं । वे अपने सूखे 
ओझो को आदे करते हुए भग्न हृदय से अपने अनुज को देखकर बोले--हे लक्ष्मण मेने 
अच्छी तरह देख लिया, पर्णशाला में कही भी भूमिसुता का पता नहीं हैँ । कदाचित्‌ 
पुष्प-चयन के लिए गई हो अथवा हमें ढूंढती हुई किसी दूसरे मार्ग से चली गई हो । 
पता नहीं, सरोवर में जल-क्रीडा करने गई हो या अत्यत भयभीत हो कही सतप्त हो रही हो, 
निकट पहुँचनेवाले वाधो के भय से कही छिप गई हो अथवा क्रोध से कही अकंली 
चली गई हो । मुझे तो कुछ भी मालूम नहीं हो रहा हैं कि वह कहाँ गई, जो भी 
हो यहाँ तो नही है ।' 


इस प्रकार तक॑-वित्क करते हुए उन्होनें पर्णशाला के भीतर प्रवेश करके सब स्थानों 
में ढूंढा । किन्तु कही भी जानकी को न पाकर उनका मन अत्यधिक सतप्त होने लगा, 
शरीर निरचेष्ट हो गया, ज्ञान-रूपी रवि-श्योक-समुद्र में अस्त होने से भ्राति-रूपी अधकार ने 
व्याप्त होकर उनके अतरग तथा नेत्रों को ढक लिया, घैयें को आवृत कर लिया और 
अभिमान को घेर लिया । वें व्याकुल होकर भूमि पर लोठ गये । उन्होनें यह भी नही 
सोचा कि मे पहले ही सीता के (वनवास) दुख से चिंतित हूँ, अब मुझे यह दुख भी 
सहना पडा । यह दुख मुझे कैसे प्राप्त हुआ ? कैसे में इस दुख को पार करूँगा ? हम 
क्यो इस वन में आये ? अब में इससे (लक्ष्मण से) क्या वात कर सकता हूँ ? में इसका 
अग्रज है, यह मेरा अनुज हैं, हम दोनो इस दुख का भार कैसे वहन करेंगे ?' 
इन बातो का विचार किये विना वे मन-ही-मन क्षुव्ध होकर मदन-पीडित उन्मत्त की 
तरह चारो ओर निरुद्देश्य दृष्टि से देखते हुए, अपने महत्त्व को भी भूलकर प्रलाप करने लगे। 
वे कभी चिल्लाते--हे तनुमध्ये (पतली कमरवाली ) । इतनी देर तक तुम कहाँ हो ? 
शीघ्र आओ । फिर ऐसी चेष्टाएँ करते, मानो वे आ गई हो और उनका आलिंगन 
कर रहे हो । तुरन्त दुखी होते, फिर धीरे-घीरे उनको सात्वना देते । थोडी देर में जब 
किचित्‌ चेतना लौट आती तो कहते--हाय सौमित्र, अवनिसुता न जाने .कहाँ चली गई ? 
क्या हो गया उसे, उसके पद-चिज्नो के अनुसार चलकर दूढने पर भी वह दिखाई नहीं 
देती, वह पर्णशाला में भी नहीं है । वह कमललोचनी न जाने किस दिशा में गई है ? 
क्या यह दण्डकवन नही है ? क्या यह (हमारा) निवास-स्थान नहीं है ” क्‍या यह (हमारी) 
पर्णंशाला नहीं है ? क्‍या में राम नहीं हूँ ” तब तो उस चचलाक्षी से विछुडकर मेरे प्राण 
अभी क्यो टिके हुए है ? उसके वियोग-दुख से यदि में प्राणो का मोह त्यागकर मर जाऊं, 
तो महाराज दशरथ तो यही सोचेंगे कि यह कैसा पृत्र है, जो ब्रत को पूर्ण किये विना ही 
चला आया है ? ऐसी दशा में क्‍या वे मेरा आदर करेंगे ? ऐसा नही करके यदि में 
न्रत को पूर्ण ' करके, राज्य करने के लिए राजधानी को लौठ जाऊँ और मिथिलेश्वर वहाँ 
जायें तो, उन्हें देखकर क्या मे लज्जित नही होऊँगा ? इसलिए तुम मुझे इस कानन में 
ही छोडकर राजधानी को लौट जाओ और भरत से कहो कि वह अपनी इच्छा से समस्त 
पृथ्वी का शासन करे और माता कैकेयी, सुमित्रा तथा कौशल्या को जानकी के खो जाने 
का तथा मेरा समाचार कहो । मेरी वात मानों ।' 

२६ 


श्र रंगनशथ रया/यरी 


इस प्रकार कहते हुए राघव ने अपनी आँखें ऐसे बंद कर ली, मानों वे इस समाचार 
को मन से वाहर जाने नहीं देना चाहते थे कि सीता पर्णशाला से अदृश्य हो गई है । 


तब लक्ष्मण सारी स्थिति देखकर अत्यधिक शोक से विलाप करने लगें--में अब 
किस माता की सेवा करूँगा ? किस माता की आज्ञा का पालन करूँगा “? किसे में अपनी 
माता के समान मानूगा ? सूर्यवज-तिलक के शोक को कैसे झ्ान्त करूँगा ? सभी माताओं 
तंथा भाइयो के लिए, इनके साथ का जीवन ही जीवन है (ये यदि न रहें, तो दूसरे कैसे 
रह सकेंगे) । हाय ! अब तो मनुवश काही अत हो गया ।' 


इतने में राम की चेतना लौट आई । उन्होने उमडते हुए शोक से दण्डकवन के 
चारो ओर एक वार दृष्टि दौड़ाई, और आाँखो में आँसू भर लिये । सीता का स्मरण 
करते ही उनका दु.ख दुगुना हो गया, घैय के छूट जाने से मन और भी शोकाकुल हुआ। 
वे बोले-- हाय सीता, तुम चली गईं । तुम अपने शरीर को मेरे इस शरीर से अलग 
करके इसे यही छोडकर चली गईं ? सुर तथा असुरो के लिए पूजनीय है, इसका भी 
विचार नही करके मेने तुम्हारे लिए शिव-बनुप को भग कर दिया था । परशुराम ब्राह्मण है 
इसका भी विचार नहीं करके मेने उन्हें शत्रु समफकर उन्तका गवे भग किया था । 
हे कमलाक्षी, तुम्हारे लिए मेनें इन दोनों निदाओ को अपने ऊपर ले लिया है । अत में 
क्र दैव ने तुम्हें मुकसे अलग किया है। में तो कंवल निंदा प्राप्त करने के लिए 
रह गया । तुम्हारे मन की अभिलापा देखकर, उसे पूर्ण करके तुम्हें आनन्दित करने के लिए 
में गया, उस माया-मृग का वध करके उसका चर्म लाया हूँ । अब में प्रेम से वह (चर्म) 
किसको दूँ ? सव सुखो को भुलाकर, मेरा विश्वास करके मेरे साथ वन में भाई हुई 
तुम्हारी रक्षा में नही कर सका । तुम्हारे जाने का मार्ग जानकर, तुमसे शीघ्र आकर मिल 
न सका । समस्त जगत्‌ का ज्ञासन करने की महान्‌ शक्ति रखनेवाले के समान शर-वाप 
धारण करके इस घोर वन में रहने आया और मूर्ख मति से अपने पूर्वजों की महत्ता को 
भी भुलाकर, आज तुम्हें खो वैठा हूँ | हें मृगलोचनी, तुमसे विछुडकर में इस शरीर में 
अपने प्राण कैसे रोक सकूंगा ? हे भूमिसुते | इस भूमि को छोडकर में और किस स्थान 
पर इस शरीर को घारण कर सकूँगा ? हे सुदरी, तुम्हारी विरहाग्नि तुम्हारे सौंदर्य-सागर 
में डूबे विना वुकेगी नहीं । तुम्हारे शरीर-रूपी नौका के विना, इस शोकनसमूद्र को करे 
तर सकगा ? तुम्हारे कुचों की जाड के विना में कामदेव की शर-वृष्टि को कैसे सह सकूँगा ” 
भगवान्‌ मुझे उस तरफ ले गया और तुम्हें इस तरफ । हम दोनो को अलग करवा 
भगवान्‌ के लिए क्‍या असभव हूँ ? हें कोमलागी, तुम्हें उठाकर ले जाते समय; तुमने 
क्या कहकर विलाप किया था ? तुमने मुझे क्या कहा था ? तुम किस देश में चली गई हो * 
कहाँ रहती हो ? कैसा दुख भोग रही हो ? क्‍या कर रही हो ? कौन तुम्हें ले 
गया है ? किस मार्ग से गई हो ? हाय, हमारी कैसी दशा हो गई है | तुम्हारी जैसी 
निपुणा, तुम्हारी जैसी मुग्ा, तुम्हारी जैसी सौंदर्य-नेधि कहाँ है ? तुम्हारे साथ रहते 
एक दिन जी भरकर सुख भोगनें का सौभाग्य (जब) मिलेगा क्या ? हे जलजनयनी, 
तुम्हारे साथ रहने पर में यही अनुभव करता था कि साक्तपुरी में ही रह रहा हूं । 


अरणयकाड ९4३ 


हें पिकवयनी, तुम्हारे संग रहने पर में अपने को स्वर्ण-महलो में रहनेवाले के समान ही 
समभता था । हे सुदरी, में तुम्हारे सहवास में अपने को समस्त भोगों को प्राप्त करता 
हुआ-सा अनुभव करता था । तुम्हारे साथ रहते हुए सब प्रकार के सुख-भोगो को भोगता 
हुआ-सा मानता था । आज ही मुझे ज्ञात हो रहा है कि यह महाकानन है, यह पर्ण- 
शाला है, यह तपस्या है, यह दु खमय जीवन है । हे राजकुमारी, हे मृगनयनी, हे कमलाक्षो, 
हे लतागी, मे कंसे सतप्त हो रहा हूँ । फिर भी तुम सहानुभूति का एक हाब्द भी नहीं 
कहती हो ? आज दैव ने तुम्हारे मद गमन की शोभा हसो को, ललित चरणों की काति- 
प्रवालो को, उन्नत कुचों की शोभा चक्रवालो को, करो का अरुण राग पद्मो को, 
तन की कान्ति नये जलद की बिजली को, आँखों का वैभव मछलियो को, 
शीतल मुख की शोभा चद्र को, उज्ज्वल हँसी चद्विका को, मधुर भाषण तोते को, 
केशो की कान्ति भ्रधरों को, कटि की कृशता आकाश को, देकर तुम्हें निगल लिया है । 
है वामलोचनी ! हे पद्मगधी ! हे कमलमुखी ! हे सीते !/” कहते हुए दु ख-विवश हो 
राम भूपाल अत्यधिक व्याकुल हुए । उसके पश्चात्‌ अत्यत दीन होकर वे अपने अनुज को 
देखकर बोले--हे लक्ष्मण, वह इदीवराक्षी न जाने किस ओर गई हैं । क्‍या हम उसे 
खोजते हुए चलें ? वह इन लता-समूहो में न जाने कहाँ लीन हो गई है, क्या हम उसे 
पुकारें ? वह पृथ्वी की कुमारी न जाने किन पेडो की आड में छिप गई है, क्‍या हम 
चलकर देखें ”? वह शुक- जुवाणी न जाने किन सरोवरो में (स्नान करने) गई है, क्‍या 
हम उसका पता लगाने जायें ?” इस प्रकार वार-बार अत्यत दीनालाप करते हुए, 
मन-ही-मन खिन्न होते हुए वे असह्य वेदना से पीडित होने लगे । 

(तत्पशचात्‌) वे गौतमी के किनारे पहुँचे और उसे सबोधित करके कहने लगे-- 
है लोकपावनी, हें लोकमाता, लोकपावनी सीता का पता क्‍या आप जानती है ? हे लोक- 
वधु, है कर्मसाक्षी (सूर्य), क्या आप जानते है कि सीता कहाँ है ? हे जगत्पराण, हे सब 
स्थानों में सचार करनेवाले (पवन) क्या आप भी नही जानते कि सीता कहाँ है ? हे 
लताकुमारी, क्‍या तुम नहीं जानती कि वह लतागी कहाँ हैं ” हे जलज, क्‍या तुमने उस 
जलजातगधी को नहीं देखा ? हे सिंह, क्‍या, तुमने उस सिहमध्या (क्षीण कटिवाली) को 
नही देखा ? हे गजराज, क्‍या तुमने उस गजगामिनी को नही देखा ? हें हरिण, क्या 
तुमने उस हरिणाक्षी को नहीं देखा ? हें पिक, क्या तुमने उस पिकवयनी को नही देखा ? 
हे भ्रमर, क्‍या तुमने उस नीलवेणी को नहीं देखा ? हे तिलकवृक्ष, क्या तुमने उस तिलक 
से अलक्ृत मुखवाली को नही देखा ?” इस प्रकार भ्रात हो, राघव जहाँ-तहाँ जाकर सीता 
को दूढने लगें, पर कही भी बैदेही का पता न मिलने से, विरहाकुल तथा विवश होकर 
रह गये । 

२४. लक्ष्मण का राम को सांत्वना देना 

ऐसे दुखी होनेवाले अपने भाई को देखकर लक्ष्मण ने उनसे कहा-- है भाई, आप 
समस्त लोकों के लिए आराध्य हे, उदात्त चित्तवाले है, महान्‌ वलथाली है, अपनी स्त्री 
के लिए इस प्रकार आप शोक करें, यह उचित नहीं । हे सूर्यवश्ञाधिप, इस प्रकार वा मोह 


न 


(६9 रंगनाथ एशयायण 


तथा ग्योक आपको क्यो ? बह संसार तो तमोंगुण से आवृत हैं । आप यदि धवुष अपने 
हाथ में लें, तो देवता भी आपको देखकर दूर जायेंगे | हे अखिलेग, आप अद्वितीय जविति- 
यानी हे । मेरे जैसा व्यवित आपका सेवक है । आपके लिए असावध्य क्या हो सकता है ? 
जाप अपने भह्त्व का विचार क्‍यों नहीं करते ?” 

तव राम ने अपने आपको संभाल, गोक तज दिया और अपने भाई को देखकर 
बोले--अवब में जानकी का वियोग किसी भी प्रकार सहन नहीं कर सकता । में अपने 
दुर्वार वाणों के सतत प्रयोग से सारी पृथ्वी को चीरकर, पातालवासियो को पीडित करके, 
चद्रमुखी नीता को प्राप्त कहूँगा या सप्त समुद्रो को आलोडित करके भूवरों को चूर- 
चूर करके, दिग्गजों के कुम-स्वथलो को फाइकर भूमिसुता को प्राप्त करूँगा । या सभी दिकू- 
पालों के हृदवों को चीरकर, सूर्यविम्व को तोडकर, नक्षत्रों को चूरूचूर करके सारी 
पृथ्वी को अधकार में डुबोकर अपनी स्त्री को प्राप्त कलूँगा- या अपने दिव्यास्त्रों का 
प्रयोग करके सभी राक्षसों को भत्म कर दूँगा, पृथ्वी को राक्षस-रहित कर दूंगा और 
को साथ लेगा (प्राप्त कर लूँगा) । या समस्त ब्रह्मलोंक कों छनकर, आदि ब्रह्मा 
का सहार करके, सभी प्राणियों में भव उत्पन्न करके, अपने पराक्रम से अपनी स्त्री को 
प्राप्त करूँगा | यदि में अपने वाहुवल का प्रदर्शन नहीं करूँ, तो क्या, यो ही सुरगण सीता 
का पता बतायेंगे ? यह देखो, समी भुवनों को कंपाती हुई मेरें वाणो की अग्नि-ज्वाला 
दीप्त हो रही हैँ | लो, सीता को देखो, में अभी सीता को ऐसे प्राप्त करूँगा कि सभी 
देवता मेरी प्रणशसा करने लगेंगे । 

इस प्रकार कहते हुए उनकी भौंहँं ऐसी तन गईं, मानों वे सभी लोकों के लिए 
उत्पात की सूचना दे रही हो । सभी जीवों के साथ समस्त ब्रह्माप्ड को चूर-चूर करनेवाला 
सकर्षण रूप उन्होंने घारण किया और प्रलयकाल के रुद्र की भाँति कऋृद्ध होकर घनुप 
हाथ में ले लिया । तभी सभी जीव भयभीत हुए, सारी पृथ्वी थरवरानें लगी, सभी लोक 
व्याकुल हुए, आकाग्म हिलने लगा, ब्रह्माण्ड मानों टूटने लगा, ब्रह्मा का मत्र मिट गया, 
रवि पव-नश्नप्ट हो गया; नक्षत्र टूटने लगें, शिव भी भयभीत हुए और यक्ष, देव तथा 
असर विचलित हुए । 

तव लद्षमण राम के निकट पहुँचकर अत्यधिक भय से, हाथ जोडकर बोलें-- 
हैं प्रभो, आप करणानिधि है; लोक रक्षण-कला में प्रवीण हे । जनकजा के लिए सभी लोको 
वा समूल नाश कर देना, क्या जापके लिए उचित हैं ? एक-एक वन में, सभी समुद्रों में, 
जनाकीर्ण नगरों में तथा समस्त देशो में वेदेही को विनता थे डुेडन के उपरान्त 
भी यदि वे नहीं मिली, तव आप अपने क्रोव तथा पराक्रम से उनको प्राप्त कर 
सकते हैं ।' 


इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर राम ने उनकी वातें बडे स्नेह से मान ली, क्रोव 
तजा और घनुप को रुख दिया । उनके पच्चात्‌ अखिलेश राम अपने अनुज के साथ दक्षिण 


दिशा की ओर चल पड़ें | उस समय मार्ग में जहालहाँ सीता की वेणी से गिरे हुए फूल, 
उस ठन्त्री के बल्षोत्रो पर विलसित हारो के रत्न, उनके मणिमय चरण-नूपुर पृथ्वी पद 


अप्स्यकांड ६५ 


पडे हुए देखकर राम अत्यधिक शोक से अभिभूत हुए । उन्होंने विचार करके निश्चय कर 
लिया--हाय, निश्चय ही कोई क्रूर दानव उस कुटिल-कुतला सीता को उठाकर ले गया है । 
यो चिंतित होते हुए वे मार्ग में अन्वेषण करते हुए थोडी दूर आगे बढे । मार्ग में 


जहाँ-तहाँ राक्षत के चरण-चिह्नो को देखते तथा उनका अनुसरण करते हुए वे कुछ दूर 
गये । वहाँ उन सूर्यवशजों ने एक स्थान पर कटे हुए पख, रक्त के कीचड में मृत पड़े 


हुए सारथी, उसपर टूटकर गिरे हुए रथ, रथ के पास कटकर गिरे हुए अश्व, पृथ्वी पर 
विखरे हुए पताका के खंड, उनके सामने ही गिरे हुए धनुष के खड, छितराये हुए अस्त्र- 
शस्त्र देखे । (इन सब वस्तुओं को) लक्ष्मण के दिखाने पर राम विस्मित हुए और सोचने 
लगे कि किन्ही ने यहाँ पर युद्ध के आनन्द का उपभोग किया है । 


२५. जठायु का अग्नि-संस्कार करना 

उक्त योद्धा का पता लगाने के उद्देश्य से रघुराम उस मार्ग में जहाँ-तहाँ ध्यान से देखते 
हुए आगे बढ़े । उस स्थान के निकट ही पश्च॒ और पैर कटे हुए, रक्‍त में डूबे, वजत्र के 
आघात से गिरेहुए मैताक पर्वत की भाँति विवश पडे हुए विहगेनद्र (पक्षिराज) को देखकर 
राम ने कहा--हे लक्ष्मण, देखा तुमने ”? चपलराक्षस सीता को निगलकर, अपना निज 
रूप दिखाने से डरकर पक्षी के रूप में यहाँ पडा हुआ हैं । भय से तडपनेवाले इसका वध 
में कर डालूँगा ।! यो कहते हुए वे घतुष हाथ में लिये उस पक्षी पर आक्रमण करने को 
उद्यत हुए । उन्हें देखकर पक्षिराज ने रक्त का वमन करते हुए, लबी साँस भरते हुए, 
गदूगद कठ से कहा--है. राजन, में आपके पिता का मित्र हूँ, कह्यप ब्रह्म का पीत्र हूँ, 
अरुण का पुत्र हूँ तथा जटायू नामधारी हूँ | में इन घने वन तथा शैल-श्गों पर निवास 
करता हूँ । मेने अपना सारा वृत्तात आपको इसके पहले स्पष्ट रूप से निवेदन कर ही 
दिया था । हे पुण्यात्मा, ऐसे मुझे यह विपत्ति क्यो कर आई, उसका भी विवरण सुन 
लीजिए । आज रावण आपकी देवी को चुराकर लिये जा रहा था, तो मेने उसको रोका 
और अपनी अमित शक्ति के साथ उससे युद्ध करके बुरी तरह घायल होकर पृथ्वी पर पडा हू । 
यह उसका केतु, सूत तथा अइवो से युक्त रथ है । युद्ध में मेरें ढ्वारा ये नष्ट 
हुए हैं । तब क्रोध से वह क्र राक्षस सीता को उठकर आकाशन्मार्ग से चला गया। 
आप तो आये नहीं । (अब) में आपको यह समाचार सुना सका, आपकी शुभ मूृत्ति के 
दर्शन कर सका । में पुण्यवान्‌ हुआ । 

तब राघव का श्योक द्विगण हो उठा । उन्होंने धनुष को फेंक दिया और मूच्छित 
होकर धरती पर गिर पडे । सौमित्र की परिचर्या के उपरान्त उनकी चेतना लौटी, तो 
बोले--हाय, महात्मा जटायु ! मेरे कारण आप पर यह विपत्ति आई है ॥' उन्होंने 
जटायु के शरीर पर हाथ फेरा, और सारा रक्त स्वय पोछा और अपने अनुज को देखकर 
वोले--. लक्ष्मण, इन्होने हमारे लिए रावण का सामना करके इस प्रकार युद्ध किया हूँ । 
ऐसे पुण्यात्मा कहाँ मिल सकते है ? इनके स्वर्ग सिधारने के पहले ही ठुम इनसे पूछ लो 
कि रावण की राजधानी को जाने का क्या मार्ग है, उसकी शक्ति आदि कितनी हूँ । 
पुरन्‍्त लक्ष्मण ने रघुराम के काये में सहायक जटायु स उस सुरवंरी की दाक्ति आदि 


१६६ रंगनाथ एयायर 


के संबब में कई उचित प्रश्न किये | तब जटायु ने कुछ वातें बताई, किन्तु कंठ से फिर 
से रक्त वहने के कारण आगे वोल न सके । तब उन्होने अतुल पुण्यात्मा राम को देखा 
और मन में उनका सतत स्मरण करते हुए बडे आनन्द से मोक्ष-मार्ग को सामने देख 
पुलकित होकर प्राण त्याग दिग्ने । राजकुमार उनकी मृत्यु पर, महाराज दशरथ की मृत्यु 


बक्त 


से भी अधिक दुखी हुए और वेद-विधि से उस पक्षिराज का दाह-संस्कार किया । 


२६. कवंध का वध 


वहाँ से वें दोनो क्रॉचचन की ओर बढ़े और वहाँ नाना लता, वृक्ष, नग तथा 
मृग से भरी एक घाटी में से होकर जाने लगे । वहाँ एक स्थान पर अयोमुखी' ज़ामक 
एक राक्षसी को देखा । उसके कंश पके हुए थे, दाढ़ें लब्री थी, उदर विद्याल था, मुंह 
वहुत वडा था, आँखें उभरी हुई थी और कुच घुटनों तक लटक रहे थे । उसकी चेष्टाएँ 
पागलो की-सी थी । उसने सुदर आकार तथा शुभ लक्षणों से समन्वित लक्ष्मण को देखा, 
तो उनपर आसकत हो गई और उनका हाथ पकड़कर रति-क्रीडा के लिए उनसे आग्रह 
करने लगी । उन्होनें उस राक्षसी को तलवार की सहायता से वही सुख दिया, जो उन्होने 
गूपंगखा को दिया था । 

इसके पब्चात्‌ उन्होंने दुदुभि, पटह तथा तूर्य आदि की ध्वनि से भी अधिक ध्वनि 
अपने आगे सुनी । उसके सव में जानने के लिए दोनों राजकुमार आगे बढे । वहाँ उन्होने 
एक ऐसे राक्षस को देखा, जिसकी वाँहें एक योजन लवी थी । वह अपनी वाँहों को फैला- 
कर उनके बीच फेंसनेवाले किसी भी जतु को पकडकर तुरंत ही नियल जाता था और 
डकार लेता था । उसका सिर वहुत छोटा था और उसका पेट ही उसका मूँह था | इस 
प्रकार का आकारवाला, बहुत से जीव-जतुओं का नाश करनेवाला, देवताओं को कंप्ट 
पहुँचानेवाला मदांव कवंब नामक राक्षस को देखकर राम-लक्ष्मण आशच्चर्यचकित हुए । 
उसने भी अपने दोनों करो से उन दोनों को पकड़ लिया और अपनी ओर खीचने लगा । 
उस समय अपने अग्रज को देखकर लक्ष्मण ने कहा--हे भाई, आप मुझे इस राक्षस का आहार 
बनाकर सीता के अच्वेषण में चले जाइए और उन्हें प्राप्त करके समस्त ससार का शासन 
करने के लिए (अयोध्या) लौट जाइए !! 

लक्ष्मण की वातो पर विचार करते हुए राम उस राक्षस के हाथो के साथ थोडी 
दूर गये । उसके पच्चात्‌ राम तथा उनके भाई दोनो ने खूब सोच-विचार करके अपनी 
म्यानो से खडग खीचे और उन तेज खड्गो से उस राक्षस के दोनो हाथ काट डाले । 

राक्षस का सारा गे चूर-चूर हो गया | वह घरतो पर लोट गया और 
थोड़ी देर के बाद सेमलकर उसने उन लोगों से पूछा कि आप कौन हैँ ? तब लक्ष्मण ने 
श्रीराम का सादा वृत्तान कह सुनाया, तो उसे (अपने पूर्व जन्म का) ज्ञान हो आया और 

वह अपना वृत्तात सुनाने लगा। (उसने कहा)--महाराज, में दनु नामक स्वर्ग का निवासी हूँ । 

एवं महात्मा मुनि के णाप के कारण में ऐसा हो गया हूँ । मेने ब्रह्मा से कामरूपत्व 
(इच्छानुमार रूप बदलने की झक्त) तथा चिरायु प्राप्त की और उस गर्व से ऐसा रूप 
घारण करके सभी सबमभी जनों को दुख देने लगा । इस सिलसिले में स्वृूलशिर नामक 


#€एयकाड ६७ 


मुनि का अपकार करके मेने यह भयकर रूप प्राप्त किया । फिर मेरे प्रार्थना करने पर 
उस मुनि ने कहा कि आपके द्वारा मेरी शाप-मुक्ति होगी | मेनें उस वचन को स्मरण 
रखा और इस रूप को धारण करके इन्द्र को युद्ध के लिए न्योता दिया | उसने अपने 
वज्र के प्रहारसे कठ-सहित मेरे सिर को मेरे पेट में दवा दिया ।” 

तव रामचद्र ने उससे पूछा, हे अनघ ! क्या तुम रावण की जक्ति के वारे में 
जानते हो ?” तव उसने कहा--'में तो जानता हूँ, लेकिन मुनीद्र के श्ञाप के कारण मेरा 
ज्ञान कुठित हो गया [ आप मेरे शरीर को अग्नि में जलाइए, तो उसके पश्चात्‌ में सब 
कुछ आपको सुना सकता हूँ । 

उन्होने अपने धनुष की सहायता से ही उसके शरीर का अग्नि-सस्कार किया । 
तब वह देवता का रूप घारण करके आकाश-मार्ग में एक सुन्दर विमान पर बैठे हुए इस 
प्रकार कहने लगा--हे रघुराम, हे युद्धप्रवीण, हे करुणानिलय, हें गभीर, हे काकुत्स्थ- 
श्रेष्ठ, आपकी करुणा-पूरित दृष्टि के प्रताप से मेने अपनी पूर्व दशा श्राप्त की है । में अव 
आपसे रावण के सवध में स्पष्ट रूप से कहूँगा, सुनिए---रावण कुबेर का भाई है । 
पुलस्त्य ब्रह्मा का प्रिय पोता है । उसने अपनी तपस्या की महिमा से ब्रह्मा को प्रसन्न 
करके श्रेष्ठ वरदान तथा औज्नत्य प्राप्त किया है । उसने दिग्विजय किया हुँ । वह दानवो 
का स्वामी, देवो का शत्रु, दस बडे शिरोवाला, वीस भुजाओवाला, लवण-सागर से परि- 
वृत, लकापुर का राजा है । उसने गे से रजत-पर्वत को भी उखाड़ दिया था । ! इतना 
कहकर उसने वह मार्ग भी बताया जिससे होकर रावण सीता को ले गया था, उस मार्ग 
के चिह्न बताये और रास्ते में पडनेवाली सभी वस्घुओ के नाम बताये । उसने यह भी 
कहा कि पपा के आस-पास श्रेष्ठ ज्ञानी मतग मुनि का आश्रम है, उतकी शिष्या शवरी 
आपका आदर-सत्कार करेगी । उस स्त्री के निवास के पास यदि आप जायें, तो सूर्यपुत्र से 
आपकी मित्रता होगी, जिसकी सहायता से आप जानकी को प्राप्त कर सकेंगे और निदान 
सामाज्य का लाभ भी करेंगे । इस प्रकार कहकर वह स्वर्ग चला गया । 


२७, राम-लक्ष्मण की शबरी से सेंट 

दूसरे दिन मनुवश-तिलंक वहाँ से निकले और पपा सरोवर की पशिन्नंम भाग में 
स्थित तरु-लता-समूह से बविलसित, प्रबल पुण्यो का आवास, शवरी के आश्रम-स्थल में पहुँचे । 
शबवरी उनके स्वागतार्थ' सामने आई और वडी भक्ति के साथ रामचद्र के चरणों 
पर गिरकर साष्टाग प्रणाम किया । उसके पद्चात्‌ वह श्रीरामचद्र की स्तुति यो फरने 
लगी--है दशरथ के वरपुत्र, ताइकाविजयी, कौशिक के यज्ञ के रक्षक, मुनियो के घ्येय, 
ताडका के पुत्रों को दड देनेवाले, परम पवित्र गगानदी को तट पर पैदल चलनेवाले, निर्मल 
पद-रजवालें, अहल्या के उद्धारक, हर के प्रचंड तथा विशाल कोदड को भग करनंवात, 
भयकर भागंव राम का गये तोडनेवाले, अभिराम नामवाले, पितृ-वचन का पालन करने- 
वाले, सत्कौत्तिवाले, विराध के कुकर्मों को रोकनेवाले, सफल मुनित्राता, सैल्वसात्र खर- 
दृषणादि राक्षसो का-शिरच्छेदन करनेवाले, मरणार्थी मारीच का वध करनेवाले, सीता-वियोग- 
जनित मोह से अभिभूत होनेवाले, खगेन्द्र को मोक्ष प्रदान करनेवाले, महान्‌ विक्रम के 

| 


(दे रंग्नशथ एायेाचण 


घाम, अति पुण्यप्रद नामवाले, हें रबुराम, में आाज आपके दर्शच कर सकी । मेरी तपस्या 
जाज सफल हुई । मेने अक्वितीय पुण्यों को प्राप्त किया । हे काकुत्स्थ, मार्य के श्रम से 
आप बहुत क्लात हुए होगे, कही और न जाकर जाज हमारे आश्रम में ठहर जाइए। 
हैं अनघात्म, मेने जपने युदू मतग्र मुनि के ठारा आपका वृत्तात सुना हैं। जाप आदिकेव हें, 
सर्वनिगम-वेद्यध हँ, अत. आपकी स्तुति करता असमव है । यह मतग मुतरीद्र का 
बाश्रम है; तपच्चर्या से परिपूर्ण तथा विश्वामदायक हैं | 

इस प्रकार (उस आश्रम का) महंत्त वताकर उसने वढ़ें प्रेम से वन के कंद, मूल, 
फल ले आकर उन्हें दिये जौर रामने उन फलों को खाया । राम उस रात को वही 
ठहर गये और दूसरे दिन घनी जठा-जूट की कवरी बारण करनेवाली झअवरी को देखकर 
वोले--स्ीता की वियोगाग्नि से में अत्यंत व्याकुल हैँ, अत, एक स्थान पर ठहर नहीं 
पा रहा हूँ; बव मुर्के उस उत्फुल्लककमलमुखी सींता को ढेँडने के निमित्त जाना है। 
बाप कृपया मुर्के वान्ना 


ही] 


तव झवरी अत्यत सतुप्ठ होकर वोली--दनू नामक देवता ने आपको भविष्य में 
करने योग्य सभी विपषयो के सवध में कहा ही हैं | फिर भी मे कहूँगी । हें राजनू, आप 
अवधय ही रावण का वब करेंगे और सीता को प्राप्त करेंगे । इसमें सदेह करने की कोई 
आवध्यक्तता नहीं है । फिर भी जाप अकेले मत जाइए । हे भानुकुलाधिप, यहाँ से आप 
ऋष्यमृक पर्वेत के निकट जाइए । उस पर्वत पर तीढ्ष्ण वृद्धिवालें, सूर्य-पुत्र सुप्रीव नामक 
वानर राजा रहता हैँ । वह अपने अग्रज के हाथो अपना राज्य तथा अपनी स्त्री को खो 
चुका है | वह चोक्षातुर है । उसकी वानर-सेना अनत हैं | इसलिए जाप उसका उपकार 
कीजिए जिससे कि उसके मन में आपके प्रति विच्वास उत्पन्न हो जाय । उसके पश्चात्‌ 
आप उसके साथ लका जाइए और अति शक्तिशाली रावण को युद्ध में मारकर अपने बल- 
विक्रम की छ्याति चारों ओर फैँलाते हुए अपनी स्त्री स्रीता को प्राप्त कीजिए । 

इस प्रकार घवरीं ने उन्हें भविष्य में करने योग्य सभी कार्य बतलाकर अपने गुर 
के वचनों का स्मरण किया और तुरत अन्नि प्रज़्ज्वलित करके उसमें अपना जरीर भस्म कर 
देने के लिए तैयार हो गई । उस समय आकाश्य में इच्ध्रादि देवता मणियो के प्रकाश से 
दें दी नारद, सनक 
सनदन आदि श्रमुच्र मुनीद्र अत्यत हर्षित हुए। तव झबरी ने परमधाम, परमकत्याण- 
गुणसपन्न, पूर्णस्वरूप, जव्यब, जविकार, अच्छिल अतरात्मा, अव्यक्त अखिलेश, आधात-रहित, 
ब्रह्मा से भी स्तुत्य, ससार के रोगों के वैद्य, और रघुकुल-हूपी समुद्र के लिए चंद्र के 
समान झोभित होनेवाले, रघुराम चन्द्र को अपने मन में प्रतिप्ठित करके, बड़ी भक्ति से 
उनकी स्तुति की बौर उस प्रभु के समक्ष ही दामापंण के रूप में अपने शरीर को अग्नि 
में भस्म कर दिया । उसके पश्चात्‌ वह देवताओं के लिए मान्य दिव्य विमान पर आख्ढ 
होकर देवताओं की विविध सेवाओं को प्राप्त करती हुईं बडे हर्ष से देवलोक को चली गई। 


२८, श्रीराम का ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचना 
इस प्रकार झवरी अग्नि-मुख के द्वारा स्वय-सुख को प्राप्त हुई ।॥ यह देखकर रमणीय 


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अर्ट्यकांड ९4६6 


आकारवाले महावलशाली राम-लक्ष्मण उस स्थान को छोडकर आगे बढ़े और उस ऋष्यमृक 
पर्वत के निकट पहुँच गये, जो सतत आलोकमय, तथा श्रेप्ठसपन्न मुनियों का निवास था । 

उस पर्वत के भरने ऐसे दीख रहे थे, मानों त्रिलोकीनाथ के आगमन के कारण 
आनद से उमडकर, वह पर्वत आनदाश्रु वहा रहा हो । उस पर्वत की तराइयो में अत्यधिक 
सख्या में देदीप्यमान चंद्रकात मणियो की काति ऐसी दीख रही थी, मानों मेरु, मदर तथा 
हिमाचलो का उपहास करनेवाली उस पर्वत की हँसी हो । उस पर्वत की ऊँची चोटियों 
पर चमकनेवाले नक्षत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो ब्रह्मा ने इस पृथ्वी के पर्वत- 
राज्य का अभिषेक करके उसके सिर पर मत्राक्षत छीट दिये हो । 


उस पर्वत पर उज्ज्वल रूप से दीप्त होनेवाली सूर्यकात मणियो की दीप्ति ऐसी 
दीख रही थी, मानो उस पर्वत की शरण में आये हुए मसुग्रीव पर अत्याचार करनेवाले वालि 
पर क्रुद्ध होकर वह अपने प्रताप की अग्नि दिखा रही हो । उस पर्वत पर विचरण करनेवाले 
दतो से युक्त मत्त गज ऐसी शोभा दे रहे थे, मानो नील मेंघ उस पर्वेत पर विचरण 
करते हुए अपनी विजलियों को चमका रहे हो । उस पर्वत के शिखर के निकट ही बहने- 
वाली आकाश-गगा, (मन्मथवैरी) शिव के जठा-जूटो पर शोभायमान गगा के समान थी, 
उसके आस-पास क्रीडा करनेवाले हसो की पवित शिव का शिरोभूषण चद्र के समान थी। 
उस पवेत पर रहनेवाले अत्यधिक श्ग, वृक्ष तथा पललव-समूह शिव के बिखरे जटा-जूट के 
समान सुशोभित थे और वह पर्वत सिद्धों की सेवाएँ प्राप्त करते रहनेवाले शिव के सदृश 
ही दीख रहा था । उस पर्वत पर रहनेवाले कल्प-ब्॒क्ष, कामधेनुएँ, देव-कन्याएँ, विविध 
ओऔषधियाँ, चितामणि जैसी श्रेष्ठ मणियो का समूह, कभी नप्ट न होनेवाली निधियाँ और 
सतान-वृक्ष (एक प्रकार का कल्प-्रृक्ष) आदि ऐसे दीख रहे थे, मानो इद्रादि देवता, समुद्र- 
मथन-« से प्राप्त वस्तुओं को (उनके वितरण के समय इद्रादि देवताओं के बीच भगडा 
उत्पन्न होने के कारण लाकर यहाँ पर रख दिया हो), या अमृत-पान से वेसुध होकर 
भूल से यही छोड दिया हो, या योग्य स्थान होने के कारण उन्हें यहाँ छिपा रखा हो । 

इस पर्वत को देखकर राघव अत्यत विस्मित हुए और उसकी प्रशसा करने लगे । 
अपने अनुज की अकलक भक्ति-युक्त सेवा प्राप्त करते हुए वे उस शैल के निकवठवर्त्ती 
पपा सरोवर के पास पहुँचे और उस सरोवर में नियमानुसार स्नान किया । उसके पश्चात्‌ 
वे उस सरोवर के चारों ओर की शोभा का अवलोकन करके जत्यत मुख्ब-्से हो गये । 
अपनी क्लान्ति मिटाने के निमित्त वें एक आम के वृक्ष की छाया में बैठे, तो लक्ष्मण उनका 
शीतलोपचार करने प्रवृत्त हुए । 


कुछ समय के पश्चात्‌ राघव ने उस आम के वृक्ष को ध्यान से देखा और लक्ष्मण 
से बोले--हे अनुज, जबसे हमने बन के लिए प्रस्थान किया, तबसे .कितने ही ऊँचे पर्वत 
और पुण्य नदियाँ देखी, किन्तु हमने इस वृक्ष के जोड का वृक्ष कही नहीं देखा । कदाचित्‌ 
सुरपति आदि देवताओ ने मिलकर इस दृक्ष का निर्माण किया हो, ब्रह्मा ने स्वय प्राण 
देकर इसे यहाँ पर ग्रतिप्ठित किया हो, या रविसुत (सुग्रीव) की तपस्या से संतुप्ट होकर 
ब्रह्मा ने इस वक्ष को यहाँ उत्पन्न किया हो, या अमृत को प्राप्त करने के बाद सुरो ने सू्ये- 
२२ 


में 
के 


8७० रंग्नाथ ए्पायण 


पुत्र का पक्ष लेकर अमृत से सीचकर इस वृक्ष को वद्धित किया हो । सूर्य के साथ प्रेम 
वढाने के निमित्त इस वृक्ष ने आठो दिश्लाओ में अपनी उन्नत झ्ाखाओ को फंलाया है । 
इच्छित फल प्रदान करने के निमित्त मानो इसने अपनी श्ाखामों की काति चारो ओर फंला 
रखी हैँ । यह अपने पत्तों को फंलाकर, उसकी कान्ति को विकीर्ण करते हुए, सूर्य की रद्िम 
भी नीचे आते नहीं देता; रात्रि के समय यह शशि के प्रेम से अनुखत हो उनकी चाँदनी 
को पृथ्वी पर पडने नहीं देता | इसके फल अमृत-फलो की अपेक्षा सौगुने अधिक स्वादिष्ट हूँ । 
ऐसा लगता है कि देवताओं ने इस पृथ्वी के वृक्षों के राजा के रूप में इसका अभिषेक 
कर दिया हैं । 

लक्ष्मण ने अपने अग्रज के चित्त का भाव जानकर उनके कथन का अनुमोदन किया 
और उनके लिए पत्रों की मृदु शय्या का प्रवध किया । तब राम ने उस शबय्या पर शयन 
किया, तो लक्ष्मण रघुराम के चरण दवाने लगे । इस प्रकार अत्यत शोभा-समन्वित हो उनके वहाँ 
रहते हुए कुछ समय व्यतीत हुआ। तव अनघ रघुराम को सवोधित करके लक्ष्मण ऊँचे 
स्वर में बोले--हें देव, अभी-अभी छिपकली की बोली मुझे सुनाई पडी है कि आप युद्ध में 
धत्रु-तेना को जीतकर अवश्य अपनी देवी को प्राप्त करेंगे । सर्वत्र आपकी विजय ही होगी ।' 

तब राम ने कहा--लजवब वानरेश्वर बडी श्रद्धा के साथ यहाँ आकर हम से मिलेगा 
बौर हम ज्ीत्र ही लका जायेंगे । युद्ध में रावण मरेगा और सीता हमें मिल जायगी और 
उसके पश्चात्‌ में राज्य-भार ग्रहण करूँगा । इस प्रकार राम के कहने के परुंचात्‌ राम तथा 
लक्ष्मण वडी प्रसन्नता से वहाँ रहने लगे । 

आध्र-मापा के समाट्‌, श्रेप्ठ काव्य तथा आगम आदि के ज्ञाता, आचारवानू, अपार 
घैरयं-सागर, भूलोक-निधि गोन बुद्ध राजा ने अपने पिता महनीय गुणसपन्न, मेरु पव॑त के 
समान घीर, विद्वल राजा के नाम पर, आचद्रार्क पृथ्वी पर स्थायी रहनेवाली, असमान 
तथा ललित शब्द तथा अर्थों से विलसित रामायण के, अलकार तथा भावों से भरे अरण्य- 
काण्ड की रचना इस प्रकार की कि वह इस पृथ्वी पर आचद्रार्क लोगो की प्रशसा प्राप्त 
फरती रहे । रसिकजनो को सतत आनद देनेवाले, श्रेप्ठ, आर्ष, आदि काव्य-रूपी इस पुण्य 
घरित को जो पढेंगे, या सुनेंगे, उन्हें सामादि वेद-समूहों का आधार, रामनाम-रूपी चिता- 
मणि, नव-भोग, परहित-बुद्धि, उन्नत विचार, परिपूर्ण गक्ति, राज्य-सुख, निर्मल कीत्ति, 
नित्य सुख, धर्म में निप्ठा, दान में आसवित, चिरायू, आरोग्य तथा ऐश्वर्य सतत समप्राप्त 
होगे । इसे सुनते रहने से पाप-क्षय, पुत्र-प्राप्ति, शत्रुओं का नाश, धन-घान्य की समृद्धि, 
विष्न-वाधारहित सुन्दर स्त्रियों के साथ जीवन और पुत्रों के साथ सहजीवन सिद्ध होगे | 
सब विपत्तियाँ दूर होगी, ववु-वाववों का सहवास रहेगा, अभिलपित वस्तुओ का वियोग 
न होगा, (घरो में) देवता-तर्पण तथा पितरो की तृप्ति होती रहेगी । इस पुण्य चरित 
के लिखनेवालों को श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति तथा इद्रलोक का निवास प्राप्त होगा । जब- 
तक कुलपरव॑त, नक्षत्र, रवि तथा चद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी तथा समस्त लोक स्थित रहेंगे, 
तबतक यह कया अक्षय आनंद-न्समूह का आधार रहेगी । 


। अभरण्यकांड समाप्त; 


श्रोरंगनाथ रमाथण 
(कि्िंधाकाँड ) 


१, पंपासर-दर्शन 


श्रीराम ने तब शीतल जल तथा कमल, उत्पल एवं कुमुदों से सुशोभित पपा सरोवर 
को और उसके तटवर्त्ती, वसत ऋतु के कारण, फूल और फल के भार से युक्त चपक तथा 
सहकार वृक्षों की शोभा को देखकर जानकी के विरह से कपित होते हुए लक्ष्मण से कहा-- 
“है सौमित्र, यह पा सरोवर इतना मनोहर हैँ कि यह देवताओ की कामिनियों के लिए 
भी जल-कीडा करने की इच्छा करने योग्य है । इस सरोवर की समता करनेवाला कोई 
दूसरा सरोवर बताना, क्‍या शेपषनाग के लिए भी सभव हो सकता हई ? इसका महत्त्व 
जानने के पछचात्‌ क्या मानसरोवर भी तुच्छ नहीं प्रतीत होगा ? पवित्र जीवन का आधार 
इस सरोवर की समता, क्या स्वर्गलोक का कोई भी जलाशय कर सकता हैं ? (जल के) 
बाहर निकले हुए मृणालों के ऊपर दीखनेवाली कर्णिकाओ पर (वीजकोष) विकसित श्वेत 
कमल, मरकत के स्तभो पर स्थित स्वर्ण-कलशो पर आधारित छत्रो की भाँति दीखते है । 
दोनो पादवेभागो में भ्रमरो के प्रो से उत्पन्न शीतल वायु के कारण तरगायमान होनेवाली 
लहरो पर डोलनेवाले राजहसो के फैलाये हुए पख चामरो की भाँति सुशोचित है । 
इनके कारण यह सरोवर शोभा-रूपी साम्राज्य के लिए अभिषिक्‍त सा जत्वत मनोहर दीख 
रहा है । उन्नतकाल के समान यौवन की काति से परिपूर्ण हो, छोटे-छोटे पल्लव-रूपी 


श्छ्छ रंग्नाथ एयायण 


3 


माणिक्य के आभूषण पहने हुए ये पेड़ो की फलो हुई शाखाएँ इस स्तिग्ध सरोवर रूपी 
दर्पण में उक्रक-उककर (अपना मुंह) देख रही है । उनकी शिखाएँ मद पवन में इस 
तरह हिल रही है, मानो वें अपने सौदर्य को देखकर प्रसन्नता से अपना सिर हिला रही है । 
यहाँ की थुक-सारिकाएँ इस प्रकार बोल रही है, मानो एक दूसरे की प्रणसा कर रही है । 
इस सरोवर के तीर की वन-स्थली को देखकर मेरा संताप, मन्मय के प्रताप के समान, 
उद्दीप्त हो उठा है | मेरी धृति भी नप्ट हो गई है 


“है सौमित्र, विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह वन-भूमि नही हूँ, वल्कि 
कामदेव का शल्त्रागार है, वें आमू-पत्लव नहीं हे, बल्कि मन्मथ के तेज खड़्ग है, यह 
भ्रमरो का गुजार नहीं है, वल्कि निकट पहुँचनेवाले मन्‍्मथ के धनुष्टकार है, वे फूलों के 
गुच्छ नही है, वल्कि मन्‍्मथ के तीक्ष्ण वाण हैँ, यह कोयल की मीठी वोली नही हे, वल्कि 
उसके (कामदेव के) कर्णकटु हुकार हैँ । मेरे जैसे स्त्री-विरही इस कानन में कैसे रात्रि 
वितायेंगे ” इस वन में सुनाई पडनेवाला कोयल का कल-कूजन वर्षा ऋतु के बादलों के 
घोर गर्जन के समान लगता है, वृक्षों से गिरनेवाले पुष्प-रज का प्रकाश, नये वादलो की 
विजली के समान लगता है, पल्लव-युकत शाखाएँ इच्द्र-धनुृष के समान लगती हे, पृथ्वी 
पर गिरनेवाले फूल ओले के समान लगते हे, सतत भरनेवाला मकरद वर्षा के समान 
दीखता हैं । (इन कारणो से) यह वसत ऋतु भी वर्षा ऋतु के समान दिखाई पडती है । 
इस पर भी पललव-रूपी अग्नि-ज्वालाओो से, भ्रमर रूपी घुएँ से, वकुल के पुष्परज-रूपी 
राख से, सेमर के फूल-रूपी अगारो से प्रकट होकर, यह ऋतु विरहियो के लिए अग्नि के 
समान दीखती हूँ और मन्मथ के प्रताप की अग्नि का भी तिरस्कार करती हुई, मेरे मन 
को जला रही है । हाय ! अव में क्‍या करूँ ? कैसे में इसे सहन करूँ ? कामिनी-कुल- 
भूषणा सीता को में कव देखूँगा ? क्या कभी में सीता के साथ उस प्रकार मिलकर रह 
सकूगा, जैसे पपरा सरोवर के तटवर्त्ती वन की शोभा के साथ वसत रहता है । इस पपा के 
कमलो के समान दीखनेवाले सीता के मुख का में कव अवलोकन कर सकूँगा ? यहाँ की 
मछलियों की आँखों के समान उस इदुबदनी की आँखें में कब देख सकेगा ? अमर यहाँ 
के पद्मो का मकरद जैसे पान करते हे, वैसे ही में कव उस सुदरी का अधर-पान करूँगा ? 
यहाँ के जलपक्षी जोड़ो में रहते है, वैसे ही उस कमलाक्षी के सग में कव रह सकूगा ? 
हाय, यह कैसा विचार हैँ ! अब वह सीता कहाँ ? कहाँ यह विरह ? इन दोनो का मेल 
कैसे संभव हैँ ? है अनुज, अब तुम अयोध्या लौट जामो | में अब अपने प्राणो को रख 
नहीं सकृगा ।”, 

इस प्रकार अनाथ की तरह जोक करनेवाले राम को देखकर लक्ष्मण बोले--है 
रघुराम, आप समस्त लोकों का सामना करने की क्षमता रखनेवाले पुरुषोत्तम हे । ऐसे 
मोहजन्य शोक से आप क्‍यों पीड़ित हो रहें हे ? सीता को छल से ले जानेवाले रावण 
के सहार का उपक्रम कीजिए । तभी भासंत नामक पक्षी (शकुन-पक्षी) बोल उठा। 

इतने में उस ऋष्यमूक पर्वत की तराइयो में विचरण करते हुए सुग्रीव ने निकट 
ही राम तथा लक्ष्मगर को देखा । वह अत्यधिक भयभीत होकर, चीत्कार करते हुए, अपने 


/किडिकक/कांछ ९७५ 


मार्ग में पडनेवाले काड-कखाड की परवाह किये विना अधाधुध पर्वत पर चढने लगा । 
उसने वानरों को एकात में बुलाकर उन्हें राम और लक्ष्मण को दिखाते हुए कहा-- 
वह देखो, पपा के पास दो व्यक्ति धनूष धारण किये हुए, विविध शस्त्रास्त्रों से सज्जित 
होकर ठहरे हुए हूँ । ये प्रच्छन्न वेशधारी, वालि के भेजने पर, हमारा सहार करने आये है । 
अन्यथा, मुनियो को खड्ग, तृणीर, धनुप-बाण आदि की व्या आवश्यकता हैँ ? इनके 
पवित्र मुनिवेश देखकर मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है । अब हमें यहाँ से कही चला जाना 
चाहिए; यहाँ रहना उचित नहीं हैं ।' 
जब सुम्रीव ने मत्रियों से इस प्रकार के वचन कहें, तव उसे सुनकर विमल विचारों 
से भरे हनुमान्‌ बोले-- इन्हें देखने पर ऐसा लगता है कि ये कोई पुण्यात्मा हैँ, ये कपट- 
वेशधारी नहीं हे । रवि-चद्र के समान दीखनेवाले, ये दयालु व्यवित ही है । पता नहीं कि 
इस रूप में वे यहाँ क्यो आकर रहते है ? उनका महत्त्व जाने विना हमें भयभीत होने 
की क्‍या आवश्यकता है ?” तब सुग्रीव ने हनुमान्‌ से कहा--हमें शका होती है कि ये 
वालि के भेजने पर यहाँ आये है, पता नहीं कि क्रोध से भरा हुआ वालि हमें कब कैसी 
हानि पहुँचायेगा। हमें कभी अपने छात्रु का विश्वास नहीं करना चाहिए । अत हें पवन-पुत्र, 
तुम किसी कौशल से उनसे जाकर मिलो और इस वात का पता लगाओ कि ये क्‍यों 
आये है । उनके मन की बात जानकर मेरे मन के भय का निवारण करो । शीघ्र जाओ ।' 


२. हनुमान्‌ की राम से मेंठ 


इस प्रकार हनुमान्‌ को विदा करके सुग्रीव अपने मत्रियो के साथ वहाँ रहने से 
डरकर मलयाद्वि पर चला गया । तब अत्यत शूर, उत्तम गुणवानू, शीलवानू, बाहुबली, 
तेजस्वी, कमनीय रूपवाले, वानरो के रक्षक, धर्मार्थमोक्ष के इच्छुक, अतुल गुरु-भकत, अंत्यतत 
कुशल, तथा कीत्तिवानू, अजन-सुत हनुमान्‌ उस पर्व॑त से धीरे-धीरे ऐसे उत्तरा, मानो वालि को 
अमरलोक भेजकर सुग्रीव को राज्य पर प्रतिष्ठित करने, सुरो की रक्षा करने, रावण की 
विजय-लक्ष्मी राम को देने, सीता के दुख को दूर करने तथा रवि-पुत्र (सुग्रीव) के 
चित्त को मोद-मग्न करने के लिए जा रहा हो । इस प्रकार वह वानरेश्वर पर्वत से 
उत्तरकर आया और वटु का वेश धारण करके पपा सरोवर के निकट पहुँचा। महात्माओ के 
दर्शनार्थ जाते हुए रिक्त हस्तो से जाना उचित नहीं है, इसलिए राम के देने योग्य एक फल 
हाथ में लिये हुए, वह उनके निकट जाने लगा । इस प्रकार आते हुए अनिल-कुमार को 
देखकर राम अपने अनुज से बोले--हे लक्ष्मण, सुनहला रग, मुज की सुदर करघनी, रत्ल- 
कुडलो से विलसित कर्ण, श्रेष्ठ हार, यज्ञोपवीत, कौपीन, तथा हस्त-ककण घारण किये हुए 
किसी मनुष्य ने क्या अनुपम कपि का रूप धारण किया है ? इस रूप को धारण करने 
की इच्छा से स्वय रुद्र ने इस रूप में जन्म तो नही लिया हूँ ? अन्यथा इस पृथ्वी पर 
कपिमात्र को ऐसी प्रभा कैसे प्राप्त हो सकती हैं ? 

इस प्रकार प्रशसा करनेवाले राजकुमार को देखकर पुलकित गात्र से हनुमान्‌ उनके 
निकट पहुँचा और बडी प्रीति के साथ फल उनको भेंट किया, मानो कह रहा हो कि में साध्वी 
सीता का शिरोरत्न आप को ज्लीत्र ही ला दूँगा । इसके पदचातू वह बोला--हे प्रभो, 


6५६ र॑गन/थ रायायक 


आप ही गरण हूं । आपकी दृष्टि ने मेरा स्पर्ण किया । में विभूषित हुआ । में कृतार्थ 
हुआ । धन्य हुआ । में आपका प्रिय सेवक हूँ । मेरा नाम हनुमान्‌ हैं; में वायु-पुत्र हूँ, 
और सूब-पुत्र का मत्री हूँ | अजना-सुत हूँ । में भय तजकर भिक्षुक के रूप में आपके विषय 
में जानने के लिए आपके पास आया हूँ । आप सुनिए। यज्स्वरी सुग्रीव वानरो के राजा हे । 
और परम वलवान्‌ हे । वे सूयये-पुत्र है और सूर्य-सम तेजस्वी हे, वे अभिमानी तथा असमान 
पराक्रमी हे । अपने भाई वालि के द्वारा अपना सारा राज्य खोकर, अत्यत व्याकुल हो, 
वे इस पर्वत पर रहते हैँ । वे दुखी है और आपके सखा वनकर रहने योग्य हैँ ।! 

इस प्रकार कहकर उसने हाथ जोडकर राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और बडी 
भवित के साथ आगे कहा--हे महात्माओ ! इस पृथ्वी के इच्द्र तथा उपेन्द्र के समान, 
मश्विनीकुमारों के समान, रवि-चद्रों के समान मनोहर रूप, उन्नत स्कघ, चद्र के समान मद 
हास से युक्त मुख, कमल-दलो को भी परास्त करनेवाले नेत्र, स्वयं के निवासियों की भी 
प्रशसा प्राप्त करने योग्य वाहुबलवाले, दुर्लभ राजचिह्नो से सुशोभित, धनुष घारण करनेवाले, आपने 
यह मुनिवेश क्यों घारण किया है ” आप कौन हे ? यहाँ क्यो आये हैँ ?' 

इस प्रकार के सुधा-मबुर वाक्यों से अत्यत नांम्र होकर जब हनुमान्‌ ने उनसे प्रश्न 
किया, तव राम उसकी वाक-पटुता, वुद्धि-चातुरी, आकृति, मन की प्रीति तथा नीति से प्रसन्न 
होकर अपने भाई से बोले--हे लक्ष्मण, ऐसे वचन कहना ब्रह्मा के लिए या उनकी पतली 
के लिए ही सभव है, अन्यो के लिए नहीं । कदाचित्‌ यह (वानर) व्याकरण, निगम, 
शास्त्रादि का ज्ञाता हैं । इसके समापण तथा रूप अतुल शुभ लक्षणों से समन्वित हैं । 
ऐसा दूत यदि हमें मिल जाय, तो हमारे सभी कार्य सफल होने में कोई सदेह नहीं रहेगा । 
इसलिए तुम इसे मेरे समी कार्यों का विवरण क्रमश. सुना दो ।' 

तव रामानृज ने अत्यत प्रसन्न होकर हनुमान्‌ को सबोधित करके कहा--हें अनघ, 


हम इक्ष्वाकु-बश में उत्पन्न दोवो भाई हे । ये मेरे भाई राम है और में लक्ष्मण हूँ । 
हम दोनो महाराज दशरथ के पुत्र हैं । राजा दशरथ की आज्ञा से तपस्वियों का-सा जीवन 
व्यतीत कर रहे है । दुर्मति रावण हमें धोखा देकर राम को स्त्री, भूमिसुता को ले गया हूँ। 
उसके मार्ग का अस्वेषण करते हुए हम वन में फिर रहे थे तो एक स्थान पर शबरी ने 
हमें सुग्रीव का समाचार सुनाया था । वह महावली हमारा मित्र बन जाय, ऐसी कामना 
करके हम यहाँ आये हे । अब तुम हमें स्पप्ट रूप से बताओ कि तुम कौन हो और 
तुम्हारा क्या परिचय हूँ ?' 
३. हनुमान का अपने जन्म का वृत्तांत सुनाना 

तव हनुमान्‌ ने उन रघुवंशियो को प्रणाम करके निवेदन किया--है महात्माओं, 
अपनी प्रिय माता के गर्म से जन्म लेने के कुछ वर्षों के पश्चात्‌ मैने किसी उद्देश्य से ब्रह्मा 
को तपस्या की थी । तब मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर सरसिजभव ने मुझे दर्शन दिये और 
वोले--कोई इच्छा हो तो कहो ।॥ तब मेने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया, 
सहसोो प्रकार से उनकी स्तुति की और फिर कहा--हे विमलात्मा, इस पृथ्वी पर मेंरे 
मोक्ष तथा इच्छित कार्यों की सिद्धि का आधार तथा मेरा काराष्य कौन हैं ? में किसकी 


जप 


#केड्किकाकाँड ९७७ 


प्राथना तथा सेवा करूँ ?” तब कमलसभव ने अपने मन में विचार करक कहा--जो 
तुम्हारे शरीर के आमभूषणों को देख सकेगा, वही तुम्हारा स्वामी और प्रभू होगा । (भाव 

है कि हनुमान्‌ के आभूषण दूसरो के लिए जदृश्य थे।) वही हम सब के इप्टदेव, 
समस्त प्राणियों तथा इस ससार के कर्त्ता है, वे ही विष्ण हूँ | जान लो, वे ही तुम्हारे 
त्राता तथा प्रभु है ।' 


.. इस प्रकार आदेश देकर ब्रह्मा चले गये । तब से में समस्त लोक में विचरण 
करता रहता हूँ । हें राजन्‌ ! मेरं आभूषणो की दीप्ति स्वर्ग के निवासी भी नही देख सकते ।/ 
'तब सौभित्र ने मारुति को देखकर कहा--है अनघ, सुनो, राघव की शक्ति लोक- 
विख्यात है । वे अनुपम दिव्यास्त्र के ज्ञाता तथा अतुल साहसी हे, वे करुणा के समद्र हें 
और गभीर प्रकृति के हे, वे शरणागत-त्राता तथा सदुधर्म में तत्पर है । वे जगन्नाथ हें, 
अशरणशरण हे, अगणित गृणो से विभूषित है, तेजस्वी, दिव्य पराक्रमी तथा सत्यवादी हे । 
ऐसे महान्‌ व्यक्ति का सेवक तथा हितेच्छु होकर में रहता हूँ । राघव के लिए कोई कार्य 
असाध्य नही है । कुटिल राक्षस का पता लगाकर हम स्वय सीता को ला सकते हे ; किन्तु 
परिश्रम उठाकर अकेले जाना उचित नहीं है और वह राजनीति भी नहीं है | इसलिए 
मेरे प्रभु का विचार है कि तुम्हारे सग्रीव को अपना मित्र बनाया जाय | अब तुम इस 
कार्य को किसी तरह सपन्न करो । 
तब पवन-पुत्र ने अत्यत प्रसन्न होकर अपना निज रूप दिखाया । राम-लक्ष्मण न 
उसे अपनाया, इससे उसने अपने को कृतार्थ समझा । तब उसने अपनी आँखों में आन॑दाश्रु 
भरकर उनकी अत्यधिक स्तुति की । तत्पश्चात्‌ राम और लक्ष्मण ने अत्यत हप॑ से अनिल- 
कुमार को विदा किया । हनुमान्‌ अत्यधिक आनद तथा उत्साह से सुग्रीव के पास पहुँचा 
और उसे रघुवद के राजकुमारो का वृत्तात इस प्रकार कहने लगा--हे सुग्रीव, रमणीय 
रूपवाले राम-लक्ष्मण, महनीय गुणों से अलकृत होते हुए इस जगत्‌ में विद्यमान हूँ ।,शोक- 
सागर में निमग्न होनेवाले तुम्हें, रघुराम एक नौका के रूप में मिल गये हें । है सुग्रीव, 
अब तुम सूरक्षित हो गये ॥ तुम्हारा प्रतिशोध पूर्ण होगा ॥ तुम्हें पूर्ण सतोष होगा । में 
तुम्हारे पुण्य की प्रशसा कैसे करू ? सज्चरित्रवानू, दयामूत्ति, सत्यवादी, आजानुबाहु, महा- 
विष्णु, श्रीनिवास और पुण्यनिधि, दशरथात्मज राम ही तुम्हारे प्रभु हे । वे महात्मा जब 
अपने पिता की आज्ञा से दडकवन में रहते थे, तब दशानन उनकी पत्नी को चुराकर ले गया । 
उससे युद्ध करके उसका सहार करने के उद्देश्य से वें तुमसे मित्रता करने यहाँ आये हे । 
इन बातो को सुनकर सुग्रीव ह्पिंत हुआ । उसने अनिलकुमार को देखकर कहा-- 
है पवनसुत, मेरा सारा भय दूर हो गया । मेरी तपस्या सफल हुई । तुम्हारे जैसे अजन 
के प्राप्त होने से में राघव-रूपी निधि को देख सका । तुम्हारे जैसे कर्णघार के रहने से 
में इस शोक-सागर को पार करने में समर्थे हुआ | तुम उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर लिया 
लाओ और मेरे मन का सताप दूर करो । भव तुम जाओ ।' 
वायु-पुत्र तुरत रघुराम के पास गया जऔर प्रणाम करके उनसे निवेदन किया--हे 
, श्रीमान्‌ का मित्र सुग्रीव, आपके दर्शनो का अभिलायी है, अत आप पधारें ।/ राम 
र्३े 


श्ड्ट र्गनाथ रॉयरॉयफ 


मन-ही-मन हर्षित हुए और हनुमान्‌ की प्रशंसा करने लगे । तत्परचात्‌ एक पुण्य मुहत्ते म 
अपने अनुज के साथ वें हनुमान्‌ के कंबों पर बैठकर ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचकर अत्यत 
हपिंत हुए । हनुमान ने उन्हें किसी निर्जेन स्थान में ठहरा दिया और मलयाद्वि पर पहुँचकर, 
श्रीराम के दर्शनों के लिए उत्कंठित सुग्रीव को देखकर कहा--हे देव, तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई । 
राम बौर लक्ष्मण ऋष्यमूक पर भा गये । तुम अब चलो । तव सूबयपुत्र थे आनंद से 
फूलकर मनुप्य-हूप धारण किया । मुकुट, केयूर जादि आभूषणों से सुसज्जित होकर अपने 
मंत्रियों के साथ चीघन्न ही ऋष्यमृक पर जा पहुँचा | वह बड़ी भवित के साथ राम के 
सामने पहुँचा और साप्टांग प्रणाम करके सतुप्ट होकर, हाथ जोडकर उनके सम्मुख छड़ा 
रहा । * 

तब राम ने सुत्रीव को गले से लगाया और मद हास की अमृत-वृष्टि करते हुए 
दे सुप्रीद से वोले--है सूर्यपूत्र, में वायु-पुत्र के मुख से तुम्हारे पराक्रम, बाहुबल आदि को 
सुनकर बहुत ही प्रसन्न हुआ । जब तुम भयभीत मत होओ । तुम पर आक्रमण करवंवाल 
तुम्हारे -झत्रु का संहार में करूँगा। अब तुम्हारे सिवा मेरा आप्तवधु और विद्वास- 
पात्र मित्र दूसरा कौन हैँ ?' 

इस प्रकार सात्वना देने पर सूर्यनदत ने कहा--हें देव, आपने मुझे अपना प्रिय 
सेवक स्वीकार किया है, आपकी करुणापूर्ण दृष्टिमात्र से में धन्य हुआ । हे सूर्य-कुल-नाथ, 
मेरे जैसा सेवक आपको मिल गया हैं, अब आप निश्चय जानिए कि आपने रावण का वध 
करके सीता को प्राप्त कर लिया | तव राम तथा सुग्रीव जग्ति के समक्ष परस्पर (एक 
दूसरे की सहायता करने का) वचन देकर सतुप्ट हुए । 

उस समय अगद ने, जो क्रीड़ा करने योग्य आयु का था, और जो विनोदार्थ वही 
पर विचरण करते हुए खेल रहा था, राम तथा सुग्रीव के अग्नि-समक्ष दिये हुए वचनो को 
सुन लिया । उसने घर जाकर अपनी माता तारा से सभी वार्ते कह सुनाई | वह मननही- 
मन अत्वत्त दुखी होती हुई कितनी ही दु शकाओं से पीडित हो उठी । 


४. सुग्रीव का सीता के आमभूषणों को देना 


तब वायुपुत्र ने एक विशाल वृक्ष की शाखा को तोड़कर, संग्रीव तथा राधव के 
लिए एक आसन बनाया । उस पर बैठकर वे दोनो वार्तालाप करने लगे । कुछ समय के 
पच्चात्‌ः सूर्यपुत्र दोनों राजकुमारों को गुफा के भीतर ले गया और बड़े प्रेम से उन सभी 
आमभूषणो को लाकर दिखाया, जिन्हें सीता ने फेंका था | उसने कहा--है देव, जिस समय 
राक्षस दण्डकचन में आपको घोखा देकर, आपकी देवी को आकान्न-मार्ग से उठाकर लिये 
जा रहा या, उन्होंने (सीता ने) हमें इस पहाड़ पर देखकर, ऊँचे स्वर में आपका नाम 
लेकर पुकार और अपने मकीने अचल का एक भाग फाड़कर इन आमपणों को बाँधा और 
उन्हें यहाँ गिरा दिया ॥ 

इतना कहते ही राम थोकनसागर में डूब गये और अश्रुघधारा बहाकर उत आभषधों 
का सार मैच घो दिया | उन्होंने उन जाभरणो को अपने वक्ष पर जहाँ-तहाँ रखकर देखा। 
साता का स्मरण आते हो उनके सभी अग शिश्रिल-सें हो गये । उन्होंने लडखडाते हुए 


किब्किधाकीड ९७९ 


स्वर में लक्ष्मण को बुलाकर कहा--लक्ष्मण, देखा तुमने ” सीता के सभी शझ्ागार इस 
प्रकार मिट्टी में मिल गये हे । भला, आभूषणों को गिरा देने का क्‍या अर्थ हैं ? इनको 
साथ रखने में उसे क्‍या कष्ट होता ? सीता तो मेरी प्राणेश्वरी हैँ । हाय, इस अचल की 
दशा को तो देखो | जो कीना अचल उसके सुडौल कुचों पर सतत रहता था, उसकी ऐसी 
दशा हुई ! मेरे चरणों को गुलावजल से धोकर, उन्हें इसी से वह पोछती थी । इसे 
विजन वेनाकर, अत्यत सुदर ढग से मेरे श्रम-विदुओ को सुखा देती थी । अपनी प्रमा- 
समन्वित तनुलता की काति !विखेरती हुई वह इसी के पाँवडे विछा देती थी ।” इस प्रकार 
शोक करते हुए राम अश्रु बहाने तथा बार-बार मूंच्छित होंने लगे । फिर सेमलकर भक्ति 
के साथ सिर भुकाये खडे सुग्रीव को देखकर रघुनाथ वोले--है सुग्रीव, बतलाओ कि मेरी 
देवी को लेकर आनेवाला वह इन्द्र का शत्र्‌ किस देश में रहता है ”? उसका नगर कौन-सा है ? 
में अभी उस राक्षस का सहार करके सीता को छुडा लाऊँगा ।' 


०. 


यह सुनकर सुग्रीव बोला--हे देव, मे उस द्रोही का निवास नहीं जानता । फिर 
भी कोई चिता नहीं । अब में सब वातें जानने का प्रयत्न करूँगा । आप शोक त्यागकर 
धैव॑ धारण कीजिए । अत्यत पराक्रमी वालि के द्वारा अपनी पत्नी के हरे जाने पर भी 
'में इतना दुखी नही हूँ । हे द्वेव, विपत्ति-हूपी सागर को आत्मधैर्य-रूपी नौका से ही पार 
'किया जा सकता हैं । है प्रभो, हम जैसे साधारण मानवी की तरह आप भी शोक करें, 
यह कहाँ उचित है ?' 

सुत्रीव के आप्त वचन सुनकर रघुवीर धैर्य धारण करते हुए सोचने लगे--सीता के 
स्लो जाने का ढग जानने के पदरचात्‌ मन-ही-मन दु खी होते रहना शूरता नही है । यो सोचकर 
उन्होंने सताप त्याग कर सीता को किसी भी प्रकार प्राप्त करने के काय॑ में प्रवत्त होने 
का निश्चय किया । किन्तु उसके पूर्व उन्होने सुग्रीव के शत्रु का अत करने का निश्चय 
किया । सीता के आभूषण लक्ष्मण को सौपकर वे सुग्रीव को देखकर वोले--है मित्र, 
विद्वानों का कहना हैँ कि विपत्ति के समय मित्र को समान कोई सहायक नही होते । चाहे 
मित्र गुणवान्‌ हो, या गृणहीन, विपत्ति के समय वही सहायक होता हैं | तुम्हारी मित्रता 
प्राप्त करके मुझे किसी भी वस्तु के अभाव की चिता नहीं रही, यह तो निश्चित हैं । 
अब में उस पापी वालि का वध करूँगा, जो तुम्हारी स्त्री का अपहरण करके तुम्हारा वध 
करना चाहता है । भाइयो में स्वेह का भाव हो, तो उससे श्रेष्ठ सुख और कुछ नही है । 
किन्तु ऐसा स्नेह तुम में क्यो नहीं रह पाया ? तुम्हारे और तुम्हारे अग्नज में शत्रुता 
क्यो हुई ? इसका वृत्तात मुझे सुनाओ ।' 

तब सुग्रीव ने कहा--है राम, में अपने और वालि की छात्रुता का वृत्तात सुनाता हैं, 
सुनिए । (समुद्र-मथन के समय) मद्राचल को मथावी बनाकर, वासुकि को नेती बनाकर 
'जब देवताओं ने हमारे वाहुबल को जानकर हमसे प्रार्थना की, तव में और वालि, दोनों 
मथन के लिए एक ओर खडे हो गये और दूसरी ओर देवता, गरंड, उरग, असुर, सिद्ध 
आदि थे । इस प्रकार जब हम क्षीरसागर का मथन करने लगे, तव उसमें से हलाहल 
निकलकर समस्त लोक को जलाने लगा, त्तो महावेव ने सबको आश्चयंच्रकित करते छुए 


न 


(८० र॑ंगनाय एयायण 


५ 


उसे पी गये । उसके पश्चात्‌ उसमें से ज्योप्टा देवी का जन्म हुआ, तो उसे कलि 
महाराज ने वड़े प्रेम से अपनाया । इसके उपरान्त कितनी ही वस्तुएं उसमें से उत्पन्न हुई । 
सब ने अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार उन वस्तुओ को बडे हर्ष से ग्रहण किया । आगे 
चलकर ऐरावत, मेष, महिष, मकर, करेणु (हथिनी ), हय, वृषभ आदि उस सागर से उत्तन्न हुए, 
तो इन्द्रादि दिकपालो ने बडे हर्ष से उन्हें अपने-अपने वाहनों के रूप में ग्रहण किया । 
महनीय सौभाग्यवती तथा महिमामयी लक्ष्मी का जब जन्म हुआ, तव लक्ष्मीनारायण ने उन पर 
आसंक्त होकर अपनी पत्नी के रूप में उन्हें ग्रहण किया । तत्पश्चात्‌ चंद्र तथा देव- 
कामिनियो का जन्म हुआ | देवताओ ने उन्त सुदरियो तारा' नामक सुदरी को हमें दिया, 
तो हमने उसे ग्रहण किया । उसके उपरान्त हमारे मथवे पर अमृत का जन्म हुआ । 
देवताओं ने बड़ प्रेम से उस सुधारस को कामबेनू और कल्पव्क्ष के साथ चंद्र को भी लेकर 
अपने निवास-स्थानों में चले गये । हम भी वहाँ से विदा हुए । 


्छ 


हम अपने निवास को लोटकर वडे आननन्‍दपूर्वक उस सुदरी के साथ रहने लगे । 
कुछ दिनो के पदचात्‌ सुत्रेण की प्रिय पुत्री रूमा के साथ विवाह करके बडे उत्साह से में 
जीवन व्यतीत करने लगा । मेरे पिता तथा अन्य मत्रियों ने ज्यष्ठ पुत्र होने के कारण 
वालि को वानर-राज्य का अधिपति बना दिया । वालि भी मेरा वडा आदर करते हुए, 
राज्य करने लगा और में भी उसका सेवक वनकर उसे पिता के समान मानते हुए दिन- 
रात उसकी सेवा में लगा रहा । इस प्रकार हम परस्पर प्रेम-भाव रखते हुए जीवन व्यतीत 
करने लगे । 

एक दिन की वात है कि पुरानी शत्रुता से प्रेरित होकर दुदुभि का पुत्र मायावी 
नामक भयकर राक्षस अद्धं-रात्रि के समय किपष्किधा नगर को भयभीत करते हुए आया, 
और दुर्वार गये से उसने हमें युद्ध के लिए चुनौती दी । अनुपम शील-सपन्न वालि ने कुंद्ध 
होकर मुझे साथ लेकर यद्ध के लिए निकला । हम दोनो को आक्रमण करने के लिए आते 
देखकर वह राक्षस भयभीत होकर भागा और अपनी गुफा में छिप गया । तब वालि मे 
मुझसे कहा--'मे इस गर्वोद्धत राक्षत को पकड़कर उसका वध करके लौटूगा, मेरे आने 
तक तुम साँवधान होकर यहाँ रहो, जिससे अन्य कोई यहाँ प्रवेश न कर पाये । इस प्रकार, 
मुर्भे गुफा के द्वार पर नियुक्त करके वालि ने गुफा में प्रवेश किया । एक वर्ष पर्यन्त गुफा 
में घोर युद्ध होता रहा | रक्त उमडकर गुफा के द्वार तक बहने लगा और राक्षस के 
हुंकार मुझे सुनाई पडने लगे । तब मेने निश्चय कर लिया कि वालि राक्षस के हाथो से 
मारा गया है । यदि वह जान जाय कि में यहाँ हूँ, तो वह वाहर आकर मेरा भी वध कर 
डालेगा । इस प्रकार सोचकर में एक पहाडी से उस गुफा का द्वार बद कर दिया और 
वालि की तिलोदक-क्रिया करके किष्किधा लौट आया । मत्रियों ने यह कहकर कि -वालि 
की मृत्यु के बाद इस राज्य के अधिकारी तुम ही हो, विवश. करके मुझे -वानर-राज्य वा 
राजा अभिषिकत किया । तव से में वानरों का चक्रवर्ती होकर राज्य करता -रहा ॥ - 


ना छः ।' 


है राजन, वहाँ वालि मायावी (राक्षस) का सहार करके, मुझे पुकार-पुकार कर, 
हाँर गया । उसके परचात्‌ वह द्वार पर मेरे द्वारा स्थापित पहाडी को पदांघातों से चूर्र-चूर 


7कि[ज्किधाकाड ९८९ 


करके बाहर निकल आया । मुझे वहाँ न देखकर वह अत्यत क्रुद्ध हुआ और किप्किधा में 
प्रवेश किया । मेरे प्रणाम को भी स्वीकार किये विना वह गरज उठा--क्यों रे, तुम्हें 
अपना अनुज समभकर तुम पर विश्वास करके में शत्रुओ से युद्ध करने गया, तो तुम इस 
प्रकार मुझे धोखा देकर मेरे राज्य का अपहरण करके, उसका शासन करने लगे ? क्‍या 
तुम्हारे लिए यह उचित है ? तुम महा पापात्मा हो । तुम्हें मारने से भी कोई, दोप नहीं 
लगेगा ॥' 

तब मेने उसके चरणों पर गिरकर भक्ति तथा विनय के साथ निवेदन किया-- 
है भाई, एक वर्ष तक आप और मायावी युद्ध करते रहे । तव (एक दिन) मेंने गुफा से 
रक्त का प्रवाह उसके द्वार तक आते देखा, तो भयभीत तथा मतिश्रष्ट हो भागकर यहाँ 
आया । मुभो देखकर मत्रियों ने विवद्ग करके मेरा राज्याभिवेक कर दिया । इसके अति- 
रिक्त में कोई कपट नहीं जानता । आपका आगमन मेरे लिए शुभप्रद है । यह वानर-राज्य 
आप पुन ग्रहण कीजिए । मुझे यह कहने की आवश्यकता नही हैँ कि नाते से में आपका 
भाई हूँ, किन्तु वस्तुत में आपका सेवक तथा पुत्र हूँ । हे करुगानिधि, मुझसे कोई भूल 
हो गई हो, तो उसे क्षमा कीजिए ।' 

इस प्रकार के वचनों से मेने वालि की बहुत विनती की , किन्तु उसका क्रोध 
पग-पग पर बढता ही गया । मत्रियों ने भी उसे बहुत समभाया :कि अनुज के प्रति इतना 
क्रोध उचित नहीं है, किन्तु उसने उनकी बातो पर ध्यान नहीं दिया । उसने मेरी पत्नी 
रुमा को मुझसे छीन लिया, मेरा राज्य ले लिया और मेरा वध करने के लिए तैयार 
हो गया । में भयभीत होकर भागने लगा, तो वह मेरा पीछा करने लगा । मे सारे भूलोक में 
शरण ढूंढते हुए भागा और अत में इस पर्वत पर रहने लगा, क्योकि वालि इस पर्वत 
पर चढ नहीं सकता । 

तब राम ने आइचये से पूछा--हे सूय॑पुत्र, इस पर्वत पर वालि क्‍यों नहीं चढ 
सकता ? इसकी कथा मुझे सुनाओ ।” तब सुग्रीव विनमू भाव से यो कहने लगा---पूवे- 
काल में दुदुभि नामक दुष्ट राक्षस, वरदानो के प्रताप से प्रवल होकर तीव लोको को 
भयभीत करने लगा था । वह जगली भेते का रूप घारण करके समुद्र' के पीछे पड गया 
ओर उसे युद्ध के लिए चुनौती दी । तब समुद्र व्याकुल हो उठा और करोडो रत्नो की 
भेंट देकर कहा--तुम्हारे साथ युद्ध करके श्रेष्ठ हिमाद्वि ही जीवित रह सकता हूँ । में 
तुम से युद्ध नही कर सकता। तब वही उस हिमाद्वि से युद्ध करने चला गया, जिसके 
शुगो ने इंद्र के बाहुस्तम से सम्मानित वज्यायुध के तेज को भग किया था । तब उस 
पर्वेतेश्वर ने कहा--क्या में तुम्हारी वराबरी कर सकता हूँ ? इस ससार में तुम्हारा 
सामना करके, तुम्हारे साथ युद्ध करने का बाहुबल केवल वालि में हैँ । वह अपनी प्रव्र॒ल 
दवित के साथ किष्किधा पर राज्य कर रहा है । यदि तुम युद्ध करने की इच्छा रखते हो, 
तो हे महावली, वही जाओो ।' 

तब वह राक्षस बड़े उत्साह से किश्किधा आया और प्रलय-काल के ब्रादल के समान 
ग्रृजुन करके अपने साथ युद्ध करने के लिए वालि को चुनौवी दी । तब वालि ऋुद्ध होकर 


श्र रंग्न/थ रायायण 


कक ०. 


वाहर जाया और गर्जन करणतें हुए दुदुमि के समान ध्वनि करनेवाले उस दुदुभि का सामना 
करके व्रोला--डझ्षेखू' अब तुम कहाँ जाते हो ?' इस प्रकार कहकर वालि ने शिलाओं तथा 
वृज्ञों को उद्चाइ-उच्चाइकर फेंफा और मूष्टि के प्रह्मरों से उसे व्याकुल कर दिया । जब 
उतने अपने वीक्ष्य श्रूत्रों से वालि पर आक्रनग करना आरंभ किया, तव वालि ने काद्ध 
होकर, भवंकर रूप घारण करके एक पर्वत उठाकर उस पर फेंका । राक्षस ने उसे वचाकर, 
स्वयं एक और पहाड उठाकर वालि पर फेंका । तव कपिराज ने एक बहुत बडा पर्वत 
. उत्त पर फेंका । राज्षत् ने अयने सीगो से उन पहाड़ो को हटाते हुए, वालि के कठ को 
पकद्चकर ऐसा घकक्‍का दिया कि वालि विचलित हो उठा । तब वालि ने उसका पीछा किया 
और एक वृक्ष उस्ाइकर उस राक्षस पर फेंका । राक्षत उसते भी वच गया और छिपकर 
वालि पर आक्रमण करने लगा । तव वालि ने एक मोडे ताड़ के वृक्ष से उस पर प्रह्मर 
किया । राक्षत्त ने अपने सोगों से उसे भी उठाकर फेंक दिया, तो कपिराज ने अपनी 
कठोर मुष्टिसे उस पर प्रह्दर करना आरभ किया। रावत भी अपने सीगो से वालि को मारते लगा। 
इस प्रकार एक दूसरे पर प्रहार करते हुए एक सौ वर्ष तक दोनों घोर युद्ध करने लगे। 
तव वालि ने उसके दोनों सीगो को पकड़ कर नीचे गिरा दिया और उसका वध कर डाला। 
उसके पण्चात्‌ उसनें अपना सारा बल लगाकर लात मारी, तो उसका जाव मुंह तथा 
नाक से रक्त बहाते हुए वत्बञाघात से गिरनेवाले पर्वत की तरह, एक योजन दूर पर 
जा गिरा । ग्रेरू रंग के भरते के समान गिरनेवाली उस रक्त-घारा की कुछ बू्दें, इस 
पर्वेत पर भी गिरी । तव इस पर्वत पर तपस्या में निरत भयकर शक्तियाली मतंग मुनि ने 
क्रोव में आकर ज्ञाप दिया कि वालि इस पर्वत पर न चढ़ सकेगा । हे जगन्नाथ, में इसी 
कारण से निर्मम हो सतत इस ऋष्यम्‌क पर ही निवास करता हूँ । हे राजन, दुदुभि के 
उस झरीर को एक बोजन तक फेंक सकने की शक्ति वालि के सिवा और किसी में नही है। 
यदि आप उस झाव को, उससे भी दूर, न फेंक सकें, तो में आपकी शक्ति पर विश्वास 
नहीं कर सकता ॥' 

तव राम ने मंद-मंद हँसकर कहा--हे सूर्यपुत्र, में उस दुदुभि के शरीर को वैसे ही 
फेंककर तुम्हारा सदेह दूर करूँगा | मुझे वह शव दिखाओं । मेरु-मंदराकारवाले उस शव को 
सुग्रीव के दिखाने पर, राम उसके पास पहुँचे और उसकी परवाह किये विना ही, केवल 
बपने अंगूठे से उठाकर उसे दस योजन दूर फेंक दिया । तव भी सुग्रीव को रघुराम की 
बक्ति के महत्व पर विश्वास नहीं हुआ । उसने कहा--हे देव, जब वालि ने इसे फेंका 
था तव यह वहुत से रक्त-मास से भरा था, आज तो केवल इसकी अस्थियाँ रह गईं हे। 
इसलिए जाप इसे बड़े वेग से फेंक सके, इसलिएें विब्वास नहीं होता कि आपका 
वल वालि से भी अधिक है । इतना ही नही, विना थके वालि पहाडो को गेंदों की तरह 
उछाल सकता है; चारो समुद्रो में संघ्या-वंदन करता हे और जिवजी के चरणो को अपने 
सिर पर धारण करता हैं। वायू से भी अधिक वेग से वह सभी समुद्रों को पार कर 


सकता है । ऐसे वालि की, जिसे इद्ध ने स्वर्णन्माला प्रदान की थी, कौन समता कर 
सकता हूँ ? हें राजनू, और एक चात सुनिए । यहाँ जो ज्ञात ताल-बुक्ष खड़े हुँ, इन सभी 


किहिककाकाँड ९८३ 


को वालि अपनी वर-शक्ति से एक साथ अपने हाथो में पकडकर उनके सभी पत्तो को तोड 
सकता हैँ । इन्द्रादि देवता इन में से किसी एक ताल को' भी हिला नहीं सकते । हे वसुवेश, 
यदि आप एक बाण से इस सातो ताल-चुक्षो को गिरा सकते है, तो हम विश्वास कर सकतें हूँ 
कि आपकी शवित वालि की जक्ति स भी अधिक है । मातग मुनि ने मुझसे कहा था कि 
जो इन सातो ताल-बवृक्षो को एक ही बाण से गिराने की शक्ति रखता है, उस व्यवित 
के हाथो से वालि का नाश होगा ॥' 

तव राम ने मदहास करके कहा--है वनेचरेश्वर, उन ताल-वुक्षों को तुम अवश्य 
मुझे दिखाओ । तब निपुण राम ने वज्ञ-सम अद्वितीय तथा निशित वाण सधान करके 
चलाया, तो वह वाण, पृथ्वी पर ठेढे-मेढें ढण से खडे उन ताल-वृक्षों को एक साथ ऐसे 
काटकर गिरा दिया, मानो रावण की नाडियो को ही काट दिया हो । उसके पश्चात्‌ वह 
शर निकट के पर्वत को भी पार करके पृथ्वी में प्रवेश किया और पाताल तक पहुँचकर 
किचित भी अपनी गति मद किये विना, बडे वेग से रघुराम के तूणीर में वापस आ गया । 
यह देखकर सुग्रीव आइचयंचकित हो अत्यधिक आनद में डूब गया और मन-हीन्‍मन यह 
सोचकर फूल उठा कि जिन ताल-बवुक्षों के मूल सप्त पातालों तक गये थे, जिनके पत्र सप्त 
वायुमडलो तक फैले थे, ऐसे तालो को इन्होने एक ही शर सें गिरा दिया । अब मेरा सदेह 
दूर हो गया । अब अवश्य ही राघव के हाथो वालि का वध होगा । में अब वानर-राज्य 
पर शासन कर सकू गा । तब सूर्यवश के प्रभु राम को देखकर सूयंपुत्र ने हाथ जोडकर 
कहा--है देव, आपका रूप देखकर मेने आपकी शक्ति की कल्पना नहीं करके पशु-बुद्धि 
का परिचय दिया । में सूर्यपुत्र हें और आप सूर्य-वशन्सभव हे । अत मैने आपकी समानता 
करने का विचार करने का अपराध किया । आप त्रिलोकीनाथ है । मुझ मूर्ख को अपना 
सेवक मानकर मेरे छात्रु का संहार कीजिए और मुझे मेरा राज्य दिलाकर मेरा दुख दूर 


कीजिए ॥ > 
४ वालि-सुग्रीव का द्व द्व-युद्ध 


तव राम ने अत्यधिक क्ृपा-दृष्टि से सुग्रीव को देखकर कहा--हे सुग्रीव, तुम शीघ्र 
ही किष्किंधा को जाओ और वहाँ वालि से युद्ध करते रहो । में एक ही वाण' से ( वालि 
का वध करके) सहज ही तुम्हें राज्य दिला दूगा । तुम निर्भभ होकर जाओ । तब विना 
किसी सकोच के तथा अत्यत उत्साह से सुग्रीव ने, नल, नील, हनुमानू तथा वलवान्‌ तार 
आदि को साथ लिये युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर किष्किधा के लिए प्रस्थान किया. । राम 
तथा लक्ष्मण उसके पीछे-पीछे चले । किष्किधा के निकट एक वन में प्रवेश करके उन्होने 
वहाँ से सुग्रीव को वालि पर आक्रमण करने के लिए भेजा । सुग्रीव शीघ्र किण्किया पहुँचा 
और नगर के बाहर खडे होकर भयकर गर्जन किया और अपने साथ युद्ध करने के लिए 
वालि को चुनौती दी । हाथी का चिघाडना सुनकर जिस प्रकार सिंह क्रोध में आ जाता है, 
वैसे क्रुद्ध होकर, शिवजी के चरण-कमलो को प्रणाम करके, रावण के कठो को अपनी 
वगल में दवानेवाले वालि ने आकर सुग्रीव का सामना किया । अप्रतिहत पराक्रमी, समान 
रूप, समान क्रोध, समान शवित तथा समान पराक्रम रखनेवाले दोनो वानर जूक गये और 


(८9 र॑ंगन/थ एॉयायएण 


एक दूसरे के घुटनों, जाघो, वक्षो, चाभियों तश्ना कटि-प्रदेशों को विचित्र ढंग से भुकाकर 
इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे पूर्व तथा परश्चिम के समुद्र आपस में युद्ध करते हो । 
उसी समय राम ने अपने घनूप पर वाण का सधान करके, उसे चलाने के विचार से, 
उन दोनो को देखा । कितु उनके वदन तथा रदन, पूँछ तथा बाहु, उदर तया अवर, उझू 
तथा पार्वँ, कक्ष त्था वक्ष, पैर तथा उँगली, वीक्षण तथा शिक्षण, वेष तथा भाषा, नाक 
तथा गाल, सिर तथा स्कव, पिडली तथा चरणबवुग्म, कर्ण तथा वर्ण, कठ तथा अगर, इन 
सब को एक समान देखकर, यह निर्णय नहीं कर सके कि इन दोनों में वालि कौन 
और सुप्रीव कौन ? तव राम ने मन-ही-मन आइचयंचकित होकर सोचा कि यदि 
वाण चलाऊँ, तो न जाने इनमें से कोन मृत्यु-मुख को प्राप्त हो जायें | यो सोचकर 


विना बाण चलाये ही रह गये । 


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यद्ध करते-करते अत्यधिक थक जाने पर भी सग्रीव ने अपनी सारी जक्ति तथा 
निपुणता लगाकर युद्ध किया, किन्तु वालि से परास्त हो गया । वालि की बलिप्ठ मुष्टियो 
के आधघातो के कारण वह घोंघो की थैली के समान हो गया और लवी सांसे लेता हुआ 
सोचने लगा--हाय रें, राम का विज्वास करके में क्यों आया ? इसका मुझे अच्छा 
पुरस्कार मिला । बस, वस, अब अपना रास्ता नापने में ही मेरा कल्याण है । यो सोचते 
हुए वह सुध-बुध खोकर, अपनी पूछ को कठ में लपेदे हुए, चारो ओर देखते तथा भूलते 
हुए ऋष्यमृक पर्वत पर भागा ओर मन-ही-मन दुखी होने लगा । 


ठीक इसी समय राम वहाँ पहुँचे । अनन्त विक्रमधा्म राम को देखकर सूर्यपृत्र ने 
सिर भुकाकर कहा--हे राजन, मेने आपका विश्वास करके अपना असमान वल-विक्रम 
दिखाकर वालि से युद्ध किया । क्रिन्तु आपने मेरी उपेक्षा की, मेरी रक्षा नहीं की, चुप- 
चाप देखते ही रह गये । सूर्य-वश में जन्म लेकर ऐसा अघर्म करना, क्या, आपको शोभा 
देता है ? हे देव, आपके सत्य तथा तेज का विश्वास करके मेने वालि को छेडा । नहीं 
तो में कहाँ और वालि कहाँ ? वालि को चुनौती देकर फिर बचकर आना असभव था । 
शायद किसी प(पूर्व-पुण्य के फल से वचकर मे पूर्ववत्‌ इस पर्वत पर पहुँच सका-। आपका विश्वास 
करने के कारण बत्रु के हाथो से पराजय और जग्-हेंसाई मुझे प्राप्त हुई । आपकें दया, 
साहस और शक्ति की अधिकता देखकर मेने आपका विश्वास किया था 7 


च्् 


इन वचनो को सुनकर राम वोले--हे सुग्रीव, तुम अपने मन में इंतना स्देह क्‍यों 
करते हो ? इसमें मेरा कोई दोप नही हैं। क्या मे तुम्हें शत्र के हाथ में सौंप दूँगा ? 
एक वात सुनो । विश्व-विमोहक आकारवाले विख्यात अद्विनीकुमारों के समान तुम्हारी 
गौर वालि की रूप-रेखा समान होने के कारण में तुम दोनो में भेद नहीं कर सर्का और 
वाण चलाने में मुझे भय हुआ; क्योकि यह अस्त्र अमोध है | इसलिए तुम इसे बुरा मत 
समभको । इस वार तुम इन गज-पुष्पो की माला पहनकर वालि से यद्ध करो । में अवश्य 
ही वालि का वध करूँगा । सदेह मत करो, दृढ़ निश्चय से युद्ध के लिए किष्किधा 
के लिए प्रस्थान करो ।' यो कहकर उन्होने अपने प्रिय अनुज से गज-पुप्पो की माला मंगवाकर 


हि. 


उसे सुग्रीव के कंठ में पहनाया । तब सुग्रीव नक्षत्रों से घिरे हुए चन्द्र के समान, 


किदिकथाकोड £४५६ 


७. ् 


बक-प क्तियो से अलकृत सध्या-गगन के समान, शरत्काल के बादलों के साथ विलसित मेंरु- 
पर्वत के समान सुशोभित दीखने लगा । 

तब राम तथा उनके अनुज बड़े हर्ष से युद्ध के लिए सन्नद्ध हुए। उसके पश्चात 
वे नल, नील, तारा तथा हनुमान्‌ के साथ सुग्रीव को साथ लिये हुए नदियो, पुप्पो से युवत 
लता-समूहो, पुन्नाग, नारंगी, कदली तथा सहकार-वृक्षो से भरे वनो को देखते हुए उज्ज्वल 
कैरव, पद्म तथा कह्लारों से शोभायमान, वहु सरोवरो का दर्शन करते हुए, गज, सिंह, 
वराह तथा जंगली भेसो को देखते हुए, वहुत दूर तक चल और वहाँ अग्नि-सम तेजस्वी 
सप्त जनाह्व! नामक मुनि के आश्रम का दर्शन किया । सुग्रीव के मुह से उस आश्रम 
का महत्त्व सुना । उसके परचात्‌ वालि के शासन में रहते हुए ऐश्वयं से सपन्न किप्किया- 
नगर को देखकर सुग्रीव से बोलें---तुम पूर्ववत्‌ जाकर वालि के साथ युद्ध करो, में अवध्य 
वालि का सहार करूँगा । यो कहकर उस पुण्यात्मा सुग्रीव को आदर के साथ भेजकर 
राम समीप ही एक पेड की आड में खडे हो गये । 


६. तारा का वालि को रोकना 


तब सूर्यनदन ने किप्किधा की सभी गुफाओ को विदीर्ण करते हुए घोर गर्जन किया 
और इन्द्र-सुत वालि को अपने साथ युद्ध के लिए ललकारा । वालि अत्यत क्रोधावेश में 
आकर सोचने लगा--'यह एक मद की तरह अपने बाहुबल का गव॑ कर रहा हैँ । अब 
इसका सहन करना उचित नहीं है, अब मे इसका वध कर डालूगा ।” 

इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली तथा जयशील वालि युद्ध के लिए निकला, 
तो अपने पति का मार्ग रोककर तारा कहने लगी,--हे देवेन्द्रददन, विना सोचे-विचारे आप 
सूय॑-पुत्र पंर आक्रमण करने क्यो जा रहे है ? अभी-अभी आपसे युद्ध करके वह घायल 
होकर भाग गया था । फिर इतना श्ञीत्र वह कैसे आ गया ? यदि आपसे कही अधिक 
बलवान की सहायता उसे नहीं मिलती, तो वह कदापि यहाँ नहीं आता । हें इन्द्र-पुत्र, 
यही नही, मेने अगद से और एक वात सुनी हैँ । अपने पिता की आज्ञा के अनुसार दशस्थ- 
राम वनवास के लिए आये थे । वहाँ दशकधर (रावण) ने उनकी पत्नी को हर लिया । 
वे और उनके भाई मुनि-वेश में सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे और सुग्रीव 
को अपना सेवक स्वीकार करके तुम्हें मारना चाहते हे । राघव स्वय विष्णु हे, कमलनाभ है, 
वैरियो को लिए भयकर रूप हे, दयालू हे, घीर है और घनुविद्या के गृर है । उनका शत्रु 
वनकर उनको जीतना असभव हूँ । आप प्रेम से सूर्य-पुत्र को अपना राज्य देकर, फिर 
राम से सधि कर लीजिए । यदि ऐसा नहीं हो सकता, तो मुनिबवृत्ति ग्रहण करके अपने 
प्राणो की रक्षा कीजिए ।॥” 

तारा के इन वचनो को सुनकर वालि अत्यत कुद्ध होकर बोला--मेरी पत्नी होकर 
तुम इतनी भयभीत क्‍यों होती हो ? में अपने बाहुबल से किसी भी बलवान पुरुष को 
युद्ध में जीतकर विजय प्राप्त कर सकता हूँ । मे कभी किसी से पराजित नहीं होऊंगा । 
जब शत्न्‌ आकर युद्ध के लिए ललकारे, तव अधीर होकर उससे सधि कर लेना वीरो का 
घमं नही हैँ । है कमलाक्षी, मेरे-जैसे वलवान्‌ के रहते, मुझे स्वीकार नही मरके, राम ने 

34 


९८६ रंगनार्थ रांचायणें 


सुग्रीव को अपवाया है । इसलिए जान पड़ता है कि राम नीतिवान्‌ नहीं हूँ । ऐसी दशा में 
राम की मित्रता स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं हूँ । सूग्रीव अनाथ होकर राम का 
सेवक वन गया हैं| मृ्े राम की क्‍या भावव्यकता हँ । सधि की कया आवश्यकता है ? 
में किसी की प्रार्थना क्‍यों करूँ ? वह महान्‌ पुरुष तथा धर्मात्मा राम, अकारण ही मेर्रा 
वध क्‍यों करेंगे ? (तुम्हारी) ये बातें सर्ववा असगत है । में अभी जाकर अपने भयकर 
वजन की समता करनेवाली अपने मुप्टि-प्रहरों से सुग्रीव का वब करके बाता हूँ। 
तुम निद्चत रहो ॥ ््ि 


» इस प्रकार के वचनों से तारा को संतुप्ट कर इच्ध-पुत्र वालि अपने पराक्रम, गक्ति 
तथा साहस के साथ इस ढंग से (युद्ध के लिए) निकला, मानो कर्मपाज् के आकर्षण को 
ठालने की शक्ति उसमें नहीं रही हो । उसने अपने गर्जन से सभी समुद्रो को क्षुव्ध कर 
दिवा; भू-वलय को कंपा दिया । उसके वाद वह सुग्रीव को डाँटते हुए भयकर स्वर में 
वोला--मेरे साथ युद्ध में हारकर, लज्जाहीन हो, फिर युद्ध करने आया हैं ? कोई वात 

नहीं | में अभी तुझे यम के मुह की वरी वनाऊँगा । डीगें मारना छोड़कर तू थोड़ी देर 
अटल खड़ा रह । म॑यूद्ध में अपने मुप्टि-प्रह्रों से तेरे प्राण हरण-करूँगा ।' 

इस प्रकार कहकर वालि ने वजन का परिहास करनेवाली, अपनी मुप्टि वाँवकर 
उससे ऐसा प्रह्मर किया कि सुग्रीव नीचे गिरकर रक्त उगलनें लगा । तुरत वह सेमल 
उठा और साहस के साथ खड़े होकर गर्जत किया और तिरस्कारपूर्ण वचनो से इन्द्र 
की निंदा करते हुए कहा--मे अब तक तुम्हारी उद्ृण्ढता केवल इसलिए सहता आ रहा था 
कि तुम मेरे भाई हो और पूज्य हो | ऐसी वात नही कि में तुमसे युद्ध करते से 
डरता हूँ । म॑ पहले का सुग्रीव नही हूँ । सोच-विचार कर मेरे साथ युद्ध करना । है वालि, 
में अवश्य अभी तुम्हारा वव कर दूगा और कपि-राज्य पर अधिकार करूँगा ॥' 


इंतना कहकर सुग्रीव ने अत्यधिक क्रोब से एक सालन्वक्ष को उखाड़कर तेजी से 
वालि पर फेंका । उसके लगते ही वालि कंपित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मूच्छित 
हो गया । थोड़ी देर के वाद वालि सचेत होकर दुर्वार गव और बड़े जौ तथा धैर्य के 
साथ . एक पर्वत उठाकर उस रविन्युत्र पर इस प्रकार फेंका कि देवता भी आइचर्यचकित 
रह गये । सुग्रीव ने उस पर्वत को अपनी प्‌छ से रोक विया । तब वालि ने सुग्रीव के 
पैरो पर प्रहार किया । सग्रीव ने अपने तेज नखो से वालि का गरीर नोच डाला । वालि वे 
उग्र रूप घरकर सूम्रीव पर मृप्टि का प्रहार किया । क्रमण: दोनों अपनी अमित शक्ति 
का प्रदर्शत करते हुए एक-दूसरे की शिखाओों को पकड़कर पदाघातों से, नखो से. मुष्टियो से, 
एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, गर्जेन करते हुए, हुंकार भरते हुए, घोर युद्ध करने 
लगे। उनके अंग्रो से रक्त की बारा वहने लगी । वे अपनी वाहुओ तथा पूछो को दूसरो की बाहुओ 
तथा पूछो -से फेंसाकर, परस्पर घक्का देते हुए, फिर दूर हटते हुए, अपना सारा बल 
लगाकर परस्पर प्रह्मर करने लगे । इस प्रकार अत्यंत भयंकर रीति से जब वें लड रहें थे, 
तब इन्द्रन्युत वालि के आधातो से रवि-पुत्र सुग्रीव बहुत घायल हुआ । वह गे खोकर, 
ब्याकुल जौर भयभीत हो, अपने जोठो को आाद्रे करते हुए, दीन दृष्टि से चारो ओर देखने लगा । 


जे 


#किाड्कधाकोंड £८७, 
७, वालि का संहार 


निग्रह तथा अनुग्रह के निधि राम ने जब देखा कि सुग्रीव अब क्लात तथा खिन्न 
हो गया हूँ, तव सोचने लगे कि यदि में अब वालि का वध नही करूँ, तो वह अवश्य ही 
सुग्रीव को मार डालेंगा । तब राम ने सप्त समुद्रो तथा सप्त लोको को क्षुब्य करते और 
समस्त भूतो को केँपातें हुए, अपने धनुष का टकार किया, वालि को तृणवत्‌ मानकर, लक्ष्य 
को साधा, और एक अमोघ अस्त्र का सघान करके उसे उस असमान वलजाली वालि पर 
चलाया । तब वह बाण अपनी सूर्य-तेज सदृश काति को सारे आकाश-मडल में विकीर्ण 
करने तथा भपकर अग्नि-शिखाओ को फैलातें हुए, गरुढड, उरग, अमर, ग्रवर्वों को भयभीत 
करते हुए ऐसे वेग से चला, मानो अपने पुत्र की रक्षा करने तथा शात्र को दण्डदेने के लिए 
सूर्य ही अस्त्र के रूप में जा रहा हो, अथवा सूर्य-पुत्र होनें के कारण यम घर्मराज ने ही 
अपने अनुज सुग्रीव की रक्षा करने के लिए, अपना काल-दड वालि पर चलाया हो । वह 
वाण सीधे जाकर वालि के उर में लगा । वालि पृथ्वी पर ऐसे गिरा कि दिग्गजो, परवव॑तों 
तथा वृक्षों के साथ पृथ्वी काॉँप उठी । वह बाण वालि के उर के पार निकलकर पृथ्वी में 
धंस गया । अविरल वहनेवाली रक्त की धाराओ से वानरेश्वर का सारा शरीर भीग 
गया और वह इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो पुष्पित अशोक-वृक्ष आँधी में गिर गया हो, 
अथवा प्रलय-काल में कातिहीन होकर पृथ्वी पर गिरा हुआ सूर्य हो | तब पृथ्वी पर 
विवश पडे हुए उस वालि के पास राम आये । 
अपने समीप पहुँचे हुए रघुराम को देखकर मन-ही-मन कुपित होता हुआ वालि 
कहने लगा-- हे राघवेश्वर, हे रामचद्र, इस पृथ्वी पर लोग आपको घर्मात्मा कहते है । 
आप दम-शम, दया, सत्य, सम-बुद्धि, नीति, सोजन्य आदि सद्गुणों के भाण्डार हे । ऐसे 
होते हुए भी आपने अपनी महत्ता को त्यागकर मेरे और सुग्रीव के युद्ध करते समय 
हमारे वीच में आये और मेरे ऊपर वाण चलाया, क्‍या यह आपको लिए उचित है ? 
मेने आपका कोई अपकार नही किया है । मेने कभी आपकी बुराई नहीं सोची । में आपका 
शत्र्‌ भी नहीं हूँ। में जानता भी नही हूँ कि आपके शत्रुओं ने आपका क्‍या अहित किया हूँ । 
उन बातों को जानकर मेने आपकी उपेक्षा की हो, सो भी नहीं। फिर भी आपका 
ऐसा करना, क्‍या उचित है ? हे सूर्य-कुल-तिलक, आप जानते हुए भी अनजान वनकर रहे । 
ससार में राजा लोग, शरभ, सिंह, शार्दूल, कोला, गज, हिरण आदि का सहार करने 
की लिए म॒गया खेलते हँ। भला, कही कोई वानरों का वध भी करता है ? सूर्य-पुत्र तथा में, 
दोनों भाई-भाई है। गर्वाघ हो, ऋूर बनकर, हम चाहें जैसा भी आचरण करें, आपका इस 
प्रकार मेरा सहार करने का क्या कारण है ? खरगोश, नेवला, कछुआ, जगली सूअर आदि 
जानवर खाद्य होते हे, किन्तु वानर को कोई खाता नहीं है । फिर आपने आड में छिपकर 
क्यो मेरा! वध किया ? हे राजन, अब आप अपने अनुज के साथ मेरे रत-मास का भोग 
लगाइए । उज्ज्वल कीत्तिवान्‌ू, जगह्विस्यात दशरथ की आज्ञा से बन में तपस्वियों कान्सा 
जीवन व्यतीत करने के लिए आप आये, फिर भी जीव-हिंसा का त्याग नहीं किया । 
यदि इस पृथ्वी पर रहते हुए हम कोई अपराध करते हूँ, तो उसके लिए दण्ड देने का कार्य 


श्ठ्ज रंगनाथ रायायण , 


भरत का हूँ । आपका इससे क्या सवध है ? क्‍या आप राजा हैँ ? आपने मुझे नहीं 
अपनाकर मेरा वध कर डाला । अपनी पत्नी को हरकर ले जानेवाले नीच रावण को 
जीतने के उद्देश्य से आप आये हे । आपने मेरी अवहेलना की और सूयं-पुत्र को अपनाया । 
इस प्रकार आप इस लोक में नीति-रहित-से हो गये । यदि यह समाचार आप मुझे देते, 
तो क्‍या मे आपकी पत्नी को छुडाकर नहीं ला देता ? जो महावलवान की तरह आकर 
सीताजी को चुराकर ले गया, उसे मेंने अपनी पूछ की रोमावली से वाँधकर सभी समुद्र 
में डबोया था और अत में उसपर कृपा करके उसे छोड दिया था । मेरा बाहुबल सारा 
ससार जानता है और सूत्रीव भी जानता है | हाय! मुभे भयभीत करके मार डालने की 
शक्ति रखनेवाले आप, मेरे सामने खड़े होकर, मुझे ललकार कर, मुकपर आक्रमण 
करके मार न सके । भय से आड में छियकर आपने मुझे मारा । क्‍या यही 


राजबमं हैं 7 


वालि के इन वचनों को सुनकर राम ने कहा--है वालि, ये वातें तुम्हें गोभा नहीं 
देती । तुम कपि के वच्च में पंदा हुए और कपियो क॑ वीच में पल हो । घर्मचास्त्र की 
नीति न जानते हुए भी वाचाल के समान मेरे दोप गिना रहे हो। यह न्‍्यायसगत नही है । 
तुमने जो वचन कहे, उनके प्रत्युत्तर में मेरी कुछ बातें ध्यान देकर सुनों । ससार के 
प्र्माचा्यों की सम्मति हूँ कि अग्रज को चाहिए कि वह अपने अनुज को अपने तनुजवत्‌ 
(पुत्रवत्‌ू) पाले । तुमने उस नियम का उल्लंघन किया । निरपराघथ सूर्य-पुत्र को तुमने 
नगर से निर्वासित किया । ऐसा कामान्ब, तुम्हारे सिवा इन तीनो लोकों में और कौन हो 
सकता है । दूसरी वात यह है कि जब हम दोनो (में और सुत्रीव) मित्र है, तो तुम मेरे 
मित्र के झत्रु होने के कारण तुम्हारा वध करना मेरे लिए उचित ही था । मृगया खेलने- 
वाले निष्कलक राजा, सजातीय पद्ु-पक्षियों की सहायता से मृगो का जिकार करते है, था 
एक मय को किसी दूसरे के साथ लडते समय उसको मारते हे, या भाड़ी में छिपकर 
उसका शिकार करते हँ या जाल फैलाकर मारते हे, या अकारण ही मारते है, या आड में 
खडे होकर गिकार खेलते हे, या कटघरा सजाकर शिकार खेलते हे । इसलिए मुझे किसी 
भी प्रकार से इसका दोष नहीं लगेगा । तुम तो शाखा-मृग ठहरे । तुम्हारा वध में किसी 
भी प्रकार करूँ, तो उसका दोष मुर्के क्यो लगेगा ? अपने श्रेष्ठ बाहुबल से समस्त जगत 
के स्वामी (वर्ने हुए) भरत की आज्ञा से हम दुष्ट मृग तथा राक्षसों का वध करते रहते हे । 
तुम अपने अनुज की पत्नी को वलात छीननेवाले पापात्मा हो । इसलिए हमने तुम्हारा 
वध किया । राजाज्ञा से दण्डित व्यक्ति नरक के सकटो को प्राप्त नहीं होते | इसलिए 
तुम दु खी न होजो गौर स्वर्ग-सुख को प्राप्त करो ।॥' 


रघुराम के इन वचनों को सुनकर वालि थोडी देर तक आँखें बद किये हुए विवश 
पड़ा रहा और उसके पव्चात्‌ कातियुकत पूर्णचद्र रामचन्द्र को देखकर कहा--हे शुभ नाम- 
वाले राम, है भयंकर किरणवाले, हे चद्रसम मुखवाले, मेरी पत्नी तारा ने आप प्रभु के 
शौर्य का परिचय देकर मुभसे अनुरोध किया था कि आप युद्ध में मत जाइए । मेने अपनी 
दुर्वृद्धि के कारण, विधि की प्रेरणा से, उसकी वात पर ध्यान नहीं दिया और आपके शत्रुता 


फिव्किधाकोंड ८6 


करके इस प्रकार पृथ्वी पर पडा हुआ हूँ । क्रोध के आवेश में मेने मूर्ख हो, आपको अप- 
शब्द कहे हे । आप मुझे क्षमा कीजिए । हें राजनू, में अपनी दुर्दशा की चिन्ता नहीं 
करता, तारा के लिए भी चिन्ता नहीं करता, किन्तु अपने पुत्र अगद के लिए मे व्याकुल 
हो रहा हूँ । मेरी पत्ती और पुत्र की न जाने क्या दशा होगी । मेने नहीं सोचा था कि 
मेरी ऐसी दु्दशा होगी ।' इस प्रकार कहते और शोक तथा मोह-रूपी समुद्र में डूबे हुए 
(मूक की तरह) मूच्छित हो पडा रहा । 


्त. 


यह समाचार जब (वालि के) रनवास में पहुँचा, तब तारा आदि स्त्रियाँ वालि के 
वध का हाल जानकर अधीर हो उठी और उनके हृदयों पर वज्त के समान आघात हुआ । 
वे सब पछाड खाकर पृथ्वी पर गिर पडी । वे एक क्षण होग में आती, फिर दूसरे ही 
क्षण मूच्छित हो जाती । वे अत्यधिक सतप्त हो, वालि का नाम ले-लेकर पुकारती हुई 
चिल्ला-चिल्लाकर विलाप करने लगी--है अगद, हाय, आज वालि का स्वर्गवास हो गया है ।' 
फिर वे अत्यधिक शोक में डूबी हुई उच्च स्वर में रोती हुई अगद को साथ लेकर 
किप्किधा नगर से वाहर निकली । चलते समय उनके पैर लडखडाने लगे, उनके अचल 
खिसक गये, उनकी वेणियाँ खुल गईं, होठ कपित होने लगे, आँखों से अश्रु-चारा बहने लगी 
और उनकी क्षीण कटियाँ इधर-उधर हिलने लगी । इस प्रकार जब वें आ रही थी, तब 
मार्ग में ही वानरो ने उन्हें सूचना दी कि राघव के हाथो से वालि का वध हो गया है । 
अब तुमलोग क्यो जा रही हो ? यदि वहाँ जाओगी, तो अवश्य कोई-त-कोई विपत्ति 
आयगी । क्या तुम नहीं जानती कि राम तथा सुग्रीव मिल गये है । न जाने, वे इस अगद 
को पकड़कर क्या करेंगे ? हमें शत्रुओ के मन का विश्वास नहीं करना चाहिए । अत. 
हम अब अगद को ही अपना राजा बनायेंगे । वैसे तो हमारे यहाँ अनेक वृद्धिमान्‌ 
मत्री है | तुम वहाँ मत जाओ ॥' 


5, तारा का शोक रण 

त्तव तारा, औचित्य का विचार करके, उन कपियो की बार-बार निदा करती हुई 
बोली--यदि में अपने प्राणनाथ वालि को न देख सक्‌ू” तो मुझे यह अगद किस लिए और 
यह राज्य ही किस लिए हैँ ”” इस प्रकार उनकी वातों की परवाह न करके, वह चद्रमुखी 
तारा मन-ही-मन वालि का स्मरण करती हुई अपने कुचों को देखकर अत्यत शोक-सतप्त 
होकर कहने लगी--द्वर से ही अमरंद्ध-पुत्र का आगमन देखकर, यत्न करके, उनके निकट 
पहुंचकर, रति-क्रीडा की अभिलाषा करके उनसे टकराते रहने के कारण ही तो आज तुम 
उस सुरराज के पुत्र को खो बैठे । अपने किये का फल तुम अब भोगों। यो कहकर 
अत्यधिक क्रोध से वह अपनी छाती पीटने लगी । उमडते हुए शोक से जब वह चलने लगी, 
तव उसके हार छिन्न-भिन्न होकर गिरने लैंगे । वेणी खुल गई । जैसे कमल से मकरद 
भरता हूँ, वैसे ही उसकी आँखों से अश्रृ गिरने लगे । वह पवन के वेग से वालि के निकट 
पहुँच गई और तरू से टूटकर गिरनेवाली पुष्प-लता के समान वालि पर जा गिरी और 
वार-वार परितप्त होती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी--हे कपिकुलाधीम, हे कपि- 
राजचद्र, हे कपिराजशे खर, हे कपिसार्वभौम, समस्त सुरासुर-समूहो में तुम अवलक शक्तति-शाली हो, 


१69० रंगनाथ रायायग', 


तुम विध्याद्रि को उखाड़कर फेंके तथा उन्हें व्याकुल करने में समर्थ हो, 
तुम महावलज्नाली, त्रिभुवतों के पालव करनेवाले, कुल-पर्वतोी को भेंदनेवाले (इन्द्र) के 
« पुत्र हो । कोलबु नामक क्र गवर्त का सहार करनंवाले युद्ध-वीर तुम ही तो हो । ऐजे 
तुम, एक मानव क॑ हाथो से ऐस्री नीच मृत्यु को प्राप्त हुए । अब में क्‍या कहूँ ? सूर्य-पुत्र 
तुम्हारा सामना करने की जक्ति नहीं रख सकने के कारण तुम्हें यूद्ध में मारे के लिए 
राम को साथ लेकर आया था । मेने तुम से कहा था कि राम को जीतना असंभव है; 
तुम युद्ध में मत जाओ । मेरी वात तुमने नहीं मात्री; मेरा सर्वस्व तुमने हर लिया । 
मेने कहा कि वह महात्मा विप्णू ही है, उनके निकट मत जाओ । यह भी कहा कि वह 
महान्‌ भूर है, तुम अपना प्रताप त्याग दो । तुमने नहीं जाना कि राम तुम्हारा सहार करने 
आया हुआ यम ही हैं | तुमने उनसे दुख पाण । जब समुद्र का मथन करतें-करते देवासुरो 
की सारी घक्ति शिविल हो गई थी और वे क्लान्त होकर पड़े हुए थे, तव तुम्हारी जिन 
भुजाओ ने वासुकि को मदर पर्वत से लपेटकर, समृद्र का मथन करके तीनो लोको में 
अपनी श्रेष्ठ चक्ति का परिचय दिया था, वे ही आज बूलिसे सनी हुई है । महान्‌ शक्ति- 
गाली राक्षसराज (रावण) को अपनी दृद्द मुप्टि में पकड़कर उसको व्ण्कुल करते हुए 
सभी समुद्दों में डुवोवेवालो तुम्हारी पूछ आज मिट्टी में लोट रही है । नीलकठ के 
त्रीचरण-कमलो में भ्रमर के समान भुकनेवाला तुम्हारा सिर आज निरी पृथ्वी पर पढ़ा है । 
हे हृदयेग्वर, में तुम्हें छोड़कर जीवित नहीं रह सकती, जहाँ तुम जाओगे, वही में भी 
जाऊँगी । इस वेदना को सहना मेरे भाग्य में लिखा था । में अपनी अनाथ अवस्था के 
कारण दु खी नही होती । हे इच्द्र-नदन, में आपके प्रिय पुत्र के लिए गोक करती हूँ । 
हैं स्वामिन्‌, तुम्हारा पुत्रधूल में सने हुए तुम्हारी गोद में लोट रहा है । उसे क्यो नहीं अपनाने ? 
हैँ राजनू, अपने पुत्र अगद को अपनी जाँघों पर बैठाकर, प्रेम से उसका सिर सूधकर, 
उसके गालो पर हाय फेरकर, उसे चूमते हुए, उसको रोने से क्यों नही रोकते ?' 


इस प्रकार विलाप करती हुई और उम्रड़ते हुए शोक से उसने सुग्नीव को सवोधित 
करके कहा--वालि के सामने खड़े रहने की क्षमता न रखने के कारण, कई वार कायर 
के समान तुम भाग गये और अनाथ की तरह जाकर राघव को साथ ले आकर कपट- 
विजय के वाद तुमने किप्किवा को जीता। तुमने जो चाहा, वही हुआ । तुम्हारा प्रतिशोध 
पूरा हुआ । अब कपियों का राज्य लेकर उसका पालन करो । संधि की वार्ते (मित्रता 
की वातें) करके राघव को यहाँ लाने के लिए हनुमान्‌ तो तुम्हारे साथ हे ही ॥ मत्रणा 
के लिए तुम्हारे पास नल, नील तथा तार भी है । (अब तुम्हें किस वात की कमी है?) 


इमपके परचात्‌ उस कमलाक्षी ने रघुराम को देखकर कहा--हे राजन, आपने वालि 
का संहार क्यों किया ? हे रघुराम, क्‍या वालि ने आपकी ऐसी दबच्ना कर देने के लिए 
(वनवास की बाज्ञा देने के लिए) आपके पिता को परामर्ण दिया था ? हे रघुराम, वेंया 
वालि आपके राज्य-सुख को छीवनेवाला भरत था ? क्या वालि दुप्टता करके आपकी 
पत्नी को चुराकर ले जानेवाला रावण था ? आपने वालि से अकारण वर ठानकर इस 
प्रकार उसके सहार क्यो किया ? आपजजैसे पुण्यात्मा, आप-जैसे प्रभु नौर, आप-जैसे करुणानिधि को 


* काविकिधाकांड १६ 


क्या ऐसा करना उचित हैँ ? क्‍या जानकी के साथ आपका विवेक भी चला गया ? 
क्या घोर विरहाग्नि में आपका ज्ञान भी जल गया ? हे राजन, मेरा भाग्य ही 
आज ऐसा हो गया हैँ । अब में क्‍या करूँ ? होनहार को में कैसे दोष दूं"? में वालि को 
छोडकर नहीं रह सकती । हे देव, आप मेरा भी वध कर डालिए।' 

इस प्रकार विलाप करती हुई वह अपनी छाती और मुह को पीटती हुई रुदन 
करती रही । तब हनुमान्‌ ने तारा को देखकर कहा--क्या ऐसी कोई घर्म-वीति हे, जिसे 
तुम नही जानतीं ? युद्ध में स्वर्ग को प्राप्त होनेवाले वीर वालि के लिए इस प्रकार तुम 
शोक क्यो करती हो ? ये सब काये भगवान्‌ की इच्छा के अनुसार चलते हैँ ।” इस प्रकार 
वह नीति-विलक्षण (हनुमान) बार-बार तारा को समभाता रहा । 


९, वालि का सुग्री को उपदेश देना 


इतने में अभरद्ध-पुत्र ने आँखें खोलकर अपनी पत्नी का अवर्णनीय शोक तथा अगद 
के उससे भी अधिक कठोर दुख को देखा और फिर सूर्य-नदत को सवोधित करके कहा-- 
हूँ भानु-पुत्र, राम के द्वारा आज समस्त ससार के समक्ष तुम्हारा प्रतिशोध पूर्ण हुमा । 
इस प्‌ थ्वी पर राजाओं की कृपा का कभी विश्वास मत करना । अपनी बुद्धि का विश्वास 
करक सावधान होकर व्यवहार करना । तुमने राम कोजो वचन दिया था, अब उसका 
पालन करने का प्रयत्न करो । मायावी पुरूहूत जब लगातार अपनी सारी शवित लगाकर, 
अनवरत युद्ध करके हार गया था, तब मुझसे सतुप्ट होकर उसने यह हेमन्मालिका दी थी । 
इसे तुम धारण करो । यही कपि-राज्य का राज-चिह्न होगा | भव इस अगद के शोक 
को, दूर करो । तुम मेरे समान ही उसकी रक्षा इस प्रकार करो कि वह मुझे भूल जाय । 
सुषेण की पुत्री यह तारा बुद्धिमती है । इसके परामर्श के अनुसार तुम आचरण करो और 
मेरे सब अपराधों को भूल जाओ । अब मेरे-प्राण नही बचेंगे, लो, इसे रत्न-मालिका को 
भी ले लो ।” यह कहकर उसने शोक से सिर भुकाये खडे रहनेवाले सुग्रीव को बुलाया। 


तब सुग्रीव ने रघ्राम की अनुमति प्राप्त करके उस हेम-मालिका को बडी भवित के साथ 
धारण किया । 


इसके -परचात्‌ वालि ने बडे प्रेम से अग॒द को देखकर कहा-हें उत्र, भव तुम शोक 
त्यागो । सुत्रीव के रहते हुए तुम्हें ्ञोक करने की क्‍या आवश्यकता है ” सूर्य-पुत्न मुझे 
भी अधिक प्रेम से तुम्हारा लालन-पालन करेंगा । सुग्रीव जो पद तुम्हें दे, उसी में सतुप्द 
रहना । तुम्हारी कीत्ति अमर रहेगी और तुम्हें श्रेष्ठ सुख प्राप्त होगे । तुम्हें किप्किधा का 
राजा बनाकर उसे देखकर आनन्द पाने के योग्य पुण्य मेने नहीं किया था । अब मे स्वयं 
को जा रहा हूँ-। > - 

इसके उपरान्त वालि ने रघराम को अत्यत प्रेम से देखकर कहा--हे राम, अत्यधिक 
गव॑ करके, मेरा सुत्नरीव से जूमना ही मेरे लिए अतिम पथ्य सिद्ध हुआ । वही मेरी 
मृत्यु का कारण सिद्ध हुआ । यह अगद निर्वेल हैं । यदि वह कोई अपराध करे, तो उसे 
सहन कीजिएगा । हे सर्य-त्रश-तिलक, सूर्य-पुत्र के वाद इसको राजा बनाइए। वेद-भास्त्रा के 
अध्ययन-मात्र से विसी को तुम्हारे दर्शन नहीं प्राप्त हो सकते । आपका आादि, मध्य तथा 


शहर र॑ंगन/थ एार्म/कर्ण 


॥०-ह 


अत नहीं हैं । प्राणो के जाते समय आपने यहाँ पधारकर मुझे दर्शन दिये । परलोक में 
जाने पर ही जिसके दर्शन सभव होते हे, (उसके दर्शन) मेने अभी प्राप्त कर लिये है । 
में कृता्थ हुआ । हे सूर्य-बच्न-तिलक, हे परमकल्याण-रूप, अब मेरे प्राण नहीं वचेंगे। 
कृपया यह वाण (मेरे गरीर से) निकालिए । राम की आजा पाकर नील नें उस दिव्य 
वाण को वालि के गरीर से बाहर निकाला | तब वालि ने पवन की गति को अपने 
शरीर में रोककर, उस रुद्ध पवन की सहायता से अपनी चित्त-वृत्ति को निश्चल वनाकर, 
उस सुदस्मूत्ति श्रीराम को मन में थारण करके, ब्रह्मानद का अनुभव करते हुए ब्रह्मरभ्न के 
द्वारा अपने प्राण छोड दिये । 

तब तारा आदि स्त्रियाँ वालि के शरीर पर गिरकर वार-वार हाहाकार करती हुई 
विलाप करने लगी। अगद, सुग्रीव तथा वहाँके सभी कपिब्युगव हाय, वालि तुम हमें 
छोड़कर चले गये !” कहते हुए विलाप करने लगे । तब सौमित्र ने सुग्रीव तथा अन्य 
कपियो को सात्वना देते हुए कहा-- हे हनुमान्‌, तुम तुरत वस्त्र, माला, कर्पूर, चदन बादि 
मंगवाओं । हे तारे, स्वर्ण तथा रत्नों से निर्मित शिविका ज्ञीन्न मंगवाओ । उन्होने वैसा 
ही किया । सभी वनचर वहाँ पहुँच गये । सूर्य-पुत्र ने तारा आदि स्त्रियों का दुख शान्त 
किया । रामचन्द्र की आज्ञा प्राप्त करके सुग्रीव, अगद, हनुमान्‌ आदि ने वालि की उत्तर 
क्रियाएँ ययाविधि समाप्त की | दस रात्रियों तक शेष क्रिया-्कर्म पूरे किये और परिशणुद्ध 
होकर रामचद्र के सम्मुख उपस्थित हुए । 


१०, सुग्रीव को किष्किधा का राजा वनाना 

तव राम ने अत्यत हपे से उन कपि-तायकों को देखकर कहा---अभब तुमलोग मेरा 
आदेश मानकर किप्किवा नगर को सजाओ और कपिराज के सिंहासन पर सुग्रीव का राज- 
तिलक करो तथा अग॒द को युवराज के पद से अभिषिक्त करो । तुरन्त सभी वानर-दण्ड- 
नाथक एकत्र होकर किबल्किवा चले आय । उन्होनें सारा नगर सुदर ढग से सजाया । 
सारा नगर, नृतन झ्ूगारो से सुसज्जित भवन, रत्नो की वेदियाँ, रमणीय हीरो के चौकों 
से अलंकृत द्वार, मुरम्य ध्वजाएँ, विशाल तथा सुगरधित जल से सिक्‍त राज-मार्ग तथा उनमें 
सचार करनेवाले निरुपम सुदराकार पुरजनो से परिपूर्ण दीखने लगा । उन्होने राजसभा का 
भी अलकार किया, मानों वह अत्यधिक ऐश्वर्य-रूपी समुद्र का आवास हों । वद तथा 
नदियों का जल मेंगाया और विविध भमगल-द्वव्यों को एकत्र किया । इसके पश्चात्‌ उन्होने 
सुदर पुण्य मुहूत्त॑ में पुण्याह वचन का उच्चारण करते हुए कपिसिंह (सुत्रीव) को सिंह के 
चर्म से अलक्ृत सिंहासन पर विठाया और जिस प्रकार देवता इन्द्र का अभिषेक करते है, 
वैसे ही उज्ज्वल तथा पवित्र ढंग से श्रेष्ठ वानरो ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया। परुण्य- 
स्त्रियाँ रत्नो की वर्षा करने लगी | तदनतर उन्होने अगद को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित 
किया । तब सारे अतपुर तथा नगर में अत्यधिक आनद छा गया । नल, नील, तार, 
हनुमान्‌ तथा सर्गे-सवर्धी सुग्रीव से बडे प्रेम से मिले । अन्य वानर-राजाओ ने हाथ जोड़कर 
बड़े हप॑ से उसकी प्रशंसा की । तब सुत्रीव ने अपनी विशाल सपत्ति को प्राप्त करके, वडी 
प्रसन्नता से रत्न-राशि वानरों को भेंट की । तत्प्चात्‌ सुग्रीव ने अपनी वानरूसेना के 


ककिड्किधाकाड' €4३ 


साथ रामचेद्र के निकट पहुँचकर बडी भक्ति से उनके चरणों में प्रणाम किया और ह्माथ 
जोडकर बडे प्रेम _तथा आनंद से कहने लगा--हे विश्वेण, अब आपको यहाँ ठहरने की 
क्या आवश्यकता है ”? आप क्ुपया मेरे नगर में पधारें ।' 


११. राम का माल्यब॑त्त पर पहुँचना 

तब राम ने सुश्रीव को देखकर बडे प्रेम से कहा--हे सूर्य-पुत्र, तपस्वियों को नगरों 
में निवास नहीं करना चाहिए, इसलिए किष्किधा नगर हमारे रहने योग्य नही हैँ । आपाढ़ 
का महीना आ गया है, अत शरत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए यह समय अनुकूल नहीं है । 
मे वर्षाऋतु में किसी तरह माल्यवत पर अपने दिन व्यतीत करूँगा । तुम किप्किधा 
मे जाकर रहो । शरत्काल के आते ही हम झनत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान 
करेंगे ।/ इन वचनो को कहकर राम ने उसे बडे आदर के साथ विदा किया और उस 
स्थान को छोडकर वे अपने अनुज क॑ साथ माल्यवत पर्वत पर जा पहुँचे । 

पव॑त पर पहुँचकर राम कुसुम सदुश कोमल सीता के गुण, वय तथा असमान रूप- 
विलास को मन-ही-मन सोचते हुए अत्यधिक दुख में मग्न हो रहे । 

उस समय आकाश में, सूर्य के प्रकाश को ढँकते हुए वादल इस प्रकार घिर आये, 
जैसे सीता के वियोग से दुखी होनेवाले राम को घेरकर दुख बार-बार आता था | बादलों 
में से निकलकर विजली इस प्रकार जहाँ-तहाँ अपनी चचलता दिखाने लगी, मानों वह बता 
रही हो कि रावण का राज्य राम के द्वारा विचलित हो जायगा । वायु के साथ घूल इस 
प्रकार आकाश की तरफ उड़ने लगी, मानो पृथ्वी देवताओं को इस बात की सूचना देने 
जा रही हो कि इक्ष्वाकु-वल्लभ (राम) देंवलोक के छात्र (रावण) पर आक्रमण करने जा 
रहे हैं । आकाश में इद्र-धनुष इस प्रकार सुशोमित हो रहा था, मानो युद्ध में राक्षसों का 
वध करने के लिए यम ने अपने हाथ का काल-पाश भेज दिया हो । आकाश में जहाँ-तहाँ 
मेंडराते हुए मेघ ऐसे गर्जन कर रहें थे, मानो राम की सहायता के लिए देवताओं की भेजी 
हुई सेना, भेरी-निताद कर रही हो । प्रथम वर्षा की वूंदें जहाँ-तहाँ इस तरह गिरने लगी, 
मातरो वर्षाकाल-रूपी पुरुष के, आकाश-लक्ष्मी से बड़े प्रेम से भेंठ होने पर, उसके (मोतियो 
के) हार टूटकर उसके मोती पृथ्वी पर गिर रहें हो । जहाँ-तहाँ घरती के भीतर से भाँप 
इस प्रकार निकलने लगी, मानो (राक्षस के हाथो में) फेंसकर कैद में पड़ी हुईं अपनी पुत्री 
का स्मरण करके धरती माता दुख से पीडित होकर निश्वास छोड रही हो। आकाश्ष में 
उमड-घुमडकर दौडनेवाले बादलों को देखकर चातक पक्षी ऐसे फूल उठे, मानो राम-लक्ष्मण- 
रूपी मेघो को देखकर सुर-लोक के चातक आनद से फूल उठे हो । मेघ के घर-धर' गर्जन 
के साथ लय मिलाकर मयूर केका करते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानों मर्देल की 
'घी-घी-धप' की ध्वनि से लय मिलाकर नत्तेकियाँ संगीत के साथ नृत्य कर रही हो। भवकर घोष 
करते हुए वज्ञ पर्वत के शिखरो पर इस प्रकार गिरने लगे, मानो वे यह प्रकट कर रहे ही 
कि राक्षसों के अगो पर राम के वाण इसी प्रकार गिरेंगे । अत्यधिक अरुण वर्ण बाद 
करके इद्रयोप (वीरवहूटी) पृथ्वी पर इस प्रकार बिखर गये, मानो वे यह श्रकंह करते हा 
कि राक्षसराज के शरीर के मास के टुकड़े इसी प्रकार रण-भूमि में बिखर जायेंगे । 


२५ 


(२५:॥ '... एग्नाथ र्यायर 


ओले इस प्रकार पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो रावण का सहार करते समय देवता हर्पित 
होकर दिव्य पुप्पो की वृष्टि करेंगे । राजहसो का भुंड इस प्रकार धीरें-बीरे 
वहाँ से क्रौच-गिरि पर चले गये, मानो राम के प्रताप के कारण रावण की कीत्ति-परपरा 
लप्त हों जायगी । सूर्य के चारों बोर का परिवेश ऐसा दीखने लगा, मानो उसने इस विचार 
से अपने चारो ओर एक सुदृढ प्राचीर वना लिया हो कि मेरे पुत्र सुग्रीव ने युद्ध में इद्ध 
के पुत्र को मरवा डाला है, इसलिए इच्ध मेरे ऊपर क्रोव न करें । वर्षा की थारा ऐसी 
दीखने लगी, मानों अघट उत्साह से आकाण-यगगा में स्तानार्थ गई हुई नाग-कन्याएँ फिर से 
रसातल को लौट रही हो । मेंढक जहाँ-तहाँ ऐसे अदुभुत ढग से स्वर-भेद दिखातें हुए टर- 
टराने लगे, मानों वे उस महान्‌ व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रणसा कर रहे हो, जिसने उन्हें 
प्रचुर मात्रा में जीवन-दान किया हैं । सारी बरती पर नीला पक ऐसा दीख रहा था, 
मानों सेघो ने वर्पाऋतु-हपी व्यू के गरीर पर कस्तूरी लपेट दी हो । जल-प्रवाह जहाँ- 
तहाँ के तालावों में इस कारण से ठहर गया, मानों वह बह सोचकर डर रहा हो कि 
समुद्र में मिल जाने से श्रीराम के वाणों की जग्नि से तप्त होना पडेगा । वडी-वडी नदियों 
का जल इस प्रकार भँवरों में चक्कर काठता हुआ घोर बव्द करता हुआ, समुद्र में प्रवेश 
कर रहा था, मानों वह भयभीत हो कह रहा हो कि लोक-कटक राक्षस को मेने अपनी 
गोद में स्थान दिया है; काकुत्स्थ-वंधज राम मुझे वधन में डालेंगे । 

कुछ दिनो में वर्षा समाप्त हुई, आकाश में दीखनेवाले मेघ विलीन हो गये । 
अपनी किरणो को सारे लोको में फैलातें हुए सूर्य सर्वत्र प्रकाशमान होने लगा । पृथ्वी 
कीचड़ से रहित हो गई । सरोवूरो में कमल सुदर रूप से दीखने लगे । मत्त गज अपने 
दाँतो से टीलों को खोद-खोदकर मिट्टी उछालने लगे । रात्रि -चद्रिका तथा नक्षत्रों से 
सुमोभित हो उठी । हस सरोवरो में निवास करने के लिए लौठ आये और मृणालों का 
भक्षण कर सतुप्ट हुए । ईख, लाल-लाल घान तथा पकी फसलें प्रचुर हो गईं । वृषभ- 
समूह गर्जव करने लगा । जल का गेँदलापन दूर हो गया और वह स्वच्छ दीखने लगा-तथा 
वात्रियो को (इससे) सुख मिलने लगा । आवाश में मेघ निर्मेल दीखने लगे । जल कम हो 
जाने से नदियाँ पार करने योग्य हो गईं । 

इसके कुछ दिन पूर्व हवृमान सूर्य-पुत्र से मिलकर कहने लगा---'शरत्काल जा गया है, 
अव श्रीराम का कार्य संपन्न करना -चाहिए। अत सब वानर-राजाओं को बुला भेजो।' 
तव रवि-पुत्र ने अपने सेनापति नील को बुलाकर कहा--विविध पर्वत, नदी तथा द्वीपो 
के राजाओं, वानर, लगूर तथा रीछ-राजाबो को वुला भेजो । जो नही आवे, उसे भी आदेश 
-मेंजकर बुला लेना ॥' 

यहाँ राम ने अनुज की सहायता तथा सांत्वना श्राप्त करते हुए, दुख -से पीडित होते 
हुए जैसे-तैसे वर्षाकाल को समाप्त किया । झरत्काल का आगमन होते ही -कोमलागी 
सीता का स्मरण-मात्र से उनके मन में विविध इच्छाएँ उत्पन्न -हुईं | मदनातुर हो वें भ्रमित 
मन से उदयाद्वि पर स्थित उद्दपति को देखकर कहने लगे--'यह कैसा उत्पात है ? यह 


रु हु 
कंसी रीति है ? रात्रि के समय सूर्योदय क्यों हुआ ? मेरे शरीर का ताप दुगुना हो 


किब्कियर का डे ९6९ 


गया हैँ । हें सौमित्र, मुझे पेंड की छाया में ले चलो ।” तब लक्ष्मण ने कहा--है देव, 
यह चंद्र हैँ, सूर्य नहीं । वह देखिए, उसमें हिरण का चिह्न दिखाई दे रहा है ।” लक्ष्मण 
की बातें सूनकर वे व्याकुल हो कह उठे--हाय ! हिरण की-ती आँखोवाली ( हमसे ) 
विछुड गई है, और मूच्छित हो गये । 


लक्ष्मण ने दाशरथि का शीतलोपचार किया और उनकी मूर्च्छा दूर की । तव राम 
संभलकर बोले---अब हमें तुरत लका पर आक्रमण कर देना चाहिए। है सौमित्र, देखा 
तुमने ? सूर्य-पुत्र॒ हमसे क्या कहकर गया था ? वर्षाकाल के समाप्त होते ही आने का 
वचन दिया था । वर्षाकाल तो समाप्त हो गया, किन्तु वह आया नहीं है । कदाचित्‌ वह 
मेरे किये उपकार को भूलकर तारा के साथ रति-क्रीडा में मग्त रहता हो या राज्य-मद में 
अपने आपको भूलकर पडा हो । अन्यथा मेरे कार्य के सबंध में वह अपने मन में सोचता 
क्यों नहीं है ? हम इस कृतघ्नता को सहतें हुए विलव क्यों करें ? विवुध जनो का कहना है 
कि उपकार को भूल जानेवाले, वचन भंग करनेवाले और अपने मित्र का कार्य नही 
करनेवाले अधम पुरुष होते हुँ । तुम जश्ीध्ष जाकर सुग्रीव को बुलाओ। यदि वह आने से इनकार 
करे और अकडता हो, तो उससे कह देना कि जिस शर ने वालि का सहार किया था, 
वह कही गया नहीं हैं । अच्छा, अब तुम जाओ ॥' 

१२. लक्ष्मण का किष्किधा में जाना 

तब लक्ष्मण ने अपने अग्नज को प्रणाम किया और आँखो से अग्नि-क्ण उगलतें हुए 
भपने श्रेष्ठ धनुष-बाण लेकर, लबे-लवे डग भरते हुए चले । वे एसे लवे डग भरते हुए जा 
रहें थे कि पृथ्वी थर-थर काँपने लगी और उनके पवन-सम वेग के कारण सभी वृक्ष टूटकर 
गिरने लगे। वे पुण्यात्मा जब किध्किधा पहुँचे, तव सभी कपि भयभीत्त हो जहाँ-तहाँ भागने लगे । 
किले के फाटक पर रहनेवाले वानरों ने यह सोचकर कि न जाने यह कौन हैं 
तुरत किले के किवाड वद कर दिये और वानर-समूह को फाटक की रक्षा के लिए नियुक्त 
करके, उसका समाचार अपने राजा को सुनाने के लिए भयभीत होकर दौडें । राजमहल में 
पहुँचकर उन्होने हाथ जोडकर तारा की परिचारिकाओ से सारा समाचार कह सुनाया टा 
परिचारिकाओं ने, यह सोचकर कि राजा को समाचार देने के लिए यह उचित समय नहीं हू, 
अगद के पास जाकर हाथ जोडकर कहा--हे विस्यात तेजस्वी युवराज, हमारे किले के 
फाटक पर कोई महाबलशाली मुनि-वेश में जटा-वल्कल घारण किये, हाथ में घनुपनवाण 
लिये हुए यम के समान आकर खड़ा हुआ है ।/ तव अगद ने मन-ही-मन निश्चय कर 
लिया कि अवश्य राम के भाई होगे । उसने तुरत फाटक पर आकर लक्ष्मण को देखा । 
तब लक्ष्मण ने उसे देखकर कहा--हे अगद, मेरे आगमन का समाचार सूरयप्रुश्न॒ को (मुग्रीव 
को) सुना दो ।! 

अगद तुरत उस सुम्रीव के पास पहुँचा , जो मन्मथ के विकार-सागर में निमग्न 
पडा था | रुमा अपने कर-पलल्‍लवों से उसके चरणों को दवा रही थी । तारा तथा मूहूर 
उसके तकिये के समान बैठी थी । इस प्रकार के सुख-भोग में निमग्त सुप्रीव को देखकर 
अगद ने कहा-- लक्ष्मण हमारे किले के फाठक पर, फ्रोधाग्नि में जलते हुए सडई है । 


श८६्‌ रंगनाथ एयायर 


सुग्रीव ने बकाकुल चित्त से अपने मत्रियों को बुलाकर कहा--क्या कारण है कि सौमित्र 
मित्रता छोडकर इस प्रकार आ गये है ? मेरे जाने, मेरे द्वारा कोई अपराध नहीं हुआ है ।' 
इस प्रकार दुविवा में पड सुग्रीव को देखकर हनुमान्‌ ने कहा-“राम ने उस महेनद्धशुत वालि 
का युद्ध में सहार करके तुम्हें कपियो का राज्य दिया था | ऐसे राम के कार्य-को भुलाकर 
तुम इस प्रकार भोग-विलास में निमग्न रहते हो ? क्‍या यह उचित हैँ /? इसमें कोई 
सदेह नहीं कि इसी कारण से सौमित्र यहाँ उग्र रूप धारण करके आये होगे । ऐसे वीर को 
द्वार पर ही खड़ा रखना उचित नहीं । लोकवद्य उस महात्मा का स्वागत- करो, उनकी 
सेवा करो, राम के कार्य का विचार करो और अपना वचन पूरा करो ।” 


इन बातो को सुनकर सूर्य-पुत्र ने रामानुज को लिवा लाने का आदेश दिया | तव 
लक्ष्मण ने स्वर्ण-गोपुरों के हम्य॑-समूह, विच्वकर्मा के द्वारा निर्मित चित्रों का कला-कौभल, 
कलास पर्वत के समान दीखनेवाले सौध, मध्यभाग में निर्मित क्रीडा-सरोवरो से युक्‍त उपवन 
देव-गवर्त के अवतार, वानरो के आवास आदि से पूर्ण उस नगर में प्रवेश किया और वहाँ 
की अनुपम वस्तुओ की उत्कृप्टता पर आच्चर्य प्रकट करते हुए, इन्ध के गृह की समता 
रखनेवाले वानरराज के प्रासाद में प्रवेश किया । वहाँ पहुँचकर उन्होने उमडतें हुए 
क्रोव से, अप्सराजो का सौदर्य देखा और सुदर स्त्रियो का स्तिग्व संगीत, उनकी वीणा, 
वेणु एवं मृदगो की ध्वनि, तथा उनके गहनो की मधुर ध्वति सुनी । वे यम के समान 
अत्यधिक कुद्ध होकर अत पुर के द्वार पर आकर खडे हुए । 

उनके आगमन का वृत्तात सुनकर, सुग्रीव अकेले ही न आकर, तारा को भी अपने 
साथ लिये हुए ज्ञीघत्र वहाँ आया । अत्यधिक भय के साथ उनका क्रोध तथा उनका रूप 
देखकर बड़ी भक्ति से उनके चरणों पर गिरकर उचित अर्ध्य-पाद्य देने का उपक्रम किया । 
इतन में ही उसे देखकर लक्ष्मण गरज उठे--हे झामब्रोही, हे कृतघ्तन, क्या यह उचित है 
कि तुम मेरी पूजा-अर्चना करो । तुमने सत्यात्मा जानकीनाथ को वचन दिया था कि वर्षा- 
काल के समाप्त होते ही आऊँगा । किन्तु तुम नहीं आये । तुमने अपने वचन का भग 
किया । रघुराम की आज्ञा का तुमने विचार नहीं किया । तुम पशुवुद्धिवालें हो | राम 
के जिस शर ने वालि का वव किया था, वह कालारिति उगल रहा हैं । वह तुम्हारा 
सर्वेनाश किये विना नही रहेगा । हैं नीच वनचर, मूर्ख वनकर तुम स्वयं अपना नाश कर 
रहें हो ।' 

तब तारा ने अत्यत भयभीत होकर कहा--है अनघ, यह सूर्य-पुत्र आपका दास है । 
यह राज्य-सपत्ति, यह ऐश्वयं आप ही के दिये हुए है । ये रविसुत आपके ही लगाये हुए 
पौधे के समान है. | ये सूर्य-पुत्र, रण विशारद राम की आज्ञा का पालन नहीं कर रहे है, 
सो वात नही है । इस कात्तिक-पूर्णिमा तक सारी कपि-सेना को एकत्र करने के लिए उत्होने 
सेनापति नील को भेज दिया हैं और स्वय युद्ध में जाने के लिए सन्नद्ध होकर बैठे हे। ये व राम- 
द्रोही हे, न असत्यमापी, न कृतघ्न ही हे । अत आप इनपर कृपा कीजिए ।' 


इन बातों को सुनकर लक्ष्मण का क्रोध घान्त हुआ और उन्होने सुग्रीव की पूजा- 
अर्चना स्वीकार की । उंसके पश्चात्‌ सुग्रीव ने राजकुमार को एक स्वर्ण-पीढ़ पर आसीन 


/किव्किधाकोंड ९697 


कराया और उनकी आज्ञा लेकर मृदु-मधुर वचन कहने लगा--हैं सौमित्र, क्‍या में प्रभु 
राप्रव के कार्य का विस्मरण करूँगा । में अभी सभी वानरों को एकत्र करूँगा और वैदेंही 
के अन्वेषण के लिए सभी दिल्लाओ में आदमी भेजूगा । चलिए, मे अभी आपके पीछे-यीछे 
चलता हूं । जिस शर से वालि पृथ्वी पर गिरा, जिस शर से सातो ताल-वृक्ष पृथ्वी पर 
गिरे, वही शर सभी दानवों का नाश करने के लिए तथा साध्वी को मुक्त करने के लिए 
पर्याप्त है । ,फिर भी में अत्यत भक्ति के साथ प्रभु रामकी सेवा करूँगा और यज्ञ प्राप्त 
करूँगा ।' 
' १३. सुग्रीव का माल्यवंत पर पहुँचना 

इतना कहकर सुग्रोव ने नीतिवान्‌ हनुमान्‌ को देखकर कहा--अब विलंब करना 
उचित नही है । वचन-पालन के निमित्त यत्न करो । हमारे राज्य के सभी वानरो को 
सूचित करके, उनको रवाना करने का प्रयत्न करो। अब हमें प्रभु राम के दर्शनार्थ जाना हैं।' 
यो कहकर अत्यधिक उत्साह से सूर्यनदत ने तारा आदि पत्नियों को विदा किया 
और सब दिशाओं में रहनेवाले वानर-सेनापतियो को वुलाकर, उन्हें प्रस्थान करने की 
आज्ञा दी । - ः 
उत्तर समय प्रस्थान की भेरी की जो ध्वनि हुई, वह पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं 
को विदीण् करने लगी । सूम्रीव ने स्वर्ण तथा रत्नों से निर्मित एक रम्य शिविका में लक्ष्मण 
को बडे आदर के साथ विठाया, इवेत छत्र तथा चामर उस महात्मा के निकट सजाये, और 
स्वयं एक शिविका पर आरूढ होकर लक्ष्मण के पीछे-पीछे चला । (लक्ष्मण के) आगे मगल- 
वाद्य बज रहे थे और वदी-मागधो की स्तुतियों की गभीर ध्वनि हो रही थी । कपियो के 
नेता आ-आकर सुग्रीव के दर्शन कर रहे थे । नक्षत्रो के मध्य में विलसित होनेवाले चन्द्र 
के समान वह सुग्रीव, सभी वानर-बीरो की सेना को साथ लिये हुए, समस्त पृथ्वी को 
कपाते हुए, लक्ष्मण की सेवा में निरत-होकर वहाँ से चला । 

माल्यवृत- पर रामचन्द्र ने जब सेना का कोलाहल सुना, तब पन-ही-मन कहने लगें-- 
लो कपिन्सेना आ गई ।” अब उनका क्रोध शान्त हुआ और रवि-पुत्र के प्रति उनका 
हृदय कोमल बन गया । सुग्रीव कुछ दूर पर ही सुद८ तथा स्वर्ण-मणिमय शिविका से 
उतरकर, सौमित्र के साथ राम के पास आया और बडी भक्ति के साथ हाथ जोडकर 
राम से कहा--हे देव, सेनाओं को एकत्र करने में मैने अपने वीरो को भेजा था । उनके 
एकत्र होते-होते इतना समय लग गया है । इसलिए आपके यहाँ आने में विलव हुआ, 
अन्य किसी कारण से नहीं ।” तब राम ने सुग्रीव को कृपा की दृष्टि से देखकर उसको 
आदर से अपनाया । 

तव कैलास-पर्वत, मेरु-पर्वत, नीलाचल, निषधादि, द्रोणाचल, ऋक्षाद्रि, पारियात्र। 
उदयाद्वि, रत्वगिरि, अस्ताद्रि, मलयाचल, मथाद्वि आदि पर्वतो पर रहनेवाले महान्‌ बाहुबली 
(वानर), पवनसुत (हनुमान्‌), पत्स, अगद, गवय, नील, गधमादन, पावकाक्ष, कालपाश, 
ग्रधन, वेगदर्शी, गवाक्ष, तल, मैन्द, महानाथ, घूम, जघ, गिरिभेदी, सुमुख, केसरी, ज्योतिर्मुस, 
विमुख, तार, विनत, गज, जावबानू, सपाति, रुभ, समुद्र-पुत्र सुवेण, छ्तवली, शरभ, सन्नाभ्र 


€्द्द रगनाथ रायायण 


आदि श्रेष्ठ वीर अपने पुत्र, मित्र, सहोदर, तथा सर्गे-स्बंधी सब एकत्र होकर क्रमश दस, 
सो, सहज्न, लाख, करोड, सौ करोड़, पद्म, महापद्म और अत में शख की सन्‍्या में ऐसे 
आ जुठें, मानो घरती ने ही इन सवको उत्पन्न कर दिया हो । जिस दिशा मेँ देखें, कपि- 
ही-कषि दीखते थे । उन कपियो का समूह पृथ्वी से लेकर आकाण तक व्याप्त था। अति- 
भयंकर काल-दड के समान दीखनेवाले भुज-दड, सब दिशाओ में व्याप्त होनेवाली वडवानल 
की अग्ति-शिखाओ के समान आकाझ से टकरानेवाले लागूल, प्रलयकाल के मेघो की कांति 
(विजली) के सदृश् दीखनेवाले भयकर दष८्ट्र, प्रलय-काल के सूर्यविव की समता करनेवाले 
मुह के गह्ूर, चचल समुद्र के विपुल कल्लोलों के घोष के समान सुनाई पडनेवाले गर्जन 


आदि से युक्त वानर-सेना को लिये हुए आनेवाले वानर-राजाओ को देखकर राम मन-ही 
मन आशच्चर्य करतें हुए प्रसन्न हुए । 


| पु 


तव सुग्रीव ने राम को देखकर कहा--हे देव, मेरी सेना के आगमन की रीति 
आपने देखी ? इनमें प्रत्येक वडे यत्त से आपका कार्य साधने की क्षमता रखता है । यो 
कहकर उसने उनकी शक्ति, उनके नाम, उनके जन्म-वृत्तात, उनकी जाति, उनका सामर्थ्य, 
उनके रग-ढंग, उनके भोजन तथा निवास आदि का समग्र वर्णन करके कहा--हें देव,- 
इन वानर-राजाओ में प्रत्येक आपकी पत्नी वेदेही को लाने की क्षमता रखता है । आप 
जाज्ञा दें ।! त्तव राम ने सूर्य-पुत्र को वद्रें आदर से गले लगाया और कहा-- हैं भावु- 
पुत्र, वल-संपत्ति में तुम्हारें लिए कोई भी अलमभ्य नही है । तुम्हारे पौरुष को देखकर ही 
तो मेने तुम्हें अपनाया था ? अब तुम वैदेही का पता लगाने के लिए (अपने वीरो को) 
भेजो 


१४. सीता के अन्वेषण के लिए सुग्रीव का वानरों को मैजना 


एक शुभ मुहृत्ते में सुग्रीव ने विनत” नामक एके वानर वीर को देखकर कहा-- 

तुम अपनी सेना को साथ लेकर वड़ी सावधानी के साथ, पूर्व दिया की ओर सीता की 
खोज में जाओो । तुम पहले यम॒ना नदी के तट पर तथा यमना गिरि में उनको ढूंढो और 
उसके पच्चात्‌ गया नदी तथा झोण नदी के आसपास ढडो। वहाँ से निकलकर कौथिकी 
और सरस्वती नदियों में देखो । फिर सम॒द्र में ढढो और पौण्ड तथा विदेह के प्रदेशों में 
सीता का अन्वेषण करो । वहाँ से तुम मालव, कोंसल, मगव, ब्रह्म देश, जादि में भी 
मंथिली की खोज करना । तदनतर समुद्र के तठो पर देखते हुए मंदर पर्वत पर चले जाना 
ओर वहाँ के किरातों के निवास-स्थानों में उनकी खोज करते हुए तत्परता के साथ बव- 
द्वीप तथा जंवृद्ीप को पार करके शिक्िराद्वि पर पहुँच जाना । वहाँ कालोद नामक सरोवर 
को तट पर ढृढ़ना। तदनंतर लोहित सम॒द्र पार करके जशाल्मलि ठक्ष की छाया मे उन्हे 
ढूढना। वहाँ से गरुड़ाश्रम में जाना | फिर गमोखछूग पर्वत पर ढू ढकर, उस पर्वत के शिखरो 
पर रहनेवाले मदमत्त राक्षसों के मध्य सीताजी का अन्वेषण करना । उसके पद्चात्‌ क्षीर 
सागर को सहज ही पार करके सुदर्शन नामक पर्वत पर उन्हें ढुंढना। वहाँ से निकलकर 
शुद्धाणंव पार करना और महानजात-रूप शिलादिि में सीताजी का अच्वेषण करना । वहाँ तुम 
सहल -सिरोवाले, इंदुवर्ण (आदि झोष को) वैठे हुए देखोगे | उनको प्रणाम करना कौर 


कििकिप्ारकाड 6 


च् 


वहाँ से चौदह योजन से अधिक की दूरी पर स्थित मेरु पर्वत पर दृढना । उस मेरु पर्वत 
के -चारो ओर चक्कर काटनेंवाले सूर्य के चरणों में वन्दना करना और उसी प्रकार बाल- 
खिल्य आदि को भी प्रणाम करना। उसके परचात्‌ उदयाद्वि में भी सीताजी का अन्वेषण करके 
रावण के निवास-का पता लगाकर हमें समाचार देता । (उदयाद्वि के) उस पार की भूमि 


३ 


'पर रवि का प्रकाश न पडने के कारण, वहाँ सदा अधकार व्याप्त रहता है । भरत में 
वहाँ के प्रदेशों के सबध में नहीं जानता | तुम तुरन्त यहाँ से प्रस्थान करो और एक मास 
के भीतर वापस लौट आगो । ऐसा न करने से तुम्हें अपमानित होना पडेगा । 

तव विनत ने वालि के भाई साूर्य-पुत्र को अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम किया 
और एक लाख वानरों को साथ लेकर पूर्व की दिशा में प्रस्थान कर गया । इसके पश्चात 
सूय॑-पुत्र ने सुशीर, नील, हनुमानू, अगद, जाववानू, गज, गरधमादन, गवाक्ष, विजय, मेंन्द, 
द्विविद और तार आदि वानरो को बुलाकर कहा--भब तुम योग्य वानरों को साथ लेकर 
शीघ्र दक्षिण दिज्या में चल पडो । विध्याचल से प्रारभ करके तुम नर्मदा तथा दरशार्ण 
नयर में ढंढलता । फिर दण्डकवन में अवश्य उनकी खोज करना । वहाँ से चलकर गोदावरी 
-के तट पर ढुंढना, फिर वेन्रवती के निकट देखना । तदनतर तुम कलिंग तथा निषध देशो 
में अन्वेषण करना । फिर कर्णाटक, आश्र, चोल, चेर,.केरल, तथा पाण्डय देशो में हँढना । 
तत्पशचात्‌ मलय-पर्वत तथा कावेरी के किनारे देखना, फिर अगस्त्य के आश्रम में जाना 
और उस महात्मा की आज्ञा प्राप्त करके ताम्रपर्णी नदी को पार करना । उसके बाद 
समुद्र के तट पर स्थित वनो में दृढना, और फिर स्वर्णपुरी में उनकी खोज करना । वहाँ 
से बडी तत्परता से . महेन्द्र पर्वत पर जाकर देखना, उसके उस पार रहने वाले विपमाद्रि 
में दूँढना, फिर पृष्पाद्रि में देखना और क्रेव कुजर मामक पहाड पर अन्वेषण करना । वहाँ 
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अगस्त्य का आश्रम हैं । वहाँ भी सीता को दूढना । उसके पश्चात्‌ 
अजना नदी को पार करना । अजना नदी के उस पार भोगवती नामक नगर है, जो मणियो 
से पूर्ण तथा फणियों से रक्षित है । तुम अवश्य उस नगर में प्रवेश करके वहाँ सीता का 
अन्वेषण करना । -वहाँ से चलकर तुम वृषभाद्वि पर जाना । उस पर्वत पर ग्रधवं, अप्सराएं 
तथा सुर रहते है | वहाँ भी तुम सीताजी को ढूँढगा और विना विचलित हुए वेतरणी 
पार करके वैवस्वत नगर में चले जाना । वहाँ यम की अनुमति प्राप्त करके समस्त पितृ- 
लोक में सीताजी की खोज करना और उनका समाचार जानकर एक महीने के भीतर 
अवश्य लौट आना । वैवस्वत नगर के उस पार का प्रदेश अधकारावृत हैं । वहाँ देवता 
भी नहीं जा सकते । 


१४. हनुमान को मुद्रिका देना 
तब वे सब कपिश्रेप्ठ, आनद के समुद्र में योते लगाते हुए, सूर्य के तेज से भी 
अधिक दीप्तिमान्‌ राम-भूषति को अपनी शवित का परिचय देते हुए कहने लगे-- है राजन, 
किसी भी प्रकार से क्यो न हो, हम जानकी का पता लगाये विना वापस नहीं लॉटगे । 
तब राम, भावी कार्यो का निश्चय करते हुए बडी क्षपापूर्ण दृष्टि से हनुमानू की आर 
'देखकर तथा उन्हें अपने निकट बुलाकर कहा-- है पवनसुत, तुम मेरे निकट आओ । तुम 


<०० _ रगनापे रामायरी 


अवश्य ही जानकी को देख सकोगे । हे अनघ, तुम्हारें द्वारा कार्य की सिद्धि होगी । तुम 
कार्य करने की शक्ति रखते हो । तुम्हारा बाहुबल भी वैसा हैं । यह मेरी मुद्रिका लो । 
इसे सीता को देना और उस रमणी के चित्त का दुःख दूर करना । सीता से हमारे कुशल- 
समाचार कहना और उसका कुणल सुनाने के लिए तुम जीघ्र यहाँ लौट आना ।' इस 
प्रकार कहकर राम ने अगूठी हनुमान्‌ को दी, तो उसने उसे अपने सिर पर इस प्रकार रख 
लिया, मातो उदायाचल ने अपने शिखर पर सूर्य को धारण कर लिया हो । 

तब हनुमान्‌ अत्यधिक हे से उछल पड़ा और हाथ जोंडकर बोला--हे सूर्य-्कुल 
के अधीर्वर, चाहे जितनी भी दूर जाना पडे, में अवश्य जाकर सीताजी का पता लगाकर 
आऊँगा । आवश्यकता हुई तो सूर्य तथा चंद्र को भी रोककर पृथ्वी, समुद्र तथा आकाश में 
भी प्रवेश करके सीता की खोज करूँगा । रावण के निवास में इस प्रकार प्रविष्ट होऊँगा 
कि मेरी अनुपम शक्ति की सब लोग प्रणसा करेंगे । अब मैं जाता हैँ । ऐसा कहकर 
वायु-पुत्र ने अगद आदि के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया । 

उसके पश्चात्‌ वानरेंश्वर ने सुपेण से कहा-- तुम एक लाख वानरो को साथ लेकर 
सौराष्ट्र में जाकर वहाँ सीताजी का अच्वेषण करो । वहाँ से निकलकर घैय॑ के साथ वाह्लीक 
देश में प्रवेश करो और वहाँ ढूँढने के पश्चात्‌ श्रीसपतन्न सिंधु, सौवीर, तथा कैकय देश में 
जाकर देखो । तत्पश्चात्‌ अच्छी तरह पुन्नाग वन में ढूँढें और पश्चिमी सागर में ढेंढो । 
तदनतर ललित नारिकेल वनो में देखो और विना क्लान्त हुए वज्ञाद्वि पर पहुँच जाओ । 
वहाँ से निकलकर पारियात्रक (पर्वत के) वन में पहुँचो और वहाँ रहनेवाले गधर्वों का 
परिचय प्राप्त करके सीताजी का अन्वेषण करो । उसके परचात्‌ तुम उस चक्रवन्त पर्वत पर 
चले जाओ, जहाँ विष्णु ने हयग्रीव तथा पंचजन्य नामक रक्ष्सो का वध करके शख तथा 
चक्र भ्राप्त किये थे । वहाँ से तुम मेघाद्रि पर चले जाना और वहाँ पर स्थित साठ 
कचनाद्रियो में सीताजी को दूंढ़ता । फिर जिस स्थान पर सूर्य अस्त होता है, उस अस्ताद़ि में 
जाकर सौवर्ण नामक पर्वत पर ढूंढ़ो और फिर वरुण की राजघानी में देखो | तदनतर वहाँ 
पर रहनेवाले मेरु सावर्णि नामक मुनि के दर्शत करके एक महीने के अंदर सीताजी का 
समाचार लेकर वापस आओ । उसके बाद की पृथ्वी सूर्य-रहित तथा सीमाहीन होने के 
कारण, में उसके संवध में कुछ नही जानता ।” इस आदेश को मानकर सुषेण पश्चिम की 
ओर चल पडा । है 

फिर सूर्य-पुत्र ने शतवली को बुलाकर कहा--“तुम एक लाख सैनिको को लेकर 
पुलिदो के देक्ष में प्रवेश कर वहाँ सीताजी को ढेंढो । फिर शौरसेन प्रदेश में देखो और 
वहाँ से समस्त मरत भूमि में ढूँते हुए यवनराजा के देशो में जाओ । वहाँ ढूढकर, 
काभोज तथा कोकण प्रदेशों को देखते हुए हेमत पर्वत पर चले जाओ । वहाँ क॑ सोमाश्रमो 
में दूँढकर, श्रीसमन्वित कालाख्य शिखर पर पहुँच जाओ । वहाँ देखने के पश्चात्‌ तुम सुदर्शन 
नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर कनकाद्वि पर पहुँच जाओ । वहाँ से कैलास पर्वत पर चले 
जाओ और कौवेर वन में देखो । फिर कुवैर क॑ नगर में तथा उसके सरोवर के तट पर 
देखो । उसके पश्चात्‌ कुवेर की आज्ञा प्राप्त करके क्रौचाद्वि में जाकर सीतांजी का अन्वेषण करो ! 


ककिंबव्किधाकांड २०९ 


वहाँ से मैताक पर्वत पर पहुँच जाओ और वहाँ वैखानस नामक सरोवर में ढूंढो। 
उस सरोवर के पार जो शैलोदया नामक नदी बहती हैँ, उसे लॉघकर उत्तर कुरुभूमि 
में अन्चेषण करो । उन प्रदेशों में गधर्व तथा अप्सराएँ अपनी इच्छा स विचरण करती 
रहती हैँ । उन प्रदेशों में तुम सीताजी का अन्वेषण करो और वहाँ न ठहरकर उत्तर समुद्र 
को पार करके सोमाद्रवि पर पहुँच जाओ । वहाँ ब्रह्मा तथा शिव अविचन समाधि में रहते हे । 
तब तुम वहाँ से लौटकर एक महीने में समाचार ले आओ ।! इस आदेश के अनुसार झतवली 
रामचन्द्र की आज्ञा लेकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा । 

उसके पर्चात्‌ रघुराम ने सूर्य-पुत्र को देखकर कहा--हे सुग्रीव, तुमने इन सव 
प्रदेशों को कब देखा ?” तब सुग्नरीव ने कहा--है देव, जिस दिन में वालि से भयभीत 
होकर भागा था और वालि मेरा पीछा करने लगा था, उस दिन मेने पृथ्वी के चारो ओर 
चक्कर काटकर इन सब प्रदेशों को देखा था ।' 

इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए । राम की आज्ञा के अनुसार पूर्व तथा पर्चिम 
दिशाओ में गये हुए वानर सीता का भन्वेषण करते हुए पृथ्वी के उस भाग तक गये, जहाँ 
तक सूर्य की किरणें पहुँचती हे और वहाँ से लौटकर राम से निवेदन किया कि हम कही 
भी सीताजी का पता नहीं लगा सके । तब राम तथा सुग्रीव बडी उत्कठा से प्रतीक्षा करते 
हुए सोचते रहें कि न जाने अग॒द आदि वानर-वीर क्‍या समाचार लायेंगे । 

अगद आदि वानर-वीर एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए बडे हर्ष के साथ अपनी 
शक्ति तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए, सुग्रीव के आदेश का अक्षरण पालन करते हुए, 
पहले विध्याचल पर गये । वहाँ की गुफाओ तथा वनो में उन्होंने सीताजी को ढूँढा। 
वहाँ से वे दक्षिण की ओर चले । मार्ग में पडनेवाली पुष्प-लता-समूहो में, पेडो में, नदियों में 
पहाडो में, तथा नगरो में सीताजी को दूढते हुए, वे आगे बढते जाते थे । किन्तु कही 
भी सीता कां पता न लगने से वे बहुत चितित थे । वे उस वन में से होकर जाने लगे, 
जो महामुनि कडु की शापाग्नि से निर्जंन, छायाहीन तथा जल-रहित हो गया था । अपने 
दस वर्ष की अवस्था के पुत्र की मृत्यु के तीन्र दुख से अभिभूत होकर कड्‌ मृनि ने अपने 
शाप से उस वन को ऐसा बना दिया था । 

१६. महुषिं कंड़ के आश्रम में 

वानर अत्यत क्लात हो, पानी ढूँढते हुए उस वन में फिर रहे थे । तब एक राक्षस ने 
उनका मार्ग रोककर भयकर गन करके कहा--मेरे हाथो मरे विना अब तुम कहाँ 
जाओगे ? तब अगद ने क्ुद्ध होकर उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मुह से 
रवत उग्लते हुए पृथ्वी पर ग्रिर पडा । तब सब वानर थककर एक महान्‌ वृक्ष की छाया 
में बैठ गये और प्यास से व्याकुल होते हुए सोचने लगे कि यहाँ जल कहाँ मिलेगा ? 
वहाँ उन्होने एक गुफा के द्वार से कुछ जल-पक्षियो को उडते हुए देखा और निश्चय किया 
कि अवश्य वहाँ जल मिल सकता है | यो सोचकर उन्होनों उस गुफा में प्रवेश किया । 
गुफा में अधकार व्याप्त रहने के कारण उन्हें मार्य न दीखता था । फिर भी घैय॑ के साथ, 
एक दूसरे का आधार लेते हुए वे आगे बढते गये । कुछ दूर जाने पर मार्ग का अधकार 

२६ 


२०२ रंगनाथ एम्यायरा 


दूर हो गया और वहाँ उन्होने ससार-भर में अद्भुत तथा अनुपम नगर देखा । वे खड़े 
होकर उस नगर के स्वर्ण-गोपुरो, स्वर्ण-सौधो, स्वर्ण-अद्टालिकाओ, स्वर्ण-दुर्गो, स्वर्ण-वक्षो 
तथा स्वर्ण के पुष्प-लता-समूहो के देखकर आइचर्यचकित हो गये । वे सोचने लगे-- 
यह कितने आइचर्य की वात है । ऐसे ऐदवर्य से परिपूर्ण यह नगर जन-रहित क्यों है ? 
यह नगर ऐसा क्यो वन गया ? उनकी समझ में नहीं आता था कि उस नगर से बाहर 
कैसे निकला जाय । चिंता में पडे हुए वे कुछ देर तक वही भटकतें रहे । एक दिन उन्होने 
उस नगर के मध्य में स्थित सब सौधो में श्रेप्ठ, एक गगनचुवी सौध को देखा । तुरत 
सभी वानर उस सौध पर चढ गये और वहाँ मृगछाला पहनी हुई, तरुण इदू की काति 
के समान दीप्त एक पुण्यात्मा स्त्री को तपस्या में निरत देखा । हनुमान्‌ ने उसे प्रणाम 
किया और अकलक मन से कहा--है साध्वी, तुम कौन हो ? अकेली यहाँ किस कारण 
से तपस्या में लीव रहती हो ? यह पुण्य नगर किस महात्मा का हैं ? हमने तो 
ऐसा अनोखा नगर कही भी नहीं देखा ॥ 


१७, स्वयंप्रमा का सत्कार 

तव वह कोमलागी, हनुमान्‌ को देखकर अपना पूर्व वृत्तांत यो कहने लगी--प्वे- 
काल में मय नामक राक्षस राजा ने ब्रह्मा की बडी तपस्या की और वास्तु-कला में अद्भुत 
कुशलता प्राप्त की । तत्पश्चात्‌ उसने यह नगर बनाया और हेमा नामक एक दिव्य रमणी 
के साथ वहुत वर्ष तक अवाघ गति से यहाँ जीवन व्यतीत करता रहा । अमरवल्लभ 
(इन्द्र) वज्जायुध से उस राक्षस राजा का वध करके उसकी स्त्री को उठा लें गया । उसी 
चचल नेत्रवाली (देव-स्त्री) की में सखी हूँ । मेरे पति महान्‌ आत्मा सौवर्णी है । मेरा 
ताम स्वयप्रभा है और उस देव-स्त्री की आज्ञा से तप में निरत होकर में यहाँ रहती हूँ । 
इतना कहकर उसने कद-मूल-फल दकर सब वानरो का सत्कार किया, जल देकर उनकी 
प्यास वुकाई और फिर पूछने लगी--हे अनघ, तुम कौन हो और यहाँ क्यो आये हो * 
'यहाँ पहुँचना देवताओं के लिए भी कठिन हैं | तुम लोग यहाँ किस प्रकार आये ?* 

तव हनुमान्‌ ने उस स्त्री से कहा--हे साध्वी, अपने पिता की आज्ञा से जब राम 
मुनि-वेश धारण कर दण्डक-वन में निवास करते थे, तव उनकी पत्नी कमलाक्षी सीता को 
(रावण) चुरा ले गया । राम की भाज्ञा से हम उनके (सीता के) अस्वेषण में निकले है । 
मार्ग में प्यास के कारण अत्यत क्‍्लात हो हमने एक गुफा में प्रवेश किया और उस 
गुफा के अधकार से विचलित न होकर हम आगे बढ़ते गये और सयोग से तुम्हारे इस 
आश्रम में आ पहुँचे । यहाँ से निकलकर जाने का मार्ग न जानकर विवश हो हम कई 
दिनो से यही भटक रहे है ।' 

तव उसने बडी भक्ति से उन्हें देखकर कहा---तुम लोग राम के कार्य के लिए 
आये हो। तुम पुण्यात्मा हो | तुम लोग जो चाहो, सो मुझ से माँगो ।! तब उन्होने कहा- 
तुम हमें यहाँ से बाहर जाने का मार्य बताओ । हम जीघ्र यहाँ से सीता के अन्वेषण में 
जाना चाहते हूँ ।! तब उस स्त्री ने बत्यत आनद से कहा--तुम सब अपनी आँखें बंद 
कर लो ।' उसके पदचात्‌ वह अपनी तपस्या की शवित से सहज ही एक क्षण-मात्र में उन्हें 


किं/बिकथ 7 की छठ २०३ 


गुफा के बाहर पहुँचा दिया और स्वय फिर उस गुफा में चली गई । सभी वानस्-यपुगव 
उस स्त्री की प्रशस्ता करते हुए आगे बडे । वे श्रेष्ठ वीर-वानर, मार्ग में पडनेवालें एक 
विद्याल सरोवर में जल पीकर फिर महेन्द्राद्रि पर पहुँचे । 


१८5, वानरों की व्याकुलता 

तव अगद इस प्रकार दुख करने लगा--सूये-पुत्र की दी हुई अवधि समाप्त 
हो गई', किन्तु अबतक सूर्यवशी (राम) की पत्नी का पता हम नहीं लगा सके । आज्ञा- 
पालन को विशेष महत्त्व देनेवाले सुग्रीव, यह कहकर हमारा वध कर देंगे कि इन्होने मेरी 
आज्ञा का उललघन किया । इसलिए कपिराज के दर्शनार्थ हमारा जाना उचित नही हैं । 
हम जिस गुफा से अभी बाहर आये, उसी में प्रवेश करके, वही सुख से रहेंगे । वहाँ का 
मार्ग अष्ट-दिक्पालो के लिए भी अभेद्य है। वहाँ के वन विविध प्रकार के पके हुए फलो 
से भरे हुए हैँ । वहाँ कोई भी प्रवेश नहीं कर पायेगा । कुछ वानरो ने अग्रद की बातों 
का समर्थन किया । 

तब मारुति ने क्रुद्ध होकर कहा--तुम बडे वुद्धिमान्‌ हो !' काका की आज्ञा से 
बडे वीर के समान राम का कार्य करने चले । अब चचल*“चित्त हो कपियों के साथ उस 
गुफा में प्रवेश करने का जो प्रस्ताव तुम करते हो, क्‍या यह सूर्य-पुत्र की भाज्ञा का 
तिरस्कार नही हुआ ? में, नील, तार और नल-- चारो इसके लिए किसी भी प्रकार 
सहमत नही हो सकते । अन्य वानर भी अपने सर्गेसवधियों को छोडकर तुम्हारी सेवा में 
नही रह सकेंगे । इतना ही नही, पूर्वकाल में इन्द्र ने अपने वज्त्र के आधात से उस गुफा 
का निर्माण किया था । लक्ष्मण के पास उनके वज्ञ की समता करनेवाले पैने अस्त्रो की 
कमी नहीं है। क्‍या वे बात-की-बात में तुम्हें और तुम्हारे सैनिक-वल का सर्वनाश नही 
कर देंगे ? इसलिए यह दुर्वृद्धि छोड दो । हम सूर्य-पुत्र की सेवा में पहुँचकर कहेंगे कि हम 
सीता को नहीं देख सके । व॑ तुम्हें और हमें अवश्य ही क्षमा करेंगे । सौजन्य के कारण 
मुझ पर, और तुम्हारी माता पर अनुरक्त होने के कारण तुम पर, वें क्रोध नही करेंगे । 
तुम उनके पुत्र हो, इसलिए वे तुमको ही राज्य देंगे । 

तब वालि-पुत्र ने कहा--मेरे काका पितृ-तुल्य वालि का वध कराके, उनकी स्त्री 
के साथ विवाह करके, उपकार करनेवाले राम के कार्य को भूलकर, भोग-विलास में 
निमग्न रहे । लक्ष्मण के क्रोध करने पर ही तो वें राम के पास आये । क्‍या, तुम उनका 
नीच व्यवहार नहीं जानते ” एसे क्ृतघ्न तथा कामाध का विश्वास कंसे किया जाय ? 
इतना ही क्यो ? श्रीराम का काय॑ किये बिना वहाँ पहुँचकर उस रवि-पुत्र के हाथो मरने 
की अपेक्षा यही मर जाना अच्छा है । अब प्रायोपवेश के लिए तत्पर हो जाओ ।' 

ऐसा कहकर अगद तथा अन्य कपि दर्भ-शय्या पर लेट गये । अपना प्रयत्न विफल 
होने से वे मनन्‍ही-मन दुखी होते लगे । प्रायोपवेश करते रहने से तथा मानसिक पीडा 
से परितप्त होते रहने से वे बहुत ही निर्वल हो गये । कभी वे उठकर बैठते, कभी लेट 
जाते, कभी चारो दिशाओं में शून्य दृष्टियों से देखते, कभी अपने पुत्र तथा सग्रेग्सव्धियो 
का स्मरण करते और कहते--है भगवान्‌, आप इस प्रकार हमारे प्राण वयो लेना चाहते हूँ ? 


शा 


य्०2 रंगनाथ एयायर 


फिर सभी वानर अलग-अलग समूहों में एकत्र होकर आपस में कहतें--हाय । 
सूर्यकुलसभव ( राम ) वन में आये ही क्यो ? अपनी पत्नी को राक्षसों के हाथ में खोया 
ही क्यो ? उंस राक्षस ने जठायु का वध ही क्यो किया ? रान ने उसकों देखा ही क्यों? 
उस जटठायू ने सीता का समाचार उनसे कहा ही क्यों ” राम पा सरोवर के तट पर 
आये ही क्यों ? वहाँ उन्होने सुत्रीव से भेंट ही क्‍यों की ? सुत्रीव उनके मित्र ही क्यों 
वने ? राजकुमार ने वालि का वव की क्यो क्थि ? इतनी बड़ी कपि-सेना एकत्र ही 
क्यों हुई ? सूर्य-पुत्र ने हमें यहाँ भेजा ही क्यो ? हमारी ऐसी दुर्गति ही क्यों हुई ? 
हमारे प्राण व्यय क्‍यों जायें ? हाथ, कैकेयी के वर ने सूर्बवच्य के साथ ही हमारे व का 
भी सर्वनाग कर दिया । इस प्रकार सभी वानर विलाप करने लगे । 
१९. संपाति से सेंट 


तव एक विद्यालकाय, यौवन तथा पखो से हीन एवं अत्यत वृद्ध संपाति नामक 
पश्षिराज उस पहाड की यूफा से बाहर निकला और मृत्यु की इच्छा करते हुए धरती पर 
पडे हुए वानर-समूह को देखकर घीरे-वीरे उनके समीप आया । वह सोचने लगा कि 
भगवान्‌ ने वडी कृपा करके मे आहार भेजा हैं | उसे देखकर सभी चपल वानर अपने 
निलचय पर पत्चात्ताप करने लगे | तब अग्रद ने हनुमान्‌ से कहा--बह पक्षी नहीं है । 
स्वयं यम्र निर्देयी होकर हमारे प्राण लेने के लिए इस रूप में जाया हूँ | उस दिन जटायु न, 
राम की पत्नी को चराकर लें जानेवाले रावण के साथ युद्ध करके उसके अखर खड़ग के 
प्रहार से मृत्यु प्राप्त की और फलत' सहज ही स्वर्ग का लाम कर लिया । अब राम के 
कार्य के लिए जाये हुए हम भी इस महापक्षी के हाथो में अपने प्राण खो दें, तो अच्छा ही 
होगा । उनकी वातो को सुनते ही अरुण-पुत्र (सपाति) का कठ जोक से गदुगढ 
हो गया । वह उन कपि-वीरो के निकट जाकर पूछते लगा--हे वानरो, तुम कहाँ से आये हो * 
वह जटठायु मेरा प्रिय अनुज हैं। हम दोनों अरुण के पुत्र है । वह पैने तबा भयकर 
नखवाला, गरूफा के समान मुखवाला, दशरथ का मित्र, सनत सुखी मृत्यु को कैसे प्राप्त 
हुआ ?” तब वालि-पुत्र ने उसे सारा समाचार कह सनाया । उस समाचार को सुनकर 
संपाति अत्यविक शोक ने संतप्त हजा । दु.खी होनेवाले उस पक्षी को वानरों ने उठाकर 
समीप ही रहनेवाले समृद्र के पास पहुँचा दिया, तो उसने समृद्र में स्नान क्या और 
उसके पबच्चात्‌ वर्ड दुख से पीड़ित होते हुए अपनी पूर्व-क्था उन वानरों से कहने लगा । 

उसने कहा--में और जटाय, हम दोनों किसी समय कौैलास पर्वत पर एक साथ 
रहते थे | अपने यौवन तथा बक्ति के गे से प्रेरित होकर एक दिन प्रभात के समय हम 
दोनो साथ-साथ जाकाथ में उडते-उड़ते वहुत दूर चले गये । मव्याकह्ल के समय हम सूर्य- 
मंडल के समीप पहुँचे । जढायू सूर्य की किरणो के लगने से जलने लगा | तब मेने उस 
अपने पसतों के नीचे छिपा लिया । तब मेरे पल भी जल गये । पलों के जल जाने सं; 
अपनी सारी थक्ति खोकर, में इस आश्रम-भूमि में गिर पडा । पता नंहीं, जठायु कहाँ चला गया। 
तुम नोगों से यह समाचार सुतकर भी में जाज चुय उैठा हुआ हूँ । यदि पहले 


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की तरह मेरे पख्॒ होते, तो में अपनी भक्ति से अपने भाई का प्रतिश्योध लेता और राम 


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ध्ड 

2०. 
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किव्किषाकोंड २०५ 


को पास पहुँचकर उनसे अपने पौरुष की प्रशस्ता प्राप्त करता । लेकिन अब उन नसातो से 
क्या प्रयोजन है? 

तव जाववान्‌ ने हनुमान्‌ तथा अगद को अत्यत हर्षित करते हुए उस पक्षी से कहा- 
ऐसे शक्तिशाली जठायु के अग्ज तुम्हारा इस ससार में कौन सामना कर सकता है ? 
कोई ऐसा स्थान नहीं होगा, जिसे तुमने नहीं देखा हो । तुम कृपया हमें वताओं कि रावण ने 
रघुराम की पत्नी को कहाँ छिपा रखा हैं ”' 


२०, सीता का पता वताना 
सपाति का सददेह दूर हुआ । उसने कहा--मेरा पुत्र सुपाइ्व, दुदेम पराक्रमी तथा 
महान्‌ पितृभकक्‍त है | पखो के जलने से असमर्थ हो यहाँ पर पड़े हुए मु्े वह प्रति दिन 
बडी भक्ति के साथ भोजन लाकर दिया करता है । एक दिन की बात है कि वह बहुत 
विलव से, बिना भोजन लाये ही यहाँ आया । जब मेने उससे विलब का कारण पूछा तथ 
उसने उत्तर दिया-- पिताजी, आपके लिए आहार प्राप्त करने क॑ उद्देश्य से में हेमेन्द्र गिरि 
के समीप समुद्र-यट पर वैठा था। उसी समय काजल के पर्वत के सदुश एक राक्षम, सुर्य-प्रभा 
के समान एक रमणी को साथ लिये हुए जाया और मुझे मीठी-मीठी बातें करने लगा । 
मेरे मार्ग देने पर वह शीघ्र वहाँ से चला गया । तग वहाँ रहनेवाले मुनि मुझे देखकर 
हषे से कहने लगे कि आज तुम मृत्यु के मुख से बच गये । वह (काला पुरुष) यम रूपी 
रावण था । श्रीराम की पत्नी को चुराकर वह लका को ले जा रहा था | इसी कारण 
से मुझे यहाँ आने में विलव हुआ हैं । अब इसमें कोई सदेह नहीं है कि जानकी, बादलों 
से घिरी हुई चद्रिका की तरह, राक्षस-रमणियो से परिवृत हो लका में रहती है । मेरी 
दृष्टि इस पृथ्वी पर शत योजन तक देख सकती हैं । सभी पक्षियो की अपेक्षा मेरी दृष्टि 
तथा गमन-शक्ति अधिक है ॥' ह 


से 
हर 


सपाति ने आगे कहा--जवब मेरे दोनों पल जेल गये और में मृत्यु ते बचकर, 
मूच्छित होकर यहाँ गिर पडा, तब कई वर्ष तक प्यास से व्याकुल हो, कराहते हुए यहाँ 
पडा रहा । एक दिन मेरे सौभाग्य से सकल जनो काताप हरण करनेवाले, साक्षात्‌ निभाकर 
(चद्रमा) के समान गुणवाले निशाकर (नामक मुनि) को मेने देखा । सूर्य-तेज से दग्व 
अपने पखो का वृत्तात मेने उनसे कहा । वे मुनि-शिरोमणि पहले सेही मुझे जानते थे । 
इसलिए दयाद्रें होकर बोले--- आश्वितवत्सल, परात्पर विष्णु महाराज दशरथ के यहाँ जन्म 
लेंगे । वह सूर्य-त्रश-तिलक वनवास के लिए भयकर बनो में आयेंगे, उनकी पत्नी को 
रावण चुराकर ले जायगा । उस रमणी को अमृताशु (चन्द्र) अमृतान्न देंगे, जिससे वह 
क्षुपा तथा तृषा से मुकक्‍त होकर रहेगी । तब राम शीघ्र आकर इख्ध-पुत (वालि) का 
सहार करके सूयये-पुत्र की रक्षा करेंगे और सीता के अन्वेयणार्थ वानरों को चारो दियाणों 
में भेजेंगे । जिस दिन तुम राम के उन भटो को यह वृत्तात सुनाओगे, उसी दिन तुम्हारे 
पख॒तुम्दें मिल जायेंगे । उनके आदेशानुसार मेने तुम लोगो से यह वृत्तात युनागा । लो, 
देखो, मुझे अपने पख्॒॑ भी मिल गये । इतना कहकर वह एकदम उछवाए आहाश में 
उड़ा और कहने लगा--देखा मेने सीता को! ज्ञका के समीप एक वन में मेने सीता को देसा । 


२०६ रंगनाथ एयायण 


वह लो, यहाँ से शतबोजन की दूरी पर, लका में, वह पवित्र साध्वी बैठी हैं | तुम 
प्राओप्रेग छोडो । अब उठो । पौजस्त्यपाति ( रावण ) की लका में जाकर सीता के 
दर्शन करो 

इतना कहकर वह वानरो को लका का मार्ग बताकर बड़े हर्ष से महेन्द्र गिरि पर 
चला गया । तव सभी वानस्-्रीर प्रसन्नचित्त हो, शीघ्र गति से महासागर के पास पहुँचे। 
उस सागर की जब्दमयबी तरणें, प्रचह्ठ वायू के आघात सें, अत्यधिक उद्धत होकर विहार 
कर रही थी । उनसे उत्पन्न कझाग दिगतों तक फैल गया था और ऐसा लग रहा था, 
मानों वह समुद्र का गड़प (कुल्ली) हो, उस समुद्र में भयंकर मगर अपनी पूछ-हूपी 
तलवारो से वडे बात्रेण से लड़ रहें थे | ऐसे समुद्र के निकट पहुँचकर सभी वानर (मन- 
ही-मन) अत्यत व्याकुल हो, थोडी देर तक निष्चेप्ट बैठे रहे और चिन्ता करने लगे कि 
इस समुद्र को कौन पार कर सकता है ? ऐसी शक्ति किसमें है ?' 


२१. वानरों का अपनी ञक्ति का परिचय देना 

अगद ने वह रात उस समृद्र-तट पर विताई और दूसरे दित अलग-अलग सभी 
वानरो को सवोधित करके कहा---बदि तुम वीर वानर अपने पौर॒ुष को खोकर, सौ योजन 
की जलराशि को पार करने के लिए इतना भिककते हो, तो अपयञ-रूपी विशाल समुद्र 
को किस प्रकार पार कर सकोगे ? तुम सव अलग-अलग अपनीन्‍अपनी शक्ति का परिचय 
मुझे दो । 

तव व्याकुल-चित्त सभी वानर साववान हो गये और अपनी शक्ति का विचार कर 
अपने-अपने वल का परिचय देने लगे । गज ने कहा-'में दस योजन लाँध सकता हूँ । 
गवाक्ष ने कहा--में वीस योजन विना किसी कठिनाई के लाँघ सकता हूँ । शरभ 
कहा-- अपनी जक्ति के प्रताप स में चालीस योजन पार कर सकता हूँ । ग्रधमादन 
अपना पराक्रम प्रकट करते हुए कहा--'मे पचास योजन की दूरी लाँघ सकता हूँ ।' मेन्द 
कहा--में अपनी छक्ति को हानि पहुँचाये विना साठ योजन पार कर सकता हूँ। द्विंविद 
कहा--विना विद्येव प्रवत्न के में सत्तर योजन की दूरी लाँधकर जा सकता हूँ । तार 
अपनी शक्ति को प्रकट करते हुए कहा--में अस्सी योजन लॉँध सकता हू । 
इस प्रकार सभी वानर निशंक होकर अपनी-अपनी शवित का सहीन्सही परिचय देने लगे । 

तव अत्यत वृद्ध तथा समस्त ससार में पराक्तमी, भल्लूकनाथ (जाववान्‌) ने कहा- 
“यदि में अपने लडकपन (या यौवन) की वात कहें, तो वह उपहास का विषय होगा 
फिर भी कहता हूँ, सुनो | पहले जब अमृत के लिए सुर तथा दानवो ने युद्ध किया था 
तब मैने सुरो की सहायता कीथी और बड़े प्रेम से उनका दिया हुआ अमृत पान किया था। 
में सप्त समुद्रो को पार करने की क्षमता रखता हूँ । उदयाचल पर खडे होकर 
अपना दूसरा चरण अस्ताचल पर रख सकता हें । सभी लोको में मेरी समता कर सकतनंवाला 
कोई नही है । जब त्रिविक्रमने महावली वलि महाराज का दर्प तोड़ा था, उस दिन मेचे समस्त 
पृथ्वी की इक्कीस वार परिक्रमा की और त्रिविक्रम की प्रार्थता की । उस समय मेरी ढाँग 
दढ गईं, मेंस दर्प तथा अक्ति नप्द हो गई । ऊपर से वृद्धावस्था ने भी मुझे आ घेरा) 


नम जे + व क जफे 


च्क 


किडिकथाकाड २०७ 


अब में बहुत वृद्ध हो चला हूँ । मेरी अवस्था नब्ते वर्ष की हैं। अब में ऐसा कार्य करने 
योग्य नही रहा । तब नील ने कहा--'में नव्बें योजन की जलधि को पार कर सकता हूँ। 
मारुति अपनी शक्ति का परिचय दिये विना चुपचाप बैठा रहा । तब अग्रद ने कहा- 


4] 


मे अत्यधिक प्रयत्न से शत योजन पार कर सकता हूँ, किन्तु कदाचित्‌ लौटकर आ नही 
सकता । 


तब जाववान्‌ ने अगद से कहा--है अनघ, तुम हमारे नेता हो | तुम इस समुद्र 
को पार भी कर सकते हो और लौट भी सकते हो । तुम सुग्रीव के समान इस वानर- 
सेना के राजा हो । अत तुम्हारे लिए उचित यही हैँ कि तुम हम से काम लो । इतनी 
दीनता क्यो व्यक्त करते हो ? राम के कार्य में सतत तत्पर रहनेवाले, रवि-पुत्र के मत्री, 
इस वानर-समूह के लिए प्राण-सम, पवन-क्रुमार के रहते, भला तुम्हारे लिए कौन-सा कार्य 
असाध्य है ? तुम निश्चित रहो ।” 


२२, समुद्र लाँचने के लिए हनुमान्‌ को प्रेरित करना 

इसके पश्चात्‌ जाववान्‌ ने हनुमान को बुलाकर बडे स्नेह से कहा--हे पवन-सुत, 
यह क्‍या उचित हैँ कि अपना काम हम पर छोडकर स्वय चुपचाप बैठे रहो ? ललित 
लावण्य-विलास से परिपूर्ण अप्सरा स्त्रियों में श्रेष्ठ पुजिक-स्थल' नाम से विख्यात तुम्हारी 
माता ने अग्निदेव के शाप से अजना के नाम से वानर-युवती होकर जन्म लिया और 
इस पृथ्वी पर केसरी की पत्नी होकर रही । एक दिन जब वह वन में विचरण कर रही थी, 
तब वायुदेव उस यूवती के मंद गमन, सुडौल जधा, भारी नितव, चद्र-मुख, सुदर अधर, 
क्षीण कटि, उन्नत कुच और विशाल आाँखें देखकर उस पर मोहित हो गया । मन्मथ के 
वाणो से आहत होकर उसने अजना के वस्त्रों को उडा दिया और उसके समीप पहुँचकर 
उसका आलिंगन किया । तब अजना ने क्रुद्ध होकर कहा--'किस दुर्मति ने मेरा शील 
बिगाडने का यह साहस किया है ? तब वायुदेव ने कहा--हे सुदरी, कुद्ध मत होओ । 
में पवन हूँ । हे कमलाक्षी, मेने तुम्हारे साथ केवल हृदय-सगम किया है, जिससे तुम्हारा 
शील खडित न हो । इससे तुम्हें ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा, जो वल, तेज, विक्रम, पौरुष तथा 
धैय॑ से सपन्न होगा । इतना कहकर वायुदेव चले गये । उस नारी-रत्न ने वायुदेव की 
विमल कूपा से अत्यन्त हु से तुम्हें जन्म दिया । तुम इस पृथ्वी पर वायु के समान शक्ति- 
शाली हो | यही नही, किसी भी आयुध से तुम्हारी मृत्यु नही हो सकती । सभी लोको में 
तुम्हारी समता करनेवाला कोई नही है । मे तुम्हारी शक्ति से भली भांति परिचित हूँ । 
अत , तुम समुद्र को पार करो, सीता के दर्शन करो और यत्लपूर्वक राम का कार्य सपन्न 
करके, कपियो के, दशरथ-पुत्रो के तथा वानर-राजा के प्राणो की रक्षा करो | हैं जगतृप्राण- 
नदन, तुम इस प्रकार उत्तम लोको की गति प्राप्त करो ।” 


तब हनुमान ने कहा--ऐसा ही हो । में तुम्हारी आजा का पालन करूँगा । 
है वानरो, आज तुम मेरी शक्ति देखों। में समस्त लोक के हितार्थ समुद्र को पार कहूँगा। 
भले ही देवता भी मुझे रोकें, में उन्हें भी जीत लूंगा । (आवश्यकता पडे त्तो) समस्त 
लोको का नाश भी कर दूंगा । सव को आश्चर्यचकित करनेवाली अपनी शबित से 


२०८ रंगनाशथ एशयायर 


लक्का में प्रविप्ट होऊेगा । अबथक परिश्रम करके दूँदँगा और भूमिन्सुता को देखकर ही वापस 
आऊँगा । बबवा उस लका को भी उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा तथा सीता को अवश्य हो 
राम के चरणों में पहुँचा दूगा । नहीं तो सभी समुद्रों का मश्न करूँगा, उद्धत गति से 
अमराद्वि को नप्ट-अप्ट करूँगा, पृथ्वी को चूर-चूर कर दूगा, मृत्यु का भी सहार कछेंगा, 
समस्त द्वीयो को छान डालूगा, देवेन्द्र को त्रास दूगा, सभी दुप्ट राकसों का सहार करूँगा, 
और समस्त ससार में अवकार फैला दूंगा, किन्तु विना कार्य सपन्न किणे तुम्हारे निकट 
नहीं आऊँगा ॥' 
२३. समुद्र पार करना-मेनाक से मेंठ 

इतना कहकर हनुमान्‌ महेल्‍्वगिरि पर चढ गया और त्रिविक्रम विप्णु के समान ऐसा 
अह्वितीय चरीर घ्यरण किया, मानो प्रलयकार्ल,न काल सभी सखमुद्रो के साथ सारी सूप्डि 
को नियलने के लिए प्रस्तुत हुआ हो। उसके परचात्‌ उसने अंगद आदि वानरो की अनुमति ली । 
मन-ही-मत अपने पिता वायुदेव का स्मरण किया, श्रीराम के चरण-कमलो को अपने 
हृदय में प्रतिष्ठित किया । दृढता के साथ अपने पैरो को पहाड पर जमाया, कठ ऊपर को 
उठावा, देह को मकाया और भौहें उठाकर विच्ााल जल-राभि को चारो ओर से देखा । 
उसके उपरात्त उसने -रावण को नगरी पर दृष्टि डाली, बपना लागूल जोर से घुमाया, 
दोनों कान खड़े किये, शिलाजों पर अपने हाथ टेके और जाकाश की ओर बडे वेग से 
ऐसे उछला, जैसे पूर्वकाल में अमृत को छीनने के उद्देश्य से गरुड पृथ्वी से आकाण की ओर 
उडा था । उस वेग के प्रभाव से पर्वत-श्वुग चूर-चूर हो गये, मानो रावण ने अबतक 
जो-अत्यधिक महत्त्व और यज्ञ प्राप्त किया था, वे सव चर-चर हो गये हो । (उस पव॑त 
पर के) वृक्ष उसके बेंग के कारण उसके साथ ही आकाश की ओर उड़ चले ओर खड 
खड होकर उस सागर में ऐसे गिरे, मानो पवन-पुत्र ने स्वय ही भावी सेतु का शकु-स्थापन 
किया हो । 

उस समय उत्पन्न प्रचंड वायु के कारण बादल चारो ओर ऐसे भागे, मानो वे पवत- 
पुत्र के लका में आगमन की सूचना इंद्र आदि देवताओं को देने के लिए जा रहे हो! 
समुद्र का सारा जल एक ओर हट गया और जल के भीतर पाताल-लोक ऐंसा दीखने 
लगा, मानों समुद्र हनुमान्‌ को यह दिखा रहा हो कि रावण ने मेरे जल में जानकी को 
नही छिपाया है | हनुमान्‌ की स्वामिभक्ति, घैये, साहस, तेज, चातु्ये, और उदात्त शक्ति 
को देखकर इन्द्रादि देवता उनकी प्रच्नंसा करने लगे । 

इस प्रकार जानेंवालें हनुमानू को देखकर समुद्र मन-ही-मत सोचने लगा--बहे 
पुण्यात्मा, जयत्‌ के कल्याण के लिए बहुत दूर जा रहा हैं | उसका श्रम दूर करने के 
निमित्त, में मेनाक को भेजूंगा।” यो सोचकर उसने मैनाक को बुलाकर कहा--मिभी हलु 
मान्‌ यहाँ जाया है | उचित रीति ने उसके अतिथि-सत्कार की व्यवस्था करो 

ओोभा-समन्वित, स्वर्ण-शिखरो से विलसित, स्वर्गं-सम सुदर वह मैचाक पर्वत तुरूत 
अपने विद्याल पख्ो को फैलाते हुए उडा औौर समुद्र के मध्य भाग से ऊपर आया और 
हनुमान के सामने आ पहुँचा । हनुमान्‌ ने अपने सामने उस विश्ञाल पर्वत को देखकर 


५ 
488 


ककि/न्कथाकाड २०० 


सोचा--यह द॑त्यों की माया हैं । यह कदाचित्‌ मेरे कार्य में विष्न डालना चाहता हैं । 
पर कोई चिता की वात नहीं है | में अपनी झक्ति से इसका ना करूँगा । यो सोचकर 
हनुमान्‌ ने वत्ञ के समान कठोर “अपने वक्ष.स्थल से उस पर्वत को धवका दिया । तुरत 
वह पर्वत, ववडर में फँसे हुए सूखे पत्ते की तरह शवितहीन होकर चक्कर खाने लगा । 
फिर वह मनुष्य का रूप धारण करके हनुमान्‌ से बोला--हे अनिलकुमार, में तुम्हारा 
शत्र्‌ नहीं हूँ | समुद्र की आज्ञा से में तुम्हारे पास आया हूँ । उस भहानुभाव ने .तुम्हें 
आतिथ्य देने के निमित्त, मुझे तुम्हारे पास भेजा हैं। इसलिए में तुम्हारे पास आया हूँ । 
प्राचीन काल में सभी पर्वतो के पल थे । अपने इन पखो के कारण जब वे गवे करने लगे, 
तब इन्द्र क्रोध में आकर वेज्ञायुध से सभी पर्वतो के पख् एक-एक करके काटने लगा। 
तब यह देखकर तुम्हारे पिता पवन सहज ही मुझे इस लवण-समुद्र में ले आये और मेरे 
पखो की तथा मेरी रक्षा की । इसलिए में तुम्हारा अपना ही व्यवित हूँ, पराया नहीं हूँ । 
मे परव॑तश्रेष्ठ शीताचल का पुत्र हूँ । मेरा नाम मैनाके है | मेरें पेडो पर जो फल लगे हे, 
उनको ग्रहण करके, अपनी क्षुधा तथा क्लान्ति दूर करो । हे पवन-पुत्र, उसके पश्चात्‌ 
तुम लकापुर को जा सकते हो । तब उस महावली हनुमान्‌ ने कहा--जवब विश्राम 
करना उचित नही है । मेने प्रतिज्ञा की हूँ कि में समुद्र के मध्य में कही नही ठहरूँगा । 
अत , हे पर्वतराज, मुझके यहाँ कही ठहरना नही चाहिए। इस प्रकार कहकर उसने अपने 
करतल से उस पर्वत की मूर्घा का स्पर्श किया और कहा-- हे अनघ, तुम्हारी पूजा फलवती 
हुई । अब तुम जाओ ।* 

इस प्रकार कहकर शीघ्र गति से जानेवाले अनिलकुमार की शवित को देखकर देवता 
आश्चयं तथा हर्ष से भर गये । देवेन्द्र ने भी मैनाक पर्वत को देखकर बड़े प्रेम से कहा-- 
श्रीराम के कार्य के लिए जानेवाले हनृूमान्‌ के प्रति तुमने उचित व्यवहार किया। अत, 
में तुम्हें अभय-दान देता हूँ । तुम सुख से यही रहो । की. 

तब गधवे, अमर तथा मुनियों ने हनुमान्‌ की शक्ति की परीक्षा लेने का विचार 
करके सुरसा नामक नाग-माता को हनुमान्‌ का मार्ग रोकने के लिए भेज़ा । तब वह एक 
राक्षसी का रूप धारण करके हनुमान्‌ के मार्ग में आ खडी हुई और कोली--इस समुद्र 
के ऊपर से होकर जानैवाले तुम्हें मेने देखा, देवयोग से अब मेरे प्राण बच गये, में वहुत्त 
भूखी हँँ। अत, तुम अब मुभसे बचने की चेष्टा न करके, मेरे मुह में प्रवेश करो। 
तब हनुमान्‌ ने कहा--हे नारी, तुम मेरा मार्ग मत रोको । में राम का काय॑े पूरा करके 
लौटते समय तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा । अब में जाता हूँ । में असत्य वचन नहीं कहता।' 

तब वह स्त्री ऋद्ध होकर हनुमान्‌ का मार्ग रोककर खडी हो गई और बोली,-- 
'मे तुम्हें जाने नहीं दृगी, मे अवष्य तुम्हारा वध करूंगी । यो कहती हुई उसने अपना 
मुह खोल दिया | तब अनिलकुमार ने अपना शरीर दस योजन तक बढ़ा लिया | तब 
उस स्त्री ने अपना मुँह उसके दुगुना चौडा कर लिया । हनुमान्‌ ने अपना शरीर तीस 
योजन तक बढाया, तो उस स्त्री ने अपना मुह चालीस योजन विधाल बना लिया । इस 
प्रकार एक-दूसरे से स्पर्धा करते हुए क्रमश अपने छरीर तथा मुंह को शत योजन तक 

२७ 


से 
के 


९४० रंगनाथ एसायायफ 


०. 


बढा दिया । तव हनुमान्‌ ने बडी चतुरता से एक अगुष्ठ प्रमाण-मात्र का अपना शरीर 
बनाकर, सूक्ष्म रूप से उस स्त्री के मुह में प्रवेश करके सहज ही इस प्रकार बाहर निकल 
आया जैसे कोई ज्ञानी ससार के जटिल वधनों से अपने-आपको मुक्त करके निकल आता है । 
उसके परचात्‌ उसने उस स्त्री को देखकर कहा--हे नारी, मेने तुम्हारी इच्छा पूरी 
कर दी, अब में समुद्र पार जाऊंगा ।” उस स्त्री ने भी उस कंपिकुलोत्तम हनुमान्‌ की 
बुद्धि की प्रशसा करती हुई दिव्य रूप धारण करके बड़े स्नेह से आशीर्वाद दिया औरे कहा- 
ज्ञी्र ही तुम्हारा कार्य सिद्ध हो ॥' | 

तब हनुमान्‌ समझ गया: कि यह छायांग्राहिंणी है और विना भय के तुरत सूक्ष्म 
रूप धारण करके उसके उदर में प्रवेश किया । फिर उसने उसका उदर चौरकर उस दुष्ट 
राक्षती को समुद्र में फेंक दिया । इन्द्रादि देवता इसे देखकर अत्यत ह्षित हुए और पृष्प- 
वृष्टि करने लगे | इस प्रकार हनुमान्‌ सहज ही समुद्र पार करके सुवेल (त्रिकूट) परवृत 
पर पहुँच गया । 

इस प्रकार, आघ्र-भाषा का सम्राट, श्रेष्ठ काव्यागमो के ज्ञाता, पवित्रात्मा, आचारवान्‌, 
अपार घधीमानू, तथा भूलोक का निधि, गोन वृद्ध नरेश ने, युणवान, धघीर, शत्रुओं में भय 
उत्पन्न करनेवाले, महात्मा, श्रेष्ठ वीर, अपने पिता विदट्ठुलनरेश के नाम पर समस्त ससार 
में .पूज्य,. अनुपम छाब्दार्थों से परिपूर्ण तथा लोकप्रिय रामायण के किष्किधाकाड की रचना 
इस प्रकार की कि वह अलकार तथा भावो से युक्त हो और जबतक सूर्य तथा चद्र इस 
ससार में रहें, तततक इसकी प्रशसा होती रहे । 


किध्किधाकांड समाप्त 


श्रीरंगनाथ रामाथण 


(सुन्दरकांड) 


१, हनुमान्‌ का लंका में प्रवेश 


क्षीराम का कार्य सपन्न करने का निशचय करके हनुमान ने विशाल सागर को 
ऐसा पार किया, मानो वह एक छोटी-सी नहर हो और उस सुवेल पर्वत पर चढ गया, 
जो लकापुरी के निकट था । वह लकापुरी सुदर श्वगोंसे, पहाडी तराइयो से, प्रचुर वृक्षों 
तथा लता-समूहो से, करव, वधूक, कल्हार एव कुमुद आदि पुप्पो से, सारस आदि 'जलचर 
पक्षियों से, विलास गति से विहरण करनेवाले हसो के कलरबव से, ऋ्रौच पक्षियों के निनादो 
से तथा कमल का मकरद पान करने से मत्त होकर भकार करनेवाले भ्रमरों की पवितयों 
से यूक्‍त तडाग्रो से परिपूर्ण था । 

उस पर्वत पर चढकर हनुमान्‌ ने दक्षिण दिशा में दृष्टि दौडाई और लका नगरी 
को देखा । वह नगरी त्रिकूटाद्धि पर सुशोभित थी, और पघ॒र्म, अर्थ तथा काम इन तीनों 
को एकत्र किये बैठी लक्ष्मी के समान सुथोभित थी । अपनी उज्ज्वल कान्ति के कारण 
वह तारादि की समता करती थी और आकाश-मार्ग से स्पर्धा करती हुई दिखाई पडनतो थी । 
वह अपने रत्तो की कान्ति से सुशोभित होकर ऐमी दीखती थी, मानों देवताओ में 
यूक्‍त अमरावती ही समुद्र के मध्य में सुदर ढंग से शोभायमान हो रही हो । अबवा सुदर 


प्श्छ रंगनाथ एयायण 


मकर, कच्छप तथा पद्मनिधियों से यूबत अलकापुरी ही मानों कुबेर से रूठकर वहाँ आ 
गई हो, या चिरकाल से समुद्र के नीचे रहने के कारण ऊबकर भोगवती नगरी ही समुद्र- 
तल से ऊपर उठकर त्रिकूट पर्वत पर आ गई हो । उस नगरी का प्रभा-समन्वित स्वर्ण- 
दुर्ग, समुद्र को ही अपनी परिखा बनाकर, ब्रह्माण्ड के समान सुशोभित था और ब्रह्मादि 
देवताओं को भी अभेद्य दीखता था । वह लकापुरी दुर्वार गज, रथ, तुरग तथा भयकर 
एवं श्रेष्ठ वीरो से युक्त थी और अलौकिक एऐंश्वर्य से सपन्न हो बहुत सुदर दीखती थी । 
ऐसी लका नगरी को देखकर हनुमान्‌ आइचर्य-चकित हो गया और निनिमेष नेत्रो से जहाँ- 
तहाँ देखता ही रह गया । वह सोचने लगा--“अकेले समस्त लोकों को जीतकर, अपने 
पराक्रम से सभी लोको में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनेवाला दशकधघर ऐसे ऐव्वर्य से 
सपन्न लका का राजा बना हुआ है। फिर भी, उसके भाग्य में जीवित रहना नही लिखा है। 
सर्वेश्वर रामचद्र की पत्नी को ले आकर इस मूख॑ ने क्‍यों मृत्यु को आमत्रित किया है ”' 
इस प्रकार रावण की निंदा करतें हुए वह जक्तिणाली हनुमान्‌ लका में प्रवेश करने 
का उपाय सोचने लगा । वह नगर के उत्तर द्वार पर पहुँचा और सारी परिस्थिति तथा 
अपने कत्त॑व्य का विचार किया । उसके पश्चात्‌ वह सोचने लगा--भला, इस विशाल 
सागर को वानर कैसे पार कर सकेंगे ? यदि पार भी करेंगे, तो इन्द्रादि देवताओं के लिए 
भी दुर्भेध इस लका को जीतना क्‍या किसी भी रीति से उनके लिए सभव होगा ? युद्ध- 
भूमि में भयकर साहसी रावण को राम कंसे जीत सकेंगे ?” 

एक मुहृत्त काल तक इस प्रकार सोचने के पर्चात्‌ हनुमान्‌ ने मन-ही-मन विचार 
किया--यदि में अपने इस विशालकाय के साथ, दिन को ही इस नगर में प्रवेश करूंगा, 
तो राक्षस भटो से मेरा सामना हो जायगा । उस प्रकार में सीताजी का पता नहीं लगा 
सकूँगा । अत मे सूक्ष्म रूप घारण करके इस नगर में प्रवेश करूँगा और दैत्यो की आाँखो 
में घूल फ्रोककर अवश्य ही सीताजी के दर्शन करूँगा । इस प्रकार मन में विचार करके 
वह सूर्यास्त की प्रतीक्षा में वैठा रहा । निदान सूर्य-बिंव इस तरह तिरोहित होने लगा, 
मानो सूर्य यह सोच रहा हो कि विज्ञाल शक्तिशाली राम की पत्नी सीता देवी का पता 
लगाने के लिए जो यह (हनुमान) आया है, मेरे आकाश में रहते समय उसके लिए लका 
में प्रवेश करना कठिन होगा | दिशाओं में घोर अधकार ऐसा व्याप्त हो गया, मानों अनिल- 
पुत्र के आगमन से भयभीत हो राक्षस (रावण) के घोर पाप चारो ओर भाग रहे हो । 
क्रमश दैत्यो की कलकल ध्वनि मद पडने लगी । यह देखकर पवन-पुत्र ने सारी बातें 
मन-ही-मन विचार करके एक विल्ली के समान छोटा रूप धारण किया और फिर राघवों 
का स्मरण करके लका में प्रवेश करने का उपक्रम करने लगे । 


२, लंकिणी का हनुमान्‌ को रोकना 
उस समय भयकर आकारवाली लकिणी हनुमान्‌ के मार्ग को रोककर ऐसे खडी हो गई, 
जैसे किसी निधि को बाहर लाते समय उस ब्रथत्न में बाधा डालने के लिए कोई भूत उत्पन्न 
होकर खड़ा हो जाता है । उतने अट्टहास करके पवनकुमार को डाँटते हुए कहा--तुम कौन हो ? 
तुम्हारा नाम क्या है ? इस नगरमें तुम क्‍यों प्रवेश कर रहे हो? किसने तुम्हूँ यहाँ भेजा हूँ ! 


से 
के 


एंन्द्रकांड ९५ 

तब हनुमानू अविचल खडा होकर बोला--तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्‍या हू ? 
तुम क्यों मेरे मार्ग को रोककर खडी हो ? पहले तुम अपना परिचय दो, तो फिर में अपने 
बारे में कहूँगा ।। तब वह बोली--में दश्कठ की आज्ञा से, वड़े यत्न से इस नगर की 
रक्षा करती रहती हूँ । मेरा नाम लकिणी हैं । जब में पराये व्यक्तियों को देखती हूँ, तव 
उन्हें नगर के भीतर प्रवेश करने नही देती और उन्हें तुरत मार डालती हूँ । तब हनमान्‌ ने 
उस स्त्री से कहा--हे नारी, में इस नगर को देखने के उद्देश्य से आया हूँ; मुर्भे जाने 
दो । तब वह राक्षसी माँखो से क्रोध प्रकट करती हुई बोली--भव तुम कहाँ जाओगे ? 
अब तो तुम मेरे हाथ में पड गये हो । तुम्हें पकड़कर तुम्हारे शरीर के टुकडें-टुकडे कर 
दूगी और तुम्हारा रक्त पी जाऊँगी । यो कहती हुई उसने बडे क्रोध से उस श्रेप्ठ 
वानर के वक्ष पर एक घूसा मारा । हवुमान्‌ ने सोचा कि स्त्री का वब करना पाप हैं। 
इसलिए उसने लकिणी के वक्ष पर ऐसा घृसा जमाया कि वह अपनी सारी शक्ति खोकर 
पृथ्वी पर गिर पड़ी और हनुमान्‌ को देखकर क्षीण स्वर में प्राथंना करने लगी--है कपि- 
कुलोत्तम, मुझपर कृपा करो । जिस दिन इस नगर का निर्माण हुआ, उस दिन निपुण 
ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन एक वानर यहाँ आकर तुम्हें दुख पहुँचायेगा, उसी दिन 
से राक्षसों का नाश प्रारम हो जायगा । इसलिए मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मनस्कामना 
सफल होगी । इस प्रकार कहती हुई वह स्त्री चली गई । उस स्त्री की वातों से हनुमान्‌ 
अत्यत हर्षित हुआ और मन-ही-मन यह निश्चय करके कि अव राक्षसो का नाश निश्चित हैं, 
पहली बार लका की घरती पर अपना वाम चरण प्रतिष्ठित किया । 


३ हनुमान्‌ का लंका में सीता का अन्वेषण 

फिर हनुमान्‌ ने सूक्ष्म रूप धारण किया और किले की भित्तियो पर चढकर इस 
प्रकार लका में प्रवेश किया कि किले के द्वार-रक्षक तथा सैनिक उनको देख न सके । 
फिर गुप्त रूप से मार्गों, बाजारों तथा चौपालो को देखते हुए वह आगे बढा । उसके 
पश्चात्‌ बडे-बडे गोपुरो पर चढा और गज-शालाओ से लेकर श्रेष्ठ सौधो के सभी स्थान देखें । 
फिर उसने मदिरो में देखा, घर-घर में दढा, तथा अत पुरो में ढू ढा, मडपो और सौधो में 
देखा । फिर अश्वशालाओ, रथशालाओ तथा शरस्त्रागारो में देखा और मणिमय भवनों में 
सीता का अन्वेषण किया । तत्पश्चात्‌ विभीषण, अतिकाय, देवातक और त्रिशिर के घरों 
में, कुभकर्ण के विशाल भवन में, कुभ के घर में, निकुभ के निवास में, शोभा-समन्वित 
इन्द्रजीत के अत पुर में, महोदर के भवन में और सभी दनुज-तायको के घरों में क्रमश 
सीता की खोंज की । दैत्यो के इन निवासो को देखकर हनुमान्‌ आउ्चर्य चकित हो गया । 
फिर उसने सभी अत पुरो में सीता को दूढा, सभी स्त्री-जनो में देखा, और एक-एक करके 
राक्षतों के सभी घर देंख डालें । किसी-किसी स्थान पर एक आँख, एक कान, एक हाथ- 
वाले विकृत रूपो को देखकर वह चकित रह गया । वही-कही उसने बहुत-से चरण, 
अनेक भुजाओ तथा कई शिरोवाले राक्षसों को देखा । फिर वह जपलप तथा 
स्वाध्याय. में तत्पर, सत्कर्मी तथा निप्ठावान्‌ तपस्वीश्रेप्ठ दानवो को देखते हुए आगे 
बढ़ गया । 


रत 


२९६ गनाय एायाय् 


उसके प्रद्चात्‌ हनुमान्‌ रावण के अत पुर के निकट पहुँचा । वह (अत पुर) मकर-तोरणो 
(मकर के आकार में बँवा हुआ वदनवार) पुष्प-मालिकाओ, विविध घूपों की सुगधि, रत्व 
तथा मोतियो से पूरे गये चौकों, चद्रकात-शिलाओ से निर्मित चवृतरो, स्वर्ण -तथा-मणियो 
से बनायें गये कपाटो, प्रशसा के योग्य मडपो, प्रवाल के बने ऊँचे स्तभो, अनेक अट्टालिकाओं 
तया सौधों की पक्तियों से अलक्नत था तथा सशस्त्र राक्षसों के छद्वारा सतत रक्षित था | 
'उस जत पुर के पास पहुँचकर हनुमान्‌ ने अतपुर के पहरेदारों के निकट जाकर देखा, 
फिर कई द्वारों को निर्भवय गति से पार करता हुआ जागे बढ़ा और सभा-मडपो में-सीता 
को ढूडा । वह रनिवास के निकट पहुँचा ही था कि इतने में, समुद्र में ज्वार उत्पन्न करते 
हुए, कमल-समूह की काति को मलिन करके उन्‍हें मुकुलित करते हुए, मदमत्त चक्रवात्त 
पक्षियों को विरहाग्नि से पीडित करते हुए, मन्मथ के प्रताप को बढाते हुए, मुरभाई हुई 
कमलिनियों के समृह को विकसित करते हुए, मृग्वा-जारिणियों के चित्तो में चचलता उत्पन्न 
करते हुए, घने अधकार के प्रताप को नप्ट करते हुए, चद्रकात-शिलाओ को गलाते हुए, 
चुकोर पक्षियों को प्रेम से अधघाते हुए, प्रेमी-प्रेमिकाओ का मिलन सपन्न करते हुए, अपनी 
संपूर्ण राका से दिशाओं को भी उज्ज्वल बनाते हुए, मन्‍्मथ का ससुर, उत्तम शोभा की 
सीमा, कुमुदिनियों का प्रेमी, नक्षत्रों के अधिपति चद्र का उदय आकाश में ऐसे हुआ, मानों 
लकापुरी में सीताजी का अन्वेषण करनेवाले हनुमान की सहायता करने के हेतु देवताओ ने 
मनाल जला दीदहो। 

४ हनुमान का रावण के अंतः्पुर में प्रवेश .करना 

ऐसे चन्द्र को देखकर हनुमान्‌ ' मन-ही-मन हर्पित हुआ और-सारे अत पुर में देखते 
हुए जाने लगा । एक स्थान पर उसने कातिमान्‌, विश्वकर्मा से -रचित, अपनी इच्छा से 
'चलने की जक्ति रखनेवाला, विचित्र कला-कौशल से सपन्न सूर्य-चद्र के समान अकाशमात 
मणि-पुप्पफफकः नामक विमान को देखा, जिसे देवलोक के झत्रु (रावण) ने युद्ध में, कुवेर को 
पराजित करके छोन लिया था ॥ 

उस विमान में पवन-पुत्र ने उन सुदरियो को देखा, जिन्होनें रावण को सुख- के 
समुद्र में उत्तराकर, मछपान तथा भोग-विलास के मघुर रसास्वादन के कारण -शिथिलः हो 
सोई पड़ी थी | उनकी गरीर-रूपी लताएँ अवश हो पढी हुई थी; उत्तकी स्निग्व जाँघो 
का सौदये प्रकट दीख रहा था; उन्तकी नीवियो की गाँठें ढीली हो गई थी, उनके मुख 
मुरमाये हुए थे, उनकी सुगधित साँसें चल रही थी, अघरः एक विचित्र सुदरता के 'साथ 
एक ओर मु हुए थे और उनपर मद हास नृत्य कर रहा था, उनके अद्ध-निमीलित 
नयन उनकी रति-क्रीड़ा की मुग्व परवशता प्रकट कर रहे थे, उनके नृपुर“निशब्द होकर 
उत्तकं चरणों में लिपटे हुए थे, उन्तका चदन-तिलक श्रम-जल से गल रहा था, उनकी 
वेणियाँ खुली हुई थी, पुप्प-मालाएँ टूटी पडी थी, श्रप्ठ मुक्ताओं की मालाएँ उनके दोनो 
कठोर कुच-पर्वतो के वीच दवी हुई थी और उनके चित्त मदिरा-पान से मत्त थे | अपने 
कटि-रूपी सैकत,' केश्-रूपी शैधाल, नाभि-रूपी सरोवर, अ्ू-रूपी तरगो, कुच-रूपी मेंवरः-तमग्रा 
नयन-रूपी मीनो से युवत वें सुंदरियाँ सुख-निद्रा में सोनेवाली नदियों के समान दीख रही थी ! 


उछनन्‍दुरकांड २१७ 


परस्त्रियों के शरीर के विविध अगो को देखने से पुण्यात्मा हनुमान्‌ मन-ही-मन 
अत्यत दुखी था | वह सोचने लगा कि स्वामी के कार्य में निरत रहने के कारण मुझे इस 
प्रकार परस्त्रियो के शरीर के अगो को देखना पडा हैँ। पाप-बुद्धि से मैने ऐसा नही किया हूँ । 
इन स्त्रियों के भुड में ही सीताजी को ढुंढना है, अन्य स्त्रियों में नहीं । 

इस प्रकार मन में सोचते हुए दवे पाँव वह आगे बढ़ा | वहाँ उसने एक विशज्ञाल 
रत्न-वेदी पर पृप्प-शय्या पर सोनेवाले इन्द्र के भोग-विलास को भी मात करनेवाले, साध्य- 
राग से युक्त जलद की भाँति चदन तथा अगराग से दीप्त शरीरबवालें सुदर भरनो से युफ्त 
नीलादि के समान मोतियो की मालाओ से सुशोभित देहवालें, पचशिरवाले भयकर सर्पो की भाँति 
सुपोंपित उँगलियो से युक्त भुजाओवाले, स्वच्छ चाँदनी के साथ रहनेवाले अधकार के समान 
अपने शरीर को स्वच्छ चादर से ढककर सोनेवाले, अपने विज्ञाल वक्ष पर ऐरावत के दाँतों के 
आधघातो को बडे साहस के साथ वहन करनेवाले, अपने दोनो पार्वों में रखे मणिमय दोपो 
की शिखाओ को अपनी उसाँसो से हिलानेवाले, मुकुट तथा कुडलो की दीप्ति से सुशोभित रूपवाले 
तथा सभी शत्रुओ का गवे निचोडनेवाले रावण को देखा और अनुमान कर लिया कि यही 
राक्षस राजा हैं। उसके पार्श्वो में गधवं, देव तथा देत्य कामिनियो को देखा । उनमें से 
कुछ पानदान, कुछ पीकदान और कुछ अपने हाथो में पे लिये हुई थी। कुछ कामिनियाँ 
अपने कर-ककणों से शब्द करती हुई चामर डुलाने, कुछ मधघुर-सधुर गीत गाने, कुछ 
नृत्य करने, कुछ वीणा वजानें और कुछ मृदग बजाने के पदचात्‌ अब थककर अपने-अपने 
उपकरणो से लिपटी हुई सोई पडी थी । 

उसके पश्चात्‌ परम पावन हनुमान्‌ ने रावण की हण्या पर सोई हुईं, नव यीवनवती 
देव-स्त्रियो के सदुश दीखनेवाली और गगन-मडल के मध्य रहनेवाली चद्रकला के समान 
प्रकाशित होनेवाली, मदोदरी को देखा । हनुमान्‌ ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि 
मेने सीताजी को देख लिया और वह जआनदविभोर हो उठा । उस आनद में कभी 
उछलता, कभी कूदता, कभी वहाँ के स्तभो पर चढता और कभी अपने लागूल का चुबन करता। 
इस प्रकार वह थोडी देर तक अपनी जाति-सहज विकृत चेप्टाएँ करता रहा । फिर बह 
मन-ही-मन अपने विवेक को जाग्रत करके सोचने लगा,--मनुकुलेश्वर की पत्नी, पति- 
ब्रताओ में शिरोमणि, परमपावनी, तथा महाराज जनक की पुत्री, भला, देवाधिदेव राम को 
छोडकर, रावण के साथ रहने की इच्छा करेंगी ” कही आसबत हो मधुपान करेंगी ? हाय, 
मेरी बुद्धि को ऐसा भ्रम क्यो हुआ ? कंसे भी विचार करूँ, यह चचलाक्षी अवश्य ही कोई 
दानवी हैं, सीता नही हैं ।॥' 

इस प्रकार निश्चय करके वह उस स्थान को छोडकर आगे बढा और आंसव, रवत, 
मध्‌ एवं मास-युक्त मधुशालाओ को देखकर उन भवनों में सीता को ढदूँढा, जिनमें गरुड, 
उरग, अमर, गधव॑ तथा सिद्धों की स्त्रियाँ बदी थी । फिर उसने जहाँ-तहाँ छाया में खडे 
होकर, एकात में वार्तालाप करनेवालो का सभाषण ध्यान से सुना । बिना इस बात का 
विचार किये ही कि में अमुंक स्थान में प्रवेश कर सकता हे, अमुक स्थान में नहीं, अमुक 
स्थान में जाना मेरे लिए उचित है, अमुक स्थान में नहीं, हनुमान्‌ ने सारी लापपुरी में 

र्८ 


से 
में 


र्‌श्८ रंगनाथ शामायेपें 


ढ़ डाला, किन्तु मानव-हूप में रहनेवाली सीता को कही भी ओर किसी भी प्रकार से 
देख न पाने के कारण अत्यत दुखी हुआ । 


४० हनुमान का रावण के उद्यान में जाना 


इसके पश्चात्‌ हनुमान्‌ ने नगर के समीप रहनेवाले और सोने की चहारदीवारी से 
घिरे हुए एक उद्यान को देखा । घीरे-घीरे वह उस उद्यान के निकठ पहुँचा । चारो ओर 
भली भांति देखकर वह उसकी दीवार पर चढ गया गौर उस सुदर उद्यान के भीतर देखने 
लगा । वह उद्यान चदन, पुन्नाग, सहकार, मदार, खर्जूर, कटहल, पीपल, नीवू, विजौरा, 
पाटली, वबकुल, घनसार, सौवीर, कर्णिकार, कुरवक, जबीर, ताल, तमाल, हिताल, साल, नारिकेल, 
अशोक, सप्तपर्णी, दाड़िम, नारंगी, केतकी और पुगीफल, आदि के वृक्षों से, मल्लिका, 
मालती, माघवी, नागवल्ली, एला, लवग आदि लताओ से, पके हुए द्वाक्षाफल के गुच्छो से 
और पके हुए फलो तथा पुप्पो की सुगधि से युक्त वायु से परिपूर्ण था । वह (उपवन) 
पिक, शक, नीलकठ एवं सारिकाओं तथा भ्रमरों से गोभायमान था । वह सुदर सरोवरो 
से, कुमुद-समृहो से, चद्रकात-मणियों की वेदिकाओं से, स्वच्छ चाँदनी से तथा सैकत स्थलों 
से अत्यत मनोहर था । वह सभी ऋतुओ में विहार करने योग्य था और उसकी शोभा 
चैत्ररथ (कुवेर का उपवन) को भी मात करती थी । अमरेन्द्र के नदन-वन की समता 
करनेवाली रावण की उस उद्यान-वाटिका को देखकर हनुमान्‌ आइचरयंचकित हो गया और 
उस उपवन में प्रवेश करके दवे पाँव सरोवरो में, खड़्डो में, उनके तठो पर, निकुजों में, 
पेडो के नीचे तथा सुरक्षित स्थानों में वडी सावधानी से सीताजी की खोज 
करने लगा । उसके पदचात्‌ उस उपवन के मध्य भाग में स्थित, रात-दिन पहरा देनेवाले 
राक्षस-वीरो से रक्षित, गगनचुवी अट्वालिकाओ से सुझ्योभित मेरु पर्वत के शिखरों के समान 
स्वर्ण-कलशो से शोभायमान, स्वर्ण-स्तमो तथा श्रेष्ठ रत्नों के वदनवारों से भासमान एक 
विज्ञाल भवन को हनुमान्‌ ने देखा | हनुमान ने उस भवन में भी सीता को ढूँढा, किन्तु 
वहाँ भी उनका पता नहीं चला । 

तब हनुमान्‌ मन-ही-मन अत्यत दुखी हुआ और सोचने लगा--हाय, सूर्यकुल-तिलक 
राम ने मुझे एकात में वुलाकर, बडें प्रेम से कहा था कि तुम अवश्य सीता का पता लगा 
सकोगे और मेरे हाथ में अपनी मुद्रिका दी थी | उनका आदेश स्वीकार करके में यहाँ 
आया हूँ । किन्तु उस कमल लोचनी का पता कही नहीं मिल रहा है । उस दुरात्मा 
रावण के ले आते समय कदाचित्‌ उस साध्वी ने अपने प्राण त्याग दिये हो या आकाश- 
मार्ग से अत्यधिक वेग से आते समय भयभीत हो सीताजी, राक्षस के हाथो से मुक्त होकर 
समुद्र में गिर गई हो, अथवा यहाँ के राक्षसों को देखकर भय से प्राण छोड़ विये हो, 
अथवा विरहाग्नि में जलकर भस्म हो गई हो, या राक्षस ने किसी ऐसी माया की रचना 
की हो, जिससे सीता कसी को दीख नही पडती हो, या रावण ने उन्हें विदेशों में रख 
दिया हो, या उस राक्षस ने उस चचलाक्षी को दण्ड देकर उसके प्राण ले लिये हो । हाय, 
म॑ किस मुँह से लौट जाऊँगा और राम से क्या कहूँगा ? अब में क्या करूँ? ज्यो ही में 
भह कहूँगा कि मेने सीता को नही देखा, त्यो ही राम अपने प्राण त्याग देंगे । अपने भाई 


उन्‍्दृरकांड २९९ 


के लिए लक्ष्मण भी शरीर छोड देंगे । यह समाचार सुनकर भरत भी अपने प्राय-त्याग 
करेंगे, उनके लिए शत्रुघ्न तथा अन्य संगरे-सवधी अपने-अपने प्राण तज देंगे । इस प्रकार 
समस्त सूर्य-वश का नाश हो जायगा । यह देख सुग्रीव, अग॒द आदि सभी वानरों के वश 
भी नष्ट हो जायेंगे । इसलिए में एक वानप्रस्थ की भाँति वनों में ही निवास करूँगा, या 
चिता रचकर अग्नि में प्रवेश करूंगा, या प्राणों का मोह छोडकर समुद्र में डूब मरूंगा। 
हाय, सपाति के वचनो को सत्य मानकर, अकेले मेरा यहाँ आना व्यर्थ हुआ । ठोक हूँ, 
चिता की कोई बात नहीं है | में साहस करके देवताओ से भिड जाऊँगा और देवेन्द्र को 
पकडकर उसे त्रास दूगा, अथवा ज्वालाओ से युक्त अग्नि को पानी में डुवोकर उसे पृथ्वी 
पर रगड दूगा और उसकी प्रभा को नष्ट कर दूगा, अथवा यम को उसके भटों के साथ 
ऐसा दण्ड दूगा कि उसका हृदय फट जाय, अथवा नैऋत को सभी राक्षसों के साथ भय 
से तडपाकर उसे अत्यधिक दु ख दूगा, अथवा जल-राशियों के साथ वरुण को परास्त करके 
उसे जीत लूगा या वायु के सप्त पवनों को घेरकर उन्हें दण्ड दूगा, या कुबेर को 
किन्नरियो के साथ कैद करके उन्हें इस तरह तडपाऊँगा कि उनकी सारी सुदरता नष्ट हो 
जायगी या अपने अतुल पराक्रम से ईशान को उसके सेनापति के साथ पकड़कर उनके 
साथ युद्ध करके उन्हें जीत लूगा, पृथ्वी को सभी पहाडो के साथ, कुम्हार के चक्र के 
समान घुमाकर उसके गर्भ की सभी चीजों को उगलवा दूँगा या इस लका के राक्षसो 
को समुद्र में डुबोकर सबका नाश करके सारी लका को छान डालूंगा । जब में इतना 
सब करूँगा, तभी सभी देवता (मेरे सामने) भुककर, सीताजी को दिखायेंगे, या राघव 
स्वय दया करके ससार का नाझ् करने से मुझे रोकेंगे । 


६. हनुमान्‌ की सीता से सेंट 

इस प्रकार निशचय करके हनुमानू उस भवन के शिखर पर चढ गया । उसने 
निकट ही स्थित वायु तथा सूर्य-किरणो के लिए भी अभेद्य अज्ञोकवन के एक प्रातर भाग 
में अत्यत समृद्ध हेम-वर्ण के अशोक-वुक्ष के नीचे एक स्त्री को देखा । वह ब्रतो के अनु- 
प्ठान के कारण क्‍लान्त हो गई थी, शोक से कृश हो गईं थी, अत्यधिक दुख से दबी 
हुई थी, वेदना से दग्ध थी, अनवरत भरनेवाले अश्रुजल में डूबी हुई थी, विरहागिनि में 
तप्त थी, कपट आचरण का शिकार बनने से मर्माहन होकर सूख-स्ी गई थी, जीवन के 
प्रति विरक्त-सी हो गई थी और उसके चीर मैले हो गये थे । वह भगवान्‌ को मन-ही- 
मन कोसती हुई, दुखो का सहन करती हुई, अपने को असहाय समभकर घीैयें त्यागी हुई, 
सूर्य की प्रचड रष्टिम से सूखी नव-लता के समान, घुएँ से घिरी हुई दीप-शिखा के समान, 
बादलो की पक्ति के मध्य दीखनेवाली चद्र-रेखा के समान, पाले से आहत पद्मिनी के समान, 
मार्जारों के मध्य रहनेवाले तोता पक्षी के समान और व्याप्रो के मध्य फंसी हुई गाय के 
समान, दुर्वार घोर राक्षसों के मध्य बडे उदास भाव से एक हथेली पर कपोल रखे वैठी हुई थी । 
ऐसी मुद्रा में बैठी हुई आभूषणों से युक्त वेणी से आच्छादित जघावाली, मलिन अगोवाली, गद्गद 
कठवाली, उष्ण निशभ्वास छोडती रहनेवाली, सतत उपवात्त करनेवाली विदश्ञालाक्षी, जनक की पुत्री 
तथा जगन्म्राता सीता को हनुमान्‌ ने देखा । उसने तुरत प्तोचा किये कदाचितु सीता हो हो । 


र्‌््‌्० रंगनाथ एयायण 


इस प्रकार सोचकर उसने मन-हीं-मन राम तथा लक्ष्मण को बडी भवित के साथ 
प्रणाम किया, बडे उत्साह से देवताओ की प्रार्थना की और वडे हर्ष से उस भवन से नीचे 
उतर आया । उसके पश्चात्‌ उसने एक अगुप्ठ-मात्र का आकार ग्रहण किया और उस बश्ोक- 
वृक्ष के पास पहुँचकर उसपर चढ गया । वालक के हूप में वट-वृक्ष के पन्नों में शयन करने- 
वाले विप्णू के .समान, वह श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घती जाखाओं में बडी कुशलता के 
साथ छिपकर बैठ गयण्णम और (उस पुण्यात्मा ने) बडे ध्यान से उस विशालाक्षी को वार- 
वार देखने और सोचने लगा--“ऋष्यमूक पर्वत पर जिन आभूषणो को मैने देखा था, उनमें 
और इनके जदीर पर दीखनेवाले आभूषणों में समानता दीखती है । अत, यह पद्मग्रधी, 
काकृत्स्थवणी राम की पत्नी ही होगी । इस प्रकार सोचकर वायु-नदन ने और एक वार 
सीता को ध्यानपूर्वक देखा और पाया कि उस रमणी के अग, कर्ण-भूषण, मणिमय ककंण 
तथा सुनहले वस्त्र, ठीक उसी प्रकार के थे, जैसे कि राम ने बताया था । उसके अतिखित 
उसने उस नारी-रत्न में विरहाूषव्यथा से पीडित होनेवाली स्त्रियों के लक्षण, पतिक्रता 
तारियो के झुभ चिक्त और निपुण मानव-स्त्रियो के सभी चिह्न देखे । साथ-ही-साथ उसने 
यह भी देखा कि वह साध्वी राम का नाम लेकर कुछ प्रलाप कर रही हैं । इन सव बातो 
पर कुछ समय तक विचार करने के पश्चात्‌ उसने निम्चय किया कि ये सीता ही है । 
फिर उनका विवर्ण मुख, कु गात्र, विखरे हुए कंश, उनकी दुर्दशा, उनका विलाप तथा 
उनकी दीनता देखकर वह मन-ही-मन वहुत दु खी हुआ और विचार करने लगा--चद्र से 
विछुड़ी हुई चद्रिका की भाँति यह चद्गरमुखी रामचद्र से विलग होकर क्या रह सकती है” 
क्या इस रमणी से विछुडकर- राम रह सकते हे ? यह बडे ही आझ्चर्य की बात हैं कि 
इन दोनों के कुल, जील, दाक्षिण्य, गुण, वय, धर्म, तथा सुदर रूप एक समान है । अत 
राम के लिए यह रमणी तथा इस युवती के लिए रोजा राम सर्वथा उपयुक्त हैं । इस 
काता के लिए ही तो सूर्यकुलाबिप ने शिव का घनुष ईख की तरह तोड़ा था । जव ये 
पीडित हुई, तब वडी कठोरता के साथ उन्होनें उस कपटी कौए को दण्ड दिया था | जिसे 
विराघ ने पहले इनपर जाक्रमण किया था, उसका वध किया था | इन्ही के लिए उन्होने 
शूर्पफखा के नाक और कान कटवाये, खर और दृषण आदि राक्षसो का सहार किया, 
मारीच को मृत्यु के माह में मेजा, वालि को एक ही शर से मार डाला और कपियो को 
चारो दिज्ञाओं में भिजवा दिया | में उन कपियों में अपने को बड़ा बलवान्‌ समभ्रर्कर, 
उस पुण्यात्मा काकुत्स्थवशी राम के सामने यह कार्य-भार अपने ऊपर लेकर, अगद आदि 
वानरो के साथ में यहाँ आया । अपने पुण्य-फल के प्रताप से और अपनी इच्छा के अनुसार 
ही इस पुण्य सती को में यहाँ आकर देख सका । भयकर असुर-स्त्रियों के मध्य, यातनाओं 
में पडी हुई इस स्त्री-रत्त को में अपना रूप किस प्रकार दिखाऊँ ? किस प्रकार में इससे 
वार्तालाप करूँ ? इस पुण्य साध्वी को कैसे सात्वना दूँ ? किस प्रकार प्रभु को यहाँ की 
दमा सुनाऊँ ? ह 


७ सीता से रावण का प्रढाप 
हनुमान मत-ही-मन इस अकार की चिंताओ से व्याकुल होता रहा । वहाँ रावण जानकी 


छुन्‍्दरकाड सर 


के सबंध में सोचते-सोचते सतप्त हो उठा । वह बडे तडके ही उठा, तो उसका चित्त काम- 
देव के प्रभाव से उद्विग्स होने लगा | उसने सुन्दर ढग से दिव्य मालाएँ थारण की, घरीर 
पर दिव्य गध का लेप किया । दिव्य आभूषणों से अपने गरीर को सजाया । चारो दिय्याओो 
में अपनी शोभा को विकी्ण करनेवाला मुकुट मस्तक पर रखा और चद्धहास (ख़ड़ग) को 
भी साथ लेकर वह अज्योक-चन की ओर चल पडा । उसके पार्व्व-भाग में अप्सराएँ, अपने 
मणिथय ककणो को क्वणित करती हुई चामर डला रही थी, गधवं-युवतियाँ अपने घन- 
>>“ कुचो पर के हारो को चचल करती हुई पखे भूल रही थी, किन्नर-रमणियाँ छत्र पकडें 
हुए अपने कुच-मूलो की शोभा प्रकट कर रही थी, यक्षन्युवतियाँ अपनी बाहुओं तथा 
पाइ्व॑-भागों को प्रकट करती हुईं हस्त-वाहिकाओ के रूप में जा रही थी । दोनो ओर 
ग़रुड की स्त्रियाँ परिमल जल तथा मद्य के पात्र लिये हुए चल रही थी । भीड में कुचल 
न जायें, इस भय से नाग-कन्याएँ आगे-आगे जा रही थी । विद्याधरो की स्त्रियाँ वीणा 
आदि वाद्यों के साथ कर्णमधुर स्वर में गान कर रही थी । रावण के गुण तथा ओऔज्नत्य 
के अनुप्तार सिद्धो तथा साध्यो की रमणियाँ एकत्र होकर उसका गुणगान कर रही थी, खड्गपाणि 
राक्षस-स्त्रियाँ बडे उत्साह से उसके पीछे-पीछे चल रही थी । इस प्रकार परिजनों को साथ 
लेकर सहस्नो मण्ालों के प्रकाश में बादलों के पीछे चलनेवाली विद्युल्लता के समान मदो- 
दरी को साथ लिये हुए रावण चला। उसकी अत्य स्त्रियाँ भी उसको सेवा में लगी हुई, 
उसके पीछे-पीछे जाने लगी । उसके बलिष्ठ पदाघात से पृथ्वी काँपने लगी । भीड के परि- 
हास की ध्वनि से आकाश गूजने लगा । स्त्रियों की मेखलाओ, नूपुरो तथा मणिमय 
आभूषणों का कलनाद कर्णपुटों को मधुर लग रहा था। इस प्रकार, उनीदी दृष्टि 
से, कनक-केयूरो से अलकृत बाहुओ से, पृश्वी पर लोटनेवाले वस्त्रों से, अत्यधिक मुरभाये 
हुए वदन से तथा अत्यत भीपण आकार में रावण सीता के सामने आकर खडा हुआ । 
उसे देखते ही सीता दिग्श्रान्त-तली हो गई । अपने मन में उन्होंने रघुराम का स्मरण 
किया और अपनी जाँघें, उदर, कुच-दय, और सुदर हाथो को अपने वस्त्रो से अच्छी तरह 
ढक लिया ओर वाघ द्वारा देखी हुई हिरणी की भांति सिकुडकर बैठ गई । ऐसी साध्वी 
को देखकर अपने मद के प्रभाव में आकर रावण बोला--हे सुदरी, तुम अपनी क्षीण 
कटि को क्यों छिपा रही हो ? अपना सुदर मुख क्यो नोचे भुका रही हो ? है अबले, 
मन्मथ की पीडा से त्रस्त हुए मुझे तुम अपने कृपा-कटाक्ष से बचाओ । परस्त्रियो को वलातू 
अपने वश में कर लेना हमारी जाति के घर्म के अनुकूल हो है । फिर भी में केवल तुम्हारी 
कृपा-दृष्टि का आकाक्षी हूँ । मेरी बातें ध्यान से सुनो। इस हीन दशा में तुम वयो रहती हो ? 
कदाचित्‌ तुम सोचती हो कि राम अपने भाई के साथ भयकर वन को पार करके 
यहां आयगा और समुद्र पर पुल बॉवकर अपने अतुल पराक्रम से मुझे जीतकर, तुम्हें छुडा- 
कर ले जायगा । यह असभव हैं । इन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओं के लिए भी युद्ध में 
मुझपर विजय पाना असभव है । हे कमललोचनी, अब तुम इस परागलपन को छोडो। 
मेटी भुज-शक्ति के सामने मनुष्य की शक्ति हो क्‍या हैं ? अनाबों की भाँति पर्वतों तथा 
जुबलो में भटकते हुए, कष्ठ सहनेवाले एक झर्कि्ीन मानव का सहवास जो चाहती द्ों?- 


य्य्र्‌ रंगनाथ एयायण 


हैं सुददी, तुम मुझे अपनाकर राज्य-सुख क्यो नहीं भोगती ? चाहे इन्द्र हो, यम हो, 
वरुण हो या कुबेर हो; अग्नि, चैऋत, वायु या ईगान ही क्‍यों न हो, कोई भी मेरी लका 
को जीत नहीं सकता। क्या किसी मानव के लिए लका की ओर दृष्टि डालना भी सभव है ? 
अब राम कहाँ है ? वह यहाँ कैसे आयगा ? आकर लका में प्रवेश करेगा किस ढगसे ? 
प्रवेश करके भी विना भयकपित हुए मेरा सामना करेगा कैसे ? सामना करके भी मेरे 
साथ लडेंगा कैसे ? लड़ेगा भी, तो मेरी शक्ति को किस प्रकार सहन कर सकेगा ? 
सहन करेगा भी, तो कवतक कर सकेगा ? इसलिए, ये सब वातें असभव है । उन 
वातो को छोड दो । रावण इस प्रकार राम की निंदा करते हुए कर्णकटु शब्द 
कहता रहा । 


८ सीता का रावण की निंदा करना 


तव सीता ने अत्यत कुंद्ध होकर एक तिनका ऐसा तोड़ा, मानों वे इसकी घोषणा 
कर रही हो कि तुम अवश्य राम के हाथो से नाश को भ्राप्त होगे । फिर वे उस तृण 
को हाथ में लेकर उसे सवोधित करके कहने लगी--हे पापी, मेरे पति को धोखा देंकर 
तुम मुझे अपनी लंका नगरी में ले जाये हो । इसे बहुत बडा पराक्रम मानकर तुम क्यों गर्व 
कर रहे हो ? इसे महान्‌ कार्य समझकर क्यो प्रलाप कर रहे हो ? पराई स्त्रियों के साथ 
समागम चाहनेवालों का ऐश्वर्य नष्ट हो जाता है और उनकी आयु भी क्षीण होती है । 
यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो ओऔचित्य तथा धर्म का विचार करके मुझे राम के 
पास पहुँचा दो । इसके विपरीत यदि दुर्वृद्धि के वश्ष में पडकर तुम मुझे ग्रहण करना चाहोगे, 
तो कोदण्ड-दीक्षा-गुद्द राजा राम के हाथो से मारे जाओगे । यह निश्चित है । तुम अपने 
मन में यह मत समझो कि वे वनवास के कारण कृज-गात्र, दुर्वल, अनाथ, राज्यहीन, असहाय 
हो गये है और वे मनुज-मात्र हे । क्‍या उन्होने दडकवन में चौदह सहन भयकर राक्षसो 
को नही मारा ? दण्डधर के उद्ृण्ड दण्ड के प्रताप को मात करनेवाले तथा सूर्य-किरणो 
के भयकर गर्व को भी परास्त करनेवाले राम के असख्य रण-भीषण-बाण जिस दिन तुम्हारी 
लका में व्याप्त होगे, जिस दिन वे वाण तुम्हारे वक्ष स्थल में गर्डेगे, उसी दिन तुम अपनी 
तथा राम की जक्ति का अनुभव कर सकोगे । में अब उसके सबंध में क्‍यों कहूँ ? जैसे 
कुहरा सूर्य का सामना करने पर नष्ट हो जाता है, जैसे भेडा पहाड़ से टक्कर लेने से 
नष्ट हो जाता है, जैसे मच्छर मच गज का सामना करने से पिस जाता है, जैसे नाला 
समुद्र का सामना करके अपना अस्तित्व खो देता है, वैसे ही तुम भी यदि अपनी और 
उनकी जव्ति की तुलना किये विना हीं राजा राम के साथ भिड़ जाजओगे तो तुम भस्म 
हो जाओगे । भला, तुम क्या देखकर इठला रहे हो ? सूर्यवश के तिलक (राम) 
इस प्रकार तुम्हें इस पृथ्वी पर थोडे ही रहने देंगे ?' 

इन बातो को सुनकर रावण अत्यत रोष से जानकी को देखकर बोला--मेने 
तपस्या से ब्रह्मा को प्रसन्न करके उनसे श्रेष्ठ शक्ति का वर प्राप्त किया है, इन्द्र से लेकर 
सभी देवताओं को परास्त किया हैं, शिवजी के साथ समस्त कैलास पर्वत को उठाया हैं, 
ब्रढ़ें साहस के साथ समी ऊब्बे लोको को जीता है, पाताल के निवासियों को परास्त किया है 


रुंणंद्रकाॉड २२३ 


और ससार में महान्‌ उन्नति प्राप्त की हैं । अपने पिताजी द्वारा निर्वासित एक मूर्ख, निरुपाय तथा 
तपस्वी का जीवन व्यतीत करनेवाला एक साधारण मानव क्‍या मेरे-जैसे ध्यवित के सामने 
टिक सकता हैं ?! 

इस प्रकार जब रावण राम की निंदा करने लगा, तव सीता उमडते हुए क्षेम से, 
व्याकुल एवं दुखी होकर, गदुगद कठ से विलाप करने लगी। जानकी का दु ख देखकर देव तथा 
गधवं-स्त्रियो का भी धैर्य जाता रहा और वे भी रोने लगी। रावण का घमद तथा 
सीता का दुख देख अनिलकुमार हनुमान्‌ क्रोधारित में सतप्त होते लगा और तुरत 
मन-ही-मन उस दुप्ट राक्षस पर भपटने का विचार करने लगा । उसने सोचा--यदि 
में इसका वध करन में समर्थ होऊँ तो में अपने प्रभु को भूमिसुता (सीता ) का 
कुशल-समाचार सुना सकता हूँ । किन्तु यदि में अपनी समस्त शक्ति खोकर, युद्ध में, 
देवताओ कं शत्रु (रावण) के हाथो मारा जाऊँ, तो राम को किस प्रकार लका का पता 
लगेगा ? लका का पता न जानने से वे स्त्री के वियोग में अत्यधिक पीडित होगे, लका 
में सीता को उपस्थिति तथा मेरी मृत्यु, इन दोनो का समाचार वे जान नही पायेंगे, तो वे 
निदान अपने प्राण-त्याग कर देंगे । मेरे सारे किये-कराये पर पानी फिर जायगा । साथ-ही- 
साथ इससे मेरे प्रभु के कार्य की हानि ही होगी । इसलिए ऐसा कार्य मुझ अव नहीं करना 
चाहिए ।' यो सोचकर घैय॑ के साथ हनुमान्‌ उसी पेड पर बैठा रहा । रावण ने काम, 
क्रोध, भय तथा बृढता के साथ जो बातें कही, उनसे भयभीत न होकर सीता ने सव स्त्रियों 
के सामने ही अत्यत कठोर वचनो से रावण की निंदा की । उनकी वातें सुनकर दनुजेश्वर 
दुष्ट भावनाओं से अभिभूत-सा हो गया । उसकी भूकुठियाँ कुटिल हो गई, उसके चचल 
नेत्र रक्तवर्ण के हो गये । प्रज्वलित, चचल एवं भयकर प्रलयकालोन लोक-सहारक अग्नि 
की भाँति वह क्रोध से भभक उठा । उसने भयकर हुकार किया और क्रूर तथा नीति-रहित 
हो साध्वी सीता को त्रास देने के लिए सन्नद्ध हो गया । 


९. मन्दोदरी का रावण को उपदेश 


90७... 


तब धन्यात्मा मदोदरी रावण के पास पहुंचकर बोली--हे नाथ, ऐसा अन्यायपूर्ण 
कार्य आप क्यो करते हे ? सीता अबला है, मानिनी है, मानव की स्त्री है, इसके ऊपर 
मोहित होकर ऐसा क्रोध क्यो करते हे ? हमारे अत पुर में जो सुदरियाँ है, उनमें से यह 
किसकी वबरावरी कर सकती हैं ? आप मेरे साथ सुख भोगिए। आपका यह कार्य आप- 
जैसे व्यकित के लिए नीतिसगत नही है ।' 

मदोदरी की बातें सुनकर रावण लज्जित तथा क्षुब्ध हो गया । फिर भी उसने 
सीता के निकट रहनेवाली दीघंकाया, भयकर आक्रतिवाली, निप्ठुर वचन कहनेवाली, सतत झगड़ा 
करनेवाली, ऋर स्वभाववाली और विक्ृत गरीरवाली भयकर हयास्या, हरिजटा, त्रिजटा तथा 
महोदरी नामक राक्षसियों को बुलाया और उनसे निर्लेज्ज होकर कहा--दो महीनों के भीतर 
तुम इसे प्रिय वचनो से, या धमकियो से, या भयभीत करके अयवा त्रास देकर ऐसा वनामो कि 
यह मेरी बात मान ले । यदि यह न माने, तो तुम सब इसका बघ करके शीतिपूर्वक इसका 
मास खा लेना ।” यह कहकर वह राक्षसराज अद्योक-वन से अपने अतपुर को चला गया । 


सर रंगनाथ एम्परयर 
१० राक्षसियों का सीता को दुःख देना 


इसके परचात्‌ दानव-स्त्रियाँ अपनी चिकनी-चुपड़ी वातों से जानकी को समझाने 
लगी--हे सीते, तुम रावण को अपना लो ॥ एक राक्षसी हाथ में झूल लिये उन्हें घमकी 
देने लगी--राम इस लका की ओर ताक भी नहीं सकेगा, इसलिए तुम उसकी आभा 
छोड़ दो । एक नीचवुद्धिवाली कहने लगी - इस प्रकार क्यो कप्ट भोय रही हो ? 
दानवेब्वर को वर लो, अन्यथा में तुम्हारा वव कर डालूगी । एक राक्षसी बीच 
रोककर बोली--लड्ग लाओे, हम अभी इसका सिर काट डार्लें और इसका मास मु 
ड्वोंकर च्खें।” उसका समर्थन करती हुई एक दूसरी राक्षसी ने कहा--ठीक है, बही करो। 

इस प्रकार बमकी देनेंवाली राक्षसियों को देखकर मूमिसुता, कुमुदनयनी सीता 
मन-हीन्‍नमन क्रोधित एवं दुर्खी हुई और आँसू वहाती हुई गदगद कठ से वमकानेवाली उन 
स्त्रियों क्ो देखकर वोली---क्या दावव और मानव में कही दावपत्य निभ सकता हूँ, तुम 
सव मिलकर ऐसे जपचव्द कह रही हों, क्‍या वह तुम्हारे लिए उचित है ? जैसे चद्रिका, 
चंद्र से -विछुड़कर नहीं रह सकती, डैसे प्रभा सूर्य से विछुडकर नहीं रह सकती, वैसे ही 
में राम से विछुडकर नहीं रह सकती । मेर प्रभु भले ही दीन रहें, राज्यहीन रहें तो भी 
वे मेरे इप्ट देवता हे | में भी जलधि (लक्ष्मी) के समान, पार्वती के समान, वाणी के 
के समान, पौलोमी के समान, साविन्नी के समान तथा रति के समान पतित्रता की निष्ठा 
से अपने पति राम की ही बाराघना कहूँगी । तुम चाहो, तो मेरा वध कर डालो, तेज 
खड्ग से मेरा सिर काटना चाहो, तो काट दो । में केवल राम के सिवा और किसी को 
स्वीकार नहीं कर सकती । में श्रम में डालनेवाली तुम्हारी बातो में कभी नहीं आऊंगी । 
बव तुम इन वातो को छोड़ दो ॥ 

सीता की वातें सुनकर सभी राक्षसियाँ क्रोव से भभक उठी और मदमत्त हो सीता 
को विविध भ्रकार से पीड़ा देने लगी | तब सीता घूलि-बूसरित हो पृथ्वी पर लोट गई 
और उनकी काली नागिन की-सी वेणी विखर अई । वह उत्तम स्त्री पृथ्वी पर पडी हुई, 
उसासे भरने लगी । वे ऊँचे स्वर में वार-वार, हाय लक्ष्मण', 'हाय राम, हाय माता 
कौसल्था', कहकर रोने लगी । 


में 
में 


११. त्रिजठा का स्वप्न 

व्रिजटा सीता का संताप न देख सकें के कारण वहाँ से उठकर चली गई और 
किसी एक्त स्थान में जाकर सो गईं | सोते-सोते एक स्वप्न देखकर वह जाग पड़ी । 
उसने सभी राक्षस-स्त्रियों को देखकर कहा--हे नारियो, मेने एक स्वप्न देखा हैं, उसे 
में तुम लोगो को सुनाऊंगी; ध्यान से सुनो । मेने स्वप्न में देखा कि राम एक हाथी पर 
चढकर आ रहे है, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मण, उनके सेवक के रूप में आ रहे हैँ । फिर मेने 
देखा कि वह पृथ्वीपति इस कोमलागी को उस गज पर बैठाकर ले जा रहे हे । फिर 
मेने देखा कि रामचंद्र का राजतिलक हो रहा है और ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा 
कर रहें हे | इतना ही नहीं, मेने यह भी देखा कि रावण सुदर पुष्पक विमान से चकराकर 
पृथ्वी पर गिर गये हें | तव नीलावर घारण किये हुई एक युवती एक भयकर खड्ग लेकर 


में 
के 


रैन्दुरकॉड २२५ 


गिरे हुए रावण के निकट पहुँची और उसने उनके सिर काट डाले हूँ । फिर उसेने बड़े 
बडे गधे जुते हुए रथ में उन्हें रव दिया और उस रथ को दक्षिण दिशा की ओर ले गई। 
उसके पद्चात्‌ मैने देखा कि कुभकर्ण एक ऊंट पर चढकर दक्षिण की ओर जा रहा है । 
सुदर ढग से विलसित होनेवाले अपने तोरणो के साथ, लका समुद्र में डूब गई हैँ । सभी 
राक्षस तैल-धाराओ में डूबे हुए पडे हे । विभीषण घवल छत्र धारण करके एक हाथी पर 


|. 


विनय से बैठा हुआ हैँ । इसलिए हे दानवियो, अब रावण का मरण, और रघुराम को विजय 
निश्चित ही समभो । अत , तुम इस भूमिसुता को न अपशब्द कहो, न उन्हें सताओ ही । 
तुम सब अब यहाँ से हट जाओ ।” उसकी वातें सुनकर सभी दानवियाँ वहाँ से हट गईं 


और थकी रहने कारण जाकर सो गईं । 


उस समय सीता भय तथा दुख से काँपती हुई, दो मास में उन्हें मार डालने की जो 
आज्ञा रावण ने दी थी, उसके वार-बार स्मरण से ही भयभीत हो उठी | वे अद्योक-वृक्ष की 
शाखा के सहारे उठकर खडी हुई, और अपनी चचलता के कारण वन में मार्ग खोई हुई 
वालिका के समान विलाप करने लगी । वे कहने लगी--हाय भगवान्‌, करता के साथ 
यहाँ बदी बनाकर मुझे इस प्रकार दुखी बनाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है” क्‍या ब्रह्मा ने 
मेरे भाग्य में यही लिखा है कि मे इस पापी दैत्य के हाथो मरूँ ? ऐसा न होता, तो 
राम दण्डक वन में क्यो आते ? स्वर्ण-मृग मुर्भे भ्रम में क्यो डालता ? यह रावण मुझे बदी 
वनाकर दुख ही क्यो देता ? किन्तु में अपने वारे में क्यों सोच” ? चद्र के समान मुस- 
वाले, लोक-रक्षण-कार्य में तत्पर रहनेवाले, मेरे प्रभु रामचद्र न जाने धोर वन में सौमित्र 
के साथ किस प्रकार दु खसे पीडित होते होगे और कैसी दुरवस्था भोग रहे होगे ? पता 
नही, उनकी क्‍या दशा होगी ? न जाने, वें शूर यहाँ कब आयेंगे, कब इस नीच राक्षस 
का गव॑ चूर करेंगे, और कब मुझे अपने साथ ले जायेंगे । ये सब कार्य कब सिद्ध होगे ? 
और कंसे सिद्ध होगे ? इस दुरात्मा के हाथो मरने से स्वय मर जाना में अच्छा समभनी हूं , 
किन्तु मुझ पर दया करके विष लाकर देनेवाला भी यहाँ कोई नही है । हैं राम, 
है धर्म-निरत, मेरा पातिन्नत्य आज खिन्न हो गया है | में अब आत्मघात कर लूगी ।' 
इस प्रकार कहती हुई वे अपने कंशो को कठ में बाँधकर अपने प्राण देने का उपक्रम करने 
लगी । इतने में उनका वाम-नेन्न मछलियों के स्पर्श से हिलनेवालें कमलो के समान फडकने 
लगा । मलयानिल से चचल होनेवालोी वन-लता के समान उनकी वाम भुजा फडक उठी । 
मत्त गज की सूंड की भाँति उस रमणी की वाई जाँघ भी फडक गई । भयकर राहु 
से मुक्त कुमुद-बधू्‌ (चद्र) के समान उनका मुखचद्र दीप्त हो उठा । जब इस प्रकार 
शुभ शकुन दीखने लगे, तव गजगामिनी सीता ने अपने दुसाहसपूर्ण निश्चय का त्याग कर 
दिया । वे रामचद्र का, उनके भाइयों का, तथा अपनी सासों का स्मरण करने लगी । 
राक्षसों के द्वारा दिये गये कप्टो से बहुत ही क्लान्त होकर वे अपनी दयनीय स्थिति का 
विचार करके दुखी होने लगी । 


१२. हनुमान्‌ का सीता को राघवों का वृत्तांत सुनाना 
हनुमान्‌ ने सोचा कि इस साध्वी का दुख शात करने का यही अच्छा अवनर हू । 
२६ 


326 रंगनाथ रार्याचफक 


"९ 
यों सोचकर वह वुक्ष पर वैठेन्चठे ही रविकुल की रीति तथा राम के पौरुष की भूरि-भूरि 
प्रणसा करने लगा । उसके पब्चात्‌, यह सोचकर कि यह साध्वी वानरों की भापा तथा 
गीर्वाग (सस्कृत्)-वापा क्द्ाचित्‌ जानती व हो, उसने मानवों की भाषा में उनको सवोधित 
करके क्ह्ा--हे भूमिसुते, हे पुण्यसताध्वी, इस प्रकार आप दुख क्यों कर रही है ? आपके 
प्रभु सकुझल है। जबदीब्वर, राजा राम नमुद्र पार करेंगे और रावण का संहार करके अपने 
साथ आपको ले जायेंगे | यह सत्व है | अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अपनी महान्‌ महिमा 
प्रकट करते हुए रामचंद्र माल्यवत में रहते हैँ और अनेक वानस्चेताएँ उनकी सेवा 
में लगी है । 

इस बचनों को सुनकर सीता ने सोचा कि यह कोई बाकाजवाणी है । उन्होने 
ठुस्‍्त्त अचोक-बुक्ष की ओर सिर उठाकर देखा । तब उन्होने सुन्दर नील मेघो के भीतर 
दीखनेवाले वालचंद्र के समान तथा विद्युत्‌ के समाच, उस वृक्ष की शाखाओं के मध्य, 
लघुरूप धारण क्तय्रे बैठे एक वानर को देंखा । तुरंत वे दु.खी होकर कहने लगी--हाव 
मेने स्वप्त में एक वदर को देखा है । भगवान्‌ करें कि इस स्वप्त का अशुभ फल काकुत्स्थ- 
वंशजों को न मिलें । फिर, उन्होने इन्द्र आदि समी देवताजो, वृहस्पति, जग्नि तथा सभी 
लोक-पालको की वड़ी भक्तिति से प्रायंना की । ः 

इसके वाद वें सोचने लगी--हम जिसके सर्वध में वास्व्रार सोचते रहते है, या- 
जिसके वियय में प्रायः सुनते रहते हे, वे ही स्वप्त में हमें दिखाई ठेतें है । में अपने मन 
में राघव के सिवा और किसी वियय के सवंध में सोचती ही नहीं हूँ । पुण्यात्मा मेरे 
प्रिय प्रभु, सूर्वदंजज, विमल चरित्रवान्‌ राम से विछुड़कर विर्हान्नि में तप्त रहने तथा 
भयकर राक्षसियो के हारा प्राप्त दुःखो से पीड़ित होने के कारण में दिन-रात निद्रा से 
वंचित रहती हूँ ! किन्तु विना निद्रा के यह स्वप्न कैसे हुआ ? में और एक वार ध्यान से 

अशोक्ब-वृक्ष की बोर देख 7 

इस प्रकार, विचार करके उन्होंने अपने मुख-क्मल को धीरे से ऊपर उठाया और 
वास्वार हंनुमान्‌ क्रो देखा | फिर सोचने लगी---यह कैसे आइचर्य की बात है कि कोई 
वंदर इस वृक्ष पर कही से आकर बैठा है । मानव के समाव सुदर ढग से इसने मेरें 
पतिदेंव का कुझल-समाचार सुनावा है और वास्यार प्रिय वचन बोल रहा हैं । भला, 
कही वानरों में ऐसी वातें संमव है । कई प्रकार से विचार करने पर ऐसा लग्रता है कि 
यह क्छाचित्‌ राक्षस की माया ही हैं। ऐसा सोचकर वे प्रत्वृत्तर दिये विना चुप रहीं। 


१३ हनुमान्‌ का सीता को राम की अँगूठी देना 
तव पवनकुमार समक्त गया कि सीता मेरा विश्वास नहीं कर रही हे । इसलिए 
वह पेड़ से उतर काबा और बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर 
कहने लगा--है कल्याणी, आप मेरा विब्वास कीजिए । में जआापकों आपके पति से मिलाने 
के लिए आया हुआ सेवक हूं | आपको मूक पर विश्वास हो जाब, इसी उद्देब्य से राम ने 
यह बेंगूठी देकर मुझे भेजा है ।! इतना कहकर हनूमान्‌ ने राम की जेंगूठी उन्हें दिखाकर 
प्रणाम क्या । तव सीता ह॒नुमान्‌ को देखकर वोली---हे अनघ, निश्माचरों की मायाओं से 


7०॥५ 


उनन्‍्दुश्कोंड स्र्ः 


सदा सतप्त रहने के कारण रघ्राम की अेंगूठो देखकर भी मुझे विश्वास नही हो रहा हैँ 
तुम कौन हो ? मसूर्बकुलाधिष का रूप कैसा हैं ? उनके अनुज सीमित्र का रूप 
कैसा है ? मेरे प्रभु अब कहाँ रहते है ? उन्होने तुम्हें कौन-सा संदेश सुनाने के लिए 
भेजा हैँ ? तुम किस प्रकार समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम इन सब वातो का उत्तर दो, 
ताकि मुझे विश्वास हो जाय ।' 


9०. यु 


तव हनूमान्‌ सीता से इस प्रकार कहने लगा--है देवी, वायुदेव के वर-प्रसाद से 
केसरी नामक एक कपि-श्रेप्ठ तथा अजना देवी के पुत्र के रूप में मेरा जन्म हुआ । मेरा 
नाम हनुमान्‌ है । इस पृथ्वी पर सुग्रीव नामक वानर-राजा का मे विश्वस्त मत्री हूं 
उनके भाई वालि ने उनके राज्य तथा पत्नी को उनसे छोन लिया था । तब से वे अपने 
चार मत्रियो के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे। दशकठ जब कपट रूप से आपको लिये 
जा रहा था, तव मैने आपका विलाप सुना और सिर उठाकर आपकी ओर देखते रहें । 
आपने भी हमें देखा और एक बस्त्र में वाघकर अपने कुछ आभूषण पृथ्वी पर गिरा दिये । 
उन आभूषणों को सुग्रीव ने सुरक्षित रखा। उसके पश्चात्‌ रघुराम आपका अन्वेषण करत हुए 
अपने भाई के साथ पपाा सरोवर के तट पर पहुँचे । उनको वहाँ देखकर सूर्ब-पुत्र ने 
उत्तका समाचार जानने के लिए मुझे भेजा । मेने जाकर उनकी सभी वातें जान लो और 
सुग्रीव की राम से भेंट करा दी | तब सूमे-पुत्र ने राम को वडो भक्ति से आपके आभूषण 
दिखाये । उन्हें देख राम बहुत प्रसन्न हुए । उसके पश्चात्‌ उन्होंने सुग्रीव के शत्रु वालि का 
सहार किया, और उपकार के भार से दबे सुग्रीव को कपियों का राजा अभिषिक्‍त किया । 
सुग्रीोव राम को अपना प्रभु मानतें हुए बडी भक्ति के साथ एक सेवक की भाँति रहने लगे। 
उन्होने अनुपम वली दो लाख वानरो की सेना एकत्रित की और उनसे कहा--तुम लोग 
जाकर सीताजी का पता लगाकर आओो और साथ-साथ घमटडी राक्षसों के सैन्य-वल का भी 
पता लगाकर एक महोने के भीतर लोट आओ ।॥' उनका आदेश मानकर सभी कपि सब 
दिशाओ में निकल पड़े । आपका अन्वेषण करने के लिए अगद आदि कुछ लोग दक्षिण 
दिशा में आये । हमने बहुत देशो में आपको दूढा, पर कही आपका पता नहीं चला । 
तब हम अभत्यत दुखी हुए । उस समय अरुण-पुत्र सपाति ने हमें लकापुरी का मार्ग बताया। 
आपके दर्शनार्थ मेने अपने पराक्रम रे समुद्र को पार किया और आज सूर्यास्त के समय दूसरों 
की आँखें वचाकर इस नगर में प्रवेश किया । मेने अपना विशाल रूप छोटकर लघु रूप 
धारण करके सब स्थानों में आपको ढूढा; पर कही भी आपको में देख न सका । निदान 
में यहाँ आ पहुँचा, जहाँ आपके दर्शन हुए । फिर भी, मुझे संदेह था कि आप रविकुतापरिप 
की पत्नी हें या नहीं । किन्तु जगदीश राम ने आपकी जो आक्ृति मुझे बतलाई थी, वह 
आपसे मिलती-जुलती हूँ, इसलिए मेरा सदेह दूर हो गया । अभी-अभी जब रावण यहाँ 
आकर आपसे वार्त्तालाप कर रहा था, तव में यही था । मेने यह भी सोचा कि में अपनी 
अपार शक्ति से उससे युद्ध करूँ और उसका वध कर डालू । उिन्तु, मेने यही उचित 
समका कि पहले आपमे भेंट कर लू", और आपके प्राणनाथ का छुघल-समाचार आपको 
सुना दू' । उसके बाद रावण से भिद्ु”। मुझे अपने प्राणों का मोह तिल-भर भी नहीं हैं। 


|! 


रे नन्‍> 


स्स्ट रंगनाथ राय 


इतना कहने के पच्चात्‌ हनुमान्‌ ने राम का कंद, उनकी अवस्था, उनकी आँखों का 
सौंदर्य, क्ठ का मावुर्य, मठ हँसी से युक्त मुख की घोभा, नखो की आक्लति, उन्नत स्कछो 
की सूदरता, कसी हुई कमर की मनोज्नता, विध्ाल वल्र की झोमा, कानो का रंग, चलने का 
डय, नाभि की सुघडता, जाँयो की विद्यालता, करो की लालिमा आदि घरीरके सभी लक्षणों 
क्य वर्णन किया ॥ तत्पब्चात्‌ उसने उनके थांर्य, थे, क़ह्मचर्य, उनकी शक्ति दाति, सबम 
बौर क्षाति (क्षमा) उनकी जक्ति, युक्तित, और पितृ-मक्ति तथा उनके ज्ील और वर्त्ताव 
आदि का वर्णन कया । फिर उस पुण्यात्मा ने लक्ष्मण के रूप का भी वर्णन क्या और 
तब राम की अँगूठी सीता कोदी । 

सीता ने बेंगूठी लो जौर उसे दज़कर ऐसी आख्यस्त हुई, मानों उनके खोरे हुए 
प्राण लीट आपे हो । दाम के दर्शनों से भी अडिक उस अंगूठी को देखकर वह रमणी 
आनंदित हुई । उन्होनें उसे बपने वल से ऐसे लगाया, मावो उसे अपने हृदब-ढूपी सिंहासन 


का [० 5 -अीकक ७ नही हए. 


पर विठा रही हों; उनकी आँखों से आनंद के अश्वु ऐसे बहनें लगे, मानो 


ह रू वें उस अंगूठी 
को वच्य-मातच्य आदिदे रही हो । वे पुलकित गात्र से उसे देखकर ऐसी मच्छित हो गई, मानों 
बूप-दोपष जादि दिखने के पच्चात्‌ वे उसके (उस जँगूठो के) सामने साप्टाय प्रणाम कर रही हो । 


कुछ समय के पच्चात्‌ वें सेनल गई और हनुमान्‌ को देखकर कहने लगी-- 
हैं कविकुलोत्तम, हे राम-कार्य-तत्वर, हैं उपकार-निरत, हें लोकोन्नत-चरित्रवान्‌ू, हे पवनकुमार, 
तुनने मुक्के प्राण-दान किया हैँ । से तुम्हारा प्रत्यपकार कर नहीं सकती । काक्ुत्स्थतिलक 
की कृपा से तुम कल्मात तक जीवित रहो । इस प्रकार आजीर्वाद देनेवाली जानकी को 
देखकर, महान्‌ पराक्रमी जयुपुत्र ने हाथ जोडकर कहा--हे देवी, मेनें आपकी वह हपा 
प्राप्त की है, जो ब्रह्मा, घिद तवा इच्ध आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैँ । मेने आपके 
दर्गन भी कर लिये । मेरे लिए यही क्‍या कम है ?* 

तव सीता अपने प्राणताव तया देवर का कुअल-समाचार पूछलत्नी हुई बोली-- 
है बनघ, अनुपम वलघाली रघुराम मुझसे विछुब्कर क्या वेर्य के साथ रह रहे हे? व तथा 
उनके अनुज क्या कभी मेरा स्मरण करते हे ? क्या वे युद्ध करने के लिए गीघ्र यहाँ 
बानेवाने है ? तव हनुमान्‌ ने कहा-- हि माता, अपने प्राणनाथ का वृत्तात सुविए । जिस 
दिन में वें आपसे जुदा हुए हूं वे सतत वेदना से पीडित रहते है, घरती पर सोते हैं, 
निद्रा को तो वे जानते ही नहीं । मासाहार नी उन्होनें छोड दिया है | वे सदा दण्डक- 
वन में आपके खो दाने की वात सोचते रहते हे । मिर किंचित्‌ भुक्ा लेते हे, लंबी साँस 
ज्ीचते हे, जाँखों में आँसू भर लेते हे, मूच्छित हो जाते है, घरती पर गिर पडते हे और 
चेतना लौटते ही उठकर चारो ओर चून्य दृष्टियों से देखने लगतें हें और व्यथा से पीडित 


१वछ) 


ए्‌ 
तथा व्याकुल होते है । कमी-करमी हाय सोता ! हाथ सीता ! कहकर पुकारतें है । सुमित्रा- 
नंदत जब उनकी यह दणा देखते हे, तव वे भी दु.खी हो जाते हे। जब वे दोनो आपके 
यहाँ रहने का समाचार चुनेगे, तठ तुरत वहाँ से तरल प्रड़ंगे | वे मुझसे नी श्रेष्ठ, भर्यंकर 
नाकायवाले; अनेद्य पराक्रमवाले: नग, मख्ूग, तद, नख तथा दाँतो को आयुर्धों के रूप में 


प्रयोग करनेवाले; सुत्रोव, नल, अगद आदि भरयंक्तर वोौरो को साथ लेकर, समुद्र को लाॉधकर 


सन्‍्दरकोंड र्र्९ 


किसी भी प्रकार यहाँ आयेंगे और आपको साथ लेकर अयोध्या जायेंगे । रावण रामके 
द्वारा युद्ध में मारा जायगा। आपकी इच्छा पूर्ण होगी । पर हे माता, इतना बिलव क्‍यों ? 
चलिए, स्वयं आपको अपनी पीठ पर लेकर, बडे यत्न से समुद्र को लॉबकर प्रात काल होते- 
होते प्रभु के पास पहुँच जाऊंँगा ।॥” 

वायु-पुत्र के सदुगुणों से प्रसन्न होकर सीता बोली---हे पवनसुत, तुम अवश्य ही 
इस प्रकार करने की क्षमता रखते हो । सचमुच तुम्हारी शक्ति वैसी ही है । किन्तु, 
है अनघ, विवाह के दिन से अबतक लोकृप्रभु, रामचद्र के सिवा अन्य पुरुष का स्पर्नण 
स्वप्न में भी मेने नहीं किया । यह नोच रावण मुझे यहाँ उठा लाया है, उसके स्पर्ण का 
दुख ही मुझे सतत सालता रहता हैं । उसने दुस्साहस को साथ बलात्‌ मेरा स्पर्ण किया । 
में अन्य किसी पुरुषों के स्पर्श की कल्पना भी नहीं करती । तुम मेरे प्रणनाथ के विश्वास- 
पात्र अनुचर हो । फिर भी, में तुम्हारी पीठ पर बैठकर चलना नहीं चाहती । लोग कहेंगे 
कि राम की पत्नी को धोखें से देत्थ उठा ले गया था और राम भी उसी प्रकार उसे 
वापस ले आये, इप्तलिए यह उचित नहीं हैं। पहले एक वार चित्रकूट में रहते समय राम 
मेरी गोद में सिर रखकर सो रहे थे । उस समय आरे के जैसे तीक्षण नखोवाला एक कौआ 
वहाँ आया और अवसर देखकर मेरे कुच के मध्य में चोच मारी । जब (मेरे शरीर से) 
रक्‍त प्रवाहित होने लगा, तव सूर्यवश-तिलक की निद्रा खुल गई । उन्होने कोए पर एक 
बाण चला दिया । वह बाण ब्रह्मास्त्र बनकर बडी भयकर जवित के साथ उस कोए का 
पीछा करने लगा । तब वह कौओआ दुहाई देते हुए सारे ससार में चक्‍कर काटने लगा । 
किन्तु कही, कोई भी उसे शरण देनेवाला नहीं मिला । तव वह फिर रामचद्र की शरण 


में आया, त्तो शरणागतवत्सल होने के कारण उन्होंने उसे शरण दी और उसकी एक आँख 
अपने चलाये अस्त्र के लिए दिला दी । उस सूर्यवजश्-तिलक ने मेरे लिए यह सब किया ॥” 


१४, सीता का संदेह 

“हे पवनकुमार, मेरा प्राणनाथ को स्मरण दिलाना कि उस दिन का वह प्रेम 
और उस दिन का वह अस्त्र, वे क्‍यों भूल गये हैं ” आज पति से बिछुडकर दस सहस्र 
प्रकार के कष्टों का सहन करते हुए मुझे दस महीने व्यतीत हो गये है । तुमने मेरी दशा 
देखी, मेरे कष्ट देखे । किसी भी प्रकार अब ये सहे नहीं जाति । कभी कम न होनें- 
वाले दुखो को सहते हुए एक दिन वितावा मेरे लिए एक समुद्र को पार करने के सनातन हैँ । 
तुम मेरे प्राणनाथ से ऐसी नम्रता के साथ मेरी ओर से यह निवेदन करना कि उनके मन 
में मेरे प्रति दया उत्पन्न हो । तुम उनसे कहना कि मेरे पिता जनक ने यह विश्वास 
करके कि आप (राम) अपने वचन का भग नही करेंगे, मूझे उनके हाथो में सौपा था । 
अब मेरा हाथ छोडना उनके लिए उचित नही हैं। विवाह की वेदी पर, अग्निनदेवता को 
साक्षी बनाकर सदा मेरी रक्षा करने का वचन देकर वे मुझे ले आये । किन्तु, अब मेरी 
उपेक्षा करके उन्होने मुझे असहाय वना दिया हैँ । अपनी स्त्री को दूसरे के हाथ में सोकर 
चुप बैठे रहना पौरुष नहीं कहलाता । इससे उनकी कीत्ति में कलक लगेगा । इसफा मुझे 
बड़ा दु.ख हैं | मेरे मन और प्राण उन्ही पर केन्द्रित हैँ । 


घ्‌३० रंगनाथ एयायण 


ह. 


हे हनुमान, तुम सौमित्र से मेरी ओर से ये वातें कहना--तुम मुझे अपनी माता 
के समान मानते थे । अब मुझको इस प्रकार भूल जाना और मेरी दज्मा का विचार नहीं 
करना क्या तुम्हारे लिए उचित हैं ? मेने तुम्हारे जैसे पुण्यात्मा को दण्डक वन में अपबद्द 
कहे थे, उसका फल में अब भगत रही हैं । जब विलव मत करो; दया दिखाओ ॥ हें 
पवनकुमार, तुम अगद, रविपुत्र तथा अन्य वानरनायकों से अवसर के अनुकूल मेरे 
विनीत वचन कहता, बौर किसी भी प्रकार उन्हें रामचद्र तथा लक्ष्मण के साथ वहाँ ले 
आना । में बडे साहस के साथ एक मास तक तुम्हारे, आगमन की प्रतीक्षा करूँगी । उसके 
पच्चात्‌ में जीवित नहीं <ह सकूगी । इस अवधि के भीतर तुम अवश्य रघुराम को किसी 
भी शकार से यहाँ ले आना । अब तुम जीघ्र यहाँ से जाओ ॥” 

सीता के इत वचनों को सुनकर हनुमान्‌ विनम्र होकर वोले--हे माता, ऐसा ही 
होगा । में आपकी सभी वातें उनसे कह दूंगा । अब आप आइवस्त हो जाँय । हें देवी, 
मेने आपको रघुराम की अँगूठो ला दी थी । अब में रिक्त हाथो यहाँ से जाऊं, यह दूत 
के लिए उचित नहीं हैं । अत , आप अपने चिह्न के स्वरूप में कोई रत्त दीजिए ॥ तब 
सीता वोलीं--तुम देखने में इतने छोटे हो, तव इस विज्ञाल समुद्र को किस प्रकार 
पार कर सकोगे ? महान्‌ वल तथा पराक्रम से पूर्ण अपना सच्चा रूप तुम मुझे दिल्ाओं। 
तुम्हारा निज रूप देखे विना में तुम्हें अपनी चूडामणि नहीं दूगो ।॥/ 

तव हनुमान्‌ ने अपना रूप इतना ऊँचा बनाया कि सारा आकाश उनके शरीर पर 
व्याप्त हों गया । चमकनेवाले नक्षत्रों का समूह पहले उनके कठ का मालती-मल्लिका का 
हार वना, फिर वक्षस्थल पर जोभित होनेवाले रजत का हार वना और उसके पश्चात्‌ 
उसके कटि-प्रदेश को अलकृत करनेवाली चाँदी की छुद्र घटिकाओं की मेंखला वन गया । 
ऐसा अत्यत भयकर रूप धारण करके जब हनुमान्‌ सीताजी के समक्ष खड़ा हुआ, तब वे मत 
ही मन भयभीत हो गई और कहने लगी--हे अनुपम गात्रवालें, हें अजनासुत, तुम्हारा 
यह रूप आव्चयंजनक हैं | शीघ्र ही इस रूप का उपसंहार करो । यो कहकर उन्होने 
हनुमात्‌ की प्रणसा की और उसे आजीर्वाद दिया । उसका विश्व-हूप देखकर देवता भी 
उसकी प्रशसा करने लगे । फिर पवनपुत्र ने विष्णु के समान, उस विद्याल आकार को 
छोड़कर लवु रूप घारण कर लिया । तव सीता नें बड़े स्नेह से हनुमात्‌ को अपने निकट 
बुलाया, अपनी साड़ी के छोर में बेबी हुई चूडामणि निकाली और बड़ी प्रीति से उसे 
हनुमान्‌ के हाथों में रखा । हनुमान्‌ ने बड़ी भक्ति के साथ उसे ग्रहण किया और 
प्रणाम करके, उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से विदा हुआ । 


१४. अशोक-वन का ध्वंस 
हनुमान्‌ ने सोचा--में अब रावण को अपने आगमन का समाचार वताता हूँ । फिर, 
थोड़ी देर तक सोचने के पच्चात्‌ वतन का नाश करने के उद्देश्य से उसने शरीर वढाया 
और बपने उर से उत्पन्न ववडर (प्रचड वायु) के धककों से उस बन के वृक्षों को तोडकर 
इस प्रकार गिरा दिया, मानो वे (कपडे के) ताने-वाने हो । फिर, नित्य अलकृत उस अशोक- 
वन में रहनेवाली रमणीय अट्टालिकाओं को पृथ्वी प्र गिरा दिया; छीड़ा-गृहों को चूर-चूर 


_लधितन 


इईन्दृरकांड २३? 


कर दिया, वृक्ष की शाखाओं को तोड दिया, फूलों को भाड दिया और उनके सुगधित 
मकरद को विखेर दिया, नालो को नष्ट कर दिया, पुष्प-लताओं को तोड़ दिया, निकुजो 
को छिन्न-भिन्न कर दिया और तालाबों के जल को आलोडित करते हुए उसमें अच्छी तरह 
तेरने लगा । हनुमान्‌ के इस भयकर कृत्य के कारण पिक, बक, सारस, कौच, कलहस, शुक, 
शारिका, मयूर आदि सभी पक्षी आत्तंध्वनि करते हुए उडने लगे । तब वन के माली जाग 
पडे और हनुमान्‌ से युद्ध करने के लिए तैयार हुए । आकाश तथा दिगतो को अपने गर्जनों 
से गुजायमान करते हुए वे हाथ में अनुपम करवाल लेकर हनुमात्‌ पर भपटे । हनुमात्‌ 
अपने नाम, अपने आगमन-कारण तथा अपनी शक्ति का परिचय देकर वडी भयकर गति 
से एक-एक राक्षस का सहार करने लगा । इस प्रकार, अनिलकुमार ने प्रथम युद्ध का प्रारभ 
किया और अत्यधिक शक्ति से सपन्न आठ सहस्न घोर राक्षसों का सहज ही वध कर दिया 
तथा पृथ्वी पर शवों का ढेर लगा दिया । उसके पदचात्‌ जब हनुमान्‌ ने गर्जन किया, तब 
सीतां की रखवाली में नियुक्त राक्षसियाँ भी भयभीत हो गई । उनका घैर्य जाता रहा । 
वे भांगती हुई लोक-कटक रावण के पास गई और कहने लगी--हें देव, आज एक वानर 
बडे सोहस के साथ अशोक-वन में आया हैं | उसने कुछ समय तक वैदेही से बातचीत की। 
ओर उसके पर्चात्‌ वह सारे वन को उजाडने लगा । उसने उद्यान की रक्षा करनेवाले आठ 
सहन राक्षतों का वध कर दिया है । वह राघव का भेजा हुआ लगता है। अन्यथा, जिस 
वृक्ष के नीचे सीता बैठी हुई है, केवल उस वृक्ष को छोडकर सारें वत को उस्राड़ फेंकने 
का दूसरा कारण क्या हो सकता है ? उसके सवध में वेदेही' से हमने पूछा भी, किन्तु उन्होने 
अपनी अनभिन्ञता प्रकट करके सत्य को छिपा रखा । इसमें कोई सदेह नही है कि वह वानर 
राघव का दूत ही है । अब आप अवश्य अपनी शक्ति तथा पराक्रम से उसे पकड़कर दण्ड दीजिए।' 


१६. हनुमान्‌ का राक्षसों का वध करना 


इन बातो को सुनकर दानव३-लोक-प्रभु रावण आग-बबूला हो गया । उसकी दृष्टि 
भयकर हो गई । उंसकी आँखों से दीपशिखानसी, दीप्त लौ की भाँति अग्नि- 
ज्वाला निकलने लगी' । उसने तुरन्त अपने अस्सी हजार अत्यत पराक्रमी राक्षस-वीरो को 
भेजा | वे बड़े उत्साह से, अपना प्रताप दिखाते हुए धनुष, अस्त्र, झूल, मुदूगर, गदा, तलवार 
भादि आयुधो से युक्त हो, युद्ध के लिए सन्नद्ध हो, गर्जन करते हुए निकले । 

इतने में सू्यंदिय हुआ । पर्वताक।र हनुमान्‌ का उत्साह और भी वढ़ गया । वह 
मकर-तोरण पर चढ गया और चारो ओर से घेरकर आनेवाले तथा शस्त्रो के प्रहार से 
कष्ट पहुँचानेवाले राक्षस-वीरो को देखकर बडे दर्प के साथ बोला--हे राक्षसों, में महान्‌ 
शूर सुग्रीव का अनुचर हूँ । राम का दूत हूँ । रामचद्र का कुशल-समाचार, सीताजी से 
कहकर वापस जा रहा हें । मेरा नाम हनुमान्‌ है । में अत्यधिक बलवान हूँ । प्रशसनीय 
पराक्रम तथा चातुर्य के वैभव से सपन्न वीर हूँ । लकापुरी में रहनेवाले पुरुषों के लिए 
में काल बनकर आया हूँ । अब तुम लोग मुझे छेडकर वयो मरना चाहते हो ” 

इतना कहकर वह अपने रण-कौशल तथा जोर को प्रवट करते हुए सहनलो राक्षस- 
सैनिको को अपने भयकर लागूल में बॉधकर उन्हें तोरण के स्तभो से मारने लगा । 


सर राय रायायर। 


इस प्रकार, उसने एक भी राक्षस को जीवित लौटने नहीं दिया और युद्ध में आये हुए वीरो को 
निशेष कर दिया । उद्यान के रक्षक भयभीत होकर भागें-भागे रवण के निकट पहुँचे 
और कहते लगे--हे दनुजेश, अपना भीषण रुण-कौणल प्रदर्शित करते हुए उद्त वानर ने 
अपनी पूछ से अस्सी सहल राक्षस वीरो का नाश कर दिया और अब मकर-तोरण पर 
इठलाता हुआ बैठा है । 

रावण कालातक (शिव) की भांति क्रोव से अभिभूत हुआ और पिंगलाक्ष, दीर्घ- 
जिह्न, वक्रतास, अश्मवक्ष, तथा शत्रुओं के लिए भयकर रूपवाले वार्दूलमुख को वुलाकर 
कहा--तुम ज्ीघ्र जाकर उस वानर का वध करके आओ ।॥* रावण की आज्ञा सिर पर 
रखकर वे प्रवल सेना के साथ रवो पर बैठकर चल पडे और भयकर गर्जन करते हुए 
पवनपुत्र के निकट पहुँचकर उस पर आत्रमण करने लगे । उनकी वाण-चृष्टि से विचलित 
न होकर अपनी सारी शव्ति एकत्रित करके हनुमान्‌ ने अपनी पूछ घुमाकर उन राक्षस 
के रथो को तोड डाला, सारथियो को मार डाला, रथ के घोडों को मार डाला हाथियों 
को मार गिराया और तुरगो को नष्ट-अ्रष्ट कर दिया। इस श्कार, सारी राक्षसन्सेता को 
घूल में मिलाकर हनुमात्‌ तोरण से नीचे पृथ्वी पर कूद पडा और अपनी पूछ को फढदे 
के समान वनाकर वत्नतास के कठ में लपेंट दिया और उसका गला घोटकर उसे मार 
डाला । इससे सतुप्ट न होकर हनुमान्‌ ने बढ्ते हुए क्रोच, साहस तथा शौय॑ से दीप्त होते 
हुए, भयकर गर्जन करते हुए, वज्र से भी कठोर दीखनेवाली अपनी मुट्ठी से अश्मवक्ष पर 
ऐसा प्रहार किया कि वह रक्‍त उगलते हुए पृथ्वी पर लुढक गया । तब अनुपम भुजन्वल 
से भूमनेवाले उस हनुमान्‌ को घेरकर अन्य राक्षस-वीर युद्ध करने लगे, तो हनुमात्‌ ने 
उन सव कामी सहार कर दिया । फिर, शझार्दूलमुख को वेग से घुमाकर पृथ्वी पर ऐसा पटका 
कि उसका सिर चूर-चूर हो गया । उसके पब्चात्‌ उमडते हुए कोघ से समस्त राक्षसों को 
व्याकुल करते हुए हनुमान्‌ ने अत्यत करता के साथ अपनी' पूछ से वाँधकर पिंगलाक्ष को 
ऐसा घुमाया, जैसे ववडर सूखे पत्ते को घुमाता है, और फिर उसको तोरण के स्तभ से 
दें मारा । 

इस प्रकार, अपने अद्वितीय पराक्रम से उसका वध करके, हनुमान्‌ ने दानकससेना में 
प्रवेश किया । उसने वड़े वेग से दीर्घजिलक्न पर जाक्रमण किया और अपनी कठोर मुष्टि 
के आघात से उसे पृथ्वी पर गिरा दिया । फिर हनुमान्‌ ने उसकी जीम खीचकर उसका 
सहार कर डाला और फिर तोरण पर जा वैठा । हनुमान्‌ के इस घोर कृत्य को देंखकर 
बचे हुए देत्य भवभीत होकर भाग गये और सारा वृत्तान दनुजेंद्र को जा सुनाया । तब 
दशकठ ने ऋषधावेश में आकर अपने मन्नी के पुत्र रक्तरोम, झशतजिह्न, रुधिरलोचन, स्तनित- 
हास, झूलढह्रप्ट्, दुर्मुख तथा महान्‌ जव्तिज्ञाली व्याप्रकवल नामक राक्षसों को बुलाया और 
कहा---एक वानर उद्दण्ड होकर राक्षमों का सहार कर रहा हैं| तुम जाकर उसका वध 
कर डालो ॥' 

तव वें महावलीं राक्षस गर्जन करते हुए, अनुपम रथो पर बैठकर, चतुरगरिणी सेना 
को साथ लेकर चल पटे । मकर-तोरण पर अप्रतिहत चौर्य के साथ उपस्थित हनुमान्‌ को 


ग्र 


उुनदुरकॉड २३३ 


उन्होंने घेर लिया और उस पर श्रेष्ठ तथा दिव्य अस्त्रो की वर्षा करने लगे । तव पवन- 
कुमार ने वडे साहस के साथ, बादलो से घिरे हुए इन्द्र के समान सुशोभित होते हुए अपने 
अघटित पराक्रम से उन दैत्यो के अस्त्रो से अपने-आपको बचाते हुए, अपने नखाग्र, पैने 
दाँत, चरण, कुहनी तथा करो से प्रहार करके तथा वडी-बडी शिलाओं तथा वृक्षों को 
चारो ओर से बडे वेग से उन पर फेंककन उनको चूर चूर कर डाला । हाथियों पर सिंह 
के समान उछलकर चढ गया और अपने कुटिल तथा भयकर नखाग्रो से उनके कुभस्थलो 
को चीरकर मास तथा गजमुक्ताओ को विखेर दिया । फिर छलाँग मारनेवाले हिरणों की 
भाँति शीघ्रगति से दौडनेवाले अइवों को देखते-देखते निशेष कर दिया । जीव-जतुओ का 
पारण करनेवाले यमराज की भाँति बडे मनोयोग से पदचर सेना को मटियामेंट कर दिया । 
कुलपर्वतोीं पर आघात करके भयकरः ध्वनि के साथ उनको भेदनेवालें वज््र के समान वह 
रथो पर उछलकर चढ गया और (थो तथा न्‍|थो में जुते हुए अश्वों को मिट्टी में मिला 
दिया । फिर, रथिको तथा सारथियो को टुक्‍्डे-टुक्डे कर दिया । इसके पश्चात्‌ अनुपम 
शवित को प्रदर्शित करते हुए सबसे पहले रखतरोम का वध किया, फिर स्तनितहास को 
मृत्यु के मुँह में भेज दिया, उसके पश्चात्‌ शतजिल्ल को मार डाला, रुधिराक्ष का सहार 
किया, दुर्मुत्त को चीर डाला और तत्पश्चात्‌ महान्‌ पराक्रमी व्याप्तकवल को छिल्न-भिन्न 
कर दिया और शूलदष्ट्र को निहत कर दिया । तनन्तर अपनी पूछ को कालपाश के समान 
दीघ॑ तेथा भयकर बनाते हुए बडे साहस के साथ बचे हुए उहण्ड राक्षसों को, उनकी सेना 
के साथ नष्ट कर दिया । 


हनुमान्‌ के इस अखड प्रताप के आगे, जो जो राक्षस नहीं टिक सके, उन्होंने रावण 
के सम्मुख जाकर सेना के नाग होने का समाचार कह सुनाया । अब रावण के ऋ्रोध की 
सीमा नही रही । उसने प्रहस्त के पुत्र जबुमाली को भेजा, जिसके प्रताप से सूर्य भी काँप 
उठता था, जो झत्रु-रूपी पर्वतो के लिए वज्ञायुध के समान भयकर था, तथा वाहुबल में 
अद्वितीय था । जबुमाली ने दानवेन्द्र को प्रणाम किया और बडे उत्साह से रक्त फूलों की 
माला रक्त वर्ण के वस्त्र तथा युद्ध के लिए आवश्यक भयकर शस्त्रास्त्र घारण किये और 
अनुपम रथ पर आरूढ होकर युद्ध के लिए चल पडा । उसने घनूप का टकार तथा भयकर 
गर्जन करते हुए, सिंह से भिड जानेवाले मदमत्त हाथी के समान अतुलनीय पराक्रम के 
साथ हनुमान्‌ पर आक्रमण किया और महान्‌ पर्वत पर मूसलाधार वर्षा करनेवाले मेघ के समान 
शर-बृप्टि की । किन्तु हनुमान्‌ किचित्‌ भी विचलित हुए विना ही, एक बहुत बडी चद्ठान 
उसाडकर उस राक्षस पर फेंका । तव उस राक्षस ने दस शरो से उस चट्टान के खड-खड 
कर दिये। फिर, उसने हनुमान्‌ के मुख पर अर्द्धचन्द्रास्थ चलाया, वाहु तथा वक्ष पर दस 
वाण छोडे तथा कपाल पर ऐसा शवितवाण फेंका कि उसके लगते ही हनुमान्‌ू का सिर 
फूट जाता । किन्तु, हनुमान्‌ ने बडे रोप के साथ एक सालवृक्ष को सहज ही उस्लाइडकर उस 
राक्षस पर फेंका । किस्तु राक्षस ने बीच में ही उसे काट डाला और उस वानरक्रेप्ठ 
के सिर पर एक भयकर तथा तेज वाण चलाया, उसके चक्ष पर दस वाण चलाये और 
बहुओ पर पाँच भाले फेंके । इस प्रकार, वह राक्षस हनुमान्‌ को अत्यधिक पीटा परहेचावर 


5] 
द्रु0 


एं३४' रंगने/र्थ एयापफे 

यम के समान आँखों से अग्निवर्षा करते हुए (हनुमात्‌ के प्रत्याघात की प्रतीक्षा में) खड़ा 
रहा । इतने में हनमान्‌ ने उस दैत्य के रथ को अपने पदाघात से पृथ्वी पर गिरा दिया, 
अपने दाँतो से उसे पकडकर उसके खड-खड कर दिये । फिर एक विशाल सालवक्ष के 
प्रहार से उसके रथ के अश्वों तथा सारथी को चूर-चूर कर दिया और सिंहसम गर्जन 
किया । तव जवुमाली रथ-हीन हो ढाल तथा खड्ग हाथ में लिये, अपनी प्रचंड शक्ति 
प्रदर्शित करते हुए, पवनसूत के भालपर प्रहार किया, तो' वह मूच्छित हो गया, किन्तु शीकघ्र 
ही वह समलकर उठा और अपनी वज्ञसम मुपष्टि के आघात से उसके ढाल के टुकडें- 
टुकडे कर दिये । फिर, उस देत्य को पकडकर हनुमान्‌ ने वलात्‌ उसका खड्ग छीन लिया 
और भर्यकर गति से उस राक्षस के सिर पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस पृथ्वी पर 
गिर पडा । उसके पव्चात्‌ हनुमान्‌ ने बची हुई सेना पर आक्रमण करके उसे छिन्न-भिन्न 
कर दिया । इस प्रकार, हनुमानू वडी चतुरता तथा पराक्रम से विजय प्राप्त करके तोरण 
पर जा बैठा । अपने प्राण वचाकर जो लोग भाग गये थे, उन्होने हनुमान्‌ के पराक्रम का 
सारा वृत्तात रावण को जाकर सुनाया । 


उनकी वातें सुनकर रावण को महान्‌ आइचये हुआ । उसने अपने मत्रियों को बुला 
भेज। और कुछ समय तक उनके साथ परामश करने के पदचात्‌ इन्द्र को भी युद्ध में परास्त 
करनेवाले, घोर पराक्रमी तथा कर, विरूपाक्ष, उपाक्ष, कलहदुर्दर, भासकर्ण तथा प्रघस 
नामक पाच प्रचंड योद्धा तथा अग्न-सेनापतियो को देखकर कहा--किसी भी लोक में वावरो 
की ऐसी' शवित हमने न देखी, न सुनी है । हमें पता नहीं कि यह कौन है । तुम पाँचो 
वीर, अगणित सेना को साथ लेकर जाओमों और अपना भीषण वल तथा युद्ध-कौशल प्रकट 
करते हुए, साववान होकर उस वानर को बंदी बनाकर मेरे सामने उपस्थित करो ।' 

रावण की आज्ञा को सिर पर धारण करके, अग्नि तथा सूर्य की-सी प्रभा से दीप्त 
होते हुए, वे पांचों राक्षसवीर, असख्य रंथ, गज, तुरग, तथा पदचर सेना को साथ लेकर 
शीघ्र चल पडे और उदयाद्वि पर प्रकाणमान होनेवाले सूर्य के समान, तोरण पर विराजमान 
होकर दिगतो तक अपने तेज को व्याप्त करनेवाले तथा दैत्य-वीरो के साथ रण करने के 
लिए उद्यत पवनसुत को घेर लिया । फिर, उन्होने पृथ्वी तथा आकाश को अपने भयकर 
सिहनादो से विदीण्ण करते हुए हनुमान्‌ पर दिव्य झस्त्रो की घोर वृष्टि आरभ की । उन 
राक्षसवीरो में दुर्दर नामक राक्षस हनुमान्‌ का शिरच्छेदन करने के उद्देश्य से उस पर 
एक साथ पाँच वाण चलाये | तव हनुमान्‌ भयकर क्रोध के साथ गर्जन करके आकाण की 
ओर उडा । दुर्दर भी उसके साथ उडा और घनुष पर तीर चढाकर प्रलयकाल के भयकर 
मेघ की भांति गरवृष्टि करने लगा | पवनकुमार ने उस भयकर झर-न्वृष्ठि को असफल 
करते हुए, आकाश में और भी ऊँचा उडकर बडें वेग के साथ दुर्दर के ऊपर कूदा, जिससे 
वह राक्षस चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडा । 


इसे देखकर, विरूपाक्ष तथा उपाक्ष नामक राक्षस अति भयकर ढ्ग से मुदूगरो से 


सज्जित होकर आकाश में उडकर खड़ें हुए और सिंहनाद करने लगे । तब हनुमात्‌ भी 
उनकी ओर लपका और उनसे भिड गया । उन्होंने हनुमान्‌ पर अपने घोर मुद्गरों का 


उन्‍दुरकोंड २३५ 


प्रहार किया, तो हनुमान्‌ पृथ्वी पर गिर पडा। फिर तुरत वह उठा और एक विश्ञाल साल- 
वृक्ष को उखाडकर हुकार करते हुए उनकी ओर लपका और बडे वेग से उस वृक्ष को 
घुमाकर उन राक्षसों पर प्रहार किया और एक ही प्रह।र से उन्हें पृथ्वी पर गिरा दिया । 

तब भासकर्ण तथा प्रधस नामक राक्षसों ने अनिलपुत्र पर आक्रमण किया और 
अपने शूल तथा मुद्गरों की चोठ से उठे व्याकुल कर दिया । उनके प्रहारो से 
हनुमान्‌ घायल हो गया और उसके अगो से रक्त बहने लगा । तब वायुपुत्र अत्यधिक क्रोधा- 
वेश में आकर कुलपर्वत-सदृश एक विशाल पर्वत को उखाडकर उन राक्षसों पर फेंका 
कि राक्षस ऐसे चूर-चूर होकर गिर गये, जैसे घूसे के द्वारा भीतर से खोपषला बना दिये 
जाने पर, ऊपर की घरती' गिर जाती हैं । 

इसके पश्चात्‌ वायुपुत्र यमराज की भाँति राक्षस-सेना का सर्वनाण करने लगा । 
हाथियो का हनन हुआ, तुरग तहस-नहस हुए, पदाति-सेना परास्त हुई, रथ ध्वस्त हुए, 
शूर गिरे, महारथी' मरे, सारथी दव गये, शस्त्रास्त्र चूर-चूर हो गये, महावत मारे गये, 
घुड-सवार गिर गये, छत्र भुूक गये, ध्वजाएँ ध्वस्त हुई और रक्त की' नदियाँ वह चली 
तथा मास-खडो से आक्ृष्ठ हो बहुत-से भूत वहाँ एकत्रित हो गये । इस प्रकार पवन- 
कुमार ने एक ही क्षण में सारी सेना का ध्वस किया और रण की आकाक्षा करते हुए 
तोरण पर जा बैठा । 


१७. अक्षयकुसार का हनुमान्‌ पर आक्रमण करना 
हतशेष राक्षस -भागतें हुए रावण के पास पहुँचे और उसे पांचों अग्र सेनापतियों की 
मृत्यु का समाचार सुनाया । तब राक्षसराज ने, रण-कौशल में निपुण, मन्मथाकार, परिप्कृत 
विचारवाले, अक्षीण छशौर्यवाले, भयकर छूर तथा महावीर अक्षयकुमार को बुलाकर कहा-- 
तुम जाकर बड़े यत्न के साथ उस वानर को युद्ध में मार डालो और उसका सिर काटकर 
तोरण के स्तभ पर लटका दो ॥' 


पिता का आदेश मानकर अक्षयकुमार, दास्त्रास्त्रों से सुसज्जित तथा अपनी पतावा 
से अलकृत हो, उदित होनेवाले सूर्य की-सी काति से शोभायमान होते हुए, आठ घोडें 
जुते हुए रथ पर चैठकर शीघ्र गति से चला । उसके चलते समय पृथ्वी कापने लगी, रय 
के चलने से उत्पन्न ध्वनि, घोडो की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड, राक्षसों के हुकार, 
तथा उस ( अक्षयकुमार ) के घनुष के टकार, इन सबकी सम्मिलित ध्वनियों से समस्त आकाण गूजने 
लगा । वहाँ पहुँचकर अक्षयकुमार ने तोरण पर आरूढ पवनपुत्र को घेर लिया, और तीनो 
लोको को, कँपाते हुए, दिशाओं को हिलाते हुए, अपने बाहुबल को प्रकट करते हुए, हनुमान्‌ 
पर असख्य वाणों की ऐसी वर्षा की कि दर्शकों को आश्चर्य होने लगा । हनुमात्‌ ने निश्चय 
किया कि मुझे यह नहीं सोचना चाहिए कि यह बालक है। यह भौर्यनिधि दिखाई देता है । 
यो सोचकर उन्होने अविचलित भाव से उन वाणों को अपने लागूल से तोड डाला । 
अक्षयकुमार ने भी हनुमान्‌ की प्रशसा करते हुए उसके सिर पर तीन बाण ऐसे चलाये 
कि उसको सिर से रक्त की धाराएँ वह्‌ चली । रक्त की घाराओ से युक्त हनुमान्‌ लाल 
किरणों से युवत बालसूर्य की तरह दीखने लगा । राक्षमकुमार के वाणों से आहत होते दी 


स्ड्द रंगनाथ सश्यायण 


हनमान क्ोव से प्रलयकालाग्नि की भाँति भभक उठा और एक ताल-वृक्ष लेकर उससे 
उसके रथ के अइवों को मार डाला । तब वह ( राक्षसकुमार ) पृथ्वी पर खडें होकर 
हनमान के भाल पर दस शर ऐसे चलाये कि हनुमान्‌ मूच्छित होकर गिर पडा । कितु वह 
ज्नीघ्र ही सेमल गया और अपनी पूछ से अक्षयकुमार पर ऐसा प्रहार किया कि वह 
विचलित हो उठा ।॥तव उसने अपनी गदा को अनिलकुमार के वक्ष पर ऐसा! चलाया कि वह 
'मूच्छित हो गया । किन्तु, जीघ्र ही उसकी चेतना लौट आई भर वह अक्षयकुमार पर 
भपटकर उसकी गदा छीन ली और उसी को उस पर पूरी शवित से चलाया । तब बअक्षय- 
कुमार ने एक वाण चलाकर उस गदा को रोक लिया और अपने को बचा लिया। फिर 
वह करवाल तथा ढाल लेकर आकाण की ओर उड़ा । वायुपुत्र भी उसके साथ-साथ आकाश 
में उडा । हनुमाव्‌ ने तव अपने झत्रु पर गंदा चलाई । लेकिन, अक्षयकुमार नें अपने 
खड्ग से उस गदा के दो टुकड़े कर दिये और तुरत अपने खड्ग से हनुमान्‌ की जाँघो 
पर प्रहार किया । उस खड्ग की चोंट खाकर वायुनदन पृथ्वी पर ग्रिर पडा। लेकिन, 
वह तुरत ऊपर की ओर उछला और अक्षयकुमार की दोनो टाँगें पकड़कर उसे ऐसे खीच 
लिया, जैसे गरुड सर्प को अपने वच्य में कर लेता है । फिर, उसने अक्षयकुमार को कुम्हार 
के चाक के समान बड़े वेग से चारो ओर घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, तो उसका सारा 
प्रताप जाता रहा । उसके सिर का मुकुट छिन्न-भिन्न हो गया और उस मुकुट के सभी 
रतन विखर गये; उसका हृदय-पिंड फट गया, आँतें निकल आई; मास-पैशियाँ ठिब्च- 
भिन्न होकर ग्रिर पडी । आँख की पुतलियाँ कुचल गई , साथ हारीर विदीर्ण हो गया 
ओर रकक्‍त/ की घारा उगलते हुए उस राक्षस ने अपने प्राण छोड दिये । उसकी वैसी मृत्यु 
देखकर इन्द्र आदि देवता आवद से फूल उठे औौर वायुपुत्र की प्रणसा करने लगे । ऐसी 
अनुपम विजय को सावकर हनुमान्‌ ह्षष्वनि करने लगा । 


भयभीत होकर भागे हुए राक्षप्त-सैनिको ने देवताओं के जत्र्‌ रावण की सभा में 
पहुंचकर निवेदन क्यि--हे दानवेन्द्, उस वानराधिप का वाहुवल आशइ्चयेजनक है । अशोक- 
वन के रक्षक समाप्त हुए, अत्यत पराक्रमी राक्षस-सैनिक मृत्यु का ग्रास बने, जतजिद्न 
नष्ट हो गया, शार्दूलमुख प्राण खो बैठा, पिगलनेत्र की मृत्यु हुई, स्तनितहास मर गया, 
जार्दूलकवल युद्ध में मारा गया, जबुमाली नष्ट हुआ, वक््तास समाप्त हो गया, रक्तरोम 
को मृत्यु हो गई, रुषिराक्ष की जीवन-लीला समाप्त हो गई, सेना के साथ शूलदष्टू 
कुचल दिया गया, प्रतापी' दीध॑जिक्नू कट मरा, दुर्मु्ख का नाम ही शेप रह गया, 
दुर्वर मृत्यु को प्राप्त हुआ, प्रचस गिर गया; भासकर्णं चूर-चूर हो गया, उपाक्ष का नाश 
हुआ, विख्पाक्ष ने अपने प्राण गँवा दिये, अद्मवक्ष का वध हो गया और अक्षयकुमार 
भी मारा गया । हमारी दुर्वार सेता भी नष्द हो गई । निस्मसदेह उस वानर को इस्दे 
आदि देवता भी युद्ध में परास्त नहीं कर सकेंगे । ऐवा लगता है कि वह प्रलयांतक (रुद्र) 
को भी पराल्‍्त करने की' क्षमता रखता है | सब पूछा जाय, तो वह राक्षत्रों को निगल 
जाने के निमित्त वानर-रूप घारण करके आया हुआ मृत्यु-देवता ही है ! इन बातो को 
सुनकर स्वर्गलोक का छत्रु रावण अक्षयकुमार की मृत्यु के लिए विलाप करने लगा* 


छनन्‍न्द्ृरकांड २३७ 


है कुमार, हे प्रिय अक्ष,, है वीर, एक कपि के हाथो तुम्हें मरना पठा ! हाथ, यह कैसी 
विपरीत वात हुई 


१८%, इन्द्रजीत का हनुमान्‌ को वन्दी वनानां 
इस प्रकार, शोक-सतप्त होनेवाले पिता को देखकर इन्द्रजीत ने कहा--हें देव, आप 
इस प्रकार धैर्य खोकर दु खी क्यो होते हे | में अभी उस नीच वानर पर आक्रमण करता हूँ। 
या तो उसे युद्ध में अवश्य मार ही डालूगा, या बडे पराक्रम के साथ उसे बदी 
बनाकर आपके समक्ष उपस्थित करूँगा । आप शोक मत कीजिए ।' 
अपने ज्येप्ठ पुत्र की इन बातों को सुनकर रावण को धीरज हुआ और वह कहने 
लगा--हे पुत्र, तुमने चिरकाल तक इन्द्र को वबदी बनाकर रखा था । माया तथा जक्ति 
में तुम प्रौढ हो, तुम्हारा पराक्रम मुझसे भी श्रेप्ठ है । इस पृथ्वी पर तुम्हारी समता कौन 
कर सकता हूँ ”? फिर भी, उस वानरथ्रेष्ठ को साधारण वीर मत समझो । सतत सावधान 
रहते हुए अपने दिव्य बाणों के प्रभाव से तथा अपनी सहज णक्ति के प्रताप से विजय 
प्राप्त करक॑ लौटो ।' 
पिता की आज्ञा पाकर मेघनाद अग्नि तथा सूर्य के समान दीप्तिमान्‌ रथ पर आरूढ 
होकर चला । उसके धनुष के अगणित टकारों से दिग्गजों के कर्णपुट विदीर्ण हो गये । 
अपने गजन से सभी लोकों को भयभीत करते हुए दिगतो की सधियो को गिथिल बनाते हुए, 
उसने हनुमान्‌ पर आक्रमण किया । उस समय देवता, मुनि, इन्द्र आदि दिवपाल, तथा 
किन्नर स्वर्ग से बड़े कौतूहल से यह दृश्य देखने लगे । इन्द्रजीत ने हनुमानू पर अद्भुत 
तथा तीक्ष्ण वाणो की ऐसी वृष्टि की कि हनुमान्‌ के जरीर पर तिल धरने के लिए भी 
स्थान न रहा , कि्तु पवनपुत्र ने उन शरो को अपनी पूछ से छिन्न-भिन्न करके अपने 
को बचा लिया और अपने विज्ञाल वाहु-बल तथा पराक्रम का परिचय दिया । ऐरावत को 
जीतनेवाला इन्द्रजीत पवनपुत्र के इस अनुपम बल पराक्रम को देखकर आश्चर्य-चकित हो गया 
ओर कई दिव्यास्त्र उस पर चलाये । पवनपूत्र ने उस शस्त्रो को नष्ट-भ्रप्ट करके 
विशाल वृक्ष तथा पर्वतो को उठाकर इद्रजीत पर फेंका । मेघनाद ने अपने तीक्ष्ण घरों से 
से उन्हें छिन्न-भिन्न कर डाला । इस पर पवनपुत्र क्रोध से इन्द्रजीत पर भापटा और उसके 
रथ तथा उसके घोडो को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया । इद्रजीत रथ से वचित 
हो गया । हनुमान्‌ के शौर्य को देखकर आश्चर्यचक्ति होते हुए उसने उस पर वायब्यास्त्र 
चलाया । हनुमान्‌ तो वायुपुत्र ही था, इंसलिए उस अस्त्र का कोई प्रभाव उस पर नहीं 
हुआ और वह अविचल खडा रहा । तब मेघनाद ने उस पर रीद्रास्त्र चलाया । हनुमान्‌ में 
रद्र का अश भी था, इसलिए उसका भी कोई प्रभाव हनुमान्‌ पर नहीं हुआ और वह अटल 
खडा रहा । यह देखकर इन्द्रजीत के क्रोध की सीमा नहीं रही । उसने अत्यधिक क्रोध से 
पृवनकुमार पर दुर्जय ब्रह्मास्त्र चलाया | इसे देखकर सभी सुर, सिद्ध तथा साथक काँप 
उठे । वह अस्त्र पृथ्वी तथा आकाश का स्पर्श करते हुए बड़े वेग से हनुमात्‌ की ओर वाने 
लगा । हनुमान को ब्रह्मा से यह वर प्राप्त था कि ब्रह्मान्त्र से, उसके प्राणों की हानि नहीं 
होगी । अत', वह उस अस्त्र को देखकर विना विचलित हुए, ब्ह्मान्मत का उच्चारण करते हुए 


ण्३्८ रणनाथ एश्यायस 


+ 


खडा रहा । ब्रह्मास्त्र उसके प्राण नहीं ले सकता था, इसलिए उसन हनुमात्‌ को बाँध- 
कर पृथ्वी पर गिरा दिया । मास्ति को गिरा हुआ देखकर समस्त राक्षसो ने, मारो, 
मारो, पकडो, वाँधो,, कहकर चिल्लाते हुए उसे घेर लिया और उमडते हुए क्रोध से हनुमात्‌ 
को मजबूत रस्सियो से वाँध दिया । अवश होकर गिरे हुए हनुमान्‌ के पास पहुँचकर 
इच्द्रजीत ने सोचा कि यह महावली ब्रह्मास्त्र के लगने पर भी प्राण खोये विना, वेंधा हुआ 
पडा है । न जाने यह वानर कौन है ? इसका वध नहीं करना चाहिए । 

इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली शीघ्र ही हनुमानू को अपने पिता के 
समक्ष उपस्थित किया । रावण तथा उसके मत्री इद्रजीत की शक्ति तथा निपुणता को देख- 
कर अत्यधिक हर्षित हुए । हनुमान्‌ को देखकर रावण अपनी आँखों से अग्निवर्षा करते 
हुए बोला--हें वानर, तुम मेरे नगर में अकेले कैसे प्रविष्ट हो सके ? तुम कोन हो ” 
तुम्हारा नाम क्‍या है ? तुम किस उपाय से समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम्हें किसने 
भेजा ? शिव ने ? हरि ने या ब्रह्मा ने ? सुर, गरुड, उरग, सिद्ध, साध्य, नर तथा खेचर 
मेरा नाम सुनते ही भय से काँप उठते है । ऐसी दशा में तुम निर्भय होकर मेरे ऐसे नगर 
में कैसे आये, जिसमें आने से इन्द्र भी डरता है ? तुमने धोखे से इस नगर में प्रवेश किया 
और मेरे उपवन का सर्वेताश करके अपने पराक्रम का परिचय दिया। बडी वीरता दिखाकर 
कुछ बूढे तथा दुर्वल राक्षसों का वध किया । तुम्हारे दीप्तिमान्‌ तेज को देखने से अनुमाव 
होता हैं कि तुम साधारण कपि नहीं हो । यदि तुम अपने आगमन का सही-सह्दी कारण 
वताओ, तो में तुम्हारें सभी अपराध क्षमा कर दूँ ।॥! “ 


१९. हनुमान्‌ का रावण को अपने आगमन का कारण बर्ताना 


तव हनुमात्‌ ने उस दशकठ को देखकर बडे क्रोध से कहा--हे राक्षस, हे नीचात्मा, 

हें पापकर्मी, हे दुष्ट, मे उस राक्षसकुलातक, जगदीश्वर राम का दूत हूँ, जिनकी कीत्ति 
समस्त ससार में व्याप्त है, और जिन्होंने दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेकर विश्वामित्र 
के यज्ञ की रक्षा की, शिव-घनुष को तोडा, अपनी महान्‌ शक्ति से परशुराम का गर्वभग 
किया, खर-ट्षण आदि राक्षसों का नाथ किया, तुम्हें अपनी पूछ से बाँधकर समुद्र 
में डबोनेवाले वालि का एक ही वाण से सहार किया, सुग्रीव का राजतिलक किया, और 
जो अपनी अक्षय शक्ति के कारण कोदण्ड-दीक्षा-गुरु के नाम से विख्यात हैँ । मेरा नाम 
हनुमान्‌ है, में सुग्रीव का मत्री हूँ । सू्यकुल-निधि राम के भेजने पर में बडे हर्ष से उनकी 
अँगूठी लेकर, सीताजी का अन्वेषण करते हुए समुद्र पार करके तुम्हारे नगर में आया । 
सव स्थानों में ढूंढने पर भी सीताजी का पता त़हीं पा सका। इससे में अत्यत दुखी हुआ, 
आखिर उन्हें उस उपवन में देखा और अपने प्रभू की अँगूठी देकर उन्हें राम का कुंशल- 
समाचार सूना दिया । फिर, उनकी दशा का वृत्तात राम को सुनाने के लिए में लौटने लगा । 
जाने से पहले में अपने आगमन का समाचार तुम्हें बता देना चाहता था, इसलिए 
मेन तुम्हारे वव को उजाडा, उप्तके रक्षकों का वध किया, अस्सी सहस्र राक्षसों का नाश किया, 
तुम्हारे मत्रिकुमारों तथा अक्षयकुमार का सहार किया और तुम्हारा रूप-रग देखकर 
यहाँ स लौटने के विचार से वदी बना । राम के अनुयायी सुग्रीव की सेना में मुझसे भी 


छन्‍्दरकाॉड २३८ 


अधिक पराक्रमी तथा बाहु-बल में श्रेष्ठ करोडो वीर हे । ऐसे बलवान्‌ भी है, जो ब्रह्मादि 
देवताओं को भी जीत सकते हूं और जो तुम्हारे नाम से ही जलते है । ऐसे करोड़ो वीरो 
के साथ राम समुद्र को पार करके लका पर आक्रमण करेंगे, हुठ तथा क्रोध से राक्षसो 
का सहार करने के पश्चात्‌ तुम्हारे सिर काटकर तुम्हारा अत कर देंगे और सीता को 
साथ लेकर वापस जायेंगे । यह सत्य है । यदि तुम वुद्धिमान्‌ हो और नीति के पथ पर 
चलना चाहते हो, तो सूनो । तुम णीघ्र सीताजी को उन्हें सौप दो और उस आश्रित लोक- 
रक्षक रघ्राम की शरण में जाओो । शत्रुता करने से कोई लाभ नहीं, इसलिए तुम उसे 
(शत्रुता को) तज दो । मृत्यु का शिकार न बनकर अपने प्राणो की रक्षा करो 

ऐसे हित वचन कहनेवाले हनुमान्‌ को देखकर क्रोध, गये और मात्सर्य से अभिभूत 
होकर घनघोर बादलों के समान गरजते हुए दशकठ नें प्रहस्त को आज्ञा दौ- 
यह नीच निर्भय होकर मेरे सामने ऐसे अपणब्द कह रहा है । इस नीच कक्‍पि को ले 
जाकर | तुरन्त इसका वध कर दो । तब विनय-भाषण तथा विवेक-भूषण से सपन्न अनघो 
का पोषण करनेवाले, शत्रुओ के लिए भीषण दीखनेवाले विभीषण ने, रावण की आज्ञा 
के परिणाम के सबंध में सोच-विचार करके बडी नम्रता के साथ रावण से निवेदव विया-- अपने प्रभ्‌ 
के द्वारा भेजे गये दृत, सदा कोई-न-कोई ऐसी वात कहते ही हे । यह उनका सहज गुण होता है, 
इसलिए आप अपना क्रोध शात कीजिए | श्तना ही नही, दूत अवध्य होता है । अत , इस कपि को 
मारना उचित नही हैं । आप अपने हठ और क्रोध राम तथा लक्ष्मण पर दिखाइए | इसे मुबत कर 
दीजिए । यदि आपका क्रोध ज्ञात नही होता हो, तो इसे कोई छोटा दड देकर भज दीजिए ।' 


२०, लंका-दहन 

उसके नीति-वचन सूनकर रावण ने दैत्य-वीरों को देखकर कहा--क्पियों को' अपनी 
पूछ बहुत प्रिय होती' है, और वह उसका चिह्न भी होता है । इसलिए सब लोगो के 
समक्ष तुम इरुकी पूछ जला दो और नगर-मार्ग में घुमाकर इसे छोड दो । तब राक्षसो ने 
मोटे-मोटे रो से पदनपुत्र के हाथ और पैर बाँध दिये और कहने लगे--भच्छा हुआ 
कि हमारे कितने ही बधुओ को मारनेवाला यह दुष्ट कीडा हमारे हाथो में फेस गया है । 
फिर वे तूय-घोष को साथ उसे नगर के मार्ग में घुमाने लगे । तब वायुपुत्र ऐसा वहाना 
किये बैठा रहा, मानो वह इन राक्षसों के अत्याचारों से पीडित तथा निर्वेल वन गया हो 
और उन दुष्ट राक्षतों को तथा लका नगर को अपनी कनखियों से देखने लगा । सभी 
दानव-बुन्द आवाल-वृद्ध उसके पीछे हँसते हुए मऔौर उसका उपहास करते हुए चलने लगे । 
उन दुष्चर्याओो को देखकर सज्जन पुरुष मन-ही-मन दुखी होते थे । कुछ दानव जिद करके 
असरय वस्त्र ले आयें, उन्हें कालसर्पो के आकार में बेटा और तेल में डुबोकर कहने लगें-- 
'इसने सारा 3शोक्‍-दन नप्ट क्या है, वितनें ही दानव-बीरो का महार विया है, दानवेथ्वर ने 
इसको उचित दड दिया है । चलो, हम इसे जला डालें । यो वहते हुए उन्होने तेल 
में भीगे हुए कपड़े उसकी पूंछ में लपेट दिये और उसमें आग लगा दी । बषडे आइचय- 
जनक ढग से जलने लगे । ऐसा लगता था, मानों लका में कोई उत्पात-्सूचक ,चिह्ल दिसाई 
पड रहा हो । राक्षस सिहनाद करते हुए हनुमान्‌ के पीछे-पीछे जाने लगे । 


२8० र॑ंगर्ना/थ रायायरी 


राक्षस-स्त्रियों ने यह दृष्य देखा, तो जाकर सीता से सारी बातें कही । सीता यह 
समाचार सुनकर वहुत दुखी हुई और कहने लगी--हे तात, कितने दढुखकी बात है कि 
तुम्हारे जैसे पुण्यात्मा को ऐसे सकट भोगने पड रहे हैं । फिर, उन्होने जल का स्पओशे करके 
एक पवित्र स्थान में खड़ी हुई और हाथ जोडकर अग्निदेव से प्रार्थना करने लगी-- 
हें पवनमित्र, हे परम पवित्र, हे वैच्वानर, हे वरद, यदि मेरे प्रभु राम धर्मात्मा है, यदि वे 
मेरे लिए समुद्र पार करनेवाले हे, यदि वे रावण का वेघ करनेवाले है, यदि में पतिब्रता हूं, 
यदि महाराज जनक सब प्राणियों के प्रति समान भाव रखते है, और यदि वेद सत्य है, 
तो आप परम शीतल होकर उस श्रेप्ठ वानर की रक्षा कीजिए ।' 


इस प्रकार, जब सीता ने प्रार्थना की, तव अनल 'घलवाल' नामक कालसर्प के सिर 
पर रहनेवाले माणिक्य की ज्वाला के समान दीप्त होते हुए भी शीतल हो गया । इस 
विचित्र बात को देखकर हनुमान्‌ आइचरयंचकित होकर सोचने लगा - यह कैसा आश्चर्य हैं 
कि अग्नि आज शीतल लग रही है । कदाचित्‌ मेरे पिता अग्नि के मित्र है, इसलिए 
उन्होंने मुझ पर दया की हैँ, अथवा सभी देवताओ नें प्रार्थना की होगी, या राम के प्रताप 
के कारण ही ऐसा हुआ होगा । नहीं नहीं, यह तो सीताजी के आशीर्वाद का ही पुण्य- 
प्रभाव है ।! उसके परचात्‌ हनुमान्‌ के सतत ब्रह्ममत्नो का उच्चारण करने के फलस्वरुप 
ब्रह्मयाश ऐसे छूट गये, जैसे परमात्मा का एकतिप्ठ हो ध्यान लगानेवाले नरो के भवन्वघन 
छूट जातें हैँ । 

तब हनुमान्‌ उस असूरेश की लक्ा का दहन करने के उचित अवसर की प्रतीक्षा 
करने लगा । इतने में पव्चिम समुद्र में सूर्यास्त हुआ, मानो सूर्य समुद्र में स्तान करके 
अग्नि-सूकति का जप करने के उद्देष्य से चला गया हो । तब हनुमान्‌ ने मेरु पर्वत के 
समाच अपने जरीर को छोटा बना लिया । सभी वधनो को तोड दिया और दुख देते, 
तया उपहास करते हुए वडे कौतुक के साथ अपने पीछे-पीछे आनेवाले राक्षसों को अपनी 
पूछ से मार डाला । फिर, एक ऊँचे सोध पर उछलकर, अपनी पूछ की अग्नि चारों ओर 
लगा दी | देखते-देखते भयकर धुआओँ तीत्र गति से चारो जोर व्याप्त हो गया । घुएँ के 
व्याप्त होने के पहले ही अग्नि-ज्वालाएँ आकाश में फैल गई । आकाश में ज्वालाओो के 
व्याप्त होने के पहले जहाँ-तहाँ उल्काएँ गिरने लगी । उससे भी पहले (देवताओं के) 
श्रेष्ट विमान सव दिगाओं में बिखर गये । 

तव हनूमान्‌ वडे वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर उछलते हुए नगर में आग 
लगाने लगा । उसने राजसभा-भवनों को जला दिया, झशस्त्रागारों को ध्वस्त कर दिया, 
भडार-घरो की पक्तियो को नप्ठ कर दिया और वडे-वडें सौधो को भस्मसात्‌ू कर दिया । 
फिर क्रम से मडपों को जला डाला, मणिमय चद्र-शालाओ को राख कर दिया, प्रशसनीय 
शयनागारों की श्रेणियों का दहन कर डाला, और रमणीय गज, तुरग तथा रथ-शालाओं 
को अग्निसात्‌ कर दिया । - 

तव लाल-लाल अग्निणिखाएँ अविश्ल गति से आकाजञ में व्याप्त होने लगी । खेचर, 


् 


उरग, तथा अमर»णों के विमान वेग से (आकाञ में) ऐसे चवकर कटने लगे, मानों 


न्द्र्कोंड 5:८४ 


रावणासुर के नाश की सूचना देने के निमित्त उल्कापात होने लगा हो । अग्नि अपनी 
प्रचड गति से समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त होने लगी, मानों राजाओ में श्रेप्ठ रामचद्र 
के लका पर आक्रमण करने का उपक्रम करते ही उनका प्रताप-रपी अग्नि पहले हीं सर्वत्र 
व्याप्त हो गई हो । रावण ने इसके पूर्व अपना भयकर रण-कौशल दिसाकर समस्त दिक- 
पालो को युद्ध में परास्त कर दिया था । उस पराजय को भूले विना आज अग्नि नें, अपनी 
समस्त शक्ति को दिखाते हुए, एक ही क्षण में एक सान्न विभीषण के भवन को छोड़कर, 
सारे नगर को जलाकर भस्म कर दिया । उस समय राक्षसो की ऐसी दुर्गंति हुई कि कुछ 
राक्षम भय से काँपने लगे, वस्त्र तथा केशो में आग लग जाने से कुछ राक्षस हाहाकार 
करते हुए चारो ओर भागने लगे, कुछ अपने स्ग-सवधियो को नप्ट होते देख कुछ राक्षस 
शोक करने लगे, कुछ हाहाकार करने लगे, कुछ हनुमान्‌ पर ऋ्रोब दिखाने लगे । ऐसे भी 
राक्षत ये, जो कह रहे थे कि इस पापी रावण ने उस महाविष्णु के अवतार राम का 
महित किया है, ऐसा अहित करनेवाले रावण के लिए इस प्रकार ही विपत्ति का आना 
कोई अनहोनी वात नहीं हैं । 


तब वानरवीर हनुमान्‌ अत्यत भयकर रूप घारण करके नगर का कोई भी स्थान 
विना छोडे, समस्त लका में आग लगा दी । उस कपिश्रेष्ठ की पूछ के स्पर्श से उत्पन्न 
भीषण अग्नि-ज्वालाएँ जहाँ-तहाँ फैलने लगी । सुरापान से सुप्त कुछ राक्षस विना जाने ही 
जलने लगे । मृदुल शब्याओ पर सोनेवाले राक्षस तीन अग्नि-ज्वालाओ के मध्य फेसकर, 
छटपटाते हुए मरने लगे । कुछ राक्षस अपने सर्ग-सवधियो, स्त्री तथा बच्चो, प्राणाधिक मित्रो 
को एकत्र करके भागते समय, बीच ही में अग्नि में फंसकर जलने लगे । अपने घर की 
वस्तुओ को बाहर निकालने के लिए गये हुए लोग फिर लौटकर नहीं आ सके और वही 
जल गये । कुछ राक्षस अपनी-अपनी पत्नियो को छाती से लगाये बाहर आने लगे, तो 
देहली के पास आते-आते जल गये । इस प्रकार, वायु-पुत्र की पूछ से निकली हुई अग्नि 
भयकर गति से समस्त लका नगर मेँ व्याप्त होने लगी और श्रेष्ठ सिहो की भाँति उम्र रूप 
धारण करके, हाथियों के कुभ-स्थलो को विदीर्ण करने लगी । तेज से युवत घुडसवारों 
के समान वह अइवो पर आक्रमण करने लगी, लम्पटो की भांति, कामिनियों के कुचो पर 
हाथ रखने लगी, दूसरों की निंदा करनेवालो की भाँति अपनी जिहबा को चारो ओर 
फैलाने लगी, अत्यधिक आनद से फूल उठनेवाले की भाँति आकाश तक बदने लगी और 
भयभीत होकर भागनेवाले कायरों की भाँति वह गलियों में प्रवेश करने लगी । इस प्रकार, 
वह अग्नि लका को चारों ओर से घेरकर शीघ्रता से उसका ब्वस करने लगी । भभी 
देवता आनद से फूल उठे और हनुमान्‌ को अपने आप्त वधु मानकर उसकी प्रण्सा करने लगे । 

तब हनुमान्‌ मन-हीं-मन जानकी की मृत्यु की आश्का से पीडित होकर सोचने 
लगा-हाय ! यह मेने क्‍या कर डाला ! मदान्ध होकर मेने लका के साथ-माथ राम को 
पत्नी को भी जला डाला । अब में किस मुंह से राम के पास जाऊँगा ?े जानकी बाग कुशल- 
समाचार में राम को कैसे सुनाऊँगा ? हाथ ! मेरे सारे प्रयत्तों पर पानी फिर गया * 
इस प्रकार, थोडी देर तक चिंतित रहने के पण्चात्‌ उसका विवक जागा लौर बह सोचने 

३१ 


२8२ र्यनाथ एयायर ' टणा 


७ है. 


लगा-में भी कैसा मूर्ख हूँ ? इसी माता के आश्ञीर्वाद का फल था कि यह भयकर अग्नि 
मेरी पूछ को जलाने का साहस नहीं कर सकी । भला, अग्नि साध्वी का क्या वियराड़ 
सकती है ?” यों सोचक्षर उसने अपनी पूछ समुद्र में ऐसे बुझा दी, मानो वह सीताजी की 
दुखाग्नि को ही बुका रहा हो । फिर, वह सीता के दर्णनाथ अग्योक-वन में गया । सीता 
पहले ही राक्षस-स्त्रियों के मुंह से हनुमान्‌ के कुशल का समाचार सुनकर आनन्द से 
गदूगद होकर बैठी थी। हनुमान्‌ ने उन्हें प्रणाम किया, अपने साहसपूर्ण कृत्यों का सारा 
वृत्तांत उन्हें कह सुनाया और फिर कहा--हे माता, में अभी जाकर रामचद्रजी को साथ 
लेकर बाता हूँ, जिससे आपके मन का दुख दूर हो जाय ।' इतना कहकर उसने सीता को 
भक्ति से प्रणाम किया और उनकी जाना लेकर वहाँ से चल पड़ा । वहाँ से चलकर वह 
नगर के पब्चिम द्वार के पास आया और उसके किवाड़ो पर इस जोर से पदाघात किया 
कि वें दूटकर पृथ्वी पर गिर गये । यह देखकर सभी राक्षस भय-विह्लल हो गये ! 


२१. अंगद आदि वानरों से हनुमान्‌ की सेंट 


वहाँ से चलकर, फिर एक वार अपना पराक्रम दिखाते हुए, हनुमान्‌ ने साहस के 
साथ परकोर्ट के ऊपर के महलो को अपने पदाघात से ग्रिया दिया और सहज ही सुवेलाद्ि 
पर चढ गया । वह जाकाश की ओर ऐसा उछला कि लकापुरी में रहनेवाले समस्त 
दैत्व कोका खाकर भयभीत हो उठे, पहाड़ के बिखर भग्न होकर समुद्र में गिरने लगे; 
बड़ी-बड़ी चद्ढठानें लुढ़कनें लगी, दक्षिण दिगा को वहव करनेवाली अग॒द नामक हथिनी का 
घरीर दव गया, पहाड़ो के झज्ध॒ गिर गये और पृथ्वी नीचे को घेस गई । फिर, उसने 
अपने अनुपम भूजवल की सहायता से आकाण-मार्ग से जाते हुए समुद्र के मध्य भाग में स्थित 
मैनाक पर्वत पर उतरकर अपनी थकावट दूर की । फिर, उस पर्वत की आज्ञा लेकर 
अपने असमान वेग तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए समुद्र के उत्तरी किनारे पर 
उतर पड़ा । 

हनुमान्‌ के मुख पर स्पप्ट रूप से दोखनेवाले हर्ष के चिह्नो को देखकर अंगद आदि 
श्रेष्त वानर उसकी अग॒वानी करने गये और उसे गले से लगा लिया । फिर, वे सेव एक 
स्थान पर बैठ गये और हनुमान्‌ से उसके कार्य के परिणाम के स्वंघ में प्रइन किये । 
तव हनुमान्‌ ने वेहा--हें वावरों, आपकी छृपा से मेने अनुपम समुद्र को पार किया, 
अगणित वैभवों से सपन्न लका में प्रवेश किया, और वहुत समय तक अन्वेषण करने के वाद 
सीतवाजी के दर्शन भी कर लिये । फिर, मेने राम की आाज्नञा के अनुसार जावकी से उनका 
सास वृत्तात कह सुनाया और उनकी दी हुई जबंगूठी भी सीताजी को दे दी । फिर, उनकी 
चूड़ामणि लेकर यहाँ लोट बाबा हूँ !' 

हनुमान्‌ को वालें सुनकर सभी वानर अत्यंत हर्पित हुए जौर हनुमान्‌ की भूरि-भूरि 
प्रशसा करने लगे | तव अत्यधिक उत्साह से भरें हुए श्रेप्ठ वीर जगद कहने लगा--अब 

यही उचित होगा कि किसी भी प्रकार हम जावकी को लका से जीतकर ले आरवे और 

उन्हें रघुराम के पान् पहुँचा दें | चलो, हम अभी समुद्र पार करें और पूत्र, मित्र तथा 
परिवार-सहित दशकठ का वध करके सीताजी को छुड़ा लाबें ।! 


एनंदएकार्ड ८9३ 

तेव जाववान्‌ ने वालिपुत्र को देखकर कहा--सुग्रीव ने हमें जानकी के अन्वेषणार्थ 

भेजा है; उस परम पवित्र सीता की कृपा से हमाशा प्रयत्न सफल हुआ । अब हमारे 

लिए उचित यही है कि हम जाकर रामचद्रजी से यह समाचार कह दें।, तथव सबने 

परस्पर परामर्श कर, वैसा ही करने का निश्चय किया । उस दिन वायूपुत्र तथा दूसरे 

वानर समुद्र के किनारे ही कद-मूल-फलो से अपनी क्षुधा शात करके रहे । वे परम शक्ति- 

शाली वानर दूसरे दिन वहाँ से रवाना हुए और मेरु, मदर-पर्वतो से भी विज्ञाल दर्दुर 

नामक पर्वत के निकट पहुँच गये । उस पर्वत की वराइयो में विचरण करते हुए उन्होंने 
फल, मूल, आदि खाकर वही रात्रि बिताई। 

२२. वानरों का मधुवन में विचरण करना 


प्रात काल होते ही उन बाहुबली वानरवीरों ने सोचा--हमें जब सुग्रीव के मधुवन 
में जाकर, वहाँ जी भरकर मधु (शहद) का पान करना चाहिए, अन्यथा हमारी प्यास 
शात नहीं होगी । हमने रामचद्र का कार्य सपन्न किया हैँ । अत, सुग्रीव कुद होकर हमें 
दड नही देंगे।! यो निश्चय करके सभी वानरों ने अगद तथा हनुमान्‌ से प्रार्थना करके 
उनकी भी सम्मति प्राप्त कर ली और मधुवन्न के लिए रवाना हो गये । मध्याह्ध होते- 
होते थे मधुवन में पहुँच गये । चारो दिशाओं में भरनेवाली मधु-धाराओ को देखकर उनके 
मुँह में पानी भर आया । विभिन्न प्रकार के हाव-भाव करते हुए, वे अपने कान खड़े 
करके, एक दूसरे को अपने दाँत दिखाते हुए, एक दूसरे से तर्क-वितर्क करते हुए, बड़े 
कौतुक के साथ अपने इषप्टानुसार उस वन के विभिन्न दिशाओं में विचरण करने और 
पुष्पों से भरनेवाला मकरद, छत्तो में एकत्रित मधु आदि का पान करने लगे। फिर, उन्होने 
कई प्रकार के फल खाये । कच्चे फलो तथा फूलों को तोडकर नीचे गिरा दिया। अत्यधिक 
उल्लास के आवेश में आकर उन्होने पेड की शाखाओो को तोड दिया और पेडो को भुका- 
कर एक पेड से दूसरे पेड पर छलाँग मारकर जाने लगें। फिर, वे पुप्प-लतामो को 
भूला बनाकर भूलने लगे तथा सरोवरो में स्तान करते हुए नाना प्रकार की क्ीडाएँ 
करने लगे । 

जब मधुवन की रक्षा करनेवाले वानर (दधिमुख) ने इन वानरो की करतूत देसी, 
तब क्रोध में आकर उसने सभी वानरो को डाँटकर उन्हें तुरत वहाँ से निकल जाने का 
आदेश दिया । जब उसके अनुचर सभी वानरो को घवका देकर बाहर निकालने लगे, तब 
अगद तथा हनुमात्‌ ने भागनेवाले अपने साथी वानरों को रोका और वन-रक्षक दधिमुख 
को मुह के वल नीचे गिराकर, उसे पृथ्वी पर घसीटकर, मुप्टियो का प्रहार करके भगा 
दिया । वेचारा दधिमुख क्रोध तथा दुख से व्याकुल होकर भगवान्‌ की दुहाई देते हुए 
भागा और राजा राम तथा लक्ष्मण के श्रीचरणों में वडी भवित के साथ प्रणाम करके, 
फिर स्य-पुत्न॒ के चरणों में सिर भुकाकर कहने लगा--हें देव, आपका मधुवन देव-दानवों 
वो लिए भी अभ्नेद्य है । आज वायु-पुत्र तथा वालि-पुत्र, दोनो ने अपने बहुनन्से साथियों 
को लेकर ऐसे मधुवन में प्रवेश फिया है और वृक्षों प८ चढकर शासाओं पर विचरण 
फरते हुए अपने इच्छानुसार फल खाये हे और जी भरकर मधु पिया हैँ | एसफा किनित्‌ 


२8४9 रंगनाथ रायायण 


भी विचार न करके कि यह उपवन राजा का है, वे मनमानी कर रहे हे । मेने उन्हें 
डॉट-डपटकर बाहर निकालने का प्रयत्न किया, तो उन्होने मुझे मुब्टियों से मारकर भगा 
दिया है ४ 

दधिमुख का विलाप सुनकर सुग्रीव अत्यत क्रुद्ग हो गया और उन वानरों को उचित 
दड देने का विचार करने लगा । तव सारी परिस्थिति समभ्मकर सतत-विजयी लक्ष्मण ने 
सुग्रीव से कहा--यबदि अगद आदि महावीर तुम्हारी आज्ञा विना प्राप्त किये ही, निर्भय 
होकर तुम्हारे बन में प्रवेश करके गहद पी रहे है, तो कदाचित्‌ उन वाहुवलियों के द्वारा 
रामचढ्रजी का कार्य सपक्ष हुआ होगा । अन्यथा, थे इस प्रकार तुम्हारी आज्ञा की अवहेलना 
करने का साहस कभी नहीं करेंगे | इसलिए तुम उन्हें छ्षीत्र यहाँ बुलाओं ।॥' 

तव सर्यपुत्र ने दधिमुख को देखकर कहा--वे रामचद्रजी का कार्य सपन्न 
करके आये दीखते हे, इसलिए उनके सभी अपराध क्षम्य हे । तुम अपना दुख सहन कर 
जाओ और उन्हें यहाँ वुला लाओ ।' सुग्रीव का आदेश पाकर वह उन वानरों के समीप 
पहुँचा और हनुमान, अगद तथा जाबवानू आदि वानर-वीरो को प्रणाम करके कहा--हैं 
श्रेप्ठ वानरों, मेरा अपच्घ क्षमा करो और ज्ीघच्र यहाँ से प्रस्थान करो । तुम्हें लिवा लाने 
के लिये सूय॑पुत्र ने मुझे भेजा है । 

यह समाचार सुनकर सव वानर बहुत हर्पित हुए । वे रविपुत्र के आदेश को सिर 
आँखो पर धारण करके, सुग्रीव के दड की कल्पना करके भयभीत होनेवाले अगद को घैर्य 
बेंधाकर, बडे उत्साह के साथ वहाँ से चले । उनकी हर्ष-ध्वनि वादलो की ध्वनि के समान 
सुनाई पड़ने लगी । बहुत अधिक मोद-मग्न हो जानेंवाले उन वानरो को दूर से ही देखकर 
सुग्रीव ने उनकी अग॒वानी के लिए कपि-सेना भेजी और वी प्रीति से उनका स्वागत किया। 

२३ राम को सीता का कुशल-समाचार सुनाना 

तब सभी वानरो ने जगदीब्वर रामचद्र के चरणों में दण्ड-प्रणाम किया, और फिर 
सुमित्रानदन तथा सूर्यपुत्र को बडे प्रेम से प्रणाम किया और हनुमान्‌ को आगे करके रामचद्र 
के आसन के समीप एक कुंड में वेठ गये । तव हनुमान्‌ अपनी यात्रा का वृत्तात सुनने 
की रामचद्र की उत्सूकता को समझ गया जौर अत्यधिक भक्ति स हाथ जोडकर कहने 
लगा--- हे सूर्यवश्ञ के नाथ, देखा मैने उस वैदेही को, जो स्त्रियों में शिरोमणि, तथा परम 
केल्याणी हूँ । हे राजन्‌, मैने उनका अन्वेषण किया और फिर सपाति के द्वारा मार्ग जानकर 
(दक्षिण दिशा में) गया, सहज ही समुद्र को पार किया, और दक्षिण समृद्र के तट पर 
अपार ग्योभा से विलसित त्रिकूट पर्वत पर स्थित दानव-समूहो से रक्षित लका में अकेले 
प्रवेश किया । वहाँ सव स्थानों में ढूँढने पर भी सीता को न देख सकते के कारण में 
अत्यत दुखी हुआ, फिर मेने रावण के उद्यान में प्रवेश किया और वहाँ मैने आपकी धर्म- 
पत्नी को राक्षस-स्त्रियों से घिरे हुए देखा । वे कई दिनो के उपवास के कारण बहुत ही 
क्लात हो गई थी | वें एक वृक्ष के नीचे विपुल दुख की बाढ में डूबी हुई अपने हाथ पर 
कपोल टेककर चितात्रात हृदय से आपका ही स्मरण करती हुई बैठी थी ! उस समय राक्षस 
रावण वहाँ आया और उन्हें विभिन्न प्रकार से भय दिखाने लगा | तब वें अपनी विवश्ता 


उुन्दुरकाड २9९ 


तथा दीन दशा का विचार करती हुई अविरल गति से अश्रुधारा बहाने तथा आहें भरले 
लगी । मलिन वस्त्र तथा घूलि-घूसरित शरीर से यूक्‍त वे, उमडते हुए शोक से वार-वार 
विलाप करने लगी । आपने अपनी पत्नी की जो रूप-रेखा मुझे बताई थी, वह उनकी 
रूप-रेखा से सर्वथा मिलती थी, इसलिए मेने निश्चय किया कि वे ही' सीता है। फिर, 
मैने उनके समीप जाकर प्रणाम किया, उनसे उचित वार्त्तालाप करके आपकी अगूठी उन्हें दी । 
फिर, उनकी चूडामणि लेकर मे समुद्र लॉघकर यहाँ पहुँच गया हूँ ।” इतना कहकर 
हनुमान्‌ ने राम को सीता की चूडामणि दी', जो उनके वियोग की' अग्निशिखाओ के प्रतीक 
के समान दीप्तिमान्‌ू थी । 


राम ने उस शिरोरत्न को बडे अनुराग से लिया और उसे अपने हृदय से लगाकर 
थोडी देर तक मूच्छित-से हो रहे । फिर, अपने धैयें को सचित करके वे समल गये और 
बाप्पपूरित नयनो से वानर-राजा को देखकर बोले--हे सूर्यनदन, मेरे प्राण-समान देवी 
की णगिरोमणि को देखकर मेरा हृदय लाख के समान पिघल रहा है । इन्द्र ने यज्ञ से सतुप्ट 
होकर यह रत्न मेरे श्वशुर को दिया था । उस गृणनिधि जनक महाराज ने इसे सीता के 
सिर में पहनाकर बडे सम्मान के साथ सीता का विवाह मेरे साथ किया । यह रत्न लतागी' 
सीता से तथा मुभसे कभी अलग नही रहता। आज मेरी तथा सीता की भेंट कराने के हेतु यह रत्न 
आया है ।' इस प्रकार कहते हुए राम उस मणि को वार-वार अपने हृदय से लगाने लगे । 


उसके पदचात्‌ राम हनुमान्‌ को देखकर वोले--हे पृण्यात्मा, तुम्हारे लौटते समय 
सीता ने तुम से क्‍या कहा था ? सुनाओं । तब शक्तिसपन्न हनुमानू राम को देखकर 
कहने लगा--“हे देव, उन्होने कहा, सूर्यवशतिलक के वियोग में गत दस महीने मेने असख्य 
दुखो को भेलते हुए बिताये हे। दो महीने के पद्चात्‌ रावण मुझे मार डालने का निरचय 
कर चुका है | इसलिए तुम राम भूपाल से निवेदन करो कि मेरे प्राण अब नही बचेंगे । 
उन्हें सत्यनिष्ठ मानकर ही मेरे पिता ने मेरा पाणिग्रहण उनसे कराया । विवाह-वेदी पर 
उन्होने ( मेरे पति ने ) अग्निदेव के समक्ष सदा मेरी रक्षा करने की' प्रतिज्ञा की और 
मुझे अपने साथ अपने घर ले आये । आज उन्होने मेरी' उपेक्षा कर दी और मुझे अनाथ 
बना दिया । इस पर विचार करने के लिए प्रभू राम से निवेदन करो । उनसे यह भी 
निवेदन करो कि अपनी' धर्मपत्नी को कोई चुराकर ले जाय, तो चुपचाप बैठे रहना वीरो 
का धरम नहीं है । औचित्य का विचार करके मेने इन बातो की चर्चा की है । मेरा शरीर 
चाहे जहाँ भी रहे, मेरे मन, वचन और कर्म उन्हीं में रमण करते रहेंगे ।! इतना कहने के 
पदचात्‌ उन्होने यह भी बताया कि चित्रकूट पर्वत पर, उन पर कोए ने कैसे आक्रमण किया था, 
कैसे आपने गैरिक से उनके कपोलो पर सुदर मकराक्ति की रचना कीधी । (ये 
वार्तें उन्होने इसलिए बताई थी कि ) मेरे वचनो पर आपका विश्वास हो जाय ॥” 
रामचद्र से इतना कहने के पश्चात्‌ हनुमान्‌ ने लक्ष्मण तथा सुग्रीव को भी सीताजी का संदेश सुना 
दिया । सभी वानरवीर मन-ही-मन हित हुए । 

यह सुदरकाड ससार में व्याप्त होकर सभी काव्यों में सूदर सिद्ध हुजा है । इसका 
विचार करके आध्र-भाषा का सम्रादू, काव्य-आगम आदि के ज्ञाता, भाचारवान्‌ू, घीर, भूलोवग- 


२४६ रेगनाथों रॉय यियोी 


निधि, गोनवुद्ध भूपाल ने सुदर गुणों से सपन्न, घैर्यवान्‌, शत्रुओ के लिए भंयकर स्वरूप, महात्मा, 
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर रसिक जनों के लिए प्रिय, अनुपम तथा ललित शब्द 
तथा बर्थों से सपन्न रामायण के इस सुदरकाड की, श्रेष्ठ अलंकार तथा सुंदर भावों से 
परिपृर्ण बनाकर इस प्रकार रचना की कि वह आचद्वार्क, परमपूज्य हो श्ौभायमान होता रहे । 
प्रसिद्ध, आप, रसिको के लिए सतत आनंददाबक इस आदिकाव्य का पठन जो कोई 
भी करेगा, या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद जादि विविध वेदों का आधार राम- 
ताम-रूपी चितामणि के द्वारा नये भोग, परोपकार-वुद्धि, उदातत विचार, परिपूर्ण शक्ति, 
राज्य-सुख, निर्मेलकीत्ति, नित्य सुख, घर्मनिष्ठा, दान-पुण्यः में अनु रक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य, 
ऐश्वर्य, अक्षय शुभ, पाप-क्षय, श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति, जबुओ का नाग, और घन-घान्य-समृद्धि, आदि 
सुलम होगे । उनका जीवन निर्विध्न होगा, घरों में लावण्यवती स्त्रियों का अनुराग तथा 
पुत्रों के साथ जीवन सिद्ध होगा। सव प्रकार के सकट दूर होगे, सरे-संवधियों से मिलन, 
इच्छित कार्यों की सिद्धि, देवताओं की प्रीति, और पितरो की तृप्ति सुलम होगी । इसके 
रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी तथा उसे इन्द्रभोग की प्राप्ति होगी । जेबतक 
कुलपर्वत, सूर्य, चंद्र, दिश्ञाएँ, वेद, पृथ्वी, तथा सभी भूवन सुशोभित रहेंगे, तवतक यह 
कया अक्षय आनदन्समूह का आगार सिद्ध होगी । हु 


सुन्दरकांड समाप्त 


श्रीरंगनाथ रामाथण 


(इुद्धकांड ) 


१, श्रीराम का हनुमान की प्रशंसा करना 


आश्वितो के हिताकाक्षी, सूर्यवेश के सवर्द्धक रामचन्द्र ने जब प्राणाधिका प्रिया के इन प्रिय 
वचतो को हनुमान्‌ के द्वारा सुना और उत्तका पता जान लिया, तत्र उन्होने बडे प्रेम से 
कहा--- हनुमान्‌ ने जैसा कार्य किया है, क्या, वैसा कार्य करना देवताओं के लिए भी सभव हू ? 
ऐसा प्रतीत होता है कि शक्ति में या तो हनुमान्‌ ही श्रेप्ठ है, या पवन श्रेष्ठ है या 
गरुढ ही श्रेप्ठ है । समुद्र को पार करना उनके सिवा और किसके लिए सभव है ? देव, 
गधवं, दैत्य तथा किन्नरो के लिए भी दुर्गम, राक्षसनसेना के प्रचड बाहुबल से दिन-रात 
सुरक्षित लका में प्रवेश करके वहाँ सेजीवित लौट आना क्‍या जशिधर (थिव) के लिए भी 
सभव है ? अपने प्रभू का महान्‌ कार्य बडे आनन्द के साथ जो ज्ञीघ्र ही सपन्न करता है, 
वही उत्तम पुरुष है । प्रभु के कार्य में विष्त पडने पर, विलव के साथ उसे थूरा करने- 
वाला मध्यम श्रेणी का पुरुष है। प्रभु के बताये हुए कार्य से बचने की चेप्ठा करनेवाला 
तथा हीला-हवाला करनेवाला व्यक्ति दुस्सेवक है । इन तीनो में हनुमान्‌ निस्सदेह श्ेप्ड 
व्यवित ही सिद्ध हुआ है । अनिलकुमार ने एक महान्‌ कार्य को बड़े हर्ष तथा तत्परता में 
सपन्न किया है । अब उसका प्रत्युपकार, में किस प्रकार से कर सकूँगा । अब (प्रेम से) 

बेर 


प्‌ः0 स्यनाथ एयायण 


का 


उसका आलिंगन करना ही इस समय मेरे व्ग की वात हैं।” यो कहकर प्रभु ने हनुमान्‌ 
को अपने हृदय से लगा लिया 

इस प्रकार, लुग्रीव के समक्ष राम ने हनुमान्‌ की प्रणसा करके क्हा--हिं पवनपृत्र, 
वद्दी प्रसन्नता हैं कि तुम जानकी का पता लगाकर जाये हों। मुझे अत्यन्त आनन्द का अनुभव 


बिक 


मच्े व 
हो रहा हैँ । पता-नही, इस कार्य की समाप्ति कैसे होंगी | मेरा मन यह सोचकर व्याकुल 
हो रहा है कि इस विज्ञाल सम॒द्र को लॉवकर जाने की क्षमता वानस्-ेना को कैसे प्राप्त 


होगी ॥ इतना कहकर राम अपना सिर कुकाकर चुप हो रहें । रविपुत्र, राम के मन का 
चिता को दृर करने के उद्देश्य से कहने लगा--हे देव ! जाप साधारण लोगो की भाँति 
इस प्रकार क्यो दुखी हो रहे है ” जाप दयो कहते है कि हम समुद्र को पार नही कर 
हम कअवच्य समुद्र को पार करेंगे, सुइेलाद़ि को पार करके लका को जीतेंगें और 
रावण का हार करके ससार का दु.ख दूर करेंगे । हे राजनू, आप विचार कीजिए । मेरे 
सभी ठानर परित्रमणील हे ; वाहवल से नसपन्न हे, और दुर्जय है । हें राघव, इनके 
रहते हुए बाप इस प्रक्नार क्यो चितित होते है ” जाप तैयार हो जाइए । उद्योगी पुरुष 
के लिए नभी अर्य सद्यः फल-प्रद सिद्ध होते है । बत्रु सदा उत्साही व्यक्ति से भयभीत 


' न्‍ैँ 
१०९) 


का 
जो 
ट्‌ 


नही 


रहते है, उत्साहहीन व्यक्ति से नहीं । 

सुद्रीव के इन वचनों को सुनकर प्रभु ने हनुमान्‌ से कहा--ठीक है । में पहले 
समूद्र से (मार्ग देने की) प्रार्थना करूँगा । यदि उसने नहीं दिया, तो अपने वाणों की अग्नि 
से समूद्र को ही सुखा दूगा, या उस पर पुल वाँवूगा । हें पवनपुत्र, समुद्र पार करना 
मेरें लिए कौन बड़ा कार्य हैं ? अब तुम यह तो बताओ कि उस दशकठ के नगर में 
क्निने क्लि है, उसकी सेना कितनी वडी हैं ? उसके नगर के कितने द्वार है ? कितने राक्षस 
उन द्वारो की रला करते है ? उस नयर के सौधों की पक्तियाँ कैसी हैँ ”? तुम तो इन 
सवका पता लगाकर जाये हो, इसलिए मे तुमसे इन सव बातों का विवरण सुनना चाहता हूँ ।' 


२० लंका के वेभव का वर्णन ह 

तव हनुमान्‌ हाथ जोडकर बडे विनय के साथ प्रभु से इस प्रकार निवेदन करने लगा-- 
“हैं दाभरणि, उस नगर में सतत (गड-स्थलों से) मधु-घारा वहानेवाले, मुख से रौद्र भाव 
प्रकट करनेंगले, पर्वेताक्ार भद्र गजो के असंख्य समूह हे । वहुत-से आयुधों से तज्जित, 
आच्चयेंजनक तबा भवकर दीखनेवालें, छत्रो, पताकाओं तथा विविध चिह्नो एवं ध्वजाओ 
से युक्त सूर्य-विव की प्रभा के समान मणियों से दीप्तिमानू, जच्चों एवं सारथियों से युक्त 
असख्य रय हे । वीर रस के समृद्र की लहरों के समान दिखाई दंनेवाले विविध रगो से 
युक्त, (दर्णकों की) दृष्टियों को चौबिया देनेवाले अपनी हिनहिनाहट से सबको आच्चय्ये- 
चक्तित करनेवाले, अपने वेग में पवनदेव के अच्चों को भी मात करने की दिव्य शक्ति 
रखनेवाल तथा मनोहर व्यक्पर्वाले, जइबबव अनगिनत नसख्या में हैँ । हे देव, हे राघव, वहाँ 
के राक्षमवीरों की तो ग्रिनती ही नहीं हो सकती हे; वे ऐसे दिखाई देते हे, मानों 
विज्लियो से युक्त वाले बादलों ने ही दानवों का कप ले लिया हो, यो काले पर्वत ही 
मूक्तिमार झोद्र दाना रूप धारण छिये हुए हों, या जिस गरल दा पान शिव ने किया था, 


खुद्धकांड, २५९ 


उसी ने मानो दैत्यों का रूप धारण कर लिया हो, या प्रलय-काल की अग्नि के घुएँ ने 
ही मानो राक्षसों का रूप धर लिया हो । बाहुबल में उन राक्षसों की समता ब्रह्मा 
आदि देवता भी नहीं कर सकते । हे राजन, लका में समस्त ससार में अनुपम सात उन्नत 
तथा श्रेष्ठ दुर्ग हे । एक ईंटो का दुर्ग है, जिसके चारो ओर के कगूरे सदर दिखाई पडते है। 
उसके भीतर शिलाओ से निर्मित एक विशाल दुर्ग है, जिसके भीतर फौलाद का दुर्ग है। 
उसके मध्य में गवाक्षो से युक्त एक ताँवे का दुर्ग है, जिसके भीतर ( बडी-बडी तोपो 
की समता करनंवाले) शिला-्यत्रों से युक्त एक विशाल कॉसे का दुर्ग है । उसके मध्य 
त्रह्मा तथा शिव के लिए भी अभेद्य एक रजत-दुर्ग है, जिसके मध्य में मणियों के प्रकाण 
की किरणों से सुशोभित तथा प्रशसनीय एक स्वर्ण-दुर्ग हैं । 

“है राजन, उन सात किलो में से प्रत्येक किले में, असख्य दीप्तियो को विकीर्ण करने- 
वाली मणियो से खचित चार द्वार है, जिनके दरवाजे यम धमेराज के वक्ष स्थल के समान 
विशाल है । उन दुर्गो में तत्र-विधियों से अभिमत्रित असख्य शर-चाप रखें हुए हें । उस 
किले के चारों ओर पाताल के समान गहरी, मकरो से भरी चार परिखाएँ है, जिनके मध्य 
में चार पुल बने है । 


“उन चारो पुलो पर वहुत-से राक्षस किले की रक्षा के लिए नियुक्त हैँ । वहाँ 
ऐसे असस्य शिलाएँ, बाण तथा यत्र-समूह है, जो अपने-आप शत्रुओं का नाश कर देंते है । 
अब उन सवका वर्णन ही मे क्यो करूँ ? महान्‌ वेभव से सपन्न हो रावण, प्रति दिन अपनी 
सेना को साथ भ्रमण को लिए निकलता हैं और सबका निरीक्षण करता है । अपने उद्धत 
गये से प्रेरित होकर वह सतत दूसरों को युद्ध के लिए चुनौती देता रहता है । पराक्रम 
तथा शक्ति से सपन्न शत्रुओं के लिए भी लका को वश्ञ में करना दुष्कर है | इसके अलावा 
समुद्र में जल, वन, (कृत्रिम) स्थल, तथा पर्वत के चार दुर्ग और हैँ । वे सतत दिखाई 
तो देते है, किन्तु उनको घेरने का उपक्रम करने जायें, तो उनका पता ही नहीं लगता। 

“हें राजनू, इस लका नगर की रक्षा करनेवाले भयकर राक्षस मृत्यु की जिह्ना की 
समता करनेवाले, शूल धारण किये हुए सतत रक्षण-कार्य में तत्पर रहते है । ऐसे रक्षक 
पव्चिम द्वार पर दस सहस रहते हे । पूर्व द्वार पर स्वय रावण चतुरगिणी सेना के साथ 
रहता है । दक्षिण द्वार पर एक लाख राक्षस रक्षा करते रहते हूँ । उत्तर द्वार पर अगणित 
शस्त्रो से सुसज्जित एक लाख राक्षस रहतें है । नगर के मध्य में एक लाख पच्चोस 
हजार राक्षस रहते ह॑ । हे सूर्यवशतिलक, ऐसी लका में, वित्ता अन्य किसी का ध्यान किये 
में आपकी कृपा से प्रवेश कर सका, उन पुलों को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया, 
दुर्गों को गिराकर खदको में भर दिया, सारी लका को जला दिया और आपके श्रीचरणो 
में लौट आया । आपने वहाँ की सारी वातें जान ली हूँ । अव विलबव क्यो ? हम झशीक्र 
समुद्र को पार करेंगे । समुद्र पार करने. की देर है कि वानर-सेना दशकठ की लका को 
क्षण भर में उडा देंगी 

तब रघुराम ने सुग्रीव को देखकर कहा--हे सूर्यपुत्र, अब विलंब क्‍यों करें ” यही 
शुभ मुहर्त है । इसी मुह्त्तं में प्रस्थान कर जाना ही हमारे लिए उचित हूँ। जब उस राक्षस 


पर रंयगन/शत्र रायायर 


के लिए मेरे अस्च के सिवाय (मृक्तित जय) और कोई उपाय नहीं है । वह छिप कहाँ 
सकता हूँ ? फिर उन्होने नील को देखकर कहा--तुम सेना के जआाये-आगे ऐसे मार्ग से 
मनोंहर हो तथा जिसमें स्वच्छ एवं मीठा जल, पर्क हुए फल, तथा 
पेड़ों की छाया का प्राचुर्) हो । साथ-हीं-साथ चअत्रुजनों का भी पूरा ध्यान रखते हुए जागे 


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वहना । नल उनकी जाज्ञा का पालन करने के लिए चल पडा । सुत्रीव ने सभी वानरों 
को बूुद्धनणत्रा पर चलने की जान्ना दी । 


. कपि-सेनाओं की युद्ध-यात्रा 


तठ वानब-येना जह्-तहाँ की यूफाओं से डे उत्साह के साथ चली | उनके यदाघातों 
वी घोर ध्वनि से सव गू फाएँ यूंजने लगी | उनके घोर हुंकार, तथा विकट बअट्ठहास के निनाद 
गये । दुछ वानर भग्कर यर्जन करते हुए, अपनी झद्िति के बर्दे में 


भूनते हुए जा रहे कुछ पके हुए फल-वुलो को ही अपने कयो पर रखे हुए उनके फलो 
को उठाते हुए जा रहे थे । दुछ वानर राम के समल्न खड़े होकर कह रहे थे कि+-हे 
राम भपाल, हन अवच्य ब॒द्ध में राक्षस-सनूह के साथ रावण का ठव करेंगे । इस प्रकार, 
सभी वानरवीर उ्त्वधिक्त उत्साह से उछलते, हर्प-निनाद करते, जपनी पूँछो को हिलातें, 
पर्वत-चिखरों पर चडकर अपनी इच्छा से मयकर गर्जन करने लगे । उस घ्वनि से आकानग 
गूजने लगा; पृथ्वी डोलने लगी, पहाड़ कॉँयने लगें, अप्द दिमयज घेंस-से गये, आदिशेष 
बत्यघिक भार का जनुमव करने लगा, लच्छप ने अपना सिर भुक्ना लिया । उस विगाल 
सेना के चलने से जो घूलि उडी उह कई रंगो से व्ाकान्म में व्याप्त होकर ऐसी दीखने 


०. 


लगी, मानों उस ध्वनि के आधिक्य के कारग पथ्ची से निब्वास का ध॒र्जां इस रूप में निकल 


वानरो की उस विशाल सेना के अग्न भाग में नील के नेतृत्व में चलनेवाली सेना 
के समान थी दोनों पाच्चे भागों में चलनेवाली सेनाएँ दो पक्षों 
की भाँति थी, नव्य भाग में जानेवालें रामहंद्र आत्म के समान थे, पीछे बड्े आठोप के 
साथ आनेअली सेना पूछ की तरह प्रक्ट होती थी । इस तरह वह विज्ञाल सेना ऐसी 
दीख रही थी. मानो नागयात्र ने णीडित होनेवाले सर्ववंती चाजकुमारों के सकट दूर करने 
के निमित्त, गरुइ पृथ्वी पर चल रहा हो | प्रबंव, केसरी तथा ठविमुख आदि वानर-ठीैर 
ड़ को हटाकर मार्य उनाते हुए जा रहे थे | उनके पीछे अत्यधिक हपोल्लास से भरे 
से गवय, तार, बंधमादन, हनमानू, अंगद, भरभ, नल, जाववान, हर, मेन्द आदि 
उनके पीछे रामचद्र. अनुज लक्ष्मण के साय चन रहे थे। इस प्रकार, 
सह्याद्रि पर॒ पहुंचकर वही उन्होंने णड़्व डाला । सयबीव ने वहाँ के विद्ञाल बनो में, 
तडायो वे चक्तिारे, तथा वृक्षों की छाया में सेना को ठहरने का जआादेश दिया | 
दूसरे दिन पूर्ववत्‌ सेना को रवाना करके लक्ष्मण स्वयं भी अपने प्रभु राम के साथ 
उले । वानरो के उलने से घरती हिलने लगी । उस सेनान्समुद्र में वीर रस का उफान-सा 


[त 


उठ रहा था, उनकी अक़्ति चारो बोर व्याप्त हो रही थी; (सैनिको की) झरीर- 
काति ही तरनें उठ रही थी; हर्प-ब्वनियों का घोष आक्ाद्य का स्पर्ण कर रहा था; 


ह खसुछ्धुकांड २५३ 


मनुवशचन्द्र, (रामचन्द्र) के सान्निध्य से वह सेना-समुद्र उद्*ेलित हो रहा था । इस प्रकार 
वह वानर-सेना-समुद्र (दक्षिण के) महासागर के गवे॑ को चूर करने के लिए निकल पडा। 
(उस सेना-समुद्र के वीच में) धीर राम-लक्ष्मण आकाश के मध्य भाग में प्रकाशमान होने- 
वाले सूर्य तथा चन्द्र की भाँति सुशोभित थे । जब नदियों में उतरकर सेना चलने लगी, तब 
नदी का पानी उमडने लगा । जब वह सेना सहद्याद्वि पर्वत तथा मलय पर्वत के मध्य भाग 
से होकर जाने लगी, तव मद पवन के चलने से वृक्षों की भाखाएँ आपस में रगड खाकर 


उन वानरो पर पुष्प वरसाने लगी । यह उचित ही तो था ! वन-लक्ष्मी प्रभु राम के 


आगमन से हर्षित होकर पुष्पाजलि दिये विना कैसे रह सकती थी ? 
वानर-वीर उस परवंत-प्रदेश में स्थित सरोवरो में उत्रकर उनका निर्मेल जल 
पानकर सतुप्ट होते । उन सरोवरो में पाये जानेवाले कमल-समूहों को वे अपने कर-कमल- 
युग्मो से इस प्रकार तोडते, मानो कह रहे हो कि हे कमलाकर, (सरोवर) जैसे कमलो का 
शत्र्‌ (चंद्रमा) कोघ में कमलो को जैसे तोड डालेगा, वैसे ही हमारे कमलाप्त-कुल-तिलक 
(सूर्यवशतिलक) दशकठ के वदन-कमलो को भी तोड देगा । वें इस प्रकार कुमुदो* 
को कुचल डालते थे, मानो कह रहे हो कि हम दुष्ट-शत्रु की स्त्रयो को दु ख* देकर, जानकी 
के दुखो* को भी इसी प्रकारर्* कुचल डालेंगे । सरोवरो के गर्भ से दीर्घ मृणालो को वे इस 
प्रकार उखाडते थे, मानो कह रहे हो कि हम राक्षसों के उदरस्थ आँतो को इसी प्रकार 
चीरकर बाहर निकालेंगे । इस प्रकार के विनोदो में मग्न होते हुए सभी वानर सरोवरो 
के किनारे लाँघकर जाते और फिर पहाडो पर चढकर वहाँ प्राप्त होनेवाला मधु छककर 
खाते और फिर जल पीकर बडे उत्साह के साथ आगे बडते जाते थे । 
४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र कां देखना 
तब ॒रामचन्द्र ने महेन्द्र पर्वत पर चढकर वहाँ से अनतिदर पर दीखनेवाले समुद्र 
का अवलोकन किया । वह समुद्र विविध क्रूर प्राणियों को अपने गर्भ में एकत्र किये हुए 
वडा प्रचंड रूप धारण करके ऐसा कहते हुए-से दिखाई दे रहा था कि जो रावण दीघें- 
काय मगर-रूपी हाथियो के झुडो से, उत्तुग तरग-रूपी घोडो से, कछुए तथा केंकडे-रूपी 
रय-समूह से, असस्य मत्स्य-रूपी सैनिकों से, सर्पों के फन-रूपी पताकाओ से, उनकी सुदर 
तथा चदुल पू छ-रूपी खड़्गो से, मीनावली-रूपी चामरो से, ऊपर तैरनेवाले भाग-रूपी छत्रो से, 
घनघोष -रूपी भेरी-निनाद से तथा जल-रूपी वीर रस से, मेरी शरण में आया हुआ हूँ, 
उसका वध में कैसे करने दूगा ? 
ऐसे विशाल समुद्र को देखकर राघव आइचरयंचकित हुए और निदान उस समुद्र 
निकट पहुँचे । समुद्र के किनारे समस्त सेना को एकत्र करने लायक चद्रकात शिलाओं 
पूर्ण एक विज्ञाल प्रदेश में रामचन्द्र इस प्रकार बैठ गये, मानो वे अपने शर-रूपी बसी 
समुद्र के आश्रय में विचरनेवाले रावण-रूपी मोटे पाठीन (मछली विशेष) को पकड़ने 
लिए बैठे हो | तब वे अपने पास ही बैठे हुए सूर्यपुत्र सुग्रोव को देखकर दोले-- 
* इस सभी शब्पे के लिए तेलुगु में एक ही शब्द (तोग) का उपयोग होता हूं । 


कवि ने यहाँ इस शब्द का प्रयोग करके यमक अलकार सिद्ध किया है । --लेसफ 


3), -# 9» ्। २५ 


२५8 रगनायथ एयायर + 


हे मुत्रीव, हम तो समृद्र के किनारं पहुँच ही गय्रे । जव कहाँ से और कंसे इस समुद्र को पार 
किया जाय, इसका उपाय तुम सोचों । पहले एक सुदर स्थान में इस वानर-सेना को ठहरने 
की आजा दो । सुत्रीव ने इस कार्य के लिए नील को नियुक्त किया। नील ने गीत्र ही 
सारी सेना को एक सुन्दर स्थान में ठहराने का प्रवव किया | वानरो के, शिविरो में आते तथा 
वहाँ उनके ठहरातें समय जो तुमूल बब्द हो रहा था, वह सूर्यमडल तक व्याप्त होकर 
ऐसा लगता था, मानों वह समुद्र को डाँट रहा हो कि एऐ समुद्र, में स्वय तो वनचरों 
(वानर) से उत्पन्न हैँ, भला में तुम्हारे वनचरों से (जल-चर) उत्पन्न घोष को कंसे सहन 
कर सकता हूँ और वह समुद्र के घोष को दवा देता था । सारी वानरूसेना, तीन सैनिक- 
शिविरों में, समुद्र-्तट पर स्थित वनों में ठहर गई । 
तव रामचद्र ने लक्ष्मण से एकात में कहा--हे सौमित्र, इस समुद्र की विशालता 
तो देखो, ध्सके अत का पता कोई कंसे पा सकेगा ? इसी प्रकार दुख-समुद्र का भी अत 
नहीं होगा ।' 
प्‌. संध्या-वर्णन 
इस प्रकार कहते हुए प्रभु रामचद्र जब दु ख-समुद्र में डूब गये, तव सूर्य भी पश्चिम 
समुद्र में ऐसा डूव गया, मानों उसने ऐसा विचार किया हो कि रामचन्द्र का जीवन ही 
मेरा जीवन है । सूर्यास्त होते ही समस्त लोक मणिहीन मजूपा की भाँति कातिहीन 
हो गये । सध्या-राग चारो ओर इस प्रकार व्याप्त हो गया, मानो मनसिज के वाणो की अग्नि 
से तप्त मनवाले राम का गीतलोपचार करने के निमित्त पब्चिम समुद्र राग-रजित वस्त्र 
लेकर आया हों । कमल-दलो का यौवन ढल जाने से, कमल अपने शोप सौदर्य को लिये 
हुए मृकुलित हो गये, मानो यह बता रहे हो कि राम के प्रताप के आगे इद्र के शत्रु 
रावण का मृह भी ऐसा ही कुम्हला जायगा । चारो ओर अबकार ऐसा व्याप्त होने लगा, 
मानो राम का शीतलोपचार करने के लिए दिग्ववुएँ ललित तमाल-पल्लव-राणियो को उछाल 
रही हो | जहाँ-तहाँ कुमुद ऐसे विकसित हुए, मानो वे यह सोचकर हँस रहें हों कि सूर्यवण- 
तिलक राम की वध्‌ को बंदी बनाकर हित होनेवाले दनृजन्द्र का हर्ष भग हो जायगा । 
सारा आकागश्य इस प्रकार नक्षत्र सममृह से अलक्ृत था, मानों वह इस वात की सूचना दें 
रहा हो कि रामचन्द्र के पैने शरो से सारा समुद्र सूख जायगा और उसके गर्भ में स्थित 
रत्त-राशियाँ इस प्रकार दिखाई पडेंगी । आकाण के सारे नक्षत्र समुद्र के जल में इस प्रकार 
प्रतिविवित हो रहे थे, मानो रामचन्द्र के विरह-ताप का शमन करने के लिए निशासुदरी ने 
सुगधित मल्लिका-पुष्पो की अय्या का प्रत्रव कर दिया हो । चक्रवाक एक दूसरे से अलग होकर 
शीघत्ष गति से चारो दिल्याओं में चलें गये, जिससे सव दिश्ञाओ में इस वात की घोषणा 
करें कि श्रीरामचन्द्र विरह-व्यवा से पीडित हो रहे हे, यदि हम भी विरह से पीडित हो, 
तो क्या, आच्चर्य हँ । चन्द्र अपनी किरणों को आाकात्न में व्याप्त करते हुए ऐसा उदित 
होने लगा, मानों वह श्रीराम की निंदा यो कर नहा हो कि हे राजन, में राजा (नक्षत्रों 
का) होवर समुद्र को प्रसन्नता से प्रफुल्ल कर देता हैँ और आप राजा होकर उसको सुखा देना 
चाहते हूँ । आप वूर्णकला से समन्वित है, वया आपके लिए यह उचित है ? यदि आप 


चुछुकांड २५९ 


ऐसा करेंगे, तो आपको भी (मेरे समान) कलक लग जायगा । चन्द्रिका समस्त दिशाओं 
में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्र विकट अट्टहास कर रहा हो कि हे राजा राम, जिस 
शिव ने मुझे अपने सिर पर धारण करके मेरा सम्मान किया है, ऐसे शिवजी के धनुष 
को तोडने के कारण ही आपको विरह-दुख हुआ है। उज्वल चाँदनी चारो दिद्याओ में 
ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्रमा ने समुद्र के फेन-हूपी चदन को अपनी किरणों के द्वारा 
लहरो से आक्ृष्ट करके, दिग्वधुओ के शरीर पर मल दिया हों । तब चकोर«वकोरी 
अत्यधिक आनंद से एक दूसरे का आलिंगन करते वार-वार अपनी चोचों को पसारकर 
छककर चद्विका-रस का पान करते, बडे अनुराग से अपनी प्रियाओं को पिलाते, उनके पीने 
पर स्वय पीते और इसी प्रकार बडे मोद-मग्न हो चन्द्रिका में खेलते-कूदते । इस प्रकार, 
जब वे अपनी प्रियाओ से अलग होते, फिर उनको दूँडकर उनके साथ बडे आनंद से रहने 
लगते थे | इन पक्षियों को देखकर वियोग-दु.ख से पीडित राम, सीताजी का स्मरण करके 
मन-ही-मन अत्यधिक व्यथा का अनुभव करने लगते । 

अपने अग्मज को इस प्रकार सतप्त होते देख लक्ष्मण उन्हें शाति पहुँचाने 
के उद्देश्य से बोले--हे देव, आप अनुपम वीर है, उदात्त चित्तवाले है । आप इसके लिए क्यों 
दुखी हूँ । अभी हम समुद्र को पार करके लका पहुँचेंगे, युद्ध में दशकठ का सहार करेंगे, 
और मिथिलेश की प्रिय पुत्री, कमलवदनी सीता को मुक्त करेंगे । आप खिन्न न होइए ।' 
अनूज के इन नम्र वचनों को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए । 

सैनिक-शिविरो में, वानर उस आनदप्रद चाँदनी में मुदित मन से रामचन्द्र के गृणों 
का गान करते, खेलते तथा कूदते रहे । कुछ लोग समुद्र के किनारे बडे आह्लाद से विचरण 
कर रहे थे । कुछ लोग विष्णु के सभी अवतारो की कथाएँ दूसरो को सुना रहे थे, तो कुछ 
वानर पिघलनेवाली उन चन्द्रकात शिलाओ पर बडे आनद से सोने का यत्न कर रहे थे । 
इस प्रकार, वे बडी देर तक विविध क्रीडाओ में मग्न रहे । 

शीघ्र ही पूर्व दिशा में अरुणिमा का ऐसा आभास हुआ, मानो वडवानल ही इस 
भेय से कपित होते हुए कि, जब राघव समुद्र पर अपने पैने बाणों का प्रयोग करेंगे. तन 
उनका लक्ष्य बन जाऊँगा, उदयाचल पर चढ गया हो । सभी नक्षत्र इस भय से ब्ॉर्फुत' 
हो छिपने लगे कि समुद्र का दहन करने के लिए राम के वाणो से उत्पन्न अग्नि की शिखाएँ 
कही आकाश तक न व्याप्त हो जायें । घीरे-घीरे सूर्य का उदय होने लगा, मानो वे अपने 
पौच्र (राम) को सचेत करने के लिए आ रहे हो कि हे राघव, अभी विलव क्यो करते हो, 
समुद्र को पार करके शीघ्र ही रावण का सहार करो । सभी कमल एक साथ ऐसे 
विकसित हुए, मानों कमलाप्त-अशज (सर्यवशी) राघव का विजय-कमल, साम्राज्य-कमल, तथा 
कौर्नि-कमल एक साथ ही विकसित हो रहे हो । तब दाजरथि जगकर प्रात कालीन सध्या- 
वदन आदि नित्यकर्मों से निवृत्त हुए । 

६ मंत्रियों के साथ रावण की मंत्रणा 
लका में रावण से अपने मत्रियों की सभा बुलाई और उनसे कहा--हे मत्रिवरो, 


कप 


तुम जानते हो हो कि एक वानर ने, एक यत्र-सचालित चित्रों की भाँति, मेरे नगर में 


२५६ एगेनाथे रापायफी 


प्रवेश किया, लकिनी का वध किया, सीता के लिए लका को जोध डाला, मेरे पुत्र का वर्घ 
किया, मेरी शविति का तिरस्कार करते हुए मेरी तगरी को जलाकर भस्म किया और 
बहुत-से राक्षतों का वध किया । वह हमारे हाथ में फेंसकर भी हमारे हाथ से वचकर 
चला गया । वहीं राघवों को समुद्र के किनारे ले आया है । यवि सूर्यवशतिलक 
समद्र को सुखाकर या समुद्र पर पुल वाँधकर इस पार चला आया, तो हमारा सब किया- 
कराया मिट्टी में मिल जायगा । उसके समुद्र पार करने के पहले हम क्‍या उपाय करें; 
जिससे वह लका में नहीं आ सके । तुम अच्छी तरह सोंच-विचारकर कहो कि हमारा 
अब क्‍या कर्त्तव्य हैं | यदि तुम्हारा बताया हुआ उपाय उपयोगी होगा, तो वैसा ही करेंगे ।” 
तव उन मूर्ख मत्रियों ने राक्षसेब्वर से कहा--हि देव, आपके वश में बहुत-से ऐसे 
दिव्यास्त्र हे, जो देवताओं के लिए भी अजेय हें। आप ने सर्पराज को बाँधा, उसका विष 
उगलवाकर गर्व-भग किया । रुद्र के मित्र कुबेर का गव॑ चर करके आपने उसका 
पुप्पक विमान ले लिया । मय की ख्याति को नप्ठ करके उसकी प्रिय पुत्री से विवाह कर 
लिया । मृत्यु-देवता अतक (यम) को वदीं बनाकर उस अतक के लिए आप अतक बन गये । 
अनुपम वलजाली वरुण को कपा दिया और उसे अपने वश में कर लिया | हे सम्राट, 
आपने सभी चक्रवत्तियों के राज्य वात-की-वात में हस्तगत कर लिये । क्या आपने शूलपाणि 
(शिव) के निकट अपने वाहुवल का ग्रदर्शन करके उनको नींचा नहीं दिखाया ? क्या, 
स्वग॑ के देवताओं के साथ उस इन्द्र का गव आपने नहीं तोडा ? क्‍या, आपने अग्नि को अपनी 
प्रतापारगित का ताप दिखाकर उसका ताप नष्ट नहीं किया ? क्‍या, दैत्यनाथ नैऋत पर कऋुद्ध. 
होकर अपने पराक्रम से उसका गर्व-भग नहीं किया ? आपने पवन को एक स्थान पर स्थिर 
रहने नहीं दिया और अपने वाहुबल से उसे विचलित कर दिया । राम तो एक मानवमात्र हें 
और आप मनृष्य-मक्षी हैं । यह कंसे सभव हैं कि वह आपके हाथो से वचकर जीवित रहे ? 
आपके पुत्र ने ईश्वर की प्रीति के लिए महेश्वर-यज्ञ करके शाइवत कीत्ति तथा पूर्ण 
सफलता प्राप्त की, इन्द्र को जीतकर उसने इद्रजीत का नाम प्राप्त किया | उसने इंद्र 
को भी वदी बनाया था, किन्तु ब्रह्मा के प्रार्थना करने पर उन्होने उसे ब्रह्मा को दें दिया। 
क्या, युद्ध में विजय पाने के लिए वह अकेला ही पर्याप्त नहीं हैँ ? हे दैत्यराज, आपको 
चिता करने की कोई आवच्यकता नहीं है ।॥” 


७, दानव-वीरों के दर्पपूर्ण वचन 


इस प्रकार, जब मत्री रावण को समझा रहे थे, तव महान्‌ वलगाली एवं प्रलय-काल 
के रद्र को भी परास्त करनेवाले घूर, ब्रह्मस्त, इद्रजीत, शतमाय, दुर्मुख, अतिकाय, मकराक्ष, 
खड्गरोम, वृब्चिकरोम, सर्परोम, अग्निवर्ण, विखरूपाक्ष, अक्षीणवल घूम्राक्ष, अक्षतविजयी 
उपाक्ष, अनुपम वली रश्मिकेतन, अमित पराक्रमी अग्निकेतन, वज्रदष्ट्र, सप्तध्न, जोणिताक्ष, 
प्रवलभूर महापाच्वं, कुभ, निकुभ, सूर्यशत्रूु, अग्निकोपन, महोंदर, देवताओं को जींतनेवाला 
देवातक, अद्वितीय पराक्रमी तथा नरो का नाग करनेवाला एवं भयक्र आकारवाला महाकाय, 
विद्यश्जिद्न, कपन तथा अकपन जादि अभेद्य विक्रमी एवं श्रेष्ठ दैत्यवीर, राक्षस राजा 
रावण के सामने ऋ्रोबाभिभूत होकर खड़े रहें। उनकी लाल-लाल आँखो से क्रोव की भयकर 


खुद्धकाड रथ 
ज्वालाएँ निकल रही थी । प्रलय-काल के प्रचंड प्रभजन से मुक्त, कुलपर्वतो की भाँति वें 
परस्पर देख रहे थे, फ़ुफकारनेवालें सर्पो की भाँति उनकी साँस वेग से चल रही थी । 
वे बडे गवें से शूल उठाते, खड़गो को खीचते, करवालो को आकाज् में घुमाते, लाठियो 
को ऊँचा करते, चक्रो को घुमाते, प्रवल मुद्गरों को सँभालते, दीर्घ खड़गो को दिखाते, 
भालो को घुमाते और घनुष का टकार करते हुए अपने क्रोध को प्रकट कर रहे थे । 
उन्तके इस क्रोघ-प्रदर्शन के समय, उनके करवाल एक दूनरे से टकराकर स्फुलिंग 
उगलते थे, परस्पर उनके केयूर तथा मुकुटो के रगड खाने से मोती विखर जाते थे और 
आभूषण च्ूर-चूर हो जाते थे | वे कोबोन्मत्त हो आकाश को केंपा देनेवाली गभीर ध्वनि 
से रावण से कहने लगे--हे देव, देवता गधवे, देतेय तथा किल्चर आपको देखने का भी 
साहस नहीं करते; इन्द्र भी तो आपको देखकर भय से सिकुड जाता है । तब नर तथा 
वानरों का साहस ही कितना हैं कि वें आपका सामना कर सके ? उस दिन हम कुछ 
आसावधान से रहे, इसलिए उस नीच वानर ने अपनी दुष्टता से आतक फैला दिया था । 
अब हमारे सामने किसकी शक्ति हैँ कि लका में प्रवेश करने का साहस करें । हे दानव- 
नाथ, इतना क्यो, आप हमें शीघत्ष आदेश दीजिए । हम तुरत जाकर उन वानरों का नामों- 
निशान मिटा देंगे और राजकुमारों का सहार करके वापस आयेंगे । 


झ, राक्षसवीरों को विसीषण का उपदेश 


इस प्रकार की दुर्वार गरवोक्तियाँ कहनेवाले राक्षगों को देखकर विभीषण, समस्त 
इन्द्रियों को अपने वश में किये हुए योगीनद्र की भाँति, गरजनेवाले उदण्ड मेंघो को गात 
रखनेवाले इन्द्र की भाँति उन सब को अपने-अपने आसनो पर बैठ जाने का आदेश देकर 
बोला--हे वीरो, तुम उत्तावले मत वनों । किचित्‌ विचार करके देखो । किसी भी कार्य 
को साधने के लिए पहले साम, दान, तथा भेद के उपायो का आश्रय लेना चाहिए । यदि 
उनसे कार्य सिद्ध न हो, तभी दण्ड-विधान का आश्रय लेना पडता हैं । पहले ही. दण्ड- 
नीति को अपनाना नीति-विरुद्ध है । शत्रु के असावधान रहते समय ही, उसको जीतना 
सुलभ है, या उस समय उसको जीता जा सकता है, जब कोई अन्य झात्रु उस पर आक्रमण 
करते आता है और वह भगवान्‌ की कृपा से वचित रहता है । राम कभी असावधान 
नहीं रहते, उनका पराक्रम दुर्वार है, उत्त पर कोई आक्रमण करने नहीं आता । और तो 
और, वे स्वय भगवान्‌ हे । शिव-धनुष का भग उन्ही ने तो किया था ? वें परम विवेकी हे, 
अनुपम बाहुबल-सपन्न, तथा विजयी है । तुम चाहे जितना भी डीग हाँको, उस सूर्यकुल- 
तिलक को जीतना क्‍या, तुम्हारे लिए सभव हैँ ? उस वायुपुत्र की शवित का किचित्त्‌ 
विचार करो, जिसने विशाल समुद्र को एक छोटी नहर की भाँति पार कर लिया हैं । 
तुम नही जानते कि उससे तुम्हारे देखते-देखते लका में कैसा उत्पात मचा दिया ? उस 
वानर ने राम की सेना के शौर्य का आभासमात्र दिखाया हैं | ऐसे अनेक वानर थौर 
उनसे भी अधिक शवितिश्ाली असंख्य वानर उनकी (राम की) सेवा में हूँ ॥ तुम लोग 
राम के पराक्रम के आगे कैसे टिक सकते हो ? हे दानववीरों, ऋ्रोबोन्मत्त हो अपने तथा 
दूसरों के बल का अनुमान किये विना, ऐसे वचन कहना क्या बृद्धिमानी हैं ? सुदरियों में 

श्र 


स्श्ट रंग्नाथ रायायरी 


श्रेप्ट सुदरी राम की पत्नी सीता जब भयभीत होकर रामचन्द्र को पुकारने लगी, तंव॑ 
राक्षसेब्बर अत्यत वेग से उन्हें उठा लाये । हम स्वयं सोचें, उन्होने हमें कौन-सी हानि पहुँचाई है ? 
तुम लोग इस वात का तो विचार करते हो कि उन्होंने खरूद्ृपण आदि राक्षसो 
को खड-खड कर दिया, किन्तु तुम यह नहीं सोंचतें कि पहले उन राक्षसों ने ही उनको 
घेरा था | क्या, राम-लक्ष्मण पर आक्रमण करना उनको उचित था ? अपने किये हुए 
कर्मों के फल भोगकर वे नप्ट हो गये और अमर-लोक को प्राप्त हों गये । अब उनकी 
चिंता क्यो करें ? हमारी भलाई इसी में हैं कि वीर वानरो के लका में प्रविष्ट होने के 
पहले, हमारे दुर्गों के उनके पदाघात से नष्ठ होने के पहले ही, सोमित्र के वाण-छूपी वज्च 
के गिरने के पहले, रामचन्द्र के क्रोध से उत्तेजित होने के पहले ही और उनकी क्रोधारिति 
से लका के भस्म होने के पहले ही, हम सीता को श्रीरामचन्द्र के पास पहुँचा दें ! 
सीता को ले आने के दोष का यही परिहार हैं| राम-भूपाल धर्मात्मा हैँ और धर्म की 
सदा विजय होती हैं ॥” 

इस प्रकार विभीषण ने कई प्रकार से राक्षसवीरों को समझाया और फिर दग्मकठ 
को देखकर कहा--हे प्रभु, दुर्व्यंयस सुख तथा धर्म में वाधा डालनेवाले होते हे ॥ अतएव 
आप उनका त्याग कीजिए । घधर्म-पालन सुख तथा कीत्ति प्रदान करनेवाला होता है । इसलिए 
आप धर्म के पथ का अनुसरण कीजिए और नीतिज्ञ कहलाइए । हठ छोडिए, और प्रसन्न- 
चित्त होइए । यदि आप अपने समस्त कुल की रक्षा करना चाहते हे, तो जानकी को मुक्त 
कर दीजिए । उस राम से हम झजन्रुता क्यों करें ?! इस प्रकार के नीतियक्त वचन 
सुनना रावण को अप्रिय लगा। इसलिए वह तुरत सभा-भवन छोड़कर अत पुर में चला गया । 


९, रावण को विमीषण का हितोपदेश 


दूसरे दिन प्रातकाल ही विभीषण सध्यावदन आदि प्रातःकाल के नित्य कर्मो से 
निवृत्त होकर अपने रथ पर सवार हो रावण के अत-पुर को चला । उसके चारो ओर 
राक्षत सैनिक उसकी सेवा में चल रहे थे । वह रमणीय तथा चित्र-विचित्र तोरणो से 
अलक्ृृत राज-मार्ग से होकर सुदर बिल्‍पो को देखते हुए रावण के उस अंत पुर के सिंह- 
द्वार पर पहुँचा, जहाँ (अव्वों की) हिनहिनाहट, (गड़ों की) चिघाड, पटह तथा शखो के 
निनाद, सेवा-कार्यों में प्रवृत्त परिचारिकारिजों की पायलो का भकार, अतःपर के रक्षको के 
हुकार, सृत-मागव वदी-जनों की स्वुति, परिचारको के वार्तालाप की घ्वनि, तथा गजों की 
निश्वास-वायु के कारण बडे वेग से फडफडानेवाली पत्माकाओ की ध्वनि, समृद्र की तरगों 
के घोष के समान समस्त दिग्ाओ को वधिर बना रही थी । वह अत पुर विद्वस्त राक्षस- 
वीरो से ऐसा रलित था, मानो नक्षत्रों से परिव्त हो । उस सौध के सिंहद्वार पर असख्य, 
गज-र्ब तथ अछ्वों का समूह था । ऐसे सिहद्धार के निकट विभीषण अपने रथ से उतरा 
और जत'पुर में प्रवेश किया । वहाँ यज्ञ आदि सत्कर्मों से अनुरक्त पुजनीय ब्राह्मणों को 
पुण्याहवाचन तथा चान्तिराठ करते हुए देखा । विभीषण उन्हें देखते हुए बडी प्रीति से 
आगे वेढा और सभा-भवन में पहुँकर अपने अग्रज को अत्वत मवित के साथ प्रणाम किया। 
फिन, रावण क्या आदेश पाकर एक उचित आसन पर बैठा । 


' रुछुकोड र्श्द 


उसके पश्चात्‌ मत्रणा-क्ुशल विभीषण सभी मत्रियों के समक्ष कहने लगा-- हें देव, 
हे दैत्यनाथ, आप ध्यान देकर मेरा निवेदन सुनिए । जिस दिन से आप सीता को ले आये हे, 
उसी दिन से दुशकुन दिखाई देने लगे हे । आजकल होम-कुडो में तेतार्नियाँ प्रदीप्त 
नहीं होती । उन कुडो को घेरकर वहुत-से साँप पडे रहते हें । सतत मदजल वबहानेवाले 
जिन हाथियों के गडस्थल पर भ्रमरों का गुजार होता रहता था, वे मत्तगज आज शुप्क 
शरीरो से, गर्दनो को ऊपर उठाये, चुपचाप खडे रहते हूँ । अत्यधिक शक्ति तथा स्फूर्त्ति 
से सपन्न उत्तम अश्व, आज आँखों से पानी गिराते हुए चारा-पानी छोडकर, शवितिहीन 
हो पडे हुए हैँ । हे असुराधिपति, इन सब के निराकरण का एक ही मा है । आप सीता 
को ले जाकर श्रीराम को सौंप दीजिए । वे आपके अपराध पर ध्यान नहीं देंगे (वे आपको 
क्षमा कर देंगे) । यही नीतिवानू के लिए उचित कार्य है । “यही कार्य उचित हैं, इस 
बात को सब लोग समभते हे, किन्तु आपको इस धर्म का उपदेश देने से वें डरते है । 
में भी विवश होकर ही आपसे निवेदन कर रहा हूँ ॥” 

विभीषण के थे आप्त वचन रावण के कानो में प्रवेश ही नहीं कर पाये । उससे 
कहा--भे किसी से भी किसी भी प्रकार का भय नहीं रखता । चाहे कुछ भी हो जाय, 
में सीता को राम के पास नही भेजूँगा । चाहे देवता भी उसकी सहायता के लिए आ 
जाय, फिर भी युद्ध में मुझ दुर्जयी के सामने वह टिक नहीं सकेगा ।” इस प्रकार कहते 
हुए वह अत्यत क्रोध से सभा-भवन छोडकर भीतर चला गया । 

दूसरे दिन प्रात काल ही उठकर रावण सध्यावदन तथा ध्याव आदि से निवृत्त हुआ 
ओर अपने अनुज के वचनों पर मन-ही-मन विचार करके अपने मत्रियों के साथ उन वबचनो 
के बारे में मत्रणा करने का निश्चय किया। फिर, वह सूर्य-मडल के समान प्रभा से युक्त 

दिव्य विमान पर आरूढ हुआ । उस विमान का स्वर्ण-कलश बहुत-से सुन्दर रत्नों से 

खचित था । उसका ऊँचा छत्र, चद्रिका के फन से विरचित-से अत्यधिक धवल दिखाई पड 
रहा था । सुदरियाँ अपने ककणों को भनभनाती हुई चामर डुला रही थी। असख्य तुरहियां 
बज रही थी और बहुत-सें सैनिक रावण की सेवा में लगे हुए उसका अनुगमन कर रहे थे । 
वेत्रधर-कचुकी, सेवक-समूह को अनुशासत में रखने में तत्पर थे। इस प्रकार, अखड 
वैभव से सुशोभित उस रावण ने अपने सभी मत्रियों के साथ सभा-मडप में इस प्रकार 
प्रवेश किया, मानो यह कह रहा..हो कि सूर्यवणी (राम) के शरो से आहत होने के पश्चात्‌ 
मे सूर्य-बिव में प्रवेश करूँगा । फिर, सिंहासन पर जआरुढ होकर सेनापतियों तथा गुप्तचरो 
को बुलाया । वे भी अपने रथो, गजो तथा अब्चों पर बैठकर तुरहियों के निनादों के साथ 
आये और सभा-मडप के आँगन में पहुंचकर अपने वाहनों पर से उतरकर उस सभा-मडप 
में प्रवेश किया, जैसे सिंह गिरिन्युफा में प्रवेश करते है । फिर, दानवेंद्र से उचित आदर 
प्राप्त करके प्रसन्नचित्त से अपने आसनो पर बैठ गये । 

उचित कार्यो के सबंध में निवेदन करने का अच्छा अवसर जानकर मत्रियों ने 


० 


रावण से निवेदन किया, हे देव, आपके अनुज, प्रचड वलशालो कुभकर्ण आज जागे 
हुए है ।' यह सुनकर रावण ने आदेश दिया कि उसे बुला लाओे । तुरत वे कुमकर्ण के यहाँ 


२६० स्यनाथ रांयायणग 


गये और उनसे कह्ा--हे देव जाज प्रभु, सभा में विराजमान हैँ और आपको बुला लाने 
के लिए हमें भेजा है । ब्ह आदेग युतकर कुंसकर्ण अपने पुत्र कुंभ तथा निकुंभ के साथ 
आीक्ष समान्मव्य में पहुँचा । मणिमय, महिमा-समन्वित्त तथा नत्तेकियों के संगीत की मधुर 
ध्वनि से संपन्न उसने समा-मध्य में सिहासनस्थ अपने अग्रज को उसने प्रणाम किया और 
बड़ी नम्नता से एक उन्नत आसन पर बैठ गषा । अपने भाई के साथ ही विभीषण भी जा 
गया और स्वर्ण के जासन पर उपविप्ट हुआ । तव रावण सुरेश (इंद्र) के समान प्रभाव 
उत्पन्न करते हुए प्रहस्त को देखकर बोला--लका नगर की रक्षा के लिए और भी वधिक 
सैनिको को नियुक्त करों; सभी मार्यों में किले के दारो पर, भीतर तथा वाहर, राक्षस- 
वीरो को जावबान रहने की चेताव्ी देकर नियुक्त करो ।' 
१०. कुमकर्ण को सीतापहरण का वृत्तांत चुनाना 


उसके पच्चान्‌ दानवेब्बर कुभकर्ण को देखकर अत्यधिक व्यग्रता से कहने लगा-- 


“हैं कुमकर्ण, में तुम्हें एक ऐसी वात सूनाता हूँ जिसे तुमने जबतक नहीं सुना होगा । में एक 
दिन जनपद में गया और वहाँ राम की पत्नी, भूमिनसुता कमलाक्षी सीता पर मुग्ध होकर 


उसे यहाँ ले जाया । छुछ दिन पहले हनुमान्‌ नामक एक वानर यहाँ जाया बौर सीता 
से मिलकर उसे प्रणाम किया कौर कहा--हें देवी, आपके पति राम यहाँ अवश्य आयेंगे। 
सीता उन वातों पर विव्वास किये बैठी है | वह मानव (राम) अत्यधिक साहस के साथ 
समद्र के उस पार जिविर डाले पढा हुआ हैं । वह जपने साथ, वनों में पाये जावेवाले 
वातरो की एक्त वदी सेना एकत्र करके लाया हैं। जीत्र मुभसे युद्ध करके सीता कों 
ले जाने के निमित्त वह आजा रहा है | वह भले ही यहाँ जावे । मेने इन्द्र आदि देवताओं 
को परास्त किया हैँ । जिस कैलास पवत पर शिव रहते है, उसे मेने उठाया हैं। भअभु से 
मेने चद्रहाल (नामक खड़ग) प्राप्त कया है । कमलसभव ब्रह्मा का वर मे प्राप्त हैं । 
तिम पर मुझे तुम्हारी चक्तित की सहायता श्त हैँ | तठ, क्या एक साधारण मानव मुझे 
परास्त कर सकता हैं ? राम केसे मुझे बुद्ध में जीत सकेगा, और कंसे उस सुदरी को 
यहाँ से लें जा सकेगा ?” 

इन बातों को सुनकर कुमकर्ण ने क्रोव में जाकर सव लोगो के समक्ष रावण से 
कहा--हि रावण, नत्यम क्यो घोड़ा देकर, उनकी पत्नी को इतनी कूरता के साथ तुम कैसे 
लाये ? ब्या इस प्रकार उसे ले आना उचित था ? तुमने अपने मत में नीति का विचार 
ही नहीं किया । धर्म-मार्ग का स्मरण ही नहीं किया । काम के पीछे तुमने सारे कुल को 
क्लंक्ति किया । जिस दिन तुम सीता को ले आये, उसी दिन लंका का सर्वनाण हो गया ? 
इसका नाथ तो अद निच्चित ही हैँ, चाहें कैसे भी हो । तुम उस सूर्यव्यज राम के अप्रति- 
हते बाशों का लक्ष्य हुए विना अपने भाग्य से वचकर चलने आये, यही वडी गनीमत है । 
अब में जाता हूँ । है रावण, इतना बड़ा कार्य सेमालने का भार मुझ पर पडा हैं | अब 
नुम वानर तथा राघठो का किचित्‌ भी भव किये विना रख शोगतें रहो ॥! 

इन बातो को सुनकर महापान्व ने कहा--हें राक्षसाशग, आप तो समस्त लोकों 
के अधिपति हे । क्य झाप कीता के साथ बलपूर्वक सति-त्रीडा नहीं कर सकते ?” यह 


खुछ्धकांड रद? 


सुनकर मन-ही-मन अत्यत प्रसन्न होते हुए राक्षसराज ने कहा--हे महापाझ्व, सुनो । 
एक वार में ब्रह्मा की सभा में जाते समय पुजिकस्थली नामक एक सुदरी को देखकर उस 
पर मुग्ध हुआ और वानना से प्रेरित होकर वलपुर्वेक उसके साथ रति-क्रीदा की । यह 
वात जानकर ब्रह्मा मुझ पर क्ुद्ध हुए और ज्ञाप दिया कि हे राक्षस, स्त्रियों के प्रति आदर 
दिखाये विना, अनुचित रीति से यदि तुम भविष्य में किसी भी स्त्री के साथ वलातू रति- 
क्रीडा करोगे, तो अवश्य तुम्हारे सिर के सौ टुकडे हो जायेंगे । यही कारण हे कि में 
किसी भी स्त्री की स्वीकृति प्राप्त किये बिना उसके साथ बलात्कार नहीं करता । मेरी 
जवक्ति का विचार किये विना वानर-सेना के साथ राम का लका पर चढ आना उसी 
प्रकार है, जैसे भद्रगजों के समूह का सोनेवाले सिंह को जगाना ।' 


तब विभीषण ने हँसकर रावण से विनयपूर्वक निवेदन किया--हें भाई, तुम्हारे 
लिए सीता एक भयकर कालसपिंणी है । उनकी उसासें ही (नागिव का) एफकार हैं 
और उनका दुख ही गरल है ।! वह (काली नाग्रित) किसी भी प्रकार तुम्हें नही छोडेंगी। 
इस कार्य से तुम्हें अपयश मिलेगा, पाप होगा, और तुम्हारा सुख नप्ट हो जायगा । 
इसलिए इस अनीति को तुम छोड दो ।” उसके पश्चात्‌ प्रहस्त को देखकर विभीषण ने 
प्रखर वाणी से कहा--“आज तुम क्यो इतना इतरा- रहे हो?” जिस दिन राम के वज्- 
जैसे वाण तुम्हारे वक्ष में गडेंगे, उस दिन तुम जानोंगे, परुष वचन कहना ती असान हैँ । 
क्या यह कुभकर्ण, यह निकुभ, यह कुम, यह महोदर, यह महापार्व, यह इन्द्रजीत युद्ध में 
राम को जीत सकेंगे ? युद्ध में वे भी अपनी शक्ति दिखायेंगे ही, युद्ध में तुम सभी रक्षक 
होकर रावण की रक्षा में तत्पर रहना । एक वात स्मरण रपो, चाहे इन्द्र ही रावण की 
रक्षा करें, देवता ही उनको बचाने का प्रयत्न करें, कालाग्ति-सम भयकर रुद्र ही उनकी 
रक्षा करने आवें, यहाँ तक कि मृत्यु ही स्वय उन्हें बचाना चाहे, तो भी रामचद्र रावण 
का सहार किये विना नहीं रहेंगे । जब मनृकुल-तिलक दनुजेब्वर को जीतने के लिए 
धनुष हाथ में धारण करे, तो क्या, हम उनकी शक्ति का सामना कर सकते है ? प्रलय-काल 
की अग्नि कही मुट्ठी में समा सकती है ? उमडनेवाली जलराशि क्या, छोटेन्से मुह में 
समा सकती है ? क्या, पाताल को अपने ज्ञोड के भीतर सीमित कर सकते हैं ? क्‍या, 
गगन को पार करना सभव है ? क्या दिड्मडल के वितान को तोडना सभव है ? वया, 
शिवजी के करवाल को खड-खड करना सहज हूँ ? क्या, सूर्य को हथेली से ढक सकते हूँ? 
तुम जैसे अज्ञान लोगो से बात करना भी वृथा है । तुम्हारे जैसे मत्रियों के रहते मूर्स 
तथा कामातुर रावण मरेंगे क्यो नहीं ? क्‍या, वे मेरें हित वचनों को सुनेंगे ? वे मदाघ 
होकर तुम्हारी मन्रणा से अवश्य ही नप्ट होगे।” इस प्रकार, सौजन्य का विचार किये 
विना जब विभीषण ने स्पप्ट बचन कहे, तो प्रहस्त ने उसकी बातो की उपेक्षा करते हुए 
कहा---हम उरगो से युद्ध करके कभी परास्त नहीं हुए । सुरों से भिटकर भी हम कभी 
नही हारे । यक्षो का सामना करके हम कभी विजित नहीं हुए । राक्षसों से जूककर हम 
सतप्त नहीं हुए । हे विभीषण, तव क्‍या, मानवमात्र राम सें, यद्र में हम हार जायेंगे ? 
न. जाने, उनके सबंध में तुम इतनी वातें कैसे जान पाये ? आज पहले-पहल हम तुम्हारे 


2» /ज# 


र्द्टर रंयनाएथ एरायावण 


 > +>_-+ ० न्न्ज्ऊे 5 दया, तम्‌ समभ्मोे 5५ राक्षस 
हु से ऐसी विचित्र बातें सन रहे है । क्या, तुम समझते हो कि राक्षस उतने शक्ति 


११ इन्द्रजीत का विमीषण को अपने पराक्रम का परिचय देना 


[ 


रामानज की वागाग्नि से दूव होना इचख्जीत के भाग्य में लिखा हुआ था | इनलिए 
वह अत्यधिक मद से उन्नत्त हा क्सी भी प्रकार की नीति का खयाल किये ब्निा कृहन 
) ९ सिम. 


ने बाक्ति तथा प्रताप का डिचार करके देखों, तो 
लगा--- हि विभी०्ण सनों । राकयों की शक्ति तथा प्रताप का व्चिार करक दंखें, तो यह 


निच्चप है क्न्न्ह्न्म से अल्परशक्तिमान्‌ भी राम तथ्य लक्ष्मण को जीत सकता हैं। तीनो 


्ल्जाा प्र बल की राज्य करने वाले न्त निकल क्या मन पन्‍्डकर बंदी नद्ठी बनाया 
दाक्षा पर उड़ वमव से राज्य करनवाल इन्द्र का क्या रूस पतक्त्डकक्र वबदा चटा वन ? 
उसके छेनावत ज्ल््ञ्ञः दाँत तन नही तोड़े नम सब कि कौन ड्ज्च, बात पे 
उसक छुनलावत का पक्कन्‌ उसक दांत मन नहा ताड़ ? ये सब मेरे लिए कान वहां बात था ? 


मेने अन्ति को अपमानित किया; वम को दवा विया, नऋत की अक्ति को नप्द 


कल््न्लजज तथा व्म्पा >> पराल्त फ्यिा दिक्यालो 0. 

किया तथ्य व्तण को परास्त क्या । दिक्‍यालो को इस प्रकार निष्ठुर होकर चास देनवालें 
नेरें प्रतलल हाथो हे क्या, ये मानक नप्ट नहीं होगे ? तुम तो वहुत वढा-चढाकर उनको 
नहा जन > 3» लीन जणन-> बलाप न्ज्््ऊ 

हि का राय बल न्ह्दहां विर भमापयण, सप्तद समद्रा मे प्रविष्ट होकर मे उन्हे 


जालोटित कहुगा; मेर तथा मंदर पर्दों को नचा दूया; समस्त पथ्वी को लाँध जाउया, 


इस पृथ्वी को ऐसे उछालूगा कि वह जाकर आक्ाभ से ठदकरा जाबगी, में समत्त लोको 
को भुका दया, सारे वनचर समूह को इस प्रकार समुद्र में दुदो दूँगा कि वे थस्-थर 
काँप उठेंगे; पृथ्ठी क्या भार वहन करनेवाले उस जेष नाग को पकंडकक्‍र, उसका विष 
निच्रोड दूंगा । अपने भुज-ठल से साय तथा चद्र को पकडक्‍र उन्हें पृथ्वी पर रगड़ दूगा। 
उन र-म्मृह को पम्डक्र उन्हें नूये तथ्य दिभाओं के उस पार फेंक दूगा; युद्ध मे वाचरा 
का रक़द भूतो को पिलाउँगा, अप्ने भऋस््समूह से आकाण, दिच्याएँ तथा पृथ्वी को ढक 
दूगा। सूर्य के स्व का जुआ पक्‍डकर व्काज्म में घ॒माऊँगा और उसे पृथ्वी में दवा दूंगा। 
कपने दायें कौर वायें हाथो में पृथ्वी तथा जाकान को ग्रहण कर उनको ऐसा मसल दूँगा 
कि वे चूस्चूर हो जाये । हे विभीषण, तुम दनुजेब्चर के भाई हों; इसलिए में तुम्हें कुछ 
कहे ब्ना क्षमा रुता हें । यदि कोई होता, तो में क्दापि ऐसी बातें नहीं सहता। 
ऐसी व्यर्थ की बातें क्यों करते हो ? ! 


१२. विभीपण द्वारा इन्द्रजीत के दंम की निंदा 
इन दर्मपूर्ण वचनों को नूनक्र व्मीपण अत्यत बुद्ध हुला और इद्रजीत को देखकर 
इस छ्रक्यर कहने लगा-- तुमने नसूर्ववंधन राम को क्या समझ रखा हैं कि ऐसे मात्सबें- 
युक्ष अनुचित उचन कट रहे हो? तुम्हारे हायोंसे पराजित होने के लिए वें इन्द्र नहीं हैं; 


अयंक्र _. ० सम्हार परास्त न. अं» + लिए 5 अन्निः जया, 
व दा युद्ध नवक्र वनदवाल राम हू । तुम्हादर द्वारा परास्त हांव के लिए वं अच्चि- 
>> नही 3. -+ _-5. नणनीति: ..?. 75. कच्ल राम हि. >> सलजन्‍ > >> >> यम नहीं फल 
देव नहीं हैं; वे तो रुणनीति-त्ुच्ाल राम हूँ । तुमसे हार जाने के लिए वे बम नहीं हैं, 


वे तो रण में अचगड रूप थारण करनेवाले राम हे । तुमसे परास्त होने के लिए, वे नैन्ट्त 
द्रव में भयोत्यादक रूप थारग करनेवाले राम है । तुम्हारे द्वारा विजित 
लिए ठे वर्ण नहीं हे; वें तो रुण में अत्यविक सावधान रहनेवालें राम 
जाने वे बद्धननिपुण राम है । तुमसे परास्त होने वाले कवेर नहीं हें; 


्> हि 


न 
न्प 
/भौाश 
मि ९ । है। 


खुछुकोड शक 
व तो युद्ध में वत्नसम शत्रुओं का नाश करनेवाले राम है । तुम्हारे हाथो से पराजित होने 
के लिए वे पशुपत्ति नहीं है, वें तो रण में अवश्य विजय प्राप्त करनेवाले रामचद्र है ) युद्ध 
में उनका सामना करना इतना सहज मत समझो, जितना दिक्‍्पालो का सामना करना है । मदाघ 
होकर असभव कार्यो को साधने का विचार करोगे, तो मुह वी खाकर गिरोगे । तुम पृत्र नहीं हो, 
कुलनाशक हो । तुमही रावण के घत्रु हो। रामचन्द्र के अग्निसम वाणों के प्रह्मर के सामने 
क्या रावण टिक सकता है?” उचित यही है कि रावण मणियों, गज-मणियों तथा अब्ब-मणिणोें 
साथ उस मानिनी-मणि (सीता) को रामचन्द्र के पास पहुँचा दे । 


१३ रावण का विमीषण को नगर से निर्वासित करना 

तव रावण ने विभीपषण को रोषवूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा--भत्रु के साथ भी 
सतत (युद्ध करते हुए) रह सकते हे, विष उगलनेवाले सर्प के साथ भी निर्भय होकर 
रह सकते हे, किन्तु शत्रु से मिले हुए पर अपना बनकर रहनेवाले लोगो के साथ जीवन 
विताना कठिन है । तुम ऐसे ही व्यक्ति हो । इसीलिए मेरे सामने तुम बडे गर्व से अत्रु 
की प्रणसा करते रहते हो । तुम मेरे अनुज हो, इसलिए अवध्य हो ? (त्रोब से) क्या, 
तुम सचमृच मेरे अनुज हो ? तुम तो मेरे ज्ञाति (गोतिया) हो ।' 

कुभकर्ण ने देखा कि ब्रह्मा का शाप प्रवल है, (अर्थात्‌, रावण का अत निश्चित है), 
न तो वह अपने अनुज की बातो को अनुचित कह सका, न अपने अग्नज को अनुचित 
कहने से रोक ही सका । इसलिए वह बड़े आदर के साथ अपने अग्रज को प्रणाम करके 
सोने के लिए अपनी गुफा में चला गया । उसके चले जाने के परचात्‌ विभीषण ने रावण 
को देखकर कहा--हे भाई, तुम मेरे अग्रज हो, इसलिए तुम पर आनेवाली विपत्ति की 
कल्पना से भयभीत होकर मेने तुमको उचित परामर्श दिया है । हे भसुरेन्द्र, आप्त बबुओ 
के हित-वचन तुमको बुरे लगते हे । ऐसे मत्री वहत कम होगे, जो अच्छा परामर्श देते हूँ 
और ऐसे राजा भी बहुत कम होगे, जो उन बचनो को सुनने हे । मेरा धर्म है कि में 
आपके हित का विचार करके उचित परामझ दू” और आपका धर्म है कि आप उसे स्वीकार 
करें । सीता को लौटा देना तुम्हारे लिए नीतिसगत होगा । यदि ईइवर स्वय प्रतिकूल हो, 
तो शवित तथा पराक्रम आदि किस काम आयेंगे ? दशरथ के पुत्र स्वयं ईइवर है, भला 
उनके अतिरिक्त और कोई ईश्वर भी है ?' 

विभीपषण के इन वचनों को सुनकर रावण की भौंहें तन गई, मुख विक्ृत हो उठा, ऋोष 
के कारण माँखों से अग्नि निकलने लगी और होठ फडकने लगे । उसने गरजकर कहा-- 
तुम मेरे सम्मुख राम को ईश्वर कहते हो ? एक साधारण मानव कही ईश्वर हो सकता हैं ? 
अविवेवी पिता के द्वारा राज से निर्वासित होकर, वनों में भठकते हुए कद-मल तथा 
पत्तों पर जीवन व्यतीत करनेवाले को कही ईश्वर कहते है । यदि वह ईश्वर होता, तो 
जब में उसकी पत्नी को चुराकर लाया, तभी वह मुभ, पर आक्रमण करता । इसके विपरीत, 
वह जप भाई के साथ जंगलों में रोतने-कलपते फिरता रहा और भदवकर संगीव नाम 
एक वानर के आज्षम में रह रहा हैं । क्‍या, यह सव ईश्वर वो ढंग है” एक कायर 


बज 


मानव को मेरे समान कहकर, क्यो वान्न्वार मेरे सामने उसकी प्रशसा करने हो ? 


९६० रंगनाथ रएयायणग 

तब विभीण्ण ने मन-ही-मन हँसते हुए रावण से कहा-- है राक्षसाघीश, देवताओं 
की वृद्धि करने, ऋषियों की रक्षा करने, तथा असुरो को दंड देकर पृथ्वी का पालन करने 
के लिए आदिनारायण ने सूर्यवश् में दशरथ का पूत्र होकर जन्म लिया हैं । उस महा 
महिमा-सपन्न आदि देव की महिमा का वर्णन ब्रह्मा भी नहीं कर सकता। सनकादि मुनि 
भी उसका वखान नहीं कर सकते । भला, तुम उनकी महिमा कंसे जान सकोगे । राम 
साधारण मानव नहीं हैँ | इसलिए यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो राम के दर्शन 
करके कमलमुखी सीता को उन्हें सॉप दो । विचार करके देखो, अर्थ तथा काम मात्र की 
प्राप्ति से धर्म की सिद्धि नहीं हो सकती । तुम तो कभी नीतिमार्ग का अनुसरण करना 
नहीं चाहते | तुमसे भी अधिक तुम्हारे मित्र तथा अनुयायी उसे नहीं चाहते । हे दानवेन्द्र, 
कार्य तथा अकार्य का विवेक नहीं रखनेवाने तुम्हारे लिए धर्म का क्या मूल्य हो सकता है ? 
वानर अवध्य समुद्र पार करके यहाँ आयेंगे । हाथ जोडकर (दया की भिक्षा माँगनें- 
वाली) राक्षस-स्त्रियों के केश पकइकर उन्हें घसीटेंगे । ऐसा करने के पहले ही तुम सीता 
को रामचन्द्र के पास पहुँचा दो । यही मेरा तुम से अनुरोध है । मे तुम्हें राज करदे हुए 
देखना चाहता हूँ, अग्नि-ज्वालाओं के सदृश राघव के असंख्य शरो को उद्ृण्डता से तुम्हारे 
वक्ष पर लगते हुए में देखना नहीं चाहता । प्रलय-काल की अग्नि किस श्रकार कुलपर्वतों 
के शिखरो को गिरा देती है, वैसे ही राम युद्ध में तुम्हारे सिर गिराने लगेंगे । उस दृश्य 
को में कैसे देख सकूगा ?” 

विभीषण की इन बातों को सुनते ही रावण के दसो मुख क्रोध से लाल हो गये, 
कनपदटी की शिराएँ फूल गईं और प्रचइ गति से निश्वास चलने लगा, मानो धूम से युक्त 
अनल ही हो । अपने पदाघात से पृथ्वी को चूर-चूर करते हुए, तथा गर्जन से आकाग 
को कॉपाते हुए, अपने कोच का पूर्ण स्वरूप प्रकट करते हुए तुरत वह सिंहासन से उतरकर 
विभीषण की ओर लपका और उस पर प्रहार करने के लिए अपना खड़ग उठाया। फिर, 
अपने-आप को रोककर उसने विभीषण पर पदाघात किया । तब वज्मपात से गिरनेवाले परत के 
उन्नत शिखर के समाव विभीषण पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरे हुए विभीषण पर जब रावण 
खडग का प्रह्मार करने का उपक्रम करने लगा, तब प्रहस्त ने उसे रोका | सभा के सभी 
लोग कहने लगें---हाय, यह कैसा अनर्थ हैं ?” 

रावण की आँखों से क्रोव की ज्वालाएँ निकल रही थी । उसने प्रहस्त को देखकर 

कहा--हैं प्रहस्त, तुमने इसके दुर्वेचन सुने ? इसे अनृज मानकर इस पर कौन विश्वास कर 

सकता हैँ । इसको तुरत वाहर निकालों । सौजन्य के कारण विलब करो, तो मेरी सौगघ है।' 

तव प्रहस्त ने क्रोध प्रकट करते हुए विभीषण को देखकर कहा--'अब तुम यहाँ मत 
रही । यहाँ से तुम अपनी इच्छा से कही भी जाकर रहो | तव विभीषण अत्यधिक कुछ 
हुआ । उसने अनल, नल, हर, सपाति नामक अपने साथियो को साथ लेकर हाथ में गदा 
लिये हुए वहाँ से चल पद्धा और चलने समय उसणे रावण को देसकर कहा-- है राकषसेन्द्र 
तुम कामातुर हो, समस्त पापों का भाञर हो और क्र कर्म करनेवाले हो । में पहने से 
स हाँ तुम से दर रहना चाहता था | तुम्हारा बह जाचरण मेरे लिए नया नहीं हैँ । 


रे 4 व 

चखु्छ्काड २६५ 
में उस आर्त्त-रक्षक, कृपानिधि, दिव्य मूत्तिं, जगट्विख्यात, सत्यनिष्ठ, नित्य यशोनिधि और निर्मलात्मा 
रामचन्द्र भूपाल की शरण में जाऊँगा । वे सदा अरणागत की रक्षा करते है । में तो जा 
ही रहा हूँ । कम-से-कम भविष्य में तुम नीतिसपन्न होकर अपना जीवन व्यतीत करना । 
ऐसा नहीं करोगे, तो जब सुग्रीव लका पर॑ आक्रमण करेगा, तब तुम्हें मेरे हित-वचन का 
स्मरण होगा; या जब वानर लका को घेर लेंगे, तव तुम मेरी मत्रणा का स्मरण करोगे, 
या रघुराम के भयकर बाण तुम्हारा नाश करने लगेंगे, तब तो अवद्य मेरी वानो को याद 
करोगे ।॥' 

0. जाना 
१४. विधभीषण का अपनी माता के मवन में जाना 


ऐसा कहकर विभीषण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और बडे वेग से अपनी 
माता के अतपुर की ओर चला । वह क्रूद्ध सिंह के आत्रमण से आहत होकर, उससे 
बचकर जानेवाले मत्त हाथी के समान तथा भयकर रव के साथ गिरनेवाले वज्ञपात से 
खडित पर्वत के समान दीखते हुए अपनी माता के घर में पहुँचा। वह अत पुर विश्वकर्मा 
से निर्मित था और कैलास पर्वत के सदृश शोभायमान था। अत पुर में पहुँचकर विभीषण ने 
'अपनी माता को प्रणाम किया, जो अत्यत निर्मल प्रभा से दीप्तिमानू थी; पर रावण की 
दुष्टता का स्मरण करके अत्यधिक दुखित हो रही थीं। वह रवेत तथा मोटे वस्त्र धारण 
किये हुए थी । उसकी भौहें तथा केश, चद्रिका में घुलकर, आकाश-गगा के काग का रोगन 
चढाये हुए के समान अत्यधिक घवल दिखाई पडते थे और दर्णको में आदर का भाव 
उत्पन्न करते थे । सहारा लेकर चलने के लिए उनके हाथ में एक डडा था । असख्य वृद्ध 
ब्राह्मण, उनके समीप उनकी' सेवा में लगे हुए थे । करुणा-रूपी जल-प्रवाह सरसः वाग्विलास- 
रूपी लहरें, शम तथा दम-रूपी दोनो तट, घवल कंश-रूपी काग, निकटवर्त्ती ब्राह्मणों के 
वेदोच्चारण की ध्वनि-रपी जल-घोष असख्य श्रेष्ठ ब्राह्मण-स्पी पक्षियों के साथ विलसित 
होती हुई वह वृद्धा जाक्लनवी के समान दीख रही थी । उसके निकट (बैठे हुए) कितने 
ही ब्रह्मराक्षस वेदनयुूराण तथा शास्त्र आदि पढकर उसे सुना रहे थे । 
अपनी' वृद्धा माता को प्रणाम करके विभीषण आँखों में आँसू भरकर खडा रहा । 
उसे इस प्रकार दुखी देसकर माता कैकसी सञ्नमित हुई और बडे स्वेह से उसे अपने क्रोड 
में भरकर बार-बार फहने लगी--है वत्स, तुम इस प्रकार दुली क्यों हो ? क्‍या अत पुर पर 
कोई ऐसी विपत्ति आई है, जिश्षका निवारण करना कठिन हैं ? या किसी ब्राह्मण का वध 
हो चुका है ? या ब्रह्मा ने क्रोच किया है ? या जिव रुप्ट हो गये है ? या विष्णु कुद्ध 
हो गये है ” या रामचन्द्रजी लका पर चढ आये है ? श्ञीघत्र बताओ कि तुम्हारे दुम का व्या 
कारण है, अन्यथा मेरे प्राण मेरे गरीर में नहीं रह सकेंगे ।' 
तब विभीषण ने हाथ जोठकर कहा--हें माता, सुनिए। आज आपका ज्येप्ठ पुत्र, 
रविकुलाधीश राम के समुद्र-त्तट पर पहुँचने को सवध में अपने मत्रियो के साथ परामर्श 
कर रहे थे। तब मेने उनसे सायह निवेदन किया कि किसी भी प्रकार से सोचा जाय, उत्तम यही हूँ 
कि सीता को राम की सेवा में पहुँचा दिया जाय । यदि हम ऐसा न बरें, तो अवध्य 
ही राघव समुद्र पार करके आयेंगे और हमारे कुल का नान करेंगे । एस पर रावण अच्ति 
३४ 


२६६ एंगनाये एयॉयम 
समान जल उठे और मृझ पर ऐसा पदाघात किया कि आसन के साथ में पृथ्वी पर गिर 
पडा । इतने से सतुष्ट न होकर उन्होने मुझपर खड़्ग चलाना भी चाहा। किन्तु, में किसी 
तरह वहाँ से बचकर यहाँ आ गया हूँ । अब में उसी राम भूपाल की शरण में जाऊँगा 
और उनकी कृपा प्राप्त करके वही रहँगा । अब यहाँ पर मेरे आप्त वंधु और कौन हू 
कि में यहाँ रहें । 

इन बातो को सुनकर कैकसी भय से मूच्छित हो गई और थोडी देर के बाद सँभल- 
कर अपने पुत्र से कहने लगी--“हे वत्स, में पूर्व से ही यह वात जानती हूं । जिस समर्य 
देवता, देवेन्द्र तथा ब्रह्मा ने अमृत सागर के निकट पहुँचकर भगवान्‌ विष्णु को अपनी 
विपत्तियो का वृत्तात सुनाया, तब उन्होने कहा बडी निर्दयता से तुम्हें त्रास देनेवाले 
क्रूर रावण तथा कुभकर्ण का वध करने के लिए में सूर्यवञ् में जन्म लूंगा ।' तुम्हारे पिता 
ने यह वृत्तात म्‌भे विस्तार से सुनाया था । तब मेने भयभीत होकर अपने पति से पूछा-- 
है देव, आपके पुत्रों में कौन ऐसा पृण्यवान्‌ है, जो आपके व का उद्धार करेंगा ? तब 
उन्होने कहा--सत्य, धर्म, तथा पवित्रता से सपन्न, नित्य यशस्वी तुम्हारा कनिप्ठ पुत्र ही 
राम की कृपा प्राप्त करके इस लका का पालन करेगा । इस प्रकार, कहकर तुम्हारे पिता 
तपस्या करते के निमित्त मर पर्वेत पर चले गये। हे पुत्र, सूयंवगतिलक राम ही विष्णु हें , 
मानिनी सीता ही महालक्ष्मी है । क्‍या, तुम्हारे पिता विश्ववस्‌ की बात मिथ्या हो 
सकती हैं ? तुम अवधच्य राम की जरण में रहते हुए सुखी रहो और राक्षस-कुल को 
बचाने का प्रयत्न करो ॥” 

इतना कहकर उसने अपने पुत्र को आश्ञीर्वाद दिया और उसे मत्राक्षत देकर विंदा 
किया । विभीषण ने भी अपनी माता को वास्वार प्रणाम किया, और मक-ही-मन प्रसन्न 
होते हुए, अपने मत्रियों के साथ आकाश की ओर इस प्रकार उडा, मानों यह बता रहा हो 
कि रावण के पच-प्राण उसका गरीर छोडकर इसी प्रकार उड जायेंगे । उस गुणनिधि 
विभीषण को देखकर लका के लोग अपने-अपने आऑँगनो में तथा गलियों में एकत्र होकर 
आपस में कहने लगे--रावण ने घर्म का त्याग करके, भाई के प्रेम को भी ठुकराकर, 
विभीषण को निर्वासित किया हैँ । नीति-रीति तथा कुशलता को उसने तिलाजलि दे दी है। 
रावण का नाथ तो होगा हीं, अब लका की क्‍या दज्ञा होगी ?! कुछ लोग मन-हीं-मन 
सोचने लगे कि विभीषण ही अब लका का राजा होगा । कुछ अन्य यह सोचने लगे, क्‍या 
विभीषण के झाम से मिल जाने मात्र से रावण का नाझ हो सकेगा ? ऐसे भी लोग थे, 
जो सोच रहे थे कि भले ही यह (विभीषण) राम के पास जाय, क्‍या राम इसका विद्वास 
करेंगे ? 

१४५ विम्नीषण को शरणागति 


विभीषण अपने मत्रियों के साथ बडे हर्ष से, आकाझश-मार्ग से, रामचन्द्र के निकट 
आ रहा था । तब सभी वानरो ने अत्यत आज्चर्य से उसकी ओर अपने सिर ऐसे उठाये 


कक 


मानो वें देवताओं को यह बता रहें हो कि हे देवताओं, रामचन्द्र [रावण पर) आक्रमण 
करने जा रहे है , परन्तु रावण अब अपने सिर नहीं उठा सकेगा, उसका कुल नप्ट होगा । 


खुद्धेकीड २६७ 


तुम लोग भय को त्यागकर अपने सिर उठाओ । तब सुग्रीव ने उन्हें देखकर कहा--हें 
वानरों, वह देखों, कोई अखड विक्रमी पर्वताकार, दीर्घकाय, शस्त्रों से सुसज्जित होकर 
इसी ओर आ रहा हैँ | देखो, वह कौन है ? तब सभी वानर बडें-बछे वृक्षों तथा पर्वतो 
को हाथ में उठाकर कहने लगे--हे सुग्रीव, हे देव, हमें उससे युद्ध करने के लिए भेजिए; 
हम युद्ध में उस दैत्य का सहार करेंगे ।! 


रू 


उनकी बातें सुनकर विभीषण ने कहा--हे वानरो, में तुम्हारे पक्ष का ही व्यवित हूं 
इस प्रकार उतावले मत बनों । में रावण का भाई हूँ, किन्तु में उत्तम शक्षस तथा 
निष्कलक मन का हूँ । श्रीराम की शरण पाने के निमित्त में लका से यहाँ उनकी सेवा 
में आया हूँ । मेने रावण को विविध रीति से समझाया कि तुम सीताजी को राम की 
सेवा में पहुँचा दो, किन्तु रावण ने मेरी बातो से क्रुद्ध होकर भरी सभा में मुझ पर पद- 
प्रहार किया । उससे सतुप्ट न होकर उसने निर्दय होकर मुभासे कहा कि यदि तुम मेरे 
राज्य में रहोगे, तो में तुम्हारा वध कर दूगा, इसलिए मे रामचन्द्र के दर्नार्थ आया हूँ। 
में कपटी नहीं हूँ । मेरे मन में कोई पाप नहीं है । में भयभीत होकर आया हूँ । अतः 
तुम लोग मुभो राम भूपाल की शरण दिला दो ।' 

तब सुश्रीव राम के दर्शनार्थे गया और बडे विनय से उनसे निवेदन किया--हैं 
देव, रावण से कुद्ध होकर, उससे वैर ठानकर एक राक्षस आया है । अपने बधघुओ के साथ 
वह आकाण-मार्ग में ठहरा हुआ है और अपना मन आप पर लगाये हुए है । कहता है कि 
में रावण का भाई हूँ । वह मिष्टभाषी है और प्रार्थना कर रहा है कि, हे सूर्यवशतिलक, 
मुभे अभयदान दीजिए । न जाने आप की कृपा किस ओर हैं । मेरा विचार हैं कि इस 
पर विश्वास नही करना चाहिए । हे राजन, राक्षसो के समान कपटो का भाडार और कौन 
हो सकता है ” भला, दनूजेश्वर रावण का भाई यहाँ किसलिए आयगा ? अवश्य ही 
इस नीच का बध कर देना चाहिए ।' 


१६ हनुमान्‌ का विभीषण की योग्यता रास को समझाना 

इतने में हनुमान्‌ ने बडी नम्नता से प्रभु राम से कहा-हे देव, इस राक्षस ने 
सारी वातें प्रकट रूप से कह दी कि किस प्रकार रावण ने प्रचंड क्रोव से उस पर भरी 
सभा में पद-प्रहार किया । यह कथन सत्य प्रतीत होता हैं । हमारे लिए उचित बात 
कहना, ' और जिसने उसे देश से निर्वासित किया, उसे त्याग कर चले जाना, यह सत्य 
हो सकता हैं । इस में कपट नहीं दीखता । कपटी आदमी कितना भी बहाना करे, उसका 
कपट प्रकट हो जाता हैं | इसकी बातो में कोई भी बनावटीपन नहीं दीसता । न कोई 
बुराई ही दीखती हैँ । हे राजनू, यह राक्षसों के भेदों को जानता होगा । उसका हमारे 
पक्ष में रहना ही उचित हैं । उस दिन जब रावण मुझे बॉधकर कई प्रकार के दुख देने 
लगा था, तब उसने मेरे पक्ष में बहुत-सी बातें रावण को समभझाई थी । इसलिए मे 
एसवो मन की दशा का थोडा-सा परिचय रखता हूँ ।' 

हनुमान्‌ की वातें रामचन्द्र के मन को प्रिय लगी । उन्होंने सुग्रीव को देखकर 
फहा--हे सूर्यपुज, हमें इस बात पर तकं-वित्त्क करने वी आवदयकता ही कया हूँ कि यह 


पद: एंयनाथ एयायण 


था 


.. 


रक्षत भलाः है या वरा | क्षत्रिय का धर्म यही है कि चाहे भअत्रु ही क्यो न हों, यदि ग्ह 
गरणार्थी होकर बाये, तो उसकी सा करनी चाहिए | वाज के द्वारा पीछा किये जाने पर 
एक कक्‍्पोंत ने व्याकुल होकर राजा जिवि की शरण ली थीं और शिवि ने अपना गरीर 
भी त्वायकर कबूतर की रक्षा की थी । जो व्यक्ति वात्ते व्यक्ति को गरण देता है, वह 
अच्बमेघध बन्न करने से प्राप्त होनेंगाले पुण्ण का भागी उनता हैं । हे संग्रीव, विभीषण 
ही वयो, यदि रावण ही स्वय अपना गये तजकर मेरी गरण में आाणे, तो में उसकी भी 
रक्षा करूँगा ।! यही हमारे वक्ष की रीति है । हे भानुपुत्र, में उस विभीषण को शरण 
दूँगा । तुम वतुरंत जाकर उस भब-विह्लल विभीषण को ले जाबओों । 

राम की हृपा-ुद्धि का विचार करके, सूग्रीव आँखें मुकुलित करके तथा सिर कपाकर 
कहते लगा--हें प्रभु, अप्नें परम झत्रु के अनुज के शरण माँगते ही, उसे अभयदान देकर 
उसकी रक्षा के लिए तत्पर होना इस संसार में आपके सिवा अन्य किस राजा के वश को 
वात है !” इतना कहकर सुग्रीव अपनी सेना के साथ जाकान-पथ की ओर उड़ा और 
विभीषण को देखकर वोला--हें विभीषण, झछ्रीराम ने तुम्हें अभयदान दिया हैं । यह 
सत्य-वचन हैँ | वव तुम उनके पास चलो 4! यो कहकर उसने राखसराज ग्भिीयण को 
अपने हृदय से लगा लिया और बडे हर्ष से उसे राम के समक्ष ले आाया । 


१७ विमीषण की स्तुति 


विभीषण ने रामचद्र को देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्त॒ति करने लगा-- 

नित्य सत्यरञक, हें नित्य कल्याण-ल्य, हे नित्य जगद्रक्षक, हें नित्य देव, हे जगत्कारक, 
जगत्‌ के आदिवीर, हे सृप्टिकर्ता, हे सर्वरंयातरीत, हे सर्वानुभूत, हे सर्वेजगत्‌ में पवित्र, 
जगद्विवाता, हे गुर-लबु रूप, हे सुस्जान-रूप, हे मधुरभाषी, हे श्रेप्ठ घ्नुथेर, हें पदुम- 
सम-नेत्रवाले, पद्माकलित घरीरवाले, हे समस्त जीवाबार, परम पवित्र-स्वरूप, कविजनो 
के लिए वेच्य, करुणा्सिवु, विविध चास्त्रों के आधार, वेदातवेदी, तुम ही परमात्मा हो, तुम 
ही मोअ् हो, तुम ही परमविद्या हो, तुम ही संसार के कर्त्ता हों, तुम ही ससार हो, और तुम ही ससार के 
हर्ता हो। तुम ही यज्ञ-मोक्ता हो, यज्ञ भी तुम ही हो, और यज्ञ-फन के प्रदाता तुम ही हों; 
तुम ही सू्-चन्द्र हो, तुम ही जलधि हो, तुम ही इद्र आदि देवता हो और पृथ्वी भी तुम ही हो । 
तुम ही तरिमूर्ति हो और नब्यूत्तियों के परे जो रूप है, वह भी तुम ही हो 
लर तथा बक्षर तुम ही हो, छर तथा अक्षर के ज्ञाता भी तुम ही हो । है शतकोदि 
सूर्यमम तेजस्वी, तुम्हारी जब हो ! हे नसास्नलर्प-सुपर्ण (ससारूरूपी साँप के लिए गरुड़ 

पत्ती के समान दीखनेवाले) तुम्हारी जब हो ! हें ललित आमयमों से प्रशसित, हे लक्ष्मीपति, 
हे दबासमृद्र, हे विवुव-मत्रुनाणक, श्रेप्ठ मुनिव्दय, जाछतरहित, हे झनत्रुनाशक, हे दशरघ- 
राम, दिनकर-अधि-नेत्रवाले, दिव्य चरित्रवानू, अनुपम शम गात्रवाले, अखिलाबथार, सहख- 
मुख बादियेष भी क्या, तुम्हार महिमा का वर्णन ऋर सकेगा ? क्‍या पदुमसमभव ब्रह्मा 
भी तुम्हारी महिमा की स्वुति करने में समय है ? फिर मेरी क्‍या जक्ति हैं कि में तुम्हारी 
प्रणंसा कर्क ? तुम्हारी महिमा को जानने वी चब्ति मुभ्में कहाँ हैं ? तुम्हारी स्वुति 


करने की क्षमता ही मुझमें कहाँ है । में दानव हूँ, चचल चित्तवाला हूँ । हें राजन, 


५) 


22 /3|/ 


खुद्धंकोंड हर 


तुम आदि पुरुषोत्तम हो । हे प्रभु, में शरणागत हूँ, तुम मेरी रक्षा करों | उस परम दुष्ट 
दैत्यमगाथ का सहार करो । तुम्हें अखल-लोक-शरण्य जानकर, तुम्हारे आश्चय में सुख से 
रहने की अभिलाषा से में आया हूँ ।” 

तब राम ने उस पर अपनी कपा-बृप्टि करते हुए उससे कहा--हे विभीषण, तुम 
मेरी बातो पर विश्वास करो । तुम देव-वैरी रावण के भाई नहीं हो, वल्कि मेरे भाई हो । 
व्याकुल मत होओ । लक्ष्मण की अपेक्षा अधिक में तुम्हें अपना भाई मानता हूँ। इस प्रकार, 
आश्वासनपूर्ण वचनों से राम ने विभीषण का भय दूर किया । इसके परशचात्‌ राम विभीषण 
के स्कघ पर हाथ टेककर समुद्र के तट पर गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने विभीषण से कहा--हि 
विभीषण, तुम हमें सच-सच बतलाओ कि रावण की तथा उसकी सेना की गवित कितनी हैँ ?' 


' १८ त्रिकूठ पर्वत की उत्पत्ति की कथा 

तव विभीषण ने रामचन्द्र को प्रणाम करके इस प्रकार निवेदत किया-- हे कमलदल- 
लोचन, पूर्वकाल में एक बार नारद ने वायु के समक्ष नागराज की शक्ति की प्रशसा की 
और नागराज के समक्ष वायुदेव की शक्ति की प्रशसा की और इस प्रकार उन दोनो में 
शत्रुता उत्पन्न कर दी। मात्सय॑ से प्रेरित होकर वे दोनो अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन 
करने की इच्छा करने लगे। वायु ने कहा--नागराज उज्ज्वल हेमाद्वि को घेरकर पडा 
रहे, तो भी में उसे उडा दूगा।' तब आदिशेष अपनी सारी शक्ति लगाकर उस पर्वत को 
घेरकर, अनुपम रीति से, अपने सहस्न फणों से उस पवेत के सहस्न शिखरों को दृढ़ता के 
साथ पकडकर पडा रहा । तब पवन अपने सप्त प्राणी को उद्रिक्त करके प्रचंड गति से 
चलने लगा । पवन के प्रकोप से सभी पर्वत खड-खड़ होकर गिर पडे, समस्त भुवत कपित 
होने लगे, सभी समुद्र आलोडित हो गये, सभी भूत आक्रदन करने लगे | उस पवन ने 
सूर्य के रथ को भी विचलित कर दिया और समस्त दि्याओ को चूर-चूर कर दिया । 
लोक में व्याप्त इस सकठ को देखकर सव देवताओ ने ब्रह्मा से प्रार्थना की कि आप इस महा विपत्ति 
से ससार की रक्षा कीजिए । तब ब्रह्मा आदि देवता हेमाद्वि के पास आये और पवन से 
अनुरोध किया कि वह अपनी शक्ति का उपसहार करे । किन्तु जब पवन ने उनकी वात 
नहीं मानी, तब उन्होंने नागराज को समभाया कि हे नाग्रेन्द्र, तुमको तो अवश्य हो इस कार्य 
से विरत हो जाना चाहिए | तुम दोनो की इस स्पर्धा के कारण सूर्य डियग गया है, पृथ्वी 
धेंस गई है, समुद्र ने मर्यादा छोड दी हैं | हमारा अनुरोध मानकर तुम पवना की विजय 
स्वीकार कर लो और हमारी रक्षा करने की कृपा करो । 

देवताओ की प्रार्थना मान करके नागराज शान्त हुआ और पवन को विजय दिलाने 
के निर्मित्त अपना एक फण ऊपर उठाया । पवन और अधिक वेग से बहने लगा, तो उस 
हेमाद्वि का एक-एक शिखर दूटकर बडे वेग से बहुत दूर तक उड गया और समुद्र के 
मध्य आ गिरा। हे राघव, वहीं त्रिकूट परत के नाम से विर्यात है ।” 

१९, विमीषण का राम को रावण के वेमव का परिचय देना 

“हे देव, उस हीप ( त्रिकूट पर्वत ) पर देवेन्द्र की आजा से देवलोक के शिल्पी नें 

लकापुर नामक एफ नगर का निर्माण फिया । उस नगर के सात दूर्ग है ओर प्रत्मेक दुर्ग 


२७० रंगनायथ एयायणग 


७ 


के चार द्वार है | वाहर का दुर्ग कई कयूरो से युक्त हैं और ईटो का वना हुआ है । 
अस्सी करोड़ सैनिक उसके पब्चिमी द्वार की रक्षा करते रहते हैं । सात सौ सतहत्तर करोड सैनिक 
उत्तर द्वार की रक्षा करते हे । पूर्व के द्वार पर सतत एक सौ करोड़ मदमत्त सैनिक 
दुर्ग-रक्षण में तत्पर रहते हे । दक्षिण द्वार पर साठ करोड़ वलवान्‌ सैनिक रहते हे । उस दुर्ग 
के भीतर के छहो दुर्गों के कुल चौवीस द्वार हे, जिनकी रक्षा भी उतनी ही सस्या के राक्षस- 
सैनिक करते रहते हुं । प्रत्येक गृप्त द्वार के पास एक-एक करोड़ जवितिज्ञाली राक्षस रहते है। 
नगर के मध्य में नगर की रक्षा में वीस लाख सात सौ करोड राक्षस तत्पर रहते हें । 
कुभकर्ण की गयन-गुफा की रक्ला सात करोड राक्षस करते रहते है । रावण के महल 
को आगन की रक्षा करने में एक लाच करोड राक्षस लगे रहते हे । उसके द्वार पर बीस करोड 
रालस रहते है । इद्रजीत के भवन के द्वार पर दस सहख्र करोड राक्षसवीर रहते है । 
विद्यालकाय श्रेप्ठ राक्ोसवीरों के गृहो के पास दस सहस्र करोंड सैनिक रहते है । हे 
सूर्यकुलादीण, उस सेना की गिनती असभव हैँ, वह वहुत ही विशाल हैं । स्वय राग्ण 
की जक्ति का वर्णन करना भी कहाँ सभव है ? उसने ईर्ष्या से कैलास पर्वत को उठाया था, 
ब्रह्म ने उसे ऐसा वरदान दिया कि वह दनुज, गवर्व, अमर, तथा यक्षों से युद्ध में 
नही मरेंगा । युद्ध में ही क्यों, कसी भी प्रकार से वे उस राजसराज को मार नहीं सकेंगे । 


किक 
9 


हे राजनू, यदि वह युद्ध में मरेगा भी, तो केवल आपके हाथों, अन्य किसी के द्वारा उसकी 
मृत्यु नही हो सकती । कुभकर्ण तो युद्ध में इन्द्र को एक तृणवत्‌ भी नहीं मानता । 
शक्ति-मद से भरा इच्धलीत भय का नाम भी नहीं जानता । उसने शिवजी की तपस्या 
करके उनकी कृपा से वज्ञ-क््वच प्राप्त किया हैं। माया-रूप घारण करके वह आकाश में 
रहते हुए अपने चत्रुओ को जीत लेता हैं । रावण का सेनापति प्रहस्त बडा ही चतुर तथा 
दक्तियाली है । उसने (शिव के मित्र) कुबेर के सामत मणिभद्व को युद्ध में जीत लिया था। 
महोदर, महापाब्व॑ तथा अतिकाय नामक राक्षस प्रचण्ड योद्धा है। ये तीनो वीर 
दिक्‍पालों की भी परवाह नहीं करते, और युद्ध में आने पर उन्हें सहज ही जीत लेते है | 
दनुजेन्द्र रावण के एक लाख पुत्र हे, जो महावली तथा देवो के शत्रु हें । उसके से 
सवधियों की गिनती करना ब्रह्मा के लिए भी दुष्कर है । जव कुबेर आदि उसके सामत है, 
तब उसके वैभव का वर्णन करना कैसे समव हैं ? इनके अतिरिक्त रावण के पास दस 
सहल्न करोड ऐसे श्रेष्ठ राक्षवीर हे, जो सदा आझत्रु-रक्त को पीकर तृप्त तथा रण-मद 
से भरे रहते हे । उन्ही के बल की सहायता से रावण ने समस्त दिशाओं को जीत लिया है ।* 


विभीषण की वातें सुनकर राघव ने क्हा--हे विभीषण, मेने इसके पूर्व ही तुम्हारे 
भाई के सवध में सुन रखा हूँ । निश्चय ही वह महान्‌ शूर हे । उसकी गक्ति भी वैसी 
ही है | कितु चाहें वह कसा ही घूर क्‍यों नहीं हो, उसमें इतनी शक्ति कहाँ कि वह मेरे 
समक्ष अपना प्रताप दिखावे। हे दानवराज, चाहे हरि, हर, ब्रह्मादि देवता भी मेरी गति 
रोके, तो भी में मारकर टुकडेन्टुक्डे कर दूगा और तुम्हें लका के सिंहासन पर विठाऊंँगा । 
तव विभीयषण ने बडे विनय से दाम को प्रणाम किया और कहा-हे राम, देंव, 
जब आपके वाणों की अग्नि-ज्वाला प्रचण्ड गति से निकलेगी, तव रावण में तथा उस लका 


झुछ्धऊड रै8९ 


में इतनी शक्ति कहाँ है कि थे उसके सामने टिक सकें ? हे तरनाथ, जिस दिन थानरो की 
पेना, लका के दुर्ग की दीवारों पर चढकर अत््यत होघध से राक्षसों से जकेगी, उस दिन 
भाप मेरी झवित देखेंगे । (म॑ रावण की सेना को) प्रलथकाल के रुद्र के समान भस्म 


क्रुगा 


5 


२०, राम का विमीषण को लंका का राजा बनाना 

तब प्रभू राम ने विभीषण को गले से लगा लिया और फिर लक्ष्मण को देखकर 
बोले-- है लक्ष्मण, तुम और सू्पुत्र दोनों तुरत विभीषण को समुद्र-जल से अभिषिवत 
करके रावण के बदले उसे लका का राजा बनाओ । राम की आज्ञा के अनुसार वानर 
सभुद्र से जल ले भाये और लक्ष्मण मे उस जल से विभीषण का अभिषेक किया और 
धोषित किया कि हे विभीषण, आज से तुम सभी दाचवो के प्रभू होकर रहोगे और जब- 
तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, जबतक श्रीरामचन्र की कीत्ति इस पृथ्वी पर सुझोमित होती 
रेहेगी, तबतक तुम राज्य करते रहोगे । 

यह देखकर वानरो की सेना अत्यन्त हृषित हुई । इसके पण्चात्‌ राधव से विभीयण 
की देखकर कहा-- विभीषण, कहो, हम इस समुद्र को पार करने के लिए क्‍या उपाय करें ?! 
तंत्र विभीषण ने हाथ जोडकर कहा--हे देव, सेतु का निर्माण किये विना इस समुद्र को 
पार करना इन्द्रादि देवों के लिए भी' दृप्फर है । अत, इसको वद्ग में लाने के लिए समुद्र 
से प्रार्थाा करनी चाहिए ।' 

इसी समय दशकठ के आदेश से झार्दूल नामक एक राक्षस गुप्तचर वहाँ आया और 
उसने वानर-सेना की संख्या, उनका पररपर-सभाषण, तथा राम और वानरो का वार्त्तालाप 
भादि को (गुप्त रूप से) जान लिया । वह तुरत असुरेद्ध की सेवा में लौठकर, हाथ 
जोडकर कहने लगा--हे दैत्यनाथ, उत्तुग गात्र, उत्तुग बाहु, उत्तुण शवित तथा उत्तुग मति से 
संपन्न राभ-लक्ष्मण समुद्र के तट पर श्रेष्ठ वानरों के साथ शिविर डाले हुए है । (उनकी 
सेना इतनी विश्ञाल है कि) आकाश के नक्षत्र भी गिने जा सकते है, समुद्र की लहरो को 
भी गिन सकते हे, किन्तु उस वानर-सेना की गणना करना असभव है । अब उचित यही है 
कि आप साभ आदि उपायो से काये को सिद्ध करें । 

२१, शुक का संदेश 

शार्दूल की वातें सुनकर दैत्यराज ने शुक को देसकर कहा--तुम श्षीक्र वानर-सेना में 
जाओ और सूर्य-पुत्र से बडे स्नेह से मेरा प्रेमपूर्ण सदेश कहो और उसे मेरी मित्रता का 
त्मरण दिलाकर युद्ध से विर्त करके लौट आओ ।' 

रावण की आज्ञा सिर पर घरे, वह सुग्रीव के पास गया और रावण का संदेण 
पुनाकर बोला--हे सर्मनदव, तुम मुझमे कहो कि तुम किस कारण से रावण से झयुता 
ठान रहे हो ? वालि तथा तुम में छत्रुता थी, वालि दानवेन्द्र का दात्रु था, श्यनिए 
तुम्हारी तो रावण के साथ मित्रता ही उचित है । यदि रावण इस राम की पत्नी को 
ले गये है, तो जया नुम्हारा एस प्रकार उनका साथ देना उचित है ? बुत्रेर को जीतकर 
पुप्पक विमान प्राप्त करनेवाले रावण को समझ्काना क्‍या अच्छा नहीं है ? यही वयों शिव 


9 
टप 
हज 
यु 


शहर रंगनाथ एयायम 


को साथ कैलास पर्वत को उठानेंवाले रावण क्या, कोई साधारण व्यक्ति हैं ? हे वानरेन्, 
क्या देवेन्र आदि समस्त देवताओं को रावण ने नहीं जीता ? क्या उन्होने हवन-कुड में 
अपने भिर की आहुति देकर ब्रह्मा को प्रसन्न करके विलोक-विजय का वरदान नही प्राप्त 
किया है ? एक जक्ति-हीन मानव (राम) से तुम्हारी मित्रता वयो हुई ? तुम्हारे लिए 
उचित यहीं है कि तुम दानवेइूर से मित्रता करो ।' 

उसकी वारतें सुनकर सभी वानर वड़े कुछ हुए | वे आकाण की ओर उडें, बलात्‌ 
उसे पक््डा और अपनी मृष्टि के आघातों से उसको चूर चूर-क्र दिया । फिर उसके 
पंखो को ठोडकर, उसके नाक-क्ाान काट लिये । तब राघव ने कहा--द्ूत को इतना त्रास् 
क्यो देते हों ? अब इसे-दुख न देकर, जाने दो ।” रघुराम की आज्ञा से प्रभावित होकर 
वानरो ने उसे छोड दिया । उसने आक्ाञ में उच्कर सूर्य-युत्र से कहा--हें कपिराज, तुम 
रावण को क्या सव्श देते हो ? तब सुग्रीव ने क्रोव से कहा--ठुम जाकर उससे कहों कि 
उसने रघुराम के साथ दुव्यवहार किया है । ऐसे नीच को में सहन नहीं कर सकता । 
वह चाहें कसी भी लोक में छिपकर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करें, में अवश्य उसको 
वध करूँगा, उसे कदापि नहीं छोड़ेंगा । सोमयाजी राघव देवताओं को असन्न करने के 
लिए अवब्य समर-भूमि-हूपी बन्न-वेंदी में संग्राम-हूपी महायञ्ञ संपन्न करेंगे । उसमें श्रेष्ठ 
घनुप, यूप-काप्ठ होगा, चदुल अस्त्र परिस्तरण (हवन-क्रुड के चारों ओर के कुश) होगे, 
लाल घूलि (अग्नि की) प्रभा होगी, वानरसेना स्त्रुक वा स्त्रुवा (यज्ञपात्र विशेष) होगे, 
वीरो के अग्रो से वहनेवाला रक्‍त ही घृत होगा, घनुष का टंकार मत्रधोब होगा, 
असंल्य राक्षस, यज्ञ-परु होगे; वानर-बीरो का सिहनाद देवताओ को आमंत्रित करनेवाली 
ध्वनि होगी; युद्धनवाद्यो का सतत निनाद ही साम-गान होगा, राम-लक्ष्मण का भयकर क्रोध 
तथा मेरा कोच त्रेताग्तियों का रूप घारण करेगा; रावण के प्राण ही आहुति होगे, उस 
रावण का दर्प-दलन ही सोम-पान होगा -ओऔर राक्षसगैर-रूपी पशुओं का मास ही समस्त 
भूत-समूह की सतुप्टि का साधन बनेगा । रावण से कहना कि ऐसे सग्राम-यज्ञ के संपन्न 
होने के पहले ही सीताजी को राम के पास पहुचाकर आण बचा लेना उसके लिए शुभग्रद 
होगा । इन वातो को सुनकर शुक वहाँ से ज्षीत्र रावण के पास चला गया और उसे सारा 
वृत्तात कह सुनाया । 


२२, राम का दर्म-शयन 
उस समुद्र के तट पर प्रभू राम अपनी दक्षिण भुजा को तकिया वनाकर, दर्भ-गग्या 


पर ऐसे लेटे हुए थे, जैसे आदिदेव अमृत-सागर में, जेष-शय्या पर आनद से पूर्ण हो विमल- 
चित्त से लेठे हुए हो | उन्होने निब्चय क्या कि में ममुद्र से प्रार्थना करूँगा कि वह मुझे 
समुद्र पार करके जाने के लिए मार्ग दे । इस प्रकार का निब्चय करके वे तीन दिन तक 
निर्देल उपदासन करते हुए वही लेटे रहें और बडी निप्ठा के साथ अपने मन में वरुण 
देवता नें प्रार्थना करने लगे--हे समुद्र, तुम्हारे विग्ञाल तथा दुर्गभ हृदय के पार जाने के 


लिए में यहाँ पडा हुआ हूँ । तुम्हारे लिए में मान्य हूँ । स्वर्ग-विरोधी रावण को सहार 
करने के निमित्त तुम मुझे मार्य दो ।' ह 


खुछुकांड र्‌७३ 


२३ राम का समुद्र पर व्रह्मास्त्र का प्रयोग करना 

इस प्रकार राम के प्रार्यना करने पर समुद्र, गर्व से फूलकर, उत्तुग तरग-त्यी 
अपनी बाहुओ को हिलाते हुए, अपने धवल फेन-रूपी हँसी को बिखेरते हुए विज्ञाल मीन- 
रूपी जिद्चा को फैलाते हुए, अपने गभीर घोष से अद्ृहास करते हुए, अपने वेला-जल से 
दिशाओ को यह व्‌ त्तात सुनाते हुए तथा अपने मध्य भाग के भेँवरों से अपनी वन्नता दिखाते हुए, 
राम की बातो की उपेक्षा करने लगा। यह सत्य ही तो है कि मूर्ख, ढुर्जत, कुर- 
कर्मी, तथा कुल-नाशक, कभी प्रार्थना करने से नहीं भुकते । प्रार्थना सुनकर थे और भी 
भडक उठते हूँ । प्रेम से उससे मिलने जाइए, तो वे मन को अजान्त वनानेवाली विपन-चबुप्टि 
करने लगते है । 

समुद्र को अपनी प्रार्थना अस्वीकार करते हुए देखकर राघव के विशान नेत्रों से 
अग्ति-कण छिटकने लगे और उनकी भौहें तन गई । वे अत्यत क्रोध से वार-वार समुद्र 
ओर फिर लक्ष्मण की ओर देखकर बोले--हे लक्ष्मण, इस समुद्र का गर्व तो देखो । 
में इससे कितनी बार प्रार्थना करता हूँ। फिर भी, यह मेरी प्रार्थना को स्वीकार नही करता । 
स्वीकार कराये विना में थोडे ही इसे छोड दूंगा ? क्‍या, इसका वड़वानल इतना तेजस्त्री हैँ 
कि मेरी बाणाग्ति उसे निस्‍्तेज न वना सकती । समद्र भी देख ले कि मेरे बाणो में 
कितनी शक्ति है । में अपने वबाणों की अग्निन्‍-ज्वालाओ से सारे समुद्र के जल को इस 
प्रकार ढक दूगा कि मानों वे उस समुद्र की हड्डियाँहों । उन वाणों के तीक्षण ताप के 
कारण, बडे-बडे मकर, सर्प, मीन, गैडा, कच्छप, कर्कट, मेंढक, जल-मानुष आदि का समूह 
परस्पर एक दूसरे से टकरातें हुए प्राण-रक्षा के लिए भाग खडे होगे और तिभिंगिल, 
वलवान्‌ जल-राक्षस, जल-ग्रह तथा पर्वत आदि का भी सर्वनाश हो जायगा । में उस समुद्र 
की ऐसी घूल उडाऊँगा कि समस्त जलचरों का सचलन बंद हो जायगा और सीप तथा घोधे 
वाहर निकल आयेंगे। मे इसको लक्ष्मी का पिता, हरि का इवशुर समभकर हीं अवतक 
चुप रहा । हे सौमित्र, में इसके लिए समुद्र से प्रार्थना ही क्यों करूँ ? अपने-आपको 
में इसके सामने शक्तिहीन क्यो समझ ? लाओ मेरे धनुष-बाण और देखो कि यह समुद्र 
मेरे बाणों से कंसे सूखता है । में अभी समुद्र में रहनेवाले प्राणियों को चूर-चूरकर 
देता हूँ । 

इस प्रकार कहते हुए जब राघव ने धनुष हाथ में लिया, तब तुरत इन्द्र कपित 
हुआ, आकाश थरथराने लगा, समुद्र आलोडित हुए, दिग्गज स्तभित हो रह गये, 
पृथ्वी घँंस गई, पर्वत-बिखर टूटकर गिरने लगे, ब्रह्मा चक्ति रह गया, नक्षत्र ग्रिर्न 
लगे और दिशाएँ चकराने लगी । सूर्यवशतिलक राम ने अपने जौर्य का प्रदर्शन करते हुए, 
प्रलय के समय प्रयुक्‍त्त करनेवाले यम को काल-दण्ड के समान, उज्ज्वल तथा प्रलयकाल 
की अग्नि के समान दीप्त होनेवाले वाणों का अपने घन॒प पर संधान किया और उन्हें 
समुद्र पर चलाया | तब समुद्र की लहरें पर्वतो का आकार धारण करके आवाद या ऐसे 
स्पर्श करने लगी, मानो समुद्र यह कहते हुए वाणो से बच रहा हो फि मेने अत्यधिक घमट 
दिखाया, मुझ पर कृपा करो। उन उत्तुग लहरों पर उतना अधिफ फेन दियाई परने लगा, 

३४ 


९४9 , रंय्नाथ एायोॉयफ 


मानो राम के शक्तिगाली वाणों के लग जाने से समुद्र के मुह से फक्राग निकल रहा हो | 
सारा समुद्र इस प्रकार आलोडित होने लगा, मानो यह सोचकर वह व्याकुल हो रहा हो, 
कि अब मुझे शरण कहाँ मिलेगी ? चारो दिज्ाओ में धुआँ इस प्रकार छा गया, मानो 
मेघ-समूह समुद्र के जल का आस्वादन करने के निमित्त आने के पद्चातू, राम के शास्त्रों 
के प्रताप से भीत होकर तुरत लौटे जा रहे हो । जलचर इस प्रकार छटपटाने लगे, 
मानो वे दिखा रहे हो कि (भविष्य में) राक्षस इसी प्रकार छटपटायेंगे । सभी दैत्य 
पाताल छोडकर चारों ओर ऐसे भागने लगे, मानो मनुकुल-वल्लभ राम के वाणों की अग्नि 
से सम्रमित समुद्र के चित्त से अहकार आदि भाव भागे जा रहे हो। उद्धत गति से 
प्रज्बलित होनेवाली वाणाग्नि के साथ मिलकर समुद्र का वडवानल भी समुद्र के ऊपर ऐसे 
जलने लगा, मानो वड़वानल यह सोचकर कि मेरें रहते हुए भी जो समुद्र सूखा नहीं उसे 
सोखने के लिए यह वाणाग्ति आ रही है, उसे बडे प्रेम से आलिगन कर रहा हो । 

तव लक्ष्मण यम के समान क्रोधाभिभूत अपने अग्रज को देखकर, भयभीत हो, 
समुद्र के किनारे आया और हाथ जोडकर वोला--हे मानवेन्द्र, यह कोई रुद्र का रोष-रूपी 
समुद्र नही, जिसका सथन करना असभव हो । यह कोई यम का क्रोध-रूपी समुद्र नहीं है, 
जिसको मथ देना दुष्कर हो । इस जल को सोखने के लिए ऐसा प्रयत्न क्यो ? आपके 
वाणों की अग्नि इस समुद्र को जला देने के पश्चात्‌ बाहर निकलकर समस्त दिश्ञाओं के 
साथ सभी लोको को जला दें, तो कोई आइचरय नहीं । अपना चरित्र समस्त जगत्‌ में 
विख्यात करते हुए आप अपने क्रोध का उपसहार कर लीजिए । आप के कोध के सामने 
यह समुद्र क्या गक्ति रखता हैं ”? इसका नाश मत कीजिए, चह घनुष मेरे हाथ में दीजिए, 
यो कहते हुए उन्होने राम के घनुष को पकंड लिया । 

किन्तु राम ने घनुष लक्ष्मण को नहीं दिया । उनका क्रोध हिगुणित हुआ और 
सौमित्र को टालते हुए, होठ चबाते हुए क्रोधपूर्ण दृष्टियो से समुद्र की ओर देखकर वे 
कहने लगे--रे समुद्र, तुम मेरे हाथो से परास्त नहीं होओगे ? तुम्हारे जल को अभी 
सोखता हूँ और तुम्हारे जल के अतर्गत रहनेवाले समस्त प्राणियो का नाश करता हूँ । 
तुम अब मेरा सेवक होकर खेडे रहोगे । तुमने मेरा सामना करने की दुष्टता की । लो, 
में अभी घनुष की डोरी पर वाण चढाता हूँ ४ इस प्रकार समुद्र को त्रस्त बनाते हुए 
उन्होने धतृष पर ब्नह्मास्त्र चढाया । 


यह देखकर इन्द्र तथा ब्रह्मा दिग्श्रान्त हुए, साथ ब्रह्माण्ड विदीणे-सा हो गया । 
त्रिभुवनों में रहनेवाले प्राणी आत्तेनाद करने लगे । सारा भुवन परितप्त-सा होने लगा । 
दिशाओं में अधकार व्याप्त होने लगा । रवि तथा चद्रविव काति-रहित हो गये । वच्च- 
पात होने लगा । महापत्रन भयभीत हुआ । आकाजवाणी कपित होने लगीं। मिथ्याग्नियाँ 
प्रज्यलित होने लगी और अविरल गति से एक भयकर निनाद गूंजने लगा । 

तव समुद्र अपने मकर-समूह के साथ विचलित हुआ । उसका सारा उफान जाता 
रहा, उसकी उत्तुग लहरें कही दव गई, उसका घोर निनाद जाने कही अतर्घान हो 
गया, उसका भयकर विष न जाने कही लुप्त हो गया , उसका गये कही स्र-चूर हो गया 


खुद्धकाड २७९ 


और उसके हाव-भाव नष्टसे हो गये । अवतक पराजय का नाम न जाननेवाला 
समुद्र आज पराजय के निवास के समान, सत्तव-सपन्न होते हुए भी सत्त्वहीन के समान व्याकुल 
होने लगा । स्थैर्य रखते हुए भी वह अस्थिर तथा अधीर हो बडे वेग से राम के हाथ 
के ब्रह्मास्त्र के अग्र भाग में एक बिंदु के रूप में आकर ऐसे खडा रहा, मानो वरदान के 
प्रभाव से पल-पल बढनेवाले रावण के मस्तको को एक साथ काट डालने के उद्देश्य से 
राम ने अंपने वाण को पैना बनाने के लिए' वडवानल में उसे तवाया हो और फिर समुद्र 
में उसे इबोने पर सारा समुद्र खिचकर उस शर के अग्न भाग में बूंद के रूप में खडा 
हुआ हो और (इस प्रकार) कह रहा हो--हे देव, मेरा अस्तित्व इतना ही तो है ।' 


२४. समुद्र का राम से प्रार्थना करना 


तब समुद्र सब देवताओं के समक्ष दीप्तिमान्‌ रत्न-प्रभा से विलसित हो, असख्य 
मगल पुष्प-मालाओं से अलक्ृत हो, उज्ज्वल तथा विशाल फणवाले कोटि क्षप तथा असख्य 
जलचरो के साथ, गगा आदि नदियो की सेवाओ को प्राप्त करते हुए, रामचद्र के समक्ष 
आया, साष्टाग प्रणाम किया और कर-कमलो को मुकुलित करके अत्यन्त भक्तियुक्त हो 
निवेदन करने लगा--हे नरनाथ, आपके क्रोध के सम्मुख मेरी क्‍या शवित हैं कि में खटा 
भी रह सकूं ? आप आदि पुरुषोत्तम हे, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी आपकी 
आज्ञा के वशवर्त्ती है । आपमें जो प्राणी विलसित है, उनकी गणना ही नहीं हो सकती । 
समस्त लोक आपके अधीन हैँ । मुझे अपराधी जानकर आप मुझे दंड मत दीजिए । आप 
जो भी काय कहें, आपकी आज्ञा को सिर आँखों पर धारण करके उसे सपन्न कछेंगा । 

इसके पदचात्‌ गंगा आदि नदियों ने रामचर्द्व को सिर नवाकर प्रणाम किया और 
ललाट पर हाथ जोडकर कहा--हे जगदभिराम राम, हम आपकी शरण में आई है । 
है करुणानिधि, आप हम पर कृपा कीजिए । हम सब आपसे अभयदान कीं याचना करनी है। 
अद्वितीय रीति से इस सागरेश्वर को क्षमा करके आप हमारे सौभाग्य की रक्षा कीजिए | 
हे त्रिभुवनाधार, हे दीन-मन्दार, अपराधियों को क्षमा करना ही आपका लोकोत्तर गुण हैं । 
है देववद्य, हम पर कृपा करके हमारी रक्षा कीजिए । हे शिवधनुभजक, हे राम, आपकी 
महिमा का वर्णन श्रुति भी गा नहीं सकते । आप देव-देव हैँ । रक्षा तथा पालन करने में 
आप ही समर्थ हे । हे भूमीश, हे लोकेश, हे प्रकाश-सपन्न, हे सीतापति, हे पुण्य-स्वरूप, 
आप हमारी रक्षा कीजिए ॥ 

इस प्रकार की नदियों की विनती सुनकर राम ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए 
कहा---तुम भय छोडो । तब समुद्र ने राम से निवेदन किया--हें कमलगर्भ, हे मुनिजन- 
वद्य, हे शरणागतरक्षक, हे दिव्य मूत्ति, आप चाहें, तो अपनी वानर-सेना को ले जाने 
के लिए दीघंकाय मकरों के सचलन से युक्त उमडकर नहरो में फैल जाने वाले, भमावात 
को उत्पन्न करनेवाले, भेंवरों से युक्‍त हो मेरे सौदर्य की वृद्धि करनेवाले मेरे इस अगाव तया 
अनत जल पर सेतु बाँधिए या चाहें तो वैसे ही चले जाइए ।” 

समुद्र के इन विनयपूर्ण वचनों को सुनकर राम सतुष्ट हुए और जलाबीय के सुझाव 
के अनुसार उस अमोध अस्थ्र को मझुकातार नामक प्रदेश पर चला दिया । उस वाण रे 


सर्द र्यगनशयथ सायत्यण 


ताप से उस प्रदेश का सारा जल सूख गया । तब राम ने उस देश को सव प्रकार से 
समृद्ध रहने का वर विया , तव से वह प्रदेश उसी प्रकार सुझोभेित रहता हैं । इसके 
पच्चात्‌ राम का चर फिर उनके तुूणीर में लौट आयः और समुद्र पूर्ववत्‌ ज्ञांत हो गया । 

तव समुद्र ने अत्यत विनय के साथ राघव से कहा--हें भूपाल, पूर्वकाल में आपके 
व्च के समसपुत्रों के द्वारा निर्मित होने के कारण में सागर नाम से विख्यात हुआ | 
इतना हीं नहीं, में आपके वच्च के लिए मान्य रहा हूँ । देवनदानव-युद्ध के समय आपके 
पिता मुझे जबयोध्या ले गये थे और बड़े जादर-सत्कार के साथ वहाँ से विदा किया था ॥ 
इस प्रकार, मेरा और आपका सवध (चहत पुराना) हैँ । इसलिए हें शाध्वेन्द्र, आप सेतु 
बाँधिए और वानर सेना को उस पार ले जाइए ॥* - 


२४ सेतु-बंधन के लिए राम का सुग्रीव को आज्ञा देना 


डर 


तव रघुराम सूर्यवदन को देखकर वोले--हे सुग्रीव, सेतु बनाने के लिए शअीक्र 
श्रेष्ठ वानरो को भेजों । सुत्रीव ने वडे उत्साह से योग्य वानरो को इस कार्य के लिए 
नियुक्त किया । अग॒द, जाव्वानू, नील, गज, गवाक्ष, पनेस, नल, पावकनेत्र, तपन, तारु, 
गवय, ऋषभ, गधमादन, चरभ, द्विविद, जतवलि, हरिरोमवक्ष, सृपेण, केसरी, ज्योतिर्मुख, 
दबिमृख, वेगदर्शी जादि श्रेप्ठ वानर-चीर समुद्र के निकट गये जौर शीघ्र गति से बड़ेजड़े 
वृक्षों तथा पर्वेतों को ले जाकर समुद्र में डालने लगे । लेकिन, उनमें कोई भी जल पर 
देरता नही था, सब जल में डूब जाते थे । तब सत्र वानर आइचर्यचकित होकर राम के 
पास लौट जाये बौर सारा वृत्तांत कह सुनाया । रामचद्र भी आउज्चर्यंचकित होकर समुद्र 
से वोले--हे समुद्र, यह वौसी वात हैँ कि इन कपि-वीरो के द्वारा फेंके गये वृक्ष तथा पव॑त्त 
पानी पर तैरते नहीं है ? यह सुनकर समुद्र वोला--हे परमेश, वानर जिन वृक्षों को जल 
में फेंक है, उनके सम॒द्र-तल में पहुँचते ही जलचर उन्हें शीघ्र निगल जाते हे । समुद्र 
के तल में झतबोजन विद्ाल आकारवाला तिमि नामक मत्स्य रहता हैँ, जो सभी जलचरो 
को खा जाता हैं । उस मत्स्य को तिमिंगिल निगल जाता है । हें देव, इस प्रकार एक 
दूसरे को निगल जानेवाले दीर्घ आक्ारवाले असंस्य मत्स्य समुद्र में रहते हे ॥” 

इन वातों को रुनकर राम ठोले--हे नमृद्र, ऐसी दण्ना में समुद्र पर सेतु वाँधने 
का क्‍या उपाय हो सकता हैं, वताओ । तब सम्‌द्र बोला--हे सूर्यवज्र-तिलक, आप सेतु 
वाँदन के लिए नल को भेजिए । यह महान्‌ विज्वकर्मा का पुत्र है । इसका उपाय वहीं 
जानता है | अपने पिता से उसने बह कला जान ली हैं| उसके सिवा और किसी से यहेँ 
सेतु वाँधा नहीं जा सकेगा | इसका एक और कारण भी है, सुनिए। बहत पहले की वात है 
कि यह अपनी वाल्यावस्था में विव्याचल के निक्‍्ठ्वर्ती वन में पद्मुकण्व नामक मुनि के 
समीप खेल रहा था | मुनि स्नान जादि अनुप्ठान करने के लिए चले गये, तो इसने मुनि 
की सभी पूजा-मूत्तियों को अपने मुह से बक्त्ला देकर नमुद्र में फेंक दिया । जब मुनि वहाँ 
लोटकर आये, ठव॒ सारा वृत्तात उन्‍हें मालूम हुआ । इस पर वे बहुत हो कुद्र हुए, किन्तु बालक 


वीक किक कक 


कारण उसे दण्ड नहीं देना चाहते थे | मुनि अपनी खोई हुई वस्तुओ को पुन 


प्राप्त ऋर॒ने का उपाय सोचने लगे । उस तपोघन ने अच्छी तरह सोच-विचारकर, अपनी 


खुद्धकांड २98 


तपस्या की महिमा से इसकों एक ऐसा वर दिया कि तृण से लेकर कोई भी वस्तु, जिसे 
यह बालक समुद्र में फेंकेगा, वह जल के ऊपर ही तैरने लगेगी । इस वरदान के फल-स्वरूप 
उस मृत्ति की देव-मूत्तियाँ जल के ऊपर तैरने लगी । यही कारण है कि इसके हाथो से 
फेक जान पर पहाड भी जल पर तरने लगेंगे । इस प्रकार मेरे जल पर सेतु बंध जायगा। 
हैं घरणीग, आप शीघ्र ही नल को बुला भेजिए । 
२६. सेतु-बन्धन 

तब रघुकुलोत्तम राम ने नल को बुलाया और बडे आदर के साथ उसे देखकर 
बोले---हे वानरवीर, हे घीर, समुद्र ने तुम्हारे पराक्रम का वृत्तात मुझे सुनाया हूँ । 
अब तुम अपने शौय॑ का प्रदर्शन करते हुए समुद्र पर सेतु बाँवने में दत्तचित्त हो जाओ ।/ 
राम का आदेश सुनकर उसने हाथ जोइकर राम भूपाल से कहा--हे देव, इस ससार 
जन्म लेने का फल आज मुझे प्राप्त हुआ । आप मृभो आज्ञा दीजिए । मेने अपने पिता 
सेतु वाधने की कला जान ली हैं । में अपनी निपुणता का वर्णन आपके सामने क्या करें 
आप मुझे आाज्ञाम्रात्र दीजिए | में तुरत समुद्र पर सेतु वाँधकर आपकी प्रशसा प्राप्त 
कम्गा । आप मुझ अनुमति दीजिए । 

राम की आज्ञा प्राप्त करके नल सेतु बॉधने के लिए निकल पडा । उसके साथ 
ही सारी वानर-सेना पृथ्वी, आकाण तथा दिशाओं को अपने गर्जन की ध्वनि से गृजायमान 
करत हुए, पर्वत तथा वृक्ष-समूह को लाकर सेतु वाँधने का उपक्रम करने लगी । मुग्रीव 
आधा योजन लवा एक विशाल पर्वत को, पृथ्वी को कंपाते हुए उठा लाया, तो राम नें 
सन ही' मन गणेश का स्मरण तथा वदन करके उसे नल के हाथ में दिया । उस विशाल 
पर्वत को नल ने समुद्र में ऐसा प्रतिष्ठित किया मानों वह पर्वत उसके सेतु-अधन-शवित का, 
राम की अनुपम कीत्ति का तथा विभीषण के राज्य का कीत्ति-स्तम हो । 

तब वानर-समूह सभी दिशाओं में व्याप्त होकर पर्वतो तथा वृक्षों को सहज 
उखाडकर आवश्यकता के अनुसार नल के हाथो में देने लगे । वे एक पर्वत से दूसरे पर्वत 
पर बडे वेग से कूद जाते, गरजतें, एक साथ कई पहाडो को उस्राडकर नीचे गिरा देते, 
पहाडो को सिर पर रखे हुए हाग्न्भाव दिखाते, पहाडो को ज्ञीत्र ले आने के लिए दूसरो 
को अपशब्द कहते, हँसते, लाये हुए पहाडो को एक दूसरे पर ऐसे सजाकर रखते कि वे 
लुढक न जाये, दोनों हाथो से पहाडो को नारगियो के समान उछालते, परिहास के लिए 
दूसरों के लाये हुए पहाडो को नीचे गिराकर हँसते, और पहाडो तथा वृक्षो को दूर से ही 
नल के पास तक फेंकने में स्पर्धा करते । इस प्रकार, वे विविध रीतियो से पहाटो तथा 
वृक्षों को ला-्लोाकर नल के हाथो में सौपते थे । नल भी बडी तत्परता के साथ सेतु 
वाँधने में लगा, हुआ था । एक भी पहाइ या वृक्ष समुद्र में दृबता नहीं था। इस प्रकार, पहले 
दिन ही चौदह योजन लवा पुल तैयार हो गया । समूद्र भी ऐसा क्षुब्ध हुआ, मानो वह 
सोच रहा हो कि हाय, मुझे यह कैसी विपत्ति का सामना करना पड़ रहा है । 

२७, चन्द्रोदय का वर्णन 
सूर्य अस्त हुआ । सेतु की रक्षा वो लिए कुछ बलवान्‌ बानरों को नियत बरली 


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ए७< रंग्ना/थ एयायणग 


सभी वानर समुद्र-तट पर स्थित अपने निवासों में लोढ आये । आकाश में नक्षत्र ऐसे 
दिखाई पड़ने लगे, मानों सफल-मनोरथ राम के कीत्ति-पुष्प ही बिखर गये हो | तब पूर्ण 
कलानिधि, मन्मथ का ब्वशुर, विकसित कुम्‌दो का वधु, चक्रवाक-मिथुनों के साहचर्य को भंग 
करनेवाला, क्षीर-सागर का मथन करने से प्राप्त नवनीत, शिवजी का शिरो-पुष्प, नक्षत्रों 
की निर्मल हास्य, चकोरो को आनन्द देनेवाला, विरही प्रेमियों के हृदयो को उत्तप्त करने- 
वाली ज्वाला, आकाश का आभूषण, चोरो के हृदय का झूल, समुद्र को उत्तेजित करने- 
वाला, हरि-हरबह्मा की आनदपूर्ण सुष्टि तथा कमलो के झत्रु चन्द्र का उदय हुआ । 
चारो ओर चद्विका ऐसे व्याप्त हों गई, मानो क्षीर सागर ही उफनकर ससार में व्याप्त 
हो गया हो । सभी वानर निद्राहीन होकर सोचते रहे कि कंव हम सेतु बाँघेंगे " 
कव हम लका में पहुँचेंगे ? दानवेन्द्र की मृत्यु कव होगी ? सीताजी राम को कब प्राप्त होगी ? 
न जाने यह रात्रि कब बीतेगी ? हाय, हम बहुत शी ध्र ही थककर अपने निवास लौट आये । हम काम से 
लौटे ही क्‍यों ? हमें रात भर वही रहकर पुल बाँधने के कार्य में लगे रहना चाहिए था । 


इस प्रकार सोचते हुए उन्होने रात्रि बिताई गौर प्रात काल ही सध्या आदि नित्य- 
कर्मों से निवृत्त हो, सभी वानर एक दूसरे को पुकारते तथा एक दूसरे को उत्साहित करते 
हुए काम में लग गये । वें बड़े वेग से बडे-बडे पर्वतो तथा वृक्षों को अपनी अनुपम शक्ति 
से उखाडकर ले आते थे और उन्हें समुद्र में डालते थे । सुग्रीव आकाझन-पथ से उडते हुए 
गया और विध्याचल का अर्द्ध-मोजन लवा एक शिखर तोड लाया और सुषेण के हाथो में 
सुपुर्दे किया । सुपेण ने उसे नल के हाथो में दिया। अगद ने अद्वितीय गति से जाकर 
दर्दुर नामक पर्वत को उठा लाया और उसे समुद्र में फेंका | नील ने मलय-पर्वत का शिखर, 
वृक्षो-सहित ले आकर नल के हाथो में दिया । द्विबिद तथा मैन्द ने एक साथ बडेंग्वडे 
पर्वतो को ले आकर उस समुद्र में फेंका । गज, गवाक्ष, गधमादन, जरभ तथा गवय आदि 
बाहुबली वीरो ने समस्त पृथ्वी को कँपाते हुए महेल्व पर्वत के शिखर ले आकर समुद्र में 
डाले । नल अपने हाथ से उन सब परव्वतो का स्पर्श कर देता, जिससे कि वे डब न जाय 
गौर वडी तत्परता से पुल बनता जाता था । 


इस प्रकार, वानरो के लाये हुए वृक्षों तथा पर्वतो को नल एक हाथ से ग्रहण करके 
दूसरे हाथ से समुद्र में रखते हुए सेतु का निर्माण करता जाता था | यह देखकर हनुमान्‌ को क्रोध 
आ गया । वह अपनी सारी शक्ति लगाकर सात योजन लबा एक पर्वत उठा लाया । 
रामचन्द्र ने समक लिया कि हनुमान्‌ के क्रोध का कारण क्‍या हैं । उन्होने नल को आाज्ञा 
दी कि वह हनुमान्‌ के लाये हुए उस पर्वत को दोनो हाथो से ग्रहण करें । नल ने वैसा 
ही किया । उस समय वानरो के गजनों की ध्वनि, उफननेवाले समुद्र का गभीर घोष, 
पर्वतो तथा वृक्षों के परस्पर टकराने की घ्वनि, कपिणे के एक दूसरे को बुलाने का शब्द, 
(पर्वतो के नीचे) दवनें से निकलनेवाले प्राणियो का चीत्कार और विचलित दिग्गजों की 
चिघाड, इन सव की सम्मिलित ध्वनि आकाश तथा समस्त ब्रह्माण्ड की दिश्ञाओ तक व्याप्त 
हो गई । वह ध्वनि क्षीर सागर की उस गभीर ध्वनि के समान थी, जो मदर पर्वत को 
मथानी बनाकर देवासुरो के (क्षीर सागर) मथने के समय उत्पन्न हुई थी । 


इुद्धकांड ३७८ 


जब मध्याह्न हुआ, तब वानर अपनी थकावट मिटाने के लिए वृक्षों की छाया में 
गये और मीठे फल खाते तथा ठडा जल पीते हुए थोडी देर वहाँ विश्राम करते रहें । 
उसके पद्चात्‌ वे अत्यधिक उत्साह से काम में लग गये । वे एक दूसरे से कहतें--तुम 
इन पहाडो को ले आओ, तुम उन पव॑तो को उखाडकर ले आओ ॥ इस प्रकार, एक 
दूसरे को बढावा देते हुए असख्य वृक्षो, तथा पर्वतो को ला-लाकर वे नल को देते थे । 
कुछ वानर पर्वतो को सीधे समुद्र में ही गिरा देते थे, कुछ बीच रास्ते में ही दूसरो का 
बोक अपने सिर पर ले लेते और कुछ अपना बोक ले आकर नल के निकट रख देते थे । 
इस प्रकार, दूसरे दिन उन्होने छब्बीस योजन लबा पुल बनाया । तब सूर्यास्त हुआ । 
तब सुग्नरीव आदि वानर, रामचन्द्र को अपने कार्य की प्रगति का वृत्तात सुनाकर समुद्र-्तट पर 
अपने निवासों में लौट आये ओर रात को बडी शान्ति के साथ सो गये। दूसरे दिन श्रात - 
काल ही उठकर वे बडे उत्साह से सेतु बाँचने चले | वे एक दूसरे से स्पर्धा करके कहते 
जाते थे कि हम अकेले सभी पर्वेतों को उठा लायेंगे । हम ही सब वृक्षों को उसाडकर 
लायेंगे । इस प्रकार, होड लगाकर वे चारो दिय्ाओं में बिखर गये । कुछ लोग वृक्षों तथा 
पव॑ंतो को ले आकर समुद्र में डालते थे, कुछ निरीक्षण करते थे, कुछ पेडो की छाया में 
बैठकर सुस्ताते थे, कुछ लोग बने हुए सेतु की लवाई नापते थे, कुछ लोग जहाँ-तहाँ 
बेठकर ऊँघते थे, कुछ लोग ठडे जल से अपनी प्यास वुभाते थे । इस प्रकार, वे सब 
अत्यधिक क्लान्ति का अनुभव करने लगे । तब सूर्य, चन्द्र के समान शीतल प्रकाशित होने 
लगा । इन्द्र अमृत का फुहारा बरसाने लगा । पवन शीतल होकर चलने लगा । पुप्प-सौरभ 
आनद पहुँचाने लगा | तब वानर अत्यत उत्साह से वृक्षों तथा शेलो को लाकर समुद्र में 
डालने लगे । उनकी उद्धत गति से भीत होकर समुद्र के सभी जीव, अपने प्राण बचाने 
के लिए जहाँ-तहाँ भागते, पुन-पुन पानी के ऊपर सिर उठाकर देखते और मन ही मन 
सोचते कि कदाचित्‌ पहले के समान ही कोई अमोघ अस्त्र हमारा सहार करने के लिए 
ञा रहा हैँ । फिर तुरन्त यह जानकर कि वानर समुद्र में सेतु बाँध रहें हे, मन-ही- 
मन प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से विचरण करने लगते । इस प्रकार, वानर-वीरो ने बडी 
तत्परता से उस दिन पचास योजन तक पुल बाँधा । इतने में सूर्यास्त हुआ । 
तब सभी वानर-वीर भक्तियुक्त हो, सघ्या-वदन आदि कार्य से निवृत्त हों विचार 
करने लगे कि अब तो हमें केवल दस ही योजन लबा पुल बाँवना शेप रह गया है । 
कल यह भी पूरा कर लेंगे । इस प्रकार, वार्तालाप करते हुए वे समुद्र-तट पर लौट आये 
और रात को सुख की नींद सोये । प्रात काल होते ही सभी वानर-नेता रामचन्द्र के पास 
गये ओर उन्हें वडी भक्ति से प्रणाम करके अपने कार्य की प्रगति सुनाई । फिर, वे 
मोदमग्न मन से फिर वृक्षों तथा महाशैलो को बड़ी शीघ्र गति से ला-्लाकर नल के हाथों 
में देने लगे । 
२८ गिलहरी की भक्ति 
तब राम सेतु का निरीक्षण करने के उद्देश्य से सागरेंइवर, वानरेश्वर तथा दैत्य- 
नायक के साथ वहाँ गये और लक्ष्मण के कधें पर अपना वाम कर टेके हृए मदन्‍न्मद 


र5४० रंगनाय सायायण 


मुस्कान-स्पी चद्रिका से दीग्त होनेवाले मुह से विलसित होते हुए पुल॑ पर खंडे होंकर' 
सेत के निर्माण का कार्य देखते रहे ।॥ कपि सव बड़े-बड़े वृक्षों तथा पहाडो को बड़े साहस 
के साथ उखाइकर ले आते थे और नल के हाथ में देते थे, नल उन्हें लेकर पुल में लगा 
देता था । इसी समय एक गिलहरी ने सोचा--सेतु का निर्माण णीषक्र ही पूरा होना चाहिए 
इसलिए में भी इन बलवानों की सरुहायता करूँगी | यो सोचकर उसेने राम के चरण- 
कमलो का मन-ही-मन स्मरण करके, उनके समक्ष ही बडी भक्ति के साथ समुद्र में गोता 
लगाया, फिर वह समुद्र-तट पर वालू में लोट गई, उसके पच्चात्‌ पुल पर आकर अपने 
शरीर पर लगी रेत को मटका देकर गिराने लगी । इसी प्रकार, वह वार-बार समुद्र 
में गोता लगाती, वालू में लोटती और तुरत आकर पुल पर अपने शरीर पर लगी रेत 
को गिरा देती । राम वडी देर तक गिलहरी का यह कार्य देखते रहे । फिर, उन्होने अपने 
अनुज को देखकर कहा--हें लक्ष्मण, वहाँ देखो, एक गिलहरी मेरी भक्त्ति से प्रेरित होकर 
अपना गरीर जल से भिंगों रही हैं । फिर, तट पर पहुँचकर रेत में लोटती हैं और फिर 
अपने जरीर में लगी रेत को पुल पर गिरा देती है । जहाँ श्रेप्८ट- वलशाली वानरबीर 
वृक्षों तथा पर्वतों को लाकर गिराते है, वहाँ अपनी अल्प शक्ति का विचार किये विना ही 
वह बडें प्रेम से अपनी शक्ति के अनुरूप सहायता कर रही है । तब लक्ष्मण ने कहा- 
हैं सूर्यवश-तिलक्, मेने जान लिया कि जो आपके चरण-कमलो में अपना मन स्थापित 
करके एक तृण भी अपित करता हैँ, आप उसे मेरु पर्वत के समान ही मान प्रदान करते हे । 
इसलिए हे अनध, आपकी भक्त ही प्रवान है 7 तव राम ने सुग्रीव से कहा---उस गिलहरी 
को देखने के लिए मेरी बडी इच्छा हो रही है । उसे प्रेम से यहाँ ले आओो ।' तब सुग्रीव 
उस गिलहरी को पकडकर लें आया और राम के हाथो में दे दिया । राम ने कई प्रकार 
से उसकी प्रशसा की और बड़े हपँ से अपना सुदर दाहिना हाथ उसकी पीठ पर फेरा । 
उसके पश्चात्‌ उन्होंने लक्ष्मण, सागरेब्वर, विभीषण तथा सुग्रीव के समक्ष उसे छोड़ दिया। 
वह्‌ गमिलहरी थोडी देर तक वहीं इधर-उघर विचरती रही । फिर, राम ने उसे चदन, 
मदार, चपक, पूगीफल, पुन्नाग, सहकार आदि वृक्षों से युवत सुदर प्रदेश में छोड देने 
का आदेंग दिया 


२९. सेतु को देखकर राम का ह॒र्षित होना 

तदनत र हनुमान, अगद, नील, हरिरोम, आदि वानरभ्रेष्ठो के साथ राम आइचर्य- 
चक्ति करनेवाले उस विश्ञाल सेतु पर खड़े होकर कहने लगे--वाह ! नल कितना निपुण है । 
उसने समुद्र के दूसरें छोर तक एक विश्ञाल चबूतरें के समान इस पुल का निर्माण 
किया हैँ । अपनी कला-निपुणता तथा अपने वाहबल को प्रदर्शित करके उसने इस दीर्ष 
सेतु को वाँवा 

नल द्वारा निर्मित वह सेतु गत योजन लवा सौर दस योजन चौडा था और मलय 
पर्वत तथा सुवेलादि का स्पर्ण करता हुआ बहुत सुदर दीख रहा था । समुद्र में उछल-कूद 
करनेवाले बड़े-बड़े मत्म्यन्यमूह-रूपी दीप्त नक्षत्रों तथा दोनों ओर व्याप्त नील समुद्र- 
रूपी नील गगन के साथ वह सेतु आकाबनागा के समान सुथोभित हो रहा था । 


खुद्धेकाड २८६ 


राम भूपाल ने ठया करके मुझे अभयदान दिया हैं--ऐसा सोचकर मानो फूल उठनेवाले उस 
विशाल समुद्र को देखकर कपि भी (अपने कार्य की सफलता देख) आनंद से फूलने लगे । 
आकाश से देवता (रामचन्द्र के) परात्रम के परिणाम को देखकर मन-हीं-मन यह विचार 
करके हर्पित होने लगे कि, सच ही तो हूँ, नीच व्यक्ति कभी मृदुवचनों से वात नहीं 
मानता । वह केवल बड़ के भय से, वच्च में लाया जा सकता हैँ । रामचन्द्र ने जब समुद्र 
से विनय के साथ प्रार्थना की, तब समुद्र ने उनकी उपेक्षा की। फिर, सूर्यव-तिलक ऐसा 
क्यो नही करें ? जो व्यवित इस सेतु का स्मरण-मात्र करेगा, जो इस सेतु का दर्णव करेगा, 
उसे विजय, यश्ञ तथा प्रुण्य की प्राप्ति होगी । जबतक यह सेतु स्थिर रहेगा, जबतक यह समुद्र रहेगा, 
तबतक राघव की की त्ति स्थिर रहेगी और दिन-प्रतिदिन ग्ढती हुई वह आनद प्रदान करती रहेगी । 

इस प्रकार, मन-ही-मन हर्ष-पुलकित होते हुए उन्होंने फूलों की वृष्टि की और 
देव-दुदूभियाँ बजाईं । तब रघुराम आनदित होकर सेतू को देखते हुए बोले--यह सेतु 
अनतकाल तक नल के नाम पर विस्थात होते हुए सु्ोभित रहेगा ।” प्रभु के वचन सुनकर 
सभी कपिवीरों ने नल की प्रशसा की । तब समुद्र, सेना के ज्ञाय राम को अपने निवास 
स्थान ले गया और अत्यत भक्तित के साथ उन्हें दिव्यास्त्र, दिव्य वस्त्र, दिव्य भूषण तथा 
वज्ञ-कंवंच प्रदान किये और निष्कलक चित्त से रामचद्र को देखकर कहा--हे शाम भूपाल, 
आप राजपुत्र हें । युरु के समय आपका यह मसुनि-वेश क्यो ? अब उचित यही है कि 
आप इन दिव्य-वस्त्र तथा आभरणों को धारण करें ।' 


३०, राघवों का सुवेलादि पर पहुँचना 
तब राम-लक्ष्मण ने दिव्य वस्त्राभरणो, चदन तथा पुष्प-मालाओ को धारण किया 
और <विचद्र के समान दीप्तिमान्‌ होने लगे । समुद्र ने उन्हें आणीर्वाद देकर विदा किया । 
पेव राम-लक्ष्मण हनुमान्‌ तथा नील के कधो पर बैठकर (सुवेलादि के लिए) रवाना हुए। 
सभी देवता उनकी स्तुति करने लगे, समस्त लोक उनकी जयजयकार करने लगा। रामचद्र ने 
समुद्र को अनुमति देकर उसको घर भेज दिया और अपने अनुज के साथ लका की ओर गह 
करके सेतु के मार्ग से ऐसे रवाना हुए, मानो रमणीय राक्षस-लक्ष्मी के सीमत पर ही चरण 
घरकर चल रहे हो । विभीपण गदा हाथ में लिये हुए कपि-सेना के आगे-आगे चलने 
लगा । निदान परात्रमी राम अपने मत्रियो के साथ सुवेलादि पर पहुँच गये और वहाँ 
शिविर डाल दिये । राम के पीछे-पीछे उनकी विद्याल वानर-शना चली । कुछ लोग सेतु 
के किनारे-किनारे चल रहे थे, तो कुछ सेतु के वीचोबीच जा रहे थे, कुछ वायर बड़े 
कौतुक के साथ आकाझ्न-मार्ग से जा रहें थे, तो कुछ भुद वनांकर जा रहे थे, कुछ समुद्र 
में तैरते हुए जा रहें थे, तो कुछ अपने समृह से विछुडकर आगे पीछे-दीट रहे थे । उस 
सेना के हुकार तथा गजनों की ध्वनि ने समुद्र-घोष को भी दवा दिया । उस ध्वनि के 
प्रभाव से आकाब-पाताल तथा दिशाएँ कपायमान होने लगी । इस प्रकार, राधव ने अपनी 
सेना के साथ सेतु की यात्रा पूरी करके नुवेलादि पर पडाव डाल दिया !। अपने गुलचरों 
के हारा राम के आगमन का वृत्तात जानकर रावण ने समस्त दानवों को अपनी राजन्यभा 

में बुलाया और स्वय नवस्त्न-खचित सिंहासन पर आसीन हुआ । 

है ३ ६ 


स्टेर रंग्नाथ एयायरी 
३१ केकरसी का हितोपदेश 


उस समय कैकसी सभा में आई । उसे देखकर रावण ने बड़े आदर के साथ उठकर उसे 
प्रणाम किया और योग्य आसन पर उसे विठाकर स्वय भी बैठा। फिर, अत्यत वितय से 


उससे कहा--हैं माता, आप तो कभी राज-सभा में नहीं आती ॥। जाज आपके जागमन 
का क्या कारण हैँ ? झपा करके उतलाइए ॥ 


तव उसने कहा--हे पुत्र, में जितना जानती हूँ उसे कहूँगी । ध्यान से सुनो । 


राम की पत्नी पर आसक्त होकर तुम उन्हें घोखे से हरकर ले आये हों। इसीलिए आज 
ऐसी भयकर घटनाएँ घट रही हे । स्वय विप्णु ने आर्यो के रक्षणार्थे दबरथ का पुत्र होकर 
जन्म लिया, ताडका का सहार किया, कौथिक के बन्न की रक्षा की, अपने चरणो दी घृूलि 
से शिला को स्त्री के रूप में बदल दिया, बड़े हर्ष से शिव-चन का भग किया, जानकी से विवाह 
किया, परश॒राम के गये को तोड़ा, अपने पिता की आज्ञा मानकर लक्ष्मण तथा जानकी के 
साथ वनवास के लिए आबा, वनो में रहनेवाले मुनियो को जअमयदान दिया, तुम्हारी वहन 
के नाक-क्रान काट दिये, खस्ूपण का सहार किया, मारीच का वध किया, अपने भयकर 
अस्च से वालि को गिरा दिया, सर्यनदन को अपना सेवक वना छिया, अपने बाण के अग 
भाग पर उपस्थित होने के लिए समुद्र को विवश क्या, कपियो से समुद्र पर पुल वेंबवाया 
और बवब देवताओं की रल्ा करने तथा असुरो को दण्ड देने के उद्देश्य से सुवेलादि पर जाकर 
ठहरा हुआ है । उस दानवातक (राम) ने इस पृथ्वी पर मत्स्य, कर्म, वराहु, सिंह, वटु, 
(भार्गव) राम, तथा (दशरथ-पुत्र) राम के रूप धारण किये हे । वे स्वय आदिनारायण है। 
उनकी महिमा का वर्णन करना किसी के लिए सभव नहीं है। उनकी आज्ञा से ही वायूपूत्र नें 
समृद्र पार किया, जानकी वें राम फा स्देश सनाया, यक्ष आदि राक्षसवीरो का संहार 
किया और लका-दहन करके अपने प्रभु के पास लौट गया । तुम उस पवनपुत्र को ही 
जीत नहीं सके । तव उसके प्रभू को जीतना क्या, तुम्हारे वक्ष की बात हैं ? 
तुम्हारे पिता ने एक दिव्य रहस्य मुझसे कहा था । उसे में तुम्हें सुनाती हूँ । ध्याव 
से सुनो । 

“एक वार ब्रह्मा तथा इन्द्र, मुनि, खक्ष तथा गधर्वष-नेंतानों को साथ लेकर विष्णु 
भगवान्‌ के दर्णनाशें गये और उनसे निवेदन किया--हे प्रभो, रावण तथा कुंसकर्ण के 
अत्याचार असह्य हो गये है | कृपया उनसे आप हमारी रल्ला करें । तब उन्हें देखकर 
कमलनाम नें कहा--मे सूर्यवश्ञ में जन्म लेकर युद्ध में सहज ही इन रामसों का संहार 
कहेंगा । फिर, उन्होंने सभी देवताओों को देखकर कहा--वतुम वानरो का रूप घारण क ९ पृथ्वी 
पर जन्म धारण करना और यद्ध में मेरी सहायता करना । 

“यह वृद्दात तुम्हारे पिता ने मुझे बताया था । वह विप्ण ही ये राम है । लक्ष्मी 
ही उनदी पत्नी हैं। देवता ही वानर है । उन्हें तुम युद्ध में जीत नहीं सकोगे। अत; 
तुम अपनी दुबुंद्धि तज दो और उस मूसुता, जगन्माता, निगमों द्वारा प्रगसित, निखिल-लोक- 
विश्यात, अमित्त-गुमोग्त, पवित्र सीतां को राम के चरणों में सौप दो । पापथोवक, धीर, 
सतत सुनायी तथ्य आर्येक्षपाती विभीषण को लका का शाज-तिलक कर दो और राम 


खुछुकाोंड र्‌८३ 


की शरण की याचना करो । वे गरणागत चत्रु की भी उसी प्रकार रक्षा करते है, जैसे 
(उन्होने) गजेनद्ग को रक्षा की थी ॥* 


कंकसी के हितोपदेश को सुनकर रावण क्रुढ होकर बोला -हे माता, मेने पचास 
लाख वर्ष तक अवाघ-गति से राज्य किया है और सब प्रकार के सुखों का अनुभव किया है। 
में स्वप्न में भी किसी से नहीं डरता । इन नर और वानरो की गशक्ति ही कितनी हैं ? 
क्या, ये देवताओं से भी अधिक शक्तिशाली है ? में अवश्य इन्हें ज,त लूंगा । यदि में 
उन्हें जीत नहीं सका, तो राम के वाणों से मारा जाऊँगा। किन्तु, इन नीच मानवों के 
सामने अपना सिर नहीं भुकाऊँगा । यह सत्य है । हे माता, आप ऐसा उपदेश मत दीजिए 
आप रनवास में लौट जाइए । आप लाख कहें, तो भी में सीता को नहीं लौटा सकता ।! 
कैकसी इस प्रकार कहनेवाले अपने पुत्र की निदा करती हुई अपने अत पुर में चली गई 
और विचार करने लगी, होनहार बलवान है, वह किसी भी प्रकार से ठाला नही जा 
सकता । यो विचार करके वहे सतत धर्माचरण में लीन रहती हुई अपना समय व्यतीत 
करने लगीं । 

रावण ने भेरियो तथा नगाडो के अत्यधिक निनाद के द्वारा सारी राक्षस-सेंना को 
एकत्रित किया और आयुधो से सज्जित अपने प्रताप से दीप्त, मत्रियों को देसकर अत्यत 
भयकर रूप धारण करके, आँखों से अग्नि-वर्षा करते हुए कहने लगा--रामचन्द्र सेतु को 
बाँधकर अत्यधिक शौयें के साथ सुवेलादि पर आकर ठहरा हुआ हैं । जब मेरा भत्रु मेरे 
ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है, तब तुम्हारा इस प्रकार उपेक्षा करफे सोते रहना, 
वया उचित है ? पर तुम्हें क्यो दोष दू ? तुम मत्री! हो, ऐसा सोचकर तुम पर विज्वास 
करना मेरी ही भूल हैं । क्या, तुम सोचने हो कि तुम्हारे उपेक्षा करने से मेरी हानि होगी । 
ऐसा कभी नहीं होगा । साम, दान, भेद आदि उपायो से यदि मे उसे अपने वश में ला नहीं 
सकता, तो में राम के साथ घोर युद्ध करूँगा । 

रावण ने जब ऐसा कहा, तव सभी राद्ास लज्जित होकर सिर भूकाये चुप हो रहें । 
जब रावण ने उन्हें डॉटकर कहा कि तुम लोग चुप क्यो हो, तव इद्रजीत अपना शी दिखाते 
हुए कहने लगा-- हे देव, समस्त देवताओं पर विजय पानेवाले आपको इन राम-लक्ष्मण 
जैसे अफिचनों के हारा कौन-सी हानि पहुँच सकती है ? आप चिंता मत कीजिए । में 
बल, साहस तथा शौर्य से सपन्न हूँ | क्‍या, आप नहीं जानते कि मेने इन्द्र को नाग्र-्पाश 
से वाँधकर उसकी कैसी दुर्गंति कर दी थी ? भीपण रण में कालकेय आदि राद्षसमवीरो 
को क्‍या मेने परास्त नहीं किया था ? तब हे दनुजेश, साधारण मानव, कृश, तपस्वी 
तथा दुर्बेल दशरथ-पुत्रो को युद्ध में मार डालना मेरे लिए कौन वडी बात हैँ ? आप सदेह 
भत कीजिए; में अवध्य उन्हें युद्ध में मार डालूगा ।”/ 


है 


तव अतिकाय नामक राक्षय ने राक्षमराज से कहा--हे दानवनाथ, जो राजा 
नीतिवानू होकर, दूसरों की सपत्ति की अभिलापा किये बिता समस्त ससार की प्रश्नसा 
प्राप्त करते हुए, जीवन-बापन करता है, वही सदा राज्यन्यालत करेगा । हें दनुजेश्वर, सर्प- 


कुल-तिलक राम ने तुम्हारा बया अपकार किया है ? उनकी न्प्री पर आपनी आनसवित 


प्द8 रणनायथ एयायर 


बे 


क्यों हुई ? आपका तथा आपकी लका का सर्वेताश करने के लिए इन राक्षसो ने निश्चय 
गे में सौप दें और वुद्धिमान्‌ 


च 


किया है । उचित यही हैं कि आप सीता को राघव के हाथो 
होकर इस ससार में सम्मान श्ाप्त करते रहें ।' 

इस प्रकार, कई रीतियो से अतिकाय ने रावण से हित-वचन कहें, किन्धु 
रावण ने उसकी बातों की जरा भी परवाह नहीं की । उसने बडे साहस के साथ शुक 
तथा सारण को देखकर अपना शौये दरसातें हुए कहा--यह वड़ी विचित्र वात हैं कि एक 
मानव अ्मुद्र पर पुल वाँघे । तुम लोग कहते हो कि रास ने ऐसे पुल का निर्माण किया है । 
इसलिए तुम दोनो उसकी सेना में श्रवेश करके उसकी शक्ति का पता लगाकर जाओं | 

३२, शुक तथा सारण का रास की सेन्‍्य-शक्ति का परिचय पाना 

तव उन दोनो ने वानरों का वेश धारण करके जगलो, उपवनों तथा पवव॑तो में सेतु 
के निकट और समुद्र के उत् पार के प्रदेशों तथा गुफाओ में विचरण किया और सब स्थानों 
में व्याप्त वानर-सेना को देख आइचये से अपने सिर कपाने लगे । फिर, वे आइचर्य-पुलकित 
गात्र से वानरूसेना के रीत< प्रवेश करने लगे । उस समय विभीषण ने उन्हें पहचान लिया 
और उन्हें वदी बनाकर रामचंद्र के सम्मुख उपस्थित करके कहा--है राजन्‌, ये दोनो 
रावण के मत्री हें | वानरो के वेश में यहाँ आये है । इनक नाम शुक तथा सारा हे । 
वे हमारी सेना में प्रवेश करके हमारी सभी बातों का परिचय प्राप्त करके जाना चाहते है ।' 

तव उन गुप्तचरो ने भय से अत्यधिक आत्रान्त होकर हाथ जोडकर श्रणाम किया 
और कहा--हे देव, हम रावण के भेजे हुए गरुप्तचर है । विभीषण ने जो कहां, वेंहे 
सत्य है है रावण ने आजा दी हैं कि हम आपकी सेना की पत्ता लगाकर आयें । इसलिए 
हम आये हूँ ।॥' 

तब राघव ने हँसते हुए कहा--तुम रावण के मत्री हो, इसलिए तुम्हें मार डालना 


् 


हो उचित है । किन्तु मे तुम्हें मारता नहीं चाहता । तुम्हें मारने से हमारा क्या हिंत हों 
सकता है ? तुम यहाँ की सभी वातें विना किसी अपवाद के देख लो और शीघ्र जाकर 
अपने प्रभु रावण से सारी व.तें कहो । उससे यह भी कहना कि जिस शक्ति के भरोसे 
वह सीता को चुराकर लाया है, उस शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए यहाँ आये । उससे 
हना कि मै युद्ध में लका के सभी राक्षतों का तथा गर्व से फूलनेबवाले उसका भी वध 
करूँगा । अब तुम जातो । 
तव उन दोनों ने विभीषण के साथ जाकर समस्त वानर-सैन्य की शर्वित का पता 
लगा लिया और तुरत रावण के पास जाकर बोले--हे देव, आपकी आज्ञा के अनुसा< 
हम वानस्सेना के विकट जाकर उसको देखने लगे, तो आपके अनूज विभीषण ने हमें 
पहचान लिया और हमारा वध करने के उद्देश्य से हमें वदी बनाकर राम के सामने उप- 
स्वित किया । लेकिन रामचन्द्र दयानिधि हे, इसलिए उन्होंने हमारे वध की आजा नहीं दी। 
हे लकेश्वर, आपका, आपकी लका का तथा समस्त राक्षमों का नाथ करने के लिए एक 
सौमित्र ही पर्याप्त है । अब राम के भीौर्य का उर्णन क्या करें ? हे देव, हमने सेतु को 
देखा । बह बंद योजन लवा और दस योजन चौडा है ! ऐसे विशाल सेतु-भर में वानर _ 


ख्द्धकांड स्ड५ 
सेना ठहरी हुई है । उस सेता की गणना करना असभव हैं | जहाँ देखो वहाँ वानर-सेना 
ही है । कुछ सेना पर्वतो पर ठहरी हुई है, कुछ सेना अभी 5हरने की व्यवस्था में ही 
लगी हैं, कुछ सेना ठहने के लिए स्थान खोज रही है, कुछ सेना समुद्र के उस पार हैं 
और कुछ सेना वहाँ से निकलकर इस पार आ रही है । हे प्रभो, इतनी विधाल सेना 
को देखकर मन में भय उत्पन्न होता है । एक एक स्थान पर ठहरी हुई सेना की गणना 
करके लिखना ब्रह्मा के लिए भी असभव हैं | इसलिए हे दानवेन्द्र, आप राम के दर्शन करके 
उन्हें सीवा को लौटा दीजिए और आनंद से रहिए ।” 
उनकी ऐसी वातों को सुनने की इच्छा न रखनेवाला रावण अत्यधिक रोप सें 
बोला--चाहे देवता तथा गवव्े ही मेरे ऊपर आक्मण करने आवें, तो भी में सीता को 
नहीं छोड गा । तुम ऐसे कायर क्यों बनते हो ? कदाचित्‌ वानरो ने तुम्हें पकड़कर अच्छी 
तरह पीटा है, इसलिए तुम भयभीत होकर भाग भाये हो । डरो मत, वें कपि तुम्हारा 
पीछा करते हुए नहीं आ सकेंगे ।/ इस प्रकार कहते हुए रावण बुक तथा सारण के साथ 
अपने ऊँचे सौध पर चढकर उस विश्ञाल कपि-सेना को देखकर आदइचर्यचकित हुआ । 
उसके परुचात्‌ उसने शुक-सारण को देखकर पूछा--इस विशाल कपिन्सेना का 
सचालन करते हुए कौन आगे-आगे चलेगा ? सावधानी के साथ उसके पीछे-पीछे कौन 
चलेगा ? इनमें कौन शूर हैं ? कौन चतुर है ? सूर्यवशी राम किसके परामर्ण से काम 
करता हैँ ? किसके साथ राम अपने मन की वात करता है ? सेना किसकी आजा के 
अधीन है ? दिन-रात इस सेना की रक्षा करनेवाला कौन है ? इस सेना में सामत 
कौन हैं ? इसमें सुग्रीव कौन है? राम कोन है ? लक्ष्मण कौन हैं ? और, अगद कौन है ? 
उन्हें दिखाने के पश्चात्‌ उनके शौर्य के बारे में कहो । मुझे क्रोध नहीं आयगा ।' 


३३. सारण का रावण की कपियों का परिचय देना 


तब सारण बडी कुशलता के साथ इस प्रकार कहने लगा--हिें देव, पुकिंद नदी- 
तटवर्ती सूर्यपुत्र, इस पृथ्वी पर महान्‌ बली है । उसीने इस लका को उखाड दिया था और 
यहाँ भयकेर चीत्कार व्याप्त कर दिया था । वही एक लाख श्रेष्ठ कपि-वीरो के साथ 
वानर-सेना के अग्न भाग में रहता है । हे देव, नील एक अतिवलजाली है और वहीं राम 
का सेनाध्यक्ष है । अपनी पूँछ को बडे गर्व से हिलाते हुए समस्त दिज्ञाओो को कपित करने- 
वाला हजार पद्म तथा एक झख उत्तम वानरूसेना के साथ, पर्वत के समान दिसाई पड़ने 


जे 


वाला वालिपुत्र अगद है । वह वालि की अपेक्षा अधिक बलवान है | वालियूत्र के उस 


ओर रहनेवाला नल है, जो चन्दनाद्वि का स्वामी है और विख्यात विश्वकर्मा का प्रुत्र हैं । 
उसीने एक सहस्न करोड और अस्सी लाख वानरो की सहायता से समुद्र पर पुल का 
निर्माग किया है और समस्त वानर-सेतवा को समुद्र पार कराया है। वह अकेले ही अपनी 
विशाल सेना के साथ समस्त लका को जीतना चाहता है । हें राद्षमराज, रविपुत्र दो 
सामने ही रमणीय काति से रजतादि की समता करनेवाले ब्वेत नामक वानर वो टेखिए । 
वही समस्त सेना की व्यवस्था करता हैं । हे लकेंश वह देगिए, सहन करोंट बानर-वीरों 


रे 


कणो साथ लिये हुए वेगवान्‌ नामक वानर हमारी छोर देख रहा है। बह सुग्रीव का मित्र हैं 


र्‌८द्‌ रएनाथ एयायण 


जौर विध्य, सह्य तथा सुदर्शन आदि मुख्य पर्वतो का स्वामी है। हे देव, उस रभ 
नामक कंपिलवर्ण तथा दीर्घ कंशवालें वानर को देखिए, जो सिह-शावक के समान दीख 


रहा है | वह गभीरता का समुद्र हे और उसकी सेवा में एक सौ तीस लाख वानरों की 
सेना हैं । हे अमरवैरी, उस कुमुद नामक वानर को देखिए, जो सकोचनाचन का अधिपति हैं 
जौर दस करोड वानर-सेना की सेवा प्राप्त करते हुए अपने बल के मद में फूल रहा है। 


हे देव, उस शरभ नामक वानर को देखिए, जो रम्य जैल (सालेय पर्वत) का राजा हैं, 
जो विद्याल वक्ष तथा उरूप्रदेश से सुग्रोभमित हो रहा है और जो चालीस लाख तथा 
चार सह वानरों के साथ लका पर बाक््मण करने की प्रतीक्षा कर रहा हैं ! 


| 


६ 


है दानवेन्द्र, वह देखिए पारियात्राचल का अधिपति, भयकर-रण-कुगल पनस है, 
जिसकी सेवा में सतत पचास लाख वानर रहते हे । सिंदुर की लालिमा को भी मात करने- 
वाली शरीर की काति से विलसित महा गक्तिणजाली क्रोवय नामक उस वानर को देखिए, 
जो लका की ओर दृष्टि गडाये सोच रहा है कि इस लका का नाश करने के लिए मे 
अक्ले पर्याप्त हैँ । उसकी सेवा में साठ लाख कपि रहते है । हे देव, उस गवय तामक 
वानर को देखिए, जो विविध जौयों से युक्त हो अपने सत्तर लाख बलवान वपि-श्रेप्ठो की 
सेना के साथ गोभा दे रहा है | ये सभी वानर कामरूपी है, भयकर जवित से सपन्न हैं, 
युद्ध में नियुण हे और देव-दानवों के लिए असाध्य हैँ । ये सभी सेना के अग्नन्भाग के 
वीर हैँ | हे दानवनाथ, अब सेना के मध्य भाग में रहने वाले वीरो का विवरण सुनिए 


#8.2 


हे दैत्यनाथ, वहाँ पर उस हर नामक वानर को देखिए । विद्ञाल वाहु, तथा 
विविध वर्णवाले असंख्य सहस्त वानर उसकी सेवा में लगे हुए है ! वह अकेले आपके 
साथ बुद्ध करने की प्रतीक्षा करता है । उसके निकट ही जाववान्‌ के अनुज धूम्र को देखिए । 
अत्यत नील मेघों के ठीच में इन्द्र के समान गोमाबमान होनेवाला वह नर्मदा नदी के 
तट पर स्थित ऋक्षनय का अधिपति है । वह महान्‌ बलगाली तथा शझ्ूूर है और असख्य 
समर्थ भालू उसकी सेवा में रहते हे । उस जाववान्‌ को देखिए । नीले पर्वत के समान 
गरीर घारण किये हुए एक करोड भालू उसकी सेवा में लगे हुए है । पूर्व काल में देवासुर 
[द्ध के समय अपने युद्धकोशल का परिचय देकर उसीने इन्द्र से कितने हीं वर प्राप्त 
किये थे । युद्ध में वह घूर्जटि (शिव) से भी परास्त नहीं होता। उस धुरंधर योद्धा सन्नादन 
को देसिए । उसका एक-एक पाउ्वे भाग एक-एक योजन लवा है और उसका शरीर भी 
उनना ही दीर्घ है । हे देव-शत्रु, उसकी सेवा में एक पद्म वानर हैँ । वह वानरो के पिता- 
मह-जैसा है और युद्ध में उसने इन्द्र को भी जीत लिया हैं। उस इद्रजालक नामक वानर 


4) 3॥ नि 


को देखिए | चह नील का अनुज हैँ । उसने अग्निदेव से एक गधषव्व॑-यवती के गर्भ से 
जन्म लिया है और जब नदी-तीर पर स्थित द्रोण पर्वत का अधिपति है । उतकी सेवा में 
एक सहस्त करोड़ कपि है और वह महान्‌ शर हैं | वहाँ देखिए, ग्रथत नामक वीर वानर 


बपनी एक सहन्न करोड वानरूसेना के साथ ठहरा हुव्ग है । वह अति वलज्ञाली हैं और 
गगा नदी-लट पर विचरण करते हुए झिभिराद्रि का पालन करता है । हे देव, वहाँ पर 


गज नामक वानर को देखिए, जो दस करोट कपियो की सेना के साथ दीख रहा है। 


शुछुकांड र्5छ 


हे इन्द्रारि, यम के सदृश करोडो वानरो की सेवा प्राप्त करते हुए रहनेवातें उस गवाक्ष 
को देखिए, वह युद्ध करने के लिए अत्यधिक उत्साह प्रकट कर रहा हैं। उस कंसरी नामक 
वानर को देखिए, जो उत्तुग काचन पर्वत का स्वामी है । उसके पास, घवल वर्णवाले, 
उहृण्ड पराक्रमी, सूर्य-सम तेजस्वी, तथा रण में भयकर रूप धारण करनेवाले विविध रूपों 
के दस सहंस्र प्रस्यात वानर हैँ । हे देवताओ के शत्रु, उस अद्वितीय पराक्रमी, महान्‌ बल- 
गाली, शतवली को देखिए, जो राम वी कृपा प्राप्त करके उनके लिए अपने प्राण त्यामने 
के लिए सतत सन्नद्ध रहता है । उसकी सेवा में सिह-शावक को मात करनेवाले विद्याल 
पिगल-नेठवाले सहख्न करोड वानर है । वही सुषेण है, जो अपने समान सहख्य करोड बानरों 
को साथ लिये हुए युद्ध के लिए तैयार खडा है । वह उल्कामुख है, जो दल करोड वानरों 
के साथ ठहरा हुआ है । ग्हाँ देखिए, यह ऋषभ है, और इसकी वानर-सेना दस करोड़ 
की हैं । वह देखिए, वही विदज्ञाल भुजाओवाला गधमादन है, जिसके अधीन सौ करोड़ 
वानर हे । हे देव, आप ध्यान रखें कि सुग्रीव वी निजी सेना ही इक्कीस सह शख और 
दो हजार एक सौ सैनिको की है । ऐसे वानर-बीरो की सेना किप्किधा में रहती थी भौर 
ये सभी वान देव तथा गधर्वो से उत्पन्न हुए हैँ । वे कामस्पी है और सतत समर करने 
की प्रवल इच्छा से प्रेरित रहते हैं । उन्होने ब्रह्मा से अमृत-दान प्राप्त किया हैं, अत 
देवताओ से भी श्रेष्ठ है । इनके अतिरिक्‍त मैन्द तथा द्विविद नामक अद्वितीय वीर दस महस 
करोट सेना के साथ समुद्र के उस पार ठहरे हुए हे । हे लकेन्द्र, वहाँ सुमुख तथा विमुख 
नामक वीरो को देखिए । ये मृत्यु के ही पुत्र हैं और मृत्यू से भी अधिक शवितशाली है । 
है दनुजेन्द्र, उस अद्वितीय वीर वानर को देखिए, जिसकी सेवा असस्य बानर भृत्यो वे समान 
करते हूं । उसी ने समुद्र को लाँधकर, आपकी तथा आपकी सेता की उपेक्षा करके जानकी 
के दर्शन करके अज्ञोक-वन को नष्ट-अप्ट कर दिया था और आपके प्रिय पुत्र को मारकर 
लकिनी को परास्त किया था । आप जानते ही है कि वही वायुपुत्र हनुमान्‌ हैँ । एक 
और विचित्र बात सुनिए । वाल्थावस्था में उसने एक दिन पूर्वदिशा में उदित होनेवाले 
सूयंबिव को देखकर, अत्यधिक भूखा रहने के कारण उसे फल समभकर, उसे पकडने के 
उद्देश्य से आकाश में तीन सहस्न योजन तक उड़ा था और बडी तीत्र गति के साथ उदयाद्रि 
पर गिर पडा था । उस समय उसकी हनू (दाढ की हड्डी) टूट गई, इसलिए उसका 
नाम हनुमान्‌ पड गया हूँ । हे देव, ये सभी वानर समस्त ससार को वहत ही जीघत्र जीतने 
में समर्थ हे । ऐसे श्रेष्ठ कपियो की सस्या की गणना ही असभव हैं ।॥” 


३४ शुक का रावण को राम का पराक्रम सुनाना 
इस प्रकार सारण के कहने को पश्चात्‌ विवेक-्सपन्न शुक ने रावण से बहा-- 


हे असुरेन्द्र, इस विशाल सेना के प्राण स्वरूप राम के तेज का वर्णन करूँगा, आप सुनिए । 
रामचन्द्र नील मणियो की काति से विलसित है, कमलों के सदुध नबनवाले हे, विमत 
कीत्ति से सपन्न हे, सत्य के आकार है, सतत घर्माचरण करनेवाले हैं, ग्स्व्रान्त-विद्या- 
विशारद हूँ, अखिन शास्त्रज है, सुकीर्सि-श्री से सपन्न हैं, सूर्य उनके पिवामह है, इस भी 
विचार किये विना उनकों भी उत्तप्त करने का प्रताप रखतेवाले वीर 2, अपने गरो में 


श्ष्ज़ रंगनाथ एत्य/यर्ग 


आकाश को भी चर-चर कर देनेवाले हैं तथा पृथ्वी को भी टुकड़े-टुकडें करने की क्षंमत्तां 
रखते है । हे दशकंठ, उनका (त्रोघ) शत्रुओं के लिए साक्षात्‌ मृत्यु हैं । चूँकि, जाप सीता 
को ले आये, इसलिए वे युद्ध करने के लिए जाये हूँ, अन्यथा वे गरणागतों के, वज्ञ के 
पिंजड़े के समान, रक्षक है, वे घरों के भी घूर है । गरण की याचना क्यि विना उनके 
त्रोधष का अत नहीं होता | आपने ऊपर छोघ करने के कारण ही उनकी आँखों में लालिमा 
छाई हुई है । वे ही त्रिभुवनों के जासक सूर्यकुल-तिलक (राम) हैं । 

“वह देखिए, उनके भाई मच जुद्ध स्वर्ण-वर्णवालें राम के अनुज जक्ष्मण घनुष घारण 
किये खड़ें है, अत्यत आग्रह के साथ सप्त भुवनों को परास्त करनें की शवित से संपन्न हे । 
वें राम के प्राणावार के समान है और उद्ण्ड पराक्रमी हे | हे असुरेद्र, उस राजा राम 
के पीछे आपके अनुज है, जो आपको युद्ध में परास्त करके लका पर राज्य करने के 
उद्देश्य से राम भूपाल के द्वारा राज्याभिषिक्त होकर वड़े आनद से फूल रहे है । वे परम 
धर्मानूसरण करनेवाले तथा नींतिवान्‌ू विभीषण हे । हे देव, लक्ष्मण तथा विभीषण के 

निकट ही जो खड़ा हैं, वह सगीव है, जो सर्वमान्य गुणों से सपन्न हो किप्किन्धा का राज्व- 
भार वहन कर रहा है । वह महनीय लक्ष्मी से संपन्न होकर स्वर्ण-माला घारण किये हुए हूं 
वह विगालवाह तथा जअत्यत भयकर जौ से विलसित हैं। उसकी सेना के वारे में 
सुनिए । (कहते हैं कि) झतकोदटि सहस्र संख्या का एक शख होता है । ऐसे लाख बंखो 
का एक महावृ द होता है और ऐसे लाख महावृदों का एक पद्म होता हैं । एक लाख पतद्मों 
का महापत्न होता है और लाख महापनञ्मों का एक खर्द होता हैं। लाख खर्वो का एक 
महास्र्व होता है, लाख महाखर्त एक समुद्र कहलाते हे और लाख समद्र महासम॒द्र कहलाते है । 
लाख महासमुद्र, महदाख्य कहलाते हे । वालि के अनुज के पास एक करोड महदाख्य सेना है । 
अब जाप ही स्वय विचार करके देख लें कि उसकी सेना कितनी वडी हैं । उसकी सेना 
का आदि तथा अत जानना असभव हैँ । उसके सामथ्यं की समता और कोई सेना नहीं 
कर सकती | वहसेना दुर्वार है। इसलिए हे देव, उस सेनासे भिडकर युद्ध करता असभव ही” 
छुक ने जब इस प्रकार कहा, तव रावण ने एक वार फिर सारी वानरनसेना की 
पर्यवेज्षण किया कौर गर्म में वडवानल प्रज्ज्वलित होनेवाले समृद्र की भाँति मन-दह्ी-मन 
भयभीत हुआ, किन्तु अपने मय को दवाकर, निर्भीक की भाँति ऋरोब प्रकट करते हुए कहा-- 
अपने स्वामी की इच्छा के विरुद्ध, कोई मंत्री मंत्रणा देकर उसको विचलित करें, 
यह कैसी नीति है ? तुम विना विचार किये, मेरे सामने मेरे विरद्ध इस प्रकार की वातें 
कह रहे हो । क्‍या, यह तुम्हारे लिए उचित है ?” रावण के इतना कहते ही ज्ुक तथा 
सारण भयभीत हो, अपना सिर नीचा किये वहाँ से चले गये । 
३४. राम के माया-धनुष तथा सिर दिखाकर सीता को मयमीत करना 

उनके चले जाने के णएब्चातू रावण अपने अतरग सचिवों के साथ वड़ी देर तक 
मत्रणा करता रहा और फिर उन्हें विदा करके दुर्वार हो, विद्यज्जिल्न नामक एक राक्षस 
को बुलाकर कहा--तुम अपनी माया से राम के सिर तथा घनुप का निर्माण करके शीक्र 
लें आओो । उह तुरत गया और अपनी सारी निपुणता तथा माया से वनावटी सिर तथ्य 


खद् कांड २८८ 


धनुष का निर्माण करके ले आया । रावण ने उसे अच्छा पुरुकार दिया । वहाँ से रमणीय 
अद्योकवन में जाकर दनुनेण्वर ने सीता को देखा । उस समय सीता सिर भकायें अत्यत 
चिता में पडी, कातर दृष्टि से पृथ्वी को इस प्रकार देख रही थी, मानो वनधरा को कोस 
रही हो कि हे माता, तुम मुझे इतना अधिक दुख वयो ठगी ? उनकी आँखों से 
अविरल अश्रुधारा इस प्रकार वह रही थी, मानो उतके चित्त का क्रोध भीतर न रह सकने के 
वं।रण धाराओ के रूप में वह रहा हो। उनका गरीर ऐसा धूलि-धूसरित था, मानो पृश्ती 
यह कहती हुई उनसे लिपट गई हो कि हे पुत्री, यह कैसा दुर्भाग्य है कि तुम ऐसी दुरवस्था 
को प्राप्त हुई हो । वे इस प्रकार बैठी हुई थी, मानो रावण के त्रूर कर्म ही देवता का 
रूप धारण कर यह निश्चय करके वैठा हो कि हे रावण, मे तुम्हारें तथा तुम्हारे राक्षस- 
कुल फा सर्वनाश करके ही यहाँ से उठूगा । वे वार-बार ऐसे दीर्घ नि श्वास छोठ रही थी, 
मानो राक्षस-लूपी नीरस बृक्षों को विध्वस्त करने में प्रयत्तनगील प्रलय-क्राल की अग्नि हो । 

अपनी ओर ध्यान दिये विना बैठी हुई सीता को देखकर, सर्वनाश को लिए 
उद्यत रावण ने कहा--हे जानकी, मूर्ख तथा अविवेकी खरदृपण आदि राक्षसों का वध 
करने मात्र से तुम राम के शौर्य का विश्वास करती हो और मेरे शौर्य को कभी अपने 
मन में भी नहीं लाती । जब राम बडे दर्प से अपनी सेना के साथ समुद्र को पार करके, 
वानरो के साथ सुबेलादि पर सो रहा था, तब मेरे एक प्रिय सेवक ने उसका वध करके 
उसके घनुष तथा सिर ले आया है । राम का प्रिय अनुज, तथा वानर परास्त होकर भाग 
गये हे । इसलिए हैं कमलमृखी, तुम अब राधव की आशा छोड दो और मेरी तथा मेरी 


_ 


स्त्रियों के लिए अधीर्वरी बनकर रहो । 

इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उसने विद्युज्जिद्द को बुलाकर, राम के सिर तथा 
धनुप को सीता के सामने लाने की आज्ञा दी । तब उसने कहा--हें सूदरी, यह लो, राम 
के सिर तथा घनुप ।! इतना कहकर वह उन दोनों को सीता के सामने फेंककर हेंसते हुए 
चला गया । उसी' समय आकाशवाणी हुई---राम भूपाल युद्धभूमि में असुर (रावण) का 
सिर कार्टेगे, यह तुम्हारे पति का सिर नही हैं । तुम विचलित मत होओो । तुम्हारे धर्मा- 
चरण के प्रभाव से रामचद्र अवश्य विजयी होगे ।/ (फिर भी) उस चचलाक्षी सीता ने 
उस सिर को देखा और राम की आँखें, मुंह, ललाट, मौलि-रत्न की प्रभा, दत-पक्ति और 
कर्ण-पुटो का सौदर्य तथा अधरो की काति का स्मरण करके उस सिर को राम का ही 
सिर समभकर मूच्छित होकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पटी, मानो पृथ्वी माता ही उस लतागी 
को अपने हृदय पर लिटाकर उन्हें सात्वना दे रही हो कि 'यह मिथ्या है । तुम्हारे पति का कोई 
नहित हो नहीं सकता । हें सुबरी, यह माया हैं, इसकी ओर तुम्हें देखना नहीं चाहिए ।' 

थोडी ही देर में सीता सेंमल गई और झ्ोकारिनि से सत्तप्त होती हुई बोली--हाय, 
है बैकेयी, कलह को जन्म देकर तुमने इस प्रकार इध्वाकु-बश का सव्वनाश किया है ! 
रापवेद्र ने तुम्हारा क्या विगाडा था कि तुमने उन्हें अनावश्यक ही वन में जाने को 
आजा दी ? हे पृथ्वीपति, मेने पू्णे विश्वास किया था कि आपने समुद्र पर सेतु बाँसा है, 
और आप अवश्य मुर्के छुशइकर ले जायेंगे, किन्तु में यह नहीं समझती थी कि भगवान्‌ 

३७ 


२६० एंगनाएथ ए/ायायर 


मेरी ऐसी गति करेंगे । हे काकुत्स्थ, आपके और मेरे प्राण एक है, उस कथन को आप 
इस प्रकार भनिथ्या साबित कर रहें हे, क्‍या, यह आपके लिए उचित है ? हें सूर्यकुल- 
तिलक, पति से पहले ही प्राण देने का सौसाग्य सुभे नहीं सिला । आप भले ही जायें, 
में भी तुरंत ही अपने प्राण आपके पास भेज दूगी । पृथ्वी मेरी माता'है और आप मेरे 
पति हैं । क्‍या, आपके लिए यह उचित हैँ कि आप मुझे पुन व्सुधा की गोद में पहुँचा दे। 
अग्निदेव के समक्ष आपने मेरे पिता से मुझे गहण किया था । अब इस प्रकार आपका 
मुभसे विलग हो जाना, क्या आपके लिए उचित है ? हें राम, न जानें क्यो आपको इस 
दशा में देखकर भी मेरा हृव्य सतप्त नहीं हो रहा है | मेरा हृढ्य जब मतप्त नहीं होता, 
तो निश्चय ही आपकी यह दशा नहीं हुई होगी ।! इस प्रकार सोचती हुई सीता विलाप- 
करने लगी । 

उसी समय द्वारपालो ने आकर दवुजेश्वर से निवेदन किया--हें देव, किसी अत्यत 
आवश्यक कार्य के उपस्थित होने से आपके मतन्री सभा-स्थल में आपकी, प्रतीक्षा कर रहें हें। 
उनका सदेश लेकर आये हुए प्रहस्त आदि राक्षसवीर द्वार पर खड़े है । यह सुनकर 
रावण तुरत सभास्थल के लिए रवाना हो गया । उसके जाते हीं, वें माया सिर तथा 
बनुप भी ऐसे वअदृश्य हो गये, मानो रावण की लक्ष्मी भी इसी प्रकार शीघ्र ही अदृश्य 
हो जायगी । सभास्थल में पहुँचकर रावण ने जब मुप्तचरों से सुना कि राम शीघ्र ही 
आक्रमण करने का यत्न कर रहा है, तव उसने वड़े धैर्य के साथ ढिंढोरे पीटकर नगर में 
इस समाचार को प्रकट कराने का आदेश दिया और अपनी सेना को एकत्रित करने के 
लिए वेत्रधरों को भेजा । 

यहाँ सरमा सीता को देखकर कहने लगी--हे माता, तुम ऐसे वयो अलाप करती हो ? 
रावण की वातें सत्य नहीं है, उन्हें मिथ्या जानो, क्या तुम इतना भी नहीं जानती 
कि तुम्हारे सामने जो सिर फेंका गया था, वह माया का सिर था । इस राक्षस्त के दुर्वचन 
सुनकर म॑ सत्य समाचार जानने के लिए गई थी । मेरी बातें सुनों । राम युद्ध करने के 
लिए आ रहे हूँ | यह समाचार सुनते ही देवता का शत्रु (रावण) विचलित हो उठा । 
वह सुनो, छिदयोरे का अब्द हो रहा है । राक्षमों के भयकर रथो वे. दौडने की घ्वनि सुनों। 
लो, वह सुनो, रथिको तथा सारथियों के सभाषणों की भ्वनि सुनाई पट सदी है । इसलिए 
है कुटिल-कुतले, तुम चिता मत करो । राम पर किसी प्रकार की विपत्ति नहीं आई 

इसी रूमय लका को विदीर्ण करनेवाले गर्जन के साथ आनेवाली वानर-सेनाओ को 
देखकर राग्ण ने चिताक्रात चित्त से अपने मत्रियों को जीक्र बुलाकर कहा--वह देखो, 
राखव यूद्ध करने के लिए जा रहा है | तुम अब अपनी अमित झब्ति का परिचय देते 
हुए शीक्ष जाओ और उन दोनो मानवों को मारकर, वानर-सेना का वध कर डालो । 
जाओी, शीघ्र जाओ 7 

३६ मात्यवान्‌ का हितोपदेश 

तब रावण को देखकर नीतिवान्‌ माल्यवान्‌ ने कहा--हे राजनू, उचित समय में 

सधि कर लेन्ग श्रेबदायक होता है ओर उचित समय पर बैर ठानना गभ-प्रद होता हैं । 


खुद्धकाॉंड ९८? 


जो नीतियुक्त कार्य करता है, उस राजा के राज्य की सतत वृद्धि होती रहती है। 
नं/च व्यक्ति से वियह और बलवान्‌ से सधि करना विवृध-जनों का उपदेश है । सूर्यग्श- 
तिलक हमसे अधिक बलवान है, देवताओ के कार्य के लिए उन्होने पृश्वी पर जन्म लिया है। 
देववल भी उन्ही को प्राप्त है। यह कहने की आवश्यकता नही है कि वे घर्मात्मा है । 
घन्हें ऋषियों के सतत आशीर्वाद प्राप्त है । तुम तो सदा देवताओं को पीडित तथा ब्राह्मणों 
का नाश करते हुए पाप-चिता में लीन रहते हो । विजय सदा धर्म क्री ओर ही भुकी 
रहती है, अधर्म की ओर नहीं । उस दिन तुमने द्वहश से अन्य सभी लोगों के हाथो थे 
न मरने का वर प्राप्त किया था, किन्तु इस प्रकार तुम पर आक्रमण करनेवाते नर तथा 
वानरों पर विजय पाने का वर प्राप्त नहीं किया हैं । किसी भी रीति से देखा जाय, 
उनके हाथो से तुम्हारा नाश निद्चित है। इतना ही क्‍यों, होनहार की सूचना देनेवाले 
कितने ही शकुत्त दिखाई पड रहे हे ।_ विपुल होम-धूम त्रस्त-सा हो गया है । राक्षसो के 
तेज का अत-सा हो रहा है। हमारे गृहो में कई प्रकार की विपत्तियों का जन्म हुआ है । 
इसलिए तुम जान लो कि वे (राम) आदिनारायण हैँ और ऐसा करने के लिए (तुम्हारा 
वध करने के लिए) इस ससार में जन्मे हुँ । राम से विग्रह तुम्हें मोभा नहीं देता । 
इसलिए तुम अपना हुठ छोड दो । राम का शर ओऔद्धत्य का सहन नहीं करता । 
अत है दानवेन्द्र सीता को ने जाकर राम को सौंप दो और अपने वच्च की 
रक्षा करो ।' 

तब रावण ने माल्यवान्‌ू को रोबषपूर्ण वयनो से देखकर कहा--में अद्वितीय 
प्रताप और दक्षता से सपन्न तथा सतत विजयी होनेवाला हूँ । तु मेरे सामने मेरे शत्रु की 
प्रन्‍सा कर रहा है । अब में तुझे क्‍या कहें ” तू कभी अपनी कायरता नहीं छोडता । 
भला, में सीता को क्यो देने लगा ? मुभो किसका भय है कि में सीता को दे दूँ ?' 
उसके उद्धत वचनों को सुनकर मात्यवान्‌ ने कहा--मेरी रातों का अनादर करके तुम 
रामचन्द्र को युद्ध में कैसे जीततें हो, यह में भी देखगा । हम जायेंगे कहाँ ? (इन्ही 
आँखो से) देखेंगे ही। इस प्रकार कोध में आकर माल्यवात्‌ू, कुछ और परप वचन कहते 
हुए, वहाँ से चला गया । 

उसके पश्चात्‌ असुरेन्द्र ने पहले, अनुपम पराजमी प्रहरत को पूर्व के द्वार की रक्षा 
के लिए भेजा, अक्षीण बली मह्ोंदर तथा महापार्त को दक्षिण के द्वार पर भेजा, अपने 
पुत्र इद्रजीत को पश्चिम के द्वार पर नियुक्त किया, उत्तर द्वार की रक्षा के लिए झुऊ 
तथा सारण को नियुक्त किया और नगर के मध्य भाग को रक्षा के लिए विरूपाक्ष को 
आज्ञा दी । इस पक्रार, लका के रक्षण की समुचित व्यवस्था करके रावण अत्त पुर में 
चला गया । 

वहाँ राम ने सुग्रीव विभीषण, अगद, जाववान्‌, सुपेण, नील, नल, हनुग्गनू, गवाक्ष 
आदि वानरो को, (उनसे) परामर्श करने के लिए बुलाया और कहा--अब हम सब प्रकार 
के अवगुणो का आगार, तथा देवताओं के झन्रु रावण की लका का पर्यवेक्षण करें । देपों, 
उस एक दुष्द के कारण उसका सारा वंश नष्ट होनेयाला है 7 


शदर स्गनाथ रायायण 


३७ सुवेलादिि पर से राम-लक्ष्मण का लंका को देखना 
इतना कहने के पच्चात्‌ राम ने अपने जनुज तथा सुग्रीव झादि ठानरो के साय 


कप 


सुवेलाचल का आरोहण इस्र प्रकार किया, मानो कह रहें हो कि गुणवान्‌ जादमी अपने वंश 


में इसी प्रकार उछृति कें शिखर पर चढ्ता हैं| वहाँ से उन्होंने अप्नें हाथो से नप्द होने- 
वाली उस लका को देखा | उन नगर के गोपुरों पर जड़ी हुई मणियो की प्रभा इतनी 
उज्ज्वल थी, मानों हनमान्‌ ने जो बग्नि लगाई थी, वह उस दिन तक उैसे ही दीप्त 
हो नहीं हो । वडे-वदे क्‍यूसे से युक्त उस नगर का प्राकार ऐसा दीऊ रहा था, मानो 
राम के वाणों के प्रह्मरा से सश्नमित एवं परितप्तल होनेंवाले रावण-ल्पी मृग को भाग 
जाने से रोकने के लिए ही उलबकाल के ण्य-दगी शिकारी ने चारो ओर से छेरा लगा 
दिया हा ! ॥॒ 

उस दुर्ग की मीतारों पर दीखनेवाली चित्र-विचित्र ध्वजाएँ तथ्ग तोरण ऐसे दुख 
रहे थे, मानो मीनारे-ह्पी स्त्रियाँ सर्य के प्रकाञ में उज्ज्वल दीख्नेंगाले सदर तोरण-छूपी 
मगल-सत्रों से अलकृुत हो, सदर व्वजाएँ-रूपी अपने हाथों को हिलाती हुई (राम का) 
स्वागत कर रही हो--हिं राम, रावण का सहार करने के लिए ज्ञीघ्र चने आओं ॥ उस 
दर्ग की परिखाएँ इतनी विज्ञाल एवं गहरी थी, मानो रावण-रुूपी जगली भेसे को पकडने 
के लिए बम ने अनुकूल खट्टे खोद रखे हो । नगर के उज्ज्वल मौध आकाञ का स्पर्श 
करते थे और ऐसे दीख रहे थे, मानों रावण ने कैलास पर्वत को उस्ाइकर और उसे यहाँ 
लाकर सुदर ढग से फिर से उसका निर्माण किया हो | उस नगर से तुरही की ऐसी 
न्‍्बति निकल रही थी, मानो लक्ष्मी राम के स्वागतार्थ आ रही हो । उस नगर में कितने 
ही एसे उपदन थे, जिसके असस्य वृक्ष शुकों की बोली से हर्पित होते, श्रमरो के गुृजन से 
आनदित होते, कोबलो के कल-कजन से सतुप्द होते, मस्तर सारिकाशोें के सचालन से दीप्त 
होते, बाखाओं ओर मन-रूपी पललवों कों राग-रजित करते तथ्य सतत व्याप्त होनेवाले पुष्यो 
के सुगव-मार से महक रहें थे। उस नगर के कमलाकर कमला (लदघमी) के मन-कमल 
के समान थे | ऐसे नगर को आदव्चर्य से देखनेदातें राथव को अपने प्रताप का ताप प्रदान 
कन्के भगवान्‌ सूर्य पश्चिम समुद्र में डूबनें लगे | तब राम ने उन्हें प्रणाम किया और 
सुवेलादि पर ही उन्होंने राजि बिताई | 

प्रात काल होते है! सभी कपि अत्यविक हे से बिनोद करते हुए उस पर्वत के 
जगल में जीक्र गति से चले गये और वहाँ अपने सवयकर निनादों से सिह तथा हाथियों 
को भगाने लगे । उनके निनाद राक्षमों की अस्थियों को केंपाते हुए सारी लक्षा में व्याप्त 
हो गये । 

इस ध्वनि को सुनकर रावण यह जानने की इच्छा से कि वह हँसी ध्वनि है, अपने 
सौध के कंगूरें पर उढकर देखनें लगा | उस समय उसके साथ उस कगरें की झोभा 
अत्यत उज्ज्वल ढोख रही थी। परिचारक-गण उसके ऊझणन बवल छणो की छाया कर 
रहा था; धवल चेंवर इला नहा था। ऐदावनत के दाँदो के प्रहार का सहन क्यि हुए उसके 


उन्‍ 


वल्ल पर मणिमय हार डोल रहे थे। इस प्रकार के वैभव से युक्त उहं विविव राक्षसों से 


लक 


खुद्धकांड २८३ 


परिवृत हो विशाल रत्न-सिहासन पर आरूढह़ था तथा आयुवों की उज्ज्वल प्रभा से दीप्ति- 
मान्‌ होता हुआ, अस्ताद्वि पर विलसित होनेवाले सूर्य की' समता करता था । विजली से 
युक्‍तत नील मेघो के समान अपना हे प्रकट करता हुआ वह अद्वितीय रूप से उस कंगूरे 
पर शोभायमान हो रहा था । रावण की महिमा के कारण प्रभा-समन्वित उस कंगूरे को 
देखकर रामचन्द्र आश्चर्य के साथ (विभीषण) से बोले--हे विभीषण, प्रलय-काल के सर्य-मटल 
के समान भासमान होनेवाला यह कौन हैं ?” तब विभीषण ने राम से कहा--हे देव 
वही मेरा अग्नज रावण है, जिसने इन्द्र आदि बेवताओ को परास्त करके देव-कामिनियो को 
वदी बनाया है और जो तीनो लोकों को अपने शौये के प्रताप से जीतनेवाले बाहुबल से 
सपन्न हैं । 
३८, रावण तथा सुग्रीव का द्वद्व-युद्ध 
तव सुग्रीव ने राम से कहा--हे प्रभो, यह राक्षस मदाघ्र हो आपके समक्ष अपने 
वैभव का ऐसा प्रदर्शन कर रहा है | में अभी इस का गर्व भग करता हूँ ।' इतना कहकर 
बह अत्यधिक ऋरोध से, अलघु खशौर्य-मपत्न गरुड के समान, मुकुट-रपी श्गो तथा विशाल 
वक्ष-हपी सानुओ से युक्त पर्वत-रूपी रावण पर अत्यत वेग से गिरनेवाले वज क्ले समान, 
सुवेल द्वि से उस रावण की ओर उड़ा । फिर, देवताओं के शत्रु उस रावण को तृणब्त्‌ 
मानकर कहा--हे रावण, सुनो, में राम का सेवक हूँ । क्‍या, तुम अपना वैभव हमें दिखाने 
का साहस करते हो / इतना कहकर उसने बढ़े दर्ष के साथ उसके सभी मुकुंटो को नीचे 
गिरा दिया । तब नीचे लुढकनेवाली उसकी मुकुट-पवित ऐसे दीखने लगी, जैसे पूर्वकान में 
क्राल-रुद्र के प्रह्मर से नक्षत्र-पक्ति नीचे गिरने लगी थी। इससे अत्यत ह्रुद्ध हो, दशकठ ने 
वालि के अनुज को पकड़कर नीचे पटका दिया, किन्तु सूर्यपुत्र शीघ्र ही। उठकर अपने 
भ्चड़ वाहु-बल का प्रदर्शन करता हुए उस राक्षस को उसके सभी हाथो के साथ पकडकर 
इस प्रकार नीचे पटक दिया कि सभी दिशाएँ काँप उठी । उसके पश्चात्‌ सुग्रीव नें उस 
राक्षत की कनपटियों, ललाटो और स्कधो १९२ अधाधध तमाचे लगाये, उसकी पीठ को नरतगे 
से नोच दिया, और उसकी गर्दन को अपने टखनो के बीच दवाकर उसे क्यगूरे से दें मारा । 
इस प्रकार, मल्ल-युद्ध करते हुए थे दोनों बहुत थक गये और पृथ्वी पर गिरने लगे, किन्तु 
दोनो फिर से सेंभलकर कगरे पर ही ग्रुद्ध करने लगे । अत्यधिक शवित से, प्रतिक्षण पंतरा 
वदलते हुए, एक दसरे को ढकेलते हुए, फिर एक दूसरे के निकट आकर ताल ठोककेर 
अलग होते हुए और ज्ञीघत्र ही एक दूसरे से भिडकर अपनी अवित दिखाते हुए एक 
दूसरे के वक्षों पर पदाघात करते, लिप्टकर अपनी केहुनियो से एक दूसरे के अगो को 
दवाते और अपने हाथों से एक दूसरे के सिरो को पकड़कर इस तरह दकराते कि खत 
की धाराएँ निकल पडती, फिर लड्खडाते हुए कई प्रकार से कणम-क्रश करने के पश्चात्‌ 
एक दूपरें से हटकर अपने-अपने स्थान पर आ जाते और फूलती हुई संसों से धोड़ी दर तक 
चुप सठे रहते । इस प्रकार, युद्ध करते हुए दोनों के शरीरों से खत वी धाराएँ ऐसी वहने 
लगी, मानो पर्वतों से लाल रग की नदियाँ वह रही हो । तब रावण अपनी माया से 
सुत्रीव को बाँधनें का यत्न करने लगा । यह देसकर सुग्रीव आकाश की ओर उडा बोर 


२६४ रगनाथ एस्ायर 


क्र राक्षमों के देखते-देखते राम के पास पहुँच गया और राघव को प्रणाम किया । युद्ध 
की घूलि तपरा दक्त से पकिल गात्रवाले सुग्रीव को राम नें बड़े प्रेम के साथ हृदय से लगाया 
और स्तिग्ब दृष्टियों से देखते हुए कहा--इन्द्र को परास्त करनेवाले रावण की 
जक्ति की अवहेलना करके, ऐसा साहस करना केवल तुम्हें ही शोभा देता हैं । उसका वध 
करके विभीषण वो लका का राजा बनाने की जो प्रतिज्ञा मैने की है, उसकी रक्षा करने के लिए तुम उसका 
वध किये विना ही लौट आयें, यह तुमने वहुत अच्छा किया । में तुम पर प्रसन्न हूँ । 
तुम वालि के अनुज हो, तुम उस रावण को अवश्य मार सकतें थे, किन्तु उसके बंध व्य 
सेहरा, मेरे सिर पर बाँवने, तथा उसे मारने का श्रेय मुझे देनें के लिए तुम उसे जीवित 
छोडकर लौट आये ।” तब सुग्रीव ने कहा--हें देव, उस द्रोही का वैभव देखकर में कैसे 
उप रह सकता था ?! सूर्य-पुत्र के इन बचनों को सुतकर राम हर्षित होकर बोलें-- 
'तारकों से विलसित तथा दीप्तिमान्‌ रक्त तथा कृष्ण वर्ण के परिवेषण से घिरे हुए 
सूर्यमडल से ज्वालाएँ निकल रही है, वडे-यडे जलद राक्षतों का रूप घारण करके खत- 
रर्पा चर रहे है, ऐसा लगता है कि कंदाचित्‌ भूकप होनेवाला है । प्रचण्ड वायु के कारण 
जैल-श्ग टूटकर गिर रहे है और सूर्य के अभिमुख होकर सियार रो रहे है । वार-बार 


राक्षस-कुल के नाग-मूचकर शकुन दिखाई दे रहे है । इधर हमारे पक्ष में अगो के फडकने आदि 


के श्रेप्ट चुमसूचक जकुन दीख रहे है । अत , निस्सदेह हमारी विजय होगी । अब विलव 
रना बनुचित हैं ।' 


इसके पहच्चात्‌ रामचद्र हनुमात्‌ के कंधे पर बैठकर, जाववानू, अगद, सौमित्र, विभीषण 
नल आदि महद्दान्‌ पराक्षमी अनूचरो के साथ उस पर्वत से नीचे उतरे । फिर, अनुपम 
पराक्रमी रामचद्र घनुप घारण करके लका की ओर चले । वानर-श्रेप्ठ, उनको मार्ग बताते 
हुए आगे-आगे जा रहें थे और पीछे लक्ष्मण आदि चल रहे थे । वामर-सेना उद्दंड वेग 
से उनके पीछे-पीछे एक साथ मिलकर जा रही थीं । इस प्रकार, सूर्यवश-तिलक राघव 
घोर राक्षस-समूह से सुरक्षित लका के उत्तर द्वार पर जा पहुँचे । यह समाचार सुनते ही 
राक्षस सश्लमित-से हो गये | अविरल वाहुवली नील, ह्विविद, मैन्द आदि वीर वानरो के 
साथ, विशाल वानर-सेना को लिये हुए पूर्व के हार पर जाकर ठहर गया | गज, 
गवाक्ष, गवय तथा बाहुबली के साथ वालिपुत्र ने बडे उत्साह से दक्षिण के द्वार पर पडाव 
डाला । अपना विक्रम प्रदर्शित करते हुए, लका-दहन करनेवाले पवन-पुत्र ने सुषेण को 
साथ लेकर पश्चिम के द्वार पर घेरा डाला । सूर्य-पुत्र सग्रोव छत्तोत करोड विश्वास-पात्र 
तथा महावलणाली कऊपि-बीरों के साथ राम के पब्चिम में ठहर गया । शक्तिज्ञाली 
भालुगो के साथ अनुपम वली जाववान्‌ ने राम के पूर्व में पडाव डाला । 

तदनतर राम ने लक्ष्मण तथा विभीषण को देखकर कहा--इनकी (बानर-तायको 
वी) सहायता के लिए प्रत्येक द्वार पर एक-एक पद्म दुर्वार वलशाली वानर-बवीरो की सेना 
भेज दो । अनल, नल, हर तथा सपाति के साथ हम तीनो यही से आझत्रुनराक्षसों से यद्ध 
करेंगे । घोर संग्राम के समय में भी हमें यहाँ का और वहाँ का समाचार मिलते रहना 


चाहिए । इसके पश्चात्‌ राम ने वानरों को देखकर आजा दी कि तुममें से किमी को 


शद्धुकांड २6५ 


अपना वानर-छप छोडकर और वोई भी कपट-रूप धारण नहीं करना चाहिए । राम की 
आजा सिर पर धारण किये हुए सभी वानर लका के चारो ओर वडे वेग से फल गये । 
पूर्व तथा पर्चिम भागों में विक्ृत लागूलवाले, विकृत आननवाले, विक्ृत दाँनोवाले और 
विकृत शरीरवालें अनुपम विक्रमी वानर दस योजन तक व्याप्त हो गये और वृक्षों तथा 
शेलो की सहायता से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो गये । उनके गर्जन, वर्जन, तथा उनके 


मे 


हुकार सारी लका में व्याप्त हो ऐसे भय का उत्पादन करने लगे कि दनुज-स्त्रियों के 


$ 


गर्भ-पात होने लगे । वानर-सेन। का यह कोलाहल सुनकर राक्षस-समृह भय से कॉप उठा। 


३९ अंगद का दौतद्य 
अपने मत्रियो की सम्मति प्राप्त करने के पण्चात्‌ राम ने अगद को बुलाकर बड़े 


स्नेह के साथ कहा--हे अगद तुम हमारा दृत बनकर रावण के पास जाओो और उससे 
कहो कि हे रावण, तुमने ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के गबे के कारण मुनियों तथा देवताओं 
को दुख दिया है । राम के समक्ष तुम्हारा कोई वश नहीं चलेगा | रामचन्द्र तुम पर 
आक्रमण करने आये हे । जिस शक्ति के मद में आकर तुम सीता को उठा लाये, अब युद्ध 
में उस शवित का प्रदर्शन करो । राम के बाणों के प्रहार से विचलित हुए विना, गर के रुूमान 
उत्तका सामना करो । यदि ऐसा करने में तुम्हें भय हो, तो सीता को लाकर सौप दो और 
सुख से रहो । यही तुम्हारे लिए उचित हैँ । राघक ने कृपा करके विभीषण को लव्ग का 
राजा बना दिया । वे अवश्य तुम्हारा सहार करेंगे । उनके सहार करने के पहले ही, अपने 
सभी सग्रेस बधियों को एक बार भली भांति देख लो, लका की ओर निहारो, अपनी प्रिय 
पत्वियो का विचार करो । अपने पुत्र, अनज तथा सरमेन्सवधियो को युद्ध में मारे जाने से 
उन्हें बचाने वा उपाय सोचो । इसमें कोई सदेह नहीं है कि तुम अपने वधु-मित्रों के साथ 
मारे जाओगे, तुममें से एक भी नहीं बचेगा । मरने के पछ्चात्‌ जो कार्य करने के लिए 
शेष रह जायेंगे, उन्हें अभी पूरा कर लो । अब यही तुम्हारी स्थिति है 

राम के इन वचनो को सुनकर वह श्रेष्ठ वानर, मननही-मन हपित हो दुष्ट राक्षस- 
स्गी' वन को भस्म करने के लिए उत्पन्न प्रलय-काल की अग्नि के समान, उस इन्द्र के 
गत्रु रावण को मारने के लिए आये हुए मृत्यु-हूत के समान, उडकर रावण की सभा में 
पहुँचा । उसे देखकर राक्षसों ने कहा--देखों, वह फिर आ गया ।” यो कहते हुए वे 
आयूधों से युवत्त हो अग॒द पर आक्रमण करने का उपक्रम करने लगे । तब रावण ने अपना 
हाथ उठाकर उत्तका वर्जन करते हुए कहा--रकों । फिर उसने अगद को देखकर पहा-- 
कहो, तुम कौन हो ?” अगद ने कहा--हे रावण, क्या तुम यह नहीं जानते कि 
राम का दूत हूँ / तब रावण ने कहा--राम कौन है ”” अगद बोला--अपने अतुल 
पराक्रम से जिसने परशराम को जीता, वहीं रणकुशल (व्यक्ति) राम हैं। रावण ने 
पूछा-- परशुराम कौन है ?” अगद ने उत्तर दिया--जिसने उद्धत कात्तंवीर्य जेसे वीर को 


3. यु पूछा: हे कात्त यू नयी पृ क्री है 7 
मारा, वह असम,न परानमी परशुराम है ।// नव रावण ने पूछा--वहे कात्तेबाव कस त् 


अगद ने कहा--क्या तुम नहीं जानते ? जिसने तुम्हें जीतबर बंदी बनाया था, 
फात्तंवीर्य है / फिर, रावण ने पूछा--ठुम किसके पुत्र हो ? अगद ने उत्तर दियाहः 


[क ्ग्ह 
दर। ८१४ 
मु 


२८4 रंयचाथ एयायर 


क्या तुम इतने शीघ्र उस इच्ध-पुत्र वालिकों भूल गये, जिसने तुम्हें समुद्र में इुतों दिया था । 
में उसी वालि का पूत्र हूँ। मेरा नाम अण्द है। हे बसुरेग, तुम युद्ध-भमि में 
मेरे बारे में बहुत कुछ जान जाओगे । क्‍या, तुम उस कादुत्स्थ-नशज राम को नही जानतें, 
जिन्होने मोहित होकर उनके पास जानेवाली शूर्पफपछा की नाक और कान काटकर उसके 
रक्त में भीगे हुए अपने रूइग को खर तथा दूषण के जग्रों के रक्त में घोया था | तुम 
क्यों प्रलाप करते हो ? तुम अब जाओगे कहाँ ? बचोगे कैसे ? भर्वांध हो तीनो लोकों को 
भुलसानेवाले तुम्हें राम अवच्य मारेंगे । तुम घृर होकर विदा विचलित हुए उनका सामवा 
करो, यही उचित हैं । सनो, अव लका पर गासन करना तुम्हारे भाग्य में नहीं हैँ । लवा 
का राजा अठ विभीषण ही हैं । तुम इतनी विपत्ति क्यों भोगना चाहते हो ? तुम उदार 
मन से सीता को रामचन्द्रजी के पास पहुँचा दो और अणप्ने प्राण वचा लो । अपने से 
बलवान्‌ न्‍राजाओ से सधि कर लेना इस एथ्वी पर सभी राजाओं का उचित धर्म है 


इन वानों वो सुनकर रावण ने कुछ होकर उस महावली अग्रद को पर्कडने वी 
बाज्ञा दी । कुछ वलवान्‌ राछ्ूस तुस्त उसे पकडने का प्रयत्न करने लगे । अगद भी अपनी 
बबित दिखाने के उद्देध्ष से अपने-आप उनके हाथो वदी बने गया और उसके परचात्‌ 
अपनी समस्त जव्ति के साथ वज्यकाश वी ओर उछलकर ऐसा भट्का दिया कि दस सहंख 
राकस-वीर नीचे गिरकर चूर-चुर हो गये। इससे सतुप्ट न होकर अग्रद ने राक्षसों के उस सभा- 
मडप पर ऐसा पद-प्रहार क्या कि वज्ञपात से गमिरतेवालें हिमाचल के शिखर के समान 
वह मंडप टुकड़े-टुकडे होकर गिर गया । रावण ने फिर से राक्षसों को जाज्ञा दी कि 
छोड़ो मत, अगद को अवच्य पकड़ लो | तब राक्षमो ने आकाश की ओर उडकर अगद 
पर परणु, शूल, करवाल, गदा आदि कई बायुथों का प्रहार करके उसे पीडित करने लगे । 
तव अगद ने अपने मुत्रको से उन राक्षमों पर ऐसा प्रहार किया कि उनकी आते निकल 
आई ओर वे पृथ्वी पर चिर पडे । तव खर के पुत्र सूकर ने अगद को देखकर कहा--ठहरों अगद, 
जव तुम कहाँ जा सकते हो ?” इस प्रकार, घोर गर्जन करते हुए उसने अपना धनुष उठाया 
जौर पाँच तेज वाण अगद के मस्तक पर चलाये और उसकी बाहुओं पर दस वाण चलाये । 
इसस कुंद् होकर अगद ने उस असुर पर अपनी मुप्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसके 
सिर के कई टुक्‍डे हो गये और वह पृथ्वी पर गिर पडा । यह देखकर सभी राक्षस 
भय से छटपटाने लगें और रावण भी वडी चिंता में पड़ गया । 

तादा-पुत्र अग॒द श्ीक्र राम के पान पहुँचा, और प्रणाम करके हाथ जोडकर कहा-- 

हैं देव, आपकी आजा के अनुसार मेने रावण के पास जाकर उसे सारी वातें समभझाई 
किन्तु, उसने मेरी बातों की जवहेलना कर दी। हे राजन, आपने नीति के अनुसार उसे 
समभाने वी चेप्टा की है, क्न्तु वह तो आपके बाणों को अपने प्राणो की भबाहुति 
देना चाहता है । वह मरने का दुढ निरचय किये बैठा है । उसका आंत आसन्न है, इसलिए 
यूद्ध में उस दशकठ का बंध कर डालिए। हे जनघ, आप (वावण को मार 
कर) देवताणों को प्रसज्ञ वीजिए । इस प्रकार उसने लका में घटी हुई सभी बातो की 

वर्णन करवों राम वो सुनाया। रगद की शबित का परिचय प्राप्त करके राम भी हर्पित हुए। 


खुद्धकोंड २८७ 


वहाँ सभी राक्षस रावण को देखकर कहने लगे-- है देव, आप इस प्रकार चुप बैठे 
रहेंगे, तो कार्य कैसे चलेगा । वह देखिए, राघव कपि-सेना के साथ लका को घेरे हुए है । 
अब आप अपना प्रताप कब दिखायेंगे ? हमें भेजिए । हम युद्ध में राम-लक्ष्मण को जीतकर 
आयेंगे ! 


ह॥ 


४०, रावण का अपना वेसव प्रदर्शित करना 


इन वातों को बड़े चाव से सुनकर रावण ने सोचा कि में अपना वैभव रामचन्द्र 

को दिखाऊँगा, जिससे सुग्रीव आदि भयभीत हो जायें । इसके पश्चात्‌ उसने उन सभी 
वस्तुओं को मेंगाया, जिन्हें उसने अपने भयकर प्रताप को प्रदर्शन से इन्द्र, धनेन्द्र तथा नागेन्द्र 
को जीतकर प्राप्त किया था । उसने उज्ज्वल कातियुकत पीतावर घारण किये, चारो ओर 
सोरभ विकोर्ण करनेवाले मुगमद, घनसार आदि सुगध-मिश्रित मनोज्न चदन का लेप किया, 
सरस, मजुल पार्जित-पुष्प-रचित मालाएँ घारण की, पद्मराग आदि वहुरत्न-खचित ककण, 
मुद्रिका, केयूर, भुजाभरण, कठाभरण आदि धारण किये, अपनी मणियों की प्रभा से 
गडस्थलो को दीप्त करनेवाले कुडल पहने, सूर्य-मडल के समान उज्ज्वल तथा अपनी 
प्रभा से समस्त दिशाओं को प्रकाशित करनेवाले मुकुट अपने दसो सिरो पर धारण किये, 
इन्द्र, अग्नि, यम, नैऋत्त, वरुण, मरुतू, कुबेर एव ईशान का दर्प चूर करके, उन पर प्राप्त 
विजय की सूचना देनेवाला तोडर अपने पैर में पहना, घनुष वाण, चक्र, परशु, निशूल, 
करवाल, पाश, मुद्गर, चद्रहास आदि बीस आयुध अपने वीसो हाथो में धारण किये, और 
परिचारको के साथ लेकर उत्तर दिशा के बुर्ज की ओर रवाना हुआ । उसके आप्तजन 
शूलो से सज्जित हो उसके चारो ओर चलने लगे । भूषण तथा वस्त्रों से अलकृत होक<« 
उसके मत्री उसके दोनो ओर चल रहे थे। कई हजार राक्षस असस्य स्वर्ण-टोपो से 
विलसित अस्सी हजार धवल-छत्र लिये हुए थे । अस्सी हजार वामिनियाँ शेषताग के फन के 
समान दीखनेवाले सुदर व्यजन (पा) लिये हुए चल रही थी । चद्र-किरणो के सदृण 
दीखनेवाली अस्सी हजार अप्सराएँ दोनो ओर चन्द्रिका की भाँति उज्ज्वल चामर घीरें-धीरे 
मुलाती हुई अपने ककणों का मृदु शिजन सुना रही थी । वदी-मागधों का समूह देवताओ 
पर (दानवों की) विजय का स्फूत्तिदायक स्वुति-पाठ कर रहा था। उसके आगे मद, मध्यम, 
उच्च आदि सरूूर-भेदों के साथ चद्रवदनी स्त्रियाँ गीत गा रही थी । ऐसी ठाट्वाट से 
सज्जित हो रावण दुर्ग के उत्तरी वुर्ज पर अपने वैभव का प्रदर्शन करते हुए मणिमय प्रभा- 
समन्वित सिंहासन पर आहरूढ होकर ऐसा दीख रहा था, मण्नो पश्चिम पर्वत पर सूर्य-विव 
दिखाई पड रहा हो । राक्षसों के आतपत्नों ने सूर्य को ढक दिया था, इसलिए चारो ओर 

अधकार फैलने लगा । 

उस समय राम माया-मृग को चर्म पर, इन्धनील मणि के समान प्रकाशमान अपनी 

देह का वाम भाग टेके हुए, वाम-भुजाग्र को अपने कपोल का आधार बनाकर, सूर्य-त्रिव के 

समान उज्ज्वल सूप्रीव की जाँघों पर, राजसी ठाठ से, अपना अतुल सोदयें को प्रकट करते 

हुए लेटे ये और अपने प्रिय-भवत पवन-पुत्र के जाँघों पर पैर पसारकर आराम कर रहेये। 

पवन-पुत उनके चरण वमलो को घोरेघीरें दवा रहा था। अगद उनते दक्षिप-हस्त 

शेप 


२९८ रंग्नाथ रायायए 


की अँगुलियों को दोनों हाथो से दवा रहा था । बदी-मागधों की तरह उनके चारो ओर 
नल-नील तथा जाववान्‌ आदि प्रमुख सेनापति उनकी स्तुति कर रहे थे--हे सकल 
लोकाराध्यचरण, हे जानकी-हृदयाबुज-पट्चरण, हे दीनात्तिहरण, हे स्तवनीयक्रपाभरण, हे हर- 
वच्य नाम, हे सूर्यकुलाब्धिसोम, हे चत्रुनाशक, हें रघुराम आदि । तब रामचद्र पूर्णचत्न के 
समान शोभायमान होनेवाले अपने मदहास-युक्त तथा अविरल करुणामृत से परिपूर्ण मुख- 
मडल में विलसित धवल गर॑बिंद की सदरता को भी परास्त करनेवाले नेत्रो की काति को, 
चारो मोर विकीर्ण करते हुए, अपने ललित कटाक्ष-रूपी चद्विका की वृष्टि करते हुए, 
अपने दोनो हाथो वो समीप बैठे हुए, राक्षसों के भेदों के ज्ञाता विभीषण के साथ अत्यत 
रहस्यपूर्ण वार्त्तालाप कर रहे थे । उस समय उनका मुह दक्षिण की ओर था । इसलिए 
उन्होने रावण को देखकर कहा--हे विभीषण वहाँ देखों । उस दुर्ग के उन्नत शिखर पर 
कोई सिंहासन पर आसीन है । उस पर तने हुए भरत्काल के वादलो के सदृश दीखनेवाले 
छत्र-समूहों के कारण पृथ्वी पर छाया पडी हुई है । इस ढग से वहाँ वैठा हुआ वह व्यवित 
कौन है ?' 
तव राम को देखकर विभीषण ने निवेदन किया--हे देव, वही देवताओं का अंत्रु 
रावण है; युद्ध में अमरों के पैर उख़ाडनेवाला वहीं है । समस्त देवताओ से प्राप्त दिव्य- 
आभूषणों को धारण किये हुए अपने आप्त दनुज-वीरो की सेवाएँ ग्रहण करते हुए, अस्सी 
सहस्त छत्रो, चामरो तथा व्यजनों से सुसज्जित हो, अपना वैभव तथा ठाठ-बाट आपके समक्ष 
प्रदर्शित करने को निमित्त वह दुर्ग के बुर्ज के ऊपर सिंहासन पर बैठा हुआ हैं । 


४१, राम का रावण के छत्र-चामरों पर अस्त्र चलाना 


इन वातों को सुनकर राम हँसे और रावण का गर्व-भग करने का नि३ंचय करके 
लक्ष्मण से घनुप लाने के लिए कहा । फिर अपने पीछे वैठे हुए लक्ष्मण के हाथ से घनुप 
लेकर दारये पैर तथा दायें हाथ के अगूठे से उस पर प्रत्यचा चढाई । फिर लक्ष्य सावकर, 
बद्धंचनद्तर शर को चंढाया और प्रत्यचा को अच्छी तरह खीचकर आधे लेटे-लेटे ही रावण 
के छत्र-चामर तथा व्यजनों पर वाण छोड दिया । राम का वह एक शर क्रमश दसो 
सेकडो, हजारो, लाखो तथा करोडो की सख्या में बढ़कर रावण के निकट पहुँच गया और 
तालवुतो को धारण करनेवाली सुन्दरियो, चामरो को डुलानेवाली स्वियो, सगीत गाने 
वाली कमलमुखियों, कीत्तिगान करनेवाली रमणियो, घवल छत्रो को घारण करनेवालीं 
देत्यनालाओ ओर सेवा में खडे हुए भठों के हाथो को विना काटे ही विना उनके कठों का 
विच्छेद किये ही, विना उनके हृदयों में प्रवेश किये, रावण के मृकुटो को नीचे गिराये 
विना ही, उसक सिरो को काट विना ही, उन छत्र, चामर, व्यजन आदि के उपरी भागों 
को काटता हुआ चला गया । यह देखकर सभी राक्षस सश्रम तथा आइचर्य से चकित 
रह गये । इस प्रकार, कटे हुए छत्र, चामर, तथा व्यजन उडकर समस्त आकाज में व्याप्त 
हो गये, फिर वे जहाँ-तहाँ, उस सभा में, कुछ राक्षसों पर, कुछ लका में, कुछ लवण- 
समुद्र में, और कुछ उस लकेश्वर पर गिरने लगे । इस प्रकार, अद्वितीय! ढंग से अपना 
कार्य पूरा करके वह दिव्य शर फिर राम के तूणीर में आकर प्रविप्ट हो गया । छत्र, चामर 


खुछ्धकांड २८६ 


तथा व्यजनों से रहित हो, केवल दण्डो को अपने हाथो में थामे खडे रहनेवाले उन 
असुर-पवितवों के मध्य रावण सश्रमित हो, अपना समस्त गे खोकर बडी देर तक बैठा रहा, 
वयोकि उसे ऐसा लग रहा था, मानों खडे हुए राक्षस उसे ने जाने के लिए बाये दुए 
यमदूत हो । रघुराम के धनुविया-करौशल का वार-बार विचार करके उसका सिर 
काँपने लगा, और मन-ही-मन वह उनके (राम के) पदुत्व को स्वीकार करने लगा । फिर, 
प्रकट रूप से वह रघूराम की प्रशप्ता करते लगा। 

४२, रावण का राम की धनुरविद्या की प्रशंसा करना 


उसने कहा--हे श्यामवर्ण रघुराम, हे नयनाभिराम, हे कोवड-दीक्षा-गुरु, हे वीरा- 
वतार, हे शर-सघान-कला-निपुण हे श्रेष्ठ चाप के कर्षण में कृपण, हे दढवाहु, हे विख्यात 
मुष्टि-सपन्न, हे विजित शत्रुओं के भाग्य-विधाता, हें विजय-सपन्न, हें श्रेप्ण मानव-राजक्ुमार, 
हे नव्य-दिव्य-अस्त्र-सपन्न, हे चचल तथा घोर छारो से पूर्ण अक्षय तूणीरधारी, हे वीराग्र- 
गण्य, हे विश्वशरण, हे राम भूपाल, तुम्हारे समान इस ससार में और कौन धनुर्धर हो 
सकता है ? त्रिपुरो का नाश करने में (निपुण) अकले एक शिव ही है और वाणो को 
चलाने में निपुण तुम एक ही हो ।' इस प्रकार, रावण अपने दसो मूँहों से रामचन्व को 
प्रशसा करने लगा । 

यह देखकर (उसके) मत्रियो ने उस देत्यनाथ से कहा--हे दैत्य-पुगव, भत्रुता का 
विचार किये विना, कही शत्रु की ऐसी प्रशसा कोई कर सकता है ? यदि आप ऐसी प्रशसा 
करेंगे, तो छात्रु तथा मित्र, यह सोचकर कि आप भयभीत हो गये है, आपको उपेक्षा की 
दृष्टि से देखेंगे । यह राजनीति नही है-।” तब रावण ने हेंसकर उनसे कहा--धनुरविद्या 
की निपृणता, महान्‌ परात्रम, सौदर्य तथा बाहुबल आदि गुणों में श्रेष्ठ, कोदडन्दीक्षा-गुरु, 
राम-भूपाल की समता इन तीनो भुवनों में कौन कर सकता है ? हरिहर तथा ब्रह्मा 
भी उसकी समता नहीं कर सकते । क्‍या, श्रेप्ठ शूरो की महत्ता को स्वीकार नहीं करनी 
चाहिए ?” इस प्रकार, नीति-पूर्ण वचनो को कहने के पश्चात्‌ दनुजेश्वर वहाँ से चला गया। 
तब राक्षस-नेताओ ने कटकर गिरे हुए छत्र-चामर आदि को देखकर अत्यत भयविह्लल हो 
वहाँ से चले गये और कई प्रकार से राम के पराक्रम तथा शौर्य की प्रशसा करते हुए 
कहने लगे--'राघव करुणा-समुद्र है, इसलिए उनके भयकर बाण ने केवल छत्रो को ही 
काटा । यदि वे उसी प्रकार और एक बाण चलायें, तो हमारे सिर भी उड़ने लगेंगे ।' 


४३, वानरों का लंका ध्वंस करना 
यहाँ पर राघवेनद्य ने आगे के कार्य के सवध में अच्छो तरह मन-ही-मन विचार 
किया और फिर अपने अनुज विभीषण तथा सूय-युत्च आदि आप्त-वर्ग की सम्मतति लेकर 
शुभ मुहूर्त में वानरो को लका पर आत्रमण करने की आज्ञा दी । वानरन्सेना उसी क्षण, 
भयकर गर्जन करते हुए--हे देव, हमारा शौर्य देखिए। आपके लिए हम किस प्रकार 
प्राण देते है, देसिए । यो कहते हुए पर्वतों तथा वृक्षों को बोपाते हुए, करोद्दो वानरों ने 
एक साथ मिलकर लका के दुर्ग को चारो ओर से घेर लिया । राम यी अबध्य ऊये 


३200 एयगनाथ एश्यायचण 


होगी--ऐसा घोष करते हुए, वानर-बीर अपनी महान्‌ शक्ति को प्रकट करें हुए पर्वतों 
तथा वृक्षों को जहाँ-तहाँ. से जमा करके परिखा को पाटने लगे । उस समय वें ऐसे दीख 
रहे थे, मानो वध्य भूमि पर स्थित वधिक हो । 

तव कुमृद दस करोड वानरों की सेना लेकर पूर्व द्वार की ओर गया । वाहुवली 
गतवली अस्सी करोड की सहायक सेना लेकर आनेवाले राक्षसों के आक्रमण को रोकने के 
उद्देग्य से दक्षिण के द्वार पर जाकर ठहर गया । सुषेण दस करोड सैनिकों को लेकर 
पश्चिम के द्वार पर चला गया। राम, लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव उत्तर के द्वार पर ही 
रहे । गज, गवय, गघमादन तथां गरभ, दुर्ग के चारो ओर वास्वार अ्रमण करने हुए 
वानरो को दुर्ग पर चढ जाने के लिए उत्साहित कर रहे थे । तव वानर उद्धत गति से 
एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए, एक दूसरे को घकका देते हुए, दुर्ग पर ऐसे चढ गये कि, 
मालूम नहीं होता था कि कौन वुर्ज हे, और कौन क्गूरा । फिर, स्तूपी पर चढकर 
वें भयकर गर्जन करते हुए, अपनी पृ छो का फदा बनाकर पन्थरो को किले के भीतर फंकने लगे । 
फिर बडे-बडे वृक्षों को तने से उखाडकर बडे वेग से उन्हें अदर फेंककर किले के 
भीतर स्थित घरो को तोडने लगे । फिर उन्होने भीतर के कितने ही भवनों, मडपो और 
कयूरो को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया, वडे-व्डे पहाडो को फेंककर दुर्ग को 
गिरातें और उसके नीचे दवकर मरनेवाले राक्षसो को देखकर हँसने लगे । वानर, राक्षसों 
को ललकारते हुए बडी-बड़ी शिलाओ को किले के ऊपर फेंककर उसकी ऊँची दीवारो को 
गिरा देते । दुर्ग के बहि््ारों, राक्षमो, उनके आयुधों, पताकाओ, ध्वजाओ तथा छत्रों को 
गिरते हुए देखकर वानर-वीर दिशाओं को कपित करनेवाले भयकर गर्जन करते और 
अत्यधिक मात्सयय से पुन पव॑तों को लाकर दुर्ग पर फेंकने लगते । उनके कठोर प्रह्ारों के 
कारण लंकापुर की ऊँची जअट्टालिकाएँ गिरने लगी, वीथियाँ नप्ट होने लगी, दीवारें गिरने 
लगी, ऊँचे सौध टूटकर गिरने लगे, घर चूर-चूर होने लगे, और असख्य मदिर नप्ट-अप्ट 
हो गये । सारा दृश्य राक्षसों के नाश की सूचना देनेवाले अपशकुन के समान वडा भयावह 
दीख पडता था । 


8४ राक्ष्सों तथां वानरों का भीषण संग्राम 

तव भयभीत हो राक्षस कहने लगें-- हमने ऐसा उत्पात कभी नहीं देखा । फिर, 
वे विकट अड्गहास करते हुए, भयकर गर्जेन करने लगे । उसके पच्चात्‌ सभी राक्षस एक 
साथ एकत्नित हो, बडें त्रोब से वानरो पर शूल फेंके, लड़ग चलाये, और गदाओ से प्रहार किये । 
वे वानरो के समृह में छस गये और उनपर प्रहार करने, परणुओ से उन्हें मारने 
और भाले चुभोकर उन्हें परिखाओ में गिराने लगे । फिर वडी-बडी जिला-यजो के द्वारा 
गोले फेंककर दुर्गे की दीवारों के ऊपर चढनेवाले वानरों को आगे बढने से रोकते तथा 
भयंकर गजेन करते । उनके गर्जनो की ध्वनि तथा कपियों के विकट गर्जनों की ध्व्नियों 
के कारण पृथ्वी तवा सभी दिद्याएँ कपित हो गई । व्याकुल होकर दिग्गज चिंघाडने लगे । 
भय से कपित होने से पृथ्वी में दरारें पड गई । अदहन के समान समुद्र का पानी खौलने 
लगा । सारा ससार तम्त हो गया और भूत भयभीत हो गये । कुल-पर्दत गोलियो के समान 


खुद्धकांड 20९ 


उछल-उछलकर गिरने लगे । शेषनाग विष उगलने लगा, कूर्म और पर्वत एक दूसरे से 
टकरा गये । 

तव रावण ने (कपि-सेना से) घिरी हुई भयकर राक्षस-सेना को अपने पास बुलाया 
और उसे उत्साहित करते हुए कहने लगा--कपि-स्रेना का पीछा करके उसे किले के बाहर 
भगा दो । तुरत दुर्ग के चारो द्वारो से राक्षस-सेना इस प्रकार बाहर निकली, जैसे प्रलय- 
काल में रुद्र के मुख से ज्वालाएँ निकलती हैँ । उस समय, भेरी, डका, पटह, शख, तुरही 
आदि वाद्यों के भयकर निनादो, घोडो की हिनहिनाहट, बलिप्ठ हाथियों की चिघाड, रथों 
के चक्रो की ध्वनि तथा मन को विचलित करनेवाले सैनिकों के सिहनादों के कारण समस्त 
ब्रह्माण्ड कपित होने लगा और सभी देवता भयभीत हो गये । 


वानर-सेना तुरत राक्षस-सेना से भिड गई । द्द्व-युद्ध होने लगा । इच्छजीत ने 
अगद पर गदा का ऐसा घोर प्रह्मर किया, जैसे इन्द्र ने दुर्वार गति से अपने वजायुध को 
कुल-पर्वेत पर चलाया था । अगद ने भी इन्द्रजीत की समता करनेवाला अपना युद्ध-कौणल 
प्रकट करते हुए एक विशाल पर्वत-छ्ूग को उठाकर फेंका और इन्द्रजीत के रथ, सारथीं 
तथा रथ के अश्वों को चूर-चूर कर दिया । प्रजघ ने दुर्वार गति से सपाति पर तीन अस्त 
चलाये । उसके आघात को वचाकर सपाति ने अध्वकर्ण वृक्ष को उस पर फेंका । अतिकाय ने 
वित्त तथा रभ नामक वानरो को घेरकर उन पर शरवृष्टि की । किन्तु उन दोनों ने 
वडे-बई पर्वतो को फेंक्कर उसकी सेना का ध्वस कर दिया । महोदर ने सुपेण को घेरकर 
उसके विशाल वक्ष तथा प्रशस्त ललाट पर क्रमश पाँच तथा तीन बाण चलाये । तब सिह- 
गर्जन करते हुए उसने एक बडा पहाड उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि महोदर का रथ 
अहव तथा सारथी के साथ चूर-चूर हो गया । जाववान्‌ ने एक विद्ञाल वृक्ष घुमाऊर 
मकराक्ष पर फेंका, किन्तु उसने उसको वीच में ही काटकर, जाववान्‌ के ललाट, वक्ष तथा 
करधों पर कई वाण मारने । इससे कुद्ध होकर जाववानू ने उस पर एक विशाल पर्वत फेंका । 
देखते-देखते मकराक्ष का रथ सारयी तथा अश्बों के साथ नष्ड-अ्रष्ट हो गया। विदुण्णिह्न ने 
शतबली को घेर लिया और उसके वक्ष पर शरृष्टि की, किन्तु शततबली ने अत्यत 
वेग से उस पर एक वडा वृक्ष पॉंका । गज को कई राक्षमों का सहार करते हुए देसकर 


प्रमद ने क्रोप से उस बली वानर के वक्ष पर अपना शूल चलाया । तव गज ने एक साल- 
वृक्ष से उस राक्षस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस वही ढेर हो गया । (-से मरते 


देख) सभी वानरों ने हेनाद क्या । कुमकर्ण का ज्येप्ठ पुत्र कुंभ नामक बीर वानरों को 
पकड-पकडकर निगलने लगा, तो उसे देखझर घूम्र ने एक वृक्ष से भारा | कूर देवातक ने 
गवाक्ष के बिशाल वक्ष पर पाँच शर उलाकर उसे अत्यत पीडित किया, तो उसने बचे 
वेग से एक साल-वृक्ष उस पर पका । तब उस राक्षस ने सात बाणों से उस वृक्ष वो राउ- 
खड कर दिये और गवाक्ष पर नी अस्त्र चलाये | तब गवाक्ष ने एक पहाड उस राक्षस पर 
फेंकते हुए कहा--लो, इसे सेभालो ।!! सारण ने ऋषन पर एक मूसल चलाया, तो ८-पनर ने 
उसके वक्ष पर एक बा वृक्ष फेंका । इससे उसके घतुपनत्राण दूढ गये और वह मच्छित हो गया । 
पहाह जैसे हाथी पर आसीन हो जब पजिशिर ने शर्म लो सिर पर तोयर चलाबा, 


20०२९ रंगनाथ एयायरय 


तव उसने क्रोव में आकर उस राक्षस पर सप्त-पर्ण वृक्ष का ऐसा प्रहार किया, जैसे इन्द्र ने 
छुल-पर्वत पर (व्ज्र से) प्रह्दर किया था थौर उस राक्षस के हाथी को गिरा दिया । 
मरातक ने तर गति से पनस पर तींब्र वाणों की वर्षा की, तो पतस नें भी अपनी भयंकर 
गक्ति प्रकट करते हुए उस पर वृक्षों की वर्षा कर दी। अवपन ने एक बड़े लट्ठु से कुमुद 
पर प्रहार किया, तो कुमुद ने रुककर उस प्रहार से अपने को बचा लिया और उस अकपन पर 
मुष्टि का ऐसा प्रहार किव्य कि अक्पनमूच्छित हो गया । जब धूम्राक्ष ने कुद्ध होकर केसरी 
पर वाणों की घोर वर्षा की, तव उसने घृम्राक्ष पर पर॑तो की वर्षा की और उसे ग्रिरा दिया । 
महापाइ्वे ने बडे रोप से महावाहग्ली गरधमादन पर आक्रमण क्या, तो उसने पव॑तो, दक्षो 
तथ्य अपने दाँतो के प्रयोग से उस राक्षस को पीडित किया । थुक ने वेगदर्शी के वक्ष पर 
अस्त्र चलाये, नो वेगदर्शी ने उपने दुर्वार विक्रम से उसके रथ को अपने पैरो से कुंचलकर 
चूर-चूर कर दिया । जब तपन ने नल का सामना किया, तव नले ने अपना शरीर इतना 
ठहाया कि देखनेवाले उश्नमित हो गये और फिर विभ्ञाल पवत को उस राक्षस एर फेंका ! 
तपन ने नल पर तेज वाण चलप्ये, तो नल ने एक नसाल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया । 
जबुमाली ने अपनों गृरुतर शक्ति से हनुमान्‌ पर घोर प्रहार किया, तो हनुमान्‌ कुदध हो 
उसके रथ पर कृदा और जवबमाली के सिर पर अपनी हथेली का ऐसा प्रह्मर किया कि 
उसका सिर फूड गया । मित्रष्य ने विभीषण पर झरवृष्टि की, तो विभीषण के शरीर से 
रक्त वे फौव्वारे छूटने लगे | तव उम्र क्ोघ से विभीषण ने उत्त पर गदा चलाई, तो 
मित्रध्व मूच्छित होकर ग्रिर पड़ा ! प्रहस्त नामक राक्षस को वानरों को पकड़कर निगलते 
देख सुत्रीव की आँखें क्रोच से लाल हो गईं । उसने तुरत एक सप्त-पर्ण वृक्ष से उस पर 
हार किया और उसे गिरा दिया । वजञ्जमृष्टि नामक राक्षस पर मैन्द ने अपनी मुप्टि से 
प्रह्दर किया, तो वह राक्षस पृथ्वी पर ऐसा गिरा, मानो लका का बुर्ज ही गिर पडा हो । 
अगनिष्रणु नामक राक्षस को द्विब्द ने एक पर्वत के प्रहार से ऐसा गिरा दिया कि स्वर्ग 
के देवता हुर्प-ब्वनियाँ करने लग्रे | विग्याल वाहवली निकुम नें अपने प्रताप का प्रदर्शन 
करते हुए अपने दिव्य अस्त्रों से नील को ऐसा ढक लिवया, जैसे काले-काले मेघ सूर्य को 
आच्छादित कर लेते है । तव नील ने इसकी उपेक्षा करते हुए सहज ही निकुभ के रथ के 
उक्र को निकालकर उसे बडे वेग से ऐसे चलाया कि सारथीं का सिर भूमि पर लोटने लगा 
और निकछुभ स्वय भयाक्रात होकर देंखता रह गयणा। विलरूपाक्ष सौमित्र पर भर-वृष्टि करने 
लगा, तो सौमित्र ने उसकी उपेक्षा करके एक ऐसा वाण उस राक्षस पर चलाया कि उसकी 
बविति जाती रही और वह मूच्छित हो पृथ्वी पर लढक गया | उस समय सप्तध्न, रब्मिकंतु, 
अग्निकेतु तथा कोपाग्निकेतु नन्‍्मक चार नयकर प्रतापी राक्षस वार-बार गर्जबव तथा घनुप 
का घोर टकार करते हुए उमड़कर आनेवाले मेघो के समान शर-वृप्टि करने लगे । तव 
सूर्य-बण-तिलक राम ने सहज ही चार वाणों से उन चारो राक्षमो के सिर उडा दिये । 
४४. युद्ध-माम का वर्णन 
इस प्रक्गार घोर छृद्-युद्ध के अविराम गति से चलते रहने से, सारी युद्ध-भूमि में 
टटे हुए असस्प घनुप, खडित घर, चूर-चूर हुई गदाएँ, खडित करवाल, टूठें हुए भाल तथा 


मुदूगर, धूलि क समान बने हुए परिष तथा खड़ग, खड-खड बने हुए चक्र तथा बूल, चूर्ण 
के समान बने हुए लट्ठ, खडित रथ-चक्र, छठपटाते हुए अश्ब, गिरकर मिट्टी चाटनेत्राले 
सारथी, सभी दिशाओं में बिखरकर पडे हुए आभूषण, टूटकर गिरे हुए रत्न, कटे हुए हाथ 
तथा मरकर गिरे हुए असुर भयोत्पादक ढग से स्थान-स्थान पर पडे हुए दिखाई दे रहे थे । 
वह यूद्ध-क्षेत्र राम के वीभूत उस छइद्य-समृद्र की समता करता था, जिसका गर्व 
राम ने अपने दुर्दमनगीय शरो के प्रहार से भग कर दिया था और फलस्वस्प उसके 
समस्त जल के सूख जाने से जल में निवास करनेवाले वृहद्ाकार मीन, मकर तथा उरग 
छटपटाने लगे थे । उस युद्ध-भूमि में घड इस प्रकार हिल रहें थे, मानो कह रहे हो कि 
जी रावण गर्वाध होकर सीता को ले आया है, उसकी घड पर सिर कैसे रह सकेगा ? 
(कट-कटकर मरे हुए लोगो की) मज्जा रूपी कीचड, केश-समृह-रूपी सेंवार, खोपडी-रपी 
सीप, खडित होकर गिरे हुए शिला-खड-रूपी कमठ-समूह, टूटकर गिरे हुए खट्ग-रुपी 
मछलियाँ, चामर-रूपी हस, श्वेत छत्र-रूपी झाग, आशभूषणो का चूर्ण-स्प। बालुका, ढाल- 
रूपी जल-अरह, विशालकाय हाथियों के शव-रूपी पर्वत-खड, वानर-तथा राक्षसों के शरीर- 
रूपी वृक्ष, आँत-रूपी दुष्ट सर्प, मरणासच्न राक्षसों की कराह-रूपी घोष, व्याकुल अश्व-रूपी 
मकर, तथा गिरनेवाली पताकाएँ-रूपी लहरें, इन सब से युक्त हो सब नदियों का उपहास 
करती हुईं रक्त की नदी युद्ध-भूमि में बहने लगी । वह सारी रण-भूमि जाह्नवी के समान 
ऐसी आइचयंजनक दीख रही थी कि मानो वह कह रही हो कि भले ही रावण पापात्मा हो, 
राम का द्रोही हो, लोक-कटक हो, नीच हो, तपस्वियो को मारनेवाला पापी हो, सतियो 
का नाश करनेवाला दुरात्मा हो, में उसे शरीर से मुक्ति प्रदान करूँगी, अपने में लीन कर 
लूँगी और उस पापी को स्वर्ग में भेजूंगी । 

उस समय लका में देैत्य-स्त्रियाँ उमडते हुए शथ्योक-समुद्र में डूवी हुई वार-वबार कह 
रही थी--क्या, राघव सूर्यास्त होने से पहले इस भीषण युद्ध को स्थग्रित करके अपने 
निवास को नही लौटेंगे ? न जाने कब सूर्यास्त होगा ।/ निदान सूर्य अपने दीर्घ करो को 
समेटकर पश्चिम समुद्र में डूबने लगा, मानों उसने निबइचय कर लिया था कि तीदण-शर- 
किरण-समूह से रावण के तमोगुण को चप्ट करने के लिए भयकरअताप-सपन्न राम हू 
पर्याप्त है । चारो ओर अधकार ऐसे व्याप्त होने लगा, मानो उस पापी दशकठ के नाश 
को सचित करने के लिए निशा का केश-समृह चारों ओर फंल गया हो । 


सर्यास्त होने पर भी युद्ध को विना स्थगित किये राक्षस, भयकर गजन करते हुए 
वानरो से यूद्ध करते रहे । उनके अट्टहासो, ताल ठोकने की ध्वनियों, एक दूसरे का कोसने 
के शब्दों, दीघं हुकारो, एक दूसरे को बुलाने या एक दूसरे की भअ्रशसा करन के झत्दा 
रथ-चक्रो की ध्वनियो, रथिक तथा सारथियों के भयकर गजं॑नो, धनुष के ठकारो, हाथियों 
के घटे की ध्वनियों, उनकी चिंघाडो, तुरही-निनादों तथा बअश्वों की हिनहिनाहदों से 
युद्ध-भूमि गूजने लगी । उस निविड अधकार में कई प्रकार के शब्द सुनाई पद रहें थे । 
कोई कह रहा था--मारो, मारो, तो कोई कहता था--भागों मत, भागों मत । वहां से 
सुनाई पडता था--छोडो, छोडो', तो वही से मारो, मारा बन घ्दनि भा रहा थी । 


०2 रंगनाथ एयायर 
कोई वह रहा था छोडो मत, मारो', तो कोई कहता था, सिर काट लो, सिर काट लों। 
कोई पूछ रहा था--कहाँ हैं ?” तो कोई कहता था--यहाँ जाने दो, यहाँ ।' इस प्रकार, 
की विविव व्वनियों के साथ हुकार तथा बद्ढहास की घ्वंति करतें हुए जब राक्षस तथा 
वानर युद्ध करने लगे, तव सारा आकाश घूलि से व्याप्त हो गया । क्रश अघकार वढ 
जाने से राक्षस-सैनिक अ्रम से अपने हीं पक्ष के लोगों पर अस्त्र चलाकर मार डालते थे । 
वानर भी अत्यधिक क्षोध से उन पापी राक्षसों से जूककर रथिको को मार डालते थे, 
सारयथियो को चीर डालते थे, रब के जब्यों को नप्ट-भ्रप्ट कर देतें थे और रथो को 
ऊपर उठाकर पृथ्वी पर ऐसे पटकते थे कि उनके टुकड-टुकड़े हो जाते थे । फिर, वे गजो 
पर बैठे बोदाओं का गव तोंड़कर, मत्त गजो को पैरों से पकड़कर उन्हें ऊपर उठाकर, नीचे 
पटककर मार डालते । तितर-वितर होकर दौडनेवाले अबच्वों को पकड़कर ऊपर उठाते, 
और उन्हें वेग से घुमाकर नीचे ऐसे पटक देते थे कि खून बहने लगता । पदचर-सैनिको 
को ऐसा मारते कि उनकी रोीढें, वक्ष, पसलियाँ, भजाएँ, मुह, दाँत, सिर तथा भेजा 
छिन्न-भिन्न होकर चारो ओर विखर जाते । रथों के सतत सचलन से उत्पन्न तथा अब्वो 
के खुरो से उठी हुई घूलि जाकाश की जोर इस प्रकार उड रही थी, मानो राक्षस्रो के 
मन की कालिमा चारो ओर व्याप्त हो गई हो । घूलि के अघकार से मिलकर आकाश 
भर में व्याप्त होने से वह रात्रि राक्षतों तथा वानरो के प्रणो को हरनेवाली प्रलय-काल 
की रात्रि के समान दीख रही थी । 

अपने लिए रात्रि जनृकूल होने से सभी राक्षसो ने अपने गर्जनों से त्रिकूटाचल को 
गूजायमान करते हुए युद्ध-सन्नद्ध होकर एक साथ राम को घेर लिया और उन पर वाण- 
वुष्टि करने लगे । तब राम ने अग्निवाण चलाकर अघकार को दूर कर दिया और अपने 
साथ युद्ध करनेव्यले महोंदर, मह्पाब्वे, सारण, शुक, वज्दत तथा महाकाय पर बडे वेग 
से वाण चलाये । उनसे पीडित हो वे छहो भव-त्रस्त राक्षस भाग खड़े हुए । बचे हुए 
अन्य राक्षसन्ैनिक राम के तीत्र घरो से नप्ठ हो गये । 


४६, इन्द्रजीत का माया-युद्ध 

अगद के हाथो ने फेंके हुए गिरि-श्रग के कठोर प्रहार से रथ, सारथी तथा अश्वो 
को खोकर इंद्रजीत ज्ीत्र बन्न-णाला की ओर गया । राक्षस आवश्यक हवन-सामग्री ले 
जाये । तव उसने, रक्त्तवर्ण के अवोवस्त्र, उत्तरीय तथा चजिरोवस्त्र तथा पृप्प-मालाएँ पहनी । 
फिर, उसने जस्नि के योग्य परित्तरण (होमकुड के चारो ओर रखे जानेवाले कुश) के 
स्प में नाले, भयकर जबझस्त्र तथा घर रखें और क्रमण काले बकरें के कठ के खत तथा 
ताल की समिवाओं से होम करने लगा । तब जग्नि, विना घुआँ छोडे विजय की सूचना 
देनेवाली अपनी चचल जिखाओ को ब्याप्त करतें हुए जलने लगी और इद्रजीत से प्रस्तुत 
आह्रतियो को ग्रहण किया । इस श्रकार, इन््रजीत ने बत्यत भक्ति से यथाविधि हवन पूरा 
किया और अग्निदेव से चार घोडो तथा विविव झस्त्रास्त्रो से युक्त एक स्वर्ण-रथ प्राप्त किया । 

इसके पबण्चात्‌ वह उस रथ पर आर6ठ होकर, ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले 
अप्ने भयकर गर्जनों से इन्द्रादि देवताओं को भयभीत करते हुए राक्षस-सेनाओ के पास 


सबको ९०4 


आया और अदृश्य होकर, आकाश से ही, राम-लक्ष्मण पर घोर अस्त्रों की वर्षा करने लगा। 
राम तथा लक्ष्मण ने भी असस्य शर आफ़ाश की ओर चलाये, किन्तु उनमें से एक भी 
इन्द्रजीत को नहीं लगा । वह राक्षस बाकाश में अदृश्य रहकर बडे गर्व से सभी दिशाओं 
में घूमते हुए श्रेष्ठ वानर-वीरों का सहज ही नाश करने लगा । सूर्य-किरणों के समान 
आकाश से आनेवाले उसके क्रूर अस्त्र, वानरों तथा रामचनद्ध को दिखाई पढ़ते थे, किन्तु 
उसके रथ की ध्वनि, घोडो के खुरो की ध्वनि, घनुष का टकार, सारथी की बातें, कोडे 
की ध्वनि, रथिक (इद्रजीत) का गर्जन तथा उसका रूप, रथ तथा उसकी ध्वजाएँ कही 
भी' दिखाई नहीं देती थी । यह विचित्र युद्ध उस कपि-सेना को ऐसा लग रहा था, मानो 
वालि का सहार करनेवाले राम पर कऋ्रुद्ध होकर इन्द्र अपने पुत्र के वध का प्रतिशोध लेने 
के उद्देश से भयकर वाणों की वर्षा कर रहा हो । कपि-सैनिकों के अग्रो को खडित होते 
हुए देखकर रामचन्द्र से लक्ष्मण वोले--हे देव, आकाश में छिपकर युद्ध करनेवाले इस 
राक्षस के प्रताप से, हमारी सहायता करनेवाले ये वानर इस प्रकार कटकर मर रहे है । 
अब मे उस पर ब्रह्मास्त्र चलाकर, उसको तथा उसके वश को भस्म कर दूया ।' 


तव राघव अपने अनुज से बोले--हें लक्ष्मण, एक व्यक्ति के लिए क्या कही बहुतो 
का सहार करना उचित हैं ? क्‍या, तुम युद्ध-नीति नहीं जानते ? भय से छिपनेवालो 
को, पीठ दिखाकर भागनेवालों को, हाथ जोडकर प्रणाम करनेवालो को, शरणार्थियों को, 
पराजितो को, शस्त्रहीन लोगी को तथा सोनेवालो को मारना कल्याण-कामी तथा पृण्यात्मा 
क्षत्रियों का धर्म नहीं हैं । मायावी इद्रजीत का वध करने में समर्थ काल-रूपी वानरो को 
भेजना ही अब उचित है, ब्रह्मास्त्र चलाने का यह समय नही हैं ।' 


इस प्रकार कहने के पण्चात्‌ उन्होंने नील, अगद, हनुमानू, शतध्न, गज, गवाक्ष, 
वित्रमी, पनस, केसरी, शरभस, ऋषभ, सन्नाथ, ग्रथन, गवय, नल, मेन्द तथा द्विविद नामक 
वानरो को इन्द्रजीत पर आक्रमण करने के लिए भेजा | तव वानर-वीर अत्यधिक वेग से 
आकाश में उड गये और वृक्षों तथा पर्व॑तो को फेंकने लगे, किन्तु बडे दर्प के साथ उस 
राक्षस-राजकुमार ने उन पर भयकर शर-वृष्टि करके उन्हें अत्यत पीडित कर दिया ॥ 
वे उस दैत्य को आकाश में कही भी न देख सकने के कारण राम-मूपाल के निकट लौढ 
भाये । प्रलय-काल के मेघ के समान काला तथा विज्ञाल शरीर एवं क्रोध से भरी अरुण 
नेत्रो से युक्त अपना भयकर रूप (दूसरों की ) दृष्टि से बचाकर मेघनाद कहने लगा-- 
है राजकुमारो, युद्ध में मेरे रूप को देखना सहस्राक्ष इन्द्र के लिए भी असमभव हूँ | तुम 
किस गिनती में हो ?' इस प्रकार कहते हुए उसने आकाश को केंपाते हुए घनुप का 
भयकर टकार किया, वजद्बसम घोर वाणों को दाशरथियो पर चलाया भौर कवचों को छिन्न- 
भिन्न करन की छ्ावित रखनेवाले कितने ही अस्प्र चलाये। इससे सतुप्ड न होकर इच्द्रजीत नें 
यम के समान भयंकर रूप धारण करके अत्यधिक क्रोध से वज्ञपात को सदृश भयंकर 
तया कर सर्पनचाणों को राम-लक्ष्मण पर चलाया । तब उन्होंने अपने झत्तिसपत्त बाणों से 
उस राक्षस पर कई श्रेप्ठ वाण चलाये; किन्तु इच्धजीत ने उन्हें चुर-चूर कर दिया गौर 
फिर असख्य बाणों की बृष्टि कर दी । तब राम-लक्ष्मण उसी ओर बाण चलाने लगे, जिस 

३६ 


3०६ रंगनाथ एयायण 


ओर से उसके गर जाते थे । यह देख्कर इच्धजीत ने उन दोनों सूर्यवजियो को नागपान्न 
से ऐसे बाँव दिया, मानो कह रहा हो कि सर्प के साथ रहना तुम्हारे लिए पहले से ही 
सहज रहा है, भव भी उनके साथ ही रहो । राम-लक्ष्मण ने भी (इच्धजीत को प्राप्त) 
ब्रह्म के वर का सम्मान करने का निल्चय किया और वें आवदिनारायण के वशज, उस 
राक्षस-राजकुमार के द्वारा प्रयुक्त भाग-पाण से वेव गये । ये बाज राम का रूप घारण 
किये हुए है, किन्तु विचार कर देखा जाय, तो इन्ही ने वामत का रूप घारण करके तीन 
पा भूमि माँगी थीं और कृतघ्न हो वलि को वाँवा था । भला उसका फल, मनुप्य का जन्म 
लेने के पर्चात्‌ मिले विता क्से रहेंगा-इस प्रकार के लोक-कथन के अनुकूल ही रामचन्र 
अपने द्वारा उत्पन्न माया से आप बँब गये । 

माया के वबधनों में बंधे हुए राम सुध-वुध खोये-से पडे रहें । यह देखकर देवता 
दिभ्रात हुए और वानर खिन्न हुए | तब दुखी सुग्रीव को देखकर विभीषण ने कहा-- 
है सुत्रीव, ऐसे क्यो दु.ली हो रहे हो ? चाहें कैसा भी व्यक्ति क्यो न हो, उसके जीवन में 
विपत्तियाँ तो जाती ही है । यदि सूर्यवजज नागनयाण से बँबे हुए है, तो क्या हुआ ? यो 
कहकर उसने अपनी माया की दृष्टि से रावण के पुत्र को आकाजञ््वीथी में देखा और जल 
को अभिमत्रित करके उससे राम-लक्ष्मण की जआाँखो को पोछकर, उन्हें मेघनाद को दिखाया । 
उसके वाद सुग्रीव ने तुरन्त एक विद्याल पर्वत को उखाडकर इद्रजीत पर फेंका, किन्तु उसने उसे वीच 
में ही खड़-खड कर दिया और तीत्र श्यृपष्टि से सुग्रीव को ऐसे तस्त एवं व्याकुल कर 
दिया कि सूग्रीव को समर में पीठ दिखानी पडी। जो राक्षस सुग्रीव के प्रताप से भयभीत थे, 
वें इसे देखकर बहुत हर्पित हुए । इद्रजीत इस विजय से अत्यधिक मोद-मग्न हो, अपने 
सैनिको के साथ लका में वापस चला गया बजौर रावण से कहने लगा--मैने सर्प-वाणों से 
कपियो का नाञ्म किया और इशक्ष्वाकु-वणजों को व्याकुल कर दिया है ।' 

अपने पुत्र वी वीरता पर मनन्‍हीं-मन हर्षित होते हुए रावण ने ज्ीघत्र ही त्रिजदा 
को वुलाकर कहा--राम को प्राप्त करने का दुृढ विश्वास अपने मन में धारण किये रहने 
से भूमिसुता मेरा तिरस्कार कर रही हैं। आज इच्द्रजीत के हाथो में राम की जो दुर्गति 
हुई है, उसे सीता को दिखाओ । सीता को शीघ्र पृप्पक-विमान पर वैठाकर ले जाओ और 
राम की दया दिखा लाओ, जिससे वह राम की आज्ञा छोडकर मुझे स्वीकार करे । 

४७, नाग-पाशवद्ध दाशरथियों को देख सीता का दुःखी हाना 

रावण की आज्ञा मानकर बत्रिजटा दानवियो के साथ सीता को प्रष्पक-विमाव पर 
वैठाकर ले आई और युद्धन्क्षेत्र में गिरे हुए वानरो तथा राम-लद््मणो को दिखाया । वह 
कमल-लोचनी उनकी द्या देखकर अत्यत दुखी होकर अविरत अश्रुधारा बहाती हुई विलाप 
करने लगी। वे कहने लगी--- हाय राम, आपकी धनुर्विद्या कहाँ लुप्त हो गई? आपकमें ही स्थ्ति हरि 
तथा हर आदि देंवो को भी भयभीत वरनेवाली आपकी वाण-शव्ति आज कैसे नप्ड 
हो गई ? इस ससार में जाप ही अकेले परशुराम की भी उपेक्षा करने की शक्ति रखते हैं । 
सभी मुनि तथा नाग, आपकी सहायता के लिए सतत तत्पर रहते हुँ । हाय, ऐसे 


ए्‌ 
नाग आज आपको वबाँवनेवाले पाण्य वन गये हूँ ! सामुद्रिकों ने मुझे देखकर कहा था कि 


जुद्धकाड ३०७ 


तुम्हारे शरीर में सब प्रकार को शुभ चिह्न है, तुम्हारे चरणतलो में रेसाएँ तथा कमल है; 
इसलिए पति के साथ तुम्हारा राजतिलक होगा, तुम्हें योग्य पुत्र उत्पन्न होंगे गौर तुम 
चिरसृहागिन रहोगी । हे सूर्यववशतिलक, उनकी सभी वातें आज मिश्या हो गढ़ । 
उन्होने मुझे देखकर यह भी कहा था कि तुम्हारे (सीता के) चिकुर भ्रमर-समूह के 
समान नीले तथा सुदर हे, कटि क्षीण है, एक दूसरे से मिलनेवाली टेढी भीहें हैं, विजली 
की-सी कांति से युक्‍त दाँत है, विकृृतिहीन स्थूल तथा वर्तुलाकार जाँघें हे, हाय, ललाट, 
नेत्र, मँह तथा चरण सूदर लक्षणों से समन्वित है, कातियुक्त तथा स्तनिग्व नखो से युवत 
सुदर अगुलियाँ है, वर्तुलाकार, विवद्धित तथा सूक्ष्म अग्रभाग से युक्‍त दो कुच है, स्तिग्व 
एवं विशाल वक्ष तथा पाउ्वभाग हैँ, -नाभि गभीर तथा सुदर हे तथा तुम्हारा शरीर दिव्य 
तथा कमनीय काति से समन्वित है, अत तुम्हारे समान भाग्यशालिनी कोई नही है । हे राजन, 
मेरा वह भाग्य आज ऐसा फूट गया हैं ? आर्यो की यह उक्ति कि ऐसे पोडश लक्षणों से 
सपन्न रमणी अत्यत भाग्यशालिनी होगी, आज मिथ्या सावित हुई । हें राजन, यह सव 
मेरे दुर्भाग्य का फल है । आर्यों का कथन है कि जिस कन्या के, लाल कमल की-्सी सुंदर 
हथेलियाँ हो, पल्लव को समान अरुण कातिवाले चरण हो, क्षीण कटि हो, मदहास से 
युक्त मुख-कमल हो, वह चिर सौभाग्यवती होती है । यह कथन भी भूठ ही सावित हुआ। 
हे राजन, मेरी साधना का यही परिणाम हुआ । मुझे चुराकर ले आनेवाले भयकर राक्षस 
की खोज करके मेरा पता आपने जान लिया, समुद्र को बाँधकर कपि-सेना के साथ इस 
पार चले भी आये, पर हाय, एक गोपद' में आप डूब गये ! हे राजन, भयकर याम्य घर, 
वण्णास्त्र, आस्नेयास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना आप भूल तो नहीं गये ? कोई भी 
शत्रु, आपके दुष्टि-पथ में पड जाने मात्र से वह प्राणो से हाथ घो बैठता था, अब आपकी 
ऐसी दशा हो गई है ! देव-योग से ही ऐसा हुआ है, अन्यथा किसकी शक्ति है कि आपका 
सामना करे । यदि मेघनाद अपनी माया के बल से युद्ध में आपको ऐसे भयकर पाशों से 
वाँध सका, तो स्पप्ट है कि विधि-विधान का अतिक्रमण करना किसी के लिए सभव नहीं हैँ । 
हे नाथ, हे वीर, हे रामचन्द्र, मे अपने लिए नही रोती, आपके लिए नहीं रोती, आपके 
लिए अपने प्राण त्यागनेवाले काकुत्स्थ-वणज लक्ष्मण के लिए भी में दुखी नहीं होती, मेरे 
दुःख को देख द्रवीभूत हृदय से शोक करनेवाली अपनी माँ के लिए भी दुखी नहीं होती, 
किन्तु सतत केवल आपका ही ध्यान अपने मन में धारण किये रहनेवाली माता कौसल्या 
के लिए विलाप करती हूँ | कब चौदह वर्ष समाप्त होगे, कब राम अयोध्या में आयेंगे- 
ऐसी प्रतोक्षा करनेवाली आपकी माता की आशाएँ आज मिट्टी में मिल गईं ।" 


इस प्रकार, विलाप करनेवाली जानकी को सात्वना देते हुए अत्यत दपाद्रं चित्त से 
त्रिजटा सीता से बोली--हे कमल-लोचनी, राम पर कोई विपत्ति आ नहीं सकती । आप 
वयो इंस प्रकार शोक कर रही है ? यदि वानर-न्सेना ऐसी निर्वेल है, तो थे इतना बडा 
कार्य-भार उठाते ही कंसे ? वहाँ देसिए, वानर, वड़ी सावधानी से जापके प्रभ की रक्षा 
वंसे कर रहे है ? हे भूपुत्री, आप निश्चित रहिए | यदि ऐसा नहीं होता (शरद राम पर 
कीई विपत्ति आनेवाली है), तो वह पुप्पक-विमान पृथ्वी पर गिरे विना बसे रहता ? 


३०८ रंगनाशथ एशयायण 


(क्योकि, इसका गुण हैँ कि यह विधवाओं का वाहन नही बनता), इसलिए आप राम के 
लिए विलाप मत कीजिए । मेरी वात का विश्वास कीजिए । हे कमलमुखी, सूर्य-बरण-तिलक 
राम अवश्य ही लकेश्वर का वध करके लका पर विजय प्राप्त करेंगे और आपको ग्रहण 
करेंगे । हे कल्याणी, अब दुख मत कीजिए । मेरी वातो का विश्वास कीजिए । तब 
सीता ने सोचा कि कदाचित्‌ माया-सिर के समान यह भी कोई माया होगी और त्रिजटा 
की वातों पर विश्वास करके जात हुई । इसके पछ्चात्‌ ब्रिजटा ने उन्हें अशोक-वन में पहुँचा 
दिया । 


95, लक्ष्मण के लिए राम का विलाप करना 


यहाँ मनुवशत्तिलक राम की चेतना लौट आई । पाइरवे में पडे हुए अपने अनुज को 
देखकर उमड़ते हुए शोक से वे कहने लगे--हे सुग्रीव, मेरे अनुज की ओर देखो, उसकी 
कंसी दुर्गति हुई हैं। हम सीता को खो बैठे । उसे रावण के कारागार से मुक्त नही कर 
सके । अब मुझे इसे भी खोना पड रहा हैँ । सौमित्र को खोने के पदचात्‌ अब मुझे सीता 
की ही क्या आवश्यकता हैँ ? अब मेरा जीवित रहना भी किस काम का ? यत्त करूं, 
तो सीता के समान दूसरी पत्नी को में कदाचित्‌ प्राप्त कर सकूंगा | पृथ्वी पर पत्नियाँ 
मिल सकती हे, पुत्र प्राप्त हो सकते हे, वघु-वाघव मिल सकते हैँ; किन्तु सहोदर भाई 
नही मिल सकता । में इसे केवल भाई समझकर दु.खी नहीं होता । यह महावली सतत 
मेरी सेवा में तत्पर रहता है । यह कौसल्या तथा सुमित्रा, इन दोनो की एक समान भक्ति 
करता है । सुमित्रा, इससे भी वढकर मुझसे स्नेह करती है । ऐसी पुत्र-वत्सला, माता 
सुमित्रा को आज मेरे कारण दुख भोगना पड़ रहा है । यदि में अयोध्या जाऊं, तो भ्रातृ- 
वत्सल भरत तथा बारत्रुध्न पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है ? वे क्यो नहीं आये ? तो में अपने 
भाइयों से क्‍या कहूँगा ? मुझे वन से अक्ले आते हुए देखकर माताएँ पूछेंगी कि, हे पुत्र, 
सोमित्र क्यों नहीं आया है ? हमारा मन व्याकुल हो रहा है । तो में उनका क्या प्रत्युत्तर 
दे सकूंगा ? में कौन-सा मुंह लेकर उनको आश्वासन दूगा। इस दारीर के साथ मे वहाँ 
जाऊँगां भी कंसे ? भत्ते ही हिमाचल फट जाय, सूर्य पृथ्वी पर गिर पडे, पानी स्थिर रह 
जाय, समृद्र सूख जाय, हवा की गति वद हो जाय, अरिति शीतल हो जाय, लक्ष्मण कभी 
मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता । कभी इसने मुभसे अप्रिय बातें नहीं की । इसका 
चित्त मुझ पर एक निष्ठा से केन्द्रित हैं । इसकी समता करनेवाला भाई और कहाँ मिल 
सकता हूँ । यही मेरा प्राण है, और यही मेरा वधू है । इसे छोड़कर में अकेले नहीं रह 
सकता । यह जहाँ जायगा, में भी वही जाऊँंगा । यही मेरा ससार है । में अन्य कोई 
संसार नहीं चाहता । उस दिन सौमित्र मेरे साथ आया था, आज में सौमित्र के साथ 
जाऊँगा । हे पराक्रमी सग्रीव, तुमने मेरे हित के लिए वहुत-से कार्य किये हे । अब तुम वालि- 
पुत्र को लेकर वानर-सेना के साथ किव्किवा को लौट जाओो । लक्ष्मण के साथ मेरे चले 
जाने के पदचात्‌,. रावण तुम्हें तब करेंगा । जयशील सौमित्र के विना, मेरी विजय का भी 
वही मूल्य होगा, जो अबे के लिए चद्रोदय का मूल्य होता हूँ । मेरे प्रति श्रद्धा रखने के 


चऔ 


कारण वायु-पुत्र ने कई अद्भुत कार्य किये हे, उसने समुद्र लाँघधकर जानकी को देखा भौर 


अय 9 


रुछ्धकोंड ३0५९ 


अनेक राक्षसों का संहार किया । यह अगद, यह सुषेण, ये धीमान्‌ ठ्विविद, मैन्द, ये गवय, 
गवाक्ष, गज, ये शक्तिशाली नील, सपाति, कैसरी आदि अन्य वानरों ने मेरे लिए महान्‌ 
कार्य किये । आज हम पर जो विधि का प्रवल आघात हुआ है, उसे ठालना किसी के लिए 
सभव नहीं है । लक्ष्मण ने युद्ध-भूमि में वहुत-से राक्षतों का तृणवत्‌ सहार किया, पर 
इस समय शत्रु के तीत्र वाणों से बंधकर, आँखें बद किये हुए घूलि में लोट रहा हैं । 
श्रेष्ठ शय्या पर सोनेवाला आज युद्ध-भूमि में, शर-शर्या पर पडा हुआ है। विद्याल 
रविकुल-रूपी समुद्र की ज्वार को जात करके लक्ष्मण-रूपी कुमुदप्रिय (चंद्र ) 
अस्त हो गया है ।” 


४९. विमीषण तथा अंगद का वानरीं को धैर्य देना 


इस प्रकार, राम को विलाप करते हुए देखकर सभी वानर शोक-समुद्र में डूब गये 
उसी समय मेघनाद फिर से युद्ध करने के लिए आ पहुँचा । अजन-शैल के सदृश आकार- 
वाले उसे देखकर सभी वानर सुध-बुध खोकर सश्रमित हो रहें । तब विभीषण हाथ में 
गदा लिये वानर-सेचा के मध्य में घूमते हुए उनको घैर्य देने लगा । फिर उसने रवि-पुत्र 
सुग्रीव को देखकर कहा--हे सुग्रीव, इस प्रकार तुम शोक क्यो कर रहें हो ? यह युद्ध 
का समय हूँ । यह समय शोक में ड्बे रहने का नहीं है ” दुनिवार तरणगणो से पूर्ण समुद्र 
के मध्य फेंसी हुई नाव के समान हमारी सेना कर्णघार-रहित हो गई हैँ । अब हमारा 
कर्तव्य है कि हम युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जायें ।' 

इसे सुनकर अगद ने कहा--तुम्हारा कथन सर्वथा उत्तम है । नाग-पाश्ों से वेंचे 
हुए राजकुमार, पृथ्वी पर गिरे हुए हैं और क्षतों से अविरत बहनेवाली रक्‍त-धारा के 
कारण मूच्छित-से पडे हे | तुम लोग इनकी रक्षा सावधानी से करते रहो । उदयाद्वि पर 
सूर्य का आगमन होने से पहले, मे समस्त राक्षसों को जीतकर जानकी को यहाँ ले आऊँंगा। 
हनुमान आदि चानरो के साथ जाकर, लका के दुर्ग के द्वार, दीवार, तोरण आदि को अपनी 
मुष्टियो के प्रहार से चूर-चूर कर दूंगा । वधुनवाधवों के साथ दशकधर को भस्म 
कर दूंगा । समस्त भत-समह आज मेरा पराक्रम, मेरा वाहुबल और राम के प्रति मेरी भक्ति 
दखेंगे । रघुृताथ का कार्य करने के लिए, चदन तथा केयूर से अलकृत मेरी भुजाएं बड़े 
दर्प के साथ फडक रही है । रावण को जीतकर विभीषण को इस लका के सिंहासन पर 
प्रतिष्ठित करूँगा, ताकि रघुवीर प्रसन्न हो, अन्यथा में युद्ध में उस राक्षस के हाथो से 
मरकर लक्ष्मण के चरण-चिक्लो का अनुसरण करूँगा | 

तव सुग्रीव ने अगद को देखकर कहा--हे पुत्र, तुम अब इन दाशरथियों को छीक्र 
किष्किधा ले जाओ । म॑ इन्द्रजीत तथा रावण को समस्त राक्षतों के साथ मारकर रघुराम 
की पत्नी को शीघ्र वहाँ ले आऊँगा / सुग्रीव को तथा रामचन्द्र को देखकर सभी वानर 
भयभीत हो शोक-समुद्र में डूब गये । तब सुपरेण ने सवको देखकर कहा--है वानर- 
वीरो, इस नाग-पाश से म॒वत होने का में एक उपाय जानता पूर्वकाल में देवताओं भोर 
असुरो के बीच भीषण सम्राम में सभी देवता इसी प्रकार नागन्पाणों से बंध गये थे । तेव 
देवताओं ने दिव्य औपधियों से, इन वधनों से मुकित प्राप्त की । वे सभी ओऔपधियाँ क्षीर 


रेश0 एंयनाशथ एयायण 


सागर के उस पार द्रोण पर्वत पर मिलती है । हनुमान को भेजो, तो वह अवश्य उन 
ओऔपधियो को ले बायगा । तुम लोग दुख मत्‌ करो । 


४० नारद का आगमन 

उर्स. समय परम योगीन्द्र, पर-तत्व-वेत्ता, परम पावन मूत्ति तथा परम-बैप्णव नारद 
मुनि वहाँ आये । सहल सूर्य-सदृग् काति से युक्त उनकी देह पर कृपष्णमृग-चर्म था । 
उस पर उनका पिंगल वर्ण जटठा-समूह ऐसा जोमायमान था, जैसे कालें-काले वादलो पर 
विजली हो । उनके ललाट पर ऊर्दध्व-पडु था और वे कौपीन-विलसित दण्ड घारण किये 
हुए थे । उनकी वीणा से रमणीय नारायण-मत्र का अनुरणच हो रहा था । उन्होने अपने 
साथी योग।द-्समूह की आकाण में ठहरा दिया और स्वय बड़े हर्ष से राम के निकट 
पहुंचकर वडे आदर के साथ हाथ जोडकर उनकी प्रदक्षिणा की और अत्यंत भक्ति के [साथ 
निवेदन किया--हि देव, ब्रह्मादि देवताओ ने, क्षीर-प्रागर में शयन करनेवाले आपके 
समक्ष पहुँचकर रावण आदि राक्षसो के अत्याचारों के सबंध में निवेदन किया, तो उन पर 
कृपा करके, उनकी रक्षा करने के निमित्त आप दवरथ के पुत्र होकर जन्मे । अत , आपका 
इस प्रकार दुखी होना उचित नहीं है । आपके नाम-मात्र का स्मरण करने से अज्ञान दूर 
हो जाता हूँ ।| तव आपको अन्नान छू भी कैसे सकता है ? आप स्वयं विचार करके देखें। 
आप स्वय नारायण हे, पूर्णज्ञान-निधि है, चारु-कौस्तुभ-रत्त विलसित वक्षवाले हे, सतत 
लक्ष्मी के निवासन्योग्य विगाल अग्रो से विलसित हें, आदिदेव हे, सर्वा तर्यामी है; बेद- 
वेद्य हें, विव्व-रूप है, स्मरण करनेवाले योगीश्वरो के ध्यान में दिखाई पडनेवाले 
सच्चिदानद-हूप है । यह पृथ्वी ही आपका चरण हे, आकाणग ही मस्तक है, ब्रह्मा आपका 
ललाट है, सूर्य-चढद्र नेत्र हें, पवन ही आपका इवास है, अग्नि ही आपका मुह है, सरस्वती 
जिह्ठा है, वेद-राशि आपका दत-समृह है, गायत्री ही शिखा है, प्रणव ही हृदय है, दिग्ञाएँ 
ही कान है, महनीय घर्मं ही मनहै, असब्य विजयो से सपन्न देवता ही आपकी वाहुएँ है; 
ब्राह्मग-ममृह ही आपका उदर है, मित्र तथा वर्ण आपकी जाँधें हें, अश्विनी-देवता 
आपके जान्‌ हे, और समस्त विध्व आपका रोम-समूह है । हे पृथ्वी-ाथ, वह देखिए, सभी 
देवता, किन्नर, यक्ष,, गवर्व आदि आपकी विजय की अभिलापा करते हुए आकाश में 
खडे हैं | आप अपना 'त्रम छोड दीजिए, निप्कतक घीमानू वन जाइए झऔर शज्ञीत्र राक्षसो 
का सहार कीजिए | कदाचित्‌ आप ससार को यह दिखाना चाहते हे कि मानव मोहव्श 
इच्छा-हपी पाञय से वेध जाय, तो वह इसी प्रकार ससार-सागर को पार नही कर सकता । 
अन्यथा हे श्रीराम, जाप कंसे नाग-पाणो से वेवनें लगे ? आप आदिदेव हैँ । आप अपने 
निज हूप का स्मरण कीजिए। आपका वाहन तथा आपके पताके का चिह्न गरुड़ यहाँ 
आयगा । उसके आदतें ही ये सभी नाग-पाण खुल जायेंगे ।” इतना कहकर नारद आशीर्वाद 
देकर क्षीस्सागर को चले गये । 

४१. राघवों का नाग-पाश से मुक्त होना 

नारद के वचनों को सुनकर राघव ने अपने आदिदेव होने की वात का विचार 

क्या और गमर्ट का क््मरग किया । उनके स्मरण करते ही गरुड क्षीर-सागर के उत्तर 


खुछ्धकांड 5२५ 


तैट पर से आकाश की ओर उछला । जिस वेग से वह उछला, उस वेग के कारण पृश्ची 
के नीचे रहनेवाला आदिशेष चौक पडा । उसको पखो से उत्पन्न अत्यधिक वायु से आकाश 
आलोडित-सा हो गया और नक्षत्र गिरने लगे । एखो की फडफडाहट के कारण उत्पन्न 
ध्वनि से समस्त लोक भयाकात-से हो गये और समस्त आकाश घूलि से व्याप्त हो गया ; 
उसकी तीज्र गति के कारण शैल-श्वृग लुढकने लगे और समुद्र आलोडित होने लगा । बह 
दस सहस्र सूर्यो की सयुक्‍त प्रभा के समान दीप्त हो रहा था और प्रभा-समन्वित पक्षों से 
युक्त मेरु पर्वत के समान दीख रहा था । इस प्रकार, आकाशझ-मार्ग से आनेवाले गररड 
को देखकर राम-लक्ष्मण को आबद्ध किये हुए सभी नागर उन्हें छोडकर चले गये । यथार्व 
तो यह हैं कि जो कोई उस गरुड का स्मरण करता है, वह सभी प्रकार के बधनो से 
मुक्त हो जाता है । फिर, राम स्वय भी यदि चाहते, तो वे अपने वधनो को काट देने में समर्थ थे । 

सग्रीव आदि वानर आश्चर्य-चकित हो देखते रहें । गरुड ने राम की परिक्रमा की 
और राम-लक्ष्मण को वार-बार प्रणाम किया, अपने कातियुवत पक्षों को उन दोनों के 
शरीरो पर फेरा, और उनके समक्ष खडे होकर, हाथ जोडकर निवेदन किया--हें देव 
आपके ये नाग-पाश-बधन छूट गये । अब आप इन्द्र-वैरी रावण का सहार करके सीता को 
साथ लेकर अयोध्या नौट जाइए। हे राजन्‌, असुरो को दण्ड देते समय आप उनकी मायाओं 
से सावधान रहिए । उनकी किसी भी माया से धोखा मत खाइए ।” इतना कहकर उसने 
फिर उनकी प्रदक्षिणा की, उनकी प्रशसा करके, उन्हें आशीर्वाद दिया । फिर, कदयप-पुत्र 
(गरुइ) ने उन्हें हृदय से लगाया, प्रणाम किया और शीघ्र क्षीर-सागर को रवाना हो गया। 

नाग-पाशो से मुक्त होने से राम-लक्ष्मण प्रसन्नचित्त हुए। सभी वानर आनद-सागर 
में निमरत-से हो गये । वे सिंहनाद करते हुए तथा पूँछें हिलाते हुए नृत्य करने लगे | कुछ 
वानर हपए॑ से उछल-कूद करते हुए, भट्गरहास करते हुए, इघर-उघर दौडते हुए, पर्वतो 
और व्‌क्षों को फेंककर समस्त लका का सर्वनाश करने की कल्पना करते हुए अत्यधिक 
हर्ष-नाद करने लगे । उनके कोलाहल से लका हिल-सी गई, आकाश विदीर्ण-सा हो गया। 
इतने में सूर्योदय हुआ और रावण ने युद्ध-भूमि का वृत्तात जानने के लिए अपने दूतो को भेजा । 

दूतो ने दुर्ग की दीवारों पर से इक्ष्याकु-बशज राम-लक्ष्मण को नाग-पाश से मुक्त 
होकर बैठे देखा । उनकी सेवा में सुग्रीव बैठा था । विभीषण सविनय खडा था, और 
सारी कपि-सेना उनके समक्ष बडी भवितयुवत हो खडी थी । वें दोनो राज-पुत्र युद्ध के 
लिए अपनी सेना को उत्साहित कर रहे थे और देखने में विश्वसल मत्त गजो के समान 
लग रहें थे । जब दूतो ने यह दृश्य देखा, तब उन्होनें श्षीक्र जाकर दनुजेश्वर से सारा 
ससाचार कह सुनाया । यह सुनकर रावण खिन्च तथा आश्चर्य-चक्तित हुआ और मगश्रियों से 
कहा--नाग-पाशो से मुक्त होने की क्षमता रखनेवाले राम-लक्ष्मण के द्वारा छलका का सर्व- 
नाश निश्चित ही है । भला, कही नाग-पाश भी छूटते है ? अब मेरी विजय को आशा 
नही हैँ । राक्षस-लक्ष्मी अब इस युद्ध में नप्ट हो जायगी । कदाचित्‌ गरद ही जाया हो, 
अन्यथा नागर-पाश कैसे छुटते ? अवश्य ही गरड ने मुझे पर चिजय पाई हैं । नहीं दो 
नर और वानरो में इतनी झवित कहाँ है ?' 


इ४२ एगनाशथ रएयायए 


३२, पृृत्राक्ष का सुद्ध 

इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उसने एक भत्त गज के हुकार की भाँति लवी साँस 
छोड़ी और घृम्राक्ष को आज्ञा दी कि तुम एक विशाल सेना लेकर शीघ्र राम-लक्ष्मण पर 
आक्रमण करो । तब दैत्यपति को प्रणाम करके बूम्राक्ष युद्ध के लिए चल पड़ा । उसकी 
सेना भी चारो ओर से चली । भेडियो तथा सिंहो के मुखवाले फुर्तीले घोडो से युक्त 
उसका रथ, कर्ण-यूटो को विदीर्ण करनेवाली तथा विज्ञाओं को कपित करनेवाली भयकर 
ध्वति करता हुआ तथा अपनी अनुपम दीप्ति फैलाता हुआ निकल पडा । भेरी, शख, डका, 
जादि विविध वाद्यो का निनाद करते हुए युद्ध के लिए आनेवाले घृम्राक्ष को कई दृश्शकुत 
दिखाई दिये । तब रथ के आगे जानेवाले राक्षस भयकर गर्जन करके भयभीत हो निर३चेष्ट- 
से हो गये । इस पर भी विना रुके वडी तत्परता दिखाते हुए घूजम्नाक्ष ने समुद्र के समान 
विज्ञाल वानस्-सेना पर आक्रमण किया । असुर तथा वानर आकाश का स्पर्श करनेवाले 
निनाद करते हुए आपस में जूक गये । दानव खड्ग फेंकते थे, तो वानर उन पर दृक्षो का 
प्रहार करते थे । राक्षस भाले भोकते थे, तो वानर मुप्टियो से आघात करते थे । राक्षस 
हठ करके (वानरों पर) घोड़े दौडातें थे, तो वानर उतर घोड़ो को अपने नखो से चीर 
डालते थे । दानव उन पर रथ चलाते थे, तो वानर उनको चूर-चूर कर देते थे। दानव 
भत्त गजो को उनसे टकराते थे, तो वानर क्रोध से उन्हें पृथ्वी पर पटक देते थे । 


इस प्रकार, दोनो पक्षों के योद्धाओ में भयकर युद्ध होने लगा । वानर-बीर यम के 
सदृश भयंकर आकार घारण करके असुरो को पैरो से कुचलकर, हाथियो को पृथ्वी पर 
रुड़कर मार डालते थे और उन्ही (मृत) हाथियो को असुरो पर फेंककर उनका दर्प-दलन 
कर देते थे । फिर, रथो के कूबर पकड़कर उन्हें (रथों को) आकाश में तेजी से घुमाकर 
पृथ्वी पर पटक देते थे और उन्ही टूटे हुए रथो को उठाकर राक्षसों पर फेंककर उनको 
पृथ्वी पर गिरा देते थे । फिर, वानर घोडो के पैरो को पकडकर ऊपर उठाते और उन्हें 
पृथ्वी पर पटककर मार डालते, और उन्ही मरे हुए घोडो को राक्षसों पर फेंककर उन्हें 
मार डालते थे | बन्र्‌ के पदचर सैनिको पर पद-प्रहार करके उनकी पसलियो को चूर-चूर 
करके मार डालते थे और उनके शवो को राक्षस-सेना पर फेंककर उन्हें नीचे गिरा देते थे। 
वे राक्षस-सेना में घुस जातें और अपने भयकर दाँतो से राक्षस-समूह को काटकर 
उन्हें तितर-वितर कर देते, उनके अस्त्रों को तोड देते, कुहनियो से उनके मुखो पर प्रहार 
करते, नीचे गिराते और उनके गले घोट देते । फिर, उनके पैरो को दबाकर अपने टखनो 
से ऐसा प्रहार करते कि उनकी पसलियाँ चूर-चूर हो जाती । फिर, वे कुछ राक्षसों के 
कठ में अपनी पुछो को फदे की तरह डाल देते और उन्हें इस प्रकार कंस देते कि वेचारे 
राक्षमों की पुतलियाँ घूम जाती और वे जहाँ के तहाँ ढेर हो जाते । इस प्रकार, सारी 
युद्ध-मूमि राक्षरं के शवों से ऐसी पट गई कि पता नहीं लगता था कि यह सिर है, यह 
आँख हैँ, यह मृह है, यह कान हे, यह नाक है, यह कया हैं, ये हाथ है, यह झारीर है, 
यह कमर है, यह जाँच हूँ, यह घटना है और यह पैर है । मज्जा, मास, भेजा, रक्त, 
आँतें, हड्िडयाँ, चर्म तथा खोपड़ियो के तो ढेर ही लग गये थे । 


खुद्धकांड ३ 


तब घूम्राक्ष ने बड़े उपेक्षा-भाव से उस कपि-सेना पर आक्रमण किया और अपने 
प्रताप का प्रदर्शन करते हुए मुद्गरो के प्रहारों से वानरों के सिर विदीर्ण करते हुए, क्रोध 
से भाले चलाते हुए, विविध अस्त्रों से भयकर युद्ध करने लगा । उसके भयकर प्रहारो से 
कई वानर-सैनिक रक्त उगलते हुए गिर पडे । कुछ धैर्य खोकर, उसके प्रहारों से अपने को 
बचाकर भागने लगे । यह देखकर हनुमान्‌ ने बडे क्रोध से एक विशाल पर्वत उस राक्षस 
पर फेंका, लेकिन उसने अपनी गदा से उस पर्वत को रोककर अपने को बचा लिया, 
किन्तु वह पर्वत उसके रथ पर गिरा और रथ चूर-चूर हो गया । तब पवन-कुमार ने 
अपनी छवित का प्रदर्शन करते हुए तरु, शैल तथा पापाणों के प्रहारों से राक्षसों के सिर 
ऐसे चूर-चूर करने लगा, जैसे यम समस्त ब्रह्माण्ड को विदी्ण करके चूर-चूर करता हो । 
फिर, वह सिंह-सदृश पराक्रमी हनुमान्‌ एक पर्वत-श्रग को उठाकर धघूम्राक्ष की ओर बढ़ा । 
तब उसने लो, अब मरो' कहते हुए अपनी गदा हनुमान्‌ के सिर पर चलाई । किन्तु, 
हनुमान्‌ ने उस घूम्राक्ष की शवित, शौर्य, क्रोपष तथा साहस की उपेक्षा करते हुए, भयकर 
गर्जेन करके अपने हाथ के उस शैल-श्ग को धूमाक्ष पर ऐसा फेंका कि उस राक्षस के सिर 
के दो दुकडे हो गये और वह ढेर होकर वही गिर गया । उस समय चारो ओर ऐसी 
ध्वनि फल गई, मानों वज्ञपात होने से कई पहाड गिर रहे हो। घूम्राक्ष को इस प्रकार 
भरे हुए देखकर हतशेप कुटिल राक्षस पवन-पुत्र के प्रताप से भयभीत हो उठे और थशीक्र 
ही लका की ओर भागने लगे । उनके भागते समय पृथ्वी भी कॉँपने लगी । 


४३. अकंपन का युद्ध 

धूम्राक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण का हृदय क्रोध से जलने खगा । तब 
उसने देवताओ को कपित करने की क्षमता रखनेवाले, दिव्यास्त्र शस्म्रों से सपन्न तथा 
दिव्य रथ से विलसित अकपन नामक राक्षस को, एक वडी सेना के साथ वानरो से युद्ध 
करने के लिए भेजा । प्रलय-काल के मेघ के समान आकारवाला वह राक्षस अपने आभूृषणों 
की दीप्ति तथा मणियो की काति से सूर्य-मडल के समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्ण-रथ 
पर चढ़कर युद्ध के लिए चल पडा । उसके रथ की पताका ऐसे फहरने लगी, मानो कह 
रही हो कि लो, अब अकपन युद्ध करने आ गया है । राक्षस-वीरो के भयकर हुकारों तथा 
भेरी, पटह आदि के निनादो के मध्य, अपने साथ असख्य चतुरगिणी सेना लिये हुए गगन को 
भी भेदनेवाले भयकर गर्जन करने हुए, उसने वानर-सेना पर आक्रमण विया । दोनो पक्षो 
पी सेनाएँ आपस में भिड गई और बडी भयकर गति से युद्ध करने लगी । उस घोर 
सग्राम के कारण उत्पन्न लाल धूलि सभी दिशाओं तथा आकाश में व्याप्त हो गई और 
कपि-सेना तथा असुरूसेना के बीच अधकार-सा छा गया । 

उस समय वृछ संनिक तो अपने पक्ष के लोगो को पहचान कर शुद्ध करते थे। 
पुछ उनवी बे ली दथा चेप्टाओ से उन्हें पराण समभकर युद्ध करते थे और बुछ तो 
किसी प्रकार का विचार किये विना, जो कोई भी सामने पद जाता, उससे भयकर गति से 
युद्ध करते जाते थे। वानरो वो द्वारा पके जानेवाले वृक्ष तथा पर्वत एव दैत्यों के द्वारा 
चलाये जानेवाले भयकर दास्त चारो ओर फैलकर पृलिन्धपी तिमिर समुद्र में जलचरों फ् 

० 


३४9 रंगनाथ एयायएण 


समान दीखते थे । राक्षसों तथा वानरो के बड़े उत्साह से युद्ध करते समय, सैनिकों के 
शरीरो से उमडनवाली रक्त-घाराओ के कारण सारी पृथ्वी की घूलि सिंच गई | युद्ध 
में वानरो का युद्ध, दुस्सह होते देखकर अकंपत अग्नि के समान कऋुद्ध हुआ | तव घनुष 


पर प्रत्यचा चढाकर बडे उत्साह से उस महावली ने अपने सारथी से कहा--वानस्-सेना वृक्षों तथा 
पववेतो की सहायता से राक्षस-समूह को नप्ट कर रही है । शीघ्र ही मेरा रथ उनकी ओर ले चलो ।' 


उसका सारथी रथ को उसी ओर ले गया । अकपन ने उस वानर-सेना पर अपने 
तीक्ष्ण वाणो की वृष्टि-सी कर दी, तो सभी वानर थैर्ये खोकर निरचेष्ट-से हो गये । तब 
हनुमान्‌ ने बडे साहस के साथ उस राक्षस का सामना किया | तव उसके साथ वानरो ने 
भी दानव-सेना पर आक्रमण किया । अकपन अपनी अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए, 
भयकर ग्जन-हूपी निर्धोष करते हुए, मेरु पर्वत के समान आकारवाले पवन-पुत्र पर प्रलय- 
कान के मेंघ की भाँति शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु हनुमान्‌ ने उनकी उपेक्षा करके अट्ठहास 
किया और प्रलय-काल के रुद्र के समान अपनी करुद्ध दृष्टियों से रौद्ग रस उगलते हुए, निर्भय 
हो एक विद्याल पर्वत को समूल उखाडकर उसे अक्पन पर ऐसा फेंका, जैसे इन्द्र ने नमुचि 
पर वच्च गिरा दिया था; पर उस दानव ने उस पहाड को अबर््ध-चन्धास्त्र से च्र-चूर 
कर दिया | तव हनमान्‌ और भी उद्धत हो, अपनी महनीय शक्ति को प्रकट करते हुए 
तथा आँखो से स्फूलिगो को गिरातें हुए शीध्रता से एक दूसरा पर्वत उखाड़कर ले आया 
और भयकर गर्जन करके उसे बड़ी करता से उस राक्षस पर फेंका । किन्तु, राक्षस ने शीघ्र 
ही उस पव॑त के टुकड़े-दुकडे कर दिये । इस पर मारुति और भी कु हो उठा और बड़े 
वेग से एक पर्वताकार वृक्ष को उखाडा और अपने पैरो के आघात से पृथ्वी को कंपाते 
हुए स्फुलियो से बुग्त भाँखों से उस वृक्ष को घुमाकर अन्य वृक्षों को तोडते हुए दैत्य-समूह 
पर पिल पडा । उसने रथिको को मार डाला, रथो तथा उसके अदवो को मिट्टी में मिला 
दिया, तथा राक्षसों का संहार कर दिया । फिर हाथियों के समूह पर आक्रमण करके, 
उनके दाँतो, हड्डियों, उनवों कुभों पर बैठे महावतो, उनके अकुशो, उनकी धटियों तथा आभूषणो 
आदि को चूस्चूर करके एक पिंड-जैसा वना दिया झौर कुछ हाथियों को चूरूचूर 
करके मिट्टी में मिला दिया । उसके पश्चात्‌ उसने घुडसवारो के साथ घोड़ो को मार 
डाला और पदचर सेना को दल दिया | यम के समान अत्यधिक भयकर गति से युद्ध 
करनेवाले हनुमानू को देखकर अकपन मन-हीं-मन बहुत कुछ हुआ । उसने एक साथ 
चौदह तीव्र वाणो को चलाकर (हनुमान्‌ के) हाथ में रहनेवाले अइवकर्ण वृक्ष के टुकडे- 
टुकड़े कर दिये ओर अत्यंत हर्प से सिंहनाद क्या । हनुमान्‌ के शरीर से रक्‍त-धाराएँ 
छूटने लगी और तब वह पृष्पित अग्योक के समाव दीखने लगा । फिर, हन॒मान्‌ ने सहज ही 
एक ओर वृक्ष को उखाड़ लिया और उससे अकपन के सिर पर प्रहार किया । उस राक्षस 
का सिर विदीर्ण हो गया और उसने एक पर्वत के समान पृथ्वी पर गिरकर अपने प्राण 
छोड दिये । उसके गिरते ही वानरो के तीक्ष्ण प्रहागों को सहना असभव जानकर तथा 
हनुमान वो समक्ष देखकर सभी राक्षस-वीर भयभीत हो गये और प्राण लेकर लका की 
ओोर नाग गये । सभी वानर-दीर हनुमान्‌ के साहस की प्रशसा करने लगे । 


सुद्धआंड 4९४ 
५४. महाकाय का युद्ध 


शत्रुओं के हाथ में अक्पन को मरा हुआ जानकर दशकठ वहन खिन्न हुआ और 
उसने महाकाय को बुलाकर कहा--अपने शौर्य को प्रकट करते हुए नरो तथा वानरो का 
सहार करो ।' तब वह पराक्रमी थीघ्र युद्ध की सज्जा से सज्जित हो, रमणीय मयूर-ध्वजा 
से अलकृत, भणियों की प्रभा से विलसित शास्व्रास्त्रों से परिपृर्ण तथा पिशाच-मखवाले गधे 
जुते हुए रथ पर वैठकर, दक्षिण द्वार से वडे वेग के साथ निकला । उसके साथ ही विविध 
शस्त्रास्त्रों से यकत उसकी सेना, भेरी, डका तथा तुरहियो का गभीर शब्द करती हुई चलने लगी। 
उस समय उनपर हड्ियो की वर्षा हुई, विजलियाँ गिरी, छत्र तथा ध्वजाएँ टूटकार 
गिर पड़ी । किन्तु, महाकाय इन अपशकुनों की उपेक्षा करते हुए आगे बढा और वडी क्रूरता 
से वानर-सेना पर आक्रमण किया । तब वानर भी उत पर तरु-शैल-समूह की वर्षा करनें 
हुए उनसे भिड गये । 

दानव उस वानर-सेना पर अपना पराक्रम दिखाने लगे । उन्होने अत्यत चचल गति 
से कपि-पेना के मध्य रथ चलाये, गज-समूह को वानर-सेना से टकरा दिया, अझ्वो को 
उनके ऊपर चलाया और पदाति-सेना उनपर टूट पडी । फिर, उन्होने वानर-सैनिकों को 
अपने करवालो से काटते हुए गदा के प्रह्मरों से उन्हें व्याकुल करते हुए, भालो से बेचते 
हुए, शूलों से चीरते हुए, लाठियो से पीठतें हुए, वरछियों से भोकते हुए, शरवृष्टि करते 
हुए, चक्रों को चलाते हुए, परशुओ से काठतें हुए अत्यत क्रोध के साथ अपने मुद्गरों के 
प्रहार से वानरों को दण्ड देने लगे | इधर वानर भी उन वीर राक्षसों पर शैल-बृक्षो की 
वर्षा करने लगे । उस घोर युद्ध के कारण धूलि उडकर रवि-मडल तक व्याप्त हो गई । 
उस घूलि के कारण अविरत युद्ध करनेवाली दोनो पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे को नहीं 
देख पातो थी । भयकर राक्षम लगातार अपने ऊपर गिरनेवाले तरु-शैनों को लक्ष्य करके 
असख्य वाण चलाकर आकाश को ढक देते थे | वानर-वीर राक्षसों के चलाये हुए शस्त्र, 
बाण तथा लाठियों को अयनी ओर आते देखकर उनको लक्ष्य करके, पर्वतो तथा वृक्षों को 
फेंकते थे । युद्ध-भूमि में उडनेवाली घूलि उनके कर्णपुटों में भी भर गई थी और उनको 
इसका पता नहीं चलता था कि कौन राक्षस है, और कौन वानर है । जो कोई उनके 
समक्ष पड जाता था, वें उस पर प्रहार करके उसको मार डालते थे । दनुजों के शरीर से 
वहनेवाले रक्त, नदियों के समान बहकर धूलि को भिगो देता था। घूलि-जनित अधकार 
के व्याप्त रहने पर भी दानवो को अपने दीप्त तेज से युद्ध करते देखकर, देवता भी आश्चर्य- 
चकित हो गये । तब दैत्यों के प्रताप से नप्ट-अ्रप्ट हो वानर भयभीत हो गये और युद्ध- 
भूमि से भागने लगे । 

उन्हें भागते हुए देखकर अगद ने कहा--हे कपियों, मेरे रहते हुए तुम ऐसे बयो 
भागे जा रहे हो ?' इस प्रकार के उत्साहपूर्ण वचनो से अगद ने उनको धैर्य देकर फिर 
उन्हें युद्ध में प्रवृत्त किया । वह स्वयं एक महापवेत को उठाकर राक्षस-सेना पर आक्रमण 
फरने लगा । उसके पीछे सयकर गजेन करते हुए वानर-बीर भी चल पटे । बगद ने झुप्र 
होकर पर्वतो तथा वृक्षों को राक्षमों की सेना पर फेंका । वह वायें हाथ से रायसों यो 


३१६ _ एंगगायथ रायायण 


नीचे गिराकर उन पर मृप्टियों से प्रहार करता, हाथो से पीठता, कुहनियों से उनके मुह 
पर प्रहार करके फोड़ देता और उनके ग्त्रास्त्रो को चूर-चूर कर देता । अंगद के सामने 
क्र राक्षम टिक न सके । वे विवश्ञ हो चारो दिशाओं में भागने लगे । 


प्र५, अंगद के द्वारा महाकांय का संहार 


इस प्रकार, भागनेवालें राक्षतों को मतिमान्‌ रुघिराशन, वज्चनाभ, कालदष्ट्र, काल- 
कल्प, वपाश, शतमाय, घूम्र तथा दुर्घर नामक महाकाय के प्रख्यात मत्रियों ने रोका, और 
अपने समस्त पराक्रम को प्रकट करते हुए वानर-सेना को पीडित करने लगें । यह देखकर 
पनस, मेंघपुप्पक, गवाक्ष, ऋषभ, गज, क्ोघन, शतबली तथा तार नामक श्रेष्ठ वानर उन 
राक्षस-वीरों के सम्मुख आकर युद्ध करने लगे । उस समय दझुघिराशन ने क्रोधोन्मत्त हो 
गवाक्ष पर असख्य वाण चलाये, तो गवाक्ष ने बडे वेग से वृक्ष तथा पर्वतों को उस पर 
फेंका; पर रुपिराणन ने उन्हें वीच में ही चुरूचूर कर दिया और गवाक्ष पर ऐसा प्रहार 
किया कि गवाक्ष मूच्छित होकर ग्रिर पडा। गवाक्ष को मूच्छित होते देखकर तार ने क्रोध से 
एक विज्ञाल साल-वृक्ष को उखाड़कर रुघिराशन के रथ पर फेंका । किन्तु, रुधिराशन नें 
उत्त वृक्ष को वींच में ही चूर-चूर करके दस वाण चलाकर तार को गिरा दिया। उसके 
पच्चात्‌ वह प्रलय-काल के यम के समान बड़ा ही उग्र रूप धारण करके कपि-सेना पर टूट पडा । 
इतने में गवाक्ष तथा तार सचेत हुए और चारो शोर दृष्टि दोडाकर देखा । फिर, 
गवाक्ष थे यम के समाच भयकर रूप घारण करके एक गदा से रुघिराशन के सिर पर 
प्रहार किया, तो वह राक्षस विक्ताग होकर पृथ्वी पर ग्रिर पडा और उसके प्राण शरीर 
को छोडकर उड़ गये ॥ 


वज्ञनाभ नामक राक्षस उद्धत होकर पृथ पर कई बाण चलाये, तो पृथु ने उस राक्षस 
पर एक पर्वत फेंका; किन्तु उस राक्षस ने उसके दस टुकड़े कर दिये। तब नचोधोन्मत्त हो 
पृथु ने बड़े वेग से उसके रथ पर आक्रमण किया, उसके धनुष को खडित किया, घोडो 
को मार डाला, रथ को चूर-चूर कर दिया और अपने अनुपम बाहु-बल से उसकी ढाँगें 
पकड़कर उसे ऊपर उठाया और बड़े वेग से उसे घुमाकर पृथ्वी पर पटककर सिंह-गर्जन 
किया | 
इसके पश्चात्‌ कालदष्ट्र ने ऋषभ पर अपने उद्ण्ड मत्त गन को चलाया। सामने से 
बानेवाले उस हाथी के मार्ग से विचलित न होकर ऋषपभ जाकाण की ओर उछला, 
और एक साथ दोनो पैरों से उस हाथी के कुम-स्थल पर प्रहार किया, तो वह हाथी 
चिघाडता हुआ बहुत दूर पीछे हट गया । किन्तु, ऋषम ने इससे संतुष्ट नहीं होकर, उप्तका 
पीछा किया और उसके दाँतो को उखाइकर उसी से उस पर प्रह्मार करके उसे मार डाला। 
फिर, अपना शञ्ञौ्ें प्रकट करते हुए उसने कालदष्ट्र की टाँगो को पड़कर उसे नीचे पदक 
दिया और उसका वध कर दिया । असुरो की सेना में हाहाकार मच गया और वानस्सेना 
दर्प से हुकार करने लगी । तब कालकल्प ने पत्स से भिड़कर उस पर अग्निकल्पन्याण 
चलाया, तो पनंस कालकल्प के रव पर कूद गया और पहले उसके अच्बों को कुचल दिया, 
फिर पदाघात से सारवी को गिराकर रथ को चूर-चूर कर दिया । उसके पद्चात्‌ उससे 


खुद्धकांड ३९७ 


उस राक्षस के जबड़े पर ऐसा घूसा मारा कि वह राक्षस छटपटाकर गिर पडा, उसके दाँत 
टूट गये और रक्त उगलतें हुए वह मर गया। सभी राक्षस आइचर्य-चकित हो गये । 


इसके पश्चात्‌ वषाश चामक राक्षस से कपियो पर आक्रमण किया और उनको 
जजरित करने लगा । तब गज ने उसपर ऐसी वाण-वृष्टि की कि सारा आकाश वाणोसे 
आच्छादित हो गया । किन्तु, वषाश ने उन सब वाणों को बीच में ही' काठ डाला और 
गज का वध करने के लिए अग्नि-सम सात बाण उस पर चलाये गौर इससे सतुप्ट न होकर 
फिर उस पर पच्चीस वाण चलाये और उसके पद्चात्‌ एक सौ ऐसे बाण चलाये, जो उसके 
शरीर को पार कर गये । उन बाणों से गज अत्यधिक पीडित हुआ और वपाश के रथ 
को चूर-चूर करते हुए उस पर आक्रमण किया और गरुड पक्षी जिस प्रकार किसी कमरे 
को नीचे गिरा देता है, वैसे ही उसका सिर घड से नीचे गिरा दिया । इस पर ऋनुद्ध 
होकर घृम्र तथा दुर्धर नामक राक्षसों में भयकर अस्त्रो के श्रयोग से वानरो को पीडित करते 
हुए उनके पैर उखाड दिये। तब क्रोधन तथा मेघपुष्प नामक वीर वानरो ने उनके रथो 
पर कृदकर अपने करतलो से उनके मस्तक पर प्रहार किया और युद्ध करके उन्हें मार डाला । 
उनको आहत देखकर सभी राक्षस भयभीत हो तुरत भाग खड़े हुए । 


इस प्रकार राक्षतों को भागतें हुए देखकर शतमाय अपनी' शक्ति का भ्रदर्शन 
करते हुए गज से भिड गया । तब गज ने एक लट्ठु लेकर उसका सामना किया । इतने में 
बडे वेग से ऋषभ, शतवली, पनस, गवाक्ष तथा अगद एक साथ उस पर वृक्षों तथा पवेतो 
की अविरत वृष्टि करने लगे, किन्तु शतमाय ने शर, तॉमर, भाले, चक्र, गदा, 
खद्ग आदि श्रेष्ठ शस्त्रो की वर्षा करके वीरो को क्रूर गति से त्रस्त कर दिया । उसके 
हाथो से यो पीडित होकर वानर-नायक रोषोद्वीप्त हो घतमाय पर पिल पडे । गवाक्ष ने 
उसके रथ के घोडो को मार डाला, अगद ने उसका भडा काट डाला, पनस ने उसके 
रथ को पैरो तले कुचल डाला, ऋषभ ने सारथी को मार डाला और नल ने उसके शस्त्रास्तो 
को काट डाला और शतबली' ने अपनी मुष्टियो से उस पर प्रहार किया । किन्तु, 
शतमाय ने उन मुष्टि के आघातो की उपेक्षा करके तलवार और ढाल लेकर गरुड के 
समान बडे लाघव से आकाश की ओर उछला । तब बडी तत्परता के साथ (युद्ध-भूमि में) 
पड़े हुए खटड़ग, ढाल आदि लेकर शतब्ली भी उसके पीछे आकाश की ओर उछला । 
आकाशझ्य में वे दोनो भेरड पक्षियों (दों सिरवाले पक्षी) के समान एक दूसरे वर वार 
करने लगे । वे कभी पैतरें बदलते, कभी निकट आते, फिर ज्ञीघ्र ही दूर हट जाते; कभी 
गिरते तो कभी उठते और एक दूसरे को गिराने की चेप्टा करते हुए लडने लगे । तब 
शतमाय ने अपने खड्य को चमकाकर शतवली के विज्ञाल वक्ष पर प्रहार किया, किन्तु 
शतवली ने अपनी दाल को भागे करके उस वार से अपने को बचा लिया और अपने 
तीदण कुपाणथ से शतमाय की जाँघो को काठ डाला, तो वह राक्षस सिर के बल पथ्वी पर 
गिर पड़ा भौर उसका सिर पवंत-शिखर को समान उिन्न-भिन्न होकर छितरा गया । 


दतमाय की मृत्यु को देखकर शतवली के साथ सभी वानरो ने हे का ग्रभीर 
तिनाद किया । 


३१८ रंगनाथ रएयायण 


तव महानाद ने अपने घनुप के टकार से पृथ्वी तथा आकाण को कँप्रेतें हुए अपना 
रथ अगद की ओर दौडाया और अगद पर तीन पैनें वाण चलाये । तब कंपिराज अगद 
बड़े क्रोव से उससे भिड़ गया और एक योजनाकार पर्वत को उसके रथ पर पोंका । किन्तु, 
उस राक्षस ने बडे वेग से अपनी गदा से उस पर्वत को दीच में ही चूर-चूर कर दिया । 
तब वालि-पुत्त छुद होकर सहज ही उसके स्थ-पर कद गया और अपनी अनुपम जवित से 
उसका बनूष तोड डाला, उसे रथ पर गिराकर उसके वक्ष को ऐसे दवाया कि उसकी 
बाँखें निकल जाई और वह हाँफने लगा । फिर, अग॒द ने उसके कठछ को मरोड्कर उसे 
काट डाला और रक़त-सिक्‍त मृड्ड को एउब्ची पर गिरा दिया । 

अपने अनज को मृत देखकर महाकाय अपार जोक से पीडित हो, भयंकर ध्वनि से 
हाहाकार करते हुए, अपनी काति-किरणो को चारों ओर विकीण करनेवाले अपने महान्‌ रब 
पर बैठे उद्धन सिंह के समान भूतने हुए निकला। उसने क्रूर वाण चलाते हुए वानरो पर आक्रमण 
क्रिया और कई वानरो को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसके समझे खद्ें रहने में असमर्थ हो 
वानर-सेना हनुमान की ओद में चली गई | तब नहाकाय मे अपने सारथी से कहा-- 
अव मेरे समक्ष खड़े होकर युद्ध करने की क्षमता रखनेवाला कोई नहीं है । तुम रथ को 
सीये राम के निकट ले चलो ।! तब उसने घोडो के रास ढीले किये और वेग से रथ 
को राम को ओर चलावा । रब की ऋूर गति के समक्ष खड़े होने में असमर्थ हो वानर- 
सेना भागने लगी । तव महाकाय ऊेचे स्वर में कहने लगा--हें वानरो, तुम क्यो भयभीत 
हो रहे हो ? मेरा च्रोध केवल उस राजकुमार पर है, जिसने शिव-बनुष का भग करके 
सीता के साथ विवाह किया है । जिसने परशुराम का गर्वे्भग किया है, वही मेरे जोड 
का है, अन्य कोई नहीं । जिसने युद्ध में खर का वध किया था, उसी पर मेरा वाण 
चलेगा, दूसरों पर नहीं । जिसने अपने वाण के अग्न भाग के समक्ष समुद्र को आने के 
लिए विवश किया था, केवल उसीसे में युद्ध कछेगा, दूसरों से नहीं । में त्रिभुवन को 
अपने थौर्य से दीप्त करनेवाले, कैलास पर्वेत को उठानेवाले रावण का पुत्र हैँ, इन्द्रजीत 
ऊा भाई हैं, मेरा नाम महाकाय हैं | में अब युद्ध करने के निमित्त जाया हैं ।' 


तब बजगद ने अत्यत कुछ होकर कहा--हे महाकाब, युद्ध-भूमि में ऐसा प्रलाप 
वयो कर रहें हो ? तुम्हारें पिता ने कैलास पर्वेत को उठाया था, इसलिए हम दोनो में 


का 


युद्ध होना उचित है | इसके लिए न राम की आवश्यकता है, न अन्य कपिल्वीरों की । 

तना कहकर उसने एक विद्याल वृक्ष से उनच्त पर प्रहार किया, तो महाकाय ने अपने दारुण 
बरो से अंगठ का घरीर ढक-सा दिया | इसके पश्चात्‌ महाकाय ने वड़ें षघ से अंगद पर 
अपनी गदा से प्रहार किया, तो अगद विवज्ष होकर गिर पछा । उसको भिरते हुए देंखकर 
समी दैत्यो ने समस्त पृथ्वी को विद्वीणें करते हुए सिहनाद किया और सभी वानर-वीरो ने 
एक साथ महाकाय पर आज्रमण किया और उस पर शिलाओ तथा वृक्षों को फेंकने लगे; 
केन्‍तु महाकाय ने अपने वायों से उन शिलाओं तथा वृक्षों को खटित कर दिया । फिर, 
उसने गवाक्ष पर दस वाण, पृथु पर पाँच बाण, महावली गज पर सौ वाण, शतवली पर तीस 
बाण, ऋपन पर अन्‍्दी बाण, भोघन बौर मेंघपुष्पक पर साठ वाण चलाकर उनका दर्पृ-दलन किया | 


झुच्ुकाड ड्श्दै 


इतने 'में मूच्छित अंगद ने आँखें खोली । अपने मुह से वहनेवाले रत को बार- 
बार पोछते हुए, एक विशाल, गदा लिये हुए वह उस महाकाय के रथ पर कूद पडा और 
अपनी उद्द॒ण्ड शक्ति को प्रकट करते हुए उसके सारथी को मार डाला । फिर, उसके धनुष 
के खड़-खड कर दिये, सभी अदवों को मार गिराया और उसके पह्चात्‌ - उस राक्षस-वीर 
पर गदा का ऐसा प्रहार किया कि महाकाय का मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगा । तब 
महाकाय भी रथ से नीचे उतरकर भयकर गदा से अगद पर प्रहार किया; किन्तु अगद ने 
प्रतिघात किया । महाकाय ने अगद का वार बचाकर उद्धत गति से अग॒द के सिर पर 
गदा-दड से प्रहार किया । उस प्रहार के कारण अगद के सिर से रक्त फूट निकला । 
किन्तु, अगद ने विना धैर्य सोये, अपनी गदा से महाकाय पर ऐसा प्रकार किया कि महाकाय 
का सिर फूट गया । तब भी' महाकाय ने भयकर आघात करके उसे खत की वाढ में 
ऐसा ड॒बोया, मानो उसने सोच लिया कि इसके पिता ने मेरे पिता को एक सह्स्न 
वार समुद्र में दुवोया था और उसका प्रतिद्योध मुझे लेता चाहिए । इस प्रकार, इन्द्र का 
पोता तथा महाकाय दोनो भयकर युद्ध करते हुए रक्त-सिक्‍त होकर ऐसे दीखने लगे, मानो 
रबत-वर्ण की नदियों से विलसित दो महापर्वत हो । दोनो की गदाओ के आपस में 
ठकराकर छिल्न-भिन्न होने से, वें दोनो वीर इस प्रकार मल्लयुद्ध करने लगे, जैसे पूर्वकाल में 
इन्द्र तथा बल नामक राक्षस ने आपस में द्ृह्युद्ध किया था । उनके पदाघात से घूलि 
उड-उडकर आकाश में व्याप्त हो गई। वे वालिनसुग्रीव के हृद-युद्ध का स्मरण दिलाते हुए 
परस्पर ऐसे भिड गये थे कि मालूम नहीं होता था कि यह वानर है, और यह राक्षस हैँ । 


से 
के 


तब सभी वानर अग्रद को उत्साह देते हुए कहने लगे--हे वीर, इस दुष्ट राक्षस 
की उपेक्षा क्यो करते हो ? तुम वालि के पुत्र हो । वालि के समान तुम्हारा वाहुवल भी 
श्रेष्ठ है । जब वानि ने द्वुदुभी से युद्ध किया था, तब उसने दुदुभी को इतनी देर तक 
ठहरने नहीं दिया था । तुम अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके इस देवताओं के छात्रु का 
सहार शीघ्र कर डालो । इस प्रकार, जब वानरो ने उत्साहवर्दधक जय-निनाद किया, तब 
अगद ने उस राक्षस पर अपनी मुष्टि से तीब्र प्रहार किया । वह उस आघात से चकराकर 
पृथ्वी पर गिर पड़ा । पृथ्वी पर गिरे हुए उस राक्षस के वक्ष को पैरो से दबाकर अगद ने 
उसका कठ मरोडकर सिर को घड से अलग कर दिया और उसे ऊपर उछालकर विजय- 
गर्जन किया । अगद को देखकर सभी वानरो ने विपुल ह्ष-नाद किया । यह देखकर सभी 
दानव तितर-बितर हो गये । कुछ समुद्र में कूद पडे, कुछ लका में घुस गये और शेष 
राक्षस चारो दिज्ञाओ में भाग गये । सभी वानरो ने अगद की प्रशसा की और उसे सीता- 
पति के समक्ष ले जाकर सारा वृत्तात उन्हें कह सुनाया । रघृपति यह समाचार सुनकर 
अत्यत प्रसन्न हुए ओर बडे हुं से हृदय से लगाकर और कृपा-यूर्ण दृष्टि से देखकर मंदहास 
करने लगे । 

हतशेष राक्षमो ने जब यह वृत्तात रावण को सुनाया, तब राक्षस-कुलाघीश ने बडी 
प्रीति से मृत महाकाय का स्मरण किया । वह दुख से, आँखों में आँसू भरे, सिर भुकाये 
खडा रहा और फिर सश्नमचित्त से अतपुर में चला गया । रात-भर चिता में निमग्न 


३२० रंग्ना/ंथ एंया/यण 


रहने से वह सो भी नहीं सका | प्रात काल होते ही वह अपने सामतों के साथ, अपने 
उज्ज्वल रथ पर वैठकर अत.पुर से निकला भर दुर्ग के स्तृूप पर चढकर अपने विज्ञाल 
दुर्ग को ध्यान से देखा । फिर, वहाँ के सैनिकों के शिविरों का निरीक्षण किया और दुर्ग 
की रक्षा के लिए और अधिक सैनिकों को नियुक्त किया | उसके पद्चात्‌ रावण ने पहस्त 
से कहा--यह प्रसिद्ध दुर्ग अभेद्य है । यह किसी भी पराक्रमी झत्रु के वश्ष में आनेवाला 
नही है । जाज वानर-समूह ने इसे भेद डाला है, यह देखकर मुझे आइचय हो रहा हैं। 
इतना ही नही, श्रीराम के बाहुबल का विक्रम दुर्वार प्रतीत हो रहा है । युद्ध करने योग्य 
या तो तुम हो, या में हूँ या मेरा भाई कुभकर्ण है । निद्रा में मग्न हो, मेरा भाई जाय 
नहीं रहा हूँ | इसलिए या तो तुम युद्ध करने के लिए जाओ या में जाऊँ । 

तब प्रहस्त ने राक्षसेश्वर से कहा--हे देव, में अभी जाता हूँ और उन नरो का 
ऐसा सहार करता हूँ कि देवता भी मेरे वाहुवबल की प्रणसा करेंगे । में अपने प्रताप का 
ऐसा प्रदर्शन करूँगा कि भूत, प्रेत तथा डाकिनी छककर रकक्‍त-पान करेंगे और मोद-मस्त 


चर 


होकर कह उठेंगे, 'लो देखो, प्रहस्त उन वन्दरों की कैसी दुर्यति कर रहा है । आपने 


मुझे युद्ध में जानें का आदेग दिया, तो ऐसे समय में, मेरा आपको हितोपदेश देना उचित 
तो नहीं है । फिर भी, एक वात सुन लीजिए। मेरा विचार है यह कार्य आपके लिए 


। 
उचित नहीं हैं | अब आप मानें या न मानें । आप स्वयं विचार करके देख लें | में 
आपकी आज्ञा का उललघन नही करता । पहले आपने अपने बुद्धिमान्‌ मंत्रियों के हित-वचन 


नही सुने | अब तो सुनिए मौर सीता को भूपाल के पास पहुँचा दीजिए। यह युद्ध 
अनावश्यक हैं ॥” 
६६. अ्रहस्त का युद्ध 

इतना कहने के पच्चात्‌ प्रहस्त रावण की आज्ञा लेकर युद्ध के लिए रवाना हुआ । 
उसने अपने वेत्रधरों को भेजकर अपनी चतुरग्िणी सेना को एकत्रित किया और मणिमय 
किकिणी के रणन से मुखरित होनेवाले ऐसे रथ पर सवार होकर चला, जिसका मेघ- 
समान घोष तवतक सुनाई पड़नेवाला था, जबतक वानरो के श्रेप्ठ अंगों के पवन उसका 
स्पर्ण नहीं करे, और जिसके ऊपर की सर्प-ध्वजा तवतक लहरानेवाली थी, जंबंतक 
वानर-झूपी गरुड उस पर उतर नहीं आवें । उसके निकलते समय तुरहियो की जो ध्वति हुई, 
उससे दिभाएँ चक्कर काटने लगी, आकाञ्म विचलित हो गया, नक्षत्र दूटकर गिरे और 
बसुबरा विदीण्ण-सी हो गई ॥ इस प्रकार, प्रहस्त पूर्व के द्वार से कालांतक के समान युद्ध 
करने के लिए निकला ॥ 

देत्यों के सिहनर्जनों के साथ निकलनेवाले प्रहस्त की उम्र मूर्त्ति को देखकर राम- 
चन्द्र आइचर्य करने लगे और उसे विभीषण को दिखाकर वोले,--'हे विभीषण, तेज, वल, 
तथा जशौये से विलसित होनेवाले इस राक्षस-्नेता का नाम क्‍या है ? विपुल साहस के 
साय उसका वानराो पर आक्रमण करना देखकर मुझे आइचर्य होता है ।' 

तब विभीषण ने क्हा--हे देव, यह रावण की समस्त सेना का सेनापति हैं । 
इसकी अपनी सेना रावण की सेना की तीन चौथाई है । अपने साहस के लिए तीनो 


युद्धकंड १२ 


... 


लौकों में यह प्रख्यात है । यह अत्यधिक बलवान्‌ हैँ तथा रावण का मामा लगता हूँ । 
यह महान्‌ पराक्रमी है और इसका नाम प्रहस्त है । (रावण के द्वारा) चन्द्रशेखर के मित्र 
(कुबेर) के सामत को पराजित होते समय इसने मणिभद्र को परास्त किया था । हैं रवि- 
कुलोत्तम, इसके साथ वानर-तायको को धोर युद्ध करना होगा ।* 

इस प्रकार विभीषण के कहते समय ही वानर-वीर पर्वतो तथा वृक्षों को उठाये 
सिहनाद करते हुए दानवों का सामना करने लगे । असुर-सेना ने भी भयकर गर्जन करते 
हुए वानरों पर आक्रमण किया । प्रलव-काल की अग्नि तथा वडवानल आपस में कभी 
सघर्ष नहीं करते, पृथ्वी और आकाश का एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होना समव 
नहीं, भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्यो का आपस में टकराना सभव नहीं । यदि ऐसा कभी' हुआ 
होता, तो इन राक्षस तथा वानर-सेनाओ के युद्ध की उपमा उनसे दी जा सकती थी | 
राक्षस अग्नि-तसम बाण-समूह को वानरों पर चलाते थे । कुछ राक्षस खड्ग, गदा, भाले, 
मूसल तथा भयकर चक्र आदि छास्त्रों को भी चलाते थे। तब वानरूसेना राक्षसो 
पर वडे वेग से वृक्षों तथा पर्वतों को फेंकती थी । इस घोर युद्ध में पृथ्वी पर लुढ़कने- 
वालें सिर, विदीर्ण होनेवाले वक्ष, चूर-चूर होनेवाले कधे, बाहर निकल पडनेवाली' आँें, 
फूटनेवाले सिर, टूठनेवाली पसलियाँ, उमडनेवाला रक्त, छितरानेवाला भेजा, छिन्न-भिन्न 
होनेवाले पैर, उछलकर गिरनेवाले हाथ, पिंडाकंति धारण कर सडनेवाले शव, आधा 
कटकर गिरे हुए शरीर, घूम जानेवाली पुतलियाँ, ये सव अत्यत भयकर दीखने लगे । 
युद्ध-मूमि में राक्ष और वानर निर्भय होकर बडे उत्साह से लडते थे । सहसा कपि- 
वीरो ने राक्षतों पर बडा भयकर धावा बोल दिया । द्विविद ने नरातक पर एक पवंत- 
शिखर उठाकर फेंका । तार ने एक वट-वृक्ष को वेग से चलाकर कुभ हनु को गिरा दिया। 
जाबवान्‌ ने महानद पर एक विज्ञाल पव॑त को गिरा दिया । दुर्मुख ने समुन्नत को एक 
विद्ञाल वृक्ष से मार गिराया । 


इस प्रकार, राक्षसों को वानरो के प्रह्मरों से बुरी तरह मरते हुए देखकर प्रहस्त ने 
अपने प्रमुख साथियों की' मृत्यु निश्चित जान और अत्यत कुद्ध होकर अपने रथ को विचित्र 
देग से चलाकर एक-एक प्रहार से एक साथ दस, वीस, त्तीस तथा चालीस वानरो का सहार 
किया । तब वानर भी पर्वतो तथा वृक्षों को गिराकर प्रहस्त की सेना का नाश करने लगे। 
रक्‍त की नदियाँ उमड-उडकर आकाश का स्पर्श करती हुई-सी' बहने लगी, रक्त की उस 
घारा में ही जहाँ-तहाँ वानर तथा असुर घोर गर्जन करते हुए युद्ध करतें थे । उनके 
पराक्रम को देखकर देवता भी उनकी प्रशसा करते लगे । 

तब प्रहस्त कालातक के समान अपने अद्वितीय प्रताप का प्रदर्शन करते हुए वानरो 
के करो तथा चरणों को काठते हुए, उनके वक्ष स्थलों को विदीर्ण करते हुए, सिर तथा 
वाहुओ को पृथ्वी पर गिराते हुए, हड्डियो तथा दाँतो को चूर-चूर करते हुए, चक्रो से खड- 
खड करके, अकुशो से चीरकर, भालो से चुभोकर, विशाल पाशों से बाँधकर, परशु से 
काठकर, शूलो को भोककर वरछियों से उछालकर तथा शक्तियों से पीढकर वानरो के मास 


तथा भेजा के ढेर-सा लगा दिया और अपनी शरथ्वृष्टि से वानरों को मारकर सभी भूतों 
है. 


श्र रंगनार्थ रएयी/यएी 


] 


को वलि चढाई । इस प्रकार, प्रहस्त ने अपने दुर्वार विक्रम से वानरों का सहार करने में 
सफल होकर सभी दिशाओं को विदीर्ण करते हुए भयकर गजन किया । 
ए७, नील के द्वारा प्रहस्त का वध 

वानर-सेना को इस प्रकार नप्ट होते हुए देखकर, उद्मट-रण-कुशल नील भयंकर 
हुकार करते हुए प्रहस्त पर आक्रमण करने के लिए ऐसी अद्भुत गति से चला कि सारी 
पृथ्वी काँप गई । उसने एक विद्ञाल वृक्ष को उखाड लिया और सहज ही उस राक्षस 
के रथ पर जा चंढा । उसने सारथी को मार डाला, अब्वो का नाश कर दिया, और 
देखते-देखते प्रहस्त के घनुष को खडित कर दिया । तब भयंकर गर्जन करते हुए प्रहस्त एक 
मूसल लेकर रथ से उत्तर पड़ा जौर नील के सामने डट गया । नील ने निर्मीक होकर 
उसका सामना किया, मानो वह अपनी विजय में पूरा विश्वास रखता हो । फिर, दोनो 
युद्ध करते हुए एक दूसरे को परास्त करने का भ्रयत्त करने लगे, जैसे वृत्रासुर तथा कौशिक ने 
(पहले) किया था । प्रहस्त ने अच्छी तरह लक्ष्य करके मूसल से नील के ललाट पर 
ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि उसका ललाट फूट गया । उससे छूठनेवाली रत-धारा 
को पोछते हुए नील ने अत्वविक ज्रोंव से उस प्रहस्त पर वृलक्षो से प्रवल प्रहार किया + 
किन्तु, उस राक्षस ने फिर से उसी मूसल से नील पर प्रहार किया । इस आघात से नील 

लडखडाने लगा, फिर भी उसने वृक्ष को छोड़कर उसी समय भयकर गर्जन करके एक 

विद्वाल पहाड़ उठाकर लक्ष्य करकें उस राक्षस के सिर पर फेंका । नील के उस प्रह्मर से 
प्रहस्त का घबरीर, सिर तथा आभूषण छिल्न-भिन्न हो गये और इन्द्र के प्रहार से सिकुडकर 
मिरनेवालें पर्वत के समान वह राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसके गिरतें ही सभी कपियों ने 
विजव-घोप किया और राक्षस-सेना लका की ओर भागने लगी । 

उस समय सारी युद्ध-भूमि, अमृत-सागर-सुता (लक्ष्मी) के समान हरि* (विष्णु अथवा अइव) 
श्रुत अगो से, दानशील को निवास के समान मार्गगो * (पातक अथवा बाण) के 
समृह से, जवृद्वीप के समान नवखडो * (हीप अथवा खड) से, प्रेमी पति के निकट बनिता 
की भाँति राग-स्स* (प्रेम रस अथवा रक्त) से, दुर्गेग वत के सदुश पुडरीको* (व्याप्न अथवा 
गज) से, सुदर मधु-मास की भाँति बारत, हुलल, पलाशो* (पलाश वृक्ष अथवा राक्षस) से, 
शिव के निवास की नाई भूतनाण *(श्षिव के सेवक अथवा प्रेत) से, सूर्य-प्रकाश से विलसित 
गगन के समान अस्त-व्यस्त तारको* (नक्षत्र अथवा आँख के तारे) सें, तीन्र निदाध के समान 
बवचर-मणियों * (सूर्य अथवा वस्त्रामरण) से, अर्दधं-नारीश्वर के समान अद्धं-शरीरो से युक्त 
हो, अनेक प्रकार से आइचर्य उत्पन्न करती थी ॥ 

तव नील शञ्यीघ्र ही राघवाबीश के समक्ष गया और उनके चरणों को प्रणाम किया। 
वानरी ने वास्वार नील की प्रशसा की । हतशेपष राक्षस भयभीत हो भागकर रावण के 
निकट पहुंचे और उसे सादा वृत्तांत कह सुनाया । तव रावण ने शोक-विह्लल हो अपने 
मत्रियों से कहा--युद्ध करने गये हुए सभी वीर लौठने का नाम तक नहीं ले रहें हे और 
वानरो के हाथो मर रहे हँ। अब वेरियो का गर्व चुर करने के लिए में स्वय ही जाऊँगा। 


डे 


“दस प्रसंग में हरि, मार्गण, नवखंड आदि शब्दों में इलप है ।--ले० 


खुद्धकांड इ्र्३्‌ 
ः प्र भंदोदरी के हितन्वचन . 


रावण की सभी वातें सुनकर, मदोदरी शीघ्र माल्यवान्‌ के पीछे, दैत्य-स्त्रियों के 

साथ रावण की सभा की ओर चलो। उसके पीछेनीछे अतिकाय तथा प्रतीहारी चलने लगे । 
आयुधो से अलकृत अन्य सैंनिक भी उतका अनुसरण कंरने लगे । चामरिक-समूह 
चामर डुला रहे थे और सभी मत्री भी उसके साथ चल रहे थे । अपने समस्त आभूषणों 
की शोभा को चारो ओर विकीर्ण करती हुई उसने रावण की सभा में ऐसे प्रवेश किया, 
मानो नील-मेघो के मध्य विलसित होनेवाली बिजली हो । 

> रावण ने मदोदरी को अपने सिंहासन के अर्दू भाग पर आसीन कराया और प्रिय 
वचन कहते हुए वुद्धिमान्‌ मत्रियों को उचित आसनो पर बिठाया  ।प्रणाम करनेवाले 
अतिकाय को प्रसन्नता से अपने निकट ही एक आसन पर बिठाया ? उसके पश्चात्‌ दानवेश्वर ने 
अपनी स्त्री से कहा--हे कुबलयनेत्री, तुम तो इस प्रकार कभी सभा में नही 
आती । आज तुमको कपित शरीर से इस प्रकार सभा में आते देखकर मुझे आश्चर्य 
हो रहा है! तुम्हारे आगमन का क्‍या कारण है ”' 

तव मदोदरी ने अपने पत्ति को देखकर कहा--हे दनुजेश, आज मुझे यहाँ आने 

की आवश्यकता पडी, इसलिए में आई हूँ । आप मेरे आगमन को बुरा न मानिए 
है देव, आपने देखा कि धूम्राक्ष आदि हमारे सेनापति युद्ध में कैसे मारे गये ? राम ने जन्म-स्थानः 
में चोदह सहस्त राक्षों का सहार किया था और खर तथा भिशिर का वध किया था । 
में कहती हूँ कि ऐसा वीर एक साधारण मनुष्य नहीं हो सकता । इतना ,ही नही, राम ने 
दणग्डक-बत में सहान्‌ बलशालो' कबब का सहार किया । मारीच की मायामो की उपेक्षा 
करके उन्होनें उसका वध किया । एक भयकर अस्त्र से वालि का सहार किया | राघव, ने 
देवताओं के हित के लिए इस ससार में जन्म लिया है । वे स्वयं आदिनारायण हे अन्यथा 
इस पृथ्वी पर ऐसा पराक्रमी' नर कहाँ मिलेगा ? उन्होने ही तो नीलकठ के घनुष को भग 
किया था ? अपने पिता की' आज्ञा से जिस समय “वें “वन में तपस्वी का जीवन व्यत्तीत 
करते थे, उसी समय आप सीता को हर लाये । रामचन् ने "आपका क्या अहित किया था। 
राम-लक्ष्मण से युद्ध करने की क्षमता तीनो लोको में- कोन रखता है ? यदि साम, दान 
तथा भेद से शत्रु वश में आ जाय, तो दण्ड का उपाय अपनाना उचित नहीं । यदि आप 
दण्ड देवा भी चाहें, तो कया राम-लक्ष्मण आपसे दण्ड भोगेंगे ” हे देव, राम परमात्मा हे, 
अत आप उनके समक्ष नतमस्तक हो, तो इसमें कोई दोष नहीं | यदि आप उनसे शरण 
माँगें, तो वे आपको अवश्य अपनायेंगे । शरण माँगने से आपका शुभ ही होगा, हानि नहीं । 
काकृत्स्थवक्षी राम के ग्रुण, रूप, कृपा आदि गृणगण का वर्णन करना कैसे सभव है? 
यदि वे क्रोध में आ जायें, तो इन्द्रादि देवता भी ठहर नहीं सकते, तब आपके लिए (उनका 
सामना करना) कैसे सभव है ? अब आप इस प्रयत्न को छोड़ दीजिए । व्यर्थ ही दर्प, की. 
अग्नि में नाश भत होइए। हठ छोडिए और सताप त्यागकर सीता को लौठा दीजिए ॥: 
इसी में आपका हित होगा । हें लकेश, आप अपने कुल तथा लका की रक्षा कीजिए॥ 
ऊँचे बाहनो तथा मणि-भूषणो के साथ आप जानकी को लौटा दीजिए और उपाक्ष, अतिकाय- 


+ 
घ 


३२8 रैंगनायथ रयायण 


ठतवा माल्यवान्‌ के द्वारा संधि का प्रस्ताव मेजिए। वहुत क्यो ? क्‍या, आपने कात्तेंवीर्य के 
साथ संधि नहीं की थी ? ठतव उस कात्तंवीर्य को जीतनेगले भागव राम को परास्त करने- 
वाले वद्यस्वी राम क्या संधि करने के योग्व नहीं हैं ।” 
४९, संदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना 

मंदोदरी के इन दीन वचनों को सुनकर रावण छोव से दीर्व इवास लेने लगा । 
उनकी लाल आँखों से क्रोबवाग्ति की चिनगारियाँ छूटने लगी। उसने मदोदरी को देखकर 
कहा--हे नारी, हितनबुद्धि से तुमने मुझे उपदेश दिया हैं; किन्तु तुम्हारी बातों में एक 
भी मुझे अच्छी नहीं लगती । दानव, यक्ष, ग्रवर्व देव जादि की सेवाएँ प्राप्त करने- 
वालें मुझे तुम वानरो के आम्नय में जीनेवाले नर को प्रणाम करने का उपदेश देती हो । 
ऐसी वात तुम इस सभा में कैसे कह सकी ? क्‍या, तुम्हारे लिए यह उचित है ? उस 
इक्ष्वाकुवंधी ने जान-वूककर पहले हमारा जह्तति किया था; तभी तो में उसकी स्थत्री को 
ले वाया । सरन्दूपण बादि के सहार तथा तुम्हारी ननद के अपमान को भुलाकर मूर्ख के 
समान में कं॑से राम से सधि कर लूं ? यह असभव हैं । अपने भयंकर वाणों से विभीषण, 
सुग्रीव तथा राम-लक्ष्मण के साथ सभी वानरो को मारकर में विजय पाऊँगा | यदि विजय नही 
प्राप्त करूँगा, तो युद्ध-मूमि में ही अपने प्राण दें दूंगा; किन्तु उत्त राम के साथ न संधि करूँगा, 
ने जानकी को ही लोटाऊँगा । यही मेरा दृढ निष्चय हैँ | तुम्हारे ज्येप्ठ पुत्र, उदात्त 
पराक्रमी, इन्द्रजीत के रहते तुम्हें किस वात का भय है ? मेरे पुत्र भयंकर जआाकाराले 
तथा दुर्वार पराक्रमी है; मेरा सामना कौन कर सकता हैं ?! 

इन बातों को सुनकर मंदोदरी चिंताक्षात मन से सिर भझुकाकर सभा से ऐसे चली गई, 
मानों रावण की लक्ष्मी ही यो सोचती हुई रावण से अलग हो रही हो कि यह नीच 
तथा निक्षप्द नीति का अनुसरण करते हुए अपना बुरा-|भला जाप ही नहीं पहचान पा रहा हैं। 


<द०, रावण का प्रथम युद्ध 

तब दावण ने बपने गृप्तचरों से कहा--चिर काल से मेरे मन में जो क्रोध था, 
उसका आज परिहार करूंगा । में उस (दाम) के लिए कालरुद्र हेँ और वह मेरे लिए 
बघकासुर है । मेरे तूणीरों से निकलनेवाले अस्त्र, केंचुली से मुक्त होनेवाले कूर सर्पों के 
समान राघव को लगेंगे । राम मृत्यु से प्रेरित होकर, कपि-सेना का विश्वास करके यहाँ 
गाया है| तुम शीघ्र मेरे युद्ध करने के लिए दिव्य चस्वरास्त्रों से सज्जित करके रथ ले 
आाओ ॥ 

उसके आदेशानुसार वें गुप्तचर सूर्य-प्रभ के समान दीप्तिमान्‌ श्रेप्ठ रव ले आबे। फिर, 
अपने नीच मनोर्व पर आखझूढह़ होने की भाँति रावण उस स्व पर आइडूढ हुआ । अपने 
दीप्लिमान्‌ बानूपणों से अलकृत रावण के उस रथ पर बेठते ही, उसके आमूषणो की प्रभा 
दिधातं तथा जाकाश्न में आध्चर्यजनक ढंग से व्याप्त हो गई, मानों बुद्ध में राम के वायों 
की अन्नि-ज्वालाओं में रब-समेत स्वयं रावण दग्ब हों रहा हो ॥ निसानों का विपुल निनाद, 
पटह, भेरी तथा झख का भयकर घोष, हाथियों की चिघाड, »ब्वों को हिनहिनाहठ, बन्दी 


खुछ्धकोड ३२६ 


मागधो के स्तुति-गान की गरभीर ध्वनि, रथों के चलने की ध्वनि, सैनिकों के हुकार, तथा 
पृथ्वी को विदीर्ण करनेवाले उनके पदाब्रात की सम्मिलित ध्वनि भयंकर गति से समस्त 
ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो लका के समुद्र के सभी जलचर एक साथ आर्त्त-ध्वनि कर 
रहे हो कि रामचद्र जैसे पहले समुद्र पर ऋुद्ध हुए थे, वैसे ही वे आज ऋकुद्ध हो गये हैं । 
(राक्षसों के) वृहदाकार रथ, रामचद्र के मनोर्थो के समान ऐसे चलने लगे, मानो कह 
रहे हो कि हे राम, हम दैत्य-समूह को ले आये हे, आप इन्हें ग्रहण कीजिए । असख्य 
गज-समूह पृथ्वी को केपाते हुए चलने लगे । उनके कर (सूंड) रामचद्र के करो (हाथ) 
के लिए दुर्जय न होने पर भी भयकर दीख रहे थे और उन सूडो के चारो ओर शिली- 
मुख (भ्रमर) ऐसे फकार कर रहे थे, मानो कह रहे हो कि इनमें रामचन्द्र के शिलीमुख 
(बाण) -समूहू लगकर इनका (गजों का) मद गिराने के पहले हम अब इनकी मद-धाराओ 
का पान कर लें । घोड़े ऐसे भूपते हुए चल रहे थे, मानो कह रहे हो कि सारे उपाय 
तष्ट हो गये हे, हमारे द्वारा रावण को युद्ध में विजय कहाँ मिलेगी, रावण तो अवश्य ही 
युद्ध में गिरेगा । प्यादों की सेना ऐसे हुकार भरती हुई जा रही थी, मानो आत्तें-ध्वनि कर 
रही' हो कि राघव की आसच्न वाणारिति से सम्रमित सेना का सारा बल दग्ध हो जायगा । 
प्रलय-काल के घने बादलो के समान तथा पहाडो का भ्रम उत्पन्न करनेवाले राक्षस, प्रलय- 
काल के सूर्यविब के सदृश दीखनेवाली उभरी' हुई आँखों से तथा विशाल कनपटियो, घोर 
दष्ट्रो एवं विपुल केश-समूह से युक्त होकर, प्रलयातक को भी भय देनेवाले विक्वत बेष, 
विविध आयुध तथा विभिन्न मायाओ से सज्जित थे । राक्षस-वीर तथा राक्षस-नेताओ ने 
राक्षसेश्वर के समक्ष, अपना शौय॑ प्रकट करते हुए प्रतिज्ञा की कि युद्ध में हम ही राम को 
जीतेंगे । फेर, वे घोर गजेन करते हुए, पटहो का विपुल निनाद करते हुए 
युद्ध के लिए चल पडे । रावण भी अपने प्रताप से सूर्य को भी निस्तेज करते हुएं, अपने 
साहस को अपने सुख की दीप्ति के द्वारा प्रकट करते हुए, शौर्य तथा विजय-लक्ष्मी से 
युक्त हो, भयकर ध्वनि एवं ठाठ-बाट के साथ, युद्ध के लिए निकल पडा, मानों सूर्यवशज 
को मार्ग देने के कारण समुद्र पर क्रुद्व होकर उप्ते सुखा डालने को लिए ही जा रहा हो 
अथवा यह कहते हुए सूर्य को निगलने के लिए जा रहा हो कि हे सूर्य, तुम्हारा पुत्र राम 

से मिल गया है । राक्षस-मेता के असख्य आयुधों की काति आँखों को चका्चांध करती थी 

और नगाडो के ताडन से उत्पन्न वायु से ध्वजा-पताकाएँ आकाश में फडफडा रही थी । 

अत्यत भयकर रूप से बार-बार गर्जन करते हुए, राम की वाणाग्नि में दग्व हो जानेवाले 

प्राणो को तृणवत्‌ मानते हुए, दुर्वार गति से आनेवाली दारुण राक्षस-सेना को देखकर रघुराम ने 

अपने अनुज से कहा--हे लक्ष्मण, पता नहीं कि यह कौन आ रहा है ? यह अत्यधिक 

शक्ति-सपन्न तथा महान्‌ साहसी दीखता है ।' 


६१, विमीषण का राम को राक्षप्त-वीरों का परिचय देना 


तव विभीषण ने राम से कहा--हे रघुराम, में इन दनुज-नायको का अलग-अलग 
परिचय आपको सुनाता हूं, सुनिए ।” फिर, वह इस प्रकार कहने लगा--वह जो मदमत्त 
हाथी पर चढ़कर, उज्ज्वल दीप्ति से द्वीप्त हो रहा है, जिसके उदयाकंबिंव के समान 


डर एंगनायथ एगयायण 


समुज्ज्वल मुँह पर अत्यधिक रोष दिखाई पड रहा है, वार-वार अपने अकुश की प्रेरणा से 
हाथी की चाल को तीत्र करने का पयत्व करते हुए बडे वेग से आ रहा है, वही उपाक्ष है। 
भीषण घटा-रव करनेवाले रथ पर चढकर आनेवाला, महोदर है। उसने युद्ध में बहुत-से 
लोगो का सहार किया था । रत्न-प्रभा-सपतन्न अरुण कवच घारण किये, अहव पर आखूढ 
जो उद्धत होकर गरड के समान वेग से आ रहा है, वह पिझाचों का नायक हैं १ युद्ध 
में इसका सामना करनेवाला कोई नहीं है। सिंह पर चढ़कर शूल हाथ में लिये जो 
आ रहा है, वह युद्ध-प्रिय त्रिशिर है । विपुल घटारव करनेवाले तथा सर्प-ध्वजा से युक्त रथ 
पर बवेठकर घनुष का टकार करनेवाला, काले चरीर का वह राक्षस, कुभ है। स्वर्ण- 
मणि-खचित ध्वजा से युक्त इस चित्ररथ पर वेठकर आनेवाला, वह विशालबाहु राक्षस, 
निकुभ कहलाता है । अग्निसम उज्ज्वल रथ पर आरूढ हो, बडे दर्प के साथ युद्ध करने 
की तोन् लालपा से विष-दुष्टियो से कपि-सेता की ओर देखते हुए, धनुष पर बाण चढाते 
हुए आनेवाला नरातक नामक राक्षस है । जैसे भूत-गण कालनेत्र की (शिवजी) सेवा 
में रहते हे, वैसे ही गज-मुख, अइ्व-मुख, सिंह-मुख, व्याश्र-मुख, सर्प-मुख तथा उपच्ट्र-मुख- 
वाले भयकर राक्षस जिसकी सेवा में लगे हुए हे, और जो भयकर गर्जन कर रहा है, वह 
उभरी हुई आँखोवाला राक्षस देवातक हैं । हे देव, वहाँ जो स्वर्ण-रथ पर आएरूढ है, जो 
एक चिशाल घनुष को एक तृण के सदृश सँभाले हुए भयकर टकार कर रहा है, जो कभी 
पराजव का नाम तक नहीं जानता, जो वरभोज का पृत्र है, जो अपने शरीर पर अरुण 
चदन का लेप किये हुए है, जो तीक्ष्ण तथा कुद्ध दृष्टियो से युक्त है, जिसका थरीर 'सांध्य- 
मेघो के समान है, जो विध्याचल के सदुश विशालकाय है, और जो करोडो छत्र-चामरों 
से विलसित है, वही युद्ध का श्रेष्ठ शूर, अतिकाय है । वहाँ जो दस सहख्र ब्वेत छत्नो“तथा 
स्वर्ण-चामरों से विलसित है, जो सिंह-घ्वज से युक्त तथा वलिष्ठ अच्ब जुते हुए रथ परे 
आरूढ हो, विपुल हास्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो, घनुष का ठकार करते हुए, हम पर दृष्टि 
गडाये आ रहा है, वह इच्धजीत है । उसने ब्रह्मा के वर से ज़्पार बाहुबल प्राप्त करके 
अखिल देवताओ को युद्ध में जीत लिया था और इन्द्र को वदी बनाकर बडे गे से भूम- 
रहा है । हे सूर्वकुलतिलक, अब में उप्त प्रताप्री लकानाथ को दिखाऊँगा, जो कनक-रत्व-प्रभा- 
कलित दण्डो से युक्त चामरो से विलसित है, जिसके सिरो पर शोभायमान होनेवाले विचित्र 
रतनो की आभा से दीप्त दस किरीट ऐसे दीख रहें हे, मानो (वे किरीट) बारहो सुर्ये- 
विंधों को गलाकर बनाये गये हो, जिसके कर्णों को अलकृत करनेवाले महनीय मणिकुडलों 
की प्रभा सभी दिश्ञाओ्रो में व्याप्त हो रही है, जो अपनी कोघधपूर्ण दृष्टियो से बहुत भयकर 
दीख रहा है, जिसने हर के निवास-स्थान कैलास पर्वत को उठाया था और देवागनाओ को वदी 
बनाया था, जिसके वक्ष स्थल ने ऐरावत के दाँतो के प्रहारों को सहन किया था, जिसने 
समस्त लोकों पर विजय प्राप्त की थी और जिसने इन्द्र को भी युद्ध में परास्त किया था, 
वही रावण वहाँ सेना के मंब्य में भूमता हुआ था रहा है ॥” जि 


विभीषण के इस प्रकार सभी वीरो का परिचय देने के पश्चात्‌, राघव ने आदि्र्य 
प्रकट करते हुए कहा-हैं विश्नीषण, यह बडी विचित्र वात है. कि यह दातवेश्र ऐसे मंहान्‌ 


इुद्धकांड 4२७४ 


तेज तथा सुदर आकार से विलसित है । भला, राक्षसो में ऐसा तेजस्वी कौन हैँ ? यदि 
यह क्रकर्मी नहीं होता, तो वह समस्त ससार के लिए पूज्य होता । इसके सभी' राक्षस- 
वीर सैनिक, पर्वताकारवाले, अपार शवितशाली, योद्धा, कुर-चरित्र तथा भयकर हे। इसके 
पदचात्‌ उम्रलोचन (शिव) के पिनाक को वहा में लाने में निपुण राम तथा लक्ष्मण ने 
धनुष तथा वाण धारण किये मानो (ससार को) बता रहे हो कि कुंद्ध होने पर भी धर्म- 
मार्ग का ही अनुसरण करनेवाले इन राजकुमारों की समता कौन कर सकता है !' 

तब रावण ने अपने सभी' राक्षस-वीरो को देखकर कहा--नगर के द्वारो पर तथा 
वडे-बड़े आँगनो में असख्य सैनिक लका के रक्षणार्थ रहें ॥ जब हम और तुम युद्ध के लिए 
चले जायेंगे, उस समय यदि वानर लका में प्रवेश करें, तो हमारी शवित किस काम की' 
होंगी ? इसलिए इसका ध्यान रहे।' तब असख्य राक्षस इस रक्षण-कार्य के लिए चले गये। 
इसके परचात्‌ू रावण ने धनुष तथा बाण घारण किये हुए बड़े वेग से वानरो की 
सेना पर ऐसे आक्रमण किया, जैसे दावाग्नि वनो को घेर लेती हो और पृथ्वी आकाश से 

भिड जाती हो । उसने अत्यत तीक्षणष बाणों की ऐसी' तीत्र वर्षा की कि यह विदित नही 

होता था कि यह जाकाश हैं, यह पृथ्वी है और ये दिख्याएँ है । अपने उदृण्ड बल को 
प्रकट करते हुए उस राक्षस ने मुड-के-कुड वानरो को सहज ही खडित करके चूर-चूर 
कर दिया, अस्थि, मज्जा, मास तथा रक्त से सारी युद्ध-भूमि को भर दिया और अपने धनुष 
के टकारो से दिज्ञाओ को प्रतिध्वनित करने लगा। गिरनेवाले, भ्रमित होनेवाले, मरनेवाले, 
चकरानेवाले, भयभीत होनेवाले, आत्तंनाद करनेवाले तथा विक्ताय होनेवाले वानरो से रण- 
भूमि को पूर्ण देखकर देवता सभ्रमित तथा व्याकुल हो गये । 

उस' समय क्रूर कालानल की दुर्वार लीला के समान भयकर दश्यानन को अत्यत 
भयानक रूप धारण करके गरजते हुए देखकर सुग्रीव ने उसका सामना किया और एक 
पर्वत उठाकर उस पर फेंका, किन्तु रावण ने उसे बीच में ही अपने विपुल अस्त्रो से 
चूर-चूर कर दिया और अपनी दीप्ति-ज्वालाओ को आकाश में फैलाते हुए, जलनेवाले एक 
ती4ण हर को सु्रीव के वक्ष पर चलाया, तो वह शर उसके शरीर के आर-पार निकल- 
कर पृथ्वी में गड गया । तुरत सुग्रीव लडखडाते हुए पृथ्वी पर गिर पडा । यह देखकर 
दानव हर्षध्वनि करने लगे और वानर अभश्रु-धाराएँ बहाने लगे । इस पर महान्‌ बाहुबली 
ऋषभ, सुदष्ट्र, गज, गवाक्ष, गवय, नल तथा ज्योतिर्मुख नामक वानरो ने क्रोधोन्मत्त होकर 
रावण पर पव॑तो तथा वृक्षों से अविरत प्रहार किया । किन्तु, रावण ने उत सब को 
वीच में ही खडित कर दिया और उन सातो वानरों को एक ही बाण से मृत-सा 
कर दिया । 

६२, हनुमान का रावण से युद्ध करके मृच्छित होना 

अपनी सेना के नायको को इस प्रकार गिरते देखकर हनुमान्‌ अत्यधिक ऋुद्ध हुआ 
और बड़े दर्ष से रावण को रथ पर कूदकर उससे कहने लगा--हे रावण, कदाचित्‌ तुम 
गये से फूलते रहे हो कि मेने देवेन्द्र आदि देवताओं तथा राक्षसों पर विजय प्राप्त की' है, 
किन्तु मेरे सामने तुम्हारी दाल नहीं गल सकती, में तुम्हारा तेल निकाल दूँगा । चिरकाल 


इेर८ एगनाय रायायर 


से इस पृथ्वी पर उन्नत दणा में जीवित रहनेवाले तुम पर प्रहार करने के लिए मेरी 
दक्षिण वाहु अपने-आप आगे बढ़ रही हैं । अभी मे तुम्हारा वध करके तुम्हें यमपुर भेज 
दूगा । इसे तिह्वय जानो ।' 

हनुमान के ये वचन सुनकर रावण का मुख क्रोध से विकृत हो उठा | उसने कहा- 
वदि तुममें शक्ति तथा सामर्थ्य हो, तुम अपनी समस्त शक्ति लगाकर मुझे एक घूसा 
मारो । उसके पद्चात्‌ तुम्हारे जौर्य तवा बवित को देखकर में भी घूसा भारूँगा ।! तब 
हंनुमान्‌ ने जपना बद्भूत ज्ञोर्य दिखाते हुए दशकठ से कहा--दिवाधिदेव, राम के भेजने 
पर तुम्हारे नगर में बाकर मेने सीता का अन्वेषण किया और जंत में सीता को देखकर 
उनसे रामचद्रजी का संदेश सुतावा और लौठते समय अपना पराक्रम दिखाकर तुम्हारे वन 
का सर्वृताण किया, तुम्हारी लका को जलाकर नुम्हारे पुत्र का वध क्या ओर दैत्यो के 
सश्रमित होकर देखते-देखते में लौट पड़ा । भाज तुम दर से फूलकर मेरी शवित देखने की 
वात कह रहे हो । हे रावण, उस दित तुम कहाँ छिप गये थे ?' 

इस पर कुद्ध होकर असुरेब्वर ने हनुमान्‌ के वक्ष पर अपनी मुप्टि से प्रहार किया। 
हनुमान्‌ इस प्रहार से सिकुड़-सा गया; किन्तु फिर भी उसने अपनी समस्त झक्ति से रावण 
पर एक घूसा चलाया | मंकावात से कपित होनेवाले विश्ञाल वृक्ष की भाँति, रावण काँप 
गया । पीड़ित होनेवाले अमुरेब्वर को देखकर इन्द्र जादि देवता हर्षित हुए; पर जल्प- 
काल में ही रावण सेमल गया और हनुमान्‌ को देखकर कहने लगा--तुम्हारी शक्ति 
प्रशसतीय है । तुम्हारी मुप्दि के प्रभाव से में प्रेत-लोक का दर्शन कर आया ।” हनुमान्‌ ने 
कहा--हि रावण, तुम अभी जीवित हो, फिर भी तुम मेरी प्रशसा क्यो करते हो ? 
(तुम्हारी बातें सुनकर) मुझे लज्जा हो रही है । तुम्हें तो मुझ पर प्रहार करना चाहिए।* 
तिव लो, यह घूसा' कहते हुए रावण अपनी वज़-सम मृप्टि से हनुमानु के वक्ष पर घोर 

प्रहार किया । तुरंत हनुमान्‌ मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा । 


६३, नील का रावण से युद्ध करना 


हनुमान्‌ के गिर जानें के पदचात्‌ रावण नील से भिड़ गया। इतने में हनुमान्‌ सचेत 
हुआ और रावण को नील पर आक्रमण करते देखा; किन्तु वहाँ जाना अनुचित समभकर 
वह वही रह गया । अपने उपर उद्धत गति से आक्रमण करनेवाले रावण को देखकर नील नें 
वड़े क्रोध से मलब-श्यृंग को उठाकर फका | देवताओ के शत्रु ने सात वाणों से उसे बीच 
में ही खडित कर दिया । उसके पदचात्‌ भी नील रावण के विज्ञाल वक्ष को लक्ष्य करके 
पर्वतो तथा वृक्षों को चलाता रहा; किन्तु रावण ने अपने पैने वाण-समूह से उन सबको 
चूर्चूर कर दिया और नील के शरीर पर कई पैने शर चलाये, जिसके कारण उसके 
शरीर से रक्त की घाराएँ वहने लगी । इस पर भी नील विचलित नही हुआ । सभी 
राक्षो को भयभीत करते हुए, लघुत्व धारण करके वह दानवराज के रघ पर कूद पड़ा 
और अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय देते हुए, उस रथ की घ्वजा पर उछलकर उसको 
तोड़ दिया; फिर धनुप के वचन्न-भाग पर कूदकर, रावण के लक्ष्य को भग कर दिया 


फिर, उसने अपने वाहवल से सुर-सिद्ध-साथ्यों को आह्ष्च्यंचकित करते हुए रावश के 


में 
री 


खुद्धकाड ३२८ 
मुकुटों को पैरों से कुचलने लगा । उसने एक, मुकुट को दूसरे मुकुट पर फेंका, एक मुकुट 
पर से दूसरे मुकुट को गिराया,' एक मुकुट से दूसरे मुकुट पर पद-प्रहार करके सभी मुकुटों 
को मिट्टी, में मिला दिया । इससे सतुष्ट न होकर, वह सूक्ष्म रूप में रहनेवाले अपने को 
पकडने में रावण को असफल होते देखकर, हँसने लगा । फिर उसने, रावण के छल्र फाठकर 
फेंक दिये, उसके चामरो को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया, रथ पर प्रहार करके उसको खड-खड 
कर दिया, करता के साथ दानवेश्वर की मुप्टि पर पद-प्रहार किया, उसके हारो को खीच- 
कर फेंक दिया और उसके विश्ञाल वक्ष पर प्रहार करने लगा । इस प्रकार, बड़े उत्साह 
से युद्ध करनेवाले उस नील को देखकर राक्षस तथा वानर-सेनाएँ आश्चर्यचकित हो गई । 
राम तथा लक्ष्मण भी विस्मित हुए । तब रावण अत्यन्त क्रोध से महान्‌ अग्नि-वाण को 
अपने धनुष पर चढाकर उस अग्नि-पुत्र (नील) से कहा--बलिहारी हैं तुम्हारे लाधव की। 
मे तुम्हारी प्रशसा करता हूँ । तुम अपनी लघुता ही मुझे दिखाते रहो । अब यह लो 
अग्नि-बवाण अपनी ज्वालाओ का प्रकाश फैलाता हुआ चला | इससे बचने का उपाय करो। 
यो कहते हुए उसने वाण चलाया । अग्नि-बाण के प्रभाव से नील का सारा शरीर जलने 
लगा और वह पृथ्वी पर मिर पडा। अग्नि-पुत्र होने के कारण उसकी मृत्यु तो नही हुई, 
किन्तु वह अवश हो पृथ्वी पर पडा रहा । 


६४. रावण का ब्रह्म-शक्ति से लक्ष्मण को गिराना 


तब सौमित्र ने अपने धनुष का ठकार करते हुए भयकर गति से उस दैत्य पर 
आक्रमण किया । उसे टकार तथा लक्ष्मण की प्रशसा करते हुए रावण ने उनसे कहा-- 
हैं लक्ष्मण, छोटी अवस्था के होते हुए भी तुम साहस. के साथ युद्ध करने के लिए सन्नद्ध 
होकर आये हो, यह प्रशसनीय है । अब कुछ समय इसी प्रकार ठहरो, में तुम्हें यमपुर 
भेज दूगा । तब रामानुज ने कहा--हे अधम राक्षस, व्यर्थ इतना गये क्यो करते हो ? 
में तो 'तुम्हारे निकट आ ही' गया हूँ । बातें बनाना छोडकर कार्य करके अपनी शवित 
दिखाओ ।' इतना कहते ही' रावण ने उनपर सात-बाण चलाये । किन्तु राक्षस के बार्णों को 
लक्ष्मण ने वीच में ही खडित कर दिया । इस पर उद्दीप्त ऋोध से रावण धनुष का घोर 
टकार करते हुए अविरत वाण-वर्षा करने लगा । उन असख्य बाणों को नष्ठ करके लक्ष्मण ने 
शीघ्र (उस राक्षस पर) एक सहख्न शर चलाये | उनके वाणों का सामना करने में असमर्थ 
होकर . रावण ने एक ब्रह्म-दत्त बाण लक्ष्मण के ललित वक्ष पर चलाया। लक्ष्मण अशक्त- 
से हो गये और वे घनुष को टेककर थोडी देर खडे रहे । फिर, सेमलकर हुकार भरते हुए 
लक्ष्मण ने एक प्रवल्र वाण से राक्षसेश्वर के घनुष को काट दिया । इतने से सतुष्ट न हो- 
कर उन्होने त्रेताग्नि-सदृश् शवितशाली तीन बाण उसके वक्ष पर चलाये । उनके लगने - 
से रावण मूच्छितं हो गया, किन्तु शीघ्र ही वह सेंमल गया । उसे अपने घनुप ,के तोडे 
जाने पर विस्मय हुआ और अपनी समस्त शक्ति को बटोरकर बडी कूरता के साथ, लक्ष्मण पर 
उसने उस ब्रह्म-शक्ति का प्रयोग किया, जो सदा गध-पुप्पो से अचिंत थी, जो समस्त दिद्ञाओ 
तथा ब्रह्माण्ड में अपनी उज्ज्वल ज्वालाओ को व्याप्त करने की क्षमता रखती थी, जो दसः» 
करोड अणनियों की-सी भयकर ध्वनि करनेवाली थी और जो सूर्य की किरणों से भी 

डर 


३३० र॑ंगन/थ एॉंयायर 


अधिक ताप से युक्त थी । यह देखकर सभी देवता चकित-से रह गये । प्रलय-काल के 
समान भयकर गति से तथा अंजनि से भी अधिक तेज से उस झावित को अपनी ओर 
बातें देखकर, लक्ष्मण ने उसका निवारण करने के लिए घोर बर-वृप्टि कर दी; किन्तु 
उन वाणो की उपेक्षा करते हुए वहू शक्ति लक्ष्मण के निकट आई और उनकी भुजाओं 
के मध्य में लग गई । तुरन्त लक्ष्मण पृथ्वी पर गिर पडे । 

तव दशानन ने लक्ष्मण को अपने बीस हाथो से उठाने का प्रयत्त किया, किन्तु 
विष्णु का अश होने के कारण वह उन्हें उठाने में असमर्थ हुआ । वह आश्चर्यचकित 
होकर सोचने लगा कि में तो कैलास पव्वंत को भी उसाइकर उठा सका था, और मेरू 
तथा मदर पर्वतो को उठाने की शक्ति भी रखता हूँ। कैसा आश्चर्य है कि यह लक्ष्मण इतना 
भारी है | ऐसा सोचते हुए, अपने वीस हाथो का सारा बल लगाकर रावण ने फिर एक 
वार लक्ष्मण को उठाने का प्रयत्न किया । इतने में हनुमान अत्यत क्रोध से उसके निकट 
पहुँचा और सिंह-गर्जय करके उस कूर राक्षस के वक्ष पर वज्ञसम अपनी मुप्टि से घोर 
प्रहार किया । उस प्रहार से रावण मूच्छित होकर घुटनो के वल गिर पडा । रावण की 
उस दछ्षा को देखकर देवताओ ने हफं-ध्वनि की; कपियों ने सिंहनाद किया और राक्षस 
त्रस्त हो उठ । विष्णुभक्त होने के कारण हनुमान्‌ ने, रावण के लिए दुर्वह लक्ष्मण को 
अपनी श्रेप्ठ शवित से सहज ही' उठा लिया और शीघ्र ले जाकर उन्हें रामचद्र के समक्ष 
लिटा दिया । लक्ष्मण को लगी हुई शक्ति राम के तेज से निस्तेज हो उनसे छूटकर फिर 
रावण के रथ की ओर लौट गई । थोडी देर में लक्ष्मण सचेत हो गये । 

६४. रास-रावण का प्रथम सुद्ध 

वहाँ रावण भी मूर्च्छांसे मुक्त हो अपने चचल घनुप को लेकर युद्ध के लिए सन्नद्ध 
हुआ । लक्ष्मण के मूच्छित होने से सभी वानर भयभीत होकर भाग आये थे । रावण को 
उद्धत गति से आक्रमण करने के लिए आते देखकर राम स्वय क्रुद्ध होकर उस देव-वैरी का 
सामना करने के लिए अपने धनुष का भयकर टकार करते हुए आगे बढ़े । तब पवन- 
पुत्र ने राम से कहा--हे सूर्यकुल-तिलक, जब यह रावण रथ पर बैठकर आप से युद्ध 
करेगा, तब आप पैदल ही उसका सामना करें, यह कैसे उचित होगा ?” तब ऐरावत पर 
आरूढ होनेवाले इंद्र की भाँति, राम हनुमानू के कधो पर बैठे और बडे रोप से धनुष 
का भयकर टकार करने लगे । रावण ने आषोन्मत्त होकर राम को देखा और उन पर 
अग्नि-शिखाओ के सदृश बाणों की चर्षा आरभ की । राघव ने भी उस पर श्रेष्ठ बाण 
चलाये; किन्तु इन्द्र के चत्रु ने उन्हें बीच में ही काट डाला | तब राम ने उद्धत गति से 
अद्धंचन्द्र वाण चलाकर राक्षसेंद्वर का घनुष काट डाला और पाँच तेज बाण चलाकर उसे 
व्यथित कर दिया ॥ तब रावण ने हुकार करके एक तीक्ष्ण बाण हनुमान्‌ के ललाट पर 
चलाया ॥ उस भयकर वाण को हनुमान के ललाट पर लगते देखकर राम ने बड़े क्रोध से 
अपना भाला सँभाला और उससे प्रहार करके रावण के सारथी को, अद्वों को, रथ को, 
ध्वजा को, छत्र को और चामरो को क्षणमात्र में नप्ट-अ्रप्ट कर दिया और फिर सुमत्रक 
तामक शर रावण के वक्ष पर चलाया । उस दर क॑ प्रहार से रावण मत्यत पीडित हुआ 


न 


८(7765॥ रेड? 


और थर-थर काँपते हुए निशचेष्ट हो गया । फिर, राम ने उद्दीप्त क्रोध से अद्धे-चन््र वाण 
का प्रयोग ,करके उसके दसो मुकुटो को नीचे ऐसे गिराया, मानो दसो दिशाओ में व्याप्त 
उस राक्षत्त के प्रताप को ही झटका देकर गिरा दिया हो । अपने उज्ज्वल मुकुटो की प्रभा 
से रहित हो रावण मन-ही-मव अत्यधिक दुखी हुआ और सुध-बरुध खोकर खडा रहा। तब 
राघव ने रावण से कहा--वानरो के साथ भयकर युद्ध करने के कारण तुम थक हुए हो। 
थत,, में तुम्हारा वध किये विवा तुम्हें छोड देता हूँ । तुम शीघ्र लका को लौठ जाओ | 


६5६. रावण का ख़िन्न होकर लंका लौठ जाना 


तब रावण विरथ हो दुखी मन, अकेले ही' पैदल, लका की ओर चल पडा । वह 
उत्तप्त निदवास छोड रहा था और उसका उद्दीप्त क्रोध बुझ गया था। उसका अत्यधिक 
गये चूर हो चुका था | उसकी शक्ति नष्ट-सी हो गई थी और उसका दर्प दलित-सा 
हो गया था । उसका मुख पीला पड गया था और वह बार-बार अपने सूखे हुए ओठो 
को आदर करता हुआ जा रहा था और भथ के कारण उसका कठ सूख रहा था । इस 
प्रकार जानेवाने रावण को देखकर सभी भूत तालियाँ पीटतें हुए ठहाका मारकर हँसने लगे । 
सभी वानर जहाँ-तहाँ दौडते हुए, उछल-कूद करते हुए रावण का उपहास करने लगे। 
निदान रावण लक़ा में पहुँच गया और अत्यधिक चिंता में डूबकर छटपटाने लगा । सिंह के 
हाथो में फँसकर भी, बचकर निकल आये हुए गज की भाँति, गरुड की पकड से छूटकर 
गिरे हुए तअ्रस्त सर्प की भाँति, रावण भग्रभीत हुआ । विद्युत्‌ की-सी प्रभा से समन्वित, 
भयकर ज्वालाओ से यक्‍त तथा ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली राम के बाणों से अपने 
सहार की चिता करते हुए वह वार-वार लू की-सी गरम साँसें छोडने लगा । लज्जित 
होने के कारण उसका साहस जाता रहा । वह सभा में स्थित दैत्यो को देखकर बोला-- 
हैं दावववीरों, आज मेरा श्ीर्थ और मेरी शक्ति मिट्टी में मिल गई । स्वाभाविक पराक्रम 
से सपन्न एक व्यक्ति राम-भूपाल, इस ससार में जन्मे है । मे ने ब्रह्मा से वर प्राप्त किया था 
कि युद्ध में सुर, सिद्ध, साथ्य, गरंड, गधव, राक्षस, पक्षी, यक्ष, किन्चर, उरग आदि 
किसी से भी में पराजित नही होऊँगा । तब मेंने नर तथा वानरो की उपेक्षा कर दी थी । 
मेरे दुष्कर्म ही मेरी विपत्ति का कारण वन गये है । में अपनी दुर्दशा का कैसे वर्णन करूँ? 
अब तुम लोग सावधानी से दुर्ग की रक्षा करो | द्वारो पर अधिक सख्या में रक्षको को 
नियुक्त करो । प्रहस्त आदि महान्‌ वीर युद्ध करते हुए अपने प्राण खो चुके हें । अब कौन 
ऐसा वीर है, जो राम-लक्ष्मण को जीतने की क्षमता रखता है ? विविध युद्धों को करने 
में प्रवीण, सहज पराक्रमी' राम-भूपाल पर आक्रमण कर सकने की क्षमता अब केवल' मेरे 
अनुज कुमकर्ण के सिवा और किसमें है ?” 

&७, राक्षसों का कुंमकर्ण को जग़ाना 

इसके पदचात्‌ दशकठ ने सबको देखकर कहा--'मेरा भाई छह मास तक लगातार 

सोने के पश्चातू जगा, सभा में आकर मेरे साथ मत्रणा की और फिर आज नौ दिन से 


सो रहा है । वह अवश्य शत्रुओं का सहार कर सकता है। उस अनुपम वीर को जगाकर 
किसी प्रकार यहाँ ले आओ |! 


र्हर रंग्नाथ रायायण 


हि पु 


रावण के आदेशानुसार राक्षमों नें कई प्रकार के गव-पुष्प और विविव मिप्टान्न 
आदि खाद्य पदार्थ लेकर कुभकर्ण की उस गुफा में प्रवेण किया, जो' तीन योजन लवा था 
तथा सब अकार के सुख-सुविधाओ से पूर्ण होने के कारण भोगों का 'निवास्र, पाताल के 
समान महंनोथ, वजायुव को महिम्ता से समच्वित, इद्रलोक के समाव ससार के श्रेष्ठ तेज से 
विलसित, अग्नि के निवास को समान, अत्यधिक भयकर यमलोक के समान, विविध मेदा, 
मांस आदि से युक्त होने के कारण (नऋत) राक्षस के भवन के आँगन के समान, निरुपम 
वारुणी से युक्त होने से वरुणालय के समान, सुगधित वायु से युक्त पवन के निवास के समान, 
श्रेष्ठ निधियो से युक्त कुबेर के भवन के समान, श्रेष्ठ विभूति का आगार शिव ,के निवास 
के समान, तथा श्रेष्ठ पद्म-राग की प्रभा से समन्वित ब्रह्म-लोक के समान, सुशोभित थी । 
सोनेवाले कुभकर्ण के दीर्घ निश्वासों से राक्षस कपित हो उठे, किन्तु जैसे-तैसे उसके 
निकट पहुँचे और निर्मल तथा विद्याल स्वर्ण-प्यंक पर, हस-लूलिका-तत्प पर शुयत करने- 
वाले कुमकर्ण को देखा । वह अयने के पर कपोल ठिकाये, सतत दीर्घष निश्वास छोडते 
हुए सो रहा था | उसके मूृख पर श्रम-जल की बूंदें थी और उसके नेत्र किंचित्‌ खुले 
हुएनसे थे। उसके शरीर पर कर्प्र तथा चदन का लेप था और उसके वक्ष पर उज्ज्वल 
मणिमय हारो का समूह था । वह आनद में अपने आपको भूलकर निद्रा तेथा कामिनियों 
के साथ रति-क्रीडा में सतत तललीव रहनेवाले के समान दोख रहा था जौर कदाचित्‌ 
देवताओं पर कई वार विजय प्राप्त करने के सवध में स्वप्न देख रहा था । ऐसे कुमकर्ण 
को देखकर आगंतुक राक्षस दुखी होने लगे कि हाथ, ब्रह्मा ने ऐसे महान्‌ वीर को ऐसी 
निद्रा क्यो दी? उसके पब्चात्‌ उन्होंने उसके आगे भात की राणियाँ तथा महिप ऐव वराह 
का पकाया माँस आदि सजाये, चदन तथा पुष्पो से उसकी पूजा की, घृष जलाया, दीपो 
से आरती उतारी और हाथ जोड़कर उसकी' स्तुति को पाठ किये । फिर, उन्होने अशनि- 
घोष से भी अधिक भयकर ध्वनि की, निसानों का विपुल निनाद किया, भीषण भेरी-ध्वनि की, 
और सिंह के समान गजन किया । वह महाध्वनि पाताल-लोक में, नक्षत्र-पथ में 
सभी दिशाओं में तथा स्वर्ग में भी व्याप्त हो गई । इस पर भी कुभकर्ण नहीं जगा, 
इसके विपरीत वह और अधिक गरभीर निद्रा में डूब गया । तव सभी राक्षसों ने यगदा, 
मूसल, मुद्‌ गर आदि से उसपर प्रहार किया। दस हजार भाले उसकी पसलियो में चुभोये । 
उस पर लगातार पहाड़ गिराये और उसकी छाती पर चढकर, हाथो तथा पैरो से ताडन 
किया । फिर भी कुमकर्ण नहीं जगा । तब उन्होने भीषण सिंहनाद करते हुए, शख वबजांते 
हुए असख्य कृम, पटह, भेरी, तुरही आदि का घोर निनाद किया । दस हजार भयकर 
राक्षस लगातार निसानो को वजाते ही रहें । इतनी ध्वनि होने पर भी कुभकर्ण नीलादि 
के समान विना हिले-इले ही पड़ा रहा । तब राक्षसों ने उसे हाथी, घोडे, ऊँट, जगली 
भेसे आदि जानवरो से रौदवाया और वडें लट्झे से उसका सारा शरीर चूर-चूर कर दिया 
और एक साथ सभी वाद्य बजाये | सारी लका इस ध्वनि से काँप उठी और वानस्तेता 
भी शकित होने लगी । इतना सव करने पर भी कुभकर्ण ऐसा सो रहा था, मानो -उसके 
कान पर जू' तक न रेंगी हो । तव कुछ राक्षम दिशाओं को कंपायमान करते हुए मेरीज़िनाद 


खुद्धकांड ३३३ 


करने लगे, कुछ पर्वत “गुफाओ को प्रतिध्वनितः करते हुए सिंह-सम गर्जन करने ज़ग्रे, 
कुछ अपने! हाथो में उसके केश लपेटकर नोचने लगे, कुछ उसके कर्णे-पुटो में प्रवेश करके 
उसके परदो को दाँतो से काटने लगे और कुछ अविराम गति से गदा, मृद्गर, खड़ग, 
मूसल आदि से उसके मुख तथा वक्ष पर प्रहार करने लगे । तब उस राक्षस की नींद 
थोडी उचटी । उसने एक जँभाई ली और फिर सोने लगा । तब राक्षसों ने उसे बड़े-बड़े 
रस्सो से बाँध दिया और एक सहस्न घट उवलता हुआ तेल उसके कानो में उडेल दिया, 
नथुनों में जलती हुई शलाकाएँ रखी, एक साथ भयकर गति से वे भेरियो का निनाद 
करने लगे और लगातार हाथी तथा धोडो से उसका वक्ष रौंदवाने लगे | तब कुमकर्ण 
किचित्‌ शकित-सा हुआ और सर्प के समान भयकर हाथो को फैलाया, थोडा-्सा ,जगा, 
हुकार भरकर अँगडाई ली' और अपने विशाल मूख को विक्ृत करते हुए जँभाई ली और 
आँखें खोलकर भयकर, रूप घारण किये ऐसे बैठ गया, मानो उसने यह सोच लिया हो कि 
जब राम मुझे महान्‌ सायुज्य पद ही' देनेवाले हे, वब मुझे इस निद्रा की वया आवश्यकता हैं 
और अपनी' निद्रा त्याग दी । उसका मुह प्रलयकाल के सूर्य-विव के समान लाल था, 
और विंध्याचल की गुफाओ से निकलनेवाले पवन के समान उसकी उसासें चल रही थी 
ओऔर उसकी आँखें प्रलयनकाल के अर्क-बिब के समान लाल दीख रही थी । 

॥ इस प्रकार, उसके जगकर बैठने के पश्चात्‌ सभी' राक्षस दानवेश्वर के पास जाकर 
बोले--हे देव, कई प्रकार से पीडा पहुँचाने के पश्चात्‌ आपके अनुज जगे है, हम उनसे 
युद्ध में जाने की प्रार्थना करें या आपके सम्मुख उन्हें लिवा लायें ? आप जो आाज्ञा दें ॥' 

) बड़ी प्रीति से कहा--उसको यही लिवा लाओ ।' 


तब रावण ने 
&5, राघर्वों की युद्॒ध-यात्रा पर कुंगकर्ण का क्र द्रृध होना 


७] हे बिक 


रावण की आज्ञा के अनुसार राक्षस कुभकर्ण के पास गये । अपने समक्ष अडे हुए 
राक्षस-समृह को देखकर उसने कहा--तुम लोगों ने मुझे क्यो जगाया ? अब रावण के 
लिए कौन-सा कार्य आ पडा है ?' कहो, वात क्‍या हैं ” तब उन्होने कहा--भआप स्वय 
प्रभु रावण से ही' सारी बातें जान लें ? आपको लिवा लाने के लिए उन्होने हमें भेजा है। 
इससे अधिक हम और कुछ नहीं जानते ।' 
तब कुमकर्ण उठा, जी भरकर स्तान किया, सुदर वस्त्राभूपण पहने और प्रकाशमान 
किरीट धारण किया । उसके पह्चात्‌ बडे मोद से राक्षसों ने कई प्रकार के मिप्टान्न, 
पकवान, मधु, महिष तथा सूकर का मास्र, भेजा तथा घी के बरतन लाकर उसके सामने रखें। 
'कुभकर्ण ने पहले बडी प्रीति. के साथ भेदा तथा मास खाया, छककर रक्‍त तथा 
मधु पिया और अत्यधिक सतुष्ठ हुआ । तव सभी' राक्षस प्रणाम करके उसके समक्ष खडे 
हुए । तव कुभकर्ण ने उन्हें देखकर कहा--दानवेश्वर अपने पुत्र तथा वधुजनों को साथ 
कुशल हैँ ? लका पर कोई विपत्ति तो नहीं आई? यदि उस पर कोई विपत्ति आ पड़ी है 
तो में उस भय को दूर कर दूगा। अमरेन्ध से भी भिडकर उसे स्वर्ग से भगा दूँगा, 
भलय-काल की अग्नि को भी बुझा दूया, क्षत्रुओ के तीत्र दर्प को भग कर दूगा ।' 
- तेव उपाक्ष ने हाथ जोड़कर कुभकर्ण से कहा--हे राक्षसवीर,, सुनिए, हमें देवता, 


३३० रंगन/थ एरयायण 


राक्षस तथा गधर्वों की ओर से कोई भय कभी नहीं हुआ । अभी मानवो ने हम में भय 
उत्पन्न किया है । देव-शत्र रावण के जानकी को ले आने से क्रुद्ध होकर रविकुलोत्तम राम 
अत्यत पराक्रमी वानरों के साथ लका पर चढ आये हूँ । इसके पहले अकेले एक वानर नें 
अक्षयकुमार का वध करने के पहचात्‌ लका को भस्म करके अपनी शक्ति को प्रकट किया था। 
अब इन महान्‌ कपियो को जीतनेवाला कौन है ? राम देवों तथा असुरो से भी 
अधिक पराक्रमी हे गौर रावण भी उनके साथ युद्ध करके हार गये हूँ और त्रस्त होकर 
लका में लौट आये हे । 


इन वचनों को सुनकर उस निद्माचर की आँखों से अग्नि-क्ण निकलने लगे । उसने 
भीषण क्रोध से उद्गीप्त होकर दाँत पीसते हुए कहा--युद्ध में सभी वानरों तथा अत्यत 
पराक्रमी दाशरथियो को वध किये विना, वानरों के रक्‍त-मासों से राक्षस-समूह को तृप्त 
किये बिना तथा स्वय राम-लक्ष्मण के रक्त का पान किये विता में कौन-सा मुंह लेकर 
रावण को सम्मुख आऊं ? में वैसा करने के पहचात्‌ ही वहाँ आऊंगा ! 

इस पर महोदर ने हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा--है वीर, दशकठ से 
मिलने के पश्चात्‌, आप ऐसा ही कीजिए । उनका आदेश लेकर आप कझत्रुओ पर विजय 
प्राप्त कीजिए ।” तव उसते कहा-एऐसा ही हो” और राक्षतों की ओर देखने लगा । तब 
उन राक्षसों ने इक्क्ीस मनुष्यों के मास का ढेर उसके सामने लगा दिया । फिर वे अस्सी 
महिष, सात सौ बकरियाँ, एक सहख्न सूकर, चार सहस्न मोटे भोटे खरगोश तथा छह सी 
मृग ले आये जौर उनका वध करके अलग-अलग पकाया और उस मास को उसके सामने 
लाकर रखा । कुमकर्ण सारे मास को खाकर तृप्त हुआ । उसके पश्चात्‌ उसने दो सहसख्र 
घट मद्य पीकर ऐसी डकार ली कि सभी दिशाएँ विदीर्ण-सी हो गई । फिर अपनी मूछो 
पर ताव देते हुए, आँखो को धुमाते हुए अपनी गति से सारी पृथ्वी को कॉपाते हुए, अपनी 
गूफा से यो निकल पडा, मानो राहु के मुह-ह्वर से मुक्त प्रलय-क्ाल का सूर्य हो, या बलि- 
महाराज को दड देकर, सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होनेवाले त्रिविक्रम हो । 


उस प्रकार दीघ॑ तथा भीषण आकारवाले राक्षसवीर को आते देखकर किले के 
वाहर रहनेवाले सभी वानर त्रस्त हो उठे । कुछ वानर विस्मित हुए, कुछ जहाँ-तहाँ 
छिपुने लगे, तो कुछ वानरो के पैर लडखडाने लगें, कुछ भवभीत हो उठे, तो कुछ मूच्छित 
होकर ग्रिर पडे, कुछ समुद्र में कूद पडे, तो कुछ दाँतो-तले उंगली दवाये खड़े रहे और 
कुछ राम की आड़ में जा खड़े हुए । तब राम ने उन्हें देखकर लक्ष्मण को घनुष-वाण 
लाने की आज्ञा दी । तत्पश्चात्‌ उन्होंने विभीषण को देखकर कहा--हे विभीषण, पृथ्वी 
तथा आकाश का स्पर्श करनेवाले विशाल झरीर से सबथन्न प्रलयनकाल के मेघो के वीच 
चमकनेवाली विजलियो के समान आमूषणो की काति से दीप्त तथा तीनो लोको को एक 
साथ निगलने योग्य मुह से युक्त यह कौन है, जो वहाँ नगर के मार्ग से जा रहा है ” 
क्या, वह यमराज है, या प्रलयन्काल का अनिल है, या प्रलय-काल का रूुद्र है, या प्रलय- 
मारुत है, याँ प्रलय-काल का सूर्य है, या प्रलय-काल का शोपष-नाग हैं, या प्रलय-मृत्यु है, था 
प्रलयन्काल का वरुण है, या प्रलयश्कराल का यम है या प्रलयज्काल का भैरव है या प्रलय-काल 


चुद्धकाड ३३९ 


क॑ रुद्र के लिए प्रलय-रुद्र है ? ऐसा भीम-रूप हमने अबतक न कभी देखा, न उसके बारे 
में कभी सुना ही' है। यह तो बताओ कि वह कौन है ? क्या वह दानव है या दैत्य है ? 
यह किस कुल काहे ? वह कहाँ का रहनेवाला हैं ? इसका नाम क्‍या हैं ? इसे देखकर 
सभी वानर त्रस्त हे, इसका आकार-प्रकार देखकर आइचर्य हो रहा है ।' 


६९, कुंमकर्ण का शाप-वृत्तांत 

तब विभीषण ने राम को देखकर कहा--हे देव, इस दैत्य का वृत्तात सुनिए । 
यह विश्ववसू का पुत्र हैं और इसका नाम कुभकर्ण है । रावण का भाई तथा महान्‌ ब्ूर है। 
देवताओ तथा दिक्‍्पालो को पराजित करके उन्हें युद्धभूमि से भगा देनेवाला महान्‌ ब्राहु 
वली है । दीर्घशूल विविध आयुधो से युक्त तथा उद्धत शक्ति से सपन्न है । यह 
समस्त ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करने की क्षमता रखता है । शक्ति में ब्रह्म से कम नहीं है । 
जन्म के समय से ही यह अपने कुर्प मुह से जीवधारियो को निगलने लगे गयाथा । 
इस प्रकार, जीव-धारियो को निग्रलते देखकर इन्द्र ने अपना वज्ञायुध इस पर चलाया, 
तव इसने क्रोध में आकर ऐरावत का दाँत उखाड लिया और उससे इन्द्र पर प्रहार किया। 
उस प्रहार से इन्द्र मूच्छित हो गया । उसके पद्चात्‌ वह सभी देवताओ को साथ लेकर 
ब्रह्म की सेवा में पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके निवेदन किया--हे देव, कुभकर्ण नामक 
राक्षस पृथ्वी के जीवो का नाश कर रहा हैं और सुरो को पीडित कर रहा है | वह पर- 
स्त्रियों पर बलात्कार कर रहा हैं और हठ करके समस्त ससार का नाश कर रहा हैं । 

यदि वह ऐसे ही अत्याचार करता रहा, तो विद्व का सर्वनाश निश्चित है ।' 

“उनकी बातें सुनकर कमलासन मन-ही-मन बहुत ही' कुंद्ध हुए और सभी' राक्षसो 
को अपने समदा उलाकर उनमें कुभकर्ण का भयकर रूप देखा । उसका रूप देखकर स्वय 
ब्रह्मा को भी आइचर्य हुआ । उन्होने कहा--ऐसा लगता है कि यह समस्त ब्रह्माण्ड को 
निगल जायगा । इसका आकार-प्रकार देखकर स्वय मुझे भी भय लग रहा है । जब इसका 
रूप इतना भयकर है, तो क्‍या, यह तिनयन शिवजी को भी युद्ध में हरा नहीं देगा ?' 
उसके पद्चात्‌ ब्रह्मा ने ससार के प्राणियों का वध करने से उसे रोकने का विचार करके 
कहा-'क्या, तुम्हारा जन्म पुलस्त्य के उत्तम वश में इसलिए हुआ कि तुम अपना शर्य 
दिखाकर सभी लोको को त्रस्त करो “और सभी' प्राणियों का नाश करो ?” फिर, उन्होने 
मृत्यु के समान शाप देते हुए कहा--तुम निरतर सोते रहो । वर्फ के वच्च के-से इस शाप 
के लगते ही कुभकर्ण खडा रह नहीं सका भौर तुरत निद्रा के वशीभूत हो गया ॥' 

“तब रावण ने ब्रह्मा को प्रणाम करके कहा--हे देव, आप इस पर कुृपा-दृष्टि 
कीजिए । स्वय पौधा लगाकर फिर स्वय उसको कही काटतें। यदि अपने आकार के कारण 
यह दूसरों को कप्ट पहुँचाता है, तो' उचित यही हैं कि उसे अच्छा उपदेश दिया जाय । 
ऐसे शाप से उसे दग्य करना न्यायोचित नही हैं । इसके शाप का अत बौसे होगा, इसकी' 
भी' व्यवस्था दीजिए । तब ब्रह्मा ने रावण से कहा--यह लगातार छह मास तक सोता 
रहेगा (प्रत्येक छह मास के बाद) सिर्फ एक दिन यह नगा हुआ रहेगा ।' हें देव, उसी 
समय से बह निश्चित होकर सोता और जागता रहता है । आपके दिव्य वाणों की भयकर 


३३६ ई॑ंगनाथ एश्यस/यंण 


अग्नि-ज्वालाओें के समक्ष न टिक सकते के कारण असमय ही रावण न इसे जगाने के 
लिए राक्षसों को भेजा । इसलिए यह युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर राजा के अतपुर में जा 
रहा है | बहुत जीघ्र यह रावण की आज्ञा लेकर हम पर आक्रमण करने के लिए आयगा। 
उसके आने के पहले आप सारी कपि-सेना में यह घोषित करवाइए कि कोई इसके 
आकार को देखकर युद्ध-क्षेत्र से भाग न जाय, यह दनुज नही है, यह यत्र की सहायता 
से वना हुआ भयकर रूपवाला काठ का एक पुतला है । इस प्रकार घोषित कराकर आप 
वानरों का भय दूर कर दीजिए और उन्हें युद्ध के लिए सन्नद्ध कीजिए ।” तब राम ने 
नील को ऐसी घोषणा करने की आज्ना देकर भेजा । 

कुभकर्ण को जाते देखकर नगर की स्त्रियाँ उस पर फूलो की वर्षा करने लगी । 
निदान, कुभकर्ण चद्विका के निवास-सदृश सुशोभित होनेवाले उस सभा-मडप में ऐसे पहुँचा, जैसे 
उज्ज्वल किरणों से सुशोभित होनेवाला सूर्य घवल मेंघ-समूह में प्रवेश करता हो । वहाँ 
पहुँचकर उसने अपने अग्रज को प्रणाम किया, तो रावण ने उसे बडे प्रेम से अपने हृदय से 
लगा लिया और उसे एक स्वर्णासन पर विठाया । उसके परचात्‌ कुभकर्ण ने अपने अग्रज 
को देखकर कहा--हे असुरनाथ, आपका मुझे जगाने का क्या कारण है ? किसने आपका 
अपकार किया ? में किसे मार डालू ? क्या भाज्ञा हैं ?! 

तव रावण ने कुभकर्ण से कहा--अपनी निद्रा की अधिकता के कारण यहाँ के 
कार्यों की गति-विधि से तुम अनभिन्न हो । इसलिए मे तुम्हें सभी बातें समभाता हूँ, सुनों। 
दशरथ-तदन (राम) सुग्रीव को मित्र बनाकर समुद्र पर सेतु वॉधकर मुक पर चढाई करने 
के लिए आया हैँ और अपनी सेना के साथ लका को घेरे हुए पडा है । उससे युद्ध करने 
गये हुए प्रहस्त आदि वीर राक्षसों का उसने सहार किया है, किन्तु उस युद्ध में एक भी 
वानर-वीर मरा नहीं है । इसलिए तुम उन राम-लक्ष्मण को जीतकर वालि-पुत्र तथा सूर्य- 
न्दन का वध करो और लका के यज्ञ की रक्षा करो । 


४७०. कुंभकर्ण का हितोपदेश 


रावण के ऐसे दीव वचनो को सुनकर कुंभकर्ण ने रावण से कहा--उस दिन एकात 
में सभी मत्रियों ने जिस विपत्ति की संभावता की थी, वही आज अचूक रूप से प्रत्यक्ष 
हुई है । यह किसी भी प्रकार टलनेवाली नहीं है । जो मदाघ होकर, आगे-पीछे का 
विचार किये विना काये “करता है, वह सव प्रकार से हानि उठाता ही है, ऐसा व्यक्ति आपके, 
सिवा और कौन हो सकता हूँ ? जो राजा अपने वृद्धिमान्‌ मत्रियों की मन्रणा के अनुसार 
कार्य करता है, उसे अपने तथा मत्री दोनों के उत्साह तथा शक्ति से अग॒णित फल प्राप्त 
होगा । राजा को चाहिए कि वह देश और काल का विचार करे, जन तथा घन को 'समद्ध 
रखे, किसी कार्य के प्रारंभ करने के पूर्व उसके सबंध में सोच-विचार कर ले, उसमें पडने- 
वाले विघ्नो का निवारण करे और कार्य में कृत-कृत्य होकर सतत राज्य-सख का आनंद 
प्राप्त करते हुए पृथ्वी का पालच करे । उसे ज्त्रु के बल तथा शवित के मल्यांकत करके 
यदि अन्नु अपने से बलवान हो, तो उससे सधि का प्रस्ताव करना चाहिए। यदि शत्रु अपने 
समान वनशाली हो, तो उसके विरुद्ध अपना बल तथा पराक्रम प्रकट करके, उसे अपने वश्च में 


खुद्धकांड इे३४ 


कर लेना चाहिए । यदि झात्रु अपने से बलहीन है, तो उस पर सारी शक्ति से आक्रमण 
कर देना चाहिए | अवसर देखकर शत्रु-्सेना पर आक्रमण करके शत्रुओं को जीतने का 
उपाय सोचना चाहिए । यदि शत्रु उद्दण्ड होकर आक्रमण करे, तो उनमें फट, डालने का 
प्रयत्त करना चाहिए। यदि वह महान्‌ शक्तिशाली' होने के कारण -अजेब हो, तो उसकी 
शरण में जाना चाहिए । इन छहो नीतियो को जानकर जो राजा व्यवहार करता हैँ, वह 
अवश्य उन्नति करेगा । साम, दान, भेद तथा दड के चारो उपायो को जो सतत्त काम में 
लाता रहता है, उसके लिए अन्य नीति-शास्त्रो की आवश्यकता नहीं है | जो पर-घन, पर- 
स्त्री में अपना चित्त लगाता हैं, वह अपने सारे वद्य का नाथ करता हैँ ।” 


कुमकर्ण के इन वाक्यों को सुनकर रावण क्रोध-विवश हो कहने लगा--ें अग्रज हूं, 
इसका विचार किये विना तुम यहाँ आकर मुझे उपदेश दे रहे हो ? अब यह प्रलाप 
क्यो ? चाहे कैसे भी हो, मेने यह कार्य किया हैँ | अब इसे सँभालना तुम्हारा धर्म है न? 
कहो ।' तब कुभकर्ण ने कहा-- हे दानवेन्द्र, में अवश्य युद्ध करने के लिए जाऊँगा । 
किन्तु एक ओर बात सुन लीजिए । एक दिन की बात है । में निद्रा से जगने के परचातु 
अत्यधिक प्राणियों को खाकर एकात में बैठा हुआ था । उसी समय अनघ नारद वहाँ 
आये । मैने उनके निकट जाकर कहा--हे अनघ, आप इतनी शीक्रता से कहाँ से आ. रहें हूँ 
और कहाँ जा रहे हे ? कृपया वतलायें । तब उन्होने कहा--'ें कनकाद्रि से आ 
रहा हूँ । में वहाँ की वातें, तुम्हें सुनाऊँगा, सुनो । कनकाद्रि पर कमलासन (त्रह्मा); 
फाल-लोचन (शिव), पकजनाभ (विष्णु); पाकशासन, अनल, यम, वरुण, अनिल, यक्षराज 
कुबेर, चद्र, सूर्य आदि ग्रह; सिद्ध, मुनि, किन्नर, गर्व, गीर्वाण, गरड, पन्नग तथा गुह्म-प्रमुख 
आदि लोगो की एक सभा एकत्रित हुई थी । उस सभा में सुर-गुर बृहस्पति ने कहा-- 
दशकठ हमारी उपेक्षा करके अत्यधिक उद्ृण्ड हो सारे ससार को त्रास दे रहा हैँ । उसने 
अपनी प्रचड शक्ति से युद्ध में इन्द्र को परास्त किया है, यम को भगा दिया हैँ, वरुण 
को जीत लिया हैँ, अपने बल का प्रदर्शन करके कुबेर को अपने अधीन कर लिया है, 
उद्धत गे से कई धर्मात्माओं को बदी बनाकर पीडित किया है, रवि-चद्र का तेज मद 
करके उनको अपनी आज्ञा के अनुसार चलने के लिए बाध्य किया है, ग्रहो को पीडित किया हैं, 
मज-यूत यज्ञों को नष्ठ किया हैं, महान्‌ उद्यान-वाटिकाओ को उजाड दिया है और 
असख्य उत्तम स्त्रियों को कारागार में डाल दिया हैँ । ऐसे भयकर कार्य करते हुए उसने 


सभी भुवनो को त्रस्त कर दिया हैं । अत, आप उस दश्शानन का नाश करने का कोई 
उपाय सोचें ।॥ 


तु 


बृहस्पति के वचनों को सुनकर ब्रह्मा ने सभी देवताओं से कहा--'मैने पहले उसे 
वर दिया था कि वह सुर, गरुड, उरग, असुर तथा यक्षों के हाथों से नहीं मरेगा । अब 
मैंने इसका प्रतीकार सोचा है, सुनो । उसने मुझसे मनुजो की, चर्चा नहीं की थी और 
वरदान के समय मेने भी इसकी चर्चा नहीं की। अत, युद्धक्षेत्र में केवल मानव उसे परास्त 
कर सकेंगे । इसलिए आप आदिविष्णु, कमलनाभ तथा लोकवद्य मुकुद से प्रार्थना कीजिए 


कि वे मस्‍्यें-लोक में जन्म लें । इसके पश्चात्‌ देवताओं तथा मुनियों ने वैसे ही किया । 
डरे 


३ई८ रंगना एयायर/ 


हरि-ने भी मर्तत्यलोक में जन्म लिया है ।” इतना कहकर नारद चंले गये:/। हे दैर्त्-राज: 
सूर्य-बंश-तिलक आदि देव ही हे, वे मनुज नही है। अत, सीता को उन्हें सौप दीजिए | ज़ैनकी 
शरण लीजिए और सभी वानरो को देवता जानिए । हे दानवेन्द्र, मेरी: वात सत्य मानिए ॥“- 


' - ७१. रावण का कुमकर्ण के उपदेश का तिरस्कार करना - 


कुमकर्ण के इन वचनों को सुनकर दद्मानन मन-ही-मत सताप की अग्नि में. जल 
गया और -थोडी देर तक मौन बैठा रहा । फिर, दीघ॑ निवास छोडकर अत्यत चिंताक्रान्त 
हुआ और साथ-ही-साथ भयभीत भी, किन्तु अपने भय को प्रकट कियें- विना - उसने 
क्रुद् होकर अपने अनुज को देखकर कहा--चवार-बार विप्णु', विष्णु, कहकर क्‍या श्रलाप 
कर रहे हो ? इतना भय तुम्हें कैसे होने लगा। स्वय विष्णु से भी में नही डरता, तव 
मानव-वेशधारी विष्णु से में क्यो भयभीत होऊेंगा ? मुझे; वार-वार ऐसा भय क्यो दिखाते हो ? 
भले ही तुम भयभीत हो जाओ । चाहे राघव विष्णु ही क्यो न हो, उसका अनुज 
इन्द्र ही क्यो न हो, सुग्रीव हर ही क्यो ने हो, उन्‍हें मुझसे युद्ध करता ही पडेगा । 
समस्त नीतिथास्त्रो के ज्ञाता होते हुए भी तुम चाहते हो कि जिस राम से मैने विरोध 
ठान लिया हैं, उसके साथ हीन मित्रता कर लू ? नीति-शास्त्र का तुम्हारा सारा ज्ञान 
आज निंष्फल हुआ । युद्ध-भूमि में हमारा सहार करके, मुनियो तथा सुरो की 'रक्षा कैरने 
का विचार करके, जगदेकरक्षक तथा कमलनाभ ने अपने देवत्व को त्यागकर, धोखे से 
मानवत्व' को घारण कर लिया है और इस जगत पर राम होकर जन्म लिया है, भला, 
उससे हमारी संधि कैसे सभव हैं ? में अपने गव को छोड़कर वानरो के आश्रय में रहने- 
वाले उस राम के पास कैसे जाऊे ? यही कमलनाभ वामन का रूप घरकर बलि के यज्ञ 
में गया, तीव चरण पृथ्वी दान में ली और फिर उसे बदी बनाया । इसनें तुरन्त उरपकार 
करनेंवालें का अपकार कर दिया । ऐसी दवा में हम विरोधियों का सहार कियें विता 
वह रहेगा क्यो ? हमारे और राम के मध्य सधि हो कैसे सकती हैं ? जब हम दोनो ने 
इन्द्र-लोक पर चढाई की थी और अपने बाहुबल का प्रदर्शन करते हुए महांनू. पराक्रमी 
इन्द्र आदि देवताओं को परास्त किया था, तव यह विष्णु कहाँ था ? क्‍या, तुमको इसलिए 
मैंने जगाया कि मे तुमसे उपदेश सुनू' ? भला, तुम्हें यह भय क्यो हुआ ? प्रार्णों के 
भय से इतनी वार्ते क्यो करते हो ? यदि तुम्हें प्राण प्रिय हे, तो तुम: कुशंलपूर्वक रहो । 
मेंने तो दींघ॑ आायु पाई है; तीवों लोको को जीता है, कई प्रकार के राज-सुखों का 
अनुभव किया है और अपना अनुपम तेज समरंत संसार में व्याप्त किया है | में. और लोगो 
के समान हीचन पराक्रमी राम की प्रणाम नहीं करूँगा । मैने तुम्हें युद्ध में जाने का आदेश 
दिया, तो जाने की इच्छा नही रखते हुए ऐसे वचन तुमः क्यों कहते हों ? अब तुम जाकर 
सुंख से सो जाओ | छात्रु सोनेवाले को नही मारते । में स्वय ' राम-लक्ष्मण का, सुग्रीव का 
तंथा अन्य भयंकर-पराक्रमी वानरों का सहार करूँगा ।- सभी देवताओ का वध मे स्वय 
करूँगा । विष्णु को भी में ही मार डालूंगा | उस विष्णु के अनुचर-शरो को यद्ध में 
जहाँ भी ' मिलेंगे, मे अफती शवित दिखाते हुए मार्रुगा-। तुम कायर की भाँतिं चिरंकाल तक 
जीवित रहो 7. '- 


खुद्धकांड , ट्र३८ 


,“/ +इतना कहने के प्रद्दात्‌ रावण ने फिर कुभकर्ण से ,क़हा--/में जमज़ता हूं कि - लक्ष्मी 
स्वयं सीता होकर इस पृथ्वी! पर जन्‍्मी हैँ । में जानता हूँ कि विष्णु स्वयं रघुसम, होकर्‌ 
जन्मे हे । में यह भी जानता हूँ कि युद्ध में राम के हाथो मेरी' मृत्यु अवइंब होगी ॥ मव्‌ 
तुमसे में क्यो छित्राऊँ ? में काम-बण हो सीता को नहीं लाया, क्रोधाभिभूत होकर 
बलात्‌ में सीधा को नहीं लाया; युद्ध में रघुराम के हाथो मरकर वंदनीय विष्णु का पर्म- 
ध्षाम॑ प्राप्त करने के निमित्त ही में सीता को लाया हूं है 
“ , दस्त प्रकार के वचन, कहनेवालें रावण को देखकर कृभकर्ण ने कहा-- हे -दानवनाथ, 
जब में आपकी सेवा करने के लिए प्रस्तुत हैँ, तब आप व्याकुल क्यों होते हैं ? आप्र 
आनद से रहिए । मे शत्रु का नाश करूँगा ।! इसके पदचात्‌ उसने सारी सभा की ओर 
एक वार ध्यान से देखा और झऊहा--हे इन्द्र के झत्रु, इस सभा में निर्मल चरित्रवान्‌, 
विभीषण नहीं दीख रहा है । वह कहाँ है ?” तब रावण ने कहा--राम-लक्ष्मण के लंका 
पर आक्रमण करने का समाचार सुनकर उस सबंध में परामर्श करने के लिए सभी लोग 
एकत्र हुए थे । निद्रा के व्ीमृत होकर तुम तोशीघ्र यहाँ से चले गये । तब विभीषण वे 
राम के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करके उसकी प्रशसा में ऐसे हृदय-विदारक शब्द मुभसे 
कहे कि क्रोव में आकर मेने दृढ़ता के साथ कहा--यदि तुम यहाँ रहो तो में तुम्हारे 
प्राण ले लूंगा । तव वह मुझे छोडकर राम की शरण में चला गया और अब वही हूँ ।” 
७२ कुमकर्ण की गर्वोक्तियाँ ' 
तब कुमकर्ण ने सोचा कि अब परिस्थिति बडी विकट हो गई है, मुझे अवश्य॑ युद्ध 
में जाना ही चाहिए | अब में (अपनी गुफा में) लौट नहीं सकता | इस प्रकार, निरचय 
करके उसने रावण के सामने दृढ़ता से यह प्रतिज्ञा की--'में यमराज से भी भिडकर 
उसका नाश करूँगा, ब्रह्मा को भ्री पकड़कर उसका मर्देत करूँगा, आदिशेष को भी' पकड़कर 
उसे चारो ओर आकाश में घुमाऊंँगा, विहगेन्द्ध (गरुड) को भी त्रस्त करूँगा, प्रलयाग्नि 
को भी निगल जाऊँगा । समुद्र का सारा जल पी जाऊँगा, विष्णु को भी युद्ध में परास्त 
क्र दूगा । रुद्र को भो नामावशिष्ट करूँगा, नैऋत को भी पकड़कर खड-खड कर दूगा, 
मृत्यू का भी गला घोट दूगा, वरुण का भी तेज नष्ट करूँगा, कुबेर का भी पेट चीर 
ड्यलूंगा, सूर्यविव को भी अपनी मुष्टि में कस लूंगा और ब्रह्माण्ड को भी ढुकरा दूंगा । 
ऐसी दशा में मेरे उद्धतरा रण-कौशलल के समक्ष, इन वानरों को निगल जाना कौन बडा 
फाम है ? हे असुरेनद्र, में अवदय इन कपियो को पहाड़ो पर भगाकर, उन मानवो का 
वध कर दुगा, आप निश्चित रहिए | जब राम मेरे हाथ से मारे जायेंगे, तव सीता 
अनाथा वव जायगी और आपकी' कामना पूरी होगी । 
इन वातो को सुनकर महोदर ने बाहुबली कुभकर्ण से कहा--हें वीर, तुमने श्रेष्ठ 
कुल में जन्म लिया हूँ और तुम्हारा यह उत्कट नर्व उचित ही है; किन्तु नीति तथा 
अनीति का विचार किये विना क्या कोई वीर ऐसे श्षत्र-वध की प्रतिज्ा करता है ? भयकंरं 
मिंह की भाँति क्रोषोग्मत्त होकर प्रखर तेज से विलसित होनेवाला राम, केवल मानव नही है, 
स्व्य किणु इस रूप में आाया हुआ हैँ। एक ही वाण से वालि का संहार करने- 


३90 रंग्नाथ रायायर 


वाले उस श्रेप्ठ वीर को जीतना, क्या, तुम्हारें लिए समव है ? उहण्ड पराक्रमी तथा 
महावली राम पर तुम्हें अकेले आक्रमण करने की सलाह हम नही देते । तुम सेना के साथ 
जाओजो और महावली राम पर विजय प्राप्त करो ।' 

इसके पदचात्‌ उसने दशकठ से कहा--हमारे रहते आप चिंता क्‍यों करते है ? 
क्या, हम आपका मनोरथ पूर्ण नही करेंगे ” जानवी को प्राप्त करने वो लिए आप इतने 
व्याकुल क्यो है ? में, सपाति. हिजिल्न, तथा गभीर पराक्रम-सपन्न बाहुबली कुभकर्ण, 
सब एक साथ मिलकर जायेंगे और राम पर विजय प्राप्त करेंगे । फिर तो, आपको वैदेही 
प्राप्त होगी ही । ऐसा नहीं भी हो सकता और हम राम के ड्ग्र वाणों के आघात से 
क्षत-विक्षत हो जायेंगे, तो भी हम आपके पास लौटकर आयेंगे और आपके चरणों में 
प्रणान करके यो ही कहेंगे कि हे देव, हम भयकर वानर-सेना के साथ राम लक्ष्मण का 
वव करके उन्हें खरा गये हे । तव आप बडे मोद से हमें हृदय से लगाकर हमारे प्रति 
आदर दिखाते हुए, उस समाचार को सारे नगर में प्रकट करेंगे । उस वार्त्ता को सीता सत्य 
मानेंगी और पति की आशा छोडकर आपकी वात मान लेगी । 

तब कुमकर्ज ने क्रुद होकर असुरेनद्र को देखकर कहा--इन सब भूठी बातो से 
क्या प्रयोजन है ? मेरे वाहुबल को देखिए | में अवश्य ही राम को जीत लूगा । आप 
निर्चिन्त रहिए । रावण भी बडे उत्साह से, अपने पुनर्जन्म की प्राप्ति को निकट देखकर 
बड़े आनद से बोला--मुर्के विश्वास हूँ कि तुम युद्ध में राम-लक्ष्म्ण को अवश्य जीत 
लोगे । अनुपम शक्ति तथा शौय॑ में तुम्हारी समता कर सकनेवाला कोई वीर नहीं है । 
यह सत्य है । शूल आदि श्रेष्ठ आयुधों के साथ तुम युद्ध करो ।” इस प्रकार कहते हुए 
वडी प्रीति से उसने कुमकर्ण को अनुपम रत्नाभरण आदि मेंठ किये 


७३. कुमकर्ण का युद्ध के लिए जाना 

तव रावण का भाई उन आभूषणों को पहनकर उज्ज्वल आशा से दीप्त हो उठा ॥ 
स्वर्ण-कवच घारण करके वह सब्या के मेघो से जावृत पर्वत की भाँति तथा बहु-रत्न-कलित 
मेखला घारण करके वह वासुकि से आवद्ध मदराचल के समान सुशोभित होने लगा । उत्त 
राक्षसपुगव ने रणोत्साह से भरे, अपने हाथ में तीनो लोको में अपनी भयकर दीप्ति व्याप्त 
करनेबाला, विजय-प्रदायिनी शिव के शूल से भी सुदर, अपनी नोक से निकलनेवाली 
ज्वालानो के द्वारा अग्निकगष विखेरनेवाला, सदा पूजित, रत्त-प्रभा से भासमान तथा शबत्रु- 
वीरो के रक्त से रजित अनुपम शूल घारण किया । उसके पदचात्‌ _उसने अपने भाई को 
प्रणाम किया और उसके आश्वीर्वाद प्राप्त करके, उस सभा-मंडप से अपने कार्य में तत्पर हों 
अत्यत वेग से यो चल पडा, मानो उसके प्राण उससे यह कह रहे हो कि हे कुमकरणे, 
इंस दुखद शरीर में हम रहना नही चाहते, शीघ्र इसे युद्ध-भूमि में त्याग दो, चलो, और 
उसे जैसे खीचे लिये जा रहे हो । तब राक्षस-वीरों का समूह भी उसके पीछे-पीछे युद्ध के लिए 
निकल पड़ा । वें सव घोडो पर, गजो पर, रथो पर, सिंहो पर चढ़कर काजल के परववतो 
के सभान सुशोभित होते हुए, अपने विशाल दष्ट्रो की दीप्ति चारो ओर फैलाते हुए, इस 
प्रकार जा रहे थे, मानो क्रुरता ने ही एक स्थान पर एकत्रित हो पिंड-रूप धारण कर लिया हो 


ख्द्धकोंड ३४ 


तथा झौयें स्वय रूप घारण करके चल रहा हो । युद्ध करना ही एकमात्र लक्ष्य 
बनाकर, बडे गवे से भूमते हुए, परिघ, भाले, गदा, कोदड, करवाल, मूसल, मुंदूगर, परशु, 
चक्र आदि आयुधो से सज्जित होकर पदाति-सेना उदृण्ड गति से चलने लगी । 

इस प्रकार की सेना से युक्त हो, दर्प से भरे हुए कुभकर्ण युद्ध के लिए रचाना हुआ, 
तो नगर की स्त्रियों ने उस पर पुष्पन्वर्षा की, उसके ऊपर चद्र-मडल-समान छठत्र 
शोभायमान होने लगे और चंद्रमुखी स्त्रियाँ चामर डुलानें लगी । उस समय घोडो की 
हिनहिनाहट, हाथियों की' चिघाड, रथों का विपुल रव, निसानो की घोर ध्वनि, पटह, भेरी, 
शंख तथा नगाडो का भीपण रव एवं घटा, मृदग और डको के विपुल नाद की सम्मिलित 
ध्वनि से पृथ्वी विदोणं-प्ती होने लगी, समुद्र आलोडित हुए, दिल्लाएँ फट गई, आकाश 
काँप उठा, दिग्गज घेंस गये, सभी जगत्‌ श्रस्त हुए और पर्वत टूटकर गिरने लगे । उस 
समय काले-काले बादल ऐसे घोर गर्जत करते हुए विजलियाँ गिराने लगे, मानो वे राघव 
के अनुचर बनकर आये हो और कुभकर्ण को डाटकर कह रहे हो--हे अत्याचारी दुष्ट 
दानव, तुमने ससार को जो दुख दिया था, उसका फल अब भोगो | तारे दूटकर पृथ्वी 
पर ऐसे गिरने लगे, मानो कह रहे हो--हम इस बात के साक्षी हैँ कि अत्यधिक दहाड़ते हुए 
इठलानेवाले इस राक्षस का अग-भग सुग्रीव ये किया था और वह राघव के 
हाथो से हत होनेवाला है ।” प्रतिकूल पवन ऐसा चलने लगा, मानों वह अपने पूर्ववर का 
प्रतिशोध लेने के लिए राम की आज्ञा से वेग से चल रहा हो । पृथ्वी' इस प्रकार कपित 
होने लगी, मानो वह भयभीत हो रही हो कि जब इस अधम राक्षस को राम मार डालेंगे, 
तब मुझ पर गिरेगा, उस समय न जाने मुझे कितनी पीडा होगी। खग ऐसे मेंडराने लगे, 
मानो कह रहे हो--हे नीच राक्षस, हमें पक्षपाती ( पखो से उडनेवाले ) मत समझो, 
तुम राघव के खग्रो से (वाणों से ) अवधब्य मरोगे । किन्तु इन सबकी उपेक्षा 
करते हुए, दुगुने साहस तथा उत्साह के साथ, अपनी कुद्ध दृष्टियों से ही. वानर-समूह को 
भस्मीभूत कर देने का सकल्प करके आनेवाले उस अनुपम वीर ने दुर्ग के बाहर रहने- 
वाले कपि-समूह को देखा । कपियों ने भी उस कुभकर्ण को देखा और प्रचड वायु के 
आघात से भागनेवाले मेघो के सभान जहाँ-तहाँ भागने लगे । कुमकर्ण ने शीघ्र दुर्ग के 
बाहर निकलकर सिंह-गर्जन किया। उस दहाड को सुनकर सभी वानर मूच्छित होकर गिर 
पडे, समुद्र आलोडित हुआ और भूमि काँपने लगी तथा देवताओं के मन में भय प्रवेश 
कर गया ॥ 


७४ वानर-कुसकर्ण का युद्ध 
कुछ ही समय के पश्चात्‌ वानर-वीर सचेत हो गये और यम-सदुश आकारवाले 
उस कुभकर्ण से भिड गये। वे सिंह-गर्जन करते हुए, वृक्षों, पर्वतो और श्टगों को फेंकने लगे । 
दानव-सेना भी बेड़े वेग और तत्परता से उनसे जूक गई। जैसे प्रलयकाल में समुद्र आपस 
में भिड जाते हूँ, वैसे ही दोनो सेनाएँ आपस में भिड गई । राक्षसों ने रथ पर आरूढ़ 
होकर झत्रुओं के शरीरो, हद्धडियो, जाँघों तथा पसलियों को चूर-चूर कर दिया, रथ के 
अंश्वो से, उनकी आँवें कढ़, सिर आदि कुचलवा दिये और दिशाओं को भेदनेवाले अपने 


डे७२ एगनाथ रएयायण 


इगों से वानरों के गरीरो के खड-खइ कर दिये । इससे संतुप्ट न होकर उन्हीते अग्रन्ने 
तीक्ष्य वाणो से पृथ्वी तथा आकाश को ढक दिया और इत्त प्रकार बड़ी अग्रकर रीति से 
वानरों का सहार किया । वानरो ने भी रथों पर कूदकर अपने पदाघातों से उनको पीछे 
की ओर ढकेल दिया, उनका ज़ूआ पकड़कर पृथ्वी पर गिरा दिया और उन्हें चूर-चूर करके 
दूर फेंक दिया; तीत्र वेंग से सारथियों पर कूदकर, अपने पैरो से उन्हें कुचल दिया, - उन्हें 
पृथ्वी की ओर घसीटकर उनके सिर काटकर फेंक दिये और वड़ी तीव्र गति से रप्रो पड 
वकादकर राक्षस-वीरो को विविध रीतियो से मारने लगे । यह देखकर राक्षस अत्यधिक ;रोष 
से बानरों को घेरकर अपने मदमत्त हाथियो को उन पर चलाकर, उनकी सूडो से वानसे 
को नीचे पटकवाते थे और उत्तवों कपाल तथा भेजा को हाथियों के पैरो के नीचे कुचलवाकर 
मिट॒ठी में मिला देते थे । गजो पर आहझूढ राक्षत-सैनिक श्रयंकर वाण चलाकर वानरो को 
खड-खड करके नीचे गिरा देते थे । तब कपि भी क्रोधोन्मत्त होकर हाथियों के दाँतो को 
पकड़कर, उनको रूक्फोर कर, उनके गड-स्थलो पर पदाधात करके उन्हें फोड देते थे 4 
फिर, उन हाथियों को ढठाँगें पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर ऐसे पटक देते कि उनका खत, मास 
और हूहियाँ एक साथ मिलकर एक लोवा वत्त जाता । उसके उपरान्त वें गजो पर आड़ 
राक्षसों पर अत्यत रौद्ग गति से आक्रमण करके, उनके घन॒प, हाथ, सिर, घड, कवच आाद्रि 
नीचे गिराकर उन्हें मार डालते । अश्वारोही राक्षस-सैनिक एक साथ मिलकर, डीग हाँकतें 
हुए अइ्बो को वानरों पर दोडाकर उन पर कई प्रकार से द्र-वर्षा करते और अपने पैते 
खड्गो से भत्रु-मैनिको के खड़यो को काट देते थे । वानर भी कुद्ध होकर घोड़ो के पैर 
या पूछ पकडकर या तो चारो दिशाओ में उछालकर फेंक देते थे, या आकाण की ओर 
उछान देते थे, या पृथ्वी पर पठक देते थे या चीर डालते थे, या पदाधातो से चूस्चूर 


किक. 


कर डालते थे। फिर, अश्वारोहियो को बडे साहस के साथ पृथ्वी. पर पटककर मार 
डालते थे । तब पदचर राक्षस बड़े दर्प के साथ आँखों से अग्निनवर्पा करते हुए उहृण्ड 
गति से वानरों पर वाण चंलाने लगे | वे भालो से चुभोते थे, वरछियो से भोकते थे, 
पैने खड्गो से काटठते थे, मुदूगरों से चर-चर करते थे और अन्य अस्त्रो से भयकर 
प्रहार करके उनका सहार करते थे । वानर भी उन पदचर सैनिकों पर टूट प्रडते और 
उनके विविध अस्त्रो को तोड देते थे | वे राक्षसों को चरणों तथा हथेलियो से मारकर 
उनके कवचो को फाड़ देते थे, दोनो हाथो से दो राक्षसों को पकड़कर उन्हें एक दुसरे से 
टकराकर नीचे गिरा देंते थे, उनके शिरों तथा घडो को काट देते थे और इम्न प्रकार वें 
असर्य राक्षसों को मार डालते थे ।॥ 


इस प्रकार, दोनो सेनाओ में जब घोर युद्ध चलने लगा, तब युद्धनभूमि राक्षसों की 
मृत्यु-देवता के क्रीडा-सरोवर के समान भयकर दीखने लगी । उसमें रक्त जल की भाँति, 
मास-पेशियाँ विकसित लाल कमल के समान, मुख कमल के जैसे, जेत्र कुमुदो की प्रक्नित की 
भाँति, आँतें मृणगालो की भाँति, जमा हुआ भेजा फेव के समान, विपुल्न केश-समूह अमरो 
के समह को भाँति, असख्य डास्त्र लहरों की भाँति, चामर-समृह हसो की नाई और घूलि 


पसग की मांति दीखने लगी । सुर तथा खेचर बहुत ही आनदित द्ीखने लगे । युद्ध के 


- झुद्धकाँड ३9३ 


समय जब कपिन्सैनिक सक्षसों के प्रहारों से अत्यधिक दुखी होते ०, तब उनके 
नायक अत्यधिक क्रोध से राक्षसों पर पर्वतों मौर वृक्षों की ऐसी अविरत वर्षा करते कि 
दानव घैयें खोकर कुमकर्ण की भाड़ ' में जाकर घगरण लेते । तव कुमकर्ण ने उन 
दैत्य_वीरो को भाइवस्त करके सिहन्नाद करते हुए, घैर्य बेंधाया और कहा कि 
भागना मत, भागना मत ।” उसके पहचात्‌ वह (शत्रुओं पर) आक्रमण करते हुए आनेवाले 
वानरों को अपनी कुद्ध दृष्टियो से ही' मार डालनेवाले की भाँति अपना शूल लेकर, दहाहते 
हुए, उन पर टूट पडता । रावण का भाई,वह राक्षस-वीर कुंभकर्ण, कपि-समूह के भाग्य- 
निर्णायक के समाव अथवा कुंद्ध होकर आनेवाले यम के समान उन बाचरों को मारने लगा। 
उस ऋर कुृभकर्ण के समक्ष टिकना असभव हो गया | कुछ वानर मूच्छिंत हो पृथ्वी पर गिर पढे, 
कुछ रक्त उगलने लगे, कुछ भयभीत हो सेतु की दिशा में भागने लगे और कुछ 
ववंडर की भाँति आकाश की ओर उडने लगे । 
वानरो को इस प्रकार भागते हुए देखकर अगद ने कऋद्ध होकर कहा--हे वानरो, 
पैये तजकर इस प्रकार क्यो भाग रहे हो ? अपने प्रभु के प्रति निप्ठा एवं अपना ओऔन्नत्य 
छोडकर भागना क्या तुम्हारे लिए उचित हैँ ? तुम महानू्‌ वश में जन्म लिये हुए, श्रेप्ठ 
वानर ही । ऐसे तुम इस प्रकार साधारण जीवों की भाँति भाग सकते हो ? रामचद्र के 
समण्ष युद्ध सें यदि तुम मारें जाओगे, तो तुम्हें सुन्दर स्व का राज्य मिल जायगा या यदि तुम 
विजय प्राप्त करोगे, तो यज्ञ प्राप्त करोगे । इसलिए तुम लौटो, भागों नहीं । ऐसे उपदेश 
देते हुए अगद ने उनमें उत्साह का सचार किया और सभी वानरों को फिर लौटा लाया। 
अगद के उत्साहवद्धक उपदेशों को सुनकर वे कहने लगे--हम राम के लिए अपने प्राणो 
की बलि देंगे, उनके प्राणों के आगे हमारे प्राणो का मूल्य ही क्‍या है ?” फिर, उन्होने 
पर्वतों को ले आकर, गर्जन करते हुए पर्वत के समान कुभकर्ण के विश्ञाल वक्ष पर फेंका, 
तो उक्षतें उन पर्वतो को देखते-देखते अंपने शूल से चूर-चूर कर दिया । इससे संतुप्ट न 
होकर' उसने रौद्र रूप घारण कर गदा हाथ में ली और उसे तेजी से घुमाकर वानरो 
पर ऐसा प्रहार किया कि दस करोड, सतहृत्तर लाख, तीस हजार छह सौ वानर हुकार 
करते हुए पृथ्वी पर मूच्छित'होकर गिर पडे। फिर, वह अपने हाथो से असख्य वानरों को 
पकड़कर बडी क्रुरता से यो निगलने लगा, जैसे गरुड़ पक्षी जल्दी-जल्दी सर्यों को निगल 
जाता है| इस प्रकार, उसने देंखते-देखते अस्सी नाख, वीस सहस्न, छह सौ वानरों को निगल 
लिया । इसके पश्चात्‌ भी वह नर तथा वानर-भक्षक वहाँ से हटा नहीं, किन्तु उसी युद्ध 
भूमि में बड़ें दप के साथ भूमता रहा । उस समय उसके नथुनों तथा कर्ण-पुटो से वानर 
वाहर निकलने लगे ' किन्तु वह उन्हें तुरत पकंडकर मसल देता और उनका लोबा बनाकर 
चेया जाता । जो लोग उसके डाढ से छूटकर पृथ्वी पर गिर जाते, उन्हें पैरो से 
रौंदकर चूर-चूर कर देता । इतने में उसके गदा-प्रहार मे आहत हो मृच्छित पडे हुए वानर 
पचेत हुए । वे भयंकर सिहनाद करते हुए पर्वतो तथा वृक्षों को ले जाकर बडे दर्प के साथ 
उस राक्षस के समक्ष खड़े हुए । कोश से जलते हुए ह्विविद ने एक विशज्ञाल पर्वत को उस 
राक्षस के वल्ल'स्थल को विदीर्ण करने के निमित्त फेंका । उसके लगते ही कुभकर्ण 
उछलकर गिर पडा और एक बडी राक्षस-सेना उसके नीचे कुचलकर मर गई। 


३४४ रंगनायथ रायायर 
७५ कुमकर्ण ओर हनुमान्‌ का युद्ध 


- तव हनमान्‌ अत्यंत क्रोव से आँखों से अग्नि वरसातें हुए, पर्वतो तथा वृक्षों को 
को उखाडकर उस राक्षस पर गिराने लगा; किन्तु कुभकर्ण अपने दारुण शूल से उनको 
चूर-चूर करते हुए हनुमानू पर आक्रमण करने के निमित्त आगे वढा । तव हनुमान्‌ न एक 
महान्‌ पर्वत को उठाकर उसे कुभकर्ण पर फेंका । यह देखकर असुर भी उसकी 
प्रशसा करते हुए कहने लेंगे कि यह अनुपम वली है । उस पर्वत के गिरने से 
कुमकर्ण का सारा शरीर काँप उठा और उत्तके घरीर से रक्‍त की अजख्त्र घाराए 
बहू निकली । 

उससे अत्यत दुखी होकर उस दानव-वीर ने प्रकाश एवं ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए, 
पृथ्वी को विदीण्णं करते हुए, नभ को कँपातें हुए और देवताओं को भयभीत करते हुए 
भयकर घूल को हाथ में धारण करके बड़े उल्लास के साथ उसे हनुमान्‌ पर ऐसे चलाया, 
जैसे कुमार ने क्रौचगिरि पर अपनी जक्ति चलाई थी । यह देखकर सभी वानर भय से 
व्याकुल हो गये । उसके लगते ही पवनकुमार का हृदय चरचराकर फट गया और रक्त 
की ऐसी घारा छूटी, मानों हनुमान्‌ अपना समस्त क्रोघ-रस उगल रहा हो। प्रलय-काल के 
घनघोर वादलो के गर्जन के समान हाँफतें हुए कपिशेखर हनुमान्‌ पृथ्वी पर गिर पडा । 
यह देखकर कपि-सेना काँप उठी और राक्षस हर्षित हुए । 

युद्धभूमि में अनिलकुमार की ऐसी दशा देखकर नील ने क्रोधाग्नि से जलते हुए 
उस कुंभकर्ण पर एक महापवंत से प्रहार किया । अत्यधिक वेग अपने ऊपर गिरनेवाले 
उस पर्वत पर कुृभकर्ण ने मुष्टि-चात करके उसे रोका । उसके भुष्टि-घात से वह पर्वत 
चिनगारियाँ विखेरते हुए चूर-चूर हो गया । प्रचड क्रोध से क्षुब्ध हो ऋषभ, शरभ, नील, 
गधघमादन, गवाक्ष आदि उहण्ड वलीं वानर-वीर, एक साथ भयकर गर्जन करते हुए, उश् 
कुभकर्ण पर पर्वतो तथा वृक्षों को फेंकते हुए, मुष्ठियो तथा चरणों से प्रहार करते हुए, 
नाखूनो से चीरते हुए तथा अन्य कई प्रकार से उसे दुख देने लगे | तव भी कुभकर्ण 
विचलित . नही हुआ । उसने दरभ पर ऐसा प्रचण्ड मुष्टि-धात किया कि वह पृथ्वी पर गिर- 
कर छंटपटाने लगा | उसके बाद उसने ऋषभ को पकड़कर अपने हाथो से उसे मसलकर 
एक पिंड-जैसा वना दिया । उसके पद्चात्‌ उसने अपने घुटने से वीर नील पर ऐसा प्रहार 
किया कि वह काँपकर गिर पडा और छटपटाने लगा । फिर, उसने गवाक्ष के निकट 
पहुँचकर अपनी हथेली से उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह तिलमिला उठा । उसके वाद 
उस राक्षस ने बडें क्रोध से गधमादत को अपने वारयें हाथ से ऐसा मारा कि वह गिर पड़ा। 
इस प्रकार, पाँचों वानर-्त्रीर रक्त उगलते हुए ऐसे गिर पडे, मानो रण का राग-रस उगल 
रहे हो । शत्रुओं का वध करने के कारण, बडे दर्प के साथ वह राक्षस अपना शूल घुमातें हुए 
भयकर वज् से युक्‍त इन्द्र की भाँति, अनुपम दण्ड से युक्त उहण्ड यम की माँति, युद्ध 
भूमि में भीषण -गर्जन करते हुए जहाँनतहाँ घूमने लगा । तनी हुई भौहो से यक्त उसके 
दे से अग्निन्‍कण ऐसे भरने लगे, जैसे प्रलय के समय रुद्र के शूल से स्फुलिंग विकीर्ण 

ते हे । 


ने 
से 


खद्धेकोड ३84 


७६. सुग्रीव तथा कुंभकर्ण का युद्ध 

तंव सुग्रीव ने मन-ही-मन सोचा कि मेरे युद्ध करने का थही' अवसर हैँ । फिर, 
उस अनुपम पराक्रमी ने, कुल पर्वतो को अशिपति पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले 
इन्द्र की भाँति अपना गरीर बढाया, तथा प्रचण्ड क्रोध की अग्नि से दीप्त होते हुए रुभी 
पर्वतो में श्रेष्ठ एक महान्‌ पर्वत को उठाकर बड़े वेग से, उस राक्षसेश्वर की ओर बढा, 
जिसके मुंह और शरीर वानरों के रबत से भीगकर विचित्र भद्दापन लिये हुए थे । उसक 
पास पहुँचकर सुग्रीव ने कहा--हे राक्षस क्या, तुम मुझे नहीं जानते ? में सूर्य का पुत्र हूँ 
और प्रस्यात रामचद्र का भी पूृत्र हैँ | तुम्हारे और मेरे बीच का ही युद्ध योग्य होगा। 
तुम व्यर्थ ही इन वानरों को क्यो मार रहे हो ”' 


ए्‌ 

तुम्हें वडा ही झूर कहते हे । क्‍या, कोई शूर युद्ध किये विना ही क्रोध करता है ? युद्ध 
में अपनी शरता प्रदर्शित करना ही उचित होगा । इस प्रकार डीग हाँकना तुम्हें शोभा 
नही देता।' उसके इतना कहते ही सूर्य-पुत्र ने उस राक्षस पर कुद्ध होकर लाये हुए पर्वत को 
उस पर पटक दिया । वह पर्वत उस राक्षस के विभ्ञाल वक्ष से लग गया और चूर्-चूर 
हो गया । दोनों पक्षों की सेवा इस क्र आघात को देखकर हाहाकार करने लगी । उस 
महाबली के प्रहार से राक्षस-वीर अत्ण्त समभ्रमितय हुआ । फिर भी, बडे साहस के साथ 
उसने भयकर गर्जव 'केया और सुग्रीव पर उस विख्यात शूल को चलाया, जो वीस सहस्र 
सिर की आहुति के पश्चात्‌ चदन-अक्षत से अर्थित था तथा सुरासुरो के वहन करने के लिए 
अशक्य था । तब वह शूल भयकर ज्वालाओ से प्रदीष्त होते हुए पृथ्वी, आकाश तथा 
दिशाओं तक अपनी ज़्वालाओ को फैलाते हुए, दस हजार अशनियो के समान ध्वनि करते हुए 
सूर्य-पुत्न की ओर जानें लगा । उस शूल को ऐसी भयकर गति से आते देखकर हनुमान्‌ ने 
वीच में आकर उसे इस प्रकार पकड़कर खड-खड कर दिया जैसे गरुड, घनी' विष-ज्वालाओं 
वेगे उगलनेवाले सर्पराज को पकडकर उसको नष्ट-अप्ठ कर देता है । उसके परतचात्‌ 
हनुमान्‌ ने उछलकर सिंह-गर्जन किया, तो सभी वानर उसकी प्रशसा करने लगे । झूल के 
टूटने से कुभकर्ण ऋोध से जलते हुए लका के मलयाद्वि-श्रूग को उठाकर सूर्य-युत्र पर फेंका। 
शग के सुगीव के वक्ष पर लगते ही वह हाँफतें हुए पृथ्वी पर ग्रिर पडा । 


७७, कुंमकर्ण का मुर्च्छित सुग्रीव को लंका ले जाना 
सुग्रीव के गिरते ही राक्षस बडी हर्ष की ध्वनि करने लगे । तब कुभ्कर्ण कूर रूप 
घारण किये पृथ्वी पर पड़े हुए उस महाबली सुग्रीव के निकट आया और उसे देखकर 
बोला-- समस्त वानर-सेदा के लिए तथा सूर्यकुल-तिलक राम के लिए एकमात्र अव्ति-पुज 
यही है। अत, यह कहने वी आवश्यकता नहीं है कि इसके गिरने से सभी वानर शीत्र 
मिर जायेंगे । अब मेरे भाई भी इस सुग्रीव को देख लें ।” इस प्रकार, सोचते हुए वह 
उसे उठाकर लका की ओर ऐसे ले चला, मानो कालानिल घनघोर वादल को गिराकर 


उसे अपनी गुफा में ले जा रहा हो । सभी देवता दुखी होने लगें--हाय, सुप्रीव कही 
४४ 


सुग्रीव के इन वचनों को सुनकर कुभकर्ण ने ऋुद्ध होकर कहा--हे सुग्रीव, लोग 


न रंग्नाश्थ रांयायर 


इस प्रकार वदी तो नहीं बनेंगा- ?” कुभकर्ण की शक्ति तथा पराक्रम की सभी दानव 
प्रशसा करने लगे और रविन्युत को छुडाने में असमर्थ होकर वानर हाहाकार करने लगे । 

तव हनुमानू, अबद, नील, शरभ, ऋषभ, जाव्वानू, गिरिभेदी, सुतर, केसरी, पृथु, 
हरिरोम, पावकाक्ष, हर, हिविंद, मैन्द, वेगवान्‌, गवय, गतवली, गज, दुर्देम, समुख, वालपाण, 
गवाक्ष, कुमुद, ज्ग्ेतिर्मुख, सुपेग, दविमुख, देगदर्णी, रंभ, क्रयन, बृम्र, गवमादन, तार, ऋबन, 
तपन, प्रजंघ, घोराक्, जघाल, ग्रोमुख, विमुख, पनस, सन्ना», सपाती, इन्द्रजाल, विनुत, 
सुदप्ट्रक, ब्वेत, दुर्मुख आदि भयकर आकारवाले उद्ृण्ड पराक्षमी एवं वीर वानर 
पर्वंतों तथा वृक्षों को उठाये हुए ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करनेवाले घोर गर्जन करते हुए किसी 
भी तरह से सूर्वशयुत्न को छुडाने का दृढ़ सकल्प करके उस राक्षत्त पर दृद पडने के लिए 
उत्तावले होने लगे । इतने में नीतिवान्‌ वायूपुत्र ने अपने हस्त-सक्त से उन्हें रोककर उनसे 
कहा--अद्भुत शूर सूर्य-पुत्र अभी मूर्च्छा में पडे हुए हे। जब उनकी चेतना लौट आयगी, 
तब वह महान्‌ वीर स्वय यहाँ चले जायेंगे । यदि हम हठ करके उन्हें राक्षस के हाथ से 
छु् लेंगे, दो कपिराज मन-ही-मन दुची होगे। अत, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए 
थोडी देर प्रतीक्षा करो । यदि इस गठीच में दे नहीं लौटे, तो कव्टिल रावण एवं कुभकण 
को तथा प्रचंड विक्रमी सभी राक्षसों को अपने मुप्टि-बातो से हम मार डालेंगे, स्वर्ण-दीप्तियो 
से सुशोभित होनेवाले सातों दुर्गों के साथ लका का सर्वेनाथ करके प्रलय मचा देंगे 
और सूर्य-पुत्र से मिलकर उन्हें ले आयेंगे । हनुमात्‌ के इच वचनों को सुनकर सभी कपि- 
वीर मन-ही-मत हर्षपित हुए और आकाजञ-मार्ग में बड़े वेंग से उस राक्षस के पीछे-यीछे 
चलने लगे । कुभकर्ण ने इस बात से अनभिन्न हो, अपने ढ्ग से सूर्य-पुत्र को लेकर लका 
में प्रवेश किया । 

सैव राजमार्गा राजातपुरो तथा ऊंची अट्वरालिकाओों पर से नगर की स्त्रियाँ पुप्प- 
वृष्टि करने लगी | इससे सूब॑-पुत्र सचेत हुआ और नगर-मार्ग को चारो ओर आइचर्य से 
देखा । फिर, मन-हींमत बाइचर्य तथा दुःख का अनुभव करने लगा। वह सोचने लगा-- 
हाय, इतनी देर तक मूच्छित रहकर में इस राक्षस के हाथो में फेंस गया । फिर. उसने 
अपने हाथो से उस राक्षस के कानों को पकड़कर ऐंठा और उन्हें जोर से खीचा । फिर 
उसके नथुनों के साथ नाक को काट डाला ओर दीन्न गति से आकाश की ओर उड़ गया; 
किन्तु राक्षस ने उसे छोड़ा नहीं | उसने सुग्रीव के पैर पकड़कर उसे नीचे की ओर खीच 
लिया और नीचे-पटक दिया, किन्तु सुप्रीव फिर से आकाश की ओर उड़कर मौज अपने 
प्रभु के पास पहुंच गया। स्वर्ग में सभी देवता आब्चयेचकित हुए और वानर-समह घेरकर 
उसे प्रणाम करने लगे। तव सभी वानरो के साथ सुग्रीव ने रामचन्द्र के चरणों में प्रणाम किया। 
श्रीराम ने वर्ड हर्ष से सुग्रीव को हृदय से लगा लिया । सभी कपि आनदविभोर 
हो गये । 

७5. कुंमकर्ण का वानर-सेना को तहस-नहस करना 

वह असुरेश्वर अपने नाक तथा कान के नष्ट होने से सन-ही-मन बहुत शुब्ध हुआ 

भौर सोचने लगा--अपनी वहन के अपमान से अत्यत लज्जित होकर उसका प्रतिकार 


+ 


खुद्धकीड ३४७ 


स्‍ने के उद्देश्य से अकारण ही सूर्यववशन राम से वैर ठानकर अत्यधिक श्ौ॑ के साथ 
युद्ध करनेवाले रावण के समक्ष में इस विक्ृत गरीर से कंसे जा सकूगा ? अतएव, मेरे 
लिए उचित यही हैं कि मे युद्ध-भृमि में वापस चला जाऊँ ।! यो सोचकर वह उद्ण्ड 
राक्षस अत्यत कुंद्ध होकर, र्त-सिकत्र शरीर से इस प्रकार रण-भूमि की ओर चल पडा, 
मानो लाल रग के भारवों से युक्त नीलादि आ रहा हो अथवा युगात के समय की प्रचंड 
अग्नि हो । रणभूमि में पहुँचकर वह कुद्ध राक्षत। भयकर गति से वानरो पर टूट पडा 
और विविध रीतिथो से उनका सहार करये लगा । वह कुछ वानरो के पैर पकड़कर उन्हें 
तेजी से घुमाता और पृथ्वी पर पटक-पटककर मारता । कुछ वानरो पर मुष्टि-प्रहार करता, 
तो कुछ वानरों की आँतो को तब्राहर खीच लेता । कुछ लोगो पर पद-प्रहार करता और 
जब उनका कलेजा और मास-खड़ बाहर निकल आते, तब उन्हें पैरो से कुचल देता । कभी- 
कभी वज्ञ के समान अपनी विज्ञाल बाहुओ को उठाकर शत्रुओं पर ऐसा प्रहार करता कि 
वे मिद्दों चाटने लगते। जो वानर उसके शरीर पर चढ जाते, उन्हें आश्चर्यजनक रीति 
से पकड लेता और सामने पडतेवाले राक्षस) को भी अपनी ओर खीचकर उसके कठ पर 
प्रहार करता था । इस प्रकार, उसने हुकारो तथा दहाडो के साथ वाबरो के प्राण ले-लेकर 
उनके शवों का ढेरूपा लगा दिया । फिर, वह कुछ वानरों को ऊपर उठाकर आकाश की 
ओर ऐसे उछाल देता कि युद्ध को देखने के लिए आये हुए देवताओ के विमान घवराकर 
लीट जाते । ऊपर फँफ़े हुए वानरों को नीचे गिरने के ५हले ही उनसे टकराने के लिए 
दूसरे वानरों को लक्ष्य करके फेंक देता । कुछ वानरों को पकडकर आकात में ऐसा घुमाता 
कि उनकी हड्डी-पसलो चूर-चूर हो जाती। कुछ वानरो को मार-मारकर मूच्छिंत कर देता। 
कुछ लोगो को दोनो हाथो से कसकर पकडइ लेता, फिर उन्हें जहाँ-तहाँ पटककर 
दूर पक देता । कुछ वानरों को पकड़कर लका में फेंक देता और कहता--लो तुम भी 
इन वानरों को देतों।” कुछ कपिथों को समुद्र में फेंककर कहता--जिन्‍्होने तुम्हें बाँधा था, 
उन्हें अब तुम डुबो दो। इस प्रकार, वह दानव अपना प्रताप प्रकट करते हुए उन 
वानरो को सभी दिशाओ में फेंकने लगा । पृथ्वी, आकाश तथा सभी दिज्ञाओं में, जहाँ 
देखो वहाँ, मरनेवाले, लुढकनेवालें, लोटनेवाले, अत्तेनाद करनेवाले, छटपटानेवाले, हाँफने- 
वाले गिरे हुए तथा गिरनेवाले कपि ही भरे थे । सारा रण-रग इन वानरो के आक्रदन 
से दुस्सह प्रतीत होने लगा । उस कुभकर्ण का कालातक के समान अत्युग्र तथा भीषण 
आकार देखकर, सुग्रीव दव गया, अगद भयभीत हो गया, गवाक्ष काँप उठा, गज घैंये 
खो बैठा, ऋषभ विचलित हो गया, नल शकित हुआ, नील भय-विकपित हो गया, पृथु 
विचलित हुआ, शरभ चकित हुआ, धूम्र भय-विह्लेल हुआ, पत्स थर-धर काँपने लगा, 

गधभादन डर गधा, अनिल-कुमार भी धरघराने लगा, ज्योतिर्मुस अत्यत भग्गकुल हुआ, 


जाववानू मार्ग पकड़कर भागने लगा और दोप सभी वानर अत्यत भय-विह्नल 
हो उठे । 
छू 


तब महान्‌ वली लक्ष्मण ने कुभकर्ण को प्विर से पैर तक देखकर शोध से उसके 
वक्ष पर सात शर चलाये। उसके वाद भी उन्होने कई क्र चलाये, विन्तु उस क्रूर राक्षस ने 


न 


ड्क्ष्द रंगन/थ एयायण 


लक्ष्ष्ण को उपेक्षा कर दी। अनेक कपि आपादमस्तक उसके छारीर पर रंगते हुए, 
उसकी मूछें पकड़कर कूतने हुए, छेध से अपनी पूछें उसके शरीर पर रगडते हुए, उसके 
गरीर के विविध अगो को पकडकर खीचते हुए, उसे विविध रीतियो से पीडित करने लगे। 
तव वह राक्षस अत्यधिक मूद्ध हो गया और अपने गरीर को ऐसे झटका देकर उन वानरो 
को नीचे गिरा दिया, जैसे चचल मत्तगज अपने घरीर को भटकाता है, या जल में डुबकी 
लगाने के पर्चात्‌ मस्त सूकर अयने शरीर को रठ्काकर (अपने शरीर पर लगे) जल-विंदुओ 
को नीचे गिराता है या प्रलय-काल में ब्रह्मा नक्षत्रों को टपन्टप नीचे गिरा देता हैं । 

तव राम उस कुभकर्ण को देखकर विस्मित हुए। उनकी आँखों से अगारे छूठने लगे। 
नहोने झोब-ताग के आकारवाले अपने स्वर्ण-बतुप को उठाया, अनुपम तृणीरो को 
ठ पर कसा और भयकर विक्रम से विलसित हो (युद्ध के लिए) चल पडे । ऐसी सज्जा 
से परिपूर्ण राम को युद्ध के जिए आते देखकर, युद्धारम में उत्साही तथा उद्दण्ड परात्रमी 
वानर भो अत्यधिक चचलता से प्रब॑ंत्रों, चट्टानों तथा वृक्षों को वारण किये, दुनिंवार ऋध से, 
अपनी उछल्न-कूद से, सप्त पातालो को विदीर्ण करने हुए, कूर्म को व्याकुल करने हुए, 
समुद्रो को आलोडित करते हुए, दिग्गजों को विचलित करते हुए, आकाञ्य को केँदाते हुए, 
उस राक्षस पर आक्रमण करने के लिए चल पड़े । उनके उस रणोत्साह को देखकर सुर- 


सिद्ध-प्ाध्य उनकी स्तुति करने लगे । विभीषण रास के आग्रे-आगे क्रोधासिभूत होकर अपनी 
गदा लिये हुए जाने लगा । 


७९, विभीषण-कुमकर्ण का वात्तलाप 


तव॒विभीषण को देखकर रावण का भाई (कुमकर्ण) हँसते हुए कहने लगा-- 
है विभीषण, सुनो। अपने प्रभु के समक्ष अपने पराक्रम के प्रदर्शन का यह अच्छा अवसर हूं। 
भाई के सवध का विचार करके तुम भझिक्कना मत । तुम्हारे लिए इस नरताथ का हूंदय 
ही आधार है । तुमने सूर्यवणज की कपा प्राप्त की हें, इसलिए कोई भी विपत्ति तुम्हें 
छ नहीं सकेगी । उनकी अपार दया तुम पर है ही, साथ ही तुम प्रजसनीय एवं दया- 
परिषूर्ण चित्तवाले भी हो। तुम्हारे सिवाय और कौन ऐसा सद्गुणालकृत है, जो लकाका राज्य 
कर सके ? इसलिए में नुमसे कह रहा हूँ कि तुम अपने साहस, वल, विक्रन से मेरे साथ 
मत भिडो । क्या, ब्रह्मा तथा रुद्र के लिए भी यह सभव है किवे आज मेरे सम्मुख खडे 
रह सर्के ? इसलिए हें भाई, तुम मेरे सामने से हट जाओ । तुम मरो नहीं, राफ्षतन्वश 
का उद्धार करने के लिए तुम्हारा जीवित रहना आवश्यक हैं ।' 

तब विभीषण ने अपने भाई से कहा--मेने इस भय से कि सारा दानवन-कुल 
दग्ध हो जायगा, अपने भाई से, अपनी शक्ति-भर नीति-बचन कहे, किन्तु उन्होने मेरी 
वातो को नहीं माना । इसीलिए मेने अग्नज तथा तुम्हें छोडकर श्रीराम की शरण ली 
इतना कहकर उसने मन-ही-मन दानवेशइवर की' दुर्नीति का विचार करके आंखों से अश्व॒ 
वहाते हुए अत्यत दु.ख से, जपने भाई की दशा न देख सकने के कारण वहाँ से हट गया । 

तव राघवेश्वर अपने अनुज लक्ष्मण के साथ रण के लिए उद्यत होकर उस कुभकर्णे 
को देखकर मन-ही-मन आ्राइचर्य-चकित हुए, जो सुदर मुकुट तथा आभूषण पहने हुए था, 


खद्धकांड ३8६ 


वीर-रसावेश से अभिभूत था, बडें साहस के साथ कपियों का सहार कर रहा था और 
अत्यधिक रक्त में भीगा हुआ ऐसा दीख रहा था, मानो रौद्र रस ही मूत्त होकर राक्षस के 
रूप में आ गया हो । 

तब सूर्यकुलोत्तम-राम भूपाल ने अत्यत क्रोध से अपने धनुप की प्रत्यचा का ऐंसा 
टकार किया, मानो कह रहे हो कि नारी के कारण उद्भुत अपना सारा क्रोध इस नारी 
(प्रत्यचा) के द्वारा प्रदर्शित कहूँगा और दहाडते हुए आनेवाले इस राक्षस की क्रोघारित 
को में अपनी शर्-यूप्टि से बुझा दूगा। घनुष की ध्वनि सुतकर दिग्गज ऐसे चिध्यडने लगे, 
मानों कह रहे हो कि गज-गामिनी (सीता ) अब अपने स्वाभाविक निवास को प्राप्त 
होगी । (उस घ्वनि से) लका इस प्रकार गूँज उठी, मानो कह रही' हो कि औ्लीराम का कोब 
अब लकेशवर को भस्म कर देगा । उस घ्वनि से समस्त जग बहरेसे हो गये । 


उस ध्वनि को सुनकर कुभकर्ण रोष से भरकर, बडे गर्व से अकडतें हुए राम के 
समक्ष आया । तब सूर्यवणज राम ने बड़े दर्ष के साथ उससे कहा--हे राक्षस, अब तुमहें 
पीछे हटना नहीं चाहिए। तुम चेर्थ तथा साहत् के साथ युद्ध करने के लिए ऐसे डट जाओ 
कि देवता भी तुम्हारी प्रशसा करें । ऐसा नहीं करके यदि तुम माया रचकर कही छिप 
भी जाओगे, तो भी में तुम्हें छोडगा नहीं । यदि तुम ब्रह्मा के निकट पहुँचकर उनकी 
शरण माँगोगे, तो भी ब्रह्म-्तोक मेरे सामने टिक नहीं सकेगा । यदि तुम नीलकठ की शरण 
में जाकर उनसे रक्षा करने की प्रार्थना करोगे, तो भी' रुद्र-लोक मेरे समक्ष खडा नहीं रह 
सकेगा । यदि तुम विष्णु की शरण माँगोंगे, तो विष्ण-लोक भी मेरा सामना नहीं कर सकेगा ।' 

राम के इन दर्प-पूर्ण वचनों को सुनकर कुभकर्ण अत्यधिक भयात्रात हुआ। फिर भी, 
उसने ऐसा अट्वृहात्ष किया कि वानरों के हृदय फट गये, खडें-खड़े उनके प्राण उड़ गये और 
समस्त पृथ्वी, आकाश तथा दिशाएँ विचलित हो गईं । फिर, वह अपनी युद्ध-कुशलता को 
प्रकट करते हुए, राम भूपाल को देखकर कहने लगा--/हे सूर्यकुलतिलक, विविध भायाओ को 
रचकर अत में तुम्हारे हाथ से भरनेवाला मारीच मे नहीं हूँ । तुम्हारे शर-प्रहारो से 
गिरनेवाला विराध में नहीं हूँ । युद्धनक्षेत्र में एक ही बाण से पृथ्वी पर गिरनेवाला वालि 
भी में नहीं हँ । अपने हाथ का घनुष तुम्हारे हाथ में देकर तुम्हारे द्वारा गर्बंभग करा 
लेनेवाला भृगु-पूत्र नही हे, में रावण का भाई हूँ, देवताओं का शत्रु हूँ और प्रदीप्त 
विक्रम से विलसित हूँ । हे राम, क्या, तुम मुझे नहीं जानते ? वानर-समूह के सद्य रक्त 
का पान करनेवाला में कुभकर्ण हूँ । तुमने अज्ञान ब्रह्म और इन्द्र की प्रेरणा से इस 
ससार में जन्न लिया और न जाने क्यो इस वानर-समूह के भरोसे मेरे साथ युद्ध करने 
के लिए आये हो ? राक्षसों के भयकर बाण, सनक आदि योगीन्द्रो की स्तुतियाँ नही है । 
वेग से आनेवाले भयकर शरत्र, परिचारको का चामर-समूह नहीं है । भीषण आकारवाले 
राक्षम-स॑ंनिक सुदर गीत गानेवाने तुबुर तथा नारद नहीं हैँ । मेरी जो वायु तुम पर 
चल रही है, वह पस्नो का पवन नही है। यह युद्ध-क्षेत्र है, अमृत-सागर नहीं । यह युद्ध-भूमि है, 
तुम्हारी देव-सभा नहीं हें । हे राजन, तुमने पृथ्वी पर जन्म क्यों लिया ? इस युद्ध में 

.... » तेलुगु में 'नारी' शदद के वो अर्थ हे--स्त्री और प्रत्यंचा "लेक 


३५4७ रंगनाएथ एयायर 


तुम्हें स्वर्ग का वह सुख कहाँ मिलेगा ? यह सब में तुमसे क्यो कहूँ ? हे राम, मेरी यह 
गदा तो देखो । इसी से मेने देवताओं को जीता । तुम्हारे दिव्यास्त्र कही इसकी समता 
कर सकते हे ? यदि तुम में वाहुलअल, शौर्य तथा पराक्रम है, तो गुभसे घोर युद्ध करो । 
है राजन, तुम्हारी जक्ति देखकर फिर में तुम्हारा वध करूँगा ।” 


5०, श्रीराम के द्वारा कुंमकर्ण का संहार 


तव राम ने चुद्ध होकर ऐसे सहस्नो भयकर बाण उस देवताओं के शत्रु पर चलाये, 

से बाण उत्होवे वालि पर चताये थे, किन्तु उन सव वाणशों को कुभकर्ण ऐसे पी गया, 
पे चातक पक्षों जल-बिंदुओं को पो जाता है। फिर, वह भयकर मुद्गर धुमाते हुए बड़े 
वेत से वालस्वादों को भावातें हुए आगे बढ । उतरी सासने आते हुए देखकर राम ने 
निर्भेक हो सहज ही एक अनिल-बाण चलाकर भयकर गंदा से बुकत उसका हाथ काठ 
डाना । उप्त हाथ को गिरते देखकर वानर चारों ओर बिखर गये, जो उस हाथ के गिरने 
से पहले भाव नहों पाये, वें उपके नीचे दवकर मर गये । तब बचे हुए वाम हस्त से 
उस राक्षस ने एक विद्याल वृक्ष को सहज ही उसाटकर उसे उठाकर राम की ओर बागे वढा। 
यह देख इन्द्र आदि देवता काँप उठे, किन्तु राम ने ऐस्र वाण से उस हाथ को 
भी काट डाला । वह विज्ञाल वाहु अदुभुत गति से कटकर पृथ्वी पर ऐसे गिरी कि पृथ्वी 
विदीर्ण-सी हो गई जौर असख्य वानर उसके नीचे दवकर चूर-च्ूर हो गये । इस प्रकार, 
सूयंवश-तिलक राम के घोर अरत्रो से दोनों हाथ कट जाने पर वह राक्षत्र, वज्र के 
द्वारा पख्ठ॒ कठे हुए पर्वत की भाँति भयकर हाहाकार करते हुए राम की ओर आते लगा । 
तव हाथ-ताक-कान-विहीन विक्त आकारवाले उस कुभकर्ण को देखकर राम ने सकल्प कर 
लिया कि में अब अवध्य इस नीच का वध करूँगा। फिर, उन्होने शीघ्र दो अद्वंचन्ध वाणो 
का सधान किथा और उस राक्षस के दोनों चरण ऐसे काट दिये कि समस्त जग उनकी 
प्रणसा करने लगा । चरण तथा वाहुओ के कट जाने पर भी, वह राक्षस नहीं दवा, किन्तु 

क्रोधोन्मतत हो वडवानल-चक्र की भाँति अपने मुँह को विकृत वनाकर, सूर्य को ग्रसने के 

निमित्त आनेगले रा की भाँति राम से भिड गया । तब राम ने अपने तूणीर के कठोर 

वाण उसके मुह में ऐसे भर दिये, मानो वें एक तूणीर वो वाण दूत्तरें तूणीर म॑ भरत हो 

इस प्रकार जब वाण-समूह से उस राक्षस का मह भर गया, तव उससे सिंहनाद करते नहीं बना; 

इसलिए वह विविध अपस्वरों से हुकार करते हुए अपनी' दृष्टियो से डराने-धमकानें 

लगा । तब राम ने उस देत्यनाथ के शरीर को लक्ष्य करके ऐद्रास्त् चलाया | रघुवर के 

छोड़ते ही वह वाण त्रीष्म ऋतु के मध्या ह्च-सर्य की भाँति, ब्रह्म-दण्ड की भाँति, अ्रवल प्रभजन 

की भाँति, समस्त लोकों को अपनी लाल-लाल ज्वालाओ से भरते हुए आया और कुभकंण के 

वक्ष स्थल में घुसकर पार निकल गया तथा पृथ्वी में गड़कर सभी दिशाओं को अपने 

भीषण रवसे प्रतिध्चनित करने लगा । इतने में राघवेन्द्र ने अत्यत ज्ञीघ्रता से अतक बाण 

का सधान करके चलाया । वह बाण अपनी भयावह ध्वनि से सभी दिशाओं को ग्रृजायमान 

करते हुए, ब्रह्माण्ड को कपित करते हुए, पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, समस्त भूत-राभि को 

मूच्छित करते हुए, सौ करोड़ काल-चको के एक साथ चलकर जानें की भाँति, वडवानल के 


खुद्धकांड ३4९ 
आगमन के समान, कालकूट विष ही बीण के रूप में आने के समान, दुर्वार गति के साथ 
अत्यत वेग से आया और उस राक्षस के नीलाहरि-सन दीसनेवाले सिर को काट दिया । 
वह सिर तुरत नीचे नहीं गिरा, किन्तु वह लका में वहुत ही ऊँची अट्टरालिकाओं तथा सौधो 
से टकराकर उन्हें चूर-चूर करके अत्यधिक ज्वनि करते हुए आगे निकल गया और समुद्र 
के विविध प्राणि-समूह को कुचलते हुए समुद्र में गिरकर डूब गया । उस राक्षस का अर्द्ध- 
शरीर पृथ्वी पर दस करोड वानरो को कुचलतें हुए तथा दूसरा अई॑-शरीर समुद्र के जल- 
चर समूह को चूरन्चूर करते हुए गिर पडा । उसके गिरने से जो ध्वनि हुई, उससे सभी 
समुद्र आलोडित हो उठे, पृथ्वी काँप उठी, दिशाएँ विदी्ण हुईं और लकाघधीश का हृदय 
विदीर्ण हो गया । लका में कोलाहल होने लगा, सभी जग हर्षित हुए और वानर-ीर 
आनद-सागर में डूब गये । तब देवताओं ने रविकुलाधिप रबुरामचद्र की विविश रीतियो से 
स्तुति की । रामचद्र भी कुभकर्ण की मृत्यु पर मदहास करते हुए मन-ही-मन हर्षित होने लगे 
कि यह राक्षस देवताओं तथा दिकपालो के लिए भी दुर्जय था, अब सभी लोको के 
लिए कभी किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा । राहु के प्रभाव से मुबत होकर प्रभा से 
विलसित होनेवाले सुर्यविव की भाँति रामचद्र विजयलक्ष्मी को प्राप्त करके भासमान 
होने लगे । 

इसके पश्चात्‌ राक्षस मन-ही-मन इस पराजय के कारण परितप्त होते हुए, काति- 
हीन मुखो से श्ञीत्र रावण के रुमक्ष गये और निवेदन किया--हें देव, देववाओ वा शत्रु, 
आपके भाई ने समस्त वानर-समूह को भयभीत करके भगा दिया और आकाश से पृथ्वी 
तक व्याप्त होकर कपि-समूह-ल्पी समुद्र को इस प्रकार मथ डाला, जैसे मदराचल ने क्षीर 
सागर का मथन किया था। फिर, उन्होने दुर्वार विक्रम से सारे रफ-क्षेत्र में युद्ध करते हुए, 
इन्द्रादि देवताओ में ईप्या उत्पन्न की और निदान श्रीराम की विपुल-वाणाम्नि में दग्ध 
हो गये । जब राक्षसों ने इस प्रकार रणक्षेत्र में वुककर्ण की मृत्यु का समाचार राव्ण को 
सुनाया, तव वह मूच्छित होकर पृथ्वी पर इस प्रकार गिर पडा, मानो उसका पत्तन निश्चित 
ही है । अतिकाय अत्यत शोकाकुल हुआ, देवातक धैर्य तजकर शोक करने लगा । त्रिशिर 
दिदूमूढ की भाँति पृथ्वी पर लोट गया। नरातक काठ के पुतले के समान स्तभित रह गया। 
महोदर तथा महापादव आदि राक्षस-वीर शोक-विह्लल हो भूमि पर गिर गये । 


5१. कुंभमकर्ण की मृत्यु पर रावण का शोक 

रावण ज्षीत्र ही सचेत होकर बार-बार अपने भाई का नान लेकर यो प्रलाप करने 
लगा-- है वीर, अब में राघव-वैर-सपी समुद्र को किस नौका से पार करूँगा ? मुझे 
विश्वास था कि तुम राम-लक्ष्ष्ण का रण में सहार करोगे । ऐसे समय में तुम स्वय राघव 
के प्रचण्ड शर-वक्ति की ज्वाला में भस्म हो गये ! हे निद्रालु वीर, तु+॥ सतत निद्रा-निरत 
रहनेवालें हो, आज तुम दीर्घ निद्रा (मृत्यु) से वयो अनुरखबत हुए ? अविरत अदशनि-पात 
से भी नप्ट नहीं होनेवाला तुम्हारा घरीर आज एक साधारण मानव के प्रहार से नप्ट 
हुआ ' तुम तो अपनी अनुपम शात्ति के कारण अतक (यम) को लिए अतक रिद्ध हुए थे। 
ऐसे तुम्हारे लिए आज युद्ध-क्षेत्र में रापघव अतक कंसे सिद्ध हुआ ? अद्धि, विद्रावण आदि 


३4२ श्यनाथ रयायण 


देवता इस भय से पीडित होकर नोतें तक नहीं थे कि तुन नींद से जगकर रौद्र रूप 
धारण करके करता के साश् उनका सर्वनाण् कर दोगे | तुम युद्ध में गिर गये, अब, भला, देवता 
भेरी परवाह क्‍यों करने लगे ? सारे वश्य की रक्षा करने के उद्देग्य से भाई विभीषण नें, 
हुठ करके वास्यार मूझे हित-वचन कहे, किन्तु मेने उसकी ढातें नहीं सुनी और पद- 
प्रहार करके उसे नगर से निर्वासित कर दिया । वया, वह पाप मुझे यो ही छोड देवा ? 
तुम॒ तथा अन्य वृद्धिमान्‌ लोगो ने सतत जो नीतिपूर्ण वचन कहें, उन्हें मेने नहीं माना, 
और तुम्हें खो वेछठा । अब जिस विजय की मैने आजा की थी, वह मुझे क्यों मिलेगी ” 
युद्धओेत्र में तुम मेरे दाहिने कधें की तरह रहे, किन्तु आज युद्ध में तुम अपने महान्‌ वाहु- 
वल को खोकर नप्ट हो गये । अब मेरा सहारा कौन होगा ?' 

इस प्रकार, रावण वार-वार कुभकर्ण का स्मरण करते हुए दीर्घ निष्बास छोटते 
हुए, परिताप-हूवी वडवानल, उमड़कर टपकनेबवाली लार-रूपी फेन, अजस्न अश्रु-हपी बाढ, 
अनत दु ख-हपी तरणगें, रुदन-हूपी बोप, भय-रूप्री सचलन से युक्त शोकन्समुद्र में ड्वकर 
व्याकुल पडा रहा | तव रावण को देखकर त्रिशिर उसे थेये देते हुए बोला--हे देव, आप 
साधारण लोगो की भाँति अपना बैय खोकर ऐसे क्‍यों शोक करते हे ? ब्रह्मा से प्राप्त वर की 
महान्‌ शक्ति रखते हुए, सतत मत्र-पूत अस्त्र तथा वज्अ-कबंच से सपन्न होते हुए, श्रेप्ठतम 
गतिणील उज्ज्वल रथ के रहते हुए, आप क्यो ऐसे शोक करते हूँ ? मेरी ओर देखिए। 
हे अमरो के छत्रु, कौन हैँ जो आपका सामना कर सके ? आप ज्ीक्ष चलकर अपने 
अनुपम पराक्रम से राघव का सहार कीजिए। अब जोक तजिए । में अभी जाता हूँ और 
घोर युद्धनक्षेत्र में अपने अनुपम पराक्रम एवं प्रताप से वानरों को ऐसे काट डालता हूँ, जेसे 
गरुड़ साँपों को काठ डालता है । जैसे इच्ध ने वृत्रासुर का सहार किया था, और जैसे 
शिव ने अधकासुर का नाश किया था, वैसे ही में भी युद्ध में राम का सहार करूँगा । मुझे 
जाज्ञा दीजिए, में अभी जाता हैं ॥' 

तव अतिकाय ने रावण को देखकर कहा--हे दानवेन्द्र, आप इतना शोक वयो 
करते हे ? में दैत्य-सेना के साथ जाऊँगा, मुझे आज्ञा दीजिए । जिस प्रकार दावानल 
काननो को जलाता है, वैसे ही, में अपने असख्य वाणों का प्रहार करके कपियो के साथ, 
राम-लक्ष्मण का वव करूँगा ।/ तव नरात्तक तथा महावली देवातक दोनो ने मिलकर कहा- 
हम इसी क्षण जाकर राम-लक्ष्मण तया वानरों का वब करते हे। इनकी वातें सुनकर 
देत्यावीज ने जोक छोड दिया और अपने पुत्रों के साथ मोदमग्न हो रहने लगा, जैसे 
देवताओं के साथ इन्द्र रहता हैं । 

इसके पब्चात्‌ रावण ने बड़े हर्ष से अपने चारो पुत्रो को आदेश दिया--राम- 
लक्ष्मण को तथा वानर-मेना को अपने भयकर अस्त्रों की सहायता से मारकर आओ । 

फिर, उसने अपने भाई महोदर तथा महापार्व को भी युद्ध करने के लिए भेजा । 
5२, अतिकाय तथा महोदर आदि राक्षसों की युद्ध-यात्रा 

ब्रे छहो राक्षस ब्रह्माण्ड को विदीर्ग करनेवाले गर्जन करते हुए इस प्रकार युद्ध 

के लिए निकल एण्ड, मानो (काम-क्रोव मादि) अरि-पड्वर्ग यह सोचकर राम से भिडने के लिए 


खुद्धकांड ३५३ 


ओगे-आगे जा रहा हो कि हमारे कारण ही' यह मनुजाशन (रावण) सीता के 
निमित्त श्रीराम का सामना कर रहा है । अस्ताद्वि पर आरूढ सूर्य की भाँति महोदर शरत्‌- 
काल के मेघ की समता करनेवाले तथा ऐरावत के अंश से युक्त सुदर्शत नामक हाथी पर 
बैठकर निकला । निशित आयुधो से प्रकाशित होनेवाला श्ीघत्रमामी रथ, जिसमें बलिष्ठ तथा 
चचल अदव जुते हुए थे और जो सूर्य के समान भासमान था, उस पर, इन्द्रचाप के क्षमान 
दीखनेवाले घनुष घारण किये हुए, नील मेघ के समान तिशिर निकला । तब धनुर्वेद का 
पडित अतिकाय, अत्यत तेजस्वी' शर, चाप, खड़ग तथा विविध शस्त्रास्त्रो से युक्त तथा 
सूर्य-सम प्रकाश से भासमान, स्वर्ण-रथ पर आरूढ होकर रवाना हुआ । विविध आभूषणों 
से यूक्‍त्त हो कनक पर्वत को समान दीप्त होते हुए नरातक, देवताओं के अछव का स्मरण 
दिलानेवाले विविध आभूषणों से अलकृत श्रेष्ठ अर्व पर आरूढ हो, प्रविमल तेज से 
विलसित हो, बलिष्ठ बाहुओ में शवित धारण किये हुए, शक्त्तिपाणि (कुमार) की भाँति 
निकल पड़ा । दीप्त गदा धारण करके देवातक, विष्णु के सभान सुशोभित होते हुए रवाना 
हुआ । महापारर्व विज्ञाल' गदा लिये हुए गुह्यकेश्वर (कुबेर) के समान निकला। कालचक्रो 
के वेग से असख्य रथ भी साथ निकल पड़े । पर्वतो की' भाँति दीखनेवाले करोडो श्रेप्ठ 
मदमत्त हाथी अपने उद्दड दण्डो से (सूंडो से) सुशोभित होते हुए भूडो में चलने लगे। 
अपनी हिनहिनाहट की गभीर ध्वनि को चारो ओर प्रतिध्वनित करते हुए अश्व चलने लगे। 
यम-किकरो के सदुश दीखनेवाले पदचर-सैनिक भयकर गति से चलने लगे । 


ऐसी अनुपम चतुरगिणी सेना को मध्य भाग में प्रलय-काल के सूर्यों की भाँति, प्रकाइ- 
मान होनेवाले छहो दैत्य-वीर, दीखने लगे । उनके इवेत छत्र शरत्काल के मेघ की भाँति 
शोभायमान होने लगे । हम अवेश्य विजय प्राप्त करेंगे या युद्ध में प्राण-त्याग करेंगे, किन्तु 
रण का उत्साह नही छोडेंगे, वे ऐसी विविध प्रतिज्ञाएँ करत हुए, एक दूसरे को पुकारते 
हुए युद्ध के लिए रवाना हुए । उनके विचित्र सिहनाद, रथ-घोष, अश्वों की हिंनहिनाहट, 
ग़जो की' चिंघाड, सैनिकों के अत्यत भयकर पदाघात, अनुपम ध्वजाओ का किंकिती-रव, 
पटह, भेरी तथा शखों की भयावह ध्वनि तथा निसान-तुरहियो का ध्ोर नाद आदि से सभस्त 
दिशाएँ गू'जनें लगी; आकाश हिल उठा, नक्षत्र गिरने लगे, वासुकि ने करवट ली, मेस- 
पर्वत आमूल हिल गया, पृथ्वी' कपित हुई और दुर्वेह भार से दिग्गज विचलित हुए । 
इस प्रकार, जब राक्षस-पेना दुर्ग से बाहर निकली, तव वानर-वीर, भूमि तथा 
आकाश को चीरनेवाली भयकर ध्वनियाँ तथा भयकर हुकार करते हुए बड़े उत्साह से 
पर्वेतों तथा वृक्षों को राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । दैत्यो ने वानरो पर अविरत गति से 
दर-वृष्टि आरभ कर दी। वानरो द्वारा असुरो पर आक्रमण करने के पहले ही असुर वानरो 
पर आक्रमण कर देते और उनका सर्वेनाश करने लगते । वे एक दूसरे से जूभतें, एक दूसरे 
को गिराते, और असुरो के हाथो के अस्त्र छीनकर उन्हें तोड डालते । तव क्रूर राक्षस 
कद होकर वानरों के हाथो के पर्वतो तथा वृक्षों को तोड डालते । राक्षस कपियो के पैर 
पकडकर उन्हें भयकर गति से नीचे पटक देते, तो वानर तुरन्त उनको पैर पकड़कर 
उन्हें पृथ्वी पर गिरा देते । इस प्रकार, घोर युद्ध करते हुए वानरों तथा राक्षसो के 
है 


8498 रैंगनाथ एयायण 


अग जर्जर हों गये और वे रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिरकर मूच्छित हो गये। 
फिर, वानर ज्ञीत्र ही सचेत होकर एक राक्षस को उठाकर दुसरे राक्षत पर प्रहार करके 
गिराने लगे । इसी प्रकार, ते एक हाथी से दूसरे हाथी को, एक घोड़े से दूसरे घोड़े को, 
एक रव से दूसरे रव को, फिर रथ से हाथी को, हाथी से घोड़े को, और घोड़े से राक्षस- 
सैनिक को, मारनमारकर गिराने लगे । इस प्रकार, जब वानर सिंहनाद कैरतें हुए अपनी 
अनुपम जक्ति का प्रदंशन करके भयकर गति से असुरो का सहार करने लगे, तब राक्षस-वीर 
भी ओधवोन्मत्त होकर वानरों पर दढ्ुट पड़े । उन्होंने वानरों पर बाण चलाये, उन्हें चक्रो से 
मारा, गदाओं का प्रहार किया, खड़गो से काठा, वछियो को मास में तथा चूलो को 
पसलियो में चुभोया और विविव रीतियो से उनको पीड़ित किया । फिर भी, वानरो ने वैं्ये 
नहीं छोड़ा । वे और भी कुद्ध होकर वडी भयकर गति से पर्वत-श्रंगों तथा तरु-काडो से 
राक्षसों पर प्रहार करने लगे ) कित्तने ही राक्षस जाहत हो गिरने लगे, कुछ भागने लगे, 
कुछ वही लुढकने लगे, कुछ रक्त उगलने लगे, कुछ भूमि पर लोटने लगे, सिर कट जाने 
से कुछ के धड़-मात्र कूलनें लगें और कुछ भरकर अपने अझत्रुओ को भूलने लगे । कही 
अश्वारोही सैनिक के गिर जानें पर भी उसकी उपेक्षा करते हुए घोडें घोर रूप से हिन- 
हिनाते थे; कुछ घोड़े ऐसे दोडते थे कि उनकी भूलें फट जाती थीं, कुछ घोडे ऐसे भागते थे 
कि दिशाएँ भी चकराने लगती, कुछ घोड़ो के अगों की सधियाँ उखड जाने से गिरकर 
मर जाते थे, कुछ गिरकर छठपटाते थे, कुछ अग-हीन होकर मुह खोले गिर जाते थे 
और कुछ तो ऐसे जर्जर हो जाते थे कि उनका आकार ही मालूम नही होता था । सूडो 
के कट जाने से कई हाथी काँपते थे, कई हाथियों के दाँत टूट गये थे, कुछ हाथी लका 
की ओर भाग रहेथे, तो कुछ वेग से चक्‍कर काट रहें थे। कुछ हाथी पर्वतों की भाँति 
गिर जाते थे, कुछ खड-खड़ होकर गिरते थे । कुछ हाथी मदजल वहाते हुए नष्ट हो 
जाते थे, तो कुछ कुचले जाने से मिट्टी में मिल जाते थे । युद्ध-भूमि में जहाँ देखो, वहाँ 
रथिक, सारथी, तथा अब्वों से रहित रथ, पृथ्वी पर गिरनेवाले रथ, एक ओर उलठकर 
गिरे हुए खंडित रथ, पूरे उलटकर गिरे हुए रथ, जोड़ चटककर टूटे हुए रथ, रस्सो के 
दूट जाने से अस्त-व्यस्त हुए तथा चूर-चूर बने हुए रथ, प्रचुर मात्रा में दिखाई पड़ 
रहे थे । सुर-खेचर आदि का समृह इसे अत्यत अद्भुत दृश्य मानकर वानरों की प्रशसा 
करने लगे । 
तव नरातक ने अमित क्रोब से गर्जन करते हुए अपना अइव वेग से दौडाया और 
असुरो को थैयये देते हुए कहने लगा--भागो मत, भागों मत ।” फिर, वह बडे दर्प के साथ 
वानरों पर आक्रमण करने और एक ही क्षण में एक साथ सात सौ वानरो को मारकर गिराने 
लगा । जिस मार्ग से वह जाता था, उस मार्ग में रहनेवाले वानर गिर जाते थे, और 
वह मार्ग उसी मार्ग के जैसा दीखने लगता था, जिस पर इन्द्र अपने अदभत झौर्य का 
प्रदर्शन तथा पर्वतों का खडन करते हुए गया था । जो कोई वानर क्रोध में आकर 
अपने मन में उसका वध करने का सकत्प मात्र करता था, उसके पहले ही वह उसका 
संद्ाार कर देता था, मानों उसने उस वानर के अतरग में पैठकर उसके मन में उत्पन्न 


रुद्धकोड ३१५५ | 


होनेवाली बात जान ली हो । जो कोई कपि उसका नाथ करने के निमित्त किसी पर्वत 
को उखाइने की चेप्टा करता, उसके पूर्व ही वह अत्यधिक क्रोध से उसका नाथ कर देता था । 
जो कोई कपषि उसका वध करने के लिए कोई वृक्ष उखाडने का प्रयत्वत करता, उसके 
पहले ही वह उसका वध कर देता । इतना ही नही, वह अपने अइतो को वानरों के समूह 
पर चलाकर कितने ही वानरों को कुचल दिया, जिससे उनकी आँतें, और मांस निकल पढ़े | 
वह उन्हें एक दूसरे से ऐसा टकरा देता था कि उनका वक्ष फट जाता और हड्डियाँ चूर- 
चूर हो जाती । इस प्रकार, उसने भयकर क्रोध से प्रलय-कालानल की भाँति सारे युद्धक्षेत्र 
में व्याप्त होकर वानर-सेना-रूपी वन को कई बार नष्ट कर दिया । वानर उसके शौर्य 
तथा उसकी शक्ति का सामना नहीं कर सकने के कारण चकित तथा व्याकुल-से हो रहे । 
सभी देवता विचलित हुए । अत्यधिक त्रस्त वानर-सेना को क्लेश पहुँचानेवाले मरातक 
को देखकर कपिराज का पुत्र अगद क्रोध में आकर वानर-सेना से यो बाहर निकल पडा, 
जैसे बादलो के समूह को चीरकर सूर्य बाहर निकलता है । 
5३. अंगद तथा नरांतक का द्वद्वनयुद्ध 

उसने नरातक को देखकर कहा--ह नरातक, इतनी क्रूरता के साथ तुम इन वानरों 
का सहार क्यो कर रहे हो ? ऐसा करने से क्‍या तुम शूर वन जाओोगे ? यदि सचमुच 
तुम शूर हो, तो मेरे साथ यूद्ध करो।' तब नरातक ने हँसकर कहा--हे वनचर, मेरे 
सामने तुम्हारी हस्ती ही क्‍या है ” मेने सभी दिक्‍पालो का दर्प-दलन किया हैं । समस्त 
देवताओ को पीडित किया है । मेरे जैसे पराक्रमी का सामना, क्या, तुम कर सकोगे ? 
में तुम्हारी दोनो जाँधों को चीरकर फेंक दूगा । तुम अभी नादान दुधम्‌हे वच्चे हो, 
किन्तु प्रतापी योद्याओ के साथ युद्ध करता चाहते हो । अभी तुम मेरी शक्ति देख लोगे ।! 
तब अगद ने हँसकर कहा--हे राक्षस, दशकठ का दर्पं चूर करने के पर्चात्‌ खर के पूत्र 
का सहार करके जब में जाने लगा, तब व्या, तुमने मुझे नहीं देखा था ?! द 

इतना कहते ही ब्वह राक्षत काल-सर्प की भाँति फ़ुफकारते हुए अगद के निकट आ 
पहुँचा और अत्यधिक स्फुलियगों को विकीर्ण करनेवाली अपनी शक्ति से अगद पर प्रहार 
किया । गरुड के म्‌ह का स्पशश होते ही गिरनेवाले काले नाग की भाँति वह शक्ति अगद 
के वज्ञ-सम वक्ष का स्पर्श करते ही खड-खड हो गई । अपने वज्ञायुध से पर्वेतराज को 
दबानेवाले इन्ध की भांति वालि-पुत्र ने अपनी हथेली से उसके घोड़े पर ऐसा दुर्भर प्रहार 
किया कि उसका मस्तक फूट गया और वह अश्व मुह खोले, जीभ वाहर किये, पृथ्वी पर 
गिर पड़ा और छठपटाकर मर गया । अदव के गिरते ही नरातक क्रोधानल से आँखें लाल 
किये हुए अपनी मुष्ठि से अगद के सिर पर प्रहार किया और उसे मूच्छित कर दिया, 
किन्तु अगद णीघ्र ही सचेत हो गया और चिल्लाया कि रे नरातक, तुम्हारा ऐसा साहस ? 
फिर, उसने वज्ञ-सम अपनी मुष्टि से श्रेष्ठ पर्वेत के समात्न दीखनेवाले उसके वक्ष पर प्रहार 
किया । चोट लगते ही वह रक्‍त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पडा और उसका कपाल 
फूटकर चूर-चूर हो गया । इस प्रकार, नरातक ने उस घोर रफ-क्षेत्र में गिरकर अपने 
प्राण छोड़ दिये । आकाश से देवता और पृथ्वी पर कपि हर्ष की ध्वनि करने लगे । 


३५६ रंगनाथ एस्यायर 


58 देवांतक तथा त्रिशिर का अंगद पर आक्रमण करना 

दानवेश्वर के पुत्र की यह दशा देखकर महोदर ने अपने भयकर गज को आगे 
बढाया । देवातक ने भी अपने अनुज की मृत्यु पर दुखी तथा वालि-पुत्र के साहस पर कुद्ध 
- होकर अपना परिघ घुमाते हुए अगद पर आक्रमण किया। रवि-मडल-सदृश दीप्त होते- 
वाले स्थ को उद्धत गति से चलाते हुए, पृथ्वी को कपाते हुए, त्रिभिर अग्ति के समान 
भासमान होते हुए वडे क्रोध के साथ अगद से भिड़ गया। तव अगद ने, शाखाओं से युक्त 
एक विज्ञाल वृक्ष को उखाडकर उसे देवांतक पर फेंका, तो त्रिशिर ने उसे वीच में ही 
काट डाला । तव, अगद आकाभ की ओर उछलकर क्रोव से पर्व॑तो तथा वृक्षों को उन पर 
गिराने लगा, विन्तु देवातक तथा त्रिशिर उन्हें तावड-तोड काटते गये । दोनों ने उस पर 
एक साथ मसरूय तोमर चलाये । इससे सतुष्ट न होकर देवातक ने भयंकर गजेन करते 
हुए अंगद पर बड़े वेग से अपना परिघ चलाया । त्रिशिर ने सिंह-गर्जन करते हुए शर- 
वृष्टि की । महोदर ने अपने मत्त गज को उत्तेजित करके आगे बढ़ाया मौर तोमर चलाया। 
इस प्रकार, जब तीनो एक साथ अपनी-अपनी शक्त्ति का प्रदर्शन करने लगे, तव मअंगद अपना 
शरीर भुकाकर वज्चञ के समान महोदर के हाथी से ऐसे टकराया कि वह हाथी चिंघाड़ते हुए 
पर्वत-शूंग की भाँति नीचें गिर गया । उसकी आँखें बाहर निकल आई जौर वह वही ढेर 
हो गया । उसका कुभ-स्थल फूट गया और उससे अनुपम मोती ऐसे विखर गये, मानों 
विजय-लक्ष्मी ने राघवेइ्वर को प्राप्त केरने की अभिलाषा से अपना अलकरण करने के 
लिए अपनी मंजूपा खोल दी हो । उसके परचात्‌ वालि-पुत्र ने उसी हाथी का दाँत उखाड़- 
कर उससे देवांतक पर प्रहार किया । उस प्रहार से, वह राक्षस, प्रवल वायु से भूलने- 
वाले घने साल-वृक्ष की भाँति कपित हो उठा और रक्‍त उगलने लगा । फिर भी, उससे 
बड़े साहस के साथ अपना सारा बल एकत्र करके अंगद के पर्वतसानु-सदृश वक्ष स्थल पर 
अपने परिघ से प्रहार किया । प्रहार से अगद भी पृथ्वी की ओर भूुक गया, किन्तु उससे 
अपनी सारी शक्ति सचित करके अत्यधिक क्रोघ से देवांतक पर आक्रमण किया | तव 
तरिशिर ने तीन प्रचण्ड शर उस वालि-पुत्र के ललाट पर छोडे । 


ठप, हनुमान्‌ आदि वीरों के द्वारा त्रिशिर आदि राक्षसों का वध 

इसी समय नील तथा हनुमान्‌ अगद की सहायता के लिए आ पहुँचे । नील ने 
एक विशाल पर्वत को उठाकर दहाड़ते हुए त्रिशिर पर फका । तव, त्रिशिर ने वज्ञ-सम 
एक वाण का सधान करके उससे उस पर्वत को काट दिया । पवन-पुत्र ने देवातक को 
वड़े साहस के साथ एक विद्याल परिघ को घुभातें हुए, प्रचंड विक्रम प्रदर्शित करते हुए 
सामने आते देखकर अपनी मुष्टि से उस पर प्रहार किया। इस प्रहार से उसके दाँत टूढ गये, 
पुतलियाँ घूम गई, जौर वह मुह खोले पृथ्वी पर लुढक गया । देवातक का यह 
पतन देखकर स्वर्ग-लोक के देवता हर्ष-ध्वनि करने लगे । 

इस पर कुद्ध होकर त्रिशिर ने अशनि-वेंग से एक तीत्र बाण नील पर चलाया । 
उसी समय महोदर भी एक हाथी पर आरूढ हो गर्जन करते हुए आ पहुँचा और उस पर 
ऐसी शरजवर्पा कर दी, जैसे घनघोर मेघ कुल-पर्वेत पर वर्षा करता है। उनके अस्त्र-समूह 


युद्धकीड ३५७ 


स अत्यत पीडित होकर नील मूच्छित हो गया, किन्तु श्ञीत्र ही संभलकर आकाश की' ओर 
उछला और तरु-सहित एक विशाल पवेत को उठाकर उसे महोदर पर दे मारा। उस परव॑त के 
प्रहार से महोदर का सिर फूट गया और वह अपने अस्त्रो के साथ नष्ट हो गया। महोदर 
को पृथ्वी पर गिरते दखकर त्रिशिर ने प्रचंड पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, साहस खोये 
विना पवन-पुत्र पर असख्य बाणों की वर्षा की । तब हलनुमान्‌ ने शीघ्र ही एक परव्वेत-श्छग 
को उखाडकर उसे उस त्रिश्विर पर फेंका । किन्तु त्रिशिर ने उसे वीच में ही ऐसे चूर-्वूर 
कर दिया कि देवता भी देखकर चकित-से रह गये । तव हनुमान्‌ सहज ही उसके रथ पर 
कूद गया और उसके अश्वों को ऐसा चीर डाला, जैसे सिंह क्रुछढ होकर हाथियों को चीर 
डालता हैँ। तब, क्रोधोन्मत्त हो त्रिशिर ने उस पर शक्ति का प्रयोग किया । प्रचड ज्वालाओ 
से युक्त हो उस शक्ति को आते देखकर हनुमान्‌ ने उसे पकडकर तोड डाला। शक्ति को 
तोडने के हनुमान्‌ के बाहु-बल का विचार करके त्रिशिर ने एक पैनी घारवाले खड़ग को 
लेकर बडे वेग से हनुमान पर आक्रमण करके उस खड्ग से हनुमान्‌ के वक्ष पर प्रह्मर 
किया । तुरत हनुमान्‌ ने अपनी हथेली से उस राक्षस के वक्ष पर आघात किया। तब, वह 
राक्षस अपने खड़ग को छोडकर पृथ्वी पर मूच्छित होकर गिर पडा। तब, नीचे गिरे हुए 
खड्ग को हाथ में उठाकर अनिल-कुमार ने पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए सिहनाद किया। 
कितु इतने में त्रिशिर सेमल गया और अपनी मुष्टि से हनुमान्‌ के वक्ष पर प्रहार किया । 
तव हनुमान्‌ की कनपटियाँ क्रोध से फूल उठी। उसने बडे दर्प के साथ खड़ग को चमकाते 
हुए उस राक्षस के तीनो सिर ऐसे काट डाले, जैसे सुरेन्द्र नें विश्वरूप के सिर काट डाले थे, 
अथवा हनुमान्‌ ने तिशिर के कर्म-बधनों को ही काट डाला हो । तब पृथ्वी, आकाश, 
तथा दिल्ञाओ को केपाते हुए त्रिशिर पृथ्वी! पर गिर पडा । 

उसके गिरते ही महापारव अत्यधिक क्रोध से तेवर बदलते हुए, दिग्गज के समान 
भयकर, कनक-चक्र एवं मणि-प्रभा से विलसित, यम के भीषण दड के सदृश दीप्त अरुण- 
पुष्प एवं अरुण-चदन से अलकृत हो उदय-सूर्य की भाँति उज्ज्वल गदा-दड को घारंण किये हुए 
बडी ज्ञीक्र गति से हनुमान्‌ पर आक्रमण करने चला। इतने में ऋषभ ने एक विशाल 
पर्वेत को उठाकर उस राक्षस पर फेंका। किन्तु, उस राक्षस ने अपनी गदा से उस पव॑ंत 
को चूर-चूर कर दिया। फिर, उसने बडे दर्प से युक्त हो तेजी से अपनी गदा को घुमाकर 
ऋषभ के वक्ष पर प्रहार किया । गदा के प्रहार के कारण ऋषभ तुरत मूच्छित हो गया, 
किन्तु वह शीघ्र ही सेमल गया और अपनी मूष्टि से महापारव के वक्ष पर भीषण प्रहार किया। 
चोट लगते ही वह राक्षस अपना गदा-दड छोडकर, शक्तिहीन हो पृथ्वी पर गिरने लगा । 
तुरत ऋषभ ने उस गदा-दण्ड को लेकर भयकर गर्जन करते हुए उससे उस राक्षस 
पर प्रहार किया । वज्ञ के गिरने से जैसे गिरि-श्रग गिर जाता हैँ, वैसे ही उस राक्षस 
का सिर चूर-चूर हो गया और वह भयकर ध्वनि के साथ पृथ्वी पर गिर पडा । पवन 
से डरनेवाले पीले पत्तो की भाँति दैत्य-सेनिक चक्‍कर काठते हुए तितर-वितर हो गये। 


८६. अतिकाय का युद्ध 
इस प्रकार, उन सब राक्षसों को गिरे हुए देखकर अतिकाय ने ऐसा गर्जन किया, 


३४८ रयनाशथ एयायण 


मानो वह सभी लोको को निगलनेवाला हो । फिर, उसने सहस्न सूर्यो की भाँति उज्ज्वल 
एक विद्याल रथ पर आहूढ होकर सिंहनाद करते हुए, अपने प्रताप की डीग हाँकतें हुए, 
धनुप का कार करते हुए, भीषण गति से कपि-सेवा पर आक्रमण किया, जैसे प्रलब-काल 
की अग्नि घोर वन पर बाक्रमण करती हँँ । उस निद्ञाचर का रूप देखकर सभी वानर 
भयभीत हो गये कि कुमकर्ण ही फिर रोद्र रूप घरकर आ गया हैं। उसे देखते ही 
कुछ वानर मूच्छित हो गये, तो कुछ बाड़ में छिपकर देखने लगे । कुछ वानर भयभीत हो 
आत्तंनाद करने लगे तो कुछ सश्नमित हो गये और कुछ राम की दुहाई देने लगें । इस 
प्रकार, भयभीत होकर भागनेवाले वानरों को देखकर श्रीराम कहने लगें--भागों मत, 
भागों मत ।” फिर, सभी में व्याप्त प्रलय-काल की घनघोर घटा की. भाँति गर्जन करते 
हुए अत्यधिक वेग से आनेवाले राक्षसराज के पूत्र के प्रताप, दर्ष, एवं गति को निकट 
देखकर राम स्वय आच्चर्यचकित होकर विभीषण से वोलें--हे विभीषण, अशनि- 
पात के समान भयकर ध्वनि करनेवाले उस रथ पर आहरूढ होकर इचन्द्र-बनुष की 
समता करनेवाला विपुल-प्रभा-सनन्वित बनुष बारण किये हुए, परिव, गदा, घूल, परशु, 
भाला, तोमर, चक्र तथा दिव्य-बस्त्र-समूह से युक्‍त अह्ितीय राहु-चिह्न॒वाली ध्वजा 
से विलसित, चार सारथियो, तथा एक सहस््र अच्चो से युक्त रथ पर त्रिनेत्र की मूर्त्ति के 
समान अपनी प्रतापान्ति को चारो दिय्याजरो में विकीर्ण करते हुए आनेवाला वह वीर कौन हैं ?' 

तव विभीषण ने रामचंद्र से कहा--हे देव, यह राक्षस, देवताजो के भत्रु (रावण) 
का पुत्र है | यह रावण से भी अधिक रण-कुचल हैं । हे राजनू, यह चतुरंगिणी सेना के 
साथ युद्ध करने में महानिपुण है बौर बद्वितीय वेद-आास्त्रादि विद्याओो में निष्णात हैं । 
यह वध्यात्म-तत्वन है । इस वीर की शक्ति के विश्वास पर लंका सतत नि ज्क रहती हैं। 
देवताओं से वैर ठानकर युद्ध में उनको हाथो नहीं मरने का वर इसने ब्रह्मा से आप्त 
किया है | यह दिव्य आयुवो, दिव्य अस्त्रो तथा मंत्र-गजक्ति से सपन्न है । इसने इन्द्र 
आदि देवताओ को सौ वार परास्त किया है । इन्द्र का वज्ायुध, वरुण का पाग, और 
यम्॒ का प्रचंड दइ तया कुबेर की ग्दा सदा इसके वाण-समूह के अधीन होकर रहते हैं । 
रावण ने इसे वान्यमालिनी में अपने पूत्र के रूप में प्राप्त किया था। हें राजनू, सभी 
वानरो को कुचल डालने के पहले ही आप अपने अनुपम पराक्रम से इसका वब कर दें, 
तो अच्छा हो ॥ 


हो । 


इतने में ही उस राक्षस को, बनुप के टकार से समस्त दिल्लात्रों को प्रतिध्वनित 

करते हुए निकट आते देखकर, खडनोदग्न, गवब, गोमुख, ज्योतिर्मुख, कुमूद, पवन-पुत्र, मैन्द, 
नल, शरभ, नील, चतवली, गज आदि कपिजवीर वृक्षों तब्रा महान्‌ पर्वतों को उठाये हुए 
उसका सामना करने लगे। तब, उस राक्षस ने हँसते हुए कहा--हे वानरो, तुमर्मे रण- 
विक्रम-क्ौचल एवं झक्ति नहीं है, जबत तुम यहाँ से हद जाओं । तुम मुझे उस झूर को 
दिखाओं, जिसने अपने वाण के अग्रभाग से समृद्र को सोख लिया था और तीनो लोको 
की प्रधंसा प्राप्त की थी । में जपना अनुपम अस्त्र उसके सिवाय और किसी पर नहीं 
चलाऊँगा । त्रिभुवनविजयी, अनुपम शूर तथा जलघु बलवान, कुभकर्ण का सिर काट डालनेवाला 


ईछुकाड ३९६ 


वेह कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर में अपना अतुल शक्ति- 
सपन्न अस्त्र नहीं चलाऊँगा । देव, दानव, यक्ष तथा अन्य देवताओं से भी अधिक शवितशाली 
रावण को युद्ध में जीतने का सकल्‍प करके, इस प्रकार लका में आनेवाला वीर 
कौन है, उसे दिखाओ । उसके सिवाय और किसी पर में अपने अतुलित 
अस्त्र नहीं चलाऊँगा ।' 


इस प्रकार गर्वोक्तियों को कहनेवाले उस दानवेश्वर के पुत्र पर कपि-वीर क्रोध 

से वृक्षों तथा पर्वतो की अविरल वर्षा करने लगे । तव अतिकाय ने अविरल वाण-वर्षा से 
उन सब को वीच में ही काट डाला । उसके पद्चात्‌ तीन गुरुतर अस्त्रो से कुमुद को, 
पाँच भयकर शरो से द्विविद को, सात अद्वितीय बाणों से मैन्द को, नौ शरो से गरभ को, 
आठ घोर बाणो से गज को, चार तीत्र वाणो से गवाक्ष को, आठ वाणों से गवय को, 
दस बाणों से ज्योतिमु ख को, पद्रह वाणों से शतबली को और पच्चीस वाणो से नील को, 
पृथ्वी. पर गिराकर मूच्छिंत कर दिया । सभी देवता आकाश से चकित होकर यह दृश्य 
देखने लगे । तव प्रचड क्रोध से अतिकाय ने सभी वानरो को ऐसे भगाया, जैसे मृगराज 
मृगो को भगाता है । वह मन-ही-मन सोचने लगा कि विरोधी होते हुए भी यदि में 
परमेश्वर राम की भक्ति करूँ, तो म॑ अवश्य मुक्ति प्राप्त करूगा। यो सोचकर वह राम 
की ओर वबढ्नें लगा । जो वानर उसका मार्ग नहीं रोकता, वह उस पर हाथ नहीं उठाता। 
इस प्रकार, वह आगे बढते हुए राम के निकट पहुँचा और उस निगमवेद्य राम से 
हँसते हुए बोला--'हे राम, तुम इस रणभूमि में अपनी शूरता मुझे दिखाओ । तुम अनन्त हो । 
कोई भी यह नही जानता कि तुम्हारी शक्ति कितनी है । मेरे पिता के कारण 
तुमने मनृष्य का जन्म लिया हैं । उन्ही के कारण तुम पृथ्वी के राजा हुए हो। मेरा सामना 
करने के लिए, अभरेन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओं के समूह से तुम कोई नहीं हो । अपना 
अत कर डालने के लिए जो कोई शूर मुभसे भिडे, उससे में लड॒॑गा ही । में तुम्हारा 
पराक्रम भली भाँति जानता हूँ । तुम्हें मान-अपमान का विचार ही नहीं हैँ । तुम कदाचित्‌ 
मुझे नहीं जानते । भला गुणहीनों में सत्त्वगुण कहाँ रहेगा ” तुम किस जाति के हो, 
में कैसे कहूँ ? क्‍या, तुम राजकुल के आचारो का पालन करनेवाले हो ? पुण्यात्मा तपस्वियो 
के मानस-काननो में भले ही तुम निवास करो । मेरे साथ लडने की क्षमता तुम नहीं 
रखते । वेदाद्वि-गुफाओ में तुम जाकर वास करो, युद्ध के लिए तुम मेरे जोड के नहीं हो। 
सनक आदि मुनि तथा योगियों के मानस-रूपी समुद्रो में भले ही तुम निवास करो, मेरे 

साथ युद्ध करने योग्य नही हो । गरेहएु रग के वस्त्र धारण करके, पाप-रहित तथा ससार 
के दुखो से मुक्त, कद-मूल-फल जैसे मीरस आहार करते हुए, विविध आचार-निप्ठाओ के 

कारण वलान्त, घोर काननो में विचरण करनेवालो के साथ तुम जाकर रहो। तुममें 

रण-कौशल नही है । तुम्हारी शक्ति की कल्पना मेने कर ली है। इस संसार में तुम 

अकेले थे, ऐसे तुम्हें यह कपि-सेना मिल गई है। आश्रयहीन होकर घूमनेवाले तुम्हें 

अब सूर्य-पुत्र एक मात्र आधार मिल गया हैँ । हाय, कही भी, किसी का जो गुरू नहीं 

वना, ऐसा विद्वामित्र तुम्हारा गुरु हुआ । तुम्हारा अपना कोई देश नहीं था, इसलिए 


३8० रंय्नाघथ एयायर 


अकलंक अबोव्या तुम्हें प्राप्त हुई । इनके गव॑ में मत इठलाओों । तुम भले ही, मत्स्य को 
रूप घरकर सभी समुद्रो में प्रवेश करो, कर्म का रूप धारण कर पर्वत के नीचे चले जाओ 
पर में तुम्हें छोडुगा नहीं । जवद्य में तुम्हें दूंढ लाऊँगा। तुम अपना वेश विक्ंत करके 
भले ही कही भी छिप जाओ, में तुम्हें जवइय पकड़ लाऊंगा, तुम्हें भूलूगा नहीं । वामन 
का रूप घरकर, याच्रक-वृत्ति अपनायें हुए भले ही तुम कही चले जाजो; में तुम्हें दृढ़कर 
पकड़ लाऊँगा; तुम्हारा विचार नहीं भुलाऊँगा । भूसुर का वेश घरकर, परशु को लिये हुए 
राजाओं के संहारक तुम भले ही वन जाजो, में अवच्य तुम्हारा बच्वेषण करके तुम्हें पकड़ 
लूया । मेरा वाण जत्यंत भीषण है । वह कोई वट-पत्र नहीं कि तुम्हें वहन किये हुए 
बह्वितीय रज-म्रमुद्र में तैरता रहे । अत्यधिक जक्ति के मद से फूमनेवाले मेरे सामने 
यद्ध-क्षेत्र में ठहरना तुम्हारें लिए असंभव है ।” 
८७, लक्ष्मण तथा अतिकाय का दन्द्र-युद्ध 
इस प्रकार, प्रलाप करनेवाले अतिकाय का दर्प देखकर लक्ष्मण हँसते हुए वोलें-- 
हे राक्षस, मेरे रहते, राघव के साथ बुद्ध करने का प्रयत्न क्यों करते हो ? समबलकर 
मेरी बोर वढ़ों; में तुम्हें अपने वाणों से टुकडे-टुकड़े कर दूगा। ऐसा कहकर वे अपने 
धतृपष के ढंकार से दानवो के चित्त कंपित करते हुए उस राक्षत पर टूट पड़े । लक्ष्मण 
साहस को देख वह जाइचर्बंचक्ति हुबजा और एक क्र अस्त्र का संवान करके, दहाड़ते 
हुए कहने लगा--5हरो, लक्ष्मण, ठहर जाबो । तुम अभी वालक हो; मेरे साथ मत 
भिड़ो । में बम से भी अधिक क्र हूँ । मेरे तीत्र वाणो को चहने की क्षमता या तो इस 
वसुंघरा में है, या हिमाचल में है, या रावण के उठाये कैलास पर्वत में है, या देवतानो 
को निवासभूत पवेत में है, या जवकरिपु शिवजी के घनुप को भंग करने के गये से फूलने- 
वाले तुम्हारे भाई राघव में है । उसके जलावा दूसरे किसी में मेरें साथ युद्ध करने की 
शक्ति नही है ? मेरे समक्ष खड़े रहना, क्या तुम्हारें लिए संभव हैं ? हे सौमित्र, यह श्रेष्ठ 
वाण जभी तुम्हें लगकर तुम्हारा रक्तपान कर लेगा 
ऐसे दुरूहूंकार से भरे वचन सुनकर लक्ष्मण ने कहा--हे राक्षस, इस प्रकार व्यर्थ 
गर्जन क्यों करते हो ? युद्ध में तुम जपनी भक्ति दिखाओ। मेरे समल्ष व्यर्थ प्रलाप क्यों करते हों 
निश्चाचर, तुम भी वड़ें वीर की भाँति, अपना जौद्धत्य तजे बिना, शस्त्र-समूह से 
सज्जित हो, तवा रव पर बाढूढ हो, मेरे समक्ष खड़े हो, यही एक महान्‌ आइचये हैं । 
यह सूनकर उस राक्षस ने बड़े कोघ से अपने हाथ का वाण लक्ष्मण पर चलाकर गर्जन 
किया। तव, लक्ष्मण ने उस वाण को अडदंचन्द्र वाण से काट डाला | फिर, उन्होने 
एक तेज वाण अपने घनुष पर चढ़ाकर उसे उस राक्षत के ललाट को लक्ष्य करके चलाया, 
मानों यह संकेत कर रहें हो कि ब्रह्म का लेख भी जब मिट्नेवाला है । तब, उस शर 
के प्रहार से अतिकाय एंसे हिल उठा, जैसे रुद्र के प्रहार से भमासरानर का प्रासाद कपित 
हो गया था | मेरे ज्ञाथ यह युद्ध करने का साहस रखता है"यह विचार आते ही अति- 
काय ने चजिहनाद किया जौर अपना रथ लक्ष्मण के निकट चलाकर, जौघ्न ही रामानुज पर 
एक एंसा पैना झर चलाया, मानों उसी से उनका सहार कर डालने का सकल्प कर लिया हों । 


| ( 


इछ्धकांड ३्दः 


उसके तुरंत बाद ही उसने तीन ऐसे शक्ति-सपन्च॒ वाण चलाय, मानों कह रहा हो 
कि भले ही त्रिनेत्र शिव भी रक्षा करें, तो भी तुम्हारा सुख छीन लूँगा। फिर, तुरत उसने 
पाँच वाण चलाये, मानो कह रहा हो कि तुम्हारे पच प्राण अवश्य खीच लूँगा । उसके 
पश्चात्‌ उसने अपने बाहु-बल के गर्व से फलते हुए वड वेग स सात वाण चलाय, मानो 
कह रहा हो कि भले ही तुम सप्त समुद्रो में प्रवेश करके उन्हें पार कर जाओ, म॑ तुम्हें 
अवश्य ही मार डालूगा। किन्तु, लक्ष्मण ने ज्षीत्र ही उन सभी वाणों को खड-खड करके 
सिंहनाजंन किया । उसके पश्चात्‌ उन्होने आग्नेय अस्त्र चलाया, तो अतिकाय ने सौरास्त्र 
चलाया । दोनो शरो ने आपस में टकराकर युद्ध किया और दोनो चूर-चूर होकर नीचे 
गिर गये। फिर, राक्षस ने ऐषिक बाण चलाया, तो लक्ष्मण काँप उठे। फिर, उन्होने ऐन्द्र 
वाण से उसे काट डाला । यह देखकर दैत्य ने याम्यास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने वायब्पास्त्र 
चलाकर उसे काट डाला । इतना ही नही, उन्होने कई और वाण भी उस राक्षस पर 
चलाये, किन्तु वे सभी बाण अतिकाय का स्पर्श करते ही टूटकर पृथ्वी पर गिर गये । 
लक्ष्मण यह देखकर सोचने लगे कि क्‍या कारण हैं कि कोई भी गर इसके शरीर में गडता 
नहीं ? उनका इस प्रकार व्याकुल होते समय अनिल ने आकर कहा--यह अनुपम रहस्य 
तुम्हें बताऊंगा । हे लक्ष्मण, इसने ब्रह्मा से वज्ञ-क्रवच प्राप्त किया है । अत, कोई भी 
शर इसके शरीर में नहीं गडता। तुम इस पर ब्रह्मास्त्र चलाकर इसके टुकडें-टुकडे 
कर डालो 

तब बडे हुए से लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र को मत्र-पूत करके धनुष पर चढाया और उसे 
रावण के पुत्र पर चलाया। तुरत समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए, इच्द्र को भयभीत करते 
तथा देवताओं को कंपाते हुए, दिशाओ को हिलाते हुए, समुद्रो को आलोडित करते हुए, 
पर्वंतो को भकफरोरते हुए, सूर्य-चद्र को पथ-अ्रष्ट करते हुए, नक्षत्रों को गिराते हुए, वह 
ब्रह्मास्त्र, रत्न-समृह की भाँति उज्ज्वल काति से युक्त हो, श्रलय-काल की अग्ति के समान 
सभी लोको में व्याप्त होकर जलते हुए, पवन के वेग से यम-दड के समान, अतिकाय की 
और आने लगा । तव अतिकाय ने उस पर तीत्र शर चलाये, किन्तु उस ब्रह्मास्त्र को निष्फल 
नही कर सका। फिर, राक्षस ने शक्ति चलाई, किस्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी उपेक्षा कर दी । 
फिर, अतिकाय ने उस पर शूल चलाया, किन्तु ब्रह्मास्त्र ने उसकी भी अवहेलना कर दी। 
उसके पद्चात्‌ राक्षस ने गदा चलाई । उसे व्यर्थ होते देखकर, उसने खड्ग चलाया। 
किन्तु, उसकी भी परवाह किये विना उसको अपनी ओर आते देखकर अतिकाय ने परथु 
चलाया। किन्तु, परश्‌ की भी उपेक्षा करके उसे आते देखकर राक्षस ने भाला चलाया । 
इस पर भी ब्रह्मास्त्र की गति नहीं रुकी, तो उसने अपनी कमर से वरछी निकालकर उससे 
प्रहार किया । 

८८ अतिकाय का वच 


उसपर भी ब्रह्मास्त्र अप्रतिहत गति से अतिकाय की ओर बढता रहा। तब अतिकाय ने 
उस पर अपनी मृुष्टि से प्रहार किया। पर, उस अस्त्र ने मुकुट तथा कुडलो में अलकृत 
उस राक्षस का सिर काट डाला । वज्ध के आघात स्‌ रोहणादि का श्टग जैसे गिरा था 
४६ 


३६२ र॑ग्नाथ रॉयायरो 
वैसे जब उसका सिर पृथ्वी पर गिरा, तव उसके सिर को देखकर हतशेष राक्षस भयभीत 
होकर लका की ओर भागने लगे । सभी वानर लक्ष्मण की प्रशसा करने लगे । रामानुज ने 
तब रामचन्द्र के चरणों में गिरकर प्रणाम किया, तो उन्होने वड़े आनद से लक्ष्मण को हृदय 
से लगा लिया और वानरो के साथ अत्यधिक हर्ष प्रकट किया । 

अतिकाय आदि छह वीरो की मृत्यु का समाचार सुतकर रावण मूच्छित हो गया। 
फिर सचेत होकर अविरल अश्रु वहाते हुए वह अत्यधिक झोक से सतप्त होने लगा | इस 
प्रंकार दुख से पीडित होनेवाले पति की सेवा में पहुँचकर मय-पुत्री मदोदरी कहने लगी-- 
हे असुरेन्द्र, सभी लोको में अद्वितीय शक्ति से सपन्न आपका ऐंसा दुखी होता उचित 
नही हैं । उस दिन वीर की तरह आप राम की देवी को क्यो ले आये ? उन्हें फिर 
राम के पास पहुँचाना आप नहीं चाहते थे । अब उचित समय वीत गया । उस राम पर 
आक्रमण करने के लिए गये हुए राक्षस-बीर फिर लौटकर आयेंगे, यह आजा आप छोड 
दीजिए । हे नाथ, युद्ध में जाप अपनी शक्ति दिखाइए।' 


इन वातो पर रावण ने मन-ही-मन विचार किया । उसने अपनी स्त्री को अत पुर 
में भेज दिया और दु.ख की लवी साँस खीचकर अपने मत्रियो से कहा---हाय, मेरे भाई 
तथा मेरे प्रिय पुत्र इस प्रकार मारे गये ? अब क्‍या कहा जाय ? श्रेष्ठ योद्धाओ के लिए 
भी अकादय नाग-पाशों को इन भानवन्वीरों ने न जाने, माया से या शक्ति से, काट 
दिया है | अब मे विजय की आशा करूँ, तो भी वह मेरे लिए असभव हैं । उस राम को 
युद्ध में जीतनेवाला अब दढूढने पर भी मुझे नही मिलेगा । अवतक जो लका, विना किसी 
भय के शोसायमान थी, वह आज इन शक्तिशाली लोगो के कारण जअस्त हो रही हैँ । उस 
राम के पराक्रम की सीमा ही नहीं है। इसलिए तुम लोग अब लका की रक्षा के लिए 
आवश्यक सेना प्रतिदिव भेजते रहो।' ऐसा आदेश देकर वह अतपुर में चला गया और 
एकात में मन-ही-मन चिता से पीडित रहने लगा । 


5९, इंद्रजीत का द्वितीय युद्ध 

उस समय मेघनाद वहाँ पहुँचकर दशकठ से कहने लगा--हे दानवेन्द्र, मेरे रहते 
हुए आपका इस प्रकार चिंतित होना उचित नहीं है । शक्ति से सपञन्न मेरे वाणो का आघात 
क्या ईइवर भी सह सकता है ? लीजिए, में अभी जाता हूँ । उस राम के भाई को अपने 
उद्धत बाणों से अवश्य जर्जर करके उसे मार डालता हूँ और उस' वानर-ेना को अपने 
पराक्रम से पृथ्वी पर सूलाकर आता हूँ । हे देवताओ के शन्रु, मेरी प्रतिज्ञा सुन लीजिए । 
जैसे महाराज वलि की यज्ञ-भूमि में त्रिविक्रम के बढते हुए रूप को त्रस्त होकर इन्द्र, 
विष्णू, यम, अग्नि, रुद्र, सूर्य, चन्द्र तथा साध्य देखते रहे, वैसे ही' आज वे मेरे प्रताप को 
देखते रह जायेंगे ॥! 

इतना कहने के पदचात्‌ वह राक्षस-राजकुमार वायुसम शीघ्रगामी रथ पर आहूढ 
हो युद्ध के लिए चल पडा । उसके चलते ही सब दिश्ञाओ से एक साथ बड़े वेग से असख्य 
रथ निकल पडे । अनगिनत गज निकल पडे, विपुल अश्व-सेना तथा पदाति-सेना निकल 
पड़ी । उस चतुरगिणी सेना पडरीको (इवेत छत्रो) से प्रकाशित होनेवाले, पडरीक (बाघ) 


ख्छ्काड़ ३६३ 
की-सी आँखोवाले, पुडरीक (श्वेत कमल) की कातिसम शरीरवालें, पुडरीक के (आग्नेय 
दिगा का दिग्गज) के औन्नत्य से विलसित होनेवाले, पुडरीक (वाघ) के समान भयकर 
लगने वाले और पुडरीक (बाघ) की शक्ति से सपन्न वीरो से पूर्ण थी । सिहनादो, दहाडो, 
हुकारो, गर्वोक्तियो, रथ की तेमियो तथा निसानो की भयकर ध्वनि चारो ओर व्याप्त 
हो रही थी । धवल छत्र से युक्त वह राक्षस-कुमार सुधाकर से युक्त आकाश के समान 
दीख रहा था । सुदर कामिनियाँ अपने कमल-नेत्रो की दीप्ति को चारो ओर विकीर्ण 
करती हुई चामर डला रही थी । ऐसी रण-सज्जा से युक्त हो, अपने आभूषणों की प्रभा 
से दीप्त होते हुए, सहज' वैभव से उज्ज्वल इद्रजीत रण-स्थल के मध्य आकर खडा हुआ । 
उसके पश्चात्‌ उसने रक्‍त-बर्ण के वस्त्र, चदन तथा पृष्प-मालाएँ धारण करके अग्निदेव का 
प्रतिष्ठापप किया, शर तथा तोमरो से उसकी परिधि बनाई और लोहे के ख्रुक॒ तथा खुवा 
एकत्र किये । फिर, राक्षसेश्वर के पुत्र ने अथवंबेद के उच्चारण के साथ घी, खील तथा 
ताल-समिघाओ का हवन किया । होम की समाप्ति के पहले, उसने क्ृष्ण-छाग (काला 
बकरा) के रक्‍त की. पूर्णाहुति दी । तब अग्निदेव ने स्वय प्रकट होकर हब्य ग्रहण किया । 
उनकी छुपा से मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र, रथ, धनुष तथा कवच प्राप्त किये । 


उसके पदचात्‌ वह राक्षस अपने सिहनाद से दिशाओं को केपाते हुए अपने रथ, 
अइव, केतु तथा सारथियों के साथ, सूर्य, चद्र तथा नक्षत्रों को अपदस्थ करते हुए शीघ्रगति 
से आकाश-वीथी में जाकर छिप गया । फिर, अपनी' सेना से अपने पराक्रम के अनुरूप वचन 
कहने लगा--'तुम विना विचलित हुए युद्ध करते जाओ । में आकाश्ञ से घोर युद्ध करते 
हुए राम ओर लक्ष्मण का शीघ्र ही सहार कर दूंगा ।* 


इन उत्साहवद्धक वचनो को सुनकर दानव अत्यत हर्षित हुए और सेना के साथ 
वानरों पर टूट पडे तथा विविध रीतियो से उनसे युद्ध करने लगे । उसी समय इद्रजीत 
अपनी छाया तक प्रकट किये विना आकाश से दिव्य बाण चलाने लगा । तब वानर उठकर 
पर्वतो को उठा-उठाकर उस राक्षस की ओर फेंकने लगे । किन्तु इद्रजीत के शरो ने उन्हें 
तोडकर उन वानरो की छाती को विदीर्ण कर उन्हें पृथ्वी. पर गिरा दिया। इसके पश्चात्‌ 
उसने एक घोर अस्त्र चलाकर पाँच वानरों को तथा नौ अस्त्रो से सात वानरो को नीचे 
गिरा दिया । तब कुद्ध होकर कपि-वीरो ने प्वतो तथा वृक्षों को उठाकर उस इद्रजीत पर 
फेंका । किन्तु, उसने बडी निपुणता से उन्हें अपने तीन्न वाणों से काटकर गधमादन पर 
अठारह बाण चलाकर उसका मद चूर-चूर कर दिया । उसके पदचात्‌ उसने नौ वाणों से 
नल के नाम-रूप मिटा दिये, सात वाणों से मैन्द को भुका दिया, पाँच वाणों से गज का 
सहार किया, दस वाणो से जाबवान का शरीर चीर डाला, सौ वाणो से हनुमान्‌ को 
अत्यधिक दुख पहुँचाया, तीन बाण गवाक्ष पर चलाये, तेरह वाणो से हरिरोम के प्राण हर 
लिये, छह वाणो से रभ को गिरा दिया, दस बाणों से सूर्यप्रभ को परास्त किया, तेरह 
वाणों से पनस के अगो को छेद डाला, आठ क्रूर बाणों से कुमुद को तथा पेतीस वाणों से 
नील को छिम्न-भिन्न दिया । तत्पश्चात्‌ विना विश्वाम लिये ही उसने कई वाणों से अगद को, 
तीन पैने बाणों से सूर्य-तदन , (सुग्रीव) को, पाँच बाणों से इन्द्रजाल को, दो शरों से गिरि- 


तो 


३६6 एयगनाएशथ रायायण ः 


है 


भेंदी को तथा वीस चरो से ऋषभ को मूच्छिंत कर पृथ्वी पर गिरा दिया । फिर, चोदह 
वाणो से केसरी को, पाँच भास्वर वाणों से दधिमुख को, छह-छह वाणो से सुमुख तथा ग्रथन को, 
छह भरो से विमुख को, सात वाणों से द्विविद को, उतने ही बाणों से शरभ को, दस 
बरो से झतवली को, आठ वाणों से हर को, तीन वाणों से सन्नाद को और श्रेष्ठ तथा 
दिव्य अस्त्रों की वर्षा से अन्य समस्त वानस्नन्‍तायकों को छिन्नगात्र तथा विगतप्राण करके 
पृथ्वी पर गिरा दिया । 


९०, ब्रह्मास्त्र से इन्द्रजीत का राम-लक्ष्मण आदि को मृच्छित करना 

इन्द्रजीत ने कुछ वानरो पर वाण चलाये, कुछ कपियो को गदा से मार गिराया, 
कुछ को घूल से हत किया, कुछ पर शक्ति का प्रहार किया । इस प्रकार, सभी वानर-वीरो 
को पृथ्वी पर ग्रिराकर, अपना अनुपम पराक्रम प्रदर्णित करता रहा । इच्दजीत के भयंकर 
वाण सह नहीं सकने के कारण कुछ कपि तित्तर्वितर होकर भाग रहें थे, कुछ थर-थर 
काँप रहे थे, कुछ त्रस्त हो रहे थे, कुछ छिप रहें थे और कुछ को ऐसा लग रहा था, 
मानो कपिन्सेना के लिए प्रलय-क्राल आसन्न हो गया हो। दानवेन्द्र के पुत्र ने तब अपने 
ब्रह्मास्त्र के मत्र-प्रभाव से हत-णेप वानर-सेना का सहार करके विजय-गरव से सिंह-गर्जेन किया । 
कपि-समूह को इस प्रकार पीडित होते देखकर लक्ष्मण कुद्ध हुए और अपने अग्रज 
से कहने लगे-हें देव, आप चिता क्यो करते हे, आप मुझे आाज्ा दें, तो में ब्रह्मास्त्र चला- 
कर रावण के साथ-साथ राक्षस-समृह को नप्ट कर दू” । तब राम ने कहा--जब यह 
राक्ष)। अपनी माया के कारण दिखाई नही देगा, तब ब्रह्मास्त्र अद्वितीय जक्ति का प्रदर्शन 
करते हुए सभी लोको को भस्म करता हुआ चला जायगा । एक के कारण तुम निष्ठुर 
होकर सभी लोको को भस्म क्‍यों करना चाहते हो ? ब्रह्मा के दिये वर की शक्ति से 
इस राज्षस ने कपि-सेना को मार डाला है। हमें तो ब्रह्मा के वर का आदर करना चाहिए ।' 
उनका वात्तंलाप चल ही रहा था कि इन्द्रजीत ने उन दोनो रघुवशियो पर 
ब्रह्मास्त्र का ऐसा प्रह्दर किया कि वे दोनो मृच्छित हो गये । तव गवित रावणपुत्र-रूपी 
व्याप्त नीलबमेच, घनुप की प्रत्यंचा के ठकार-ढूपी मेघ-गर्जन, वेग के साथ राक्षस के 
द्वारा गिराई जानेवाली कांति-हूवी विजली, वास्वार चलाये जानेवाले असख्य वाण-रूपी 
वर्षा, पखो से युक्त वाण-रूपी चातक, कक रत्न-प्रभा-कलित घनुप-रूपी इंद्रधनुष, अनुपम 
रीति से वानरों के बरीर से फूटकर निकलनेवाली रक्त-बारा-रूपी बाढ, हारों से छूटकर 
(गिरे हुए मोती-रूपी बोले, दूटकर छितराये हुए मुकुटो की उज्ज्वल मणियाँ-रूपी इद्गोप, 
काहल (चर्मवाद्य) का निनाद-रूपी केका तथा अत्यधिक भीषण पटह-ताद-रूपी मेंढको की 
टर-टर से युक्त हो, वह समय आपाढ की पहली वर्षा के समय के समान दीख रहा था, 
जब कि रघुपति-हृपी क्सान, राक्षमों की विपुल देह-रूपी क्षेत्रों में वाण-रूपी वीजो को 
रोपने के लिए आया हो और अपने वाहु-अल का प्रदर्शन करके खलिहान में उस दंशकघर 
को लाकर, उसके सिर-त्पी वालों को काटकर देवरी कराना चाहता हो । इसी समय 
इद्रजीत ने वहत्तर वानर-सेना-समूह को तथा राघवों को जीतकर, अपने धनुष का घोर 
टंकार करते हुए, युद्ध को स्थगित किया और हर्ष से हँसते हुए लका को लौठ गया । 


4 


खुद्धकांड ३६४ 


उसी समय सूर्यास्त हुआ, मानों राघव की दुर्देशा के कारण मन-ही-मन दुखी हो, 
उन्हें उस दशा में देख नहीं सकने के कारण सूर्य ने आँखें वद कर ली हो । वानरो के 
मुख-कमल मुरका गये । अधकार चारो ओर ऐसा व्याप्त हो गया, मानो बता रहा हो कि 
वानरों के द्वारा लका का दहन होते समय, धुआँ इसी प्रकार व्याप्त होगा । वह ब्रह्मास्त्र 
का सधान करने के लिए आवश्यक मत्र-पठन का उचित अवसर नही था, इसलिए विभीषण ने 
पृथ्वी पर गिरे हुए सुग्रीव आदि योद्धाओ को देखकर कहा--हे वानर-वीरो, रावण के 
पुत्र ने ब्रह्मा के वर की शक्ति से अस्त्र चलाया था, और राघव ने ब्रह्मास्त्र की शक्ति 
का आदर करने के विचार से उसे सह लिया है। इतना ही हैँ और कुछ नही ।' ब्रह्मा के वर 
से आरक्षित होने के कारण वायु-पुत्र, इन्द्रजीत के दिव्य-अस्त्रों के प्रहार से मरा नही था। इसलिए 
उसने कहा--अब हम देखें कि वाणों से आहत हो युद्ध-भूमि में गिरे हुए वीरो में से 
कितने अभी जीवित हैँ ।! यो कहकर वे दोनो जलती हुई मशालें लेकर उस अधकार में 
युद्ध-भूमि में घूमने लगे। तब उस युद्ध-भूमि में लगातार नृत्य करनेवाले घड, छककर मास 
खानेवाले भूत, भयकर रूप से गरजनेवाले बैताल, बहनेवाले रक्त का पान करनेवाली 
डाकितियाँ_ मास-पेशियो को निगलनेवाले गुद्ध, उच्च स्वर में रव करनेवाले श्वगाल, 
रक्त उगलनेवाले भालू, पृथ्वी पर लोटनें, छटपटाने तथा दाँत पीसनेवाले वानर, शक्ति- 
हीन होकर गिरे हुए, रूप-विकृत, रक्‍त में भीगे हुए तथा धूलि से सने हुए कपि, एक ही 
बाण के आघात से एक साथ एक ही स्थान पर सटकर गिरे हुए कपि, खड-खड होकर गिरे हुए 
पर्वत, छिन्न-भिन्न होकर गिरे हुए वृक्ष, खडित होकर फैले हुए राक्षसों के शूल, असख्य खडो 
में टूटकर गिरी हुई गदाएँ, मरकर गिरे हुए असख्य हाथी आदि जहाँ-तहाँ दिखाई पडने 
लगे । इस दृश्य को देखकर विभीषण तथा हनुमान्‌, दोनों विस्मित तथा दुखी हुए, किन्तु 
तुरन्त उन्होंने निश्चय किया कि अब हमें भविष्य के कार्य के सवध में जाववान्‌ से परामर्श 
लेना चाहिए वही जानता है कि अब क्या करना चाहिए | हम उसे पहले ढूँढे और 
उसके कथन के अनुसार कार्य करें । 


यो सोचकर वे युद्ध-भूमि में जाबवान्‌ को ढूंढते हुए गये और निदान एक विशाल 
शर-शय्या पर पडे हुए उसे देखा । तब विभीषण ने कातर-भाव से जाववान्‌ को 
देखकर कहा--हे ऋक्षराज, तुम अभी जीवित हो ? क्‍या, तुम बोल सकते हो ” तुम 
हमें पहचानते हो ?” राक्षस के शर-प्रहार से शक्तिहीन होने के कारण जाववान्‌ ने क्षीण 
स्वर में कहा--'हे विभीषण, तुम्हारे कठ-स्वर को पहचानकर में तुम से वात कर रहा हूँ। 
वैसे तो मेरी आँखो में वाण चुम गये है । अत, मेरी आँखें देख नहीं पाती। क्या पवन- 
पुत्र जीवित हैँ ? उसके जीवित रहने की वार्ता सुनकर मेरे कानो को आनद पहुँचाओ ॥' 
यह सुनकर विभीषण ने अत्यत आइचर्ये-चकित होकर जाववान्‌ से पूछा--हे ऋक्षराज, 
यह कैसे आइचये की वात है कि तुम महात्मा रामचन्द्र के बारे में नहीं पूछते, लक्ष्मण 
के सवध में नही पूछते, सूर्य-पुत्र के सवध में जानने की इच्छा प्रकट नही करते, और श्रगद 
के बारे में भी पूछना नही चाहते, किन्तु पवन-पुत्र के सबंध में ही पहले जानना चाहते हो ? 
यह तुम्हारा कैसा विचार है ? तब जाववान्‌ ने कहा--है विभीषण, यदि अकेले 


३६६ स्यनाथ रायायर 


हनुमान्‌ अपने प्राणो से जीवित है, तो सभी वानर जीवित हो जायेंगे । यदि वह जीवित 
नही है, तो जीवित रहकर भी, वानर जीवित नही रह पायेंगे ॥' 

इन बातो को सुनकर वायु-पुत्र को अधिक हर्ष हुआ । उसने अपना नाम लेकर 
जाववान्‌ के चरणो में प्रणाम किया। ऋक्षराज अत्यत हर्पित हुआ गौर अपने को पुनर्जीवित-सा 
अनुभव करके कहा--हे वायुनदन, अब इन वानरों के लिए तुम्हारे सिवाय और 
कौन आश्रय है, इसलिए तुम शीघ्र ही समुद्र को पार करके जाओ। हिमाचल को पार 
करके हेमकूट,- ऋपभ-पर्वत, मेरु-पर्वत, रजताद्वि तथा ब्वेताचल से आगे निकल जामो । 
वहाँ (तुम्हें) लवण-समृद्र मिलेगा । उसे भी पार करो, तो ज्ाकद्धीप पहुँचोगे । उसको भी 
पार करो, तो तरगायमान अमृताव्धि को देखोगे । उसे पार करो, तो चद्र-शैल तथा द्रोण- 
शैल के मध्य भाग में उज्ज्वल प्रकाश से दीप्त ओषबी-शैल को देखोगे । उस पर्वत पर 
सजीवकरणी, विजल्थकरणी, सघानकरणी तथा सौवर्णकरणी नामक चार ओपधियाँ है । तुम 
उस पर्वत पर चढ़कर उन ओपवधियो को ले आओ और इस वानर-समूह को प्राण-दान देकर 
राम-लक्ष््ण को आनद पहुँचाओो ।' 

९१. हनुमान का ओषधी-शल लांकर वानरों का मूर्च्छा दूर करना 


ह०. 


वायुपुत्र, जाववान्‌ से आज्ञा लेकर सुवेलाचल पर चढ गया । अपने चरणों को 
समान रूप से पृथ्वी पर प्रतिष्ठित करके, अपनी दीप्तिमान्‌ लागूल को ऊपर उठायें, कधो 
को उचकाकर, अपने शरीर को फुलाकर, राम का स्मरण करते हुए वह आकाश की ओर 
उछला । उस अनुपम वेग के कारण वह विद्याल पर्वत भी पृथ्वी में घेंस गया, दिद्याएँ 
काँप गई और पृथ्वी चकराने लगी । इस प्रकार, आकाज मार्ग में उडकर हनुमान्‌ ने अत्यत 
भयकर समुद्र को पार किया और विष्णु के चक्र के समान आकाशओ में जाते हुए, मार्म में 
कई विचित्र दृश्यों को देखते हुए, घने फेन से युक्त अमृत-समुद्र को पार किया और चन्ध- 
शैल तथा द्रोण-शैल के मध्य भाग में स्थित ओपची-शैल पर चढ गया और ओपधियों का 
अन्वेषण करने लगा । किन्तु, वें ओषधियाँ काम-रूपिणी थी, इसलिए अपने-आपको उस कपि- 
शेखर की दृष्टि से छिपा लिया | ओषधियो के नहीं दीखने से अनिलकुमार मन-ही-मन 
विचार करने के पब्चातू, विनीत हो उस पर्वत से प्रार्थना करने लगा--हे पर्वतराज, 
में प्रालेय, पर्जन्य तथा कैलास-पर्वतो की उपेक्षा करते हुए ज्ञीघत्रगति से तुम्हारी सेवा में 
आया हूँ । में कार्यातुर हूँ । देवताओं नें यहाँ जिन ओषधियो को छिपा रखा है , उन्हें 
कृपया मुझे दिखा दो । हमारे राघव को इनकी आवश्यकता पड गई है। किसी भी तरह 
उन्हें दे दो, तो अच्छा होगा ॥' 

तब पर्वत ने अट्टह्ास करके गर्व से फूलते हुए, हनुमान्‌ से कहा--तुम्हारा कितना 
साहस हैँ कि तुम मुझसे ऐसे वचन कह रहे हो ”? इन ओषधियों को मुझसे माँगने का 
तुम्हारा अधिकार ही क्या है ? इन्हें लाने का आदेश देनेवाले तुम्हारे राम की शक्ति 
कितनी हैँ ? जिन ओपधियो को देवताओ ने यहाँ छिपा रखा है, उन्हें तुम्हें देनें से अधिक 
कोई और अपराध हो सकता हैं ?! 

इन गर्वोक्ततियों को सुनकर अनिल-कुमार ने अत्यत करुद्ध होकर उस पर्वत से कहा-- 


इुछ्धकाड ३६४ 
मे जब तुमसे ऐसी विनम्र प्रार्थना करता हूँ, तब क्या यह उचित नहीं कि तुम 
मेरी प्रार्थना पर विचार करो ? हूं पर्वत, में अपनी विशाल भुज-गक्ति से समूल तुम्हें 
उखाडकर अभी यहाँ से ले जाता हूँ, अबतक जिन रामचन्द्र को तुम नही जानते हो, 
उन्हें तब तुम जानोगे । इतना कहकर हनुमान्‌ ने भयकर गति से गर्जन करते हुए उस 
पर्वत को जड़ से उखाड लिया, ( पर्वत पर रहनेवालें ) गवर्वों को भगा दिया और उसे 
उठाकर इतने वेंग से जाने लगा कि कोई भी उसे पहचान न सके । 


सहस्न॒धाराओ से अत्यधिक दीप्त होनेवालें चक्र से युक्त विष्णु की भाँति जब 
हनुमान्‌ उस पर्वत को लिये हुए चलने लगा, तव राक्षस-वीरो के शर-प्रहार से घायल हो, 
मूच्छित पडे हुए कपियों ने श्रेष्ठ महौषधियों की वायु के स्पर्श-मात्र से हीं अपनी आँखें खोल दी। 
उन्होने अत्यधिक उत्साह से सिहनाद करते हुए युद्ध-भूमि में पडे हुए दत्य-सैनिको 
को उठा-उठाकर समुद्र में फेंक दिया। सुवेलादि को पारकर हनुमान्‌ ने उस महनीय ओपधि- 
शैल को कफ्लसेना के मध्य भाग में उतार दिया और अपने कुल के लोगो को तथा सूर्य- 
पुत्र आदि वानर-नायकों पर उन ओषधियों का प्रयोग किया । उन ओपषधियों की शक्ति से 
वे सव मूर्च्छा से मुक्त हो गये। फिर, उसने खडित देहो को सधानकरणी की सहायता से 
जोड दिया । विशल्यकरणी के प्रयोग से शर तथा शस्त्र-समूह घायलो के शरीर से निकल गये 
और उनके घाव भर गये । सौवर्णकरणी से उनके सभी अग सुवर्ण की काति के समान उज्ज्वल 
हो गये । सजीवकरणी की सहायता से उनके खोये हुए प्राण लौट आये गौर पूर्व की 
अपेक्षा अत्यधिक बल तथा उत्साह से सपन्न हो गये, मानो वे अभी सुख-निद्रा से जाग पढ़ें हो। 
तब, सभी कपि-वीरों ने वडे उत्साह से अनिलकुमार के प्रति आभार प्रकट किया । 
युद्ध-भूमि में मरे हुए राक्षसों को कपियों ने पहले ही समुद्र में फेंक दिया था, इसलिए 
उनमें से एक भी राक्षस उन ओबधियों के प्रभाव से जीवित नहीं हो सका । 


तब सुग्रोव आदि वानरो ने बडे हर्ष से सूर्य-चन्द्र की भाँति सुशोभित होनेंवाले 
राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया और बडी प्रीति के साथ अनिल-कुमार की प्रशसा की । 
हनुमान्‌ ने अत्यत हर्ष से गदगद होकर बडी भक्ति के साथ राम-लक्ष्मण को प्रणाम किया। 
तव राम ने हनुमान्‌ को देखकर बडे आदर के साथ कहा--हे वायुपुत्र, हमें इन्द्र की 
आज्ञा मान्य होती चाहिए। अत, इस ओपषधी-शैल को यथास्थान प्रतिष्ठित करके 
लौट आओ ॥।॥ 


राघव का आदेश मानकर मारुतिनदन अनुपम वेग से उसे पर्वत को यथास्थान 
प्रतिष्ठित करके शीघ्र युक्ध-क्षेत्र में लौट आया । इतने में सू्योदिय हुआ और राघव की 
चिता के साथ-ही-साथ अधकार भी दूर हो गया । तब सुग्रीव ने रामचद्र को देखकर बड़े 
उल्लास के साथ कहा--हे वसुधेश, रावण की सारी सेना, अपने अद्वितीय साहस तथा 
बल को खोकर नष्ट हो गई हैँ । कुभकर्ण आदि मुरय राक्षस एक साथ मारे जा चुके हे, 
इसलिए रावण की शक्ति समाप्त हो चकी हैं। अब वह युद्ध करने की इच्छा भी नहीं 
करेगा, इसलिए हें देव, आज रात को आप लका को जलाने के लिए वानरो 
को भेजिए ।' 


३4८ रंग्नाथ रायायर 


९२, वानरों का लंका जलाना 


इस वात को सुनकर सभी वानर सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे । झरने. शने 
सूर्यास्त हुआ और अधकार क्रमश घना होता हुआ चारो ओर व्याप्त होने लगा। तब 
कपि-वीरो ने अत्यधिक रोष से भरे हुए बड़े साहस के साथ लूकाओ को हाथ में लिये 
हुए बड़े वेग से उछलते-कदते लका को घेर लिया । द्वाररक्षक उन्हें देख भयभीत होकर 
भाग गये । तब वानरो ने लका में प्रवेश किया और लका को जलाने लगे। अग्नि क्रमश 
प्रचंड होकर दिगाओों तथा आकाजत में व्याप्त हो गई । वह प्रचंड अग्नि ऐसी लग रही थी 
कि रावण की लंकापुरी को जलाने के लिए अब राम की क्रोघाग्ति की कोई आवश्यकता 
नही, यही अग्नि उसको जलाने के लिए पर्याप्त होगी । 


वडवानल जैसे अपने घुएऐँ के साथ समुद्र-भर में व्याप्त होता है, वैसे ही यह अग्नि 
विपुल घुएँ के साथ आकाभथ तक पहुँच गई । इससे प्रासादो की पक्तियाँ अपनी मणि- 
राजियो को विखेरती हुई भस्मसात्‌ हो गई , ऊँचे-ऊँचे गोपुर पृथ्वी को केपाते हुए जलकर 
पृथ्वी पर गिर पडें और चूर-चूर हो गये । वडढी-बडी अद्वालिकाएँ आइचर्यजनक रीति से 
जलकर गिरने लगी और अग्नि-ज्वालाएँ लपलपाती हुई आकाश की ओर बढ़ने लगी। 
महान्‌ स्वर्ण-मडप, तथा रत्त-निर्मित गृह-पक्तियाँ जलकर राख हो गई । आभरणो से भरे 
भंडार-घर जैसे थे, वैसे ही भस्म हो गये । विविध अमूल्य वस्त्र, सुगध-द्रव्य, कालीनें, मोती, 
तथा मरकत, अगर-चदन, कर्पुर, कस्तूरी आदि बस्तुएँ, विविध धान्यो की अक्षय राशियाँ 
तथा अन्य मूल्यवान्‌ वस्तुएँ, हाथियों तथा घोडो की भूलें, स्थान-स्थान पर रखें हुए कवच- 
समूह आदि जलकर भस्म हो गये, जिससे राक्षसों के हृदय में पीड़ा उत्पन्न होने लगी । 
उस समय कुछ राक्षस सुवर्ण-कवच पहने हुए आयुधो से युक्त हो दुर्वार गति से वानरो 
का सहार करने का निश्चय करके घरो से निकल रहे थे, कुछ राक्षस विपुल रति-क्रीडा 
के आवेश से मस्त हो कामिनियो के सग्र-सुख की घडियाँ विता रहे थे, शब्या को 
छोडने की अनिच्छा से कुछ लोग ऊँघ रहे थे, कुछ लोग अभी सुख की निद्रा में 
निमग्न थे, कुछ राक्षस अपने बच्चो को लेकर भाग रहे थे, कुछ भौंचक होकर चारो 
दिज्लाओ में दौड रहे थे, कुछ रुदन कर रहे थे, कुछ अपनी सपत्ति को घर के बाहर 
निकालकर उसे छोड़कर जाने की इच्छा न होने से, वही चकित हो यह दृश्य देख रहे थे, 
घुएँ के कारण मार्ग न पाकर कुछ लोग जँभाइयाँ लेते हुए खडे थे, कुछ राक्षस अस्नि की 
वुफाने के लिए घर की छतो पर चढ गये, किन्तु वहाँ से नीचे उतरने में अपने को 
असमर्थ पा रहे थे, ओर जहाँ-तहाँ कुछ लोग इकट्ठ होकर घबराहट से यह दृश्य देखकर दु खी 
हो रहे थे । अग्नि प्रलयानल के समान, अपनी लपलपाती शिखाओं को व्याप्त करती हुई, 
कई भवनों तथा कई राक्षसों को भस्मसातू करने लगी । रत्न-वूपुरो का मबुर शिजन, 
वीणा की मृदु ककार, सुदर तथा मीठे वचनो की ध्वनि, अहितीय नृत्य-गीतो की ध्वनि, 
श्रुति-मधुर केका-रव, हसो का कल-कूजन तथा सुदर शुक-शारिकाओ की मधुर ध्वनि आदि 
मिट्टी में मिल गईं । चद्रिका से भी घवल काति से युक्त तथा पद्मराग-मणियों की 
काति से उज्ज्वल, उस लंका के सभी हम्ये, जलने की ध्वनि, चारो ओर व्याप्त होनेवाले धुएं 


खुद्धकाड ३६6 


तथा छिनरानेवाले स्फुलिगों से युक्त हो भयकर रूप से भस्म होकर मिट॒टी में मिल गये। 
सभी युवतियों का अभिमान चूर-चूर हो गया और वे कठपुतलियों की भाँति सन्न-्सी 
खडी रह गई । प्रचंड ध्वनि से, जलतों हुई अग्नि-ज्वालाओं से युक्त बहिर्द्वारि-समूह 
ऐसा दीख रहा था, मानो बिजलियो से युक्त मेंघ हो । नगर की वधुओ की विपुल रोदन- 
ध्वनि श्रोताओं के हृदय तथा कानो को विदीर्ण करती हुई फल रही थी । जले हुए तथा 
विना जले अपने बधनों को तोडने के प्रयत्न में विफल हो क्दन करनेवाले हाथियों तथा 
घोडो की आत्तें-ध्वनि से भरी लका ऐसी लग रही थी, जैसे इसके पूर्व राम की 
बाणागर्ति से जलनेवाले जलचर-समूह के आक्रदन से उद्देलित समुद्र दीख पडा था । 
भागनेवाले, दौडकर आनेवाले, दुख से रोनेवाले, छिपनेवाले, धुएँ से व्याकुल होकर 
भागनेवाले, लाँधकर जानेवाले, विलाप करनेवाले, आग बुझाने के निमित्त पानी लाने- 
वाले राक्षमों को पकड-पकदकर वानर उस भयकर अग्नि-ज्वालाओं में फेंक्रर भयकर 
गर्जन करने लगे । 

तब राघव अपने श्रेष्ठ कोदड को हाथ में लिये हुए इस प्रकार उस धनुष का टकार 
करने लगे, जैसे त्रिनयन ने क्ुद्ध होकर जत्रिपुरो को जीतने के लिए अपने पिनाक का टकार 
किया था । उस धनूष का टकार करते ही नक्षत्र पृथ्वी पर गिरने लगे, पृथ्वी काँपने लगी, 
समृद्र आलोडित होने लगे, रवि-शशि पथ-अ्रष्ट हो गये, स्वर्ग हिंल उठा, दिग्याओ की सधियाँ 
चटक गई, दिग्गज डोल उठे, विरूपाक्ष विस्मित हुए, भूत-समूह चकरा गया, ब्रह्मा चसस्‍्त 
हो उठे, भूमि तथा आकाश उस ध्वनि से गूज उठे और पौलस्त्य (पृलस्त्य के वशज रावण आदि) 
भयभीत हो गये । कोदड की ध्वनि, वीर वानरों का सिहनाद तथा सैनिकों के गर्जनों 
से एक साथ सभी दिशाएँ गृूजने लगी । तब राम ने कैलास-शिखर के समान विलसित 
होनेवाले लका के सिहद्दार पर पाँच बाण ऐसे चलाये कि वह खड-खड होकर गिर 
पडा । फिर, उन्होने लका के सौधो पर, अट्टालिकाओं पर, तथा रथो पर कई बाण चलाकर 
उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर दिया । यह देखकर सभी राक्षस युद्ध के लिए तैयारी करने लगे । 
इस प्रकार, वह रात्रि घोर-रूप से व्यतीत हुई । 

राक्षगों की रण-सज्जा देखकर सुग्रीव ने सभी वानरों से कहा--लका के सभी 
द्वारो की तुम जागरूक होकर रक्षा करते रहो। यदि कोई राक्षस बाहर निकले, तो उसका वध 
कर डालो । यदि तुमने किसी को छोडा, तो उस अपराध को में कभी क्षमा नहीं करूँगा।* 
यह सुनकर सभी वानर भयकर गर्जन करते हुए विशाल पर्वतो तथा वृक्षों को लिये हुए 
अत्यधिक रणोत्साह से भरे दुगं के द्वारों की रक्षा करने लगे । 


९३, कुंभ-निकुंम का युद्ध के लिए प्रस्थान 
वानरों का भयकर गर्जन असुरेन््र के लिए असह्य हो गया । उसने तुरत भयकर 
पराक्रमी, कुभकर्ण के पुत्र कुभ तथा निकुभ को युद्ध करने के लिए भेजा । उनकी सहायता 
के लिए रावण ने कपन, प्रजघ, शोणिताक्ष तथा उपाक्ष नामक राक्षसों को भी उनके साथ 
भेजा । वे राक्षस-वीर गज, अब्बच तथा रथों पर आहरूढइ हो, परिघ, गदा, शल, करवाल, 
फुत, मुदूगर, धनुप, बाण आदि आयुधो से सज्जित होकर चलें । उनके पीछे अत्यत 
डे 


३७86 र्णना्ें एयोयर्ण 


गक्तिञाली दानव-सेना भी चली । उनकी सुदर पताकाएँ फहराने लगी और उनके आभूषणों 
की काति दीप्त हो उठी । तुरहियों की ध्वनि तथा भीषण सिंहनाद से पृथ्वी को कंपातें हुए 
लका को जलाकर गर्व से भूमनेवाले वानरों पर राक्षसों ने ऐसा आक्रमण किया, जैसे 
प्रलय-काल का पवन-समूह प्रलय-काल के वादलो पर आक्रमण करता हों । पहले उन प्रचंड 
पराक्रमी वीरो ने दुर्ग के द्वार पर दुर्वार गति से रहनेवाले कपि-सैनिको पर आक्रमण 
करके उन्हें भगा दिया । उन वानरों को भागते देखकर हरिरोम, केसरी आदि वाह- 
बली योद्धाओं ने उन्हे रोका और रोप से भरे हुए दैत्य-वीरों से स्वय भिड गये 
और उन पर पर्वतो तथा वक्षों को फेंकने लगे । किन्तु, राक्षमों ने अपने करवाल, गदा, 
घूल, परिध, चक्र आदि श्रेष्ठ अस्त्रों से उन्हें रोक दिया | तव वानरो ने अपने नखो से 
उनका वक्ष/ःस्थल चीौर डाला, उनके कानो तथा नाकों को खडित किया, दाँतो से काटा 
और सिरो पर मृुष्टियो से प्रहार किया । एक वानर एक देत्य पर मुष्टि से प्रहार करता था, 
तो दूसरा राक्ष उस वानर पर मुष्टि से प्रहार करता था । एक राक्षस किसी कपि 
को मार डालता, तो दूसरा कपषि उस राक्षस का वध कर डालता था । एक देत्य किसी 
कपि को पकड लेता, तो दूसरा दैत्य शंक्ष उस कपषि को पकड लेता था । एक कपि किसी 
राक्षस को घेर लेता तो दूसरा देत्य गीघ्र उस कपि को घेर लेता । एक राक्षस किसी 
कपि को युद्ध करने के लिए ललकारता, तो दूसरा कपि उससे युद्ध करने लगता । कही- 
कही सात-आठ योद्धा एक साथ अपने अत्रु को अकेले घेरकर उसको मुप्टि के प्रहारों से 
मार डालते, तव उसके फलस्वरूप दोनों पक्षो के कितने ही कपि तथा राक्षत लडकर मर 
जाते । इस प्रकार, दोनो पक्ष के योद्धा भयकर सिंहनाद करते हुए घोर युद्ध करने लगे । 
तब रण-भूमि परववत-शूगों, गज, हय तथा राक्षसों के विद्ञाल शरीरो एवं शस्त्रों से भरकर 
भयकर दीखने लगी । 


युद्ध इस प्रकार चल ही रहा था कि कपन ने एक विशाल गदा उठाकर अगद पर 
प्रहार किया । इस प्रहार से अगद बहुत ही व्याकुल हुआ, किन्तु शीघ्र ही सँभलकर एक 
विद्याल पर्वत से उस दैत्य पर प्रहार किया | तब वह राक्षस चूर-चूर होकर मिट्टी में मिल गया। 
यह देख कपिनायक अगद बडे दर्प से सिहनाद करने लगा । कपन की मृत्यु को देख, 
गोणिताक्ष ने अत्यधिक कुद्ध होकर अपना रथ अगद के निकट ले जाकर अग्रद पर अक्षतास्त्र 
चलाने लगा । अगद उसकी वाण-वर्पा से व्रिचलित हो उठा । वह तुरत उस राक्षस के 
रथ पर कूद गया और उसका घनुष तोड़ दिया, तो वह राक्षस श्ीघत्र ही खड़ग लेकर 
आकाश की ओर उछला । तव कपि-वीर भी उसके साथ ही आकाज की और उछला 
और उस राक्षस के हाथ का खड़ग छीनकर उसीसे उस राक्षस पर प्रहार किया। तब 
वह राक्षस मूच्छित हो गया । तव अगद यम के समान राक्षस-समूह का सहार करने लगा। इतने 
में गोणिताक्ष सचेत हुआ और गदा लेकर अग॒द पर आक्रमण किया | प्रजघ भी उसकी 
सहायता के लिए आ गया और गवाक्ष भी उसकी सहायता के लिए आ पहुँचा । यह देख- 
कर द्विविद तथा मेन्दर अगद की सहायता के लिए आये | तब उन दोनी दलो में घोर 
युद्ध छिड गया | जब वानर राक्षमों पर पर्वतो की वर्पा-्सी करने लगे, तब प्रजघ ने देखते- 


खुद्धकांड इ0ए 


देखते उन पर्वतो को तोड डाला । उसके बाद तीनो वानर-नेताओं ने गज, तुरग तथा रथों पर 
लगातार पव॑तो तथा वृक्षों की वर्षा की, तो उपाक्ष ने अद्वितीय ढग से उन्हें वीच ही में 
काट डाला । उसके पह्चात्‌ द्विविद तथा मैन्द आश्चर्यजनक रीति से वृक्षों को उखाइकर 
राक्षमों पर फेंक्रने लगे तो जोणिताक्ष ने अपनी गदा से उन्हें बीच में ही चूर-चूर कर दिया। 
तब प्रजघ ने अपनी तेज तलवार को चमकाते हुए वानरों से भिड गया, तो मैन्द ने एक 
काले साल-वृक्ष से उस पर प्रहार किया । इससे सतुष्ट न होकर मैन्द ने अपनी मुष्टि से 
उस राक्षस के वक्ष पर प्रहार किया, तो खड़ग को नीचे फेंककर उस राक्षस ने क्रोध से 
अपनी वज्न-सम मुष्टि से मैन्द पर प्रहार किया । इस प्रहार से मैन्द मूच्छित हो गया, किन्तु 
शीघ्र ही समलकर अपनी प्रवल मृष्टि से प्रजघ पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस 
पृथ्वी पर गिर पडा । अपने चाचा को इस प्रकार गिरते देखकर उपाक्ष रथ से उतर पडा 
और तलवार लेकर युद्ध करते के लिए निकला । तब द्विविद ने अत्यत क्रोध से उस पर 
आक्रमण किया, अपनी प्रबल मुष्टि से उस पर प्रह्मार करके अपने समस्त वल से उसे 
पकड लिया । तुरत उपाक्ष का अनुज गोणिताक्ष वहाँ पहुँच गया और द्विविद के वक्ष स्थल 
पर मुष्टि का श्रवल प्रहार करके उसे मूच्छित कर दिया और अपने भाई को छुडाकर ले 
गया । द्विविद झीघत्र ही सचेत हो उठा और मैंन्द को साथ लेकर उपाक्ष तथा शोणिताक्ष 
पर आक्रमण करके युद्ध करने लगा । युद्ध करते समय द्विविद ने आश्चर्यजनक ढंग से 
शोणिताक्ष को पकडकर उसे अपने पैरो से ऐसा रौद दिया कि उसका रूप पहचानना भी कठिन 
हो गया । तभी मैन्द ने अपनी भीषण मुष्टियो के प्रहार से उपाक्ष को, उसके शरीर तथा हड्डियों 
को चूर-चर करके, मार डाला । 


इस प्रकार, चारो राक्षसनेताओं को मरे देखकर राक्षस-सेना प्राण लेकर भागने 
लगी । यह देखकर कुभ अत्यत क्रुद्ध हुआ और भागनेवालो को आश्वासन देकर सुरधनु- 
सदृश प्रकाशित होनेवाले अपने धनुष तथा चमकनेवाले वाण धारण करके एक पैर आगे 
करके धनुष चलाने की मुद्रा में खडे होकर क्रर गति से वानरों पर बाण चलाने लगा । 
उसके वाणो के प्रहार से द्विविद एक पहाड की भाँति पृथ्वी पर भयकर गति से गिर पडा । 
अपने सामने अपने प्रिय अनुज की यह दशा देखकर मैन्द ने अत्यत वेग से एक पव॑त कुभ 
पर फेंका, तो उसने सात बाणो से उस पर्वत को नष्ट-अ्रष्ट कर दिया । फिर, उसने मैन्द 
पर एक ऐसा अस्त्र चलाया कि वह वीर पृथ्वी पर लुढक गया । अपने दोनो मातुलो को 
इस प्रकार धराशायी होते देख, अगद ने एक विशाल पर्वत को उठाकर कुभ पर फेंका । 
किन्तु, उसने पाँच बाणों से उस पव॑त को तोड दिया और फिर लगातार अगद पर असस्य 
शर चलाये । क्रोध से जलते हुए अगद ने भयकर गति से कुभ पर कई विज्ञाल पर्वत 
फेंके, किन्तु कुभ ने उन सब पर्वतो को सहज ही काट डाला । उसके पश्चात्‌ उसने दो 
पैने शर अगरद के ललाट के मध्य भाग को लक्ष्य करके चलाये । इन थरो के प्रहार के 
कारण फ्टनेवाली रक्‍त-धाराओ को पोछते हुए अगद ने एक पेड को उस्लताडकर उससे 
कुभ पर प्रह्मर किया, किन्तु उस राक्षस ने उस पेड को भी तोडकर अगद को बहुत भीयण 
वाणों से पीडित किया । इससे अगद मूच्छित होकर पृथ्वी पर गिर पडा। उसके गिन्‍ते ही 


इछर्‌ एगनाथ रामायण 


सभी वानर-सैनिक राम के पास भागे और उन्हें सारा वृत्तात कह सुनाया । राम ने 
जाववान्‌ आदि श्रेष्ठ वानर-वीरो को कुभ के साथ युद्ध करने के लिए भेजा । वे वृक्षों 
तथा शिलाओ को फेंक्रते हुए राक्षस-सेना को भगाने लगे । तब कुभ ने अनेक पैने शरों 
को चलाकर वानर-वीरों के आक्रमण को रोका भौर अपनी सेना को आश्वस्त किया । 
कपि-वीरो तथा अगद को युद्ध-भूमि में मूच्छित गिरे देखकर सम्रीव क्रोधोन्मत्त होकर असख्य 
विशाल पर्वत तथा अब्व-कर्ण वृक्षो को उखाडकर उनसे दानवों पर प्रहार करने लगा । 
किन्तु, देखते-ही-देखते कुभ ने उन सब को नष्ट-अ्रप्ट कर दिया और रवि-्पुत्र पर कई 
वाण चलाकर उसे अत्यधिक पीडा पहुँचाई । फिर भी, विचलित न होकर सुग्रीव ने उस 
राक्षस के धनूष को छीनकर उसे खड-खड कर दिया । दाँत तोडने से जैसे हाथी क्रोध से 
अपने शत्रु पर भपटता है, वैसे ही कुभ क्रोधावेश से सुग्रीव को मार डालने का निश्चय 
करके, उसकी ओर लपककर उससे जूक गया । उस समय वे दोनो ऐसे लगते थे, मानो 
दो हाथी आपस में भिडकर लड रहे हो । इस प्रकार, दोनो उद्धत हों, अपनी श्रेप्ठ भुज- 
जक्ति को प्रदर्शित करते हुए, अपने चरण-ताडनो से पृथ्वी को कॉपाते हुए घुएँ के समान 
लवी साँस छोडते हुए, परस्पर ऐसे टकराते थे कि उनके आघातों से सारा आकाश विदीर्ण 
हो जाता था । 


९४, सुग्रीव के द्वारा कुंम का वध 


निदान, सुग्रीव ने उस कुभ को उठाकर चारो ओर वेग से घुमाया और उसे समुद्र 
में फेंक दिया, तो सभी देवता हप॑ की ध्वनि करने लगे। वह राक्षस समुद्र में ऐसे जा गिरा, 
मानों मदराचल ही समुद्र-तल में गिर गया हो । किन्तु, वह राक्षस फिर अत्यधिक वेग से 
सूर्य-पुत्र॒ के समक्ष पहुँच गया और अत्यत क्रोव से सुग्रीव के वक्ष स्थल पर अपनी- 
मृष्टि से ऐसा प्रहार किया कि उसका प्रभाव सुग्रीव की हड्डियो पर भी पडा और अग्नि- 
कण ऐसे छित्तरा गये, जैसे वज्चपात होने से कनकाद्वि से अग्नि-क्रण निकलते हो । इससे 
क्रोधाग्ति से जलते हुए सूर्य-पुत्र ने उस नीच राक्षस के वक्षःस्थल को लक्ष्य करके अपनी 
मृष्टि से ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि राक्षस अपनी शक्ति खोकर पृथ्वी पर लुढ़ककर 
मर गया । श्ञात अग्नि के समान, प्रताप से हीन हो जब वह गिर गया, तव सभी राक्षस 
भयभीत हो, ऐसे भागने लगे कि सारी पृथ्वी हिल उठों और सभी समुद्र आलोडित 
हो उठे । 

अपने अग्रज को इस प्रकार गिरते हुए देखकर निकुभ की आँखों से अग्ति-कण निकलने 
लगे । वह क्रोबावेश से सिहनाद करके, कनक-रत्न-प्रभा से युक्त तथा सतत पुष्प-चदन से अर्चित 
अपने परिघ को ऐसे घुमाने लगा कि समस्त ब्रह्माण्ड टुटता हुआ-सा दीखने लगा, सभी 
दिशाएँ चटकती-सी दिखाई पडने लगी और वायु-पाञ् दूठते-ने दीखने लगे । तब हनुमान 
सग्रीव की सहायता के लिए आ पहुँचा और गर्जन करते हुए स्वय उस राक्षस का सामना 
किया । तब राक्षस ने क्रोबोन्मत्त हो अपना परिघ मारुति के वक्ष स्थल पर चलाया । उस 
प्रहार से चारो ओर अग्निक्रण छिटक पे और परिघ आइचर्यजनक हूग से चर-चर 
ढोकर हनुमान्‌ के वक्ष की कठोरता को प्रकट करने लगा। उस आधघात के कारण 


सुद्धकााड २७३ 


हनुमान्‌ स्वयं ऐसा हिल गया, जैसे प्रचंड वायू के कारण कोई विज्ञाल वृक्ष डोलने लगता हैं । 
फिर भी, अत्यत थैय॑ के साथ हनुमान्‌ ने निकुभ के वक्ष पर अपनी मृप्टि का ऐसा 
प्रबल प्रहार किया कि उसका वक्ष विदीर्ण हो गया और रक्‍त की धारा फूट निकली । 
निकुभ भी प्रचण्ड वायू-बेंग से आहत वृक्ष को भाँति काँप गया और जी।प्र ही सँभमलकर 
उद्धत गति से हनुमान्‌ को ऊपर उठा लिया । यह देखकर सभी दानव हर की ऐसी ध्वनि 
करने लगे कि सारा आकाञ काँप उठा । किन्तु, कपि-पुगव हनुमान्‌ ने अपने-आपको शीघ्र ही 
उसके हाथो से छुडा लिया और युद्ध-भमूमि पर कद गणा । उसने अपनी मृप्टि से 
निकुम पर प्रवल प्रहार किथा और उसे उठाकर पशथ्ची पर ऐसे पटका कि उसको हड्डियाँ 
च्र-चूर हो गई । फिर, उसने उस राक्षस की छाती पर चढकर उसका सिर काट डाला 
और ऐसा भयकर गजन किया कि सभी दिद्ञाएं हिल उठी और पृथ्वी, आकाश, समुद्र एवं 
सारा दिद्ठमण्डल उस ध्वनि से गूंजने लगा । 

हतशेप राक्षस जीघ्र लका में रावण के निकट पहुँच गये और कुभ-निकुभ जादि छह 
शक्तिशाली वीरो की मृत्यू का समाचार कह सुनाया । तब रावण ने अत्यत क्रुद्ध होकर 
खर के योग्य पुत्र मकराक्ष को बुलाकर कहा-- तुम अपनी विशाल सेना को साथ लेकर 


अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए राम-लक्ष्मण तथा उन वानरों का सहार करके आओ ।' 
९४ मकराक्ष का युद्ध 

रावण का आदेश पाकर मकराक्ष अत्यधिक उत्साह से भर गया कि मुझे अपने 
पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का अवसर मिल गया । हर्ष से उसकी छाती फूल गई । 
उसने रावण को प्रणाम किया और उसकी आज्ञा लेकर रथ पर आरूढ होकर चल पडा । 
उसने रणोत्साह से फूलते हुए अपने निकट उपस्थित वीरो को देखकर कहा--तुम उग्र 
रूप से कपियो से युद्ध करो । में अपने भीषण शरो की अग्नि से राम-लक्ष्मण को तथा 
वानरो को छिन्न-भिन्न करके उनका नाश करूँगा ।' 

उसके आदेश को स्वीकार करके सभी दानव उसके पीछेगीछे चलने लगे । चलते 
समय उन्हें कई दु शकुन दिखाई पड़े । किन्तु, उन सबकी उपेक्षा करके तुरही-नाद तथा 
सिहनाद करते हुए राक्षस-सेना कपि-सेना पर ऐसे टूट पडी कि पृथ्वी तथा आकाश 
विचलित हो गये । वानरो ने दैत्यो पर पर्वतो तथा वृक्षों की वर्षा की, तो दानवों ने गदा, 
दड, कोदड, खड्ग आदि महान्‌ शस्त्रो की सहायता से उन सबको शीघ्र ही खडित कर 
दिया और अपने शस्त्रों के प्रहार से वानरों को व्याकुल करके सिंह-गर्जतज किया । उस 
समय मकराक्ष ने सभी वानरों पर अपना रथ वेग से चलाते हुए उन पर कभी तीस, 
कभी सो, कर्भी साठ, कभो पैसठ, कभी बीस, कभी छत्बीस, कभी छह, कभी वारह, कभी 
दो, कभी दस, कभी पन्द्रह, कर्म, अठारह, कर्भ। तेरह, कभी चार, कभी चौदह, कभी तीन, 
कभी पाँच, कभी सात और कभी नौ वाण चलाकर उन्हें पीडित कर दिया । 

उन अस्बप्रो को सह न सकने के कारण सभी वानर इस वेग से भागने लगे कि 
पृथ्वी भी काँप उठो । तब राम ने घबनुप उठाकर वानरो को आश्वासन देते हुए कहा-- 


बे 


भयभीत होकर भागों मत, में अभी आता हें, यो कहते हुए राम राक्षमों की चतुरगिणी 


3७2 एस्यनएशयथ एयायण 


सेता का सहार करने लगे । यह देखकर मकराक्ष क्रोव से दहाडते हुए अपना रथ राम के 
पास ले गया और उनसे कहने लगा--'हे राघव, में खर का पृत्र हूँ। तुमने पहले मेरे 
पिता का वब किया हैं । इसी कारण मेरा हृदय इतने दिनो से जल रहा हैं। में सतत 
तुम्हारे साथ बुद्ध करन के अवसर की प्रतीक्षा में था । आज वह अवसर मम मिल गया । 
तुन यहाँ से हटों मत । अपने पिता के वब का प्रतिश्योथ लेने के लिए आज मेने तुम्हें 
प्राप्त किया है | तुम गदा, बनुप या खड्ग इन तीनो में से किसी को लेकर मेरे साथ 
युद्ध कर सकते हो ।' 

तव राघव ने क्रुदढ्ठ होकर उससे कहा--है नीच दानव, व्यर्थ का गे क्यो करते हो ” 
में अपने भुजचल का प्रदर्शन करके युद्ध में तुम्हारा वध करूँगा | इन बातों को 
सुनकर मकराक्ष ने राम पर कई पँने बाण चलाये । किंतु, बीच में ही राम ने उन्हें काट 
डाला । उन दोनो के कठोर धनुष के टकारो से समस्त ब्रह्माण्ड तथा दिद्याएँ कपायमान 
होने लगी । मकराक्ष, राम के चलाये सभी अस्त्रों को ज्ञीघत्न ही काट डालने और उन पर 
अनुपम वाणों का प्रह्मर करने लगा । किंतु, राघव ने उसके वाणों को काटकर विविव 
भीषण चरो से उसे आहत करने की चेप्टा की । लेकिन, उस राक्षस ने शीघ्र ही सब 
अस्च्रों को खड-खड करके भयकर सिहनाद किया। तब काकुत्स्थ-चणज ने एक बाण से 
उसे राक्षत का धनुष काट डाला | आठ जरो से उसके सारथी का सहार किया और 
उतने ही वाणो से उसके रथ को छिल्न-भिन्न कर दिया । 

रय से रहित होकर मकराक्ष ये एक घूल राम पर चलाया । कितु, राम ने तीन 
वाणों से उसको चूर-चूर कर दिया । बह देखकर देवता राम की प्रशसा करने 
लगे । वह राक्षस क्रोवोन्मत्त दाज्रथि पर मुप्टि से प्रहार करने के लिए वेग से उनकी 
ओर जाने लगा । क़ितु, राम ने इसी वीच उसके वक्ष पर अनलास्त्र का प्रहार किया, तो 
मकराल्ष तुरत पृथ्वी पर गिर पडा । उसी समय पब्चिम पर्वत पर कमल-वाघव (सूर्य ) अपनी 
अरुण प्रभा से भासमान होने लगा । हतणेप राक्षस लका में भाग गये और रावण से 
मकराक्ष की मृत्यु का समाचार कह सुनाया । तब क्रोध एवं चिता से अभिभूत होकर रावण ने 
इद्रजीत से क्हा--हें तात, युद्ध में कपियो तथा राम-लक्ष्मण को क्षणमात्र में मार 
डालने को क्षमता रुखनेवाला तुम्हारे सिवाय और कौन घूर रह गया हैं ? तुम गीत्र 
अपनी सेना के साथ जाओ और उन दोनो का सहार करके लौट आओ, जैसे तुम देवताओं 
का सहार करके लौठ आये थे ।' 

९६. इन्द्रजीत का तृतीय युद्ध 

तब इद्रजीव ने विनय से रावण को ब्रणाम किया और उसकी जाज्ञा लेकर युद्ध 
के लिए चल पडा | वायुवेग से जानेबवाले अब्चों से जूते हुए विशाल रथ पर आखूढ 
होकर जरत्काल के वादलो से आच्छादित शैल की भांति वह ब्वेत छत्रो की छाया में बेढे 
हुए जाने लगा । उसके दोनो पार्ष्वो में सुन्दर्याँ अपने रमणीब ककणों की मधुर घ्वनि 
करती हुई चामर इला रही थी । अपने मुख पर रणोत्साह की दीप्ति को लिये हुए उसने 
अपनी साता को प्रणाम किया और माता से आज्ीर्वाद प्राप्त करके यत्नी तथा पुत्रों से 


द 


रुद्धकांड २09९ 
विदा लेंकर अपने भाइयो की मृत्यु का स्मरण करकं, अत्यत कऋ्रुद्ध हो, बडे दर्प को साथ 
वह आगे बढा । उसके पीछे असख्य दानव-सेना तथा काम-रूप मत्री उसकी सेवा करते 
हुए चले । उसी समय साठ करोड, चार दाँतवाले विशालकाय गज तथा भेरुण्ड पक्षी 
के समान वृहदाकार, तोते के रगवाले चार करोड घोडें उत्तर द्वार से निकले । ऐसी 
घोर युद्ध-सज्जा से युक्त हो इद्रजीत निसानो की भयावह ध्वनि के वं।च लकापुर से निकला 


कि 


और वानर-बीरो के दुर्वार गर्जनों की ध्वनि से गृजायमान होनेवाली युद्ध-भूमि में जा पहुँचा। 


९७, इन्द्रजीत का होम करना तथा कृत्ति नामक शतित प्राप्त करना 
युद्ध-भूमि में पहुँचकर इच्धजीत रथ से उतरा और चारो ओर दैत्यो को खडा 


किया । एक त्रिकोणाकार वेंदी बनाई और दक्षिण दिशा से इमजान की सिद्ध-अग्नि ले 
आकर उसे वेदी पर प्रतिष्ठित किया । उसके पर्चात्‌ उसने बडी भक्ति से रक्‍त वर्ण के 
वस्त्र, माला तथा चदन धारण किये, दण्ड, उपवीत तथा मौर्जी (मूँज की करधनी) धारण 
की और सपूर्ण मन से खट्वाग का ध्वज स्थापित किया, महान्‌ निष्ठा से कपाल पर आसीन 
होकर ककाल की परिधि बनाई और दक्षिण दिशा में लोहे के ख्रुक्‌ तथा खुबा सजाये । 
फिर, उसने कृष्ण वर्ण के यज्ञ-पशुओ के रक्त तथा मास अग्नि-कुड में डालकर मौन 
धारण किया । तत्पब्चात्‌ अथव्वंवेद की विधि के अनुसार अविराम मत्रोच्चारण करते हुए 
लुक-लूवाजो को अपने हाथ में लेकर उस प्रज्वलित अग्नि में विधिवत्‌ ताड की 
समिधाओ, तिल तथा सरसों का हवन किया और उस होम के धूम से समस्त ब्रह्माण्ड 
को भर दिया । उस समय उस अग्नि-कुड से एक विशाल रथ निकला । फिर, भयकर 
केश, भयावह रूप तथा कपाल, चमकनेवाली डाढें, अस्थि की मालाएँ तथा अग्नि-ज्वालाओं 
को उगलनेवाली आँखो से युक्त हो, निरतर अट्टहास करती हुई दहाडनेवाली एक (हत्ति) देवी 
निकल । उस देवी ने कहा--हे देव-वैरी, जो भी कार्य हो, मुझे सौपो। में उसे सपन्न 
करूँगी । उस देवी को पहचानकर, इन्द्रजीत अस्त्रों को तथा उसको लिये हुए, रथ पर 
बैठे, आकाश में चला गया और वानरो पर आक्रमण करने के लिए छिपा रहा । उसकी 
सारी सेना लका को लौट गई । 

इन्द्रजीत कपि-सेना पर घोर गर-वृष्टि करके उन्हें विवश कर दिया । शिलाओ 
की वर्षा के कारण चारो ओर उडनेवाले पक्षियों की भाँति कुछ वानर तितर-बितर होकर 
भाग गये । कुछ वानर अपना प्रताप खोये हुए रहे । कुछ घायल होकर लाल रग की 
नदियों से युक्त पर्वतो के ढहने को भाँति रक्त-धाराएँ वहाते हुए पृथ्वी पर गिरने लगे । 
उस राक्षस-कुमार के वाणों के कारण चारो ओर अधकार व्याप्त हो गया । वानर-बीर 
अतरिक्ष में छिपे हुए इद्रजोत को देख नहीं सकते थे । इसलिए, वें उन वाणो को रोकने 
का कोई उपाय भी नहीं कर सकते थे। किन्तु, इन्द्रजीत अविराम गति से भूमि तथा 
आकाश को अपने बाणो से भरने लगा । उन पौने वाणों से कुछ वानरों की कमरें वंट 
गई , कुछ चूर-चूर हो गये, कुछ खड-खड होकर मिट्टी में मिल गये । कुछ इद्रजीत के 
वाण लगते हो, युद्ध करने के लिए लाये हुए वृक्षों को, पृथ्वी पर छोडकर भूमि पर 
लोट गये । 


३४% ह रगनाय एरयायरी 


कुछ लोगो के सिर पर वाण ऐसे लगने कि वे पृथ्वी से सट जाते और खडे-ही- 
खडे मर जाते थे, कुछ समस्त अगो में वाणों के लगने सें, भूमि पर लोट जाते । कुछ 
गजो के बवों की आइड में छित जाते और कुछ अपने हाथों में पर्वत उठाये हुए राक्षस के 
वाणो को रोकते । कुछ वानर इद्रजीत के दृष्टियोचर न होने से पुर -पुन जाकाज की 
ओर देखते हुए दाँत पीसते थे | अविरन अस्त्र के प्रवाह के ऊत्र से गिरते रहने से कुछ 
वानर उससे अपने मृखो की रक्षा करने के लिए अपनी हथेलियों को सेतु के समान वनाकर 
उसे रोकते थे । कुछ वानर अशनि-पिंडो को भाँति गिरनेवालें उन वाणों को गीदत्र ही 
अपने हाथो से तोंड डालते थे और कुछ पूछो से उन पर प्रह्मर करके उन्हें तोइ डालते थे, 
कुछ बानर वाणों के आघात से रक्त में सन गये थे और कुछ वाणो के प्रह्मर के 
वावजूद अचल खड़े रहते थे । कुछ वानर आँतो के बाहर निकलने से पृथ्वी पर लोटतें हुए 
और जेंगाइयाँ लेते हुए अपनी आाँखें वद कर लेते थे, कुछ कहते थे कि अत में हम 
श्रीराम के लिए ब॒द्ध में अचने प्राण दे पाये और कुछ ब्रह्मा को कोसते हुए कहते थे कि 
यह दुर्जेव हैं, आज इसको जीतना असभव हैं । कुछ वानर कहते थे कि यह ब्रह्मा की दी 
हुई जगक्ति है, इसलिए यह ब्रह्माण्ड में कही भी दीख नहीं रहा है, किन्तु राम के जागे 
ब्रह्मा का वर ही क्‍या हैँ और स्वय ब्रह्मा की ही क्या हस्ती हैं ”? पता नहीं कि रामचन्द्रजी 
अवतक कुद्ध क्यों नहीं हों रहे है ? 
इस प्रकार, सभी वानर जितने मुह उतनी वातें कर रहे थे | इन्द्रजीत अपने अनुपम 
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए एक स्थान पर बनृप का टकार करता, तो दूसरे स्थान पर 
घशर-बुप्टि करता । एक स्थान पर अपना नाम कहता, तो दूसरे स्थान पर गर्जन करता, 
एक स्थान पर डॉट बताता, तो दूसरे स्थान पर हसता और कही हुकार भरता । इस 
प्रकार, जब वह भयकर गति से विचरण करने लगा, तब श्रेष्ठ बलवान हनुमानू, अगद, 
गरभ, ऋपभ, जाववानू, गज, गवाक्ष, गधमादन, विजय, नील, सुषेण, पनस आदि योद्धा 
शीघ्र ही पर्वतों तथा वुक्षो को उठा-उठाकर समस्त आकाज में फेंकने लगे, किन्तु वे इच्ध- 
जीत के चलाये हुए वाणों से ठकराकर खड-खड हो गये और वायू-वेग से तथा भयकर 
व्वनि के साथ, जहाँ-हाँ पृथ्वी पर गिर गये और उनकी चोट से कई वानर मृत्यु को 
प्राप्त हो गये । फिर, मेंघनाद अत्यत करता से वाणों को अविराम वर्षा करने लगा, तो 
कुछ वानर खडित होकर गिर पडे और कुछ भयभोत होकर चारो दिद्याओं में जाकर छिप गये । 
इस प्रकार, इतद्रजोत ने वाणो के प्रह्र से दस करोड़ वानर-वीरो को मिद्‌टी में 
मिला दिया । उसके पच्चात्‌ भी उसका सामना करनेवाले कितने ही वानरो को अपने 
प्रचण्ड वाणों के प्रहार से खड-वड कर दिया । महान पराक्रमी हनुमानूु, अगद, गतवली 
गवाक्ष, नील, नल, पनस, कुमृद, गवमादन तथा ऋल्ष एवं असख्य वानरनायको को अपने उम्र बाणो 
से निश्चेप्ट कर दिया और ऐसा सिंहनाद किया कि देवताओं के हृदय भी दहल उठे । 
९८, राम का आग्नेय अख्तर से इन्द्रजीत की माया को दूर करना 


इन्द्रजीन के दुर्वार विक्रम से मन-हींमन भयभीत हो, गर्व त्यागकर कपि-सैनिक 
लक्ष्मण के पीछे आ आकर गरण लेने लगें । तब सौमित्र ने रामचद्र को देखकर कहा-- 


ता 


खुद्धकाड ३७७ 


0] 


है देव, अपनी माया के कारण गर्वाध होकर यह इस प्रकार कपि-सेना का सहार करने 
पर तुला हुआ है । हमें अब जी घ्र इसका वध कर डालना चाहिए ।॥ तव राम ने अनुज को 
देखकर कहा--हे लक्ष्मण, ब्रह्मा के वर के प्रभाव से यह आकाश्य में दूसरो की वृष्टि में 
आये विना गर्व से बहुत फूल रहा है । हम कितना भी क्रुद्ध होकर युद्ध करें, यह हमारे 
वश में नही आ सकेगा । आज यह हमारे लिए असाध्य हैं । इसके ऊपर कोई भी अस्त्र 
सफल सिद्ध नहीं होगा, केवल हमारे अस्त्र व्यर्थ जायेंगे ।। उसी समय अग्निदेव ने आकर 
मृदु बचनो में कहा--हे नर-ताथ, इसकी माया को देखकर आप भयभीत मत होइए । 
यदि आप आगशग्लेय मत्र को जपकर बाण चलावें, तो उस देवी की शक्ति नष्ट हो जायगी 
ओर वह उस राक्षस को छोडकर चली जायगी ।' 


इतना कहकर जब अग्निदेव चले गये, तब राम विधिवत्‌ अग्नि-मत्र का 
जप करके बाण चलाया । तुरत वह माया-मूत्ति अद्भुत रीति से इन्द्रजीत को छोडकर कर्ह 
चली गईं । तव इन्द्रजीत पृथ्वी पर उतर आया और धनुष का भीषण टकार करने लगा। 
इतने में सभी वानरनायक मूर्च्छा से मृक्‍त हो श्ञीत्र एकत्र हुए और इन्द्रजीत से भिड गये । 
हनुमान्‌ ने शैल-श्ग से, अगद तथा मैन्द ने विज्ञाल पवेतों से, गज ने बडे पर्वत से, नील ने 
एक विशाल वृक्ष से, नल ने अश्वकर्ण नामक वृक्ष से, सूयये-पुत्र ने एक विद्याल वृक्ष से, 
पनस ने असख्य शाखाओवाले वृक्ष से, विभीषण ने भयकर गदा से, सपाति ने ताल-वृक्ष से, 
अन्य वानर तथा जाववान्‌ आदि वीरो ने असख्य वृक्षों तथा महाशैलो से इन्द्रजीत पर 
प्रहार किया । लक्ष्मण ने तीन वाण चलाये और राघव ने एक सौ तीर चलाये । किन्तु 
उस राक्षस ने उन सब को अपने विविध बरो से चूर-चूर कर दिया और अपने घोर वाणो 
की वृष्टि से वानरों को विफल कर दिया । उसने अठारह परुष तथा उग्र बाणों से गध- 
मादन को, पाँच द्ारो से मैन्द को, सात तीरों से द्विविद को, सात वाणों से हनुमान्‌ को, 
सात ही बाणो से कुमूद को, नौ वाणों से अगद को, उतने ही शरो से नल को, पाँच 
तीरो से नील को, सात बाणों से गवाक्ष को, पेसठ बाणो से सुग्रीव को, वीस वाणों से 
पनस को, सात बाणों से दधिमुख को, सौ वाणों से राघव को, पचहत्तर वाणों से लक्ष्मण 
को, तीन ही वाणों से शतवली को, तथा सौ वाणों से विभीषण को व्याकुल कर दिया 
और अन्य वानर तथा ऋक्ष-वीरों को अपने शराघात से मरणासन्न कर दिया । तब हनु- 
मान्‌ ने पर्वत-श्वग को, अगद ने बृहदाकार शिलाओं को, पनस तथा विभीषण ने विशाल 
गदाओ को, सपाति ने उत्ताल ताल को, नल ने साल तथा अद्वकर्ण नामक वृक्षों को, 
सूर्य-पुत्र॒ने पर्वत-पक्तियों को, शक्ति-विक्रम-सपन्न नील ने शक्ति को, अनल ने सप्तपर्ण को, 
अन्य वानरो ने खदिस-व॒ुक्षो को तथा अतबली ने वेर-वृक्ष को उस इन्द्रजीत पर फेंका । 
लक्ष्मण ने तीन उग्र बाण चलाये और राम ने एक सौ श्रेष्ठ शरों को चलाया । थरभ, 
ऋषभ, जाववानू, गवय, सुपेण, गवाक्ष, गज, द्विंविद, मैन्द तथा अन्य अनुपम शूर वानरो ने 
विद्याल पर्वेतो तथा वृक्षों को उस राक्षस-राजकुमार पर फेंका। किन्तु, इन्द्रजीत ने आइ्चर्य- 
जनक ढग से उन सबको अपने बाणों से चूर-चूर कर दिया और नूये-पुत्र के वक्ष पर 
एक शूल ऐसा चलाया कि वह प्रचण्ड वायु के आघात सें कपित होनेवाले वृक्ष की भांति 
है 


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३७८ रंगना/थ रायायण 
कॉँप गया । तुरंत उसने ऋषभ, गवाक्ष. सुपेण, अगद, जाववानू, कुमुद, हनुमान्‌, गधमादन, 
नल आदि वीर वानरो को अपने अनुपम युद्धतक्ौजल से विवश कर दिया । फिर, 
उसने राघव पर विविध वाण चलाये और लक्ष्मण के घनुप को खडित कर दिया और 
विभीषण को वाणों के प्रह्मार से कककोर दिया । तव उसने प्रलय-काल के वादल की भाँति 
वास्वार गर्जन करते हुए राम से कहा--हे रघुराम, देखा तुमने, मेरे क्रोव में जाते ही 
सुग्रीव आदि वानर-बीर कैसे गिर गये ? हें राजकुमार, तुम पर विब्वास करनेवाले इन 
वानरों की घज्जियाँ उड़ गईं । इस प्रकार कहने के पच्चात्‌ भी उस राक्षस ने अनेक 
वाण उस कपि-सेना पर चलाये और तदनतर 'ें विजयी हुआ, यो चिल्लाते हुए लंका 
को लौद गया और अपने पिता से अपने युद्धकौचघल का वृत्तात कह सुनाया । 

अपने पुत्र के पराक्रम का वृत्तात सुनकर रावण अत्यत हर्पित हुआ और उसे निकट 
वुलाकर हृदय से लगा लिया और कहा--हे वत्स, तुम्हारे जैसे पुत्र के रहने से ही तो में 
छत्रुओ के द्वारा मारे गये अपने ववबुन्‍वाववों की मृत्यु का प्रतिगोघ लें सका । आज मेरा 
दुःब् दूर हुआ । महान्‌ वीर कुभकर्ण मारा गया, महावली प्रहस्त मृत्यु को प्राप्त हुआ, 
अनुपम वीर त्रिशिर का अत हुआ, अतिकाय युद्ध में आहत हुआ, महापा््व तथा महोंदर 
युद्ध में गिरे, नरातक तथा देवातक कट मरे, कुभकर्ण के पुत्र, घोर पराक्रमी कुम तथा 
निकुभ नप्ट हुए; साथ-ही-साथ मकराक्ष भी युद्ध में काम आया और समस्त राक्षस-सेना 
का नाश हो गया । कपियों ने अपने प्रताप का प्रदर्शन करके लका को जला दिया | 
हे पुत्र, तुम इन वातों का स्मरण करके ज्ञीत्र ही जाओ और अपने भयकर वाणों के 
प्रयोग से राम-लक्ष्मण का वध कर डालों । तुम रण-विद्या में दक्ष हो । पहले तुमने 
सहज ही देवेन्द्र को युद्ध में जीत लिया था । यदि तुम कुद्ध होकर युद्ध के लिए प्रस्थान 
करोगे, तो निखिल लोक उसी समय भस्म हो जायेंगे । तुम्हारे समक्ष इन नर तथा वानरो 
की शक्ति ही कितनी है ?' 

९९, इन्द्रजीत का यज्ञ करके रथ प्राप्त करना 

इस प्रकार के उत्साहवरद्धक वचन कहकर रावण ने अपने पुत्र को विदा किया । 
तब वह अपने पुरोहित को भी साथ लेकर बुद्ध-भूमि में पहुँचा और वही यज्ञ करने का 
उपक्रम करने लगा । परिचारक लोग जीकप्र ही अस्थि, कपाल, आवश्यक पात्र, लोहे के 
खुकू-लुवा, गस्त्र, ताल, समिवाएँ, रकत-वस्त्र, रक्‍त-चदन आदि ले आये । तब 
उसने रक़्त-वस्त्र, रक्‍त-माला तथा रक्‍्त-चदन धारण किया, मारण-तत्र-विधि से तोमर, 
प्रास तथा खडगो को हवन-कुड की परिधि के रूप में सजाया कौर सजीव क्ृृष्ण-हरिण 
का कंठ काटकर उसका सिर ले लिया और भक्ति के साथ विधिवत्‌ होम किया । 
अग्निदेव ने अपने घूम तथा जशिखाओं को चारों ओर व्याप्त करते हुए प्रज्वलित होकर 
हव्यो को ग्रहण किया । उस जबशील निशाचर वीर ने विजय के कई जकुन देखने के 
कारण अत्यत हर्ष से नियमपूर्वक होम समाप्त क्या । उसके पण्चात्‌ उसने चार अद्व 
जूते हुए, भयकर तथा श्रेप्ठ वाणों से दीप्तिमान्‌ होनेवाले, सुदर ढछग से अलकृत सिंह 


खुद्धकांउ ३७6 


ब्रह्मास्त्र-से रक्षित, तथा युद्ध-भूमि में अदृश्य रूप से विचरण करनेवाले एक रथ को 
प्राप्त किया । उस रथ पर आरूढ होकर वह युद्ध के लिए रवाना हुआ | जातें समय 
उसने राक्षस-सैनिको से कहा--अब में तुम्हारे समक्ष ही उन दाशरथियो को युक्धक्षेत्र 
में गिराकर उनसे प्रतिशोध लूगा और अपने पिता दशकंधर के दुख को दूर करके उन्हें 
विजयी बना दूगा । में एक निमिष मात्र में सूर्य-पुत्र॒ तथा अन्य वानर-पृगवों का 
सहार कर डालूंगा और देखते-देखते ही युद्ध-क्षेत्र में, मे अन्य वानर-बीरों का भी 
ताश कर दूँगा ।! 


इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ वह अदृश्य हो गया । राक्षसों से युद्ध करनेवाले 
राघवों को देखते ही उसकी भोहें तन गई । तुरत धनुष का सधान करके उससे दुर्वार 
गति से उन पर ऐसी शर-जवुष्टि की, जैसे प्रलय-काल में बादल जल-बृष्टि करते हे । यह 
देखकर राघवों ने क्रोध से समस्त आकाश को उम्र बाणों से भर दिया । इद्रजीत ने तब 
उन सबकी खडित करके ऐसी गर-वृष्टि कर दी कि सभी दिशाओं में अधकार-सा छा गया । 
केवल उसके विशाल एवं प्रचंड कोदंड की भयकर ध्वनि, रथ की नेमियों की ध्वनि, 
रथ के अइवो की ठापो की ध्वनि तथा प्रत्यचा का टकार-मात्र सुनाई पडता था, किन्तु 
उस राक्षस का रूप कही दिखाई नहीं पडता था । इससे दोनो राजकुमार आश्चर्य से 
आकाश की ओर देखने लगे । किन्तु, वह राक्षस जीघक्र उनके शरीरो के सभी अगो में 
पैने बाणो से प्रहार करने लगा । तब राघवेंन्व ने क्रुढ होकर उसी दिशा में अपने बाण 
चलाकर उसके बाणों को जहाँ-के-तहाँ काट दिया । तब भुजबली इन्द्रजीत अपने रथ को 
भिन्न-भिन्न दिग्ाओ में चलाते हुए असख्य शर चलाने लगा। तब उसके बाणों से क्षत- 
विक्षत अगो से राम-लक्ष्मण पुष्पित किशुक-वुक्षों के सदृश दीखने लगे । प्रलय-काल के 
बादल के सदृश अपने विशाल शरीर को छिपाये हुए दक्षिण-दिशा से इन्द्रजीत ने राघवों 
को देखकर कहा--अब तुम कहाँ जाओगे और कहाँ छिपोगे ? तुम मेरे हाथो में फेस 
गये हो । अब तुम्हारी रक्षा करनेवाला कौन है ? देवता तो अब इस ओर अपना मुह 
भी नहीं दिखा सकेंगे । दुबले-पतले बदरों पर भरोसा करके बडे साहस' के साथ तुम युद्ध 
में आकर धोखा खा गये । मेरे तीक्षण वाणो की अग्नि-शिखाओं से वचकर तुम अब कहाँ 
जाओगे ? उस विभीषण के वचनों पर अधिक विश्वास करके मेरी शक्ति को तुम पहचान 
नही सके । में अभी तुम्हारा वध करता हूँ और आज ही जाकर अयोध्या में रहनेवाले 
उन भरत-शअत्रुष्त का भी अत करता हूँ । 

यह सुनकर सभी वानर तथा देवता सश्नमित-से हो गये । इन्द्रजीत क्रुद्ध होकर 
कभी पश्चिम दिशा से गयव॑ का प्रलाप करता, तो कभी उत्तर दिश्ला से धनुष का टकार 
करता | फिर, पूर्व दिशा से घोर शर-वृष्टि करता और तुरत दक्षिण दिया से ऐसा घोर 
गर्जन करता कि पृथ्वी हिल उठती । इस प्रकार, वह भिन्न-भिन्न दिशाओं में सचार करते हुए 
वानरों पर वाण चलाने लगा । तब राम-लक्ष्मण धनुप पर बाण चढाये हुए शीघ्र ही, 
उस राक्षस के चलाये हुए वबाणों को वीच में ही तोड देते । उसके इस युद्धनकौदवल को 
देखकर देवता तथा सूर्य-पुत्न आदि वानर-वीर आश्चयं-चकित हो गये। 


३८७० रगनाथ एयायर 


इच्धजीत के वाणों से सैकडो कपियों को मरकर ढेर होते देखकर, सौमित्र ने क्रोध 

से अपने भाई से कहा--हें देव, इस राक्षस के हाथो से वानरों का सर्वनाश हो गया है। 
तव भी आप ऐसे चुप साधे क्यो हे? वहाँ देखिए, भालुओ के नेता सभी दिशाओ में मिर- 
कर लोट रहें हे और अनेक वानरनायक नष्ट हो गये हे । हे प्रभु, सभी वानर आपका 
भरोसा करके वडी भक्ति के साथ युद्ध में आये और इच्द्रजीत के दारुण अस्त्रों से आहत 
होकर गिरते हुए आपका ही नाम ले रहे हूँ | गत्र्‌ ने आपकी सारी सेना को समाप्त कर 
दिया हैं। अब आप यदि इसे नही रोकें, तो अनर्थ हो जायगा । हे सूर्यवशतिलक, शत्रुओ 
का सर्वनाग करने की क्षमता रखनेवाले आपके बाण चारो दिशाओं में व्याप्त होकर अपने 
दिव्य शरीर धारण किये हुए रहते हे । आप उन्हें ग्रहण करके भत्रु का वध कर डालिए । 
इन शत्रुओ की शक्ति ही क्‍या है कि आपका सामना करके युद्ध कर सके ? ऐसे शात 
रहना क्षत्रिय के लिए उचित नहीं हे । आप ऐसी चिंता में क्‍यों पडे हूँ ? हे सूर्य-सम 
तेजस्वी प्रभु, आप अपने भुज-बल तथा पराक्रम का विचार ही नहीं करते । हे नाथ, 
आपकी भक्ति करनेवाले मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आप चिंता क्यों करते हे ” आपकी 
कृपा से में स्व्थ इस नीच दानव का वध करने में समर्थ हैँ | में अभी ब्रह्मस्त्र का प्रयोग 


०: 


करके इस कुटिल राक्षस-वश का नाथ करता हूँ ।' 

तव राघव ने अपने अनुज से कहा--हें लक्ष्मण, केवल इस एक के कारण अनेक 
का सहार करना क्या उचित हैं ? जो लोग यूद्ध में भाग नही लेते है, क्‍या, उनका भी 
सहार करना ठीक है ? उसे ब्रह्मा का यह वर प्राप्त है कि यह देव-दनुज तथा रुद्रादि 
देवो के द्वारा नही मरेगा , उस वर के गौरव की रक्षा करने के लिए ही में अवतक 
इसके ओऔद्धत्य का सहन कर रहा हूँ । अब भी यदि यह युद्ध-भूमि में रहा, तो में स्वय 
इसका सहार करने की क्षमता रखनेवाले वीर-वानरो को भेजूंगा । बे ही बुरी तरह इसे 
पीडित कर सकेंगे । यदि ऐसा नहीं हो सका, तो भले ही यह मेघनाद, इन्द्रलोक में 
आश्रय ले, ब्रह्मलोक में गरण ले, रुद्र-लोक में छिप जाय, पृथ्वी में प्रवेश कर रसातल में पहुँच जाय, 
समुद्र में डूब जाय या चाहे यम ही इसकी रक्षा करे, अथवा इसका दादा पुलस्त्य स्वय इसे 
अपनी आड में छिपा ले, फिर भी में इसका वध अवश्य करूँगा, में इसे छोड“गा नहीं ।' 


राम के इस प्रकार कहते ही उनके क्रोध की कल्पना करके इन्द्रजीत युद्ध करने की 
इच्छा छोडकर अपनी भयकर सेना को साथ लिये हुए लका को लौट गया और अपने 
पिता से कहने लगा--हे दानवेन्द्र, मेने युद्ध में वानर-सेना का सर्वताश और राम-लक्ष्मण 
का मान-हरण किया है । उसकी वारतें सुनकर रावण ने क्रुद्ध होकर कहा--युद्ध के लिए 
तुम्हारा इस प्रकार जाना और फिर लौट आना किस प्रयोजन का हूँ ? तुम ने कौन वडा 
कार्य किया है कि मेरे सामने डीग हाँक रहे हो ? राम-लक्ष्मण का वध किये विना तुम 
लौट आये और कहते हो कि सब मर गये | यदि तुम अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए 
युद्ध करते, तो समस्त लोक भस्म हो जाते । अवतक जो सफलता तुम्हें मिली है, उसे 
वहुत वडा मानकर तुम सतुष्ट मत होओ । अपने पराक्रम से राम लक्ष्मण को तथा वानरो 
को मारकर, फिर मुर्भे अपना मुख दिखाओ ॥' 


रुद्गधुकांड " ३८९ 
१०० इन्द्रजीत का माया-सीता का सिर काठना 


रावण के इन वचनों को सुनकर इद्रजीत ने कहा--ऐसा ही होगा', और अपने 
पिता की आज्ञा लेकर वहाँ से चल पडा | उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि इस 
भयकर युद्ध में अतिकाय, कुभकर्ण आदि देत्य-वीर अपने प्राण खो वबेठे हे, इसलिए मे किसी- 
त-किसी प्रकार से राम-लक्ष्मण को अवश्य परास्त करूँगा । यो सोचकर उसने अपनी 
माया से एक माया-सीता की सृष्टि की और उसे साथ लिये हुए अपनी सेना के साथ 
पश्चिम दिशा की ओर रवाना हुआ । उस राक्षस के प्रताप से भयभीत हो सभी वानर 
भिन्न-भिन्न दिशाओं में भागने लगे । तब हनुमान्‌ एक महान्‌ शैल-शछ्ग को उठाकर उस 
राक्ष) का सामना करने के लिए आया । वहाँ उसने इन्द्रजीत के रथ पर माया-सीता 
को देखा । वह (माया) सीता राम की अत्यधिक विरहाग्नि से पीडित आहार तथा निद्रा 
से रहित अत्यतत दुख से अभिभूत दिखाई पड रही थी। नि श्वास छोडनेवाली उस माया- 
सीता का शरीर नितात दुर्बंल था, मुख पीला पड गया था और उसके कमल-दल-जैसे 
नेत्रो से आँसू बह रहे थे । उसके केश उलभो तथा मलिन थे । उसके सभी अग पृथ्वी पर 
लोटने के कारण धूलि-धूसरित थे । वह अपना कातिहीन मुख, कर-पल्‍लव पर टेके हुए 
इस प्रकार काँपती हुई बैठी थी, जैसे प्रचड वायु से लता कपित होती है । उस सीता को 
देखकर हनुमान्‌ दुखी होने लगा, हाय भगवन्‌, यह राक्षस राम की पत्नी की न जाने 
और क्या दुर्गति करेगा | उनकी यह दीन दशा मुझे देखता पड रहा है।' फिर भी वायु- 
पुत्र घोर वानर-सेना के साथ दारुण रूप से उस राक्षस पर आक्रमण करने का उपक्रम करने 
लगा । यह देखकर दशकठ के पुत्र ने बडी करता से हनुमान्‌ को देखकर कहा--रे वानर, 
अब क्यो आगे बढ रहा हँ ? ले, सीता को यहाँ देख । इसी सीता के लिए तो तू इस 
प्रकार उतावला हो रहा है ? में अभी इसका सिर काट डालता हूँ ।' 

तव वाव के सम्मुख पडी हुई हिरणी के समान दीखनेवाली सीता अपनी आँखों 
से अश्रु वहाते हुए, 'हाय राम, हाय राम' कहकर आतर्तनाद करने लगी। वह क्रर राक्षस 
सीता के केश पकडकर खीचने लगा । तब वायुपुत्र ने उस राक्षस से कहा--रे दुरात्मा, 
क्या, यह तुम्हारे लिए उचित है ? तुम राक्षस हो तो क्‍या हुआ ? तुम विश्ववसु के पोते हो, 
क्या तुम्हारे लिए यह शोभा देता है कि तुम मनुकुलेश्वर राम की पत्नी को इस प्रकार 
केश पकडकर खीचों ?! 


हनुमान्‌ के इतना कहते ही इन्द्रजीत ने अपने खड़ग को उठाकर उस माया-सीता का 
सिर काट डाला और कहा--भवब तुम जाकर यह समाचार राम-लक्ष्मण से कहो ।' यह 
देखकर अनिलकुमार अत्यत शोक-सतप्त हुआ । खडग से कटकर, रक्त से लथपथ माया- 
सीता को दिखाकर इन्द्रजीत ने हनुमान्‌ से कहा--हे वानरोत्तम, राम की पत्नी इस सीता 
का वध मेने अपने खड़ग से कर डाला । अब तुम्हारा रणोत्माह शिथिल पड जायगा ।' 
इतना कहकर इन्द्रजीत युगात के घनघोर मेघ के गर्जन की भांति सिंहनाद करके दिग्गजों 
के वर्ण-पुटो तथा दिशाओं को विदी्ण करते हुए, भत्रु-सैनिको के मन में भय उत्पन्न करते 
हुए, युद्ध-भूमि में आगे बढा । उस राक्षस को देखते ही सभी वानर भागने लगे । तव 


३५२ र्गनाथ रायायण 


बे 


हनुमान्‌ ने उन्हें देखकर कहा--हें कपि-वीरो, अपने पराक्रम का प्रदर्शन करना छोडकर 
भाग जाने का क्‍या यही समय है ? क्‍या, तुम युद्ध-वर्म को नहीं जानते ? क्या, युद्धक्षेत् 
से भागना, अपने वत्ष के लोगो को कलकित करना नहीं हैं ? मे आगे-आगे चलता हूं, 
तुम मेरा अनुगमन करों ।* 
हनुमान्‌ के वचन सुनकर सभी वानर परववत-श्रग तथा वृक्षों को उठाये हुए, गर्जन 
करते हुए हनुमाव्‌ के पीछेसीछे चलें और राक्षसों पर उन पर्वतों तथा वृक्ष को फेंकने 
लगे । पवन-कुमार ने भी क्रोंब से एक महान्‌ पर्वत को उखाडकर उस राक्षस पर फेंका । 
तव इन्द्रजीत के सारबी ने रब को तुरत दूसरी ओर फिरा लिया, तो वह पर्वत भयकर 
ध्वनि के साथ पृथ्वी पर आ गिरा । इतने में वानर फिर से पर्वतो पथ्चा वृक्षों को ला- 
लाकर राक्षस-सेना पर फेंकने लगे । वानरो के प्रह्मरों से अपनी सेना को नष्ट होते देख 
रावण का पुत्र क्रुद्ध होकर चझूल, मुदुगर तथा खड़गो के प्रहार से वानरों का सहार करने 
लगा । तव मारुति ने अत्यत क्रोंबोन्मत्त हो अपने भयकर रण-कौगल का प्रदर्शन करते 
हुए राक्षो। पर शिलाओं तथा वृक्षों की वर्षा करके राक्षतओं को भगा दिया । इसके पच्चात्‌ 
उसने वानरो को देखकर कहा--हें वानरों, इस अबम राक्षस ने राम की पत्नी सीता का 
वव कर दिया हैं | हमारा कार्य विगड गया हैँ । अब हमें युद्ध करने की आवश्यकता ही 
क्या है ? में यह समाचार राघव को सुनाने के लिए जा रहा हूँ । उसके पच्चात्‌ राम जो 
आजा देंगे, वही हम करेंगे । जव तुम साववान होकर रहो । यह राक्षस महान कर है । ' 
१०१ इन्द्रजीत का निकुमिल-यज्ञ करना 
इस प्रकार कहने के पच्चात्‌ हनुमान्‌ को जाते हुए देखकर रावण का पुत्र मन-ही- 
मन सोचने लगा--यबह वली यहाँ से चला गया, जब मेरे यज्ञ में विषध्न डालने की शक्ति 
किसी में नहीं हूँ ।! यो सोचकर वह राक्षस रक्त-मासों से अनल को तृप्त करते हुए 
निकुभिल-यज्न करने का प्रयत्त करने लगा । इबर राम ने पब्चिम दिशणा में अत्यधिक 
कोलाहल सुतरा, तो शीघ्र जाववानू को बुलाकर कहा--पश्चिम दिद्या में विपुल घोष सुताई 
पड़ रहा हैँ । न जाने, हनुमान्‌ पर कोई विपत्ति आ पडी हो । तुम शीघ्र ही सेना के 
साथ जाओ और वहाँ के विपुल घोष के संवध में पता लगाकर आओ ॥' 
राम का आदेश पाकर ऋश्षेण (भालुओ का राजा) शीघ्र ही अपने एक करोड 
रीछ-सैनिको के साथ पश्चिम द्वार की ओर चल पडा 4 मार्ग-मध्य में ही वायु-पुत्र उससे 
मिला । वादु-झपुत्र ने जाववान को देखकर इद्रजीत के कार्य के सबंध में वताया और कहा- 
में यह समाचार रामचद्रजी को सुनाकर अभी जाता हूँ; मेरे आते तक तुम इसी स्थान 
पर डटे रहो । शक्तिणाली चत्रु के सबध में असावधान नहीं रहना चाहिए।” यो समकाकर 
प्रवन-युत्र ने जाववानू को भेज दिया और स्वय राघव के पास चला । राघव हनुमान्‌ को 
दूर से ही देखकर सोचने लगे, क्‍या कारण है कि हनुमानू का मुखमण्डल अग्निवत्‌ 
(तमतमाया हुआ) दीख रहा है ? न जाने क्‍या वात हैं ?* इतने में वायु-पुत्र राम के 
निकट आ पहुँचा और उन्हें प्रणाम करके कहा--हें ठेव, में आपसे क्या विनती करूँ ? 
हम सव अपने प्राण हथेली पर लिये राक्षमों से युद्ध कर रहे थे कि इन्रजीत भूमि-सुता 


ज्द्धकाँड इ५३ 
सींता को युद्धनभूमि में लेकर आया और निर्दय होकर हमारे समक्ष ही उतका सिर काट 
डाला । इसलिए में जाववान्‌ को द्वार पर रक्षा करने के लिए नियुक्त करके आप से यह 
समाचार कहने को आया हूं ।' 
यह समाचार कानो तक पहुँचने के पूर्व ही प्रचण्ड वात्त से आहत वृक्ष की भाँति 
अतुलित शोकाग्नि से जलते हुए, घैयँ खोकर रघुकुलेश्वर मूच्छित हो गये। पृथ्वी पर गिरे 
हुए राम को देखकर सभी वानरनायक विलाप करने लगे । 


१०२ लक्ष्मण का शौक 

तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज के सिर को अपनी गोद में रखकर सश्रमित चित्त से 
इस प्रकार आत्तंवाद करने लगे--“हाय राम, आप जैसे पुरुषोत्तम को आज यहाँ ऐसा कलक 
लग गया । धमंमेव जयतें, यह कथन सत्य सिद्ध नहीं हुआ । यदि वह उक्ति सत्य 
होती, तो आप जैसे दयावान्‌ के लिए ऐसा सताप क्यो कर होता ? आपके हाथो से रावण 
की मृत्यु क्यों प्राप्त नही होती ” इससे तो यही सिद्ध होता हैँ कि धर्म से अधर्म ही श्रेष्ठ है । 
अयोध्या का राज्य त्याज्य नहीं हे, ऐसा विचार किये बिना हम उस राज्य को 
छोडकर जगलो में भटकने आये । जगलो में भटकनेवाले हमें पुरुषार्थ कैसे 
सिद्ध होगे ? 

“क्या हमने बुद्धिमानों का यह वचन नहीं सुना कि निर्धनों के सभी प्रयत्न उसी 
प्रकार निष्फल हो जाते हे, जैसे निदाघ में भरने नष्ट हो जाते हे । हे राजन, धन को 
अर्जेन करने से धर्म तथा काम आदि अपने-आप सिद्ध हो जाते हे । जिसके पास धन 
होता है, सभी उसके सगे-सबधी बन जाते हे । अर्थ-सपन्न व्यक्ति ही पुरुषोत्तम होता हैं, 
धन ही विद्या हे, धन ही कौशल है, धन ही कीत्ति है, वही महत्ता है, वही उच्चकुल 
तथा सदगुण है । धन ही शील और बल है, वही पुण्य है, वही राज्य है । धन ही 
प्राण है, सौदर्य है, ख्याति है, नीति है, सपत्ति है, वृद्धि है, ज्ञान है, सुख है और शुचित्व है । 
अर्थ से सपन्न व्यक्ति की सभी इच्छाएँ वात-की-बात में पूरी हो जाती हे । महान्‌ 
व्यक्ति, वेद-वेदाग-पारगत तथा विबुध-जन पृष्पाक्षतों से धनी व्यक्ति की बडी प्रीति से 
पूजा करते हे । जगलो में रहनेवाले मोक्षार्थ मुनियुगव भी कद, मूल तथा फल की भेंट 
करते हुए धन-सपन्न व्यक्ति के दर्शन करते हे । वदीजन तथा सग्रीतज्ञों का समाज धनवान 
व्यक्ति की सतत प्रशसा करते रहते हैँ । उन्नतकुच, गुरु नितव, क्षीण कटि, मदगमन, बिवा- 
धर, चद्रमुख, कमल-तेत्र, अश्रमर के समान नीला जूडा, सुदर केश, नवोदित लज्जा, हाव- 
भाव, मधुर कटाक्ष, मीठे वचन, नव यौवन आदि से सपन्न रमणियाँ भोग- 
लालसा से प्रेरित होकर घनी-बुद्ध से भी प्रेम करेंगी, पर धन-हीन तरुण का अनादर करेंगी। 
धन का अभाव ही नरक है, वही ज्मज्ञान है, वही महान्‌ शोक है । दरिद्रता ही रोग हें, 
मृत्यु है, पाप हैं और कारावास हैं । धन का अभाव ही सकट हैँ, अकाल हैं, दैन्य है 
और दुख हैं | निर्धनता ही सब प्रकार की कलूपता हैं। घनाभाव से सभी का अभाव 
होता हैं । अत, जिस दिन हम राज-पाट छोडकर आये, उसी दिन विपत्तियाँ भी हमारे 
साथ आईं । मे जानकी की मृत्यू का दुख सहन नहीं कर सफ़ता । हे राजन, 


झटके रंगर्नायथ एॉयोयरो 


में अपने भयकर वाणों की अग्नि से राक्षों को साथ सारी लका को शीत्र ही भस्म 
कर दूंगा ।” 

१०३. इन्द्रजीत की माया को विभीषण का राघवों को समझाना 

लक्ष्मण के इन वचनो को सुनते ही विभीपण ने राम की मूर्च्छा दूर करने का सफल 
प्रयत्त किया'। जब उनकी चेतना लौट आईं, तव वह कहने लगा--हे देव, यह सव इन्द्र- 
जीत की माया है । सीता पर कोई विपत्ति नहीं आई है । मेरी बातों पर विश्वास 
कीजिए । उस पापात्मा दशकठ के मन का भेद में भली भांति जानता हूँ । मेने उसे 
कितना समझाया कि तुम सीता को राम के चरणों में सौंप दो । किन्तु, उसने मेरे हित- 
वचनो पर कान नहीं दिया | ऐसा रावण, भला, सीता का वध क्यों करायेगा ? हे राजन, 
सभव हैँ कि यह उसकी माया हो । यदि सीता का वध सत्य होता, तो क्‍या अवतक 
सभी लोक नष्ट-अ्रप्ट नहीं हो जाते ? यह असत्य ही है । आप चिता क्यो करते है ? 
मे अभी जाता हूँ और सीता का कुगल जानकर आता हूँ 7! 

उसके पच्चात्‌ विभीषण ने राम की अनुमति पाकर, अपना विशाल रूप छोडकर 
सूक्ष्म रूप ग्रहण किया और राक्षसेब्वर के वन में निर्विष्च चला गया, वहाँ सीता को 
देखकर तुरत लौटा और रामचद्र को प्रणाम करके वडी भक्ति के साथ सारा समाचार 
कह सुनाया । उसकी वारतें सुनकर राम ने कहा--हें विभीषण, इन्द्रजीत ने युद्ध-भूमि में 
ऐसा क्यो किया ?” तब विभीषण ने कहा--हे देव, उसने आसुर होम करने का सकल्‍प 
किया हैँ । हनुमान्‌ आदि वानर-वीरो को निरुत्साह करके उन्हें आपकी सेवा में भेजने 
के निमित्त ही उसने यह उपाय किया हूँ । उसकी योजना सफल हुई और उसके यज्ञ में 
विध्न डालनेवाला वहाँ कोई नहीं रह गया । यह देखकर उसने निकुभिल में यज्ञ प्रारभ 
कर दिया है | हें देव, यदि वह निष्ठा तथा भक्ति-युक्त मन से विधिवत्‌ यज्ञ को पूरा 
कर लेगा, तो देव तथा दानव कोई भी उस वीर को जीत नही सकेंगे। अत, हमें उस 
राक्षस के यज्ञ में विध्न डालना चाहिए। हे राजनू, हम अभी अपनी सेना के साथ उसके 
यज्ञ में विध्न डालने के निमित्त जायेंगे, आप लक्ष्मण को हमारे साथ भेजिए । दशकठ 
के पुत्र इन्द्रजीत आज निकुभिल वन में यज्ञ के अनुष्ठान में लगा हुआ है । लक्ष्मण आज अपने 
प्रचड वाणों से उसे वध कर डालेंगे । यज्ञ का अनुप्ठान पूरा होने के पहले ही यदि उसको 
हम दण्ड नहीं देंगे, तो यज्ञ की समाप्ति पर वह ब्रह्मा से ब्रह्मणिर नामक शर, धनुष, कवच, 
खड़्ग, दो तूृणीर, कई मत्र-पूत अस्च्र और देवताइ्वों से तथा सुदर ध्वजा से युक्त, वायु- 
वेग से चलनेवाला रथ, उस होम-कुड से निकलेंगे । यदि इबच्रजीत उस रथ पर आइरूढ 
होकर अपने हाथ में वह धनुष सभाले, तो देवासुर भी उसके समक्ष खडे नहीं 
रह सर्केगे । इसके पहले, ब्रह्मा ने उसे वर-प्रदान करते समय उससे कहा था कि यदि तुम 
निकुभिलनयनज्न करोगे तो सव प्रकार ये अजेय हो जाओगे । यदि यज्ञ के वीच में विध्त 
उपस्थित हो और यन्न अबूरा रह जाय, तो तुम युद्ध में बत्रुओ के द्वारा मारे जाओगे । 
इसलिए हे राजन, आप युद्ध का आवश्यक प्रयत्न कीजिए और इच्रजीत का वध करवाइए । 
यदि यह मायावी मारा जाय, तो निश्चय समक्किए कि देवताओ का शत्रु दशकठ भी मर गया। 


खुद्धकांड ३5% 
१०४. लक्ष्मण का युद्ध के लिए प्रस्थान 

तंव रघुराम ने अपने अनुज से कहा--हे अनघ, वीर इन्द्रजीत बादलों में तिरोहित 
होनेवाले सूर्थ की भाँति अपनी माया से अपनी गति को प्रकट किये विना विचरण करने 
के लिए यज्ञ कर रहा है । उस वीर को इन्द्रादि देवता भी युद्ध में जीत नहीं सकते । 
अपने मत्रियों के साथ विभीषण उस यज्ञ को तुम्हें दिखायगा | हें सौमित्र, तुम जाओ और 
यज्ञ पूरा होने के पहले ही उस राक्षस का वध कर डालो । शक्तिशाली भालुओ की 
सेना के साथ पराक्रमी जाववानू तथा विजय भर विक्रम में धुरंधर हनुमान्‌ भी तुम्हारे 
साथ जायेंगे ।” इतना कहकर रघुराम ने अपने अनुज को समुद्र के दिये हुए वज्ज-क्वच, 
श्रेपष्ट खड़ग, दो तूणीर, धनुष तथा श्रेष्ठ आभूषण आदि देकर उन्हें आज्ीर्वाद देते हुए 
कहा-- हरि, तुम्हें सतत विजय प्रदान करें, शकर तुम्हें सब प्रकार के शुभ दें, ब्रह्मा 
तुम्हें दीर्धाय्‌ू दें, समस्त देवता सभी दिद्याओं में तुम्हारी रक्षा करें, अनल तथा अनिल 
आगे और पीछे तुम्हारी रक्षा करते रहें ।' , 

तब लक्ष्मण ने अत्यत उत्साह से धनुष संभाला, कवच धारण किया, तूणीर कसे, 
खडग लिया और विविध आभूषणों से विलसित हो, राम को भक्ति के साथ प्रणाम किया 
और वडे साहस के साथ कहने लगे--हें देव, कमल-सरोवर में हसो के प्रवेण होने की 
भाँति, ब्वेत पखवाले मेरे बाण आज इन्द्रजीत को पार करके लका में गिरेंगे | रूई के ढेर 
की भाँति में अपनी वाणारित से उसे भस्म करूँगा ।' 

इस प्रकार कहते हुए उन्होंने रामचद्र की आजा लेकर, गरुड पर आरूइ विष्णु की 
भाँति हनुमानू पर आरूढ हो, वानर-सेना तथा जाववान्‌ आदि वीरो के साथ युद्ध के लिए 


बे 


प्रस्थान किया । निदान, वे वहाँ से तीस योजन दूर स्थित निकुभिल के पास पहुंचे । 
१०४ निकुंमिल-होम में विध्न 

यज्ञ-भूमि, मत्त गज, उत्तम अश्व, श्रेष्ठ रथ, तथा पदचर सेना से घिरी हुई भयकर 
एवं अभेद्य प्रतीत होती थी । सारी सेनाएँ विना कल-कल ध्वनि के, तरग-हीन समुद्र की 
भाँति दिखाई दे रही थी । ऐसी राक्षस-सेना को देखकर महान्‌ गस्त्रास्त्रों से सपन्न सौमित्र 
से विभीषण ने कहा--हे अनघ, इस महान्‌ सेना को जबतक आप अपने वाण-समह से 
काट नही डालेंगे, इनच्रजीत हमें दिखाई नहीं देगा, इसलिए आप अपने श्रेष्ठ वाणों से 
पहले इस सेना का सहार कीजिए । उसके पज्चात्‌ हालाहल के सदृश भयकर अपनी वाणागिनि 
से इस दुरात्मा का सहार कर डालिए, जिससे इसका प्रारभ किय्रा हुआ यज्ञ पूरा 
न हो ।' 

विभीषण की सलाह के अनुसार सौमित्र ने अपनी आँखों से अग्नि-कणों की वर्पानसी 
करते हुए राक्षस-सेना पर विविध बाण चलाये । तुरत ही अतीव वलणशाली वानर राक्षसों 
पर पर्वतो तथा वृक्षों की वर्षा करने लगे । राक्षसों ने अत्यधिक कुृद्द होकर, परिध चलाते 
हुए, गदाओ से प्रह्मर करते हुए, करवालो से मारते हुए तथा भिन्न-भिन्न महान्‌ थस्प्रों से बाघात 
करते हुए विविध रीतियो से वानरों पर आक्रमण किया । ऐसी भयकर गति से भिड़े हए्‌ 
वानर तथा राक्षस-मेनाओं के भीपण ग्जनों से लका होल उठी । राक्षस-सेना नप्द होते 

ढछ्‌ 


३54 एगनाथ एयायण 
लगी । तव वानर-सेना भी क्रुद्ध होकर राक्षमों पर ऐसे प्रहार करने लगी कि राक्षस- 
सेना अपना दर्प खोकर इंद्रजीत की आड़ में गरण लेने लगी । 

तवतक इच्द्रजीत यज्ञ की सफल समाप्ति के लिए आवश्यक दो सौ दस आहुतियों 
में से, एक-एक करके एक सौ नौ आहुतियाँ महावक्तनि की ज्वालाओ में दे चुका था । 
उसी समय वानर-सेना अपने भयकर गर्जनो से पृथ्वी को कँपाती हुईं वहाँ आ पहुँची । 
यह देखकर क्रोधोन्मत्त हो इन्द्रजीत ने अपने हाथ की आहुति नीचे फेंक दी, अपनी आँखों 
से चिनगारियाँ विखेरते हुए वह युद्ध के लिए सन्नद्ध हुआ । अपने रथ पर आखरूढ हो, 
हाथ में अपना भयकर घधनृष लिये हुए, वह वानर-सेना पर टूट पडा और उन्हें अपने तीक्र 
अशरो के आधात से भागने के लिए विवण क्र दिया । इसी बीच सौमित्र को साथ लिये 
हुए विभीषण ने निकुभिल-वन में प्रवेश किया और घने नील मेघ की भाँति दीखनेवाले 
वटव॒क्ष के नीचे स्थित इद्रजीत का हवन-कुड दिखाकर कहने लगा--हें सौमित्र, देखा 
आपने ? युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस राक्षस ने यहाँ यह हवन प्रारभ किया हैं 
और भूतों की वलि देकर अग्नि से अद्वितीय जक्ति को प्राप्त कर जअत्रुओ को जीतने का 
सकलप किया है । इसको पहले भी इसने इसी प्रकार हवन करके दुर्वार गव्ति प्राप्त की थी 
और इन्द्र को जीत लिया था। वहाँ देखिए, हवनकुड से अरुण नेत्र, अरुण केश, 
अरुण बस्त्र तथा अरुणवर्ण माला धारण किये हुए काले रग का सारथी तथा अरुण अश्वो 
से युक्त रथ उभर-उभरकर निकलनेवाले हँ । इद्रजीत ज्ञीत्र ही लौट आयगा और 
हवन से प्राप्त गक्ति से इस रथ पर आरूढ होगा । उसके पहचात्‌ उसे कोई भी जीत 
नही सकेगा । अत, हे सौमित्र, आप अपने भयकर वाणो के प्रहार से इन्द्रजीत का सहार 
कीजिए । तुरत लक्ष्मण घनुष का भयकर टकार करने लगे । 


१०६. लक्ष्मण तथा इन्द्रजीत का परस्पर तिरस्कार के वचन कहना 


तब करवाल हाथ में लिये हुए, कवच घारण किये, अग्निवर्ण रथ पर सवार हों 
इच्धजीत लक्ष्मण को समक्ष उपस्थित हुआ । उसे देखकर सौमित्र ने क्रोध से कहा--हें 
मायावी राक्षस, अब तुम्हारी माया से कोई प्रयोजन नहीं है । यदि तुम वीर हो, तो मेरा 
सामना करो और अपनी सच्ची वीरता को प्रकट करते हुए मेरे साथ युद्ध करो । में 
जवश्य तुम्हें यमपुरी को भेजूगा । तुम भले हीं कपट-रूप धारण करो या अपने निज 
रूप में रहो, मे जीघत्र तुम्हें समाप्त कर दूगा ।' 

यह सूनकर इन्द्रजीत ने रोपपूर्ण आँखो से लक्ष्मण को देखकर कहा--हे लक्ष्मण, 
बालक होकर तुम ऐसा हठ क्यो करते हो ” किचित्‌ काल ठहरो, में अपने वाणों से विजय- 
लक्ष्मी से तुम्हें दूर करके, तुम्हारे गौर्थ का नाथ करूँगा और तुम्हारे प्राण लेकर पृथ्वी पर 
गिरा दूंगा और तुम्हारे शरीर को काटकर उस मास से कौओ तथा गीधो को तृप्त 
करूँगा । क्‍या, इतने जीघ्र तुम भूल गये कि मेने तुम्हें नाग-साशों से बाँचा था ।' 

इसके पच्चात्‌ उसने विभीषण को देखकर क्रोध से कहा--हे धर्म-घातक, तुम मेरे 
चाचा हो, और म॑ तुम्हारा प्रिय पुत्र हूँ । क्‍या, तुम्हें यह उचित है कि तुम मेरा अहित 
करो । दुर्मति होकर कुल-द्रोह करनेवाले तुम, भला औचित्य का विचार ही कैसे करोगे ? 


चुद्धकांड ३5७ 


क्या, कोई ऐसा नीच होगा, जो विपत्ति में पडे हुए बधुओ को छोडकर णत्रुओ की शरण ले ? 
औचित्य की बात रहने दो। अपने लोगो को छोडकर बजत्रुओ की सेवा में जीवन 
बितानेवाले व्यक्ति का जीवन भी कोई जीवन हैँ ? राक्षसेशवर महा तेजस्वी है । ऐसे 
व्यक्ति तुम्हारे निष्ठुर वचनों को हित-बचन कैसे मान लेंगे ? भाई के कोध करने से यदि 
तुम घर के किसी कोते में पडे रहते, तो क्‍या होता ? वहाँ से भागकर भी तुमने कौन-सा 
महान्‌ कार्य सिद्ध कर लिया ? क्या, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही दशकठ ने समस्त 
देवताओं को जीत था ? हमारे अपने होते हुए तुम अपना रहस्य अपने शत्रु को बताकर 
उसके हाथो में स्वय भी नष्ट हो जाओ ।' 


मय 


तब विभीषण ने कहा--हें मेघनाद, तुम मेरे आचरण से भली भांति परिचित हो । 
फिर भी, ऐसा प्रलाप क्यो करते हो ” तुम उस अविनीत पिता के अविनीत पुत्र ही तो हो। 
भला, तुम्हें धर्म और नीति का विचार ही क्यो होगा ? क्रूर बधु का उसी प्रकार त्याग 
करना चाहिए, जैसे पाले हुए सर्प का त्याग करते हैँ । यदि वह पापी दशकठ मेरी बात 
उस दिन मानता, तो इतना अनर्थ ही क्यो होता ” परधन तथा परस्त्रियों के लोभ में 
पडनेवाले पापियो को ओऔचित्य, शुभ, धर्म, लोक-सग्रह आदि से सबंध ही क्‍या हो 
सकता है ? तुम्हारे मत का गव॑ तथा अहकार तुम्हें अग्नि में जलाये विना नप्ट भी कंसे होगे ? 
तुम लोग मदाघ होकर सतत अधर्म के आचरण में प्रवृत्त रहते हो । तुम देवताओं को 
पीडित करते हो और सूत्रती परम मुनीन्द्रो का वध करते हो । अत , उस दशकठ के साथ- 
साथ तुम, सारी लका, तुम्हारे सभी वधु-बाधव, भूठी प्रशसा करनेवाले तुम्हारे मत्री 
तथा सेना, सब राम के द्वारा नष्ट होगे, यह सत्य है । तुम मति-अ्रष्ट हो गये हो, 
आसच्न मृत्यु के पाञ में वँधे हुए हो । अत , तुम जैसे चाहो, वको । अब तुम्हारी कोई 
माया काम नहीं देगी । हवन करने के निमित्त तुम अब बटवृक्ष के नीचे नहीं जा सकते। 
न लक्ष्मण ही लका की ओर जा सकते है । तुम शीघ्र यम-पुर को जा सकते हो ।' 

इतने में उदयाद्वि पर उदित होनेवाले सूर्य को भाँति, हनुमान्‌ के विशाल कधो पर 
आरूइ लक्ष्मण को, विभीषण को, तथा युद्ध के लिए उन्‍्मुख वानरों को दुर्वार क्रोध से 
देखकर कहा--आज तुम लोग युद्ध-भूमि में वीर होकर मेरी वाण-वृष्टि का सहन करो । 
मेरे धनुष से अविराम निकलनेवाले वाणो की अग्नि तुम्हें आहुति के रूप में ग्रहण करेंगी। 
में आज करवाल, भाला आदि शास्त्रों से तुम्हारा सहार करूँगा । 


१०७ इन्द्रजीत तथा लक्ष्मण का युद्ध 

इस प्रकार कहकर पृथ्वी तथा आकाश को प्रतिध्वनित करते हुए उसने सिंहनाद 
किया और विविध वाण अत्यत वेग से चलाते हुए कहने लगा--देखता हूँ कि कौन भुज- 
बल से संपन्न व्यक्ति मेरे समक्ष आज खडा रह सकता है। यह सुनकर लक्ष्मण ने उस 
देत्य से कहा--हे अधम दनुज, व्यर्थ का गर्व क्यो करते हो ? समक्ष भिडना छोडकर, 
छिपकर धोखे से चोट करना कसा न्याय है ? यह भी कोई शौर्य है ? अपनी सब 
प्रकार की मायाओ को तजकर तुम आज मेरे समक्ष खडे रहो । में अपने घरों से तुम्हारे 
प्राण हरण करूँगा [/ 


द्ज्प रंगनाथ एयायण 


यह सुनकर इन्द्रजीत ने वडे ऋरध से कालसर्प-सदृश बाणों को लक्ष्मण पर चलाया, 
जो लक्ष्मण के भरीर को पार करके पृथ्वी में घँस गये । फिर, उसने लक्ष्मण के गरीर पर 
कई गर चलाये, जो उनके शरीर को छेदकर दूसरी ओर निकल गये । लक्ष्मण के शरीर 
से, रौंद्र रस की वाढ की तरह रक्त की घारा फूट निकली । यह देखकर राक्षस हर्ष का 
भीयण निनाद करने लगे । तब इन्द्रजीत से अद्ृह़्ास करते हुए लक्ष्मण के निकट पहुँचकर 
कहा--हे राजकुमार, वडे शूर की भाँति तुमने मुझसे युद्ध ठाना है। पहले मे तुम्हारा 
कवच खड-खड कर दुगा और उसके पब्चात्‌ अपने दारुण अस्त्रों से तुम्हारा सिर काट 
लूंगा । आज राम अवच्य ही अपने भाई को युद्ध-यूमि में पडे हुए देखेगा [|  , 

तव लक्ष्मण ने उस निश्ञाचर को देखकर कहा--हे राक्षस, व्यर्थ ही गवे क्‍यों 
करते हो ? युद्ध-भूमि में प्रलाप करने से क्या प्रयोजन ? यहाँ से विवा हटे, मेरे साथ 
युद्ध करो । जिस प्रकार अग्नि विना कुछ कहे, जला डालती हैं, वैसे ही मे विना वातें 
किये ही अभी तुम्हारा वव कर डालता हूँ । व्यर्थ डीग मारने से क्या लाभ ?” इस प्रकार 
कहकर लक्ष्मण क्रोध से आँखें लाल किये हुए, अपने घनुष की प्रत्यचा पर ऐसे दारुण अस्त्रो 
का सधान किया, जिनका प्रकाश दिल्याओ में व्याप्त हो रहा था और जिनसे अग्नि-ज्वालाएँ 
तथा स्फुलिंग निकल रहे थे। लक्ष्मण ने ऐसे अस्त्रों को उस क्रूर राक्षस के वक्ष स्थल को 
लक्ष्य करके उलाया । उन वाणों के लगते ही वह राक्षम रक्त-वमन करते हुए मूच्छिंत 
हो पृथ्वी पर गिर पडा । किन्तु, तुरत समलकर उसने सिहताद करके तीन पैने वाण 
रामानुज के वक्ष पर चलाये । वे दोनो रौद्ग रूप धारण किये हुए, आँखो से अगारो की वर्षा करते हुए, 
एक साथ सिहन-ार्जन करते, घनुप का ठकार करते तथा वाणो का सचालन करते थे, 
मातों यम का ही ऋचद्ठहास हो । अपनी शक्ति तथा विक्रम से दीप्त होते हुए वे सतत 
दीप्निमान्‌ चद्र-सूर्य की भाँति चार दातोवाले गजो के समान, सिंह-भावको के समान, 
कुमार-तारको के समान, वृत्रासुर तया इद्र के समान तथा काल-रुद्रो की भाँति शोभायमान होते 
हुए जय की उत्कट अभिलापा से प्रेरित हो युद्ध कर रहें थे । अत्यधिक क्रोघ से लक्ष्मण 
घनुष के टकार से युक्त धनुप, रथ, ध्वजा आदि के साथ इन्द्रजीत को अपने गरो की 
वृष्टि से ढकन्से देते थे । जब वह प्रतिवाण चलाता था, तब लक्ष्मण उसके वाणो को 
वीच में ही काटकर उस राक्षम को अपनी वाण-वर्षा से आबृत कर देते ये । तब मेघनाद 
घक्तिहीन हो, उनके अस्त्रो के प्रति-अस्त्र चलाने में असमर्थ हो, दीर्घदवास लेते हुए खडा 
रहा । यह देखकर विभीषण ने लक्ष्मण से कहा--हे राजकुमार, वह देखिए, आपके वाणों 
का सामना करने की क्षमता नहीं रखने के कारण रावण का पुत्र निर्वेद से अभिभूत हो 
चुपचाप खडा हैं | अभी जाप विजय प्राप्त कीजिए । तुरत लक्ष्मण ने उस राक्षस के 
दरीर पर मयकर वाण चलाकर उसे घायल कर दिया । इद्रजीत एक मुहत्तं काल तक 
मूच्छित पडा रहा, और उसके पदचात्‌ सचेत हो सोचने लगा--हाय, मेने पहले देव तथा 
असुरेनद्र को जीत लिया था । आज द॑व मेरे प्रतिकूल हें; इसलिए मुझे एक मानव से 
पराजित होना पड रहा है । इन सूर्यवणियो के द्वारा सभी राक्षस युद्ध में मारे जा चुके । 
अब मेरा जीवित रहना व्यर्थ है ।' 


खुद्धकांड र5९ 


इस प्रक्रार सोचकर मेघनाद ने लक्ष्मण को देखकर कहा--हे राजकुमार, अब तुम 
वीर की तरह खडे होकर मेरे पराक्रम को देखो । यो कहते हुए उसने सात बाण लध्मण 
पर, दस वाण हनुमान्‌ पर तथा एक सौ बाण विभीषण पर चलाकर उन्हें व्याकुल कर 
दिया । उन वाणों की उपेक्षा करते हुए लक्ष्मण ने इच्धजीत को देखकर हँसते हुए कहां-- 
है राक्षस, शूर वडी-बडी बातें कहे विना ही युद्ध जीत लेते हें और अबम डीग हॉँकते 
हुए भी हार जाते है | सच्चा वीर युद्ध में कभी छिपता नहीं । युद्ध में धोखा देना भी 
क्या, कोई वीरता है ? हे क्रात्मा, तुम कुटिल युद्ध करनेवाले हो ? तुम्हारे इह-लोक 
और पर-लोक दोनो नप्ट हो जायेंगे ।* 

इस प्रकार कहते हुए लक्ष्मण ने सूर्य-किरणो की भाँति प्रकाशमान होनेवाले, स्वर्ण 
की अनी से युक्त बाणों को उस राक्षस पर चलाया, तो बे उसके कवच को भी छेदकर 
उसके शरीर के पार निकल गये । तव उसका कवच भयकर सर्प की केंचुली की भाँति 
पृथ्वी पर गिर पडा । तब इद्रजीत दूसरा वज्ज-क्वच पहनकर लक्ष्मण पर पैने बाण 
चलाने लगा । परस्पर के गराघातो के कारण शरीरों से निकलनेवाले शोणित के प्रवाह 
से युक्त होकर, वे दोनो गेंरए रग के निर्भेरों से युक्त पर्वतो की भाँति दीखने लगे । वे 
अपनी-अपनी धनुर्विद्या का कौशल दिखाते हुए तीब्र गति से युद्ध करने लगे । अस्त्र के 
आधघातो से युक्‍त हो युद्ध करते समय, वे ऐसे दिखाई पड रहें थे, मानो पतझभड के उपरान्त 
पुष्पित किशुक वृक्ष हो । अमर, गधर्व॑ आदि आश्चर्य के साथ इस युद्ध को देखने लगे । 


उसी समय कलभो से घिरे हुए मत्त गज के सदुश, मत्रियों से घिरे विभीषण ने 
भयकर रीति से अपने धनुष का टकार किया और क्रोधोन्मत्त हो राक्षस-सेना पर ज्वालाओ 
को उगलनेवाले तीक्ष्ण बाण चलाये । उन बाणो के लगते हो राक्षस-्सेना इस प्रकार 
पृथ्वी पर गिरने लगी, जैसे वज्भपात से विद्याल वृक्ष गिरते है । अनल आदि उसके मत्री 
शूल, वरछे, खड़ग आदि शास्त्रों से राक्षसों पर आक्रमण करके उन्हें धराशायी करने 
लगे । तब विभीषण बानर-सेना को देखकर कहने लगा --अवब तुम सब लोग एक साथ 
मिलकर इस इन्द्रजीत का वध करो । लकेश्वर की सारी शक्ति यही हैं । यदि यह मारा 
गया, तो समकभो कि दशकठ अपनी सेना के साथ परास्त हो गया । इसके पहले तुम 
लोगो ने अपने असमान विक्रम से, प्रहस्त, वज्जमुष्टि, प्रजघ, सुप्तघ्न, भयकर प्रतापी कुभ- 
निकृभ, कुभकर्ण, अतिकाय, महापारव, धूम्राक्ष, मकराक्ष, क्रोधन, झोणिताक्ष, उपाक्ष, त्रिशिर, 
महोदर, अग्निकोप, देवातक, नरातक, जबुमाली, अकपन आदि मभहान्‌ पराक्रमी योद्धाओ 
को मारकर युद्ध-सागर को सहज ही पार किया था और अपने वाहुबल को प्रदर्शित किया था । 
अब तुम्हारे तथा लक्ष्मण के लिए यह इन्द्रजीत एक गोपद के समान है। मुझे अपने 
पुत्र का बंध नहीं करना चाहिए । इसके नप्ट होने का उपाय में तुम्हें बताऊँगा । सुनो, 
स्वये हिंसा करना या दूसरो को भेजकर हिंसा कराना, दोनो समान हैं । मितु यह राम का 
कार्य है, इसमें लोकहित निहित है । इसलिए यह पाप नहीं है । अब में सौमित्र के हाथो 
इसका वध कराऊंगा । आगे इसकी एक भी माया नहीं चलेगी ।' 


इसकी पब्चात्‌ जाम्बबान्‌ ने अपनी रीछो की सेना लिये हुए आकाथ को विदीर्ण 


३९० रंयग्ना/थ एयायण ॥॒ 


करनेवाला गर्जन करके राक्षमो पर दृठ पडा और पर्व॑त-श्रुगो, वृक्षो तथा नखो और दाँतो 
से झत्रुओं को ऊपर आघात करते हुए उन्हें व्याकुल कर दिया। तव राक्षस भयकर परजु, 
मुद्गर, झूल, परिष तथा बनुप लिये हुए भयकर गति से उनसे भिड गये। वानर तथा 
निञ्याचरों का वह सग्राम ऐसा दीख पडा, मानो सुरासूरो का सग्राम हो । तब हनुमान्‌ ने 
क्रद्न होकर लक्ष्मण को नीचे उत्तार दिया और बम के समान एक-एक प्रहार से अनेक 
राक्षमों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसने शैल-श्गों तथा शाल-वक्षो का प्रचुर प्रयोग 
किया और राक्षतों का सहार करके भयकर सिहनाद किया । तब विभीषण ने क्रोध 
से अयने धनुष का ठकार और अपने मत्रियों के साथ राक्षस-सेना पर टूटकर अनेक 
राक्षमों का सहार किया । फिर. उसने स्वर्ण जनी से युक्त तीज घर इद्रजीत के शरीर पर 
चलाया । तब उसने भी कुद्ध होकर अद्वितीय गर यो चलाये कि वें विभीषण के वक्ष को 
पार करके पृथ्वी में ऐसे गड गये कि पृथ्वी भी डोल गई । 

इस प्रकार, विभीषण से भयकर युद्ध करनेवाले इद्रजीत को देखकर लक्ष्मण ऋुद्ध 
हुए और हनुमान्‌ के के पर बैठकर असख्य तोन जर उस राक्षस पर चलाये । इद्रजीत ने 
भी भयकर वाण-समूह चलाकर लक्ष्मण के वाणों को काठ दिया । इस प्रकार, जव वो दोनो 
एक दूसरे पर ऋूर वाण चलाने लगे, तव उन अस्त्रों से ढके हुए चरीर से युक्त वे, वर्षा 
की धारा से युक्त वादलो के समान और वादलो से युक्त सूर्य-चद्र के समान दिखाई पड़ते 
लगे । उनके वाणों की तीत्र गति का वर्णन कैसे किया जाय ? ऐसा लगता था, मानो 
वनूप को प्रत्यचा पर चढाये हुए वाण ज॑से-के-तंसे रहते हो और वें उन्‍हें छोडते ही न हो । 
दोनों जोर के बाण समस्त आकाञ में ऐसे व्याप्त हो गये कि अधकार छा गया । 
वीर न्‍य के जावेंग से अभिभूत वे दोनो उस युद्ध-क्षेत्र में अपने-आपको भूलन्से गये । 
आच्चर्य था कि उस समय उस युद्ध-भूमि में वायु का सचलन भी नहीं होता था और 
अग्नि दीप्त नहीं होती थी | यह देखकर दिक्‍पाल, देवता, गधर्व, यक्ष, किन्नर आदि 
चकित-मे होकर लक्ष्मण की प्रणसा करते हुए उनकी शरण में आये। उन्होने लक्ष्मण की 
विजय की कामना करते हुए उन्हें कई आशीर्वाद दिये और कहने लगे---हे सौमित्र, इस 
लोक-कटक राक्षस का आप अवब्य बंध कीजिए ।! 


१०८ डन्द्रजीत का वच 

देवताओं के इस प्रकार कहते ही भानू-बछ्यज लक्ष्मण ने भयकर सिहनाद करके 
अपने घनृप का टकार करते हुए इद्रजीत पर आक्रमण किया और असख्य वाण उस पर 
चलाये । उस रानस ने भी उन वाणों को काटकर फिर कई भीपण घर लक्ष्मण पर चलाये। 
तब, लक्ष्मण ने कद होकर एक अद्धंचद्र वाण से उसका घनुप काट डाला, सात वाणों से 
उसकी ध्वजा को गिरा दिया, एक वाण से सारथी का सिर काट डाला, दस वाणों से 
उसका वक्ष विदी्ण करके चार वाणों से रघ के जचज्वों को मार गिराया । तब रावण का 
पुत्र स्व्य सारथी तथा रथिक वनकर सौमित्र पर भयकर गशरबवर्षा करके अट्टह्मास करते लगा। 
तव सौमित्र ने स्वय न्‍थ चलाते हुए युद्ध करनेवाले इद्रजीत को लघध्य करके त्तीक्षण वाण 
चलाये, जिनके लगने से रावण का पुत्र मूच्छित हो गया । 


सुद्धकांड ३९९ 


कुछ ही समय के परचात्‌ इन्द्रजीत की चेतना लौट आई । वह चिंतित होकर 
सोचने लगा--'यह कैसी विचित्र बात हैँ कि एक मानव ने मुझे इतना व्याकुल कर दिया । 
इसके पहले के यूद्धों में मेने कभी एसी व्याकुलता का अनुभव नहीं किया था । समय की 
गति प्रवल हैं, कोई उसके प्रतिकूल जा नहीं सकता | इस प्रकार चिता से पीडित हो वह 
दीर्घ नि इवास छोडते हुए घनतृष पर वाण का सधान करने की इच्छा नहीं रहने के कारण 
चुपचाप शजत्र्‌ को देखता रहा । तब सभी देवता रामानुज की प्रशसा करने लगे । 


इद्रजीत के कातिहीन तथा विवर्ण मुख को देखकर वानर हर्ष-घ्वनि करने लगे । 
तव वोौराग्रणी प्रमाथी, मेर-सद्ृश विशालकाय एवं मेघनि स्वव शरभ तथा ऋषभ ने पर्वत- 
श्गो को, इन्द्रजीत के रथ पर फेंक्कर अर्वों के साथ रथ को भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया । 
इस पर विपुल क्रोध से इन्द्रजीत ने सिहनाद करके विभीषण के ललाट को तथा लक्ष्मण के 
वक्ष को लक्ष्य करको तीन-तीन पैने बाण चलाये और घनुष का टकार करते हुए सिह-गर्जन 
किया । तब विभीषण ने क्रोधोन्मत्त हो, आँखों से अग्नि-कणों की वर्षा करते हुए पाँच 
वाण ऐसे चलाये कि वे उस राक्षस के वक्ष को पार कर निकल गये। तब इन्द्रजीत ने 
ऋरध से अपने पिता (विभीबण) पर आस्नेय बाण चलाया। उसको आते देखकर लक्ष्मण ने वारुणास्त्र 
का प्रयोग किया । दोनो गर आपस में टकराकर पृथ्वी पर गिर पडे । उसके पश्चात्‌ उस 
राक्षस-कुमार ने उरगास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने गरुडास्त्र के प्रयोग से उसको विफल कर 
दिया । फिर, उसने कुवेरास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने ऐब्द्रास्त्र सें उसे खडित कर डाला । 
तब दानव ने गरधर्वास्त्र चलाया, तो लक्ष्मण ने उसे रौद्ास्त्र से काट डाला। उन दोनो का 
युद्ध प्रलय-काल में पृथ्वी की दशा का स्मरण दिला रहा था। उस समय सौमित्र की रण- 
क्लान्ति को मिटाने के लिए मानों, मंद-मद पवन चलने लगा । 


तब लक्ष्मण ने यम की भाँति क्रूर हो इन्द्रजीत को देखकर अपने धनुष की ऐसी 
ध्वनि की कि दिशाएँ विदीणं-सी हो गई । और, उसके पश्चात्‌ उन्हींने भयकर सिहनाद 
करके, देवेन्द्र से प्राप्त ऐन्द्रास्त्र को अपने धनुष पर चढ़ाया और कहा--यदि रामचन्द्र 
धर्मात्मा है, यदि देवी सीता पतिन्रता हैँ, यदि देवताओं की कृपा मुझ पर है, यदि इन्द्र 
आदि देवताओ का हित (इन्द्रजीत के अत से) होनेवाला है, तो यह महान्‌ घर इन्द्रजीत 
का सिर काट देगा। इस प्रकार कहते हुए उन्होंने लक्ष्य साधकर इन्द्रजीत पर वह वाण 
चलाया । रत्न की नोक से सुशोभित वह बाण, समस्त आकाश्य में व्याप्त हों, घोर वज्र के 
समान भीषण रूप धारण किये हुए, कुर गति से चल पडा । उस घर ने विहगेद्ध के सदृभष 
वेग के साथ, सप॑ के मुख से निकलनेवालें अग्निकणों की चचलता लिये हुए, सर्य-विव की-सी 
भेयकर दीप्ति से प्रज्वलित होते हुए, अपनी काति से पृथ्वी तथा आकाण को भरते 
हुए उम्र दड देने के उद्देश्य से भयकर बनकर उस राक्षसेन्द्र के पुत्र पर आक्रमण क्रिया । 
उस महान्‌ उहण्ड अस्त्र ने अनुपम मणिकुडलो तथा ललित अरुण अक्षत्रों से अलकृत इन्द्रजीन 
के सिर को सुकुट के साथ पृथ्वी पर गिरा दिया, मानों (लक्ष्मण ने) लका की, निधि सिद्ध 
करने की इच्छा से प्रेरित हो, उसके पहले बलि देने के लिए, एक जगली भंसे का सिर 
काट लिया हो । यद्यक्षेत्र में गिरे हुए इन्द्रजीत को देखकर, लक्ष्मण विजय-लक्ष्मी से 


ड्शर्‌ रंमनांथ एयायएी 


सपन्न हो, अत्यत हर्ष से दिगाओं को कॉँपातें हुए गख बजाया, धनुष का भीषण टैकार 
और सिंहनाद किया । उस समय अप्मराएँ नृत्य करने लगी और गधर्वों ने अपने मधुर 
संगीत से लोगो को आनद पहुँचाया । 

तव विभीयण नें अत्यधिक हर से लक्ष्मण को हृदय से लगा लिया और सभी वानर 
हर्ष मानने लगे । हतणेष निज्ञाचर त्रस्त हो, वानरों के आक्रमण के समक्ष खड़े रहने का 
साहस ने कर सके और अपने चरणों के आधघातो से पृथ्वी को कँपातें हुए, अपने आयुधों 
को जहाँ-तहाँ फेंक्कर, प्राण लेकर भागने लगे । कुछ राक्षस लका की ओर भागे, कुछ 
पर्वत-क्रूगों पर चढ गये, कुछ समुद्र में कूद गये और कुछ गुफाओं में जाकर छिप गये । 
तब अग्निदेव अपनी स्वाभाविक दीप्ति से जलने लगें, सूर्य प्रखर तेज से भासमान होने 
लगा, सातों समुद्र अत्यत स्वच्छ हो गये, दिद्याओ में आच्छादित कुहरा हट गया, गगन 
प्रसन्न दीखने लगा, और पृथ्वी निप्कप दिखाई पडने लगी । तब हनुमान, शतवली, नल, 
पनस, गरभ, ऋषपभ, अतुल पराक्रमी अगद अतिबली सुग्रीव, दधिमुख, गज, गवय, गधमादन, 
द्विविद, मैन्द आदि वानर-नेताओं ने आकर लक्ष्मण को प्रणाम किया और वडे हर्ष से उनकी 
प्रणमा करने लगे । समस्त देवताओं ने भी लक्ष्मण की प्रशसा करते हुए पुष्पनवृष्टि की । 
वानरों ने विजयनाव से सिहनाद किया । परिमिल से युक्त मद पवन धीरे-बीरे चलने लगा। 
चूंकि, लक्ष्मण विष्णु के अभ् से सभूत थे, उनके हाथो युद्ध में मरे कपटी राक्षस, गरीर तजकर, 
पब्चिम सागर में डूबनेवाले सूर्य की भाँति विष्णु-सायुज्य को प्राप्त हो गये । सूर्यवज्य की कीत्ति को 
सव दिग्याओ में व्याप्त करते हुए लक्ष्मण ने वहाँ एक विजय-स्तभ प्रतिष्ठित किया और वानरो, 
विभीषण तथा हनुमान्‌ के साथ जञीप्र रामचन्द्र की सेवा में पहुँच गये । वहाँ पहुचकर उन्होने राम 
के चरण-कमलो में क्ुककर प्रणाम किया । तब, राम ने उन्हें अपने हृदय से लगा लिया 
और आनदाश्रुओं से अभिपिक्त करते हुए, उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया । लक्ष्मण के 
घरीर पर वीर-पुलक के सदृभ लगे हुए बाणों को देखकर उमडनेवाले अपार दुख तथा 
मेघनाद की मृत्यु के अत्यधिक हर से राम मूच्छित-से हो गये । किन्तु, वे णीघध्र ही सैभल गये 
और नसूर्य-पुत्र को तथा विभीषण को अपने भाई लक्ष्मण को दिखाकर यो कहने लगे-- 
बुद्ध में अजेबव होकर आज इसने कैसी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया हैं । असख्य दिव्य 
अस्त्रास्त्रों से सपन्न इच्धजीत का इसने वध किया है । अत , अब यह निश्चित ही हैं कि महान्‌ 
जक्ति-सपन्न रावण मेरे हाथो मरेगा । उसका वैभव और उसका वल, आज उसके पुत्र की 
मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गये । असर्य उस्त्रों से सपन्न तथा समस्त राक्षसों का आधार 
अपने पुत्र की मृत्यु का प्रतिणोध लेने के उद्देश्य से रावण मेरे साथ युद्ध करने के लिए 
समस्त आयुधों से सुसज्जित होकर, दुर्वार गति से आवबे, तो भी में अपने पैने वाणों से, 
चतुरगिणी सेना के साथ दशकठ का खड-खड करके भूतों को वलि चढा दुगा ।' 


इसके पण्चात्‌ राम ने सुपेण को देखकर कहा--हे वानरोत्तम, तुम ओषधी-शैल स 
श्रेष्ठ प्रभा-विलसितन विशल्यकरणी ले जाओ और लक्ष्मण, विभीषण तथा अन्य बानरों के 
शरीर पर लगे वाणो के छावों की पीडा को दूर कर दो । सुपेण ने राम के आदेश का 
पालन क्या और वे सव स्वस्थ-गात्र हो गये । सूर्य-पुत्र की जाजा से, सभी वानरो ने 


इुद्धकाड़ ' २९३ 
चेंद्र तथा सूर्य-सम विलसित राम-लक्ष्मण को अलकृत किया । राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षस- 


राज विभीषण, हनुमान्‌, सुषेण, झतमन्यु का पोता जाववानू, नील आदि वानरनायक, 
पौलस्त्य-वशजो का एकमात्र आधार उस वीरवर इद्रजीत की मृत्यु पर हर्ष मनाने लगे । 


१०९ इन्द्रजीत की मृत्यु पर रावण का शोक 

युद्धभूमि से भागे हुए हतशेष राक्षस लका में पहुँचे और लोक-कटक रावण को 

देख, शोकात्त॑ हो यो कहने लगे--हे देव, इंद्र के वेरी आपके पृत्र ने अपने अनुपम भुज- 
वल से असख्य वानरों का सहार किया । उन्होने देवताओं को आश्चर्य-चकित करते हुए 
अपने दिव्य अस्त्रो के प्रयोग से लक्ष्मण को भी व्याकुल कर दिया और युद्ध करते हुए 
निदान लक्ष्मण के हाथो से मृत्यु को प्राप्त हुए । यह समाचार सुनते ही रावण अत्यधिक 
शोक से व्याकुल होकर बहुत समय तक मूच्छित होकर पडा रहा । फिर, वह सचेत होकर 
शोक-सागर में डूबे हुए कहने लगा--"हाय, वशवर्द्धन, हे महावीर, हाय दानशील, हे श्र- 
वीर, शतमन्यु को सहज ही जीतनेवाला तुम्हारा शौर्य आज किसने दवा दिया ? इंद्र 
आदि दिक्‍पाल और गगनचारी जीव तुम्हारा नाम लेते हीं भयभीत होकर भागते थे । 
ऐसी तुम्हारी भयकर शक्ति के समक्ष खडे होकर एक साधारण मानव ने तुम्हारा दर्प-दलन किया ! 
प्रचड क्रोध से तुम अपने भयकर कोदड को सभाले हुए युद्ध-क्षेत्र में खडे हो जाते, तो 
यम भी तुमसे परास्त हो जाता था । ऐसी तुम्हारी वह शक्ति कहाँ नष्ट हो गई ? 
क्या देव-गति वाम हो गई है ? अन्यथा, हें इन्द्रजीत, आज यम तुमसे भी अधिक प्रवल 
कैसे हो गया ? तुम्हारे पैने शर आइचरयंजनक ढंग से मदराचल को खड-खड कर देने 
में समर्थ थे । तुमने युद्ध-मूमि में कई बार सहज ही राम-लक्ष्मण को परास्त किया था। 
हे पुत्न्‍र, आज उस शक्ति को खोकर तुम सौमित्र के हाथो मारे गये । हे देवशत्रु, तुम्हारी 
मृत्यु से देवता तथा मुनि अत्यत हर्षित होगे । प्रलय-काल के घन-गर्जन-सदृश तुम्हारे सिहनाद 
करते ही समस्त लोक भयभीत हो जायेंगे । तुम सभी देवताओं के लिए अजेय थे । ऐसे 
तुम एक क्षुद्र जीव की भाँति मारे गये । हाय, ब्रह्मा का लेख मिटाने में तुम असमर्थ ही 
रहे । आज समस्त चराचर जगत्‌ विक्रम तथा वीरो से शून्य दीख रहा है । हाय पुत्र, में 
तुम्हारी शक्ति का भसेसा किये हुए था, आज तुमने मुझसे अलग होकर मुझे देवताओ के उपहास 
का पात्र बना दिया । क्‍या, तुम्हारे लिए यह उचित था ? आज राक्षस-स्त्रियों का विलाप 
मुझे अपने कानों से सुनना पड रहा है | तुम अपना युवराजत्व, अपनी लका, अपने इंप्ट 

वधुओ, अपनी माता, स्त्रियों तथा पुत्रों को त्याग कर कैसे चले गये ? हाय पुत्र, तुम कहां 

चले गये ” उस दिन तुमने यम को जीत लिया था, ऐसे वलणशाली तुम आज उसी के 

नगर को कैसे गये ? पुत्र बडी भक्ति से अपने पिता के क्रिप्रा-कर्म करता है । आज वह 

कर्म नहीं रहा, आज मुझे ही तुम्हारा क्रिया-कर्मे करना पड रहा हैं । अब में क्या कहें और 

क्या करू ? राम-लक्ष्मण, रवि-पुत्र, राक्षम-पालक विभीषण तथा भयकर पराकरमी वानर, 

शूलो के समान मेरे हृदय में गडे हुए हे । हे पुत्न, उन हृदय-शूलो को निकाले विना ही 

तुम कहाँ चले गये ? तुम मेरी विजय थे, मेरे तेज थे, मेरे पुण्य-फल थे, मेरे भाग्य घें, 

मेरें श्ौयें थे, मेरी गति थे, मेरी कीत्ति थे और मेरा सर्वेस्व तुम ही थे, तुम्हारे जैसे पृत्र की 

पूछ 


३3९9 रंगनाथ रायायप 


मृत्यु मेंने देखी । अब मेरा जन्म किस प्रयोजत का ? इस विपत्ति-रूपी समुद्र को पार 
करने का साधन ही कया हैं ? में अवतक यही विश्वास किये रहा कि तुम्हारी सहायता 
से में राम को जीत लूंगा । वह विश्वास अब नष्ट हो गया हैं| मेरी सभी आशाएँ समाप्त 
हो गईं । अब में इस जोक-दावानल में जल नहीं सकता ।” इस प्रकार, आत्तंताद करते 
तथा वार-बार शोक करते हुए, अस्थिरसति हो, रावण कितनी ही वार मूच्छित होता रहा । 
दअ्कठ के विवेकी मत्री उसे सात्वना देने तथा समकाने लगे । रावण वार-बार सेमलकर 
रोष तथा शोक से, भौहें तानता, और चारो दिशाओं में क्रमण- अपनी क्रद्ध दृष्टि केच्द्रित 
करता । जिस दिशा में उसकी कुद्ध दृष्टि पड जाती, उस दिग्ना में स्थित राक्षस भय से 
सिकुड जाते। निदान, राक्षसेश्वर ने अपने उग्र दाँतो को पीसते हुए, अपने दसो मुखो के 
नेत्रों से अग्निकणों की वर्षा करते हुए अपने मत्रियो को देखकर कहा--मैने अविरत 
तप से ब्रह्मा को सतुष्ट किया और असख्य गत्त्रास्त्रो को प्राप्त किया । मेने युद्ध में न 
कभी अपजय प्राप्त की, न कभी अपने मन में शोक का ही अनुभव किया । शिवजी को 
सतुष्ट करके नील मेघ के सदृश जो कवच मैने प्राप्त किया है, उसे घारण करके यदि में 
अपने रथ पर युद्ध के लिए जाऊँ, तो क्या, स्वर्ग के अधिपति भी मुझे जीत सकते है ? 
उस दिल में ब्रह्मा से जो घनुष-बाण प्राप्त किये थे, उन्हें शीघ्र ले आओ । आज मैं अपने 
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए शीघ्र छात्रुओं पर आक्रमण करूँगा और राम और लक्ष्मण 
तथा वानरो को जीतूग़ा ।! इतना कहकर वह मन-ही-मन प्रलय-काल की अग्नि की भाँति 
जलते हुए ताल ठोककर सभी दिज्ञाओं को प्रतिध्वनित करते हुए विविध वाद्यो के निनाद 
के बीच युद्ध के लिए चल पडा । अत्यत क्रोध से वह गरजकर कहने लगा--राम ने 
सीता को प्राप्त करने के लिए मेरे भाइयो, पुत्रों, बधुओ तथा सैनिकों का नाश किया है । 
इद्रजीत ने माया सीता का भी वध किया । मेरे सभी उपाय निरथक हो गये। में अभी 
जाऊंगा और असली सीता का ही वध करके अपना प्रतिशोध लूगा ।' 


११० रावण का सीता का वध करने के लिए जाना 


इस प्रकार कहने के पश्चात्‌ वह चद्रहास को अपने हाथ में लेकर अपने पदाघात से 
पृथ्वी को कॉपात हुए अशोक-वन की ओर चल पडा । तब वृद्ध राक्षस-मत्री आपस में 
परामर्ण करने लगे--- क्या दशकठ उन दागरथियो को अपने पैने वाणों से जीत नही सकता । 
इसने लोक-पालको की परवाह न करके युद्ध में उन्हें जीत लिया था, मरुतो को भयकर 
यूद्ध में परास्त किया, नौ ब्रह्माओ को जीत लिया, आठ वसुओ का द्प चूर कर दिया, 
अपने प्रताप से नवग्रहों को दवा दिया, वारह आदित्यो को झुका दिया, ग्यारह रुद्रो को 
जीत लिया, गधवं, यक्ष, राक्षस, उरग, गरझुड तथा भयकर दानवों को भयभीत करके अपने 
वण में कर लिया | ऐसी दणा में इसके सामने मनुष्यों की गक्ति ही कितनी है ? कोध 
में आकर पतिन्नता स्त्री को मारना उचित नही है !' 

उसी समय रावण यम की भाँति लोक-भयकर रूप घारण किये हुए जानकी का वध 
करने के उद्देग्य से अशोक-वन में पहुँच गया । उस पापात्मा की कऋद्ध दृष्टि को देखते 
ही वह साध्वी भय से सिकुड-्सी गई। भयकर ग्रह के समक्ष भयाक्रात हो पडी हुई रोहिणी 


खुछ्धुकोाड - ३९३ 


की भाँति वह सीता रावण को देख सोचने लगी--हाय भगवन्‌, इस दुरात्मा के हाथो से 
मुझे इस प्रकार मरना पड रहा हैं। कदाचित्‌ इद्रजीत की मृत्यु का समाचार जानकर 
मुझे मारने के लिए यह आ रहा हैँ अथवा उन राम-लक्ष्मण को जीतकर मुझे मारने के 
उद्देश्य से यहाँ आ रहा है, मुझे जान नहीं पडता । क्‍या, इसी के हाथ मरना विधि ने 
मेरे भाग्य, में लिखा है ? हाय, अब में क्‍या करूँ ? हाय भगवन्‌, तुमने अत्यत पुण्पात्मा 
राम-लक्ष्म्ण को अनेक सकटो में डाल दिया हैं ।! इस प्रकार, वह कमललोचनी विलाप 
करती हुई, अपने मन में रघुराम की मूत्ति प्रतिष्ठित करके दु ख-विवश होकर मूच्छित हो गई। 
पृथ्वी पर पडी हुई सीता को देख दशकठ उनकी तरफ आगे बढा । तब सभी 
राक्ष) हाहाकार करते हुए चिल्लाने लगे--यह भयकर छत्य अनुचित हैं ? उसी समय 
महान्‌ मतिमान्‌ तथा नीतिवानू सुपाहर्व नामक राक्षस रावण के निकट पहुँचकर निर्भय 
हो रावण को उपदेश देने लगा किहे दानवेंद्र, तुम्हारे पितामह पुलस्त्य हे, तुम्हारे पिता 
धर्मात्मा, नीतिज्ञन तथा यशस्वी विश्ववस्‌ हे, तुम स्वय वेद तथा आगमो के ज्ञाता हो, अपने 
महत्त्व का विचार किये विना तुम ऐसे दुष्कर्म करने पर क्यो उतारू हुए हो ? उत्तम 
स्त्रियों का स्पर्श करके उनका वध करना महापाप है। इसलिए, तुम यह विचार छोड दो। 
तुम अपना सारा क्रोध कल युद्ध में राम-लक्ष्मण पर दिखाना । इस प्रकार कहकर 
सुपाइव॑ ने रावण के हाथ से चद्रहास छीव लिया और रावण को अपने साथ वहां से 
ले आया । वहाँ से लौटकर दशकठ मन-ही-मन शोक से पीडित होते हुए अपने मतन्रियों 


तथा वधुमित्रों को सभा-मडप में बुलाया और अपने पुत्र के गुणों की वार-बार प्रशसा 
करते हुए शोक प्रकट करने लगा । 


१११ इन्द्रजीत की स्त्री सुलोचना का शोक 


अत पुर की स्त्रियाँ इद्रजीत की मृत्यु का समाचार सुनकर शोक प्रकट करने लगीः 
तो उसे सुनकर आदिशेष की पुत्री सुलोचना को अपने प्राणनाथ की मृत्यु का समाचार 
ज्ञात हो गया । वह तुरत शोक से अभिभूत होकर, मूच्छित ग्रिर पडी । बडी देर तक 
सहेलियो की परिचर्या के उपरान्त, वह किंचित्‌ सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर का स्मरण 
करती हुई विविध रीतियो से यो प्रलाप करने लगी-- हाय प्राणेश्वर, हें प्राणनाथ, क्‍या, 
एक साधारण मनुष्य ने तुम्हें परास्त किया है ? हाय, वह पापी ब्रह्मा हमारे प्रेम को नहीं 
देख सका । इसीलिए उसने हम दोनो को अलग कर दिया है ।! जब कभी तुम बाहर 
जात थे, तब मूकसे कहकर जाते थे । इस बार भी तुम मुझसे कहकर जाते, तो 
शत्र्‌ के हाथो तुम्हारी ऐसी मृत्यु नही होती । मेरे पिता ने जब तुम्हारे साथ बडी प्रीति 
से मेरा विवाह किया था, तब उन्होने तुमसे कहा था, यदि तुम विजय की आकाक्षा करते हो, 
तो जाने से पहले सभी कार्यों की सूचना अपनी स्त्री को देकर जाना । तब तुम ब्रह्मा 
तथा शिव के लिए भी अजेय बनोगे । नरो की तो वात ही क्‍या ?” उसके पश्चात्‌ उन्होंने 
मुझे एक शिरोरत्त देकर कहा था, है पुत्री, जब तुम्हारे पति झत्रुओं पर आक्रमण वरने 
जायें, तव तुम इस मणि से उनकी आरती उतारकर उन्हें भेजना । ऐसा करो, तो वे 
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके अवश्य लौट आयेंगे । उनके इन प्रिय वचनो को भूलकर 


२९4 एयनायथ रायायण 


तुम शत्रुओं के दिव्य झरों से यद्ध-ममि में निहत हुए ।” इस प्रकार, प्रलाप करती हुई 
उसने मन-ही-मन अपने प्राण, अपने प्राणेब्वर के चरणों पर समर्पित कर लिये । उसके 
परचात्‌ अपने पुत्रो को देखकर उस सुदरी ने कहा--हीं पुत्रो शोक-हूपी गम्भीर समुद्र में डूवन 
के पदचात भी किस बात का भय हो सकता है ? विभीषण तो हैं ही | वे अवश्य तुम्हारा 
रक्षा करेंगे। अत , तुम श्रेप्ठ गृणो से सपन्न होते हुए उन्नति करो । अब मरा जीना ७चित 
नही है । में अवश्य अपने प्राणंश्वर को संचा मे जाऊगा | 


इस विचार से मन-ही-मन हर्षित होती हुई, वह अपने मन की इच्छा को दृढ़ 
बनाती हुई, अत्यधिक क्लान्ति से चीत्कार करती हुई अपने पैरों को घसीढती हुई किसी 
प्रकार रावण के सभा-मण्डप में पहुँची । वहाँ पहुँचकर वह सुदरी आँखो से अश्वधारा बहाती 
हुई बडी नम्रता से अपने ससर से कहने लगी--हे दानवेन्द्र, पति से वचित हुई पत्नी का 
यही धर्म हैं कि वह पति के साथ ही इस ससार को त्याग दें। अत, मुक्त अभी पति के 
साथ जाना चाहिए। आप अपने सैनिकों तथा मित्रो के द्वारा मर पति का शव मंगवा 
दीजिए ।' 
उस साध्वी के वचन सनकर राक्षसराज बडी देर तक चिंता में घुलतें हुए चुत 
रहा, फिर कहने लगा--हे साध्वी, तुम्हारे पति का शरीर युद्ध-क्षेत्र में शत्रुओं के वीच में 
पडा हुआ है । यदि में जाकर माँग भी, तो क्‍या, वे मुझे वह शरीर देंगे ? अत , यह कार्य 
मभसे नही हो सकेगा । अब आगे जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसे करो | में क्या कहूँ 
हे पुत्री, कोई ऐसा कार्य नही हैँ, जिसका ज्ञान तुम्हें न हो । अपनी वृद्धि के अनुरूप मन 
तुम्हें यह परामश दिया हैं ॥' 
तब उस पद्मलोचनी ने उससे कहा--हें दानवेन्द्र, आपने अपन हाथ स कैलास 
पर्वत को उठाकर शिवजी को भी भयभीत किया था। आप तीनो लोको को जीते हुए 
महान्‌ वीर हे । देवेन्द्र को भी परास्त किये हुए महावीर क सम्मुख वर और वानरो की 
गउक्ति कितनी हैँ ? नरो तथा वानरो के मध्य पड़े हुए आपक वीर-पुत्र का शरीर लाने 
में आप अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे हे । कदाचित्‌ यह कुसमय का ही प्रभाव हैं कि 
आप इस प्रकार कह रहे है । पति-हीना तरुणियो को यदि घर के वाहर कार्यव् जाना 
तो घर्मं यही बताता हैं कि वे अग्नि को साथ लेकर जाय | आप मर निवेदन को 
बरा मत मानिए और मूभे जाने की आज्ञा दीजिए । में स्वथ जाकर अपन पति का शरीर 
ले आऊंँगी । 
दशकठ ने उस रमणी को जाने की अनुमति दी, तो उसने अपने इवज्लुर को पणाम 
किया और आपाढ मास की विजली के सदृश दीखनेवाली अपनी देंह की काति की किरण 
भमि तथा आकाजञ में व्याप्त करती हुई, निः्चल वृद्धि से वह सुंदरी आकाशन-्माग स चल 
पड़ी । सभी वानर-वीर आइचर्य-चकित हो उस कमललोचनी को देखकर सोचने लगें-- 
कदाचित, देवताओ ने स्वर्गं-लोक से इस श्रेप्ठ सुदरी को राम देंव के पास भजा होगा, 
अथवा अपने पत्र की मृत्यु के दुख से पीडित हो रावण ने अपना दर्प त्यागकर सीता को 
ज्य पर विठाकर भेज दिया होगा, अन्यथा किसी देवकाता को इतने वेग से यहाँ आने 


' खुद्धकांड ३९७ 


की आवश्यकता ही क्‍या थी ?” अग॒द, सुग्रीव, हनुमान्‌ तथा युद्ध-भूमि में रहनेवाले सभी 
वानर-तेता राम-लक्ष्मण के निकट पहुँचकर आइचर्य प्रकट करने लगें । उस समय परम 
पावन, पवन-पुत्र ने आकाश-मार्ग से आनेवाली उस रमणी को देखकर रामचद्र से कहा-- 
हैं देव, यह मानिनी, देवकाता नहीं है और राम की पत्नी भी नहीं हैं । यह कोई पति- 
हीना स्त्री है, उसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी है । वहाँ उस रमणी के रथ पर देखिए, भस्म से 
आवृत अग्नि दिखाई दे रही है ।' 
११२, सुलोचना का राम की स्तुति करना 

इतने में वह रमणी शीघ्रगति से उस स्थान पर पहुँचकर रथ से उतर आईं । 
क्षीण कटि से विलसित वह रमर्ण। ऐसी दीखती थी, मानो स्वर्णं--प्रतिमा हो या नवजात 
मोती हो, अथवा नवन्यौवगा राजहसिनी हो । वह अपनी आँखों से अश्रु वहाती हुई, 
चकराती हुई, चीत्कार करती हुई, मद-गति से राघव के सम्मुख पहुँच गई और उन्हें साष्टाग 
दण्ड-प्रणाम करके, हाथ जोडकर कहने लगी--हे रवि-कुलाबुधि सोम, हे रामाभिराम, है 
विमल गुणधाम, हे शत्रुविनाशी, हे मेघश्याम, हे कमलनेत्र, हें विमल चरित्रवानू, हे हिमगिरि- 
सम धीर, हे ललित-मधुर-वचन-कुशल, हे लावण्य-निधि, हे जन-नायक, आपके चरणों की सेवा 
से मेरे सभी पाप दूर हो गये ।' 

इस प्रकार, राम के समक्ष स्तुति करती हुई, विनय के साथ वह खडी हुई । त्तव 
राम की आज्ञा से सूर्यपुत्र ने कहा--हे सुदरी, तुम कौन हो ? तुम्हारे यहाँ आने का क्या 
कारण है ? तुम्हारा नाम क्‍या हैं ? तुम्हारे पति कौन हे ? तुम किसकी पुत्री हों ? तुम 
अपना वृत्तात सुनाओं।! तब वह आँसू वहाती हुई कहने लगी--हे भानु-पुत्र, मेरे पिता 
आदिशेष है, मेरा नाम सुलोचना है, मेरे पति वह पुण्यवानू, वहुभोग-भाग्य-सपन्न, बाहुबली, 
महा तेजस्वी, युद्ध में भयकर, इन्द्र-विजयी, महान्‌ शूर, दशकठ तथा मदोदरी के पुत्र 
मेघनाद है ।' 

इतना कहने के पश्चात्‌ उस रमणी ने राम को देखकर शोकाभिभूत होकर कहा-- 
है राघवेन्द्र, आपने युद्ध-भूमि में ऐसे महान्‌ शूर का वध किया है । कृपालु होते हुए भी 
आपने कैसे उनका सहार किया ? हे सूर्यकुलतिलक, ऐसा महान्‌ विक्रमी अब आगे कही 
जन्म लेगा ? आप जानते ही हूँ कि पति की वियोगाग्नि से सती स्त्री अत्यधिक परितप्त 
होती है । में अपने पति को खोकर वैधव्य-दुख का कैसे सहन कर सक्गी ? हे शरणार्थी- 
नाण, हे दयामय, हे परिपूर्ण हदय, हे शुभ-गुण-सपन्न, में आपकी शरण में आईं हूँ । 
शरणागत की रक्षा करने की आपकी टेक है । मेरे पति को प्राण-दाव देकर आप अपने 
भ्ण की रक्षा कीजिए । पति-भिक्षा देकर मुझे जीवन प्रदान कीजिए ।' 

सुलोचना की कात्तर प्रार्थना सुनकर, दया-मूत्ति राम का हृदय पिघल गया और 
वे उस रमणण। के पति को पुनर्जीवित करने की बात सोचने लगे । यह समभकर हनुमान्‌ ने 
राम से निवेदन किया-हे राघव, आप तो सर्वज्न हैं । उस ब्रह्मा का बचन टाल देंना 
आपको उचित नहीं है । हे राजन, आपको ब्रह्मा की मर्यादा रसनी चाहिए । तब राधव से 
पवन-पुत्र की बातो पर विचार करके कहा--हे कमलाक्षी, तुम अगले जन्म में अपने 


डक र्एनाथ रायायण 


पति के साथ इस पृथ्वी पर जन्म लेकर अगणित सपत्ति के साथ चिर काल तक 
सुख-भोग करोगगी और उसके पण्चात्‌ तुम दोनों वैकुण्ठ में अपना इच्छित सुख 
आप्त करोगे 


राम के वचन सुनकर वह स्त्री हर्पित हुई और विनयपूर्वक उस दयामय राम की 
स्तुति यो करने लगी--हे दया-समुद्र, हें अमल-गृण-बीर, हे साथुजन-आश्वित, हे सेतु-बधक, 
आप कृपा करके मेरे पति का शव मेगा दीजिए । मुझे अब शजीत्र नगर को लौट 
जाना चाहिए ।' तब सुग्रीव ने उस स्त्री से कहा--हे कमलनयनी, यदि तुम पतिक्रता हो, 
तो विना विलव जाकर अपने प्रिय पति से अपना सारा वृत्तात कहों । यह सुनकर वह 
साध्वी ज्ञीघ्न युद्ध-क्षेत्र में पहुँच गई । वहाँ उस चचलाक्षी ने अपने पत्ति के कटे हुए 
सिर को देखकर कई प्रकार से रुदन करने लगी । फिर, अपने पति के बरीर के पास 
पहुँचते ही उमडते हुए दु.ख से वह मूच्छित होकर गिर पडी । कुछ समय के उपरान्त वह 
सचेत हुई और अपने प्राणेश्वर के गरीर पर गिरकर ऊँचे स्वर में हाहाकार करती हुई 
विलाप करने लगी । फिर वह घैयें धारण किये हुए स्थिर हो खडी हुई और सत्य की 
प्रभा से दीप्त होती हुई यो वोली--यदि मेने मन-वचन-कर्म से पति की भक्ति की हो, 
यदि मेने धर्माचरण में पति को ही ढठेव मानकर पातित्रत्य धर्म का पालन किया हो, तो 
मेरे पति पुनर्जीबित होकर मुझसे समाषण करें ।' 

सुलोचना ने आत्मविब्वास के साथ जंब ऐसे वचन कहें, तो दशकठ के पुत्र ने 
आँखें खोलकर कहा--हे रमणी, मेरा वध करानेवालें तुम्हारे पिता ही तो हैँ ? मुझे 
जीतने की जवित दूसरों में कहाँ है ? तुम को दुखी होने की कोई आवश्यकता नहीं है। 
अपने ऋणानुवव के अनुसार ही पति अपने पत्नी के साथ रहता है | सयोग तथा वियोग, 
दोनो, जीवों के लिए ब्रह्मा के द्वारा विवान किये जाते हे । समय की गति प्रवल हैं, 
इसलिए मेरी मृत्यु हुई है | अब तुम जाओ ।” इतना कहकर उसने अपनी आँखें वद कर लीं। 
सुलोचना मन-ही-मन अत्यत दुखी हो, वहाँ से चलकर राम के पास आईं और 
उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया और वडी प्रसन्नता से उनकी प्रश्मसा करने लगी । 
तव रघुराम ने अगद को बुलाकर कहा--इस रमणी को उसके पत्ति का शरीर 
दिला दो 7 


अगद ने राम की जाज्ञा मानकर सुलोचना को उसके पति का झरीर दिला दिया । 
सुलोचना उस छव को लिये हुए बडी भक्ति से राम की आाज्ञा प्राप्त कर वहाँ से शीघ्र लका- 
नगर को रवाना हुई। वह सीधे अपने अतपुर में नहीं गई, किन्तु अपने पति के घरीर 
को एक योग्य स्थान में रखकर, उसकी रक्षा के लिए सैनिको को नियुक्त करके, उसके पब्चात्‌ 
अत पुर में गई । वह वहुत समय तक अत्यधिक चिंता में निमग्न रही और उसके पदचात्‌ 
अपने प्रिय पुत्रों को पास बुलाकर आँखों से अश्रुवधारा वहाती हुई, उनके शिरो को सूंघा, 
गालो का बड़े स्नेह से स्पर्श किया और फिर उन्हें हृदय से लगाकर कहा-- हैं पुत्रो, 
तुम्हारे मुह देखते रहने का सौमाग्य सुझे भगवान्‌ ने नहीं दिया है । अब इस पृथ्वी पर 


७. 


जीना मेरा धर्म नहीं है, इसलिए अवच्य में सहगमन कहूँगी । अब तुम्हारा यहाँ रहना भी 


खुद्धकांड २६९ 
उचित नहीं है । इसलिए तुम पाताल-लोक में चले जाओ । अपने नाना आदिशेप के घर में 
तुम विना सकोच के स्थिरुद्धि से युक्त हो रहो ।! यो कहकर सुलोचना ने उन्हें शीघ्र 
वहाँ से भेज दिया । 

उसके पश्चात्‌ वह थर-थर काँपती हुई दशकठ के सम्मुख गई और मुरभाये हुए 
अपना मुख भूकाये आँसू वहाती हुई, गदुगद कठ से, हाथ जोडकर भक्ति से प्रणाम किया 
और अपने राम के पास जाने तथा शव लाने का वृत्तात उसे सुनाया और अत में कहा-- 
राम की दयालुता, लक्ष्मण का अतिशय स्नेह, विभीषण की सद्हृदयता तथा वानर-वीरो 
का पराक्रम आदि अद्भुत है । यह सुनते ही रावण का मुख कातिहीन हो गया । उस 
रमणी। के साहस, विवेक, न्याय, विचक्षण महिमा, पति-भक्ति तथा (शव के लाने में) उसकी कुशलता 
आदि के सबंध में सोचकर उससे कुछ कहते नहीं बना । भ्रत्युत्तर देने में हिचकनेवाले अपने इबशर 
को देखकर सुलोचना ने कहा--हे असुराधीण, विधि-विधान को लेकर अब मन-ही-मन चिंतित 
क्यो होते हें ? में अब एकनिष्ठ होकर सती हो जाऊँग। । आप मुभे जाने की अनुमति 
दीजिए ॥' 

तव व्याकुल चित्त से रावण ने अपनी पुत्र-वधू को देखा, और ऐसी साहसवती तथा 
बृद्धितती तारी को सहगमन करने से रोकना असभव समभकर कहने लगा--हे कमलाक्षी, 
अब में तुम से क्‍या कह सकता हूँ ? तुम्हारे मन की इच्छा कया हैं, कौन जाने ? अपने 
प्रिय ज्येष्ठ पुत्र का वध कराकर, में भय तथा श्ञोक के समुद्र में डबा हुआ हूँ । मुझे कुछ 
सूकता नहीं है। अत, तुम जैसा चाहती हो, वैसा करो ।” 


११३. सुलोचना का सहगमन 
तब उस चचलाक्षी ने अहोभाग्यः कहकर मन-ही-मन हर्षित होती हुई रावण 


को प्रणाम किया और वहाँ से अपने अत पुर में पहुँच गई । स्तान से निवृत्त होकर उसने 
पीत्ताबर तथा रत्नाभरण घारण किये, ललाट पर चदन का लेप किया और पुष्प-मालाएँ 
पहनी । उसके पश्चात्‌ सहेलियो तथा दशकठ की आज्ञा से आये हुए वधुमित्रों के साथ 
वह सुंदरी अतपुर से बाहर चली । उस समय मृदग, निसान, पटह, भेरी, शख, काहल 
आदि वाद्यों की ध्वनि से दसो दिश्याएँ प्रतिध्वनित होने लगी । वहाँ से वह शीघ्र इन्धजीत 
के शरीर के पास पहुँची और सुदर वस्त्र तथा आभूषणों से उस मृत शरीर का अलकरण 
किया । तत्पश्चात्‌ उसने उस देह को अरथी पर रखवाया। तुरही आदि श्रेष्ठ वाद्यो की 
ध्वनि के बीच तज्रेताग्नियो को लिये हुए स्वय अरथी के आगे-आगें चली । उसके पीछे-्ीछे 
दैत्य-पमह चला । इस प्रकार, नगर की उत्तर दिशा में पहुंचकर वहाँ उसने चिता सजाई । 
फिर, अपने साथ आई हुई सोभाग्यवती स्त्रियो को स्वर्णाभरण, वस्त्र आदि विविध 
दान दिये और निशचल भक्ति के साथ चिता में प्रवेश करके अपने प्राणेश्वर का शरीर 
अपने हृदय से लगाकर बैठ गई । जब अग्नि प्रज्वलित हुई, तब उसने अपना शरीर अपने 
पति को समर्पित किया । देवता उसकी पति-भक्ति की अ्रणसा करने लगे । उस समय 
सब के समक्ष वह अपने पति के साथ देवताओ के विमान पर बैठकर, देव-मइली को बीच 
देदीप्पमान होती हुई पुण्य-लोक में पहुँची और बहाँ अपने पति के सग रहने लगी । 


20०0 रंगेनाये एपोय्फ 


११४, रावण का अपनी प्रधान सेना को युद्ध के लिए भैजर्नी 


रावण अत्यधिक क्रोध तथा झ्लोक से जलते हुए, बार-बार उमडनेवाले पुत्र-शोक 
में घुलते हुए अपने सभा-मडप में पहुँचा । क्रोधोद्दीप्त सिंह की भाँति उष्ण निश्वासों को 
छोडते हुए, वल, साहस तथा युद्ध-कुअलता से सपन्न अपने सैनिको को देखकर उसने आदेश 
दिया कि तुम शीक्र जाकर वानरों तथा राम-लक्ष््ण को जीतकर आओ । 


रावण का आदेश जिरोधाय करके राक्षस-सैनिको ने बडे उत्साह के साथ, रथ, गज, 
तुरग, पदाति आदि चतुरगिणी सेना के साथ युद्ध के लिए आवश्यक शास्त्रास्त्रों का सगठन 
किया । फिर, वे वज्जअ-कवच तथा वज्-सम आयुधों से सज्जित हो भीषण गति से चल पडे। 
उस समय उनके गज-समूह के चिघाडो तथा घटिकाओ एवं अद्वों की हिनहिनाहटों का भीषण 
रव, दुदुभि, गख, पटह, डमरू, पणव आदि वाद्यों का तुमुल नाद, सेना का कलकल, 
ध्वजाओ की फडफडाहट, रथ के पहियो की घडघडाहट तथा धनुष का टकार आदि विविध 
ध्वनियो से मथित समुद्र की भाँति दिशाएँ गूजने लगी । सेना के चलने से अत्यधिक धूलि 
ऐसे उडने लगी, मानो वह समुद्र से युद्ध करने जा रही हो। सभी राक्षस ऐसे गर्जन करने 
लगे कि उनके गर्जवों की ध्वनि आकाश का स्पर्ण करने लगी और सारी पृथ्वी कॉँपने लगी। वे अपनी 
गर्वोक्तियों, धमकियों, हुकारों तथा चिल्लाहटों की ध्वनियों के साथ, अपने मणिमय कुडलो, 
हारो, ककणो तथा किरीटो की दीप्ति को विकीर्ण करते हुए लका से बाहर निकले, मानों 
महान्‌ जक्ति-सपन्न कपि-समुद्र को देखकर, बडे उत्साह से लका-समुद्र से निकलनेवाला 
वडवागर्नि का समूह हो । 

तब कपिन्व्रीरों ने बडे उत्साह से गर्जन करते हुए, अपने पदाघातो से दिग्गजों को 
बैठ जाने के लिए विवश करते हुए, आकाश की ओर उछलते हुए तथा ताल ठोककर 
ब्रह्माण्ड को भी विदीर्ण करते हुए, काजल के पर्वतों के समान दीखनेवाले राक्षसों को 
देखकर करोडो वृक्षो, पर्वेतो तथा वडी-बडी शिलाओ को लिये हुए, उन पर आक्रमण 
किया । इतने में उदयाद्वि पर सूर्य भगवान्‌ चढ आये, मानो वे रघुराम की धनुरविद्या की 
निपुणता देखने की उत्कट अभिलाषा लिये हुए आये हो । राक्षस तथा वानर-सेनाएँ ऐसी 
भयकर रीति से परस्पर भिड गई , मानो एक समुद्र दूसरे समुद्र से भिड गया हो । कपियों 
की विज्ञाल सेना को देखकर राक्षस अपने रथ, गज तथा अच्वों को उनकी ओर बढातें 
हुए वानरो पर टूट पड़े और उन्हें अनेक रीतियो से दुख पहुँचाने लगे। किन्तु, वानरो ने 
अत्यत साहस के साथ पवेतों को उठाकर उन पर फेंका। उनके प्रहार से कई राक्षस- 
सैनिक गिर पडे । राक्षस, करवालो से वानरों की पूछो को काट डालते थे, तो वानर 
अपने बाहु-दण्डो से राक्षसों के गदा-ण्डो को तोड देते थे । राक्षस, वानरों पर परशुओ, 
परिघो तथा खड्गो को फेंकरते थे, तो वानर पव्व॑तो, वृक्षों तथा पर्वेत-श्रूगो को फेंककर उन्हें 
नप्ट कर देते थे | युद्ध-भूमि में रक्त की घाराएँ वहने लगी । वानर अपनी पूछो से 
पर्वेतो को उठाकर फेंकते थे, तो राक्षस उनके नीचे चूर-चुर हो जाते थे और फिर चक्रो 
तथा गदाओ से वानरो पर प्रह्मर करते थे। इस प्रकार, वे समान पराक्रम दिखाते हुए 
परस्पर यद्ध करते थे । राक्षस जब गजो, अछ्वों तथा रथों को कपियों पर चलाकर उन्हें 


खुद्धकोंड 8०९ 


व्याकुल करने लगे, तब सुग्रीव, अंगद, पवनपुत्र तथा नील आदि वानर-बीर अत्यंत ऋ्रोंघ 
से उनपर पर्वतों तथा वृक्षों की वर्षा करने लगे । इससे असंख्य रथ खड-खेंड होकर गिर 
गये; हाथी भुड-के-कुड गिरकर मर गये और अहवं तथा पदचर सेना पृथ्वी पर लोटने 
लगी । जब रथारूढ कुछ राक्षस ऋद्ध हो पृथ्वी को कँपातें हुए, अपने मनोरथी की भाँति, 
अपने रथों को बडे वेग 'से वानरों पर चलाया, तब वानरो ने उन रथो के जुए पकड़कर 
सहज ही उन्हें पृथ्वी पर पटक दिया । जब अझ्वारोही राक्षसों ने कपियों पर अपने अश्व 
चलाये, तब कपि उनके सम्मुख घैर्य के साथ खडे होकर एक अश्व को उठाकर उससे दूसरे 
अश्व पर प्रहार करने लगे । जब गजारोही सैनिक वानरों पर गजो को चलाते, तव वानर 
गजो पर आंक्रमण करके एक गज से दूसरे गज को टकरा देते । फिर, वे गजन्सेना पर 
टूट पडते और सजो पर मारूढ राक्षसों को नीचे खीच लेते या उन पर पदाघात करके 
गिरा देते या उन्हें नीचे गिराकर अपने पैरों से कुचल देते या उन्हें ऊपर उठाकर पृथ्वी 
पर पटक देते और विविध *रीतियो से उन्हें छिन्न-भिन्न -कर देते थे । इस समय अश्वों के 
खुरो से उठी हुई धूलि के आकाश में व्याप्त होने से युद्ध-भूमि में अधकार-सा छा गया। 
उस अधकार में करवालो की दीप्ति उन्हें मार्य दिखाने लगी, तो उस दीप्ति की सहायता 
से वानर तथा राक्षस परस्पर घोर युद्ध करने लगे । इस युद्ध के कारण वहनेवाले रक्त 
को घारा-हुपी किरणें, धूलि-हपी अधकरार को दूर करने लगी । घोर युद्ध में हाथी तथा 
रय-हूपी तटो के बीच अइब्र-हूपी मगर, ध्वजाओ, पेडो तथा सैनिको-रूपी तटवर्त्ती वृक्षो, 
खड्ग-हूपी मछलियो, हाथी की सूड-रूपी सर्पों, ढाल-हूपी कच्छपो, चूर-चूर बने हुए 
अप्स्थ रत्वाभूषणों के कण-हूपी रेत, केशजाल-रूपी शैवाल तथा चामर-रूपी फेन से 
यूक्‍त रक्‍त की नदियाँ बहने लगी । उन नदियों को ज्ञीत्र पार करते हुए वानर तथा राक्षस 
परस्पर भिड जाते । इतने में वानर राक्षसों पर उद्धत गति से दूट पडते, उनकी रीढो 
को तोड देते, अपनी मुष्टियो तथा कुहनियों से प्रहार करके, उन्हें नीचे गिरा देते, सिरो 
को कुचल देते, उनके पेट चीर देते, और इनसे भी सतुष्ट न होकर उन्हें दाँतो से काटते, 
अगो को तोडते, एंडी पकडकर उन्हें घुमाकर पृथ्वी पर पटक देते, उनके केश पकडकर क्रूर 
गति से खीचते, दोनो हाथो से दो राक्षसों को पकडकर उन्हें एक दूसरे से टकराकर चूर- 
चूर कर देते, उन्हें गिराकर उनके वक्षो पर ऐसा प्रहार करते कि उनकी छातियाँ फट जाती 
उनसे रक्त वह निकलता और अपने नाखूनों तथा दाँतों से उनकी नाक, कान, मुख, 
ललाट आदि चीर डालते । कभी एक सौ वानर एक ही दानव पर टूट पडते और कभी 
एक ही वानर एक सौ दानवो का नाश कर देता । इस प्रकार, वानरो ने वडी तत्परता से 
लडते हुए दानवों को तितर-बितर कर दिया । 


तब राक्षस-सैनिक बड़े रोष के साथ, अपने दहाड, भेरी, मृदग आदि युद्ध-वाद्यो के 
निनाद से पृथ्वी को*कॉपाते तथा दिश्ञाओ को विदीर्ण करते हुए, वानर-सेना पर दूठ पडे । 
यह देखकर इन्द्र आदि दिक्पाल भयभीत हो उठे । विकृत सिर विकृत प्रकोष्ठ, विक्रेत ओष्ठ, विकृत नख, 
विकृत मुख, विक्ृत गात्र, विक्ृत नेत्र, विकृत हास, विक्ृृत नाक, विकृत वक्ष, विकृत वर्ण, विकृत 
कर, विकृत पाद तथा विकृत नाववाले राक्षस-वीर उमड-घुमडकर नलग्र-अलग मझानवात 
| 


8०२ रेंगनायथ रायायण 


प्रलव-काल के वादलो की पंक्ति के समान परिघ, गदा, चक्र, परशु, तोमर, त्रिशूल, खड़ग, 
मुद्बर, करवाल, ढाल, नागमुख, झिलीमुख, घनुष, मूसल आदि समस्त आयुधो से 
सज्जित हो वानर-सेंता पर भयकर गति से टूट पडे और उन्हें काटते, पीठते, मारते, 
उछालतें तवा विविध रीतियो से उनपर प्रह्मार करतें हुए उनका सहार - करने लगे । 
इन क्रूर ॒प्रह्मर्रों से भीत होकर वानर कपने हाथ के पववतों तथा वृक्षों को नीचे गिराकर 
विबश हो सोचने लगे, भला, हमें युद्ध करते की तावश्यकता ही क्‍या है ? हमें राक्षसों से 
छत्रुता ही क्या हैँ ? हमें न सूर्यवज राम ही अाहिए, न सूर्यपुत्र सुग्रीव । जगलो में कच्चे 
फल झोर पीले पत्तो को खातें हुए सुख से जीवन-बापन करना छोडकर, यहाँ इन राक्षतों 
के हाथो में व्यर्थ ही हम क्यों मरें ”? चलो, हम यहाँ से भाग चलें। यो सोचकर वानर- 
वीर वैध लोकर सेतु की दिशा में भागने लगें। राक्षस-स्ेना उनका पीछा करके उन्हें 
खदेड़ने लगी । 


११४. वानर-सेना को हनुमान्‌ आदि का प्रोत्साहन देना 


हनुमानू, नील तया अगद ने वानरो को इस प्रकार भागतें हुए देखा, तो वें शीघ्र 
सेतु के उस पार गये गौर वानरो को सेतु के पार जाने से रोककर उन्हें लौटाया | तब 
सभी वानर भय से पीड़ित हो राम के पीछे जाकर शरण लेने लगे । राम ने वानरो की 
यह दीनता देखी, तो क्रोव से घनुष हाथ में लेकर उसका टंकार करतें हुए ऐसा सिहनाद किया 
कि राक्षतों के हृदय भय से काँप उठे । तदनतर क्रोधोन्मत्त हो अपना हस्त-कौशल दिखाते 
हुए, निशाचरों पर तीत्र वाणों की ऐसी वर्षा करने लगें कि उन वाणों की अधिकता के 
कारण स्वर्य राम भी युद्ध-भूमि में दीखते नही थे । राम के चलाये हुए असंल्य चरो के 
प्रहार से राक्सों की कमरें टूट गईं, जाँघें कट गईं, शरीर के खड-खड हों गये, वद्ध- 
स्वल विदीर्ण हो गये, मुख विकृत हो गये, पैर कट गये, हाथ दूढ गये, कठ कट गये 
जौर सिर फट गये । कवर्चों को पार करके वाणों के चरीर में चुभ जानें से रक्त की 
नदियाँ वहने खूगी । राम के वाणो के प्रहार से कुछ राक्षस मरते थे, कुछ भयभीत होते थे, 
कुछ मूच्छित हो पृथ्वी पर मिर पड़ते थे, कुछ व्याकुल हो जाते थे तथा कुछ भय से 
मुह वाये खड़े रह जाते थे | गज, जदव तथा रथ पर आरूढ राक्षस संञ्रमित रह जाते थे ॥ 
अस्त राक्षस चिल्लाने लगें--वह देखों, राघव वाण चला रहे हे । लो, वें हमारे 
निकट पहुँच ही गये ।' ऐसा जात्तेनाद करते हुए वे बड़े वेग से युद्ध-क्षेत्र सें भागने लगे 
इतने में राघव ने अत्यधिक रोप से उन पर सम्मोहन-अस्त्र चलाया । उस अस्त्र के 
लगने से राक्षस अपने-आपको भूल-सें गये और यह न जानकर कि कोन राक्षस हैं, और 
कौन वानर, एक राक्षस दूसरे राक्षस पर ही आक्रमण करने लगा । उस गावर्व शर का 
ऐसा प्रभाव था कि किसी-किसी राक्षतत को एक ही राम दीखता था, किसी को एक राम 
के स्वान में दस राम दीखते थे, किसी को सौ राम दीखते थे, किसी को सैहस्न राम दीखते थे, 
किसी को एक लाख राम दीखते थे, किसी को करोड़ राम दीखते थे, किसी को सौ 
करोड़ राम दीखते थे; इस प्रकार उनको सारा युद्ध-क्षेत्र ही राममय दीखने लगा । मविराम 


ना. 


वाण चलाते रहने से राम का स्वर्ण-धनूष वृत्ताकार में दीखने लगा । उसे देखकर राक्षस 


खुद्धकांड 80३ 


भन-ही-मन सोचने लगे कि यह कदाचित्‌ वही चक्र है, जिसे विष्णु ने भयकर युद्ध करते 
हुए, नमुचि' पर चलाया था, अथवा किरण-समूह से घिरा हुआ सूर्यविम्ब हैं । यो सोचते 
हुए, राम के शर-समूह के प्रहार का सहन न कर सकने के कारण वे प्राण लेकर भागने 
लगे । उस समय राक्षस-सेना में क्षण-भर की रबत-वर्षा में भीगे हुए, नोदह सहस्र अश्व, अठारह 
सहद्न हाथी, एक लाख रथ, दो लाख वीर राक्षस नष्ट हुए । शर-हूपी अर, धनुष-रूपी 
नेमि (पहिये का घेरा), ठकार-रूपी रव, किरण-रूपी स्फुलिंगों से युक्‍त्त रास का धनुप- 
रूपी चक्र काल-चक्र की भांति विलसित होते देखकर हतशेष दैत्य अत्यत त्रस्त हो उस घोर 
युद्धभूमि को छोडकर भागे और लका में जा पहुँचे । यह देखकर वानर उत्साह से सिंह- 
नाद करने लगे । प्रलय-काल के यम की भयकर नाश-लीला की भाँति उस समय का युद्ध- 
क्षेत्र दीखने लगा । जब रघुवीर रावण की प्रधान सेना के दस सहस्न हाथी, वीस सहस्र 
अद्व, एक सौ रथ तथा एक पदुम सेना का सहार कर देते थे, तव एक धड उठकर नाचने 
लगता था, ऐसे करोड धड जब नाचते थे, तब एक कटा हुआ सिर आकाश की बोर 
उछलकर एक भयकर चीत्कार करता था, ऐसे एक करोड सिर जब उछलते थे, तब राम 
के घनुष की एक घटी बजती थी । इस भयकर युद्ध में राम के धनृष में लगी हुई ऐसी 
चौदह घटियाँ अविराम बजती रही । रघुवीर की ऐसी धनुविद्या का कल्पनातीत कौशल 
लगातार सत्रह घडियो तक चलते देखकर किन्नर, गधर्व, खेचर, ,यक्ष, उरग तथा अमर 
उनकी स्तुति करने लगे । 

उसके उपरान्त, रामचद्र ने शूर-पुगव सुग्रीव को देखकर कहा--“यह सम्मोहनास्त्र 
जगद्भयकर है । इसका प्रयोग करने तथा इसका उपसहार करने की शक्ति या तो मुझ में है, 
या ईश्वर में, अन्यो में ऐसी क्षमता नहीं हैं। कौशिक ने जिस' महान्‌ शस्त्र को 
मुझे प्रदान किया था, उसकी महिमा से स्वयं कौशिक भी अनभिज्ञ थे । तब विभीषण ने 
राम को देखकर विनय तथा सभ्रम से कहा--हे देव, रावण की यह सेना देवेनद्र आदि 
देवताओं के लिए भी अजेय थी । यही रावण की मूल-सेना थी, आज यह भी मिट्टी में 
मिल गई । अब रावण का अत निद्चित हैँ । आप तो स्वयं अपने महत्त्व का ज्ञान नही 
रखते । सच तो यह है कि कोई भी आपकी समानता नहीं कर सकता ।॥ विभीषण के 
वचन सुनकर रामचद्र प्रसन्न हुए । 


११६- राक्षस-स्त्रियों का रावण की निन्‍दा करना 

लका में दानव-स्त्रियों ने भुंडो में एकत्र होकर उमड़ते हुए शोक से पीडित 
होती हुई कहने लगी--हाय, कैसा दुर्भाग्य है कि निंदनीय चरित्र, भाग्यहीन मुखडा, पलित 
केशो से युक्त सिर, विशाल उदर, विक्वृत वेश, विकृत यौवन, उम्र केश तथा उम्र दष्ट्र- 
वाली शूर्पणखा सकल गुणोज्वल, सत्त्व-सपन्न, सुकुमार, तेजस्वी, सुमुख तथा कामदेव के समान 
सुदर रामचद्र पर आसकत हुई । कहाँ राजा भोज, और कहाँ गगू तेली । इस लंका के 
सभी राक्षसो पर मृत्यु की छाया पडी हुई थी, इसी कारण से उस राक्षसी ने दशकठ तथा 
उस सूर्यवशज में शत्रुता उत्पन्न कर दी । उस थूर्पणखा की बातें सुनकर उचित तथा 
अनुचित का विचार किये विना, शत्रुत्व ठानकर, दशकंठ अपना ही नाश कराने के लिए नही, 


६०9 रंगनाथ रॉयायफ 


कपितु राक्षत-वंग का भी सर्ववाग करने के लिए उस राम की पत्नी को ले आाया । 
इतना करने पर भी क्‍या, सीता उसे मिल गई ? ऐसा दुस्साहस उसने किया ही क्यों ? 
राम ने तो एक ही वाण से मारीच का वध कर डाला तथा दण्डक-वन में विराध पर क्रृद् 
होकर उसका सहार किया । इन वातों को जानकर भी मदाथ हो रावण ने उनको नहीं 
पहन्नाना .। जनस्वान में राम ने अपने अनल के समातच घरो से चौदह सहल्न राक्षसों का सहार 
किया और अपने भयकर वाणो से, त्रिभिर, दूषण तथा ख़र को सहज ही मार डाला । 
दरशकठ ने उम्तका भी विचार नहीं किया । क्रौचवन में दाशरथियों ने अपने अनुपम शौर्य से 
रुधिरागन को, कूर थिक्रम को तवा योजनवाह कवब को मार डाला । ऐसे विक्रमी राक्षस 
के (5व का) वृत्तात जानकर भी रावण ने राम पर विजय प्राप्त करने की ठावी । क्या, 
यह उसके लिए समव है ? क्या हनारे राब्ण में इतना साहस है, कि वह जगदीश्वर 
राम से युद्ध कर सके ? राम ने तो एक ही वाण से सहज ही वालि का वध करके सूर्य- 
पुत्र को किप्किवा का राजा बना दिया । सहनरों हाथी, लाखो अद्व, करोड़ो रथ और 
बसख्य पदचर सेना को राम ने एक क्षण-मात्र में ही युद्ध में मार डाला । उन्होने अकेले 
महान्‌ पराक्रमी कुभकर्ण का संहार किया । ऐसी वीरता देखकर भी रावण राम की शविति 
पृहचान नहीं सका । महाबघूर अतिकाय तथा इच्द्जीत को अकेले लक्ष्मण ने युद्ध में समाप्त 
कर दिया | इतना सव होने के उपरान्त भी रावण राम की शरण में नहीं जाना चाहता । 
बाज लका के घर-घर में विलाप सुनाई पड़ रहा हैं। सभी लोग युद्ध में हमारे वबु 
नरे, हमारे पुत्र मरे, हमारे पति मरे, हमारे सहोदर मरे, इस प्रकार का आत्तंनाद करते 
हुए शोक-समुद्र में डूब रहे हे । जिस दिन से दुर्मति तथा नीति-वाह्य हो रावण अपनी 
माया से सीता को इस नगर में ले जाया, उसी दिन से दुःशकुन दिखाई पड़ रहे हे । 
बव शीघ्र ही दशस्व के पुत्र के हाथो में दशकंठ का अत होना निर्चित ही हैँ । हाय, 
नीतिज्ञ विभीषण ने विविव रीतियो से इसको वर्म-मार्ग समकाबा था । यदि यह उनके 
हित वचनो का आदर करता, तो क्‍या लका की ऐसी दुर्दशा होती ? या तो कुल-र्वतों 
के पद्चो को बपने वज्ञाघात से काटनेवाले पुरदर ने या मधु-कैटभ आदि राक्षसों का 
संहार करनेवाले विप्णु ने व्य कर बम ने या प्रलय-काल के रुद्र ने इस पृथ्वी पर राम के 
रूप में जन्म लिया हैं और राक्षसों का वध करने लगा हैं । जिस समय ददारच-पुत्र राम, 
अपने जोर्य॑ का प्रदर्शन करने हुए, युद्ध में दशकठ का वव करने लगेंगे, उस समय, क्‍या, 
महान्‌ देवता या बधर्व या मृनि या रावण को वर प्रदान करनेवाले ब्रह्मा या शिव 
या राक्षस उन्हें राम के हाथों से बचा सकेंगे ? वर देते समय ब्रह्मा ने यह वर नहीं 
दिया था कि यह नर के हाथो से नहीं मरेगा । इसलिए यह स्पष्ठ हो रहा हैँ कि दंशकृधरं 
बपने वधुओं के साथ राम के हाथो से मरेगा। यह सत्य है; क्योकि जब इस रावण ने 
इन्द्र आदि देवताओं को बड़ी करता से दुःख पहुचाया, तव समस्त देवताओ ने ब्रह्मा से 
वमब-दान की प्रार्थना की । तव चतुर्मुख ने उन्हें देखकर कहा था---भविष्य में तुम्हें किसी 
प्रकार का दुख नहीं होगा | जब तुम निश्चित रहो । इसके पब्चात्‌ ब्रह्म देवताओं को 
साथ लेकर महांदेव के पास गये बौर उनसे प्रार्थना की । तब प्रसन्न होकर थिव ने ब्रह्म को 


युद्धकांड ०4 


करुणापूर्ण दृष्टि से देखकर कहा--देवो की रक्षा करने तथा समस्त राक्षसों का बध 
करने के लिए पृथ्वी पर इंदिरा का जन्म होगा । उस सती के पति बनकर विपत्तियों से 
प्रजा की सतत रक्षा करने तथा दु्जन राक्षसों का सहार करने के लिए विष्णु स्वय पृथ्वी 
पर अवतार लेंगे । राम ही वह विष्णु हे और भूमि-सुता ही वह इदिरा हैं ।” शिव का 
वचन कभी नहीं टलेगा । अत, समझ लो कि हमें अब अघट दुख प्राप्त होनेवाला हैं । 
अब हमारा रक्षक कौन है ? हमारा रावण अब बचेगा नही। अब हमारे सतप्त होने से कोई 
प्रयोजन नहीं हैं। हमारे एकमात्र त्राता विभीषण भी रामचद्र की शरण में गये 
हुए है ।” 
११७ रावण का द्वितीय युद्ध 

इस प्रकार, विविध रीतियो से असुर-स्त्रियों के दीन विलाप सुनकर रावण थोड़ी 
देर तक चिता की अग्नि में परितप्त होते हुए मौन हो रहा । फिर, प्रचण्ड' काल-ताग के 
फुफकार की भाँति दीघ नि श्वास छोडकर ओठ चबाते तथा आँखों से भग्नि-कणों की वर्पा 
करते हुए अत्यत क्रोध से युद्धोन्मत्त तथा विरूपाक्ष वामक राक्षसों को देखकर वोला-- 
तुम शीघ्र तुरहियो की भयेकर ध्वनि करते हुए सिंह-गर्जनो के साथ युद्ध के लिए निकल 
पडो । उसकी बातें सुनकर भी भयाक्रान्त निशाचरो को मौन देखकर, उसने 
फिर कहा--शीघ्र ही युद्ध की तैयारी करो । इस प्रकार हतोत्साह हो क्यो हो 
तब उन्होनें जाकर पुण्याह कर्म आदि करने के पद्चात्‌ युद्ध की तैयारी की और राक्षसेन्द्र 
के समक्ष आकर उस बात की सूचना दी । तब रावण ने उनको देखकर कहा---दिन-दिन 
मेरी सेना घटती जा रही है । मेरे सभी अनुचर मारे जा चुके। कअमरेनद्व के समान 
पराक्रमी खर, अमित बलझ्ञाली इच्धजीत, कुभकर्ण, प्रहस्त, कुभ-निकुम, भयकर पराक्रमी अति- 
काय, महाकाय, महोदर, असुरातक, नरातक, यशस्वी अकपन, कंपन आदि महान योद्धा, 
जो युद्ध में इंद्र का भी. सामना कर सकते थे, मेरे निमित्त प्राण खो बैठे । मेरा दर्प चूर- 
चूर हो गया। इसलिए, मे अपने सभी शत्रुओं का नाश करूँगा और अपने पराक्रम का 
प्रदर्शन करके उनसे प्रतिशोध लूंगा । मेरे शर समस्त आकाश तथा समुद्र को ढक लेंगे । 
मे आज सभी वानरो का सहार करूँगा । मेरे चलाये. बाण मृणालयुक्त कमलो की भाँति 
वानरों के कठ-ताल-युकत मूंख-कमलो को कार्टेंगे और में उनसे युद्ध-भूमि का अलकार करूँगा । 
आज लका नगर की स्त्रियाँ यह सोचकर कि हमारे पति, पुत्र और सहोदर युद्ध में कटकर 
मरे पडे हे, अब हमारी रक्षा कौन करेगा। वे शोक-सागर में डूबी हुई हू । में शत्रुओं का वध 
करके उनका शोक दूर करूँगा । में झत्रु-पक्ष की सेनाओ को अपने पैने वाणों से काटकर 
उनके रक्त-मास से, सियारो, गीधो उकावो, पिशाचों, प्रेतों एवं भूतों को तृप्त करूँगा ।' 

इसके पश्चात्‌ उसने युद्धोत्मत्त, मदमत्त एवं अक्षीण वलवानू विरूपाक्ष को देखकर 
कहा--तुरत तुम सभी राक्षसों को युद्ध-भूमि में ले आओो। मेरे लिए रव सजाकर भेजो। 
आज मेरे तीक्षण बाण, ,प्रतापी राम-लक्ष्मण के प्राण लेकर उनके रक्त का पान करना चाहते ह। 
में वानर-सेना पर बाण ऐसे चलाऊँगा कि एक-एक बाण से सैकड़ो वानर मारे 
जायेंगे । तुम वलवान्‌ राक्षसों को चुन-चुनकर सेना का सगठन करके शीघ्र लाओो ।' 


804 एगनायथ रामायण 


तव विरूपाक्ष आदि राक्षसो ने सेनां को एकत्र होने की घोषणा की | तुरत सभी 
राक्षस अपने गज॑नो से आकाश को केपाते हुए, करवाल, चक्र, खड़ग, परशु, शूल, गदा, 
मूसल, मुद्गर, शक्ति आदि विविध एवं विचित्र आयुधो से युक्त हो अत्यधिक उत्साह से 
आ गये । राक्षस रावण के लिए विविव अस्त्रों से सज्जित, सूर्य-प्रभा से विलसित रथ लें 
आये । तब रमणीय रत्नो की काति से प्रकाशमान कर्ण-भूषण घारण किये हुए; दसो कठो 
में रत्व-पदक पहने हुए, दसो मुखो से नाना प्रण करते हुए, केयूर, मणिकंकण आदि भूषणों 
से वाहुओं को अलक्ुत किये हुए; घनृप, शर, खड़्ग, चक्र, करवाल, परशु आदि विविध 
आयुधों को धारण किये हुए दशकठ रथ पर आउरूढ हुआ । उसके दसो मुकुट ऐसे प्रतीत 
होते थे, मानो वारह आदित्यों में एक को तो रावण ने वंदी बनाया, दूसरा आकाश में 
दीख रहा हैँ, अत बचे हुए दसो आदित्य यहाँ विराज रहे हे । रावण के रथ के पीछे 
रथ, गज, तुरग, पदाति चतुरगिणी सेना भी चलने लगी | उस समय सेना के निसान, 
तुरही आदि की ध्वनि तथा सैनिकों के सिहनाद आदि से गूजनेवाली लका प्रलय के 
समय भयकर गजंन करनेवाले समुद्र के समान दीख रही थी । वदीजनो की स्थुतियो के 
साथ रावण उत्तर द्वार से लका से वाहर निकला और युद्धोन्मत्त विरूपाक्ष को देखकर ऐसा 
सिहनाद किया कि पृथ्वी विदीण्णं-सी हो गई । उस समय सूर्य-विव की दीप्ति भी क्षीण 
हो गई, दिशाएँ अधकार से व्याप्त हो गईं, पृथ्वी डोल गई, रथ चूर-चूर हो गयें, 
अइ्व गिर पडे और रक्‍त की वर्षा होने लगी । ऐसे दुशकुनो को देखकर भी दशकढ 
किचित्‌-मात्र विचलित नहीं हुआ । ह 


लकेश की विशाल सेना को देखकर ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए वानरो ने सिहनाद 
किया बोर उद्धत गति से भयकर राक्षसरों पर टूट पडे । इससे क्ुद्ध होकर राक्षस-वीरो ने 
अपने पराक्रम को प्रकट करते हुए, वानरो के हृदयो को छेंदकर पार निकल जानेवाले 
पैनें वाण चलाये, मूसल, तोमर, शक्ति, मुदूगर, चक्र आदि फेंके, अकुश, कुत तथा 
शूल चुमोये, भयकर गदाओं से प्रहार किया और तलवारों को चमकाकर उनसे वानरो के 
अगो को खडित किया । तब कपि-वीरो ने भी क्रोघोन्मत्त हो, विशाल पर्वतो तथा वृक्षों 
को उन राक्षसों पर फेंका, अपने चरण, हाथ, दाँत, नख तथा पूछो की सहायता से उनके 
सिरो तथा शिरादो को, हाथों तथा मुखो को, वक्षो तथा वाहुओ को, ओठो तथा कठो को 
काटते, चीरते तथा कुचलते हुए, उन्हें कई प्रकार से पीडित किया । यह देखकर दनुजेंश्वर ने 
वत्सदत, अश्वकर्ण, नाराच, भलल आदि नाना अस्त्रों को वानरों पर चलाकर रक्‍त की 
घाराएँ वहा दी । वह एक-एक वाण से पाँच-पाँच, सात-सात, नौ-नी कपियो को एक साथ 
जहाँ-के-तहाँ गिरा देता था । इसके पछ्चात्‌ उसने पाँच वाणों से गधमादन को, अठारह 
बाणों से पनस को, दस वाणों से नील को, पचास वाणों से नल को, छह वाणो से द्विविद को, 
सात वाणों से विनत को, सत्तर वाणो से पवनपुत्र को, पच्चीस " वाणों से कुमुद को, 
पाँच बाणो से ग्रोमुख को, सात वाणों से ऋषभ को, सच्रह वाणों से गज को, सात बाणों 
से शरम को, सात वाणो से गवय को, तीन-तीन वाणों से तार तथा क्रथन को, 
अस्सी वाणों से अंग्द को तथा कई वाणों से अन्य वानरो को पृथ्वी पर झीज्र 


खद्धकांड 8०७8 


गिराकर गयव॑ से इंतराने लगा । असुरेबवर के वाणों से आहत कुछ कपि कमर के 
टूटने से गिर पडते थे, कुछ चकराकर लुढक जाते थे, कुछ लोगो के वक्ष स्थलो के विदीर्ण 
होने से ग्रिर पड़ते थे, चरणों के कट जाने के कुछ वानर गिर जाते थे, कुछ लोगो के 
हाथ कट जाते थे, कुछ वानरों के सिर फट जाने से वे भूमि पर लोट जाते थे, कुछ 
कपियो के कठ कट गये और कुछ की जाँघें कट गईं, इसलिए वे कराहते हुए पृथ्वी पर 
लोट, गये । युद्ध-भूमि में कई ऐसे भी कपि थे, जिनके अग ऐसे कुचल गये थे कि उनके 
अग्रो को पहचाचना कठिन हो गया था । बाणों के लगते ही कुछ वागर भागने लगते, 
किन्तु बीच में ही प्राणों के निकल जाने से वही पृथ्वी पर गिर जाते थे । इस प्रकार, 
दनुजेन्द्र के बाणों के आघात को सह नहीं सकने के कारण वे सभी वानर प्राण लेकर 
भागने लगे । रावण ने उनका पीछा किया । तब सुग्रीव वानर-सेना को देखकर कहने 
लगा--भागते क्यो हो, रुक जाओ, ठहर जाओ । फिर भी, वानर-सेना भागती ही रही। 
तब उनको रोकने के लिए सुषेण को भेजकर, सुग्रीव ने स्वय एक वृक्ष को लिये हुए राक्षस- 
सेना का सामना किया । उसके पीछे-पीछे पर्वतो को लिये हुए वानर-वीर भी चलने लगे । 
तब सिंहनाद करके वह प्रलय-काल के रुद्र की भाँति वृक्ष से प्रहार करते हुए शीघ्र गति से 
राक्षों का सहार करने लगा । अन्य वानर-वीर भी उसीके साथ राक्षस-सेना पर वृक्षो 
तथा पर्वतो की घोर वृष्टि करने लगे । इससे राक्षसों के सिर फूट गये और कई राक्षस 
कुलिश से आहत भगन-शिखर कुल-पर्वतो की' भाँति गिर पडे । 


११८, सुग्रीव के द्वारा विरूपाक्ष आदि राक्षसों का वध 

तब रविपुत्र क्रोध से अपने नेत्र लाल किये हुए एक पर्वत को हाथ में लिये हुए 
आगे बढा । तब विरूपाक्ष ने अत्यधिक रोष से रथ को आगे वबढाते हुए धनुप का टकार 
करके सुग्रीव पर वज्ञ-सम पैने बाण चलाये । किन्तु, रविपुत्र उनकी उपेक्षा करके उसके 
रथ पर कूद पडा और रथ, सारथी तथा घोडो को एक पर्वत के प्रवल प्रहार से पृथ्वी 
पर गिरा दिया । रथ से वचित किये जानें पर भी वह राक्षस-वीर पृथ्वी पर उतरकर 
सुग्रीव पर विविध शरों को चलाने लगा । इतने में राक्षसेन्द्र की आज्ञा से, सभी आयुधो 
से सज्जित करके, महावत एक मत्त गज को ले आया, तो विरूपाक्ष तुरत उस पर चढ़ 
गया जोर कपियों पर भयकर प्रहार करके उनका सहार करने लगा और साथ-ही-साथ 
सूर्य-पुत्र पर भी भयकर वाण चलाये । इससे सतुष्ट न होकर विरूपाक्ष कई शस्त्र और 
विविध बाण कपियों पर चलाने लगा । इनको न सह सकने के कारण जब वानर युद्ध- 
क्षेत्र से भागने लगे, तब सुग्रीव ने उन्हें रोककर, किसी भी तरह विरूपाक्ष को जीतने का 
संकल्प कर लिया । इतने में क्रथम नामक एक वीर वानर ने विपुल पराक्रम से एक वृक्ष 
को उखाडकर क्रोध से उस वृक्ष से हाथी के कुभ-स्थल पर प्रहार किया । तब श्रचुर रक्‍्त- 
धारा वहाते हुए वह गज उतनी टूर पीछे हट गया, जितनी टूर घनुष से निकलकर बाण 
जा सकता है और वहाँ जाकर वह भूक गया । तुरत वह राक्षस पृथ्वी पर कूद पडा 
और खड्ग तथा ढाल लिये हुए उसने सुग्रीव पर आक्रमण किया। तब सुग्रीव ने उस पर एक 
विशाल शैल से प्रहार किया, पर उस राक्षस ने उसे काठ डाला । तब रविपुश्न ने 


(20 रंगन/थ' एयायग 


रे 


उस पर अपनी मुष्टि से प्रहार किया, तो विरूपाक्ष नें अपने करवाल लेकर उससे सुग्रीब 
पर प्रहार किया । मुष्टि के प्रहार से विरूपाक्ष तथा करवाल के प्रहार से सुग्रीव दोनो 
मूच्छित हो गये । किन्तु, शीघ्र ही वे दोनो समलकर एक दूसरे से भिड गये। सुग्रीव ने 
अपनी हथेली से विरूपाक्ष गर प्रहार किया, तो उसने उसे बचाकर अपने करवाल से सुग्रीव॑ 
पर वार किया | करंवाल का वांर बचाने के लिए सुग्रीव दौडा और तुरत उस राक्षस पर 
ऐसा आघात किया कि विख्याक्ष के हाथ का आयुध गिर पडा | फिर, दोनो वीर, दो सूर्यो 
की भाँति प्रकाणमान होते हुए, प्रलय-काल की अग्नियों के समान प्रज्वलित होतें हुए, इद्रो 
की भाँति अपने भुजवल के गव॑ से फूलते हुए, विजय की आकाक्षा से मल्ल-युद्ध करने लगे। 
तब विख्याक्ष ने आइचर्यजनक शक्ति से सुग्रीव पर अपनी हथेली से ऐसा क्रूर प्रहार किया 
कि सुग्रीव मूच्छित होकर गिर पडा। तुरन्त वह तलवार हाथ में लिये हुए वावरी पर टूट 
पडा । इतने में सुत्रीव की चेतना लौट आई ओर उसने कुलिश के समान कठोर अपनी 
हथेली से विरूपाक्ष के वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह भयकर राक्षस रक्त उगलतें 
हुए पृथ्वी पर लोट गया। यह देखकर वानर हर्ष से फूल गये और दानव अत्यंत दीन हो 
भागने लगे । 


तत्र रावण ने विरूयाक्ष की मृत्यु से किचित्‌ भी विचलित हुए विना उसके अनुज युद्धोन्‍्मत्त « 
को देखकर कहा--दिखा तुमने सुग्रीव का पराक्रम ? युद्ध-क्षेत्र में अपने भाई विरूपाक्ष क्री 
दशा देखी ? इस यूद्ध में अनेक राक्षस-सैनिक मारे गये, कितने ही हाथी नष्ट हुए, भर्व 
दव गये, रथ दूट गये और सेना छिलन्न-भिन्न हो गई । वह देखो, घानर हर्षोन्मित्त होकर 
आग्रे वढ रहे हे । तुम्हारे लिए युद्ध करने का यही उचित अवसर है । अब तुम युद्ध- 
भूमि में जत्रुओ का सहार करो ।” तब विरूपाक्ष का अनुज श्रीराम को व्याकुल करने का 
सकल्प्र करके वानर-सेना के निकट पहुँचा और वाण, गदा, खड़ग आदि सभी आयुधो से 
कपियो पर प्रहार करते हुए उन्हें दुख देने लगा । यह देखकर सुग्रीव ने एक विशाल 
पर्वत को. उठाकर उस पर फेंक्रा, कितु उस राक्षस ने उसे बीच में ही काट डाला । 
तब सूर्यपुत्र ने और एक पहाड उठाकर फेंक्रा, तो उस राक्षस ने तीन वाण चलाकर उसके 
तीन खड कर दिये । उसके पश्चात्‌ भी उस राक्षस को शर-वृष्टि करते हुए देखकर सुग्रीव 
उसके रथ पर कूद पडा और उसके परिघ से ही उसके घनूष तथा केतु को तोड डाला, 
सारथी को मार गिराया और रथ के अइवो को पृथ्वी पर गिरा दिया । तब वह राक्षस 
बडे वेग से पृथ्वी पर कूदकर एक विश्ञाल गदा लिये हुए सुत्रीव पर ढूट पडा । तब दोनों 
परिघ एवं गदा से युक्त अपनी वाहुओ को चमकाते हुए सिंहो के समान गरजते हुए एक 
दूसरे के कठ, मुख, हाथ, स्कध, चरण, नख, जानु, जघा, छाती, पीठ, उँगलियाँ, नितब, कमर, 
शिर, कान, नाक तथा ओठो पर क्रमश प्रहार करते हुए आश्चर्यजनक रीति से अत्यत 
साहस के साथ युद्ध करने लगें । कभी वे दोनो परिघ एवं गदाओ से आहत होकर गिर 
पडते, फिर इतने में एक दूसरे से पहले सचेत होकर पृथ्वी को कँपाते हुए गर्जन करते । 
इस प्रकार, युद्ध करतें समय उस राक्षस ने अपनी गदा को दोनों पक्षो की सेनाओ को 
आदचर्यचकित करते हुए घुमाकर सूर्यपुत्र पर ऐसा फेंका कि सुग्रीव पृथ्वी पर गिर पड़ा 


खुद्धकांड 9०९ 


किंतु शीध्र ही उठकर सुग्रीव ने अपना परिघ घुमाकर उस राक्षस पर ऐसा फेंका कि वह 
उसके अग्रो से लगकर चूर-चूर हो गया । तब क्रोध से जलतें हुए उस राक्षस ने अपने करवाल 
को सुग्रीव पर फेंका, तो सुत्रीव ने उस कृपाण को लेकर उसे चमकाते हुए उस राक्षस के 
मकर-कुण्डलो से दीप्त मस्तक पर ऐसा प्रहार किया कि वह पृथ्वी पर लोट गया । यह 
देखकर राक्षस लका की ओर भागने लगे । 

तब सुपाइवव ने अपने बल के गर्व से फूलते हुए अगद की सेना पर आक्रमण किया 
ओर तीक्ष्ण शरो के प्रहार से कुछ वानरो के सिर काट डाले, कुछ लॉगो के हाथ काटे 
ओर कुछ लोगो का सहार किया । तव वानर भयभीत होकर भागने लगे । यह देख अगद 
उस राक्षस के रथ पर कूदा और उसी का परिघ छीनकर उससे उस राक्षस पर ऐसा 
प्रहार किया कि वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर लुढक गया। इतने में जाववान ने एक विग्ाल 
चट्टान उठाकर उस पर ऐसा फेंका कि उसका रथ दूट गया और अश्व तथा सारथी मर 
गये । इतने में सुपाइर्व सचेत हुआ और क्रोध से जलते हुए, अगद के कधे पर दस बाण 
चलाये, जाबवानू पर तीन वाण चलाये और गवाक्ष पर पाँच बाण चलाये । अगद बड़े 
रोष से परिघ घुमाकर उस राक्षस पर फेंका, तो वह पृथ्वी पर मूच्छित होकर गिर पडा । 
इसी समय अगद उस राक्षस का धनुष तोडने लगा, तो वह राक्षस सेमलकर उठ बेंठा और 
परशु उठाकर उससे अगद पर ऐसा आघात किया कि अगद मूच्छित होकर गिर पडा। फिर, 
शीघ्र ही सैमलकर अगद ने अपनी वच्ञ-सम मुष्टि से उस राक्षस को ऐसा मारा कि वह 
कुलिश के आघात से गिरनेवाले कुलपवंत की भाँति युद्ध-भूमि में गिर पडा । यह देखकर 
देवता हर्ष से निनाद करने लगें और राक्षस-सेना के पैर उखड गये । तब दशानन कहने 
लगा--महा पराक्रमी सुपाश्व नष्ट हुआ, बाहुबली युद्धोन्‍्मत्त की मृत्यु हो गई, विरुपाक्ष 
का वध हुआ और श्रेष्ठ राक्षस-बीर युद्ध में काम आये । अब बल-समन्वित इन राज- 
कुमारों को मै स्वय जीतूगा और अपने बधुओ की मृत्यु की शोकार्नि से जलनेवाली लंका 
के रहनेवालो के दुख को दूर करूँगा । अविरल क्षात्र धर्मे-रूपी जड, नव-विजय से उद्नत॑ 
लक्ष्मण-रुपी प्रकाड (तना), सूर्यपुत्र तथा अन्य वानर-वीर-रूप शाखाएँ, राम की अखड़ 
कीत्ति-रूपी मजरी, सीता-रूपी फल से युक्त हो, देवताओं के लिए आश्रय-रूपी छाया प्रदान 
करनेवाले राम-रूपी वृक्ष को मै उखाड़ दूंगा और उसे अपने मन के दुंख को दूर करने- 
वाली ओषधि बनाकर, इस ससार में जीवन-यापन करूँगा ।' 

११९ रावण का राघवों पर आक्रमण करना 

इस प्रकार कहते हुए असुरेश्वर ने क्रोवोद्दीप्त मन से अपने सारथी से कहा-- 
तुम अपनी चतुरता का प्रदर्शन करते हुए रथ को राघवों पर चलाओ, में आज उनका 
सहार करूँगा । यदि वे युद्ध में मरेंगे,तों सभी वानर तितर-वितर होकर भाग जायेंगे। 
रावण के आदेशानसार सारथी ने रथ की नेमियो का भयावह रव करते हुए उसे राघवों 
को निकट चलाया । वदी, मागध तथा सूत रावण की विपुल कीर्ति का गान करने लगे, 
राक्षस-सेना भीषण गर्जेन करने लगी और निसान घोर रव करतें हुए बजन लग ॥ तेव 
दशकंठ घनुष का भयकर टठकार करते हुए वानर-सेना पर दारुण अस्त्र चलाने लगा। ब्रह्मा स 

भरे 


९० रंय्नायप शयायगमे. 


निर्मित उन वाणों के लगते ही समस्त वानर, अपना भुजवल खोकर पृथ्वी पर गिरने लगे। 
इतने में रघुराम ने अपने अनुज के साथ क्रोध से बनुष धारण किये हुए रावण का सामना 
किया । राम के घनुष का निनाद सुनते ही आकाश विदीणं-सा हो गया, समुद्र आलोडित 
हो गये, दिग्गजों के कान के परदे फट गये बौर राक्षसों के चित्त डोल उठे ॥-कुद्ध दशकठ 
के घनुष से निकलनेवाले भयकर वाणों की ध्वनि सुनकर ही कितने वानर भयाक्रान्त 
हो पृथ्वी पर गिरने लगे । तब राम-लक्ष्मण सूर्य-चन्र की भाँति भासमान होते हुए युद्ध 
के लिए आगे बढे, तो देवताओं का श्ृत्र्‌ रावण राहु की भाँति शोभायमान होते हुए उनसे 
जूक गया । जब लक्ष्मण ने दशकठ पर बत्यत तीत्र शर चलाये, तव दशकठ ने उन्हें कठोर 
वाणों से वीच में ही काट डाला और उनपर उग्र वाण चलाये । लक्ष्मण ने भी उसके 
एक-एक वाण को खडित करके उस पर तीन वाण एक साथ चलाये | तव रावण ने 
अपने तीन वाणों से उनके वाण खडित कर दिये । इसी प्रकार, जब लक्ष्मण दस बाण 
एक साथ चलातें, तव वह उन्हें अपने दस वाणों से छिन्न-भिन्न कर देता, सौ वाण चलाते 
तो वह अपने सौ वाणों से उन्हें चूर-चूर कर देता । इस प्रकार, सौमित्र को युद्ध-भूमि में 
तंग करके उसके उपरात दनुजेश्वर राम से युद्ध करने चला । उसे देखकर सभी वानर इस 
प्रकार भागने लगे, मानो वें यम को देखकर भाग रहे हो । तब राम ने कोध से आँखें 
लाल किये हुए घनृष समालकर रावण का सामना किया । तब सभी देवता राम की 
प्रशंसा करने लगे और पृथ्वी हिल उठी । तब रावण भी क्रोध से तेवर बदलकर राम से 
भिड़ गया । राम तथा रावण भयकर अट्टहास करते हुए घनुष की ठकार-ध्वनि से दसो 
दिशाओं को प्रतिधष्वनित करते हुए, परस्पर ऐसे वाण चलाने लगे कि उनके चलाये बाण 
सारे आकाश में व्याप्त हो गये । उच्च वाणो के आपस में टकराने से भयकर ध्वनि के 
साथ निकलनेवाली अग्नि-ज्वालाओं से नभोमडल व्याप्त हो गया । वे एक दूसरे के 
धनुविद्याकौशल की भन-ही-मन प्रणसा करते हुए, एक दूसरे की रण-कुशलता पर 
आइचये करते हुए युद्ध करने लगे । इसी समय रावण ने भयकर तमिस्रन-वाण चलाया, 
जिसके प्रभाव से सभी वानर अघकार से आच्छादित हो निरचेष्ठ हो गये । तब राम ने 
रोष-पूरित अरुण नेत्रों से एक सो भयकर वाण चलाये, तो दश्ानन ने शक्तिशाली भालो 
से उन्हें काट दिया और राम पर पैने वाण चलाये । तव राम ने उसके वाणो को एक 
अद्धंचद्ध वाण का प्रयोग करके काट डाला और अनेक वाण ऐसी अनुपम गति से चलाये 
कि वे रावण के अगो को छेदकर दूसरी ओर निकल गये । तव रावण ने रौद्र बाण चलाया, 
तो राम ने भी रोद वाण छोड़ा । वे दोनो वाण अन्योन्‍्य सघर्षण के पश्चात्‌ पृथ्वी पर 
गिर पड़े । तब दोनों ने क्रोव से परस्पर अनेक पैने वाण चलाये, जिनके आाकाझ में व्याप्त 
होने से अधकार-सा छा गया । टकार-रूपी गर्जेनो से युक्त दोनों के घनुष-रूपी समुद्री 
से निकलनेवाले शर-हूपी लहरें परस्पर टकराकर एक दूसरी को दवा देती थी । जब 
राक्षस ने भयंकर क्रोध से राम के वक्ष पर वाण-समूह चलाया, तब वे बाण नीलोत्पलो की पक्ति 
के समान राम के जरीर पर भासमान होने लगे । तब राम ने प्रचड वाणो का सधान 
करके उन्हें रावण पर ऐसे चलाया कि वे उसके कवच को पार करके वक्ष में चुभ गये । 


खुद्धकीड 22५ 


रावण इससे अत्यत व्याकुल हुआ और राम पर सर्प-वाण चलाये, तो राम ने उन्हें वीच 
में ही काट डाला । तब रावण ने शार्दूलमुख, उप्ट्रमुख, सूकरमुख, सर्पमुख, गजमुख, 
गृप्रमुख तथा सिहमुखवाले कितने ही भयकर वाण राम पर चलाये, पर राम ने उनके 
टुकडे कर दिये । उसके पश्चात्‌ राम ने आग्नेयास्त्र चलाया, तो उसमें से उल्कामुख, विद्युन्मु ख, 
ग्रहमुख, सूर्यमुख तथा अग्निमुख से यूकक्‍त बाण निकलकर रावण पर आधात करने 
के लिए पहुँचे | तव रावण ने आइचर्य-चकित रीति से उन सबको काट डाला और मय 
से प्राप्त माया-शर का सधान करके उसे राम पर चलाया । उससे असख्य भाले, तोमर, 
गदा, परिघ आदि हास्त्र निकल पडे । यह देखकर राघतर ने अपने महान्‌ धुष्र पर गा६ववं 
शर का सधान करके चलाया, तो उसमें से अनेक सूर्यविब-सदृश चक्र तथा दिव्य वाण 
ससार को त्रस्त करते हुए निकले और उन्होने रावण के माया-शर से निकले हुए परिष 
आदि शस्त्रों को चूर-चूर कर दिया | तव दशकठ ने क्रोध करके राम पर अनेक प्रखर 
बाण चलाये, तो राम ने भी शत्र गति से उस राक्षस पर असख्य प्रतिशर चलाये । राम- 
रावण के शर-जाल से सारा आकाश ढक गया । तब लक्ष्मण ने सात वाणों से रावण की 
पताका को काट डाला, एक वाण से घनुष को तोड दिया एक और बाण से सारथी का 
वध किया और फिर रावण के वक्ष पर पाँच वाणो से प्रहार किया । इसी समय विभीषण ने 
इच्दधतील पर्वत की भाँति दीखनेवाले रावण के अहवों को मार गिराया। रथ से वचित 
होने से रावण पृथ्वी पर कूद पडा और अपने दसो मुखो की भोंहो को तानकर क्रुद्ध दृष्टि 
से विभीषण पर भयकर शंक्ति-बाण चलाया । किन्तु, रामानुज ने तीन वाणों से उसे बीच 
में ही गिरा दिया । उससे स्फुलिंग तया ज्वालाएँ निकलकर आकाझ तक व्याप्त हो गईं । 
तव दशकठ अत्यत क्रोध करके, भय से प्राप्त शक्ति-बाण को विभीषण पर चलाने का 
यत्न कर ही रहा था कि लक्ष्मण ने कहा--शरणागत की रक्षा करनेवाले घर्मात्मा क्या 
कभी शरणागत की मृत्यु सह सकते हे ? यो कहते हुए उन्होने रावण के अनुज को अपने 
पीछे कर लिया और स्वय रावण पर कर वाण चलाने लगे । 


१२०, रावण की शक्ति से लक्ष्मण का मृच्छित होना 

तब रावण ने कहा--हे लक्ष्मण, बडे शूर की भांति तुमने विभीषण को अपने 
पीछे छिपा लिया है । तब तुम स्वय ही इस शक्ति के प्रहार का सहन करो ।! इस प्रकार 
कहते हुए उसने प्रलय-काल के आदित्य के परिवेश के सदृश, उस शवित को घोर वलय फे 
रूप में घुमाकर, उसे लक्ष्मण पर चलाया। तव वह शक्ति अपनी किकिणी तथा घटिकाओं 
का निनाद करते हुए, समुद्रो को आलोडित करते हुए, कुल-पवंतो को हिलाते हुए, 
दिशाओ को केँपाते हुए, सूर्यंविव को विचलित करते हुए, वज्ञो को गिराते हुए, पृथ्वी फो 
कपित करते हुए, आकाश को भकभोरतें हुए, नक्षत्रों को तितर-वितर करते हुए, अग्नि-कयों 
को विकी्णं करते हुए, ज्वालाओ को व्याप्त करते हुए, आदिशेष की जिह्ला का आकार 
घारण किये हुए, लक्ष्मण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समूह को चूर-चूर करते हुए, 
लक्ष्मण के वक्ष पर भयकर गति से गड गई । राम कहने लगे कि इस भयकर अस्प्र से 


हित. 


लक्ष्मण के प्राणो पर कोई विपत्ति नहीं आये। समस्त देवता यह देखकर थाकाद में हाहाकार 


श्र रंगनचाथ एयायग 


करने लगे । शक्तिवाण के लगते ही लक्ष्मण चकराकर पृथ्वी पर ऐसे ग्रिर पड़े, 
जैसे प्रलय-काल में महामेरु पर्वत ढह जाता है । 
. घरती पर पडे हुए अपने अनुज को देखकर, राम का हृदय शोकाग्नि से जलते 
लगा और आँखो से अश्वपात होने लगा । लक्ष्मण के विभाल वक्ष में अच्छी तरह गडे हुए 
उस शव्ति-वाण को निकालने के लिए सर्भी वानर-वीर यत्न करने लगे, किन्तु उनसे वह 
निकल नहीं सका । तव राम ने रावण के द्वारा चलाये जानेवाले वाण-समृह की उपेक्षा 
करते हुए, उस जक्ति वाण को लक्ष्मण के वक्ष से निकालकर फेंक दिया । उसके पश्चात्‌ 
उन्होने सभी वानर-बीरो को देखकर कहा--हें वीरों, अपना शौर्य प्रदर्शित करने का यही 
समय है, शोक में पडकर युद्ध से विमुख होने का समय नहीं है | अब तुम लोग लक्ष्मण 
की रक्षा करते रहो और मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो । में आज इस दुष्कर्मी दशकठ का 
सहार करके, उन सभी दुखो को दूर करूँगा, जिन्हें मेने, राज्य छोडने, वधघुजनों से अलग 
होने, वनो में भठकने, घनुप-वाण लिये हुए भी, अपनी प्राण-प्रिय धर्म-पत्नी को खोलने तथा 
मायावी राक्षसों से युद्ध करने से प्राप्त किया था । समर-भूमि में इसका वध करने के लिए 
मेने असमान विक्रमी वालि का सहार किया और कपिराज के रूप में सूम्रीव का अभिषेक 
क्रिया । प्रचंड ग्राह-सकुल तथा आकाश का स्पर्श करनेवाली तरगो से युक्त जनत सागर 
पर सेतु वाँघकर मे कपि-सेता के साथ समृद्र को पार करके आया और लका को घेर 
लिया । यहाँ अब में अपने सौमित्र को खो वेठा हूँ । यदि युद्ध में रावण मेरे दृष्टि-पथ में 
आये, तो अपनी दृष्टि के विष से ही उसका अत कर दूंगा, जैसे क्र सर्प दुष्ट जंतुओ को मार 
डालता हैं । अव में दशकठ को जीवित लौटने नहीं दूगा, उसे में अपने वाण-समूह का 
लक्ष्य बना दूगा । आज सभी वानर पर्वतो पर चढकर हमारें युद्ध का कौजल देखते रहें । 
आज सभी दिकपाल तथा समस्त लोक मेरे घनुरविद्याकौणल को भली भाँति देख लें और 
युद्ध में मेरे पराक्रम को देखकर, मुझ रघुराम के विक्रम को जान लें | आज रावण भले 
ही देवलोक में छिप जाय, समुद्र के गर्भ में डूब जाय, पृथ्वी में समा जाय, और रसातल 
में प्रवेश कर जाय, तव भी में उसका सहार किये विना नहीं छोडगा । यदि निशुचय ही 
मेने रवि-कुल में जन्म लिया है, यदि में रवि-समान तेजस्वी दशरथ का पुत्र हूँ, यदि में 
राम हूँ, यदि रावण युद्ध-क्षेत्र में डटा रहा, तो में किसी भी प्रकार उसका वघ करूंगा । 
इस यूद्ध-क्षेत्र में या तो रावण रहेंगा या राम रहेगा । राम तथा रावण दोनो का यहाँ 
रहता अब असभव हैँ ।” 
ऐसी प्रतिज्ञा करके राम ने दशकठ पर भीषण वाण चलाने लगे | दशकठ ने भी 
उनके वाणों के प्रतिवाण चलाये, तो उन वाणो के परस्पर टकराने से निकलनेवाली अग्नि- 
ज्वालाएँ आकाण तक व्याप्त हो गई और घोर ध्वनि होने लगी । इस घ्वनि के साथ 
घनुषो के टंकारों की ध्वनि मिलकर समस्त लोको को भयभीत करने लगी । 
१२१. रावण का चिंतित होना 
राम के वाणो के प्रहार से रावण जर्जर हो गया और उनके वाणो के वेग का 

सहन न कर सकने के कारण राक्षसेंद्र, सिंह को देखकर भागनेवाले गजराज की माँति, 


खुद्धकांड 9९३ 


युद्ध.भमूमि को छोडकर भागने लगा । तब उसके केश खुल गये, सुदर रत्न-खचित आभूषण 
विखरने लगे, समस्त भूत तालियाँ वजाकर अट्टहास करने लगे, और वानर हप॑ के निनाद 
प्रकट करने लगे । भागते समय उसके चरण-घात से पृथ्वी भी कॉपने लगी। 


इस प्रकार, लका में प्रविष्ट होकर वह अपने सभा-मडप में आसीन हुआ। फिर, 
वह विभीषण के हितवचनो, राम के प्रहारों का तथा कुभकर्ण, अतिकाय, महान्‌ इद्रजीत 
आदि वीरो की मृत्यू का स्मरण करके मन-ही-मन शोक-सतप्त हो निश्चेष्ट बैठा रहा । 
कुछ समय के उपरान्त वह सभलकर अतपुर में पहुँचा और उद्विग्न हो, अपनी पत्नी को 
बुलाकर सिर भुकाये हुए कहने लगा--हे प्रिये, राम के अद्वितीय विक्रम का वृत्तात सुनो। 
में कंसे कहेँ ? वह देखो, मेरे समक्ष सहस्रो राम दीख रहे है । में इस लका में जहाँ भी 
देखता हूँ, वहाँ राम-ही-राम मू्‌झ्े दिखाई पडता है । अब विजय की कोई आशा नही है । 
अब शकर के चरण ही मेरे लिए शरण है । जिस देव के दिव्य तथा भयकर बाण के 
आघात से त्रिपुर भस्मीभूत हुए, जिनके मुकुट पर चन्द्रकला रमणीय गत्ति से सुशोभित 
हो रही है, जिनके हाथो में पिनाक, खड़्ग, त्रिशल आदि विलसित हे, जो अखिल 
लोक के ईंश हे, जिन्होने दक्ष-यज्ञ का विध्वस किया था, कुद्ध होकर जिन्होने अधकासुर का सहार 
किया था, वेद जिस देव की स्वुति करते हे, तथा जो देवादिदेव हे, उस शिवजी की अव 
में उपासना करूँगा ।' 


इस प्रकार निश्चय करके वह स्नान आदि से निवृत्त हुआ, ब्राह्मणो को विविध 
दान दकर उन्हें तृप्त किया तथा मद, दर्प॑ आदि ( राजस भावो का ); त्याग कर 
सात्तिक भाव ग्रहण किया । उसके पश्चात्‌ उसने, रक्ताबर, रक्‍त माल्य, रक्त उपवीत, 
रक्‍त चदन तथा रक्‍तवर्ण की जपमाला आदि घारण की और फिर बडी भक्ति के साथ 
मत्र का जप करते हुए, शिव के मदिर में पहुँचा । वहाँ एकनिष्ठ हो उसने एक वेदी 
बनाई, दर्भाकुर आदि एकत्र किये । फिर सभी, दिशाओ में यज्ञ के रक्षणार्थ भयकर राक्षसो 
को नियुक्त किया और यज्ञ करने के लिए उद्यत हुआ । इसकी सूचना मिलते ही मदोदरी 
वहाँ आ पहुँची और दशकठ को देखकर कहने लगी--हे दानवेन्द्र, क्या, आपको उचित है 
कि इस प्रकार दीन होकर अपना झौये खो वैठें । आपके क्रोध करने से सभी समुद्र गर्जन 
करने से डरते हे, पवन चलने से डरता है, अग्निदेव तीत्र ज्वालाओ के साथ जलने से डरता हैं 
और आकाश में सूर्य प्रचड तेज से दीप्त होने से डरता है । आपके नाम से सारे जग 
विचलित होते हे । ऐसे आप, अपना साहस खोकर ऐसी दशा को क्यों प्राप्त हुए ? यदि 
आपमें इतना साहस नहीं था, तो उस दिन राम की पत्नी को क्यों ले आये ? उस दिन 
मारीच ने जो हिंत-वचन आपसे कहे थे, उन्हें आपने बुरा मान लिया और नीति-विरुद् 
वचन कहे थे । नीति का विचार करके तथा आपके अहित की सभावना देखकर धममात्मा 
विभीषण ने वार-वार आपसे कहा था कि हे राक्षसेन्द्र, आप अनुचित मार्ग पर क्यो जा 
रहे हे ? सीता को छोड देने में ही आपका हित है । किंतु आपने उनके वचनों पर ध्यान 
नही दिया । मातामह माल्यवान्‌ ने जापको नीति सुझाई, तो क्‍या आपने उसको स्वीकार 
किया ? आपकी माता ने स्वय उचित कर्त्तव्य का आदेश दिया, तो क्या आपने उस पर 


्र्छ रंगनायथ रायायण 


व्यान दिया ? कुमकर्ण ने जब कहा था कि राम से आप क्यो विरोध ठानते है, तो क्या 
आप क्रद्ध नहीं हुए ? इस कार्य से विमुख होने का उपदेश जिन लोगो ने दिया था, उनके 
ही वचन बाज सिद्ध हुए हे न ? अपने भजवल तथा पराक्रम को छोड़कर आज आपसे 
मुनि-वृत्ति क्यों स्वीकार की हैं ? इन्द्र से यद्ध करके भी आप परास्त नही हुए, जब आप रामचद्र 
को परास्त नहीं करेंगे, तो क्या लोग आपका उपहास नही करेंगे ? हें असुरेश्वर, आप युद्ध 
करके वात्रु पर विजय पाइए । दीन होकर आप यह सव क्या कर रहें हें १” 

इय प्रकार जब मदोदरी ने रावण को उत्तेजित किया, तव रावण ने लज्जा से एक 
दीघ॑ निब्वास छोड़ा और कहा--हें सुदरी, तुम्हारी बातें सत्य हें | भव में रामचचन्द्र से 
नहीं डरहूँंगा । अब तुम जाओ ॥ तब प्राणेश्वर को प्रणाम करके आँखों से अश्वु-वर्षा करती 
हुई वह चली गई | उसके कहें हुए दु खपूर्ण वचनो का स्मरण करके रावण ने हवन करना 
छोड दिया और युद्ध की तैयारी करने के लिए चला गया । 


१२२. लक्ष्मण की मूर्च्छा पर रांम का शोक 

युद्ध-मूमि में रक्त में भीगे, निब्चेष्ट पडे हुए जेयनाग के सदृश दीखनेवाले अपने 

प्रिय जनुज को देखकर रामचद्र अधीर होकर शोक करने लगे | वे कहने लगें--'सौमित्र 
को इस प्रकार पृथ्वी पर गिरे हुए देखकर में किस प्रकार अपने प्राणो को रोक सकता हैं? 
युद्ध करने की भक्ति मुक्में कैसे आयगी ? अपनी मुष्टि में घनुष कैसे धारण कर सकूगा ? 
आाँखो में आँसू उमड़-उमड़कर जाते समय, वढ-बढ़कर आनेवाले गत्रुओ को में कँसे देख 
सकूगा ? मेरी आँखो के सामने मेरा सहोदर, मेरा प्रिय वबु, मेरा प्रिय सखा मेरे लिए 
प्राणों की वलि देकर मुभे छोड़कर चला गया हैं 4 धिककार है, मेरे शौय को । मुझे 
अब इस युद्ध को आवध्यकता ही क्‍या मुझे विजय ही किसलिए चाहिए ? मुझे अब 
राज्य की क्या आवश्यकता हैं ? मुझे अब सीता ही क्यों चाहिए ? मेरा यह शौर्य किस 
काम का ? में अब जीवित ही क्यों रहें ? हे लक्ष्मण, तुम्हारे साथ में भी स्वर्ग चलूगा । 
हे ववृ, विजयी होकर तुमने पहले शरभ-शार्दूलो से भरे हुए भवकर वनो में मेरी रक्षा 
करते रहे, अव यहाँ तुच्छ दैत्यो के वन के बीच मुझे पराया समझकर छोड दिया है । 
हैं तात, अपनी उन्नत जक्ति से मेरी रक्षा करने के निमित्त वन में तुम एक क्षण भी 
नहीं सोये ? आाज इस प्रकार दीर्घ निद्रा में सो जाना क्‍या तुम्हें उचित हूँ ” मे वार- 
वार दुख के आवेश से छेंचें स्वर में तुम्हें पुकारता हूँ, फिर भी तुम बोलते क्यो नहीं हो ! 
बव मेरे लिए कौन है ? मे कहाँ जाऊं | में अत में झोकार्नि के हाथो में पड गया हूं । 
भुमलक्षण-सपन्न, सुन्दराकार, अद्वितीय बलवानू, परम भक्त तथा प्रिय सहोदर, गमीरचेता, 
युद्धविजवी मेरा प्राय-लखा लक्ष्मण मेरे साथ वनवास के लिए आया। बब में इसी के साथ 
स्वर्ग जाऊंगा । कितने ही वंधु हे और कितनी ही पत्नियाँ हे, किन्तु ऐसा सहोदर 
पृथ्वी में कहाँ मिलेगा ? यत्न करूँ, तो सीता की समता करनेवाली पत्नी को में कही-न- 
कही प्राप्त कर सकता हूँ; पर ऐसे सद्गुणशील, दयालु तया महावली अनुज की में 
कहाँ पाऊँगा । क्या, यह केवल मेरा जनुज था ? यह महावली सतत मेरी सेवा करने- 
वाज़ा भक्त भी था । यही मेरा पीझष था, यही मेरी शाति था, यही मेरी कीर्ति था, 


खुद्धकांउ 82९ 


यही मेरी प्रेरणा था, यही मेरा शौर्य था, यही मेरा घैय तथा विनय था और यही मेरी 
विजय था । इतना ही' क्यो, मेरे लिए भाग्य-देवता तथा मेरा पावन राज्य-यद भी यही था ।” 

इस प्रकार, जब राम शोक से अभिभूत हो प्रलाप कर रहे थे, तब सुपेण ने राम 
को देखकर कहा--है देव, आप इस प्रकार शोक क्यो करते हे ? आप धैय॑ धरकर इनकी 
ओर देखिए । यदि इनके दरोीर में प्राण नही रहते, तो क्‍या, उनके मुख पर ऐसी आमा 
दिखाई देती ? था उनकी आँखें कमलो की सुदरता लिये रहती ? या उनकी सदर हथेलियाँ 
लाल कमल की भाँति सुशोभित रहती ?* 

इस प्रकार राम को आइवासन देकर उसने उन्हें शात किया और हनुमान्‌ को 
देखकर कहा---इसकी पहले जाववान्‌ के कहने से तुम ओपधियों का पता जानते ही हो । 
महाद्रोण पर्वत के, दक्षिण शिखर पर विशल्यकरणी, सौवर्णकरणी, सघानकरणी तथा 
सजीवकरणी ओषधियाँ अपनी काति से प्रकाशित रहती हे । तुम शीघ्र इन चारो ओपधियो 
को ले आयो । उनकी सहायता से लक्ष्मण के प्राण लौट आयेंगे । पूर्वकाल में देवासुरो ने 
क्षीर-सागर का मथन करके जो अमृत प्राप्त किया था, उसे वही छिपा रखा है । उसी 
अमृत से इन ओषधी-लताओ ने जन्म लिया हैँ । लवण-समुद्र को पार करके जाने के वाद 
कुशद्वीप मिलेगा, उसे पार करके आगे बढो, तो क्षीर-सागर मिलेगा। उसे भी पार कर 
जाओ, तो चद्र तथा द्रोण पर्वतो को देखोगे । वहाँ देवेन्द्र की आज्ञा से मदराचल की भाँति 
विशालकाय गधव॑ उन ओपषधियों की रक्षा करते रहते हे । गधवों से तुम्हारा युद्ध होगा । 
वही राक्षस भी घूमते रहते हूं । वे बडे मायावी हे, उनसे सावधान रहना । द्रोणाद्रि से 
उन ओषधियो को लाकर, लक्ष्मण के प्राणों को लौटाओ, जिससे रघुपति प्रसन्न हो । यहाँ 
से वह पर्वत तेईस लाख, वीस हजार दो सौ दस योजन दूर हैं । तुम वायु-वेग से जाकर 
सूर्योदय के पहले ही यहां लौट आओो । सूर्योदय हुआ, तो वे ओपधियाँ अपनी काति खोकर 
शक्तिहीन हो जायेगी । उसके परचात्‌ लक्ष्मण को मूर्च्छा से जगाना असभव होगा । इसलिए 
है वानरोत्तम, तुम शीघ्र जाकर वापस आओ । उन ओषधियो के लक्षण भी तुम्हें जान 
लेना चाहिए । उनके फल हरे होगे, फूल लाल होगें गौर पत्ते सफेद होगे | तुम शीक्र 
विभीषण, जाबवानू, सुग्रीव तथा अगद की अनुमति लेकर जाओ ।॥ 

सुपेण के इन वचनो को सुनकर हनुमान्‌ ने कहा--ऐसा ही हो । तव पवनपुत्र 
को देखकर राम ने कहा--मूच्छित पडे हुए लक्ष्मण को प्राण-दान करके तुम त्रिभुवनों में 
अचल कीत्ति प्राप्त करो । मेरे तीन भाई हे । हें अनिलकुमार, आज से तुम्हारे साथ मेरे 
चार भाई होगे । 


१२३ सजीवनी लाने के लिए हनुमान का द्रोणाद्रि को जाना 
राम की वातें सुनकर हनुमानू ने कहा--हें सूर्यकुलतिलक, सेवक हनुमान्‌ 
के रहते हुए आप चिंता क्‍यों करते हे ? हे राजन, आपकी आज्ञा थिरोधाय॑ करके गीघ्र 
ही' सप्त द्वीपो के उस पार रहने पर भी ओपधियो के उस पर्वत को सूर्य के उदयाचल 
पर आने के पहले ही ले आऊंँगा । इस प्रकार कहते हुए उसने राम के चरणों पर गिर- 
कर प्रणाम किया । तब राम ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा--हे अजनि- 


शक र॑ंगनाथ एावयायएण 


पुत्र, इन्द्र तुम्हारे सिर कीं, सूर्य तुम्हारें मुख की, चन्द्र तुम्हारे मन की, आदिशक्ति तुम्हारे 
नितब की, पवन तुम्हारी पीठ की, शिव तुम्हारी पूछ की, अग्नि तुम्हारे चरणों की, ब्रह्मा 
तुम्हारी वृद्धि की, वरुण तुम्हारी शक्ति की, सरस्वती तुम्हारी वाणी की, विष्णु तुम्हारे 
वाहुद्यई की तथा गणेश तुम्हारे उदर की रक्षा करते रहेंगे । तुम शीघ्र जाकर जाओ ॥ 
उसके पश्चात्‌ क्रमण. सुग्रीव, विभीषण, जाववानू तथा अग॒द आदि वानर-वीरो ने उसे 
विदा दी । तव हनुमान जाकाश की ओर ऐसे उछला कि जिस पर्वत पर चढकर वह उछला था, 
वह घेंस गया और पृथ्वी विदी्ण हो गईं, पवन, समुद्र तथा आकाशणागा व्याकुल-्सी 
हो गई और लका नगर की ऊँची अट्टालिकाएँ गिर गईं । उसके पदचात वह विद्युत-प्रकाश के 
समान उज्ज्वल काति से युक्त अपनी पूछ को तथा अपने दोनों विशाल हाथो को ऊपर 
उठाये, सूर्पमडल की भाँति प्रकाशमान होनेवालें अपने मुख से प्रचंड दीप्ति 
विकीर्ण करते हुए, चरणों तथा कर्णो को कुचित करके उड़ने लगा । देखते-देखते वह अनेक 
पर्वेतो, कई देशो, कई नद-नदियों, कई वनो, नगरो तथा समुद्रो को देखते हुए हिमाचल के 
पार निकल गया । दिज्ञाओ तथा आकाश को कँपाते हुए वह एुकाकी शूर आगे बढने लगा। 


१२४. कालनेमि का वृत्तांत 

गुप्तचरों के द्वारा रावण ने यह समाचार सुना, तो वह हनुमान्‌ के भागे में विध्न 
डालने का सकल्‍प करके स्वय अद्धंरात्रि के समय कालनेमि के घर पहुँचा । कालनेमि नें 
जत्यत श्रद्धा से रावण को अध्यं, पाद्य आदि देकर उसका सत्कार किया और पूछा--हैं 
राजनू, अद्धंरात्रि कें समय आपके यहाँ पघारने का क्‍या कारण हैँ, कृपया बताइए ।' 
तव रावण ने कहा-आज मेरे शक्ति-वाण से आहत लक्ष्मण को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य 
से राम की आजा से हनूमान्‌ सजीवकरणी लाने के लिए जा रहा है | तुम शीघ्र जाकर 
उस हनूमानू का वध कर डालो, या उसके मार्ग में कोई ऐसा विध्न उपस्थित करो कि 
वह सूर्योदय के पूर्व यहाँ पहुँच नही सके । द्रोण पर्वत के पास ही देवासुरो से निर्मित एक 
सरोवर हैँ | उसमें एक महान्‌ मकरी बडे आनद से रहती हैं। वह देवताओं को भी निगल 
जाने की क्षमता रखती है, तब इस वानर की गिनत्ती ही क्या हैं ? तुम कोई ऐसी माया 
रचो कि हनुमान्‌ उस सरोवर में पहुँच जाय । तुम शीघक्र जाओ ।! 

रावण की वातें सुनकर, मन-ही-मन नीति-मार्ग का विचार करके, उसने कहा-- 
है दनुजेग, माया-मृग का रूप लेकर मारीच गया था और उसकी मृत्यु हुईं | आप इस 
अनुचित मार्ग को त्याग दीजिए । धोर युद्ध में कुभकर्ण आदि दानव-वीर नष्ठ हो चुके है । 
अब तो आप वात मानिए । राम के पास सीता को पहुँचा दीजिए और अपनी लका 
विभीषण को देकर आप शिवजी के निवास कैलास पर्वत पर त्पस्वी चनकर जीवन व्यतीत 
कीजिए या योद्धा के समान, युद्ध-भूमि में राम से युद्ध कीजिए और उनके हाथो से 
प्राण त्वागकर विष्णु-सायुज्य प्राप्त कीजिए ।” 

कालनेमि के इस प्रकार कहते ही रावण की आबाँखें क्रोव से लाल हो गई और वह 
अपने चद्रहास को निकालकर उसका वध कर डालने के लिए उद्यत हुआ । यह देखकर, 
कालनेमि ने कहा--हे देव, जापकी आज्ञा का पालन करने में अभी जाता हूँ ।' 


 इुछ्धकांड 9९७ 


इसके वाद वह मनोवेग से द्रोण गिरि के निकट पहुँच गया और वहाँ अपनी माया से एक आश्रम का 
निर्माण किया । 'उस आश्रम में आम, पुन्नाग, चपक, पूगीफल, कटहल, चदन, जामुन, 
पाटली, बकुल, कदली, खर्जूर, कर्पूर आदि के सुदर वृक्ष थे । जहाँ-तहाँ ब्रह्मचारियो 
का वेद-पाठ हो रहा था और महनीय मणिदीप-मालिकाएँ जल रही थी । फल-फूल तथा 
लताएँ, होम-धूम से घूमिल हो रही! थी । कलकठ शुक, नीलकठ शारिका तथा कलहसो 
के' मधुर कूजन सर्वेत्र सुनाई पड रहे थे। स्थान-स्थान पर हवन तथा स्वरयुक्त मत्रो का 
पठनत हो रहा था । ऐसे माया-आश्रम में कालनेमि एक मुनि के समान कपट वेश घारण 
किये मन्द प्रकाश में आँखें बन्द करके जप-माला फिराते हुए बैठा था । आकाश-मार्ग से 
जाते हुए हनुमान्‌ ने इस आश्रम को देखा और सोचने लगा कि मुनि का यह आश्रम कितना 
भव्य दीख रहा है !' उस दिन (जब में यहाँ आया था) यह यहाँ नहीं था, आज यह 
कहाँ से आया ? कहाँ वह क्षीर-सागर, कहाँ वह मेरु पर्वत और कहाँ मुनियो का यह 
आश्रम ? कदाचित्‌ में मार्ग खो गया हूँ । मे इस मुन्ति से मार्ग जान लूगा । यों सोचकर 
वह आकाश से पृथ्वी पर उतर आया । वन के पर्क हुए फल देखकर उसके मुह में पानी 
भर आया, किन्तु मुनि-शाप के भय से विना उनको छुए ही मुनि के समक्ष पहुँच गया 
और हाथ जोडकर वोला--हे मुनिनाथ, महाराज राम के आदेश से में क्षीर-सागर के 
पास जा रहा हूँ । मेरा नाम हनुमान्‌ हैँ । मुझे अत्यधिक प्यास लग रही है, क्‍या यहाँ 
कही जल मिल सकता हैं ?' तब उस कंपटमुनि ने मदहास करते हुए कहा--हमारे 
कमडलु का जल पीकर तुम अपनी प्यास बुझा लो । ये फल लो, इन्हें खाकर इस रात को 
यही आराम करो । हे वानरोत्तम, में अपने मन में भूत तथा भविष्य की सभी वातें जानता हूँ । 
राम को धोखा देकर रावण उनकी पत्नी सीता को ले गया है । राम ने सहज ही 
वालि का वध करके लवण-समुद्र में सेतु को बाधा और वानर-सेना के साथ लका को 
घेरे हुए हे । उन्होने कुमकर्ण आदि राक्षसो तथा इन्द्रजीत का सहार किया है । पुत्र- 
शोक से क्रुद्ध रावण ने भय से प्राप्त शक्ति-बाण सुमित्रा के पुत्र पर चलाया, तो लक्ष्मण 
मूच्छित हो गिर पडे । उस लक्ष्मण को जीवित करने के निमित्त ओषधियाँ ले जाने को तुम 
आये हो ॥ अवतक तुम वायूु-वेंग से एक सहस्न योजन का मार्ग तय करके आये हो । 
कोई अधर्मी मुझे देख नहीं सकता । तुम मुझे देख पाये, इससे मुझे निश्चय हो गया हैँ 
कि तुम उत्तम व्यक्ति हो । जगत्‌ के कल्याण के लिए राम ने जन्म लिया है, इसलिए 
हमें भी राम का काये सपन्न करना चाहिए । में तुम्हें ऐसे दिव्य मत्र दूंगा, जिनसे तुम्हें 
दिव्य ओषधि दिखाई पड़े । प्रात काल के सूर्य का दर्शत करते ही शक्ति से सपन्न होनेवाली 
सजीवनी आदि कितनी ही ओपधियाँ हमारे इस बन में हे। उनमें से जो ओपधि चाहिए, 
उसे तुम लका ले जाओ । “मेरे मत्रो की शक्ति से तुम पलक मारने की देर में (लका) 
पहुँच जाओगे ।* 
तव उस कपटमुनि को देखकर हनुमान्‌ ने कहा--हे तपस्वी । जब लक्ष्मण बुरी 
दशा में वहाँ पड़े हुए हे, तब क्या मुझे उचित हैं कि में यहाँ सुख से सो जाऊं ? हैं 
स्वामिन्‌ , अपने प्रभू की कार्य-सिद्धि के रूप में लक्ष्मण को प्राप्त करने के पहले में इन फलों 
रे 


घन रंग्ने/थ एयायण 
का ग्रहण कैसे कर सकता हूँ ? मेरी प्यास थोड़े-्से जल से नहीं वुक्रेगी । क्या यहाँ कोई 
सरोवर नहीं है ?” तब उस कपट-मुनि ने कहा--यहाँ से समीप में ही एक दिव्य सरोवर हूँ। 
यदि तुम उस सरोवर में आँखें वन्द करके उसके अमृत-सम निर्मल जल का पान करोगे, 
तो तुम्हारा शरीर दिव्य हो जायगा और दिव्य ओषधि तुम्हें तुरत्त दिखाई पडेगी ।' इतना कहकर 
हनुमान्‌ को मार्ग बताने के लिए उस कपटमुनि ने शिष्यो को भेजा । 

हनुमान्‌ कपट्मुनि के शिष्यो को सहायता से उस सरोवर के पास पहुँचा | उस 
सरोवर के तट पर आम, मंदार, माधवी, वकुल, सागवान, कुटज, चन्दन, साल, नीम, अर्जुन, 
अशोक, गनिवु, कदम्ब, तमाल आदि के वृक्ष सुशोभित थे । सरोवर में सुन्दर तथा 
कोमल कमल, कल्हार तथा विमल करव विलसित थे। कही कलहस कल-कूजन करते हुए 
विलासपूर्ण गति से परस्पर कौतुक करते हुए बिहार कर रहे थे, कही हस की चोचो 
का स्पर्श करनेवाले वक, क्रौच तथा कारण्डव पक्षियों का समूह विचरण कर रहा था। किसी 
स्थाव पर कैरव-मुकुलो के अग्र-भाग पर अमर मुड-के-मुड अचल वेठे हुए मधुपान कर रहे थे 
और किसी स्थान पर अभ्रमर-समूह मकरन्द-पान करने के निमित्त आया हुआ था, किन्तु 
कमलिनियो के विकसित न होने के कारण गायको की तरह उसके चारो ओर मँडरातें हुए 
फिर रहे थे | तोते की चोचो से चीरे जाने से फलो का रस, पत्तो से होकर लाल 
कमलिनियो पर ऐसे भर रहा था, मानो सरोवर के तट पर स्थित आम के वृक्ष शिव से 
(वसन्त के मित्र) कामदेव को फिर प्राप्त करने के उद्देश्य से अग्नियों में घी की आहुति 
दे रहे हो । दूसरे स्थान में लाल कमलिनियो में भरनेवाला फलो का रस पान करके 
मधघ॒प आकाश की ओर ऐसे उड रहे थे, मानो होमकूड से घुआँ उड़ रहा हो। वह 
सरोवर ऐसा दीख रहा था कि मानो कमलपत्र-हूपी थालियो में हिम-शीकर-रूपी 
अक्षत रखे हुए, उत्फुल्ल कुबलयो के लोचनो से, हनुमान्‌ के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हो। 
उस सरोवर को देखकर हनुमात्‌ अत्यधिक “हर्षित हुआ और आंखें बन्द करके उस 
सरोवर में उत्तर गया और अत्यधिक प्यास के कारण जल का पान करने लगा । 


१२४ मसकरी का हनुमानू को निगल जाना 


ससार-रूपी सागर में विषय-रस को बडे चादव से पीनेवाले तृषित व्यक्ति को ससार 
की माया जसे निगल जाती है, वैसे ही उस सरोवर से उस समय एक विशालकाय मकरी 
निकली और उसने हनुमान्‌ के चरणों को कसकर पकड लिया। हनुमान्‌ ने अपने चरणों को खीच 
लेने का उद्धत शक्ति से प्रयत्न किया, किन्तु छुडा न सका । तब वह बडे घैय के साथ 
खडे होकर देखने लगा कि वह क्‍या है ? ध्यान से देखने पर उसे मालूम हुआ कि वह 
एक विज्ञालकाय मकरी हँ । तव उसका क्रोध दुगुना हो गया और उसने भयकर रूप 
घारण करके रघुराम की विजय का आधारभूत अपनी पूछ उठाकर दुर्वार गति से उस 
मकरी के दाँतो पर प्रहार करके उन्हें गिरा दिया, मानो रावण की भोग-लालसा से सचित 
पापों को ही मटका देकर गिरा दिया हो, किन्तु वह मकरी हनुमान्‌ को निगल जाने का 
उपक्रम करने लगी, मानों वह समसत्‌ मुनि के जाप-रूप रोग से मुक्त होने के लिए (हनुमानू- 
रूपी) ओपधि को खाना चाहती हो । तब वायुपुत्र सोचने लगा--हाय, राम के कार्य में 


रुद्धकाड 9९6 
विघ्न पड गया । कदाचित्‌ में यहाँ इस प्रकार मर जाऊँगा । हाय, अव कया उपाय हैं ?! 
फिर, हनूमान्‌ ने यह निश्चय करके कि इसके पेट में पहुँचकर में इसका वध कर डालूगा, 
मकरी को अपना शरीर निगलने दिया। निदान वह भुजवली अधकप के सदृण दीखनेवाले उस 
मकरी के उदर में पहुँच गया । वह मकरी बडी प्रसन्नता से जल के मध्य-भाग में चली गई। 
तव हनुमान्‌ भयकर क्रोध से उस मकरी की आँतो तथा नसो को ऐंठने और तोडने 
लगा और विषग्रास की भाँति उस महा भकरी के उदर में अविराम गति से जहाँ-तहाँ 
घूमते हुए अग्नि की भाँति उसका उदर जलाने लगा । तब वह मकरी घैयें खोकर प्यास 
की तीत्रता का सहन नहीं- कर सकने के कारण अपने सूखे हुए मुख-ग ह्वर को खोलकर पड 
रही । तब क्र नक्त, ग्राह आदि से युक्त जल-प्रवाह हनुमान्‌ पर गिरने लगा ।* तब वायुपुत्र 
काटी हुई आँतो का पिंड बनाकर वाहर ले आया और ज्ञीत्र उसका गला घोट दिया । 
मकरी ने भी यह सोचकर कि यह आहार पचाने-योग्य नहीं है, अवश हो पडी रही । तब 
हनुमान्‌ ने उसे तट पर घसीटकर उसको चीर डाला । उस समय उस मकरी के रक्‍त से 
युक्त वह सरोवर प्रलय-काल में भयकर वडवानल की ज्वालाओ से युक्त समुद्र के समान 
लाल दीखने लगा । 

तब वह मकरी देव-स्त्री का रूप धरकर अपनी चचलता छोडकर, स्थिरता के साथ 
बादलो में प्रकाशित होनेवाली बिजली की भाँति विमान में बैठी आकाश-मार्ग में दिखाई 
पडी । पवन-युत्र के पुण्य प्रताप से शापमुक्त हो वह अत्यन्त हर्षित हुई और वह देव-स्त्री 
हनुमान्‌ को देख कर वोली--हे कपिकुजर, हे वानरेन्द्र, मे तुम्हारे कारण आज शापमुक्‍त 
हुई । मे अभी इन्द्रलोक में जा रही हूँ । जाने से पहले में तुम्हें एक वात बतलाना चाहती हूँ ।' 
इतना कहकर हनुमान्‌ को सरोवर के निकट भेजनेवाले उस कपट-तपस्वी को दिखाकर 
वोली---हे कपिश्रेष्ठ, यह कोई मुनि नहीं है । इस पर विश्वास मत करो । यह एक 
राक्षस है और दानवेन्द्र के आदेश से तुम्हें मारने के लिए यहाँ आया है । मेरे इस सरोवर 
में रहने की वात जानकर मुभसे तुम्हें मरवाने के लिए ही यहाँ भेजा । यह वध्य हैँ | इस पर 
विद्वास मत करो । वह यहाँ रहने योग्य नहीं है। अत, तुम शीघ्र इसका सहार करके 
ओषधियो को प्राप्त करने के लिए जाओ । द्रोणाद्वि पहुँचने का मार्ग यही है ।' 


१२६. धान्यमालिनी का वृतांत 

देव-रमणी की बातें सुनकर हनुमान्‌ को आइचर्य हुआ । उसने उस रमणी को देखकर 
कहा--हे सुन्दरी, पहले तुम मकरी कंसे हुई और फिर अब देव-काता कैसे वनी ?” तब 
वह कहने लगी--"हे वीरवर, हे पावनचरित, हें कनकाद्विसम धीर, में धान्यमालिनी नामक 
गधर्वे-कन्या हूँ । म॑ अपना पू्व॑-वृत्तात सुनाता हूँ, सुनो । अखिल लोक के आराध्य सदाशिव 
जब रजताद्वि पर गोष्ठी में बैठे थे, तब मेने अपनी नृत्य तथा सगीत-कला का प्रदर्शन 
करके उनको प्रसन्न किया और उनसे एक अनुपम विमान प्राप्त किया । उस विमान में बैठकर 
में प्रतिदिन इस सरोवर में जलक्रीडा करने आने लगी । एक दिन की वात है कि शाण्डिल्व 


मै के, गलने ॥००. पी ५ 
विशाल मकरी के मुंह खोलने से उसके मुख से होकर मीन, ग्राह आदि के साथ 
सरोवर का जल उसके दारोर के अन्दर बहने लगा --ले० 


0 रंयनायथ एयायग 


नामक म॒नि यहाँ जाये और वड़ी आसक्ति से मुझे देखते हुए मन-ही-मन महान्‌ -जानन्द- 
का अनुभव करने लगे | फिर भोग की लालतसा से प्रेरित तथा काम-पीडा से अभिभत्र हो, 
इसका भी विचार किये विना कि कहाँ मेरे जैसा तपोंबव तथा पुण्यात्मा मुनि और कहाँ 
यह सुन्दरी, मुक्त पर अनुरकत हो गये और निलेज्ज हो, लोलुप- दृष्टि से मुझे देखने -लगे-। 
यह देखकर मेंन उनसे कहा--हे मुनीच्ध, कहाँ आप, कहाँ में और कहाँ आपकी यह लोलुप 
दृष्टि ? आप तपस्वी तथा पुप्पात्मा हे, आपका यह कार्य बापके तप में विध्च -डालनेवाला हैं।' 
तत्र मूनि कामातुर हो, तपस्था का पवित्र संकल्प त्याग कर कहने लगे--हें सुन्दरी, 
यही मेरी तपस्या बौर पुण्य का फल है, यहीं मेरे लिए स्वर्ग का सोपान - है, 
यही मेरे लिए मोल का सावन है !” तब मेने उनसे कहा--हे मुनि, में अभी रजस्वला हें, 
अत. आपको मेरा स्पर्णभ नहीं करना चाहिए | इन दिनों में जापके ही घर में रहेंगी -। 
स्तान तथा छुद्धि के पद्चात्‌ आप मुझे प्राप्त कर सकते हैं । इस प्रकार, मुनि को सममा- 
कर में उस मुनि के साथ गंवमादन को गई और मुनि के घर में ही निष्ठा से रहने- 
लगी । उस दिन रात को रावण सभी दिलश्लाओों पर विजय प्राप्त करके अपनी सेना के 
साय उत्त पर्वत पर ठहरा । जब में पर्वत-बिखर पर गाने लगी, तथव मेरा गाना सुनकर 
रावण मरे पास जाया जौर अपना प्रताप, अपना सौन्दर्य, अपनी महत्ता तथा अपना नाम 
ताकर मुझे प्रलोभन देने लगा कि हें सुन्दरी, तुम अपने रूप-यौवन तथा विलास के साथ 
मेरा बालिगन करो ! मेने कहा--में विवन्र हें, अत- तुमको मेरा स्पर्श नहीं करना चाहिए ।' 
तव उस राक्षत्त ने कहा--हे सन्दरी, मेरे लिए रजल्वला स्त्रियाँ -तया- परस्त्रियाँ अधिक- 
ग्रिय है, बत- तुम मुझे मत ठकराओ | इस प्रकार मझे अपने प्रिय वचनों से प्रसन्न करके 
उसने मेरे साथ रति-क्रीड़ा की । इससे जतिकाय का जन्म हुआ । मेंने उस पुत्र को दानवेन्द्र - 
को सौंप दिया। तींच दिन के पच्चात्‌ जुद्धि-स्तान आादि से निवृत्त होकर में मुनीश्वर- 
के समक्ष जाकर खडी हो गईं | त्तव उस मुनि ने मुझे देखकर क्हा--मेरे घर में रहती हुई, 
तुम मुझे धोखा देकर किसके साथ प्रीति से रति कीडा में प्रवृत्त हुई थी ? हें तन्‍्वी, 
तुम्हारे यौवन का उपभोग किसने किया ? तमने -विना सोचे-समझे ऐसा क्यों किया ? 
यदि विवेक के साथ विचार किया जाय, तो तुम्हारी यह करतूत स्त्री-सुलभ ही प्रतीत 
होती हैँ । परहित कहाँ और बुवतियाँ कहाँ ? शीलाचरण कहाँ ओर सुंदरियाँ कहाँ ? 
कमललोचनियाँ कहाँ और सत्य कहाँ ? कामिनियाँ कहाँ जौर करुणा कहाँ ? ( काश,-- 
दोनो वातें एक साथ ही देखी जाती ?) इस प्रकार कहते हुए उस मुन्ति ने अत्यधिक क्रोच 
से नि्दंव हो मुझे घोर चाप दिया--वुम अपने विलास को खोंकर इस सरोवर में मकरी 
वनकर रहो ॥ जिनने तुम्हारे साथ रति-क्रीड़ा की, वह तुम्हारें इस पाप से अपने पुत्र, 
मित्र तया सेना के साथ भस्म हो जायया । 


मुनि का यह घोर गाप सुनकर में विचलित हो उठी और उस पुण्यात्मा के समक्ष 
हाथ जोडकर कहने लगी--हैं मुनिश्ेप्ठ, में शाप-रूपी समुद्र को किस नौका की सहायता” 
पार कर सकूगी ? इस बापन्‍तपी दावावल को में किस जल से बुझा सकूगी ? 
व्यालु, मुझ पर दया दिखाइए। भवाकान्त-हो, इस प्रकार जात्तंनाद करनेवाली- मुझे देखकर 


है| 


खुद्धकांडः 9२९ 
ज्ञान-दृष्टि से अनुमान करके, उस क्ृपानिधान ने कहा--हे सुन्दरी कुछ समय के पदचात्‌ 
हनुमान्‌ राम के कार्यार्थ यहाँ आनेवाला हैं । उसके द्वारा तुम्हारे जाप की मुक्ति होगी । 
इतना कहकर वह मुनि गगा नदी के तट पर चले गये । आज में गापन-मुक्त हो गई हूँ । 
अत. में जा रही हूँ । यो कहती हुई वह कमलाक्षी हनुमान्‌ को आशीर्वाद देकर वहाँ से 
स्वर्ग चली गई । 


१२७, कालनेमि का वध 


हनुमान्‌ वहाँ से सीधे कालनेमि के सामने उपस्थित हुआ । उस समय वह पापी, 
अचल समाधि में निमग्न रहनेवाले (मुनि) की भाँति कुमक-क्रिया के द्वारा अपने वक्ष स्थल 
को फुलाकर मुख को किचित्‌ भुकाकर, ध्यान-मग्न रहनेवाले की भाँति आँखें वद किये हुए 
जप-माला को फेरतें हुए जप करनेवाले की भाँति ओठ हिलाते हुए बैठा था ७ हनुमान्‌ 
के आते ही उसने आँखें खोलकर, हनुमान्‌ से कहा--सरोवर निकट ही तो है ? तुमने 
इतना विलब क्यो किया ? देखों कितनी रात बीत गईं हैं । यदि तुम मत्रोपदेश ग्रहण 
करने की इच्छा रखते हो, तो क्‍या गुरु-पूजा की व्यवस्था कुछ करोगे ?! 

तब पवनपुत्र ने कहा--लो, अब तुम्हारे लिए यही गुरु-पूजा हैँ । यो कहकर 
उसने अपनी कठोर मुष्टि से उस राक्षस के बाहुमध्य में प्रहार किया । तुरन्त उस दैत्य ने 
अपना वह रूप छोडकर एक पक्षी का रूप ले लिया और हनुमान्‌ पर आक्रमण किया । उसके 
आक्रमण करते ही हनुमान्‌ ने उसे कसकर पकड लिया और उसके दोनो प्रो को तोड़कर 
फेंक दिया । तुरन्त उस राक्षस ने वह रूप भी त्याग दिया और अपनी माया से एक गभीर 
सिंह का रूप धारण किया और आकाश की ओर भयकर दृष्टि को दिखाते हुए गर्जन करके 
हनुमान्‌ को धमकाने लगा। किन्तु, हनुमान्‌ निर्भके हो अपनी मुष्टि से उस कालनेमि के 
सिर पर ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर फट गया । तुरन्त वह राक्षस सिंह का रूप 
भी छोडकर सुग्रीव के रूप में आया और कहने लगा--हे पवनपुत्र, यहाँ क्या कर रहे हो ? 
चलो, लक्ष्मण के प्राण लौट आये है । अब तुम्हें द्रोगाचल जाने की आवश्यकता 
नही हैं । अब हमें ओषधि नहीं चाहिए ।” पहले हनुमान्‌ को भ्रम हुआ कि वह सुग्रीव 
ही है, किन्तु ध्यानपूर्वक देखने के पश्चात्‌ निदप्चय कर लिया कि वह सुग्रीव नहीं है । 
तब अत्यन्त क्रोध से उसके वक्ष पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मूच्छित होकर गिर 
पडा, किन्तु शीघ्र ही वह दानव सेंमल गया और शतश्यगी होकर घनुष से पैने शर 
चलाकर हनुमान्‌ को कष्ट पहुँचाने लगा । तब हनुमान्‌ ने भी अपनी मुप्टियो तथा चरणों 
के आघात से उसकी सारी शक्ति शिथिल कर दी और उसे आकाश से पृथ्वी की ओर 
खीच लिया । उसके पश्चात्‌ उसने राक्षस का सिर ऐँठकर उसे धड मे अलग करके पृथ्वी 
पर ऐसा फेंक दिया, जैसे मत्त गज मृणाल को तोडकर फेंक देता हैँ। उसके बाद विजय- 
गये से सिहनाद करते हुए हनुमान्‌ तुरन्त द्रोणाचल पर पहुँच गया । 

द्रोणाचल पर पहुँचकर हनुमान्‌ अनेक दिव्य लताओं की आभा से तथा निर्मल 
मणिसमूह की कातिवाले दीप-वृक्षो की दीप्ति से भासमान उस पर्वत पर घूम-घूमकर दिव्य 
ओपषधियो का अन्वेषण करने लगा। वह किसी लता को देखकर “यही चह सुगधि हूँ, यही 


ध्श्र रंग्नशथ एयायय हु 


वह लता हैँ,' ऐसा विचार करके उसके पास पहुँचता, तो वह लता छिप जाती । यह देखकर 
हनुमान मन-ही-मन दुखी हो कहने लगा--हे पर्वेतेश्वर, हें पर्वतराज, हें पुण्यात्मा, अनघ 
रघुराम की आज्ञा से दिव्य ओषधि ले जाने के निमित्त मैं आया हूँ। हे नगराज, जो कार्य 
समस्त लोको के हित में है, उसको सपन्न करने के लिए आये हुए मुझे आप क्यो इस 
प्रकार धोखा दे रहें हे ? आप श्ीत्र अपने पास रहनेवाली ओषधि-लताओ को प्रकट कीजिए। 
मुझे शीघ्र जाना है । हे ओषधि-लताओ, यह कार्य लोक-हिताथ हैं। अत , में आपसे प्रार्थना 
करता हूँ कि आप अपनी सुन्दर आकृति दिखाइए ।” इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी 
वे लताएँ अपने रूप छिपाये रही । तव हनुमान्‌ ने फिर कहा--हे नगकुलतिलक, मेरे 
आगमन को देखकर आपने मेरा उचित सत्कार नहीं किया, यह उचित नही हैँ ।' 
कई वार विनम्र प्रार्थना करने पर भी जब उस पर्वत ने दिव्य ओषधि-लताओ 
को नहीं दिखाया, तव हनुमान्‌ अत्यन्त ऋद्ध हुआ और कहने लगा--हे नगकुलाधम, मेरे 
इतनी प्रार्थना करने भी तुम्हारा मन मेरी ओर द्रवीभूत नहीं हुआ । भला, गुणहीन तथा 
कठोर पत्थर में दया कैसे उत्पन्न होगी ?' ह 
इतना कहते-कहते हनुमान्‌ की क्रोघाग्ति की ज्वालाएँ उनके रोम-रोम में व्याप्त 
हो गई । तुरन्त उसने दस योजन विशाल तथा दस योजन ऊँचा रहनेवाले उस भयकर पर्वत 
को सहज ही उखाड़ लिया, मानो यह वता रहा हो कि में राम का सामना करनेवाले रावण- 
रूपी पर्वत को भी इसी प्रकार उखाड डालूगा । उस समय सारी पृथ्वी हिलः उठी और 
आकाश काँपने लगा । ॥॒ 
इन्द्र के आदेश से उस पर्वत की रक्षा करनेवाले अग्नि-सम तेजस्वी चित्रसेन आदि 
तेरह करोड़ गधर्व अपने बल तथा शौर्य का प्रदर्शन करते हुए हनुमान्‌ से कहने लगे--यह 
देवगण का निवास) है । यह मेंरु-तुल्य पर्वत है और यह जगत्‌ का जीवन हैं | इसे 
तुम मत ले जाओ । तुम इसे नहीं ले जा सकोगे । इसलिए इसे यही छोड जाओ । यदि 
नही मानोगे, तो तुम्हारे प्राण नही वचेंगे । तब युद्ध में यम की भाँति भयकर दीखनेवाले 
हनुमान्‌ ने क्रुद्द होकर उनकी ओर देखा और उन्हें अपनी पूछ-रूपी पाश से बाँधकर, 
तेजी से घुमाया और कुछ लोगो को समुद्र में फेंक दिया, कुछ लोगो को मार डाला और 
कुछ लोगो को पृथ्वी पर पटककर नष्ट कर दिया । उस महावीर की उद्धत शक्ति देखकर 
गधघरवों ने सोचा कि उसको पराजित करना असभव हैं | अत, दीन होकर उन्होने हनुमान्‌ के 
समक्ष वडी भक्ति के साथ हाथ जोडकर कहा--हें कपिकुजर, हे वानरेन्द्र, आप इस पर्वत 
को ले जाइए । इस प्रकार कहते हुए गधर्वें-वीर आशीर्वाद देकर चले गये, तब पवनपुत्र 
उस पर्वत को उठाकर आकाश की ओर उडा और अपने भ्रयकर वेग से भूचर तथा खेचर 
को आइचयं-चकित करते हुए जाने लगा । 


१२८. सरत का स्वप्न 
उसी दिन अद्धंरात्रि के समय भरत ने स्वप्न में देखा कि राम तथा लक्ष्मण 


रण-भमि में सिर पर तैल लगाये हुए, क्लान्त शरीर तथा बलहीन हो, पक के मध्य में 
पडे छटपटाते हुए रुदन कर रहे हैं । यह देखकर भरत चौंककर जाग्र पडे और अपने 


' छुद्धकाडे रे 


दु स्वप्न के कारण व्याकुल होते हुए घर से बाहर निकल आये । वे वार-बार स्वप्न में 
देखी हुई राम-लक्ष्मण की दशा की कल्पना करके व्याकुल होते रहे । साथ-ही-साथ, उसी 
समय उन्होने कई और दुहकुन देखें, तो वे और भी भयभीत हो सोचने लगे, यह कैसा 
पाप है ? कैसा अपशकुन है ? न जाने भविष्य में क्या होनेवाला हैं ? न जाने वन में 
राम तथा लक्ष्मण को क्‍या हो गया हैं? न जाने, जानकी की क्‍या दशा हुई ? चौदह 
वर्ष पूरे होने को है, किन्तु उनका कोई समाचार नहीं मिल रहा है । सत्यनिष्ठ, उदार, 
सदाचारी, क्ृतार्थ, उन लोगो के लिए में अपना सारा पुण्य अर्पंण करता हूँ, जिससे 
उनपर कोई विपत्ति न आये । 

इस प्रकार सोचकर भरत ने तुरन्त बवेदनिष्ठ ब्राह्मणो को बुलाया और बेदविधि से 
सब प्रकार के दान-धर्मं आदि करके, हवन आदि के द्वारा शान्ति-कर्म कराया । 

उसी समय हनुमान्‌ आकाझ-मार्ग से चचल वालन-सूर्य की भाँति, नदीग्राम के ऊपर 
होकर जाते हुए, जटाभार एवं वल्कल धारण किये हुए, राम के समान दिखाई पडनेवाले, 
घनश्याम वर्णवाले सूर्यवशज भरत को देखकर अत्यन्त आइचर्य-चकित हो सोचने लगें-- 
क्‍या सौमित्र की मृत्यु हो जाने से सीता को भी तजकर रामचन्द्र अकेले यहाँ आ गये हं?, 
क्या में इनसे पूछकर जान लू ?” फिर, वह कपिकुलोत्तम हनुमान्‌ (भरत से) न पूछने 
का निश्चय करके मन-ही-मन सोचने लगा--'रघुराम शरणागतरक्षक, सद्धर्मनिरत तथा 
श्रेष्ठ बलशाली हे । क्‍या, वे अपने सत्य तथा यश की उपेक्षा करके अपनी धर्मपत्नी तथा 
अनुज को त्याग कर सुग्रीव आदि वानर-वीरो को युद्धक्षेत्र में ही छोड रावण को सजीव 
छोडकर अकेले यहाँ आयेंगे ? ऐसा कभी नहीं हो सकता । एक साधारण मनुष्य की भाँति 
सोचकर मेने राम के प्रति अपराध किया है | कदाचित्‌ राम से मिलता-जुलता कोई और 
तपस्वी यहाँ रहता होगा ।” इस प्रकार सोचते हुए हनुमान्‌ शीघ्रगति से लका के मार्ग में 
जाने लगे । 

उसी समय भरत आकाश-मार्ग से जानेवाले हनुमान को देखकर सोचने लगे-- 
न जाने क्यों यह दुष्ट-प्रह यहाँ दिखाई पड रहा है। इसे अपने भयकर वाणो से नीचा 
गिराना चाहिए ।” ऐसा निश्चय करके शक्तिशाली धनुप-वाण हाथ में लेकर वे वाण चलाने 
का उपक्रम करने लगे । उसी समय आकाशवाणी हुई--हे अनघ, तुम इसके प्रति मित्र- 
भाव रखो, यह तुम्हारा हित है, इस पर तुम क्रोध मत करो ।” इस आकाझ्ववाणी को सुन- 
कर भरत ने धनुष-बाण नीचे डाल दिया । 


१२९, हुनुसान्‌ का माल्यवान्‌ से युद्ध करना 


निदान हनुमान्‌ समुद्र के निकट पहुँच गया। इतने में रावण की आजा से माल्यवान्‌ ने 
अपने दस करोड महावली तथा पराक्रमी राक्षस-सैनिको के साथ आकर हनुमान्‌ का 
मार्ग रोका । हनुमान्‌ ने द्वोण पर्वत को सावधानी से थामे हुए, उन राक्षसों का सामना 
किया । राक्षस-वीर भी वडी भयकर गति से हनुमान्‌ से भिड गये और परणु, तोमर, चक्र, 
णूल, करवाल एवं सुदूगर आदि अस्त्र चलाते हुए हनुमान्‌ को मारने लगे । किन्तु, अनुपम 
विक्रमी पवनकुमार ने उनके प्रहारों की परवाह किये बिना, अपनी भयकर पूंछ से राक्षम- 


9२8 + रंगनाथ एरायाश्यण 


वीरो को वाँधकर- समुद्र में फेंक दिया, उसने कुछ राक्षसों को पद-प्रहार से मार डाला, 
-कुछ वीरो को अपने भयकर गजन से मार डाला, कुछ राक्षसों का अपनी पूंछ से सहार 
-किया और अपनी दुष्टि-मात्र से कुछ राक्षसों का वध कर दिया । कुछ राक्षसों को उसने 
नीचे गिरा दिया, कुछ राक्षसों को दवा दिया मौर कुछ को चीर डाला । 
तब माल्यवान्‌ क्रोधोन्मत्त होकर यम के समान भयकर रूप धारण किये हुए हनुमान्‌ 
पर झर-बृष्टि करने लगा। किन्तु, हनुमान्‌ ने उन वाणों को अपनी पूंछ से ही तोड़ डाला 
और क्रोध से उसके घनुष को खड-खड कर दिया। फिर, उसने अपनी पूछ से माल्यवान्‌ के 
पैरो को बाँचकर ऊपर उठाया और पृथ्वी पर पठक दिया । तब माल्यवान्‌ ने हनुमान्‌ पर 
अपना शूल चलाया । उसकी भी उपेक्षा करके खडे हुए हनुमान्‌ को देखकर उस राक्षस ने 
अपनी शक्ति से उसके वक्ष पर भयकर प्रहार किया । इस आघात से हनुमान्‌ के वक्ष से 
- रक्त की धारा वहने लगी । हनुमान्‌ थोडी देर तक मौन खडा रहा, और फिर अत्यधिक 
रोष से उस राक्षस के सिर पर भयकर पद-प्रहार करके आकाह में जाकर उड गया । 
इससे राक्षस का सिर फूट गया और उससे रक्‍त की घारा बहने लगी । माल्यवान्‌ इस 
भयकर प्रहार से थोडी देर तक मूच्छित पडा रहा,किन्तु शीघ्र ही सचेत होकर उसने हनुमान 
पर अपनी गदा फेंकरते हुए कहा--युद्ध में यही गदा तुम्हारा अन्त कर देंगी । उस गदा 
के लगने से भयकर ज्वालाएँ निकल पडी । यह देखकर माल्यवान्‌ ने कहा--हें वानर, 
इस पर्वत को समुद्र में फेंककर जाओ, तो में तुम्हारा वध नहीं करूँगा । पुर्वकाल में समुद्र 
के मध्य में गर॒ड पर आरूढ हो विष्णु स्वय मुझसे युद्ध करने आया था और मुझे अजेय 
जानकर लौट गया था । मेरा प्रताप सारा संसार जानता है, तुम मुझसे युद्ध नहीं कर सकते ।' 
तव हनुमान्‌ ने माल्यवान्‌ को देखकर कोध से- कहा--हे वृद्ध राक्षस, मेरे प्रताप से 
भीत हुए विना तुम मुभसे युद्ध करने चले हो ” - तुम्हारी शक्ति ही कितनी है ” 
हनुमान्‌ के इन दर्प-पूर्ण वचनों को सुनकर माल्यवान्‌ का क्रोध और भी बढ गया । उसने 
“अपने भयकर खड्ग चन्द्रहास को निकालकर उद्धतः शक्ति से उसे हनुमान्‌ पर चलाया । 
हनुमान्‌ू के वज्त्रसम शरीर पर लगते ही वह चन्द्रहास ,चूर-चूर हो गया । उस खड्ग के 
प्रहार से हनुमानू ने थोडी देर तक पीडा का अनुभव किया, किन्तु ज्ञीत्र ही समलकर 
अपनी' भयकर पूछ को उस राक्षस के कण्ठ में लपेटकर आकाश्ष में बडे वेग से घुमाकर 
फिर समुद्र में फेंक दिया । माल्यवान्‌ समुद्र में गिरकर उसी मार्ग से पाताल में पहुँच गया। 
हतशेष राक्षस घैयँ खोकर भाग गये। पर्वत जैसी विशाल विजय को तथा पर्वत को लिये हुए 
हनुमानू आगे वढा, तो सभी देवता उसकी- प्रशसा- करने-लगे । 


१३०.- लक्ष्मण के लिए राघव -का शोक 


द्रोण. पर्वत की दीप्ति को दूर से देखकर सू्यवशज राम को भ्रम हुआ कि प्रभात 
होनेवाज़ा है । तब अत्यन्त भय-विह्लल हो, समरलक्ष्मी-रतिश्रात लक्ष्मण को “रण-शय्या 
पर सोते देखकर राम कहने लगे--हें लक्ष्मण, तुम्हारे जैसे अनुज के रहने से ही में वन- 


गमन की तपस्था का भार वहन कर सका । वह देखो, संसार के समस्त जीवो के लिए 
दिन निकल रहा है, किन्तु मेरे लिए दिन डूब रहा है । में वन में पत्नी को खो बैठा 


ख्द्धकाड: 9९४ 


और युद्ध में तुमको खो दिया । हे सौमित्र, अब मुझे सप्राप्त अपयश-रूपी पक को कौन 
घो सकेगा ? यदि माता सुमित्रा मुझे देखकर कहें कि हे तात, वडी तपस्था के उपरान्त 
प्राप्त, उन्नत, पुण्यशील, महनीय चरित्रवानू, मानधन अपने पुत्र को मेने तुम्हारा विश्वास 
करके तुम्हें सोपा था । ऐसे पुत्र को वन में ले जाकर तुमने उसका अन्त कर दिया, अब 
में क्या करूँ ? तब में उनसे क्‍या कहूँगा ? मुझसे मिलने के लिए जब भरत तथा आझत्रुष्न 
आयेंगे और पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ है, तो में क्‍या उत्तर दूंगा ? दीन होकर में वहाँ 
जाऊंगा भी कैसे ? में इसके कारण चिन्तित तथा दुखी नहीं हूँ । मेरी चिन्ता का कारण 
दूसरा हैं । पापी रावण के दुष्कर्मों को देखकर मन-ही-मन दुखी हो, अपने भाई का 
त्याग कर मेरा मित्र तथा सेवक बनकर विभीषणं ने मेरी शरण ली । ऐसे शरणार्थी 
विभीषण को आइ्वासन देते हुए मेने कहा था--मं तुम्हें राक्षमों का राज्य देता हूँ । 
मेने उसका राज्यतिलक भी कर दिया। किन्तु, उस प्रण को पूरा करने की क्षमता मुभमें 
नहीं रही । लो, सूर्योदय भी होने लगा है, अब लक्ष्मण के बचने की आशा नहीं हैं । 
मुझे भी अब जीवित नही रहना चाहिए। पापरहित लक्ष्मण के जीवन के साथ ही मेरा जीवन हें। 
अब यह शोक मेरे लिए असह्य हो गया है । किन्तु, शरणार्थी को त्यागना नहीं चाहिए, 
इस पृथ्वी पर यह क्षत्रियों का धर्म नही हैं । राजाओ को चाहिए कि स्वय दुख भोगते 
हुए भी, अपने आश्वितो की रक्षा करे । इसलिए हे सुग्रीव, तुम इस विभीषण को साथ 
लेकर अयोध्या जाओ और परण्यात्मा भरत को यहाँ का सारा समाचार समभाकर कहो 
और उन्हें मेरा यह आदेश सुनाओ कि वह इस विभीषण को लका के बदले अयोध्या का 
राज्य देकर पुण्य-लग्न में इसका राजतिलक कर दें । उसके पद्चात्‌ तुम तथा वालिपुत्र 
दोनो अपनी सेनाओ को लेकर किष्किन्धा को लौट जाना ।/ 


राम को ऐसे दीन वचन कहते सुनकर सुग्रोव अत्यत सशञ्नमित हुआ । वह सान्त्वता 
देते हुए कहने लगा--हे देव ! ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि अमी प्रभात नहीं 
होगा । अभी तो रात का चौथा पहर प्रारभ हुआ हैं । वायुपुत्न शीघ्र आ जायगा । 
आप सताप त्यागिए ।' फिर भी, राम अत्यधिक शोकाग्नि में जलते हुए पृथ्वी पर लोट- 
लोटकर कहने लगे--हे तात, मैं जब पिता की आज्ञा से अकेले वन के लिए चला, तो 
तुम विना पिता के आदेश लिये ही अपने-आप मरे साथ चले आये और असख्य दुःख 
भोगते रहे । इसे देखकर मे बहुत दुखी होता था । आज तुम शत्रु के हाथो में अपनी 
दविति खोकर इस प्रकार पृथ्वी पर पडे हुए हो । भब में क॑ंसे जीवित रह सकूँगा ? 
कंसे यह दुख सह सकूंगा ? कौन-सा मुँह लेकर अयोध्या को लौटूगा ? अब मुझे सीता 
किसलिए चाहिए ? अब मेरा जीवन ही किस काम का है ? मुझे अब राज्य किसलिए 
चाहिए ? जिस दिन पिता ने मुझे यहाँ भेजा, उसी दिन से तुम मुझे पितृवत्‌ मानते आा 
रहे हो । मेरे भाग्य ने आज रुष्ट होकर रावण के द्वारा तुम्हारी ऐसी गति करा दी । 
भिन्न-भिन्न देशो में खोजने के पश्चात्‌ योग्य पत्नियों को प्राप्त किया जा सकता है, देश- 
देशान्तरो में भ्रमण करके वधु-जनों को भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु अनुज को प्राप्त 
करना असम्भव हूँ । इस प्रकार, विलाप करते हुए राम अनुज के चेतना-हीन झरीर पर 

प्र्ड 


8२६ रंगनाथे रॉगीायेफ 


गिर पड़े | फिर अधघीर होकर कहने लगे--हे लक्ष्मण, तुम मुझे भाई कहकर करववं पुकारोगे ! 
तुम सीता को सुमित्रा की भाँति, मुझे महाराज दर्भरथ की भाँति और इस घनघोर कानन 
को अयोध्या के समान मानते थे । पुपष्प-शय्या पर लिटाने योग्य अपने शरीर को आज 
तुम पत्वरों पर कैसे लिटा सके ? हे राजकुमार साधना की समाप्ति पर ही निद्रा उचित हैँ। 
ऐसा सोचकर तुमने चौदह वर्षों तक निद्रा का त्याग कर दिया और वन में मेरी 
रक्षा करते रहे । आज युद्ध में भत्रुओं का सहार किये विना ही तुम सो रहे हो, कया, 
यह तुम्हारे लिए उचित है ? यदि तुम इस प्रकार पडे रहो, तो तुम्हारा अग्नमज भी दीर्घ- 
निद्रा (मृत्यु) को प्राप्त होगा । तुम सतत अपने अग्रज की वडी भक्ति करते रहे, आज 
क्यो नहीं कर रहे हो ” तुम सतत मेरे बचनो का आदर करते रहे, आज मेरी परीक्षा 
क्यों ले रहे हो ? हे पुष्पमृत्ति, युद्ध में रावणं का सहार करके सीता को आपकी सेवा में 
उपस्थित करूँगा' ऐसे श्रुति-मधुर वचन कहनेवालें तुम आज किस कारण से मौन साथें 
हुए हो? तुम उठो और 'हें देव, ऐसे अनुचित वचन कहना आपको शोभा नही देता ।' 
ऐसे वचनों से मुझे सात्वता दो और आाँखें खोलकर मुझे देखो ।” ऐसे विलाप करते हुए 
राम ने लक्ष्मण के अरुण हस्त को अपनी कनपटी से लगाया और हे लक्ष्मण मेरा उद्धार 
करो' यो कहते हुए ही मूच्छिंत हो पृथ्वी पर गिर पडे। तव वानर-वीरो ने उपचार करके 
राम की मूर्च्छा दूर की और उन्हें सात्वना देने लगे । 


१३१. हनुमान्‌ का द्रोण-पर्वत ले आना 


इसी समय प्रभा-मडल से दीप्त होते हुए हनुमान आता हुआ दिखाई पडा । तेजों- 
मय सूर्य-सम उसकी दीप्ति के आधिक्य के कारण उसपर दृष्टि ठहरती नहीं थी । उसे 
देखकर सभी वानर अत्यधिक भयभीत हो गये और सश्नम-चित्त हो व्याकुल हो उठे । 
रामचन्द्र ने भी उसे सूर्य ही समक लिया और प्रलय-काल के यम के समान क्रोध से 
जलते हुए सभी वानरो को देखकर कहने लगे--हे वानरों, तुम लोगो ने आकाश में 
निकलनेवाले सूर्य को देखा ? पुण्य तथा जशील से समन्वित हमारे वश का आरम्मकर्त्ा, 
अन्धयकार का शत्रु तथा कमल-वधु यह सूर्य आज शत्रु से मिल गया है और लक्ष्मण के 
ऐसे पडे रहते हुए निकल रहा है। अब में इस सूर्य-मडल को पृथ्वी पर गिरा दूँगा । इस 
प्रकार कहते हुए दुर्वार साहसी राम ने घनुष को अपने हाथ में ऐसे सँमाला, जैसे प्रलय के 
समय थिवजी ने ब्रह्माण्डो का भजन करने के निमित्त ब्रह्मा आदि देवताओं को भयभीत 
करते हुए अपने हाथ में पिनाक धारण किया था | उस समय अपने पूर्ण वाहुबल से युक्त 
राम स्वयं शिवजी के समान दोप्त होने लगे । अत्यन्त क्रोधोन्मत्त हो शीघ्र उन्होने ही 
अपने धनुष पर रीद्व-अस्त्र का संवान किया। राम की अद्वितीय शक्ति से परिचित जाववादनु ने 
भय से व्याकुल होते हुए क्रोधोद्दीप्त राम को देखकर कहा--हें देव, क्रोधावेश से अपनी 
दुर्वार शक्ति का प्रदर्शन करते हुए आपके इस प्रकार शर-सघान से देव तथा ग्रधर्व 
घैय॑ खोकर चारो ओर भाग रहे हे । हे राघव, यह कैसा आइचर्य है कि आप (आकाश 
की ओर) सावधानी से देखकर भी सचाई समभ नही पाये। यह जो प्रकाश दीख रहा है, 
वह सूयं का नहीं है, किन्तु अनेक दीप्त वृक्षों की काति से परिपूर्ण उज्ज्वल द्रोणाचल है, 


खुद्धकंंड 8२७ 


जिसे गुरुसत्त्व-सपत्न ( महान्‌ शक्तिशाली ) पवनकुमार लिये आ रहा है । सूर्य-सम 
तेजस्वी पवनपुत्र की अग॒वानी करने के लिए आप वानर-वीरो को भेजिए ।” तव रघुराम 
की आज्ञा से हनुमान्‌ के स्वागतार्थ वानर गये । 

हनुमानू आकाश से नीचे उतर आया और उस पर्वत को पृथ्वी पर रख दिया । 
फिर, उसने रामचन्द्र के समक्ष उपस्थित होकर उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया और कहा-- 
हैं देव, मेने द्रोणाचल पर जाकर ओषधियो के लिए बहुत ढढा, किन्तु उनको प्राप्त नही 
कर सका, इसलिए म॑ उस पर्वत को ही उठा लाया हूँ । आपकी आज्ञा प्राप्त करके यहाँ 
से द्रोणाद्रि जाते समय तथा वहाँ से लौटते समय मेरे मार्ग में कई विघध्न उपस्थित हुए, 
अत विलब हो गया । इसे आप मन में नहीं लाइए ॥ तब राम हनुमान्‌ को देखकर वडी 
प्रसन्नता से कहने लगे--हे पवनपुत्र, भला तुम में कोई दोष हो सकता है ) तुम्हारे 
कारण ही तो काकुत्स्थ-बशजो के यश तथा गौरव आज स्थिर रह पाये । अपनी अनुपम 
शक्ति से तुमने आज देवताओं के लिए भी असाध्य कार्य सपन्न किया हैं ।' 


१३२. संजीवकरणी से लक्ष्मण की मूर्च्छा का दूर होना 

तब सुग्रीव ने सुषेण को देखकर कहा--तुम दूसरे वानरों के साथ इस पर्वत पर 
चढ जाओ और आवश्यक महौषधियो को लाकर लक्ष्मण की मूर्च्छा दूर करो।' तब सुषेण 
अन्य वानरो के साथ शीघ्र उस पहाड पर चढ गया । वह अपने साथियों को पर्वत पर 
भिन्न-भिन्न स्थलों को दिखाकर कहता था--यहाँ पर इन्द्र ने अमरो के साथ अमृत-पान 
किया था । यहाँ पर विष्णु ने जगत्‌ के कल्याणार्थ अपने चक्र से राहु का सिर काटा था। ! 
फिर, वह उस पर्वत से आवश्यक ओषधियो का सचय करके ले आया और लक्ष्मण पर 
उनका प्रयोग किया । उन ओषधियों कें प्रभाव से लक्ष्मण के शरीर में गडे हुए वाण 
निकल आये और लक्ष्मण की चेतना लौट आई । सभी वानर आनन्द के अतिरेक से भरे 
रामचन्द्र के समक्ष आ पहुँचे । हे 

तब राम ने सौमिन्र को हृदय से लगा लिया और आँखों से हएँ के अश्ु वहाते 
हुए समीरकुमार को देखकर कहने लगे--हे प्रुण्यात्मा, आज तुमने मुझे सौमित्र का दान 
दिया । तुम्हारे कारण आज म॑ काकुत्स्थ-वशज कमनीय गात्रवाले लक्ष्मण को प्राप्त कर 
सका । गिरे हुए मेरे भाई को पुनर्जीवित करके तुमने मेरे प्राण बचाये । मेरा यह भाई 
मेरे प्राणो के समान हैं | तुम मेरे प्राण-बधु हो तथा परम मित्र हो | तुम्हारे द्वारा ही 
यह कार्य सपन्न हो सकता था । अन्यो के द्वारा इसकी पूत्ति असम्भव थी। हें वानर-वीर, 
उपकार का प्रत्यूषकार करना उत्तम हैं। किन्तु में तुम्हारा कोई प्रत्युवकार नहीं कर सकता, 
क्योकि समस्त लोको में तुम्हारें लिए कोई विपत्ति ही नहीं है । इसके पद्चात्‌ राम ने 
सुषेण की भी प्रशसा की और उसे हृदय से लगा लिया | सुषेण आनन्द से समुद्र के समान 
फूल उठा । उसने राम की अनुमति से रण में गिरे हुए वानरो को पुनर्जीवित किया | 
सभी वानरो ने मन-ही-मन अत्यन्त हर्षित होते हुए राम की अनुमति पाकर उस पर्वत 
के समस्त रत्नों से युक्त उज्ज्वल सानुओ तथा खश्ूगो पर विचरण किया, विविध स्थलों 
को देखा, परिपक्व फलो को छककर खाया, मधु का जी भरकर पान किया, अमृतोपम जल 


क्ष्त्ठ रंगनायथ एयायक 


पिया, और उसके पच्चात्‌ पर्वत से नीचे उतर जाये | तव राघव ने पवनकुमार को देखकर 
कहा--इस पर्व॑ताधीम को उसके स्थान पर फिर प्रतिप्ठित कर आओ 

राम की आतन्ना प्राप्त करके हनुमान्‌ अपनी अपार झक्ति से उस पर्वत को उठकर 
आकामग-मार्य से जाने लगा | नमूद्र के मब्य में राक्षतं ने यह देख लिया और तुरूत 
रावण को इसकी सूचना दी । तब लकेब्वर ने विजयबन, बकुकर्ण, स्थूलजघ, महानाद, 
महावक्तत्र, चतुर्वेक्त्र,, मेबजीत, हस्तिकर्ण, महावीर, जैतन्र, उल्कामुख आदि राक्षतों को 
बुलाकर कहा--तुम लोग अपने अनुपम पराक्रम से हनुमान्‌ का मार्ग रोककर उसे पकंडकर 
ले जाबो, या वह जिस पर्वत को ले जा रहा है, उसे उसके हाथ से छीनकर समुद्र में 
गिरा दो । इस दोनो में किसी एक कार्य को पूरा कर सकोंगे, तो में अपना आधा राज्य 
अमी तुमकों दूंगा 


तप 
न्द्र्ज 


यह सुनकर वें अपनी महाजक्तियाली सहल्नों विपुल सेनाओं के साथ दानव तथा 
अमरो का वेष घारण किये हुए, खड्ग, तोमर, भूल, घनुष, परणझु, भाले जआादि चस्त्रो 
को वारण क्ये हुए चल पड़े । उन्होने बड़े दर्प से गर्जन एवं हुंकार करते हुए, प्रलय-क्ाल 
के मेंघ जैसे सू्ये को घेर लेते हें, वैसे ही, हनुमान को घेर लिया और उसका मार्ग रोककर 
गर्जन करतें हुए, वें दुर्मति कहने लगें--हम देवासुरों को देखने के निमित्त (पर्वत सौंपने 
के निमित्त) ही तो तुम जा रहें हो । जअव इस पर्वत को लिये कहाँ जा रहें हो 7?” तठतव 
हनुमान्‌ उनको देखकर आँखों से प्रलय-काल के अग्ति-स्फुलिंगो को विकीर्ण करते हुए काल- 
चक्र के जाकारवाली वज्ज-सम कठोर अपनी पूछ को मबकर गति से घृमाते हुए उससे 
उन राक्षसों पर प्रह्दर करने लगा । तब राक्षसों ने भी (अपने जल्त्रों से) हनुमान्‌ को 
बच्छी तरह मारा । तब हनुमान्‌ ने कुछ राक्षनो को पद-प्रहार से मार डाला, कुछ राक्षसो 
को अपनी पूछ के आधातों से मार गिराग्ग, अपनी भयक्तर मुप्टि के आजाघातो से कुछ 
राक्षओों का सहार किया, अपने नाखूनों से कुछ राक्षतों को चीर डाला, अपने भयकर 
गजेन-मात्र से कुछ राजसों को ग्रिरा दिया और अपनी पढप तथा उच्र दृष्टि-मात्र से कुछ राक्षस 
के प्राण हर लिये । महानक्तिनसपन्न हनुमान्‌ ने ऐसा भयंकर युद्ध करके, अपने अनुपम 
पराक्रम से उन राक्षसों की सेना को इस प्रकार तितर-वितर कर दिया, जैसे सूर्य हिमणिखरो 


को ज्ञीत्र नप्द कर देता है । इसके पच्चात्‌ हनुमान्‌ आकाच-मार्य से जानें लगा, तो देवता 


५3] 


तथा गवर्व उसके वाहुवबल की प्रशंसा करते हुए उसपर पुप्प-वृष्टि करने लगे । हनुमान्‌ 
अत्वविक वेंग से जाकर उस पर्वत को ययास्थान प्रतिप्ठित करके ज्ीघक्रष रघुराम के पास 
लौट जाया जऔर पर्वत को लाने तथा उसको पुन अतिप्ठित करने के संत्रंव में उनपर 
वीती हुई विपत्तियों को कह सुनाया | तब राम ने वड़े हर्ष से वायु-पुत्र का आलिंगन 
कर लिया । 

तदनंतर सभी कपियों ने एकन्र होकर ऐसा सिहनाद क्या कि सारी लका व्याकुल 
हो उठी । बाकाजश में टिमिठिमानेंगले तारे एक-एक करके ऐसे लुप्त होने लगे, मानों 
दर्मकठ के पुण्य के चिह्न एक-एक करके लुप्त होते जा रहे हो। निदान, सूर्योदय हुआ 


5, 


जोर दैत्यो के दाहण रोप एवं गर्वावकार के साव-साथ अन्वक्षार भी दूर हुआ । वानरो के 


। खुद्धकांड क्ष्र्ए 


मुख-कमलो के साथ ही सरोज भी विकसित हुए । जव्तिहीन दनुजों के मुख-कैरवो के 
साथ-ही-साथ पृथ्वी पर करव भी मुरका गये । सूर्यवशाधीन राम के प्रताप-सूर्य के साथ- 
ही-साथ सू्यंविम्व भी प्राची दिज्ञा में दिखाई पडने लगा । 

तब राम ने सौमित्र को देखकर अत्यन्त आनन्द से भरे हृदय से कहा--हे सद- 
गुणशील, सौमित्र, तुम बच गये, सचमूच यह मेरा सौभाग्य है । राम के इन प्रणसापूर्ण 
वाक्यों को सुनकर लक्ष्मण राम को प्रणाम करके बोले--हे देव, क्या आप प्राकृतजन है ? क्‍या 
आप दीन हे, क्या आप निर्धन या क्षुद्र हे ? आप अपने महत्त्व को भूलकर ऐसे दीन 
वचन क्यो कहते हूँ ” हे लोकेश, दण्डकवन में आपने मुनियो को जो वचन दिये थे, उनका 
स्मरण कीजिए । आपका विश्वास करके आये हुए इस विभीषण से आपने जो प्रतिज्ञा की हैं, 
उसका विचार कीजिए और आज सूर्य के अस्त होने से पहले रावण का सहार कीजिए । 
इन बातो को सुनकर राम ने कहा--ऐसा ही होगा' और रण-विक्रम-दीप्ति से भासित 
होने लगे । 

१३३. रावण का शुक्राचार्य से परामर्श करना 
इस वृत्तान्त को सुनकर रावण मन-ही-मन चिन्ता से व्याकुल हो उठा और अपने 


समस्त पराक्रम को तजकर दीन हो शुक्राचार्य के पास पहुँचा । उनको वडी भक्त से 
प्रणाम करके रावण ने कहा--हे गुरुदेव, रघुराम की निशित (तोक्ष्ण) बाणाग्नि ने मेरे 
संगे-सवधियो, पुत्रों तथा भाइयो को जलाकर भस्म कर दिया है और प्रलय-काल की अग्नि 
के समान अमोघ दिखाई पड रही है । वह दुर्वार दीखती है और युद्ध में सवका सहार 
कर रही हूँ । मे अब कैसे वच सकूगा । कृपया बताइए। तब शुक्राचार्य ने कहा--हें 
रावण, तुम व्याकुल क्यों होते हो ? ऐसे कितने ही उपाय है, जिनके द्वारा महान्‌ युद्धो 
में भी नरो को जीता जा सकता हैं । केवल इस बात की आवश्यकता हैँ कि तुम विना 
विध्न के हवन पूरा करो । हवन करने से हवन-कुड से भयकर सम्राम के योग्य श्रेप्ठ रथ, 
अदव, भयकर खड़्ग, शर, चाप तथा कवच तुम्हें मिल जायेंगे । उनकी सहायता से तुम 
नरो को जीत सकते हो । वे अस्त्र-शस्त्र तुम्हें अवश्य विजय प्रदान करेंगे । इतना कहकर 
शुक्राचा्य उसे हवन के लिए आवश्यक मत्रो का उपदेश किया और हवन-विधि आदि बता- 
कर विदा किया । 

शुक्राचार्य की आज्ञा लेकर रावण अन्त पुर को लौट आया और नगर की रक्षा 
करनेवाले महान्‌ शक्ति-सपन्न राक्षस-वीरों को सावधान किया । उसके पश्चात्‌ उसने सिंह- 
द्वारा को वद कराया और उनकी रक्षा के लिए अपनी चतुरगिणी सेना को नियुकत किया। 
फिर, उसने यम-सदृश आकारवाले तथा उद्धत शूर विद्युज्जिक्न नामक एक वीर राक्षस 
को बुलाकर कहा--तुम अपनी सेना के साथ बडी तत्परता से नगर की रक्षा करते रहो। 
असावधान मत रहो और अपने स्थान से किसी भी दआ में मत हटो ।' 

१३४. पाताल-होम 

उमके पश्चात्‌ रावण ने हवन का अनुप्ठान करने के निमित्त, पाताल-गुफा में ऐसे 

प्रवेश किया, मानों मृत्यु के मुह में ही प्रवेश कर रहा हो । वहाँ पर बडी निश्चलता के 


9३6 ्््ि रंगनएथ ए्यायरस 


साथ हवन-कर्म के लिए अनुरूप रक्त वस्त्र, रक्त माल्य तथा रक्त चंदन धारण किया; 
दक्षिण दिशा में सिद्ध की हुई होम-वेदी की चदन-पुष्पों से अर्चता की, अग्नि को 
प्रतिष्ठित किया, विधिवत्‌ होम-मत्रो का उच्चारण करते हुए, पैने अस्त्रों को परिधि के रूप 
में सजाया; पीपल और भिलावा आदि समिधाओं को वार-वार जलाया; सरसो, दूर्वा, 
खील, गृग्गुल, अगरु, घी, मधु, ताडी, खून, दही, परमाज्न, दर्भ, प्रवाल, भेड, मछली, गीध, 
वराह आदि की वलि क्रमण देते हुए उस महावेदी के सम्क्‍क्ष निश्चल ध्यान में मस्त 
रहा । 

उस समय उस गुफा से भयकर घुएँ का समूह, पवन के सघात से विजलियों को 
गिराते हुए समस्त आकाजत में ऐसा व्याप्त होने लगा, मानों रावण के सभी पाप एकत्र 
होकर आकाण की ओर उठ रहें हो । यह देखकर देवता त्रस्त हुए, मुनि भयभीत हुए, 
दिक्पाल सञ्नमित हुए और वानर भय-विक्नल हुए । उस घुएँ को देखकर विभीषण ने 
राम से कहा--हे देव, रण में आपका सामना करके, आपके समक्ष खडे रहने में अपने को 
असमर्थ पाकर रावण कपट-कर्म के द्वारा आप पर विजय प्राप्त करने के निमित्त हवन कर 
रहा हैँ | वह देखिए, हवन-कुंड से निकलनेवाला धुआँ समस्त आकाश में व्याप्त हो रहा है। 
यदि इसकी इच्छा के अनुसार हवन निर्विध्च समाप्त हुआ, तो लोक-भयकर रावण को 
जीतना देवासुरो के लिए भी असंभव हो जायगा । अत, इस हवन में विध्न डालना ही 
चाहिए । इसके लिए आप शीत्र वानर-वीरो को भेजिए । 


उसकी मत्रणा स्वीकार करके राम ने वानर-वीरो को (हवन में विध्न डालने के 

लिए) भेजा । तव असमान बलवान्‌ गवाक्ष, तार, शरभ, क्रथन, शतबली, नल, गवय, मैन्द, 
गधमादन, हनुमानू, पनस, अगद, कुमुद, ज्योतिर्मूख, गोमुख आदि दस करोड उद्भट 
रण-विक्रमी तथा प्रतापी वानर अत्यधिक क्रोध से आकाझ-मार्ग से लंका में पहुँच गये । 
अपने हुकारो तथा पदाघातो से पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए, दिग्गजों को कुचलते हुए, 
आकाञ् को कपित करते हुए, उन साहसी तथा उत्साही वीरो ने प्रचंड गति से राक्षसो 
पर जाक्रमण किया और नगर की रक्षा करनेवाले कई बलवान राक्षसों को छिन्न-भिन्न 
कर दिया और द्वारपालों को करता से मार डाला; अपनी विज्ञाल शक्ति से ढ्वारो को 
चूर-चूर कर दिया और अत्यत शीघ्रता से नगर में प्रवेश किया । कुछ प्वताकार वानर तुरत 
दशानन का अच्वेषण करने लगें; कुछ रथश्ालाओ में प्रवेश करके रथों को चूर-चूर करते 
लगे; कुछ गजजालाओ में जाकर अपने मुष्टि-धातों से गजो के सिर फोडने लगे, कुछ 
अश्वगालाओं में पहुंचकर अपने भयकर नखो से घोडे के शरीर चीरने लगे, कुछ वानर 
घोडो (घूलको) को नष्ट-अष्ट करने लगे, कुछ शास्त्रागारों में पहुँचकर शस्त्रास्त्रो को खडित 
करने लगे, कुछ भाडार-घरो में पहुंचकर वहाँ की चीजो को बाहर फेंकने लगे । दूसरी 
ओर कुछ वानर अपनी प्रचड जक्ति से भूलते हुए तोरणों को तोड़ते थे, स्वर्णे-कलशो 
तथा स्वर्ण-हम्यों को पृथ्वी पर गिरा देते थे, कुछ वानर राक्षसों को यत्रणा देते हुए 
कहते थ--उस जगतु-्रोही (रावण) को बाँधकर लाओो, कुछ वानर घरो में घुसकर, 
राक्षतों को उनकी पत्नियो तथा सुतो के हाहाकार के वीच वाहर खीचकर लाते थे और 


झुहछ्वेकांड 9३ 


उनके सिर काट डालते थे। वानरो के ऐसे पीडित करने से सारा राक्षस-तगर भयभीत हो, 
दीन तथा व्याकुल दीखने लगा । वानरो से प्रपीडित घोडो की हिनहिनाहटो, गजो के 
भयकर चिंघांडो, वुद्धा तथा बालाओ के दीन विलापो तथा कपियो के सिंहनादो के व्याप्त 
होने से सारी लका प्रलय-काल में दीप्त होनेवाली वडवाग्नि की ज्वालाओं से भयभीत 
हो गर्जन करनेवाले समुद्र की भाँति, हाहाकार करने लगी । 

इसी समय सूर्योदय हुआ । वानरो ने सब स्थानों में रावण को ढूंढा, कितु वें 
कही भी उसको देख नहीं सकने के कारण सम्नेमित हो गये | तब विभीषण की चतुर 
पत्नी सरमा ने, अपने पति के हित का विचार करके बडी उद्िग्नता से, हाथ के सकेत 
से अगद को रावण के रहने का स्थान बताया । तुरत उस वीर ने कुद्ध होकर उस गुफा 
के मुंह पर स्थित शिला को अपने पदाघात से चूर-चूर कर दिया और अपने महान 
पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए, अपने वाहुवल से राक्षसों को भयभीत करते हुए अदर प्रवेश किया 
और हवन-कर्म में निश्चल निष्ठा से लगे हुए तथा विविध मत्र-तत्नों में लगे रावण 
को देखकर , चिल्ला उठा--मैने रावण को देख लिया । शीघ्र चले आओ ।' यह सुनकर 
अनिलकुमार आदि राक्षस बडे वेंग से गुफा की रक्षा करनेवाले राक्षसों को मारकर अदर 
चले आये । तब उन्होंने अकेले हवन करनेवाले रावण को देखा और बडे क्रोध से कहने 
लगे---विना किसी को साथ लिये यह अकेले फेस गया है । हम इसका हवन कर देंगे ।' 
यह कहकर वानरो ने हवनकुड के चारो ओर रहनेवाले कलश-समिघाएँ, हाथी, मुर्गा, 
जबूक, अदृव, ऊंट, कुत्ता आदि जानवरो के मस्तक, घी तथा भधु के पात्र आदि होमकुड 
में फेककर सिहनाद किया । यह देखकर राक्षस भयभीत हुए। फिर, वानर उस पापी 
रावण के अगो पर होमकुड के अगारो की वर्षा करनें लगे और जलते हुए मशाल उठाकर 
राक्षतों पर फेंकने लगे । एक वानर ने रावण के हाथ के खुकू-लुवा को बलातू खीचकर 
उन्ही से रावण पर प्रहार किया । कपियों के इस प्रकार के आक्रमण के कारण रावण 
की निष्ठा डोल गई । फिर भी विना विचलित हुए या विना कुद्ध हुए वह निष्ठा में 
ऐसे निमग्न रहा, मानो वह सोया हुआ पर्वत हो । 


१३५. अंगद का मंदोदरी को रावण के पास घसीठकर लाना 


तब युद्ध-कला-कुशल, दुर्जेय तथा अगदो से अलकृृत बाहुओ से विलसित अगद, 
शीघ्र रावण के अत पुर में पहुँचा और रानियो के निवास में प्रवेश किया । वहाँ उसने 
उमडते हुए दुख से सतप्त होनेवाली मदोदरी को देखा । उसका सूजा हुआ लाल मुख-चद्र, 
उसके कर-पल्‍लव पर ऐसा टिका हुआ था, जैसे रोहिणी से अलग हुए चद्र को तरुण पल्‍लव- 
शय्या पर पहुँचा दिया गया हो । वह अपने वधुओ के साथ यह सोचकर व्याकुल हो रही थी 
कि घोर युद्ध में कुमकर्ण आदि मरे, महावीर तथा घोर विक्रमी पुत्र सब नप्ट हुए; 
केवल मेरे पति बच गये हे, भला वे क्‍या रघुराम को जीत सकते है ? चह मन-हीं-मन 
इन्द्रजीत की मृत्यु का स्मरण करके रो रही थी । रमणीय मणि-मदिर में बैठकर शोक 
करनेवाली रमणी मदोदरी की सुदर वेणी को वलातू पकड़कर अगद उसे खीचने लगा । 
तव उस मृगनयनी के मुख-चद्र की काति ऐसे मलिन पड गई, जैसे ग्रहण के समय राहू से 


से 
के 


88९ रंगर्नाथ एयर 


घिरे हुए चद्र-मडल की काति मलिन पड जाती हैं। उसके वालो में सजे हुए सुरभित 
मल्लिका-कुसुम पृथ्वों पर ऐसे गिरने लगे, मानों रावण के कीत्ति-कुसुम ही गघ-हीन हो 
पृथ्वी पर गिर रहे हो । उसकी माँग में पिरोये हुए मोती भय एवं क्रोध से ऐसे गिरने 
लगे, सानों रावण की राज्य-लक्ष्मी ही सीमत-वीयी से च्यूत हो रही हो । उसके लाल 
मुख-कमल के नील अलक, ऐसे बिखर गये, मानो राक्षसों की लक्ष्मी के मुख-क्रमल के आश्रित 
अमर विखरकर उड़ रहें हो । उसके दोनो कर्ण-कुडल टूटकर पृथ्वी पर ऐसे गिर पढें, 
मानों मगलप्रद श्रेष्ठ आभूषण रावण की लक्ष्मी के कानो में रहने की इच्छा व रखने से 
गिर रहे हो। उसकी बाँखो से काजल से युक्त अश्वु ऐसे गिरने लगे, मानो वे दनुजेश्वर 
के अपयण की धाराएँ हो । उसके मणिमय आभूषण ऐसे टूटकर गिरने लगे, मानो राक्षस- 
राज के लिए अपणकुन सूचित करनेवाली महान्‌ उल्काएँ गिर रही हो । उस रमणी के 
वर्म का निर्मल जावरण-रूपी कचुक के जिधिल होने से उसके उन्नत स्तन-कलश ऐसे 
विचलित हो उठे, मानो रावण की इस लोक की तथा परलोक की उन्नति ही विचलित हो 
गई हो । उसकी तनु-लता ऐसी कुचल गई, मानो देव-शत्रु रावण की गुण-लता ही कुचल 
गई हो । उसकी मेंखलावली का वधन ऐसे खुल गया, मानो पवित्रात्मा राम के द्वारा 
राक्षसराज के कर्म-चधन ऐसे ही कंट जायेंगे । उसके चरण-नूपुर निनाद करते हुए एक- 
एक करके ऐसे छटकर गिरने लगे, मानो प्रमद राक्षसराज-पद की सन्धियाँ चटक गई हो 
और उसकी विमल कीत्ति खड-खड होकर गिर रही हो। इस प्रकार, जब अगद कुद्ध होकर 
मदोदरी को राक्षसेश्वर के समक्ष घसीटकर लाने लगा, तब राक्षसनवधुएँ आत्तंनाद करने 
लगी और कारागार में पडी हुई देव-स्त्रियाँ हर्षित होने लगी । 


तव मदोदरी शझ्ोक-सतप्त हृदय से दानवेंद्र को देखकर कहने लगी--हे देव, इद्र 

को परास्त करनेवाली आपकी जक्ति कहाँ लुप्त हो गई ? क्या, जाज चद्रहास की घार 
कुंठित हो गई ? प्रमथ-गणों से युक्त शिव के साथ कैलाश पर्वत को उठाने का आपका 
दर्ष कहाँ चला गया ? तीनो लोको को आपने जीत लिया था, ऐसी गक्ति को आप क्यो 
त्याग रहे हैं ? यदि मुझे त्याग कर इंद्रजीत इद्रलोक में नहीं गया होता, तो क्या, वह 
मुर्के इस दगा में देखते हुए चुप रहता ? यदि मेरा पुत्र जीवित रहता, तो कया, मे ऐसी 
नीच दुर्देशा को प्राप्त होती ? शत्रु इस प्रकार मेरा अपमान तथा उपहास कर रहे हे 
ओर जाप देख तथा सुर रहें हें । क्या, आप निलंज्ज वधिर हो गये हे ? आपका यह 
हवन किस काम का ? आपकी यह निष्ठा किसलिए ? इस आहुतियों ने स्वयं आपकी 
पूर्णाहुति कर दी । वुद्धिमान्‌ होकर भी आप राम की वाणाग्नि से दग्व हो जायेंगे । कुटिल 
क्रिपाओ से जब कोई प्रयोजन नहीं है । अब उन्हें त्याग दीजिए ।” इन वातों को सुनकर 
दशकठ क्रोव से भभक उठा । उसने अपने हाथ की आहुति पृथ्वी पर फेंक -दी । निष्ठुर 
क्रोव से उसकी भौहें तन गई । वह यमराज के समान भयकर रूप धारण करके उठ 
खडा हुआ । अपने भीषण खड्ग को खीचकर उसने अनुपम रत्नों के अगदों से विलसित 
अगद पर प्रहार किया और अपनी पत्नी को उसके हाथो से छुडा लिया । तव खुली हुई 
वेणी तथा उत्तरे हुए मुंह से दुम्ब प्रकट करती हुई वह दैत्य-रमणी अत'पुर को चली गई। 


खुद'्धेकीड #ईई 
उसके पद्चात्‌ हनुमान्‌ अपनी भयकर मृष्टि से दशकठ के सिर पर कठोर प्रहार 
किया । इतने में वालिपुत्र संभल गया और रावण पर कठोर प्रहार करके फिर गिर पडा । 
इस प्रहार से रावण लाल रक्त से भीगे हुए एक लाल पर्वत की भांति दीख रहा था । 
फिर भी, उसने भयकर क्रोध के आवेश में आकर अगद पर गदा का प्रहार किया, हनुमान्‌ 
पर अपने तेज खड़ग को चलाया, तल पर शर-प्रहार करके उसको ऐसे दवा दिया, जैसे अकुश 
के प्रहार से गज को' झुका दिया हो, मूसल का प्रहार करके नील को दड दिया, शक्ति 
के प्रयोग से शतबली का दर्प चूर कर दिया, वज्ञ-सम मुदूगर तथा बाणों को चलाकर 
द्विंविद तथा मैन्द को गिरा दिया । तब वानर-वीर आइचर्यजनक वेग से अपनीं सेंना में 
जा पहुँचे । 
अनिलकुमार ने राघवेश्वर के समक्ष पहुँचकर हाथ जोडकर प्रणाम किया मर 
कहा--हे देव, हम दानवेंद्र का हवन भ्रष्ट करके लौट आये हे ।! यह सुत्कर रघुराम 
मन-ही-मन बहुत हर्षित हुए । 
वहाँ देत्येंद्र शीत्र अतपुर में गया और अपार शोकाम्नि में जलनेवाली मदोदरी 
को देखकर कहने लगा,--हे प्रिये, विधि-विधान के सवध में मन-ही-मन ऐसे शोक करने 
की क्या आवश्यकता है । आज मे युद्ध में राम का वध करूँगा | यदि इसके विपरीत 


वह्‌ मेरा सहार कर डाले, तो तुम भी' जानकी को मारकर शीघ्र अग्नि में प्रवेश कर 
जाना । 


१३६ रावण को मन्दोदरी का राघव की महिमा बताना 

तव वह रमणी अपने पति को देखकर कहने लगी--हे राक्षसेंद्र, आप रघुराम को 
युद्ध में जीत नहीं सकते । आप ही क्यो, देवासुर भी मिलकर उन्हें जीत नही सकते । 
आप उन्हें एक साधारण राजा मत मानिए | वें पुराण-पुरुष हे । उन्होने पूर्वकाल में मत्स्या- 
वतार लेकर सौमक का सहार किया और श्रुतियो का उद्धार किया था । उन्होने कमठ 
का रूप लेकर मदराचल को अपनी पीठ पर घारण किया था। वराह का अवतार लेकर 
उन्होने हिरण्याक्ष का सहार करके पृथ्वी का उद्धार किया था । उन्होने नूसिह का रूप 
घरकर क्रुद्ध हो नीच राक्षस का वध किया और प्रह्लाद की रक्षा की थी। वामन का 
अवतार लेकर उन्होने बलि से याचना करके उसे बाँधा था । जमदग्नि के यहाँ जन्म लेकर 
उन्होने महाशूर कात्तंवीय॑ का सहार किया और समस्त ससार को कश्यप ब्रह्मा को दान 
में दे दिया । अपनी समस्त शक्ति को एकत्र करके, अब तुम्हारा सहार करने के निमित्त, 
अपना तेज चारो ओर व्याप्त करते हुए उन्होने दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है । 
उनकी महिमा तथा उनके कार्यों का वर्णन में कैसे करे ? इसी राम ने अपने वाल्य-क्राल 
में अपने महान्‌ विक्रम तथा विशाल शक्ति का परिचय देते हुए कौशिक के यज्ञ की रक्षा 
ऐसे की कि कौशिक तथा अन्य प्रमुख दिक्‍्पाल भी उनकी प्रणसा करने लगे । फिर, उस 
मृनि से उन्होने शत-सहस्तादि सख्या में दिव्यास्त्र प्राप्त किये । उन्होंने जनक को सतुप्द 
करते हुए अपनी अनुपम शक्ति का परिचय देकर शिव-धनुप का भग किया जौर देव- 
नियोग से वैदेही को अपनी चर्म-पत्नी के रूप में स्वीकार किया । उसी राम ने भागव राम 

कै. 


9३8 रंग्नाथ एमायफे 


का गवे-मग करके अपने वाहुबल का परिचय दिया । अपने पिता की आज्ञा से वे मुनि- 
वृत्ति स्वीकार करके वनवास करने आये हैँ । उन्होंने अपनी प्रशसनीय शक्ति से विराध 
का बंध किया, गूपंणखा को दड ब्या और अपने चरण-स्पर्श से दण्डक वन की भूमि को 
पुण्यभूमि वता दिया। उन्होंने खर, दृपण आदि वीर राक्षसों को उनके चौदह सहस्र सैनिको 
को साथ मार डाला, मारीच का सहार किया और भयकर आकारवाले कबध का वध 
किया । जिस वालि ने आपके पौरुष को कुठित करके, अपनी पूछ से आपको वाँघकर 
चारों समुद्रों में ड्वोकर अपनी अनुपम शक्ति का परिचय दिया था, उसे एक ही वाण से 
गिराकर, सुग्रीव का राजतिलक कर दिया । अपने वाणो की जग्विजज्वालाओं से समुद्र को 
सुखा दिया । युद्धभूमि में कुभकर्ण का सहार किया । इतना ही नहीं, लक्ष्मण ने युद्ध में 
बतिकाय तथा इद्रजीत का व किया । राम भूपाल कदाचित्‌ ही कभी क्ोब करते हूँ । 
यदि बे ऋुद्ध हो जायें, तो इद्रादि देवता भी उनके समक्ष खड़े नहीं रह सकते । हे दैत्यनाथ, 
ऐसे वसुवेब्चर की पत्नी को धोखे से ले आना क्या, आपको उचित था ? क्‍या आप राम 
के नित्यसत््व को नहीं जानते ? क्या, आप उनकी महिसा से परिचित नहीं है ? न जाने 
किस पाप का फल हैँ कि राम की शक्ति की श्रेप्ठता आपको सूभती नहीं है । हें देव, 
अब भी जाप जानकी के साथ-साथ अपने समस्त राज्य को राम को समर्पित कीजिए और 
उनके निप्ठुर वाणों की अग्वि-ज्वालाओं से अपने को बचा लीजिए । अवत्तक हमने राज- 
भोग का अनुभव किया, यही पर्याप्त हैं । अब हम तपोवृत्ति स्वीकार करके वनों में 
विचरण करेंगे। यदि आपका अत हो जायगा तो में आपके साथ अग्तिमुख में गिरकर 
जल भी नहीं सकती, क्योकि मेरे पिता ने मुझे यह वर दिया है कि जरा-सृत्यु मेरा स्पर्श 
नही करेंगी । जब में राज-सुख भोगना नहीं चाहती | आप इस मार्ग का त्याग कीजिए । 
मेरे पिता का वर दुस्तर हैं । अव मुझे या तो सरमा की या जानकी की सेवा करनी 
पड़ेगी ।॥” 


तब दशकठ उस पिकवेनी को देखकर उत्कट क्रोव से कहने लगा--हे सुदरी, 
तुम इतना दुखी क्यों होती हो ? क्या, मेरी दमा इतनी दीन हो गई है ? पुत्र वबु, 
मित्र, सेवको का वध कराने के परचात, देव-दानवों को भी भयभीत करनेवाले अपने प्रताप 
को तजकर, में केवल अपने प्राणो की रक्षा क्यो करूँ ? इन्द्रजीत जैसे पुत्र का बध कराने 
के पण्चात्‌, में जीवित क्यो रहे ? मेने गरुढ, उरग, अमर तथा गवर्षो को जीत लिया है, 
पुण्यात्माओं का विनाग किया है जऔर तपस्वियो का वध किया है । अब यदि में स्वय 
तपस्वी बनने जाऊँ, तो क्या सभी तपस्वी मेरा उपहास नहीं करेंगे ? इसलिए हे कमलाक्षी, 
तुम्हारे थे वचन आचरण करने योग्य नहीं हँ । अब में किसी भी प्रकार से हो, राघवों 
का वंब कर ही डालूगा । अनुपम बल से समन्वित, में किसी भी दच्चा में सीता को नहीं 
दूँगा । यदि में राम के वाणों से मारा जाऊँगा, तो में जिस वैकुठ की इच्छा करता हूँ, 
वह स्वय मेरे समझ जा जायगा । हें सुदरी, तब मुझे न तुम्हारी आवश्यकता रहेगी, न 
इस लका की । म॑ अपनी इच्छित मुक्ति-पथ को प्राप्त करूँगा । मेरी मृत्यु के पश्चात्‌, 
तुम गुमलक्षण श्री से रहित हो मसूर्य-विहीन कमलिनी की भाँति, गशिहीन कुमुदिनी की 


युछुकांड 98३५ 


भाँति रहना । यह सुनकर मदोदरी लज्जा से अभिभूत हो प्रत्युत्तर देने से भयभीत होती 
हुई चुप हो गई । 
१३७. रावण का तृतीय युद्ध के लिए प्रस्थान 
उसके परचात रावण अत्यधिक उत्साह एवं हर्ष से युद्ध की तैयारियाँ करने लगा । 
उसने आदित्य को त्रस्त करते हुए तथा ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करते हुए रण-भेरी का निनाद 
कराया और सेना को एकत्र करने के लिए भटो को भेजा । फिर, उसने अपनी विज्ञाल 
भुजाओ को रत्न, केयूर तथा ककणों से अलकृत किया, इंद्र आदि देवताओं को जीतने क॑ 
उपलक्ष्य में स्मारक-स्वरूप एक वीर-ककण पहना, अपने सभी करो में भयकर चद्रहास, 
धनुष, वाण, गदा तथा चक्रों को धारण किया और अपने नेत्रों से क्रोधाग्नि की काति 
को चारो ओर व्याप्त करते हुए वाहर निकला। फिर, वह अच्छी तरह निर्मित सोलह 
चक्रवाले दो करोड क्षुद्र घटिकाओ के निनाद से भयोत्यादक तथा एक सहस्न घोडे जुते हुए 
रथ पर इस प्रकार आरूढ हुआ, मानो राम के शरो से मृत होकर वैकुठ के रथ पर आखरूढ़ 
हो रहा हो । महाद्‌ बलशाली' तथा रथ-कला-निपुण कालकेतु उस रथ को चलाने लगा । 
रावण के ऊपर अनेक चद्विका-सम उज्ज्वल छत्न तने हुए थे । रावण के श्रेष्ठ साहस का 
परिचय देनेवाले, राहु के मस्तक से अकित तीन ध्वजाएँ, आकाश का स्पर्श करती हुईं ऐसे 
फडफडा रही' थी, मानो सूर्य-मडल एवं चद्र-मडल को निमलने के लिए उद्यत राहुत्रय हो । 
(सेता की) भेरी, मृदग आदि के गभीर निनादों से समुद्र उमडने लगे और उनके उमडने 
के प्रयत्न के फलस्वरूप पृथ्वी काँप उठी । रावण के साथ ही साथ, गज, अश्व, रथ एवं बल- 
शाली तथा उद्भठ भटो का समूह भी निकला और सभी दिशाओं में व्याप्त हो गया । 
उस सेना के साथ ही प्रलय-काल के आदित्यो की भाँति अद्भुत शौर्य के साथ खड्गरोम, 
व्‌द्चिकरोम, सर्परोम तथा अग्निवर्ण नामक राक्षस भी युद्ध के लिए निकल पडे । तब 
सारे समुद्र क्षव्ध हुए, समस्त लोक भयभीत हुआ, दिग्गज घेंस गये और सभी कुलपर्वेत 
काँप उठे । 
इस प्रकार की यूद्ध-सज्जा के साथ जब रावण निकला, तब आकाश में देवता उसे 
देखकर आपस में कहने लगे--रावण जिस समय इद्र के ऊपर आक्रमण करने के लिए 
क्रोध से निकल पडा था, उस दिन भी उसकी युद्ध-सज्जा तथा क्रोध आज के समान नहीं थे । 
आज अवश्य वह अपनी सारी शक्ति के साथ लक्ष्मण से युक्त राघव पर आक्रमण 
करेगा । ऐसा सोचते हुए रत्नमय विमावों में आरूढ हो सभी देवता एकटक हो रण की 
गति देखने लगे । वानर-सेना-रूपी अरण्य को जलाने के लिए आनेवाले दावानल की भाँति 
अत्यधिक बेग से आक्रमण करनेवाली राक्षसरों की सहख्रों सेनाओ को देखकर वानर-बीरो ने 
अगद के साथ अट्टहास करते हुए बडे उत्साह से सिह-गर्जन किया । फिर, विश्ञाल वृक्षों, 
भारी पर्वेतो तथा गिरि-श्लंगो को उठाये हुए पर्वताकार वानर-सैनिको ने राक्षस-तेना पर 
इस प्रकार आक्रमण किया, जैसे दक्षिण समुद्र तथा उत्तर समुद्र एक दूसरे से टकरा गये हो। 
तव दानवो ने क्रोध से जलते हुए दहाडो, धमकियो तथा हुकारो के नितादों से आकाश 
को भरते हुए अपने मदमत्त गजो के समूह को उनके ऊपर चलाते हुए बहुत वेग से जाने- 


3६ रंगनगाथ एल्‍यायरस 


वाले अब्वो को, उनपर दौडातें हुए रथो को अवाधूष चलाते हुए, पैदल सेना से उन पर 
भयकर आक्रमण कराते हुए, उनका सामना किया | फिर, उन्होने करवाल, मूसल, मुद्गरः 
परणु, तोमर, गर तथा चक्रो से वानरो पर प्रहार किया और उन्हें काटा, चुभोया, रौदा 
तथा पृथ्वी पर गिराकर नाना विधि से उनका सहार किया । इस भयकर आक्रमण से 
क्रद्ध होकर वानर-वीरों ने उद्धत रण-कौजल प्रदर्शित करते हुए निकट ही रहनेवाले पर्व॑तो, 
असल्य गिरि-श्गों, वुक्षो तथा शिलाओ को उठाकर राक्षसों पर फेंका । फिर, घोड़ो पर 
कृदकर घूडसवारों को पदाघातो से नीचे गिराते भयकर रूप धरकर गज-समूहों पर पिल 
पड़ते और पहाडो से उन पर प्रह्मार करके महावतों को मारते, और हाथियों के कुभ-स्थल 
पर ऐसा प्रह्यार करते कि हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ते । फिर वें अदवों, सारथियो तथा 
रथिको के साथ रयो को एकदम ऊपर उठा लेते और उसे रण-म्रध्य में फेंक्कर उसको चूर-चूर कर 
दंते। सारी पृथ्वी उस समय काँप उठती। इतना ही नहीं, वे पदचर सेना पर पर्वतों तथा 
वृक्ष-सममूृहों से भयकर प्रह्मार करते, उन्हें दाँतो से काटते, हथेलियों से मारते, पैरो से कुचलते, 
नखो से नोचते, प्‌ छो से अच्छी तरह पीटते और अपने हाथ के मुक्को, से उनपर प्रहार करते । 


पनस, नील, अगद जआादि प्रमुख वानर इससे संतुप्ट न होकर दुर्वार गति से आकाश 
की ओर उड़कर और वहाँ से राक्षस-सेना पर पहाडो की ऐसी वर्षा करते, जैसे प्रलय के 
समय विजलियो की वर्षा होती हैं । इस प्रकार की शैल तथा पापाणों की वर्षा से राक्षस- 
सेना में हाथी गिरे, महावत जहाँ के तहाँ मरे, अच्व पृथ्वी पर लोटने लगे और उनपर 
अश्वारोही गिरने लगे, रय पिस गये, सारथी समाप्त हो गये, शव रौदे गये, मास-खंड विखर 
गये, मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगे, मस्तक फूटने लगे, रक्‍त की धारा वहने लगी, शरीर 
छिन्न-भिन्न होने लगे, अंतडियाँ छितरानें लगी और खड्ग टूटने लगे । उस समय वह रण, 
विविध भोग-विलसित पर्जन्य* ( मेघ-इन्द्र ) की सपत्ति की भाँति महान्‌ अअञ्ज-मातग* 
( ऐरावत-इवेत गज ) के मद से सिंचित था, जति रोद्र रुद्रविहार ( कंलास 
पर्वेत-ब्मझान) की भाँति आहत गज एवं असुरो से युक्त हो पिशाचों के लिए आनद- 
दायक था । अल्लीण राम-कटाक्ष के समान प्रेक्षण-हप्ट-विभीषण * ( देखने में भयकर, देखकर 
सतुप्ट विभीषण) था, कलियुगात के भयंकर काल के समान वल-रहित एवं विध्वस्तधर्मा* 
(वर्म-अ्रष्ट, नीति-अ्रष्ट) था, रात्रि के उपरात विकसित कमलिनी * (सरोवर-कमलिनी ) 
की भाँति शिलीमुखो* ( वाण-अ्रमर ) से जाश्वित पुण्डरीक * (कमल-श्वेतच्छत्र) समूह के 
समान था, उदार व्यक्ति के सुदर एवं शुभप्रद सदन की भाँति आरक्‍्त * ( अनुरक्त, रक्त 
से सीचे), मार्गपो * ( वाण-बाचक ) से परिपूर्ण था, गाइवतन-पुण्यमूल नदी के पति 
(समुद्र) की भाँति हरि-शक्ति-निर्मेथित * (साँप से मथित, वानरों से मथित) हो भयकर 
दीखता था और निर्मल वेद-विहित यज्ञ की भाँति देव-लोक के चित्त को प्रसन्न करनेवाला था । 
ऐसे भयकर रण में रक्त-सिक्‍्त हो, अँतडियाँ-रपी प्रवालसमृह, रथ-रूपी नावें, 
टूटकर गिरे हुए रव-चक्र-हूपी कच्छप-ममृह, जव-रूपी मगर, कटकर गिरी हुई भुजाएँ-रूपी 
साँप, आायुधों का चूर्ण-हूपी रेत, गज-समूह-रूपी विश्ञाल पर्वत, दप्ट्र-हूपी तिमि-तिमिगल, 

#चिह्वित शब्द हिलष्ट है |--ले० 


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ख्द्धकांड 8३७ 


बृहत्काय अश्व-समू ह-रूपी चल एवं उत्तुग तरगें, विविध अझ्वों की लार-रूपी उज्ज्वल फेन, 
धवल आततपत्र-रूपी हस, असख्य मूकुटों की प्रभा-रूपी वाडवाग्नि-शिखाएँ, विखरे हुए मास- 
खड-रूपी मणियाँ, सतुष्ट विशाचर, प्रेत एवं वैतालों का अट्टृहास-रूपी भयकर घोष, रघुराम- 
चद्र-रूपी चद्र, उनकी हास्यन्युति-रूपी चद्रिका से युक्त हो रक्‍्तसमुद्र-रूपी समुद्र, उमड 
रहा था । 


१३८, वानरों के द्वारा खड़॒गरोम आदि राक्षसों का वध 

तब हतुमान्‌ को असुरेंद्र पर आक्रमण करने के लिए उद्यत होते देखकर पर्वताकार- 
वाला अनुपम साहसी, रुचिर खड़्ग से सपन्न, खड़्गरोम क्रुद्ध हुआ और कहने लगा--हैं 
पवनकुमार, उधर कहाँ जा रहे हो *? उधर जाने की क्‍या आवश्यकता है ? म॑ तो यहाँ 
हैं ही, इधर आओ । यह सुनकर पवनपुत्र उसपर कद पडा और उसके शरीर के रोमो 
के पेने खड़्ग धाराओ में डब-सा गया । किंतु किसी तरह वह उनसे वाहर निकला और 
भयकर रूप घारण करके अपनी उन्नत शक्ति को प्रकट करते हुए, कुलपर्वत की समता 
करनेवाले एक विशाल पर्वत: को उठाकर भयकर ग्जेन करके उसे उस राक्षस पर ऐसा 
फेंका कि पृथ्वी काँप उठी । किंतु उसने अपने रोम-खड्ग की धाराओं से उसको खडित 
कर दिया और वानर-सेना को काटते हुए हनुमान्‌ पर आक्रमण किया । तब हनुमान्‌ ने 
एक विज्ञाल पर्वत को उठाकर उस राक्षस-वीर पर ऐसा प्रहार किया कि वह वजन के 
आधात से आहत हौल की भाँति गिर पडा । 


तब सर्परोम ने भयकर सर्प की भाँति ऋुद्ध हो, बडे दर्प से अगद पर आक्रमण 
किया और अपने रोम-सर्प के समूह से उसे पीडित किया । तब अगद ने प्रलय-काल के 
यम की भाँति जलते हुए उस राक्षस पर अपनी हथेली से ऐसा प्रहार किया कि उसका 
सिर फूट गया और रक्‍त की धाराएँ बहने लगी । फिर भी, रोषाग्नि उगलते हुए उस 
राक्षस ने भयकर रूप धारण करके अगद के अगो पर अपने रोम-सर्पों से आधात किया । 
तब अगद ने अत्यधिक क्रोध से उस राक्षस के सिर पर अपनी भयकर मुष्टि से प्रहार 
किया और उसे नीचे गिराकर पैरो से रौंदते हुए उसका सिर तोडकर फेंक दिया । 

तब वृश्चचिकरोम ने भीषण रण-कुशल नील पर आक्रमण किया और विप-ज्वालाओ 
को उगलनेवाले अपने रोम-वृश्चिको के प्रयोग से नील को अत्यधिक पीडा पहुँचाई । इसको 
सहने में असमर्थ होकर नील ने उस दानव की परवाह किये विना एक विद्याल घाल-ृक्ष 
को उसपर फेंका । तब उस राक्षस ने अपने विप-भरे रोम-कटकों से उस वृक्ष को तोड़ 
डाला । यह देखकर नौल ने क्रोधातुर हो, अपने भयकर वाहुबल का प्रदर्शन करते हुए 
असख्य शाखाओं से यक्‍त एक विज्ञाल वृक्ष को उखाडा और उससे उस राक्षस के वक्ष स्थल 
पर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण जाते रहे । सभी देवता हे से फूल उठ । 

उसके पद्चात॒ शझत्रभजक एवं अकुठित पराक्रमी अग्निवर्ण ने प्रचंड क्रोध 
वनो को दुर्वार गति से जलानेवाली दावारित के समान अपने अगो में अगणित बग्नि- 
शिखाओ को दीप्त करके वानर-सैनिको को जलाकर भस्म करतें हुए आगे बढा | राम मे 
उसे कोधपूर्ण दृष्टि से देखा, वानर-वीरों का पराभव होते भी देसा, वहूणाईचित्त 


विधाल 


श्श्८ रंगनशथ एयायण 


होने के कारण वे उसके अत्याचारों को सहन न कर सके, कितु उसकी भयकरता को देखकर 
सिर कँपाते हुए विभीषण से कहने लगे--हे विभीषण, में अनुमान नहीं कर पा रहा हूँ 
कि यह कौन आ रहा है | पता नहीं कि रावण की आजा से स्वय अग्निदेव युद्ध करने 
के लिए आ रहे है या कोई राक्षस-चीर ही आ रहा है । यह कौन है ” इसका परिचय 
मुझे दो ।' 

तब विभीषण ने कहा--हे देव, यह अग्निवर्ण है । यह अपने शरीर से अग्नि- 
ज्वालाओ को प्रज्वलित करके पर्बतो को भी भस्म कर सकता हैं, यह अखड वीर एवं महान्‌ 
घमडी है ।! यह सुनकर राम आखज्चर्यचकित हुए । फिर भी, उसके भयकर ओद्धत्य को 
देखकर उन्होने उस पर वारुणास्त्र चलाया । तब उस अस्त्र ने समस्त आकाश को घने बादलों 
से आच्छादित कर दिया और अविराम गति से वर्षा करके उस राक्षस कें द्वारा प्रज्वलित 
अग्नि-ज्वालाओ को वुकाकर भयकर घ्वनि के साथ उस राक्षस का वध कर डाला । 

युद्ध में अग्निवर्ण को इस प्रकार गिरते हुए देखकर, रावण ने आँखों से अग्निवर्षा 
करते हुए, प्रलय-काल के सूर्य की भाँति जलती हुई दृष्टियों से राथ को देखकर कहा-- है 
राम, क्या तुम मुझे नहीं पहचानतें ? अपने निष्ठुर वज्ञ की दुर्वार धारा से कुलपर्व॑तो 
को खंडित करनेवाले इद्र भी यदि वर्ड, उद्धतता से अपने देवताओं के साथ युद्ध में मेरा 
सामना करे, तो में उसे भी परा/स्त कर दूया । तब, में तुम्हारी क्या परवाह करूँगा ” 
क्या, तुम्हारे जैसे क्षुद्र प्राणियों का प्रयत्त मुझे परास्त कर सकेगा ? अब तुम अपनी शूरता प्रकट 
करो और अत तक मेरा सामना करते रहो। में अपने शस्त्रास्त्रों से तुम्हें गिरा दूंगा और 
तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय दूंगा।' 

रघुराम उस दुरात्मा का प्रलाप सूनकर हँस पडे और मत्त सिधुर (हाथी) के चिंघाड 
सुननेवाले सिंघुरातक मत्त सिंह की भाँति चुप हो रहे । तब रामानुज ने कुछ होकर रावण पर 
आक्रमण किया और उस पर भयकर वाण चलाने लगे। तव रावण ने उन शरो को सहज ही खडित 
कर दिया और उनकी परवाह किये घिना भानु पर आक्रमण करने के लिए आनेवाले स्वर्भानु 
(राहु) के समान भानुवशाधीश (राम) पर आक्रमण करके दारुण वज्मघर की समता करनेवाले 
वाणो से उन्हें ढक दिया । तव राम ने कऋोधोन्मत्त हो, अगरारो को उगलनेवाले निष्ठुर अस्त्रो को 


उस राक्षस पर चलाया। तव रावण उन वाणों का सामना करने के लिए युद्ध-भूमि के 
मध्य आया। 


१३९, इंद्र का मातलि के द्वारा राम को रथ भेजना 

तब इद्र ने राम को देखकर मातलि से कहा--दिवताओ के हित के लिए ही 
राघव राक्षसों से घोर युद्ध कर रहे हे । कितु वे पदाति हो पृथ्वी पर खडे हे और राक्षस 
रथ पर आरूढ हुं ) ये लोकोन्नत (राम) दुखोंसे पीडित हो उस कुमार्गी के सामने नीचे 
खडे हे । वेद-पल्लवों पर विहरण करनेवाले, सुखी तथा सपन्न व्यक्ति आज कठोर रणभूमि 
पर खडे हें । कमला के मन-रूपी रथ पर अत्युन्नत सुख-राशि में डोलनेवाले आज 
पृथ्वी पर खडे हें । अत, हे मातलि, तुम ज्ञीघ्र उनके लिए दिव्य रथ पृथ्वी 
पर ले जाओ । 


रुछ्धकाोंड 9३6 
तब वायू तथो मन के वेग से जानेवाले अछ्वों से युक्‍त कनक-दडों में बँधी हुई 
पंताकाओ से विलसित, महनीय कातियुक्त मणि-समूहों से जटित, वालसूर्य के समान दीप्त 
होनेवाले रथ को लिये हुए मातलि पृथ्वी पर उतर आया और राम के समक्ष खडे होकर 
हाथ जोडे हुए राम से निवेदन किया--हे देव, हे राघव-भूपाल, हे समस्त देवताओं के 
आराध्य, हैं भक्त-जन-साध्य, इंद्र ने आपके लिए शर, चाप, कवच आदि से युवत दिव्य 
रथ भेजा है । अब आप कौशिक की आज्ञा के अनुसार इस वच्च-कवच को धारण कीजिए 
ओर इस दिव्य रथ पर आरूढ होकर इन आयुधो से उस दुर्मदाध राक्षस का सामना करके 
उसपर विजय प्राप्त कीजिए । पूवंकाल में मेरे सारथी के रूप में रहते हुए इंद्र ने समस्त 
दानवों को जीत लिया था । तब राम ने विभीषण से परामर्श करने के पवचात्‌ उस रथ 
की परिक्रमा की और अपने शरीर की उज्ज्वल काति को चौदहो भुवनो में आकाश तक 
व्याप्त हुए वानरों के जय-निनादों के बीच, उस रथ पर ऐसे आसूढ हुए, जैसे कमल-व्थु 
(सूर्य) उदयाद्वि पर आरूढ होता हैँ । उस समय समस्त आकाश हिलने लगा और शरत्‌- 
कालीन मेघ एवं सध्या के मेघो की समता करनेवाले गरुड, उरग तथा देवताओ के विमानों 
से सारा आकाश भर गया । इस दृश्य को देखने के लिए एकत्र सुर, खेचर तथा किन्नर 
अत्यत हर्ष तथा भय से अभिभूत हो कंहने लगे--'राम-रावण का यह द्वद्व दो पर्वतो का 
दद्ध है । ये समुद्रयुगल हे, पावकद्दय हे, आकाशद्बय है । आज ये दोनो आपस में भिड 
रहे हे । यह समान जोडी है । न जाने क्‍या होगा ।” विजय की आकाक्षा एवं विजय की 
उत्कट अभिलाषा से राम तथा रावण एक दूसरे से भिड गये । तब समस्त जग कपित हुआ, 
पहाड प्रकपित हुए, दोनो ओर की सेनाएँ आकपित हुई, उनकी दृष्टि-रपी वच्ञपात से 
विजलियाँ पिसकर आकाश में बिखर गई, दोनो पक्षो की सेनाओं के सिंहनाद से स्वर्ग 
आदि लोक क्ष्व्ध हो उठे । वे दोनों प्रवीण घनुर्धर, अन्योन्‍्य विजय की इच्छा रखते हुए 
अपने रथो को विविध रीतियो से चलाते हुए, सूर्य तथा अग्नि-सम प्रचंड, वज्ञ के समान 
तीक्षण शरो को करो, कठो, पाद््वों, स्कधो, वक्षो, ललाटो, जाँघों तथा पसलियों पर 
चलाकर एक दूसरे को पीडित करने लगे । वे दोनों आपस में भिडते, एक दूसरे पर रोब 
जमाते, वाणो से युद्ध करते । उस समय उनकी चाल-ढाल, पराक्रम एवं साहस देखकर 
आइचये होता था । वें दोनो सफल पराक्रमी वीर जब एक ही समय में वाण चलाने 
लगते, तब यह जानना असभव हो जाता कि कब वें तरकस में रखें तीरों को निकालने 
के लिए अपने हाथ फैलाते, कब शरो को धनुष पर चढातें, कब धनुप की प्रत्यचा खीचतें, 
कव लक्ष्य साधते और वाण छोडते । उन दोनों के द्वारा बेग से चलाये जानेबवाले भयकर 
वाणो को गिनना तो असभव ही हो गया, कितु यह कहना भी असत्य नहीं हैं कि उनके बाण 
प्रचड कोदण्ड-रूपी रवि-मडल से निकलनेवाले चचल किरणों के समान एक के पीछे एफ 
चलते थे । धनुर्विद्या में पारगत तथा अक्षय तूणीरो में सपन्न वे दोनो वीर एक शर फ्े 
पीछे दस शर, दस को बदले सौ शर, सौ के बदले सहख्र घर, सहखे के बदले दस सहल 
शर, दस सहुस्न के बदले एक लाख शर, एक लाख के बदले एक वरोउ अतिथर चलाते थे 
भर सभी शर एक ही समय में राम-रावण पर लग जाते थे । 


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986 रंग्रनाथे रॉयायरी 


१४०, रास का रावण के वांणों का प्रतिवाण चलानां ेु 

तव देवताओं के झत्र्‌ रावण ने अपने घनुष की डोरी को खीचकर शीघ्र गति सें 
देव तया गघर्वों के वाण चलाये । उनके आने का ढग देखकर समस्त अस्त्रो के ज्ञाता 
राम ने विना विलव किये, देव तथा गधर्व-बाणो को चलाकर उन्हें दुकडे-टुकडे कर दिया । तव 
क्रोवोन्‍न्नत्त हो. रावण ने राम पर राक्षस-वाण चलाया । वह वाण उभरी हुई आँखें, दी 
दष्ट्र, खुरदरे, छोटे तया घूँघराले केश तथा विशालकाय दानवों का रूप घरकर आगे 
वढा । यह देखकर रघुकुलाघीश ने रोप से वंण्णवास्त्र का प्रयोग किया और जिस प्रकार 
सूर्य की काति अधकार को नणष्ठ करती है, वैसे ही उसने राक्षस-बाण के प्रताप को नष्ट 
कर दिया । तब रावण ने नागास्त्र का सघान करके चलाया । उसको चलाते ही, उस महा 
वाण से दस, वीस, बारह, दो, तेरह, तीन, पद्रह तथा पाँच शिरोवाले भयकर सर्प अपने 
शिरो पर उज्ज्वल कातियुक्त मणियों को धारण किये हुए निकल पड़े । उद्धत गत्ति से 
आनेवाने वे सर्प ऐसे दीख रहे थे, मानो कि सर्प-सेना राम पर इस विचार से आक्रमण करने के 
लिए निकली हो कि राम गरुडबाहन हूँ । अपनी अत्युज्ज्वल ज्वालाओो को समस्त आकाश 
में व्याप्त करते हुए आनेवाले उन सर्पों को देखकर राम ने गारुडास्त्र चलाया । तब उससे 
गरुड के आकारवाले असस्य वाण निकले और अपने पख्तो की फडफडाहट से उत्पन्न वाबु से 
पर्वतो को भी हिलाते हुए वें आगे बढ़े और बीच में ही उन नाग्रवाणों को तोड़ डाला । 
यह देखकर देवता आकाश से हर्ष-निनाद करने लगे । 

उसके पद्चात्‌ राघव ने छुद्ध होकर दैत्यराज पर अग्नि-वाण चलाया ॥ वह बाण, 
घूम एवं स्फुलियो से दिशाओ को जलाते हुए, अपनी ज्वालाओ को चारो ओर व्याप्त करते 
हुए रावण पर आक्रमण करने चला, तो रावण ने भयंकर वारुणास्त्र चलाया | तव उस 
अस्त्र ने समस्त आकाश में घनघोर वादल व्याप्त कर दिया और घोर जल-वृष्टि करके 
अग्निन्वाण के प्रताप को नप्ट करके भयकर गर्जव किया । तब राम ने उस शर पर 
वायव्यास्त्र चलाकर उसकी शक्ति को नष्ट कर दिया । तब उस राक्षस ने गजमुखास्त्र 
का प्रयोग किया । उस अस्त्र के प्रयोग से असख्य गज-समूह अपने गंड-स्थलो से मद-जल 
की घाराएँ वहाते हुए, राम पर आक्रमण करने चले । तब राम ने नुसिहास्त्र चलाया । 
उस वाण से असख्य सिंह बादलों को समूह के समान अपने घोर गर्जनो से दिग्गजों को 
विचलित करते हुए, अपने कुलिग-तम नखो से हाथियो के कुभस्थलो को चीरते हुए उन्हें 
मार डाला | तव दंवताओं ने राघव की प्रशसा की । 


१४१ रावण का रास पर शूल् चलाना 
तब रावण ने कुद्ध होकर प्रलय-क्राल की अग्ति-ज्वालाओ को उगलनेवाला, सभस्त- 
लोक-मयकर घूल उठाबा और अपने सिहनाद से पृथ्वी को कॉपाते हुए, समुद्रो को क्षुव्ध 
करते हुए, समस्त दिशाओं को गुजायमान करते हुए, सभी भूतो को भयभीत करते हुए 
कहने लगा--हे राम, इस झूल की अग्नि से में तुम्हें और तुम्हारे भाई को भस्म कर 
दूगा और जिन वीरो ने युद्ध में तुम्हारा सामना करके स्वर्ग को प्राप्त किया हैं, 
उनकी पत्नियों की अश्रुधारा को रोक दूगा / इस प्रकार, कहते हुए राम पर उसने वह 


ईद्धकांड 89 
शूंल चलाया । तब राम ने प्रलय-काल की अग्नि पर वर्षा करनेवाले इद्र की भाँति अद्भुत 
तथा पैने बाणों की वर्षा की, किंतु उन वाणों से रावण का बूल नष्ट नहीं हुआ ! वह 
शूल उन सभी बाणों को खडित करते हुए राम की ओर बढने लगा । तब राम ने देवेंद्र 
की भेजी हुई शक्ति लेकर उस पर चलाया । तब उस शक्ति ने घटिकाओ का रव करते 
हुए, अग्नि-ज्वालाओजो को उगलते हुए, यक्ष, देवता तथा खेचरो को आनद देते हुए, राक्षस- 
लोक को भयभीत करते हुए, मन तथा वायू के वेग से आतनेवाले रावण के शूल को भस्म 
कर दिया । तब रावण ने कुद्ध होकर अपने दोनो हाथो में दस धनुष धारण करके भयकर 
गर्जन करते हुए राम को शर-वर्षा में डुवो दिया । किंतु राम ने अपने एक ही कोदड से 
उसके सभी शरो को काट डाला । तब रावण ने मद, मात्सयं, अभिमान एवं हठ के साथ 
आँखो से अग्नि की वर्षा करते हुए, रघुराम पर घोर शर-वृष्टि की । उससे सतुष्ट न 
होकर उसने दस बाणों से मातलि को तथा दस और वाणों से अश्वो को सन्नाहीन कर 
दिया और एक विषम अस्त्र को चलाकर रथ की ध्वजा को काट डाला । वानर तथा 
देवता विपुल चिता के भार से विवश-से हो गये । समस्त भुवन भीत हो गया, वुध (ग्रह) 
रोहिणी में पहुंचकर पीडा पहुँचाने लगा । अपने महान्‌ तेज से भय उत्पन्न करते हुए 
मगल ग्रह विशाखा में पहुँच गया । चचल एवं भयकर गति से समुद्र उमडने लगे, उत्तुग 
लहरें आकाश को छूने लगी । वाडवाग्नि की लपटें घुएँ के समान ऊपर उठने लगी । 
सूथेविम्ब से टकराती हुई उल्काएँ भयकर दीप्ति के साथ गिरने लगी । सूर्य भी तेजोहीन 
होकर क्षीण प्रकाश से चमकने लगा । 


१४२. अगस्त्य के द्वारा राम को आदित्यहृदय का उपदेश 

मैनाक की भांति अविचल होकर दशकठ जब बडे चेग से बाणो को चलाने लगा, तब राघव 
सभ्रमित हो देखने लगे । तब अगस्त्य मुनि वहाँ आये और रास को देखकर कहने लगे-- 
“हे राप्त, हे महावाहुबली, युद्ध में अवश्य विजय दिलानेवाली, गोपनीय आदित्यहृदय' 
नामक मत्र का आप भक्ति-भाव से अनुष्ठान कौजिए । उस महामत्र के जप से आप अवश्य 
शत्रुओं को जीत सकेंगे । इतना ही नहीं, वह आयु को बढाता है, दुख का दमन करता है 
और समस्त कल्याण का कारण वनता है । हे समस्त सुरासुरो के वद्य, कमल-वधु सूर्य की 
पूजा आपको करनी चाहिए । यही इस ससार के नेत्र-समान हैँ और अपनी किरणों के 
द्वारा समस्त ससार में विचरण करता है । ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने ब्रह्म-कल्प के प्रारभ 
में सूर्य का रूप घारण किया था, इसलिए आपको उचित है कि सूर्य को समस्त देवताओो 
का प्राण मानें । जो व्यक्ति इस कमल-वधु की स्तुति करता है, उसे युद्ध में अवश्य विजय 
मिलती है ।” 

, इतना कहकर अगस्त्य मुनि अपने आश्रम को लौट गये । राम ने बडी भक्ति के 
साथ सर्य-मत्न का जप किया और महोन्नत शक्ति से विलसित होते हुए, रावण का मौद्धत्य 
देखकर क्रोव से अपनी आँखों से अग्नि उगलने लगे । उनकी भौहें तन गई और 
उन्होने रावण के रथ में जुते हुए भयकर अश्वों पर श्रेप्ठ वाणों से प्रह्दर किया और तीन 
दारो से रावण के ललाट पर प्रहार करके उसे रक्‍्त-सिक्‍त्र कर दिया । रकक्‍त-सित्त अगो से 

४६ 


२४४२ रंग्नीप सयायरो 


यक्‍त लंकेश्वर तब ऐसा दीखने लगा, मानों रामचद्र के शर-हूपी वसत के आगमन के 
प्रभाव से विकसित तरुण, अरुण अशोक वृक्ष हों । तब राक्षसपत्ति ने रोष से राम के 
विशाल वक्ष पर एक सहस्न वाण चलाये । वें वाण काकुत्स्थ-वबणज के शरीर में प्रवश 
करके आउञ्चर्यजनक रीति से उनके गरीर के पार निकल गये और पृथ्वी में घेंसकर पाताल 
प्रवेश कर गये, मानों वे बता रहे हो कि अधम राक्षस के द्वारा प्रयुक्त हो, देवताओं के 
दुर्भाग्य से विचलित न होकर अपनी विषम शक्ति को प्रकट करते हुए, निर्मल गुणों से रहित हो, 
घर्म-मार्ग को तजकर, अपने ओऔद्धत्य से राघव को दु.ख देनेवाले वाण अधघोगति के 
'सिवा सदगति कौसे प्राप्त कर सकते हूँ ? क्षतों से बहनेवाले रक्त से राघव लयपथ हो 
गये और प्रलय-काल की भीषण अग्नि-ज्वालाओ की भाँति जलते हुए, आँखों से निकलनेवाले 
अग्निकणों को आकाच्-भर में व्याप्त करते हुए प्रलय के समय जहाँ-तहाँ विचरनेवाले यम 
को समान भयकर तेज से युक्त हो, प्रचड मात्तिण्ड-मण्डल की किरणों के समान तेजस्वी शर- 
समूह को चलाकर रावण के गर्व, मद तथा शक्ति का नाथ करते हुए उसका सारा शरीर 
ऐसा जजेर कर दिया कि वह निदचेष्ट-ला रह गया । रघुराम के वाणों के वेंग को 
देखकर रावण निर्वेद से अभिभूत होकर खडा रह गया । * 


१४३, राम-रावण का परस्पर देाषारेपण 


, तब प्रताप-भास्कर राघव ने दशकठ को देखकर कहा---'क्यो रे रावण, निर्वेद से 
चेष्टाहीन होकर तू ऐसे क्‍यों खडा है ? तू तो कहता था कि में कभी हारूँगा नही । वें 
दर्प-पूर्ण वचन अब कहाँ गये ? रे दशकठ अपने भाई कुबेर का अपमान करके, एक 
पराये व्यक्ति की तरह उसका पुष्पक विमान ले जाना और वन में हमें घोखा देकर सीता 
को चुराकर ले आना, क्या ये सव वीरोचित काये हे ? क्‍या, इन्ही कार्यो पर तू गर्व 
करता था ? अपने पूर्व जन्म के पापो के कारण तू मेरे दृष्टिपय में पड गया है । अब में 
तेरा सहार किये विना कंसे छोड दू ? में न तुझे छोडगा और न तेरी लका को छोड'गा, 

चाहें हरिहर और ब्रह्मा ही तेरी सहायता करने के लिए क्यो न बावें, फिर भी मेँ युद्ध में 
तेरा वध अवश्य करूँगा, तुके कदापि छोडगा नहीं । रे रावण, आज मे तेरा रकत- 
मास समस्त भूतो को खिलाऊंगा । तू क्र है, अति कामातुर है, दुष्ट-बुद्धि है, और देवताओं 
का द्रोही है, इसलिए तू युद्ध-भूमि से भाग भी जायगा, तो भी तेरा पीछा करके तेरा सहार 
करना मेरे लिए महान्‌ पुण्य का कार्य होगा । तेरी मृत्यु अब तेरे निकट आ पहुँची है, 
इसलिए तुमे ऐसी बातें कहने से कोई प्रयोजन नहीं है । आज मे तेरे पराक्रम, वाहुबल 
तथा वैमव को समाप्त करूँगा । क्‍या, तू नहीं जानता कि मेने तेरे भाई भुवत-मयक॑र खर 
नामक देत्य का सहार किया है । और एक वात में तुमसे कहँ, तू यदि आज भी जानकी 
'को मुझे लौटाकर मेरी शरण माँगो, तो में तेरी रक्षा करूँगा । इसमें सदेह मत कर 
यदि युद्ध करेगा, तो तेरी विजय असभव हैं और पराजय निर्चित हैं। (ब्रह्मा के) वर 
प्रताप से तूने दीर्घ आयु पाई हुँ, कई प्रकार की मायाओ को जानता हूँ | भयकर युद्ध 
'अस्त्रास्त्र रखता हैं और इद्रादि समस्त दिक्पयालों तथा तीनो भुवनों को तूने जीत लिया 
एसे वीर का व आज में अवश्य करूँगा ।” 


| 
के 
के 

। 


. रुद्धकीड 9३ 


रघुराम की ये वातें रावण को अग्नि-ज्वालाओ के, समान जलाने लगी। तब दश- 
कठ क्रोधोन्मत्त हो रघुराम से कहने लगा--कदाचित्‌ तुम इस बात के कारण फूल रहें 
हो कि तुमने कुछ क्षुद्र राक्षतों का सहार किया हैं । तुम मुझे नहीं जानते । मेरी: शक्ति 
का परिचय तुम्हें नही हैँ । में ने स्वर्ग के निवासी यक्ष, गधर्व, देवता तथा दिकपालों का 
अपमान करके उन्हें परास्त किया हैं और बडी निरकुशता के साथ राज्य करता रहा ॥ 
ऐसे बल-पराक्रम से सपन्न मे तुम्हारी परवाह करूँगा ? जबतक मे तुम्हें और तुम्हारे 
भाई का युद्ध में सहार करके उस दृश्य को जी भरकर नहीं देखूगा, तबतक में लका में 
प्रवेश नहीं करूँगा ।! ऐसा कहकर रावण ने प्रलय-काल की अग्नि के समान जलनेवालें 
असख्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र राम पर चलाये । तब राम ने क्रुद्ध होकर एक श्रतिवाण छोडा। 
उसके पश्चात्‌ उन्होने बडे हुं से उन दिव्यास्त्रो का स्मरण किया, जिन्हें विश्वामित्र ने 
ताडका के वध के दिन दिया था । स्मरण करते ही वे सभी दिव्यास्त्र स्फुलिंगो को विकीर्ण 
करते हुए उनके समक्ष साकार होकर उपस्थित हो गये । तब राम ने उन दिव्यास्त्रो का 
समुचित रीति से सधान किया और दार्यें-वार्यें इस प्रकार चलाया, जैसे पर्वत पर विजलियों 
की वर्षा होती है । इससे भी तुप्त न होकर राम ने अपनी उद्धत शक्ति का प्रदर्शन करते 
हुए ऐसी बाण-बृष्टि की कि दशकठ दृष्टि से भी ओकल हो गया । 


१४४. रावण की मूर्च्छा 


राम के दरों के आघात से आहत हो रावण रथ परही मूच्छित होकर गिर पडा । 
यह देखकर कालकेतु भयाकुल हो उस रथ को युद्ध-भूमि के बाहर ले गया | इससे देखकर 
देवता ह॒र्ष-निताद करने लगे और वानर-समूह उत्साह से सिंह-गर्जत करने लगा । थोडी देर 
के परचात्‌ राक्षसराज की मूर्च्छा दूर हुई । वह रण-विक्रम का प्रदर्शन करते हुए रथ पर 
खडे हुए अपने सारथी से कहा--क्यों रे, तुमने ऐसा अपराध क्‍यों किया ? युद्ध-भूमि से 
तुम रथ को इतनी दूर क्यो ले आये ? मेरी कीत्ति को कलकित करते हुए तुमने राम को 
हँसने का अवसर्‌ क्‍यों दिया ?” तब सारथी ने कहा--हे देव, परास्त होने पर या शत्रु 
से मिलने पर मुझे रथ को युद्ध-भूमि से बाहर नहीं लाना चाहिए । रथी को सकट में 
देखकर ही रथ को युद्ध-भूमि से लौटा ले जाना सारथी का रण-घर्म हैँ । इसलिए में, 
आपको यहाँ ले आया हूँ।' तब रावण ने उसके विवेक की प्रशसा करते हुए बडे हर मे 
साथ उसे उचित भेंट दी और उसको देखकर कहा--वह देखो, राम अब भी रण के मध्य 
खडा हूँ । उसके रथ को निकट हमारा रथ ले चलो । तब कालकंतु ने बडे वेग से रथ 
चलाकर उसे राम के रथ के आगे प्रतिष्ठित किया । दशकठ के रथ को उद्धत वेग से 
आते हुए देखकर राम ने मातलि से कहा--रावण का रथ आ रहा हैँ | तुम मेरा रथ 
शोघ्र उसके निकट ले चलो । दृष्टि को चचल किये विना, तीत्र वाणों के भय से विचलित 
हुए बिना, वागडोर को अच्छी तरह सभाले हुए अब्बों को हाँको । हे मातलि, घोडो का 
मन तुम जानते हो । ऐसा सारथ्य करो कि रथ का वेग विचित्र दिखाई पडें | कोई ऐसी 
वात नही, जो तुम नहीं जानते । में भौर तुम्हें क्‍या कहें ?” तब मातलि ने अपना रख 
विपरीत मागं से रावण के रथ के पास ले गया । तव लोककटक तथा तीनों लोकों को 


है 
के 


2:05 एनाथ रएयरवण 


भयभीत करनेवाले रावण ने पृथ्वी को कॉपातें हुए अद्भुत अस्त्र चलाकर रथ को ढक-सा 
दिया, सारथी को व्याकुल कर दिया, अच्वों को गक्तिहीन कर दिया और एक प्रचंड बाण 
चलाकर राघव का धनुष तोड दिया और कई बाणो से राघव को भी पीडित किया । तब 
कद होकर राम ने भयकर रूप घारण करके देवेंद्र के द्वारा भेजें हुए धनुष को संभाला 
और उसकी प्र॒त्यचा के ठकार से ब्रह्माड को विदीर्ण करते हुए दानवो के गर्वाबचकार का 
नाश करने के निमित्त सूर्य-सम भास्वर सैकडो, सहस्तो, लाखो, करोडों तथा अरवो की 
संख्या में गर रावण पर चलायें । वे वाण कदाचित्‌ यह सोचकर उसके शरीर को पार कर 
जाते थे कि यह महान्‌ पापी है, क्र है, चचल है, मायावी है, धर्मवद्ध रहनेवाले हमें इसके 
शरीर में नहीं रहता चाहिए | कुछ वाण कदाचित्‌ यह सोचकर आकाश की ओर, पृथ्वी 
की ओर और लका की ओर जाने लगे, मानो वे यह समाचार पृथ्वी को देवताओं तथा 
सीता को सूनाने जा रहें है कि अब अधिक विलव नहीं हैं, रावण अब मरनेवाला ही है, 
तुम अब व्याकुल मत होओ । अग्नि की प्रभा के समान दीप्त होनेवाले राम के वाण 
मूसलावार वर्षा की भाँति रावण पर गिरने लगे, फिर भी रावण अविचल रहते हुए प्रचंड 
दरो से राम के वाणों को काटने लगा । इस प्रकार, विशाल वाहुबल तथा रण-कौशल से 
युक्त वें दोनो पराक्रमी समान सत्त्व, समान वेग, समान वाण-सपत्ति, समान रण-कौशल से 
युक्त हो, भिड गये, और वधन से मुक्त क्रोध से भरें सिहो की भाँति, सात दिन तथा 
सात रात तक बविराम युद्ध करते रहे । उस समय रावण के रथ पर मेघ रकक्‍त की वर्षा 
करने लगे, रथ के अश्वों की पूछो से अग्ति-कण निकलने लगे, सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न 
कातियो में दीप्त होने लगी । रावण को देखकर समस्त भूत कहने लगे---जवब तुम वच 
नही सकोगें, आज अवश्य मरोगे । आकाशवाणी हुई--हे राघव, आप विजयी होगे ।॥' 

अपनी पराजय को सूचित करनेवाले दु शकुनो को देखकर रावण नें विजय की जाशा 
छोड़ दी। फिर भी, वडे साहस के साथ राघव पर निशित वाण, करवाल, गदाएँ, शूल, 
परिघ, शक्ति आदि चलाकर उन्हें कप्ट पहुँचाने लगा । कितु राम ने वच्च-सम तथा प्रचंड 
प्रलयार्नि की समता करनेवाले बद्धं-चद्रासत्र चलाकर उन्हें वीच में ही खडित कर दिया । 
रावण ने अत्यंत भयकर रूप से भीषण वाणो की वर्षा की, तो राघव ने बद्ध-चद्र बाणों से 
उन्हें काट डाला । 


इस प्रकार, विजय की आकाक्षा करके दोनो वीर बडी घीरता के साथ परस्पर 
युद्ध करते रहे । तव वानर एवं राक्षस-सैनिक अपने-अपने अस्त्र सेमाले हुए रण-विचक्षण 
राम-रावण का युद्ध-कौशल देखते हुणए चित्रलिखित की भाँति युद्ध भूलकर 
खडे रहे । अपनी पराजय को निशचत जानते हुए भी रावण और अपनी विजय निश्चित 
जानते हुए राम, दोचो बडी तत्परता के साथ क्षण-क्षण आगे बढते हुए, उत्साह के साथ 
युद्ध करने लगे । उसी समय कोब से अपनी आँखों से अग्नि-कणों की वर्षा करते हुए 
राम ने एक पैने बद्धें-चद्र बाण से रावण के रथ की घ्वजा को काट डाला । तब रावण ने 
भी अत्यधिक रोष से घोर वाणों का सवान करके, राम के रथ के अदवों तथा मातलि 
पर चलाया । किंतु वें उन वाणों से आहत होकर भी कमल-तालो से आहत व्यक्तियों के 


खुद्धकांड &&५ 
समान विना हिले-डुले निश्वल खडे रहें । तब वानर अट्ृहास करते हुए रावण पर पिल 
पडे । रावण ने अपनी माया से उस वानर-सेना पर महान्‌ शस्त्रो की वृष्टि की | उस 
बाण-वृष्टि से वानर-वीर भयभीत हो उठे। तब राम ने रावण पर, उसके सारथी, रथ तथा 
रथ के अइवों पर असख्य बाण चलाकर उसे व्याकुल कर दिया । दशकठ ने भी दाशरथि 
पर वाणों की वृष्टि की । तब राम ने अद्वितीय ढग से भयकर वाणो का सधान किया 
और उनसे समस्त आकाश तथा पृथ्वी को ढक दिया । महेंद्र पर्वत तथा मदराचल के समान 
घैयें रखनेवाले वे दोनो वीर, युद्धभूमि में स्थिर होकर इस प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे 
नभ के साथ नम, समुद्र के साथ समुद्र युद्ध करते हो और “रामरावणयोर्युद्ध रामरावणयो- 
रिव' वाली उक्ति को चरितार्थ करने लगे । तब मेघ-गर्जन के समान धनुष की ध्वनि, 
प्रचड शरों के परस्पर टकराने की ध्वनि, युद्ध के समय सुताई पडनेवाले भयकर गर्जन, 
रथो के चलने से उत्पन्न होनेवाली विपुल ध्वनि तथा घोडो की हिनहिनाहट आदि की 
सम्मिलित ध्वनि से समुद्र आलोडित हुए, उल्काएँ गिरने लगी, दिशाएँ कप्रित हो उठी, 
पृथ्वी हिल उठी, समस्त लोक चकरा गये, पर्वत काँप उठे, दिग्गज चकराने लगे, देवता 
आनदित हो उठे, समस्त भूत त्रसत हो उठे और आदिशेष विचलित हो उठा। इस प्रकार, 
अत्यधिक वीरता के साथ लडते-लडते उन दोनो की वाहुओ का दर्पष कुछ गिथिल हुआ, 
उनकी प्रचडता कुछ कम हुई, और थोडी देर तक अपने-अपने धनुष का सधान करना 
छोडकर वे एक दूसरे को देखने लगे । चचल फूत्कार, श्रमजल का प्रवाह, चीत्कार आदि 
के पश्चात्‌ उनकी थकावट आधी घडी में ही दूर हो गई । 


१४४. राम का रावण के कर-चरणों को खंडित करना 


तुरत वे फिर रणोत्साह से दीप्त हो उठे और प्रलय-क्राल के यम की भाँति भयकर 
रूप धारण करके महान्‌ साहस के साथ रावण से भिड गये। राम ने तब प्रलय-काल के 
रुद्र के समान भयकर दीखते हुए घोर तथा पैनी कत्तंरी, आरा तथा भाला को चलाकर ड्स 
दशकठ के दसो सिर और वींसो वाहुओ को एक साथ ही काट डाला। सब लोग आइचय- 
चकित होकर देखने लगे । कितु दूसरे ही क्षण करवाल, मूसल, मुद्गर, शर, चाप तथा 
केयूरो से युक्त बीस बाहुएँ तथा महान्‌ मुकुटों से अलकृत दसो सिर ऐसे उग आये कि 
राम भी इसे देख चकित होकर कहने लगें--'मेरा काटना ही भूठ था । इस पर कुद्ध 
होकर दाशरथि ने पुन उसके सिर और हाथ काट डाले । किंतु जितने वेग से राम उसके 
सिर काट देते, उतने ही वेग के साथ उसके सिर उग आते थे । सिर के मुकुंटो पर बाणों 
के लगने की ध्वनि कानो में पडने के पहले ही नये उगे हुए सिरो से निकलनेवाला भयकर 
अट्टहास कानों में सुनाई पडता था । रावण के कटे हुए सिरो के स्थान पर तुरत जमे 
सिर उग आते थे और कटे हुए सिरो में राम के वाण गडे हुए रह जाते थे, तो ऐसा 
लगता था कि मानो रावण ने ब्रह्मा से, केक कठ पर सिरो के उग आने का ही वर नहीं 
प्राप्त किया था, वल्कि शरों में भी सिरो के उग आने का वर प्राप्त किया था । उसके 
सिरो का कटना, कटे हुए सिरो का बाण के साथ ऊपर उठना, फिर नये जा आाये हुए 
सिरो को वाणों से काटना, ये सभी व्यापार एक के वाद एक इतनी शीघ्र गति से चलने में 


दश4्‌ रंगनतशथ एयायए 


कि दर्गक चकित रह जाते थे बौर ऐसा लगता था, मानों सौरभनयुक्त राम-बाण-हुपी 
उत्पलों के साथ रावण के सिर-रूपी कमल-समृह को मिलाकर, रक्त-बारा-रूपी सूत्र में 
माला गथकर, स्त्रग का माली बार-बार देवताओं को मालाएँ समर्पित कर रहा हो 


रघुराम कोंव से व्यग्न हो, अपना रण-कौणल दिखातें हुए, अच्छी तरह लक्ष्य साधकर, 
अपनी दृढ़ मूष्टि के चमत्कार से, रावण के सिर तथा भुजाएँ काटते जाते थे और शीघ्र ही 
वे उन आते थे । जितनी ही जीक्रता से राम उन्हें काटते थे, उतनी ही भीघ्रता से वे उग 
आते थे | राम के अस-समूह से रावण के सिर तथा करो का कट जाना और फिर उनका 
निकल आना इस वेग से होता था कि राक्षसों तथा वानरो को इसका पता भी नही लगता था। 
रघुराम के बरो से कटकर गिरे हुए रावण के सिर न जँँभमाई लेतें थे, न दर्द का 
अनुभव करते थे, न मद पड़ते थे, न जक्तिहीन होते थे, न अपने उल्लास से रहित होते थे, 
न काति-हीन होते थे, न परितप्त होते थे, न पलक मारते थे, न उत्साह खोंते थे, 
और न बपनी ऋुद्ध दृष्टि ही तजते थे । पूर्व की भाँति वही कुद्ध दृष्टि, वे ही तनी हुई 
भौंहें, वही अट्टृहास, वही गजेन, वही वाणी, वही अनुग्रह, वही युद्ध की क्लाति, वहीं बृति, 
और वहीं हुकार ? इनसे रहित एक भी सिर उस रण-भूमि में कटकर गिरे हुए रावण 
के सिरो में नहीं दीखता था। जो अद्ठहास, जो दर्पे और जो रोष-पूर्ण दृष्टि, गिरते हुए सिरो 
में दीखते थे, उसी प्रकार के अट्ठहास, दर्प एवं रोषपूर्ण दृष्टि उगतें हुए सिरो में भी दिखाई 
पडते थे । दानवेंद्र के सिरो तथा बाहुओ से पृथ्वी तथा आकाञ के वीच का भाग भरने 
लगा । यह देखकर राम का क्रोध और भी अधिक वढ गया, वे लगातार वाणो को 
चलाने लगे । तव रावण अपने कटे हुए सिरो तथा वाहुओ को, नये उगे हुए करो से 
उठा-उठाकर क्रोबपूर्ण दृष्टि के साथ बडे वेग से राम पर फेंकने लगा । उसके फेंके हुए 
सिर और भूजाएँ राम पर इस तरह आक्रमण करते हुए जाव पड़ते थे, जैसे कमतीय वानर- 
प्रह के मध्य विलसित कुमुद-बबु, पोटश क्ला-पूर्ण, जगदानददायक रछुराम-ल्पी चंद्र को 
देखकर, चद्र के श्रम में, कमल-समूह (रावण के सिर) राहु-कोटि (रावण की भुजाएँ) से 
युक्‍त हो, परस्पर सहायता करते हुए, एक साथ आकर उन (राम-ल्पी चंद्र) पर आक्रमण 
करते हो ।# सिरो तथा करो का एक साथ आना ऐसा लगता था, मानो राम तथा 
विजय-लक्ष्मी के विवाह के समय देवताओं ने पल्‍लव-रत्न-दर्पण' तोरण सुदर ढंग से 
सजायें हो । कटते हुए सिर एवं विज्ञाल बाहुएँ, वरसनेवाले शर तथा उलूक, -काक आदि 
खग, पृथ्वी को कपित करते हुए गगन-मडल में ऐसे व्याप्त हो गये, मानो यमराज 
की समा का भवकर वितान हो । इस कारण देवताओं को भी यह मालूम नहीं 
होता था कि यह दिन हैं या रात है या सध्या । प्रख्यात घनुषो एवं शरो की दीप्ति 
के कारण भूमि में दिन की भाँति प्रकाञ व्याप्त था । - 
अपनी बक्ति-मर प्रयत्न के पश्चात्‌ भी उस दैत्य को जीतने की किचित्‌ भी आशा 
न देखने के कारण राम शर-सवान का कार्य स्थगित करके वास्वार मन-ही-मन सोचने 
+कमल और राह दोनों चंद्र के शत्रु माने जाते हे, इसलिए दोनों सिलकर राम-रूपी चंद्रसा पर 
आक्रमण कर रहे थे ।--लें० 


“ झुंछुकाडेंए 8580 


लगे क्रि अविराम गति से इस राक्षस का सिर काटते-काटते तग आ गया हूँ," बाहुओ को काठते- 
'काटते ऊब गया हूँ, वक्ष स्थल पर बाण चलाते-चलातें थक गया हूँ, बिना रुके शर-प्रहार 
'करते-करते क्‍्लात हो “गया हें, फिर भी यह दुष्ट मरता नहीं है ।' अब इस दुरात्मा को 
कैसे मारूँ ? ऐसे उत्साह-शिथिल होनेवाले राम को देखकर विभीषण ने' कहा--हे सूर्य- 
कुलाघीश, ब्रह्मा के वर से, इसकी नाभि में कुडलाकार में अमृत रहता है" । उस अमृत 
का प्रभाव उसे मरने नहीं देता । आप भले ही असख्य बार उसके सिर तथा वाहुओ को 
कार्टे, वे पुन-पुन. उगते ही रहेंगे । उनका उन्मूलन नहीं होगा। यही कारण है 'कि 
दानवेंद्र विचलित नही होता । आप इस प्रकार लगातार उसके सिरो एव बाहुओ को कबतक 
काटते जायेंगे ”? इसका अत, है! नहीं होगा, अत आप आग्नेय शर चलाइए । इससे 
उसके नाभि-विवर में स्थित अमृत सूख जायगा । तब राक्षसराज स्वय परास्त हो जायगा। 
आपके द्वारा चलाये जानेवाले वाणों से रावण के हाथ और सिर युद्ध में एक सौ नौ बार 
'उग आयेंगे और उसके बाद उसकी मृत्यू होगी । 


१४६. आग्नेय अस्त्र के प्रयोग से राम का रावण को शक्तिहीन कर देना 


तब राम ने विभीषण की विनय, नीति, ज्ञान; स्वामिभक्तति, श्रद्धा तथा पवित्र 
भावों को देखकर उसकी प्रशसा की । उसके पद्चातृ्‌ उन्होने अपने धनुष की प्रत्यचा की 
ऐसी ध्वनि की कि देवता हर्षित हुए, रावण विचलित हुआ और गगा आदि नदियाँ क्षुब्ध हुई। 
फिर, उन्होने प्रज्वलित वच्चो की वर्षा करनेवाले आग्नेय अस्त्र का सधान करके 
चलाया । रावण की नाभि में स्थित अमृत को उस शर की अग्नि में आहुति दी और एक 
सौ नौ बार रावण के सिरो तथा बाहुओ को काट डाला । उसके पद्चात्‌ राम ने एक 
सो दसवी बार एक अनुपम बाण चलाकर उसके एक सिर तथा दो बाहुओ को छोड शछोपष 
शिरो तथा बाहुओ को काट डाला । यह देखकर देवता हर्षोन्मित्त हो उठे और वानर हर्प- 
निनाद करने लगे । सिरो के कटने पर, रक्‍त-धाराओ के पृथ्वी पर गिरते समय, रावण 
ऐसा दीख रहा था, मानो प्रलयाग्नि, सभी लोको को जलाकर अपनी लाल लपटो से युक्त 
हो जल रही हो । सारे शरीर से रक्‍त की धाराएँ छूट रही थी । उस समय रावण के 
शरीर पर स्थित एक सिर ऐसा दीखता था, भानो अस्ताचल पर स्थित हो सूर्य-विव अरुण 
आतप की कातियो को विकीर्ण कर रहा हैं । 

तब विभीषण को देखकर रावण ने अत्यत क्रोधावेश से कहा--इसीने राम को 
मेरा वह रहस्य बता दिया, जिसे अबतक कोई नहीं जानता था । इसलिए अब में पहले 
इसीका वध करूँगा ।/ इस प्रकार कहते हुए रावण ने भयकर शविति को विभीषण पर चलाया, 
तब वह' शक्ति आकाश-मार्ग से अग्नि-ज्वालाएँ उगलतो हुई आनेघाली प्रलयानल की भाँति 
विभीषण की ओर आने लगी । तुरत राम ने अविचल भाव से घोर बाण चलाकर बीच 
में ही उसे काट डाला । रघुराम की अविराम शर्-यवृष्टि से राक्षस की क्रोघारित जैसे 
नष्ट हो जाती है, वैसे ही उसके शरीरस्थ तेज भी अद्भुत गति से तिरोहित हो गया । एक सिर 
'तथा दो वाहुओ को छोडकर रावण के शेष सिर एवं भुजाएँ कट गर्ड थी । बीर रस के 
महान्‌ प्रवाह की भांति स्रवित होनेवाली रवत-घाराओं से वह सना हुआ था। फिर सी, 


89८ रंगर्ना।थे एयायकी 

उसने बड़े दर्प से रण-भूमि में रक्त से भीगकर पडें हुए अपने सिरो तथा बाहुदडो को 
निहारा, उनपर चोच मारनेवाले पक्षी-समूह को देखा, फिर राम की ओर दृष्टि दोड़ाई । 
तव उसने कंश सोचने से क्रद्ध हो वधनो को तोडकर मुक्त होनेवालें सिंह के समान गर्जन 
किया, दाँतो को उसाडने से कुद्ध होकर आक्रमण करवेवाले उम्र-साँप की भाँति, मूछो 
को खीचने से खीजकर दड देने के लिए उद्यत यम को भाँति तथा सारे ससार को एक 
साथ निगल जानेवाले के समान क्रोध से उन्मत्त हो, रावण ने भयकर रूप घारण किया । 
फिर, अपनी पहले की सभी बाहुओ की शक्ति अपनी बची हुई दोनो बाहुओ में संचित 
करके भयकर अट्टहास किया, और अविराम गति से बरछा, तोमर, शूल, परशु, खड़्ग, शर, 
भाला, शक्ति, गदा आदि चलाते हुए राम को विविध प्रकार से कष्ट दिया, गौर ऐसे 
आइचर्यजनक साहस को साथ भयंकर युद्ध करने लगा कि देवता भी भयातुर हो उठे । 
शक्ति, गर्व एवं यत्न के साथ युद्ध करनेवाले रावण को देखकर मातलि ने भयाकुल हो, राम से 
कहा-- हे देव, अव विलम्व क्यो ? इसके सिर और भूजाएँ कही फिर उग न आयें । उसके पहले 
ही आप ब्रह्मास्त्र चलाकर इस नीच का सहार कीजिए और अपनी शक्ति का परिचय दीजिए।” 


१४७, ब्रह्मास्त्र से रावण का वध 


मातलि की वारतें सुनकर श्रेष्ठ बलझाली, प्रशसनीय पराक्रमी, बाहुब॒ल-सपन्न राम ने 
सोचा कि ब्रह्मास्त्र को चलाने का यही समय है। फिर, उन्होने पृथ्वी, देवता, तपोधन, 
वेद, वैदिककर्म आदि का स्मरण किया, और अपने प्रताप एवं दर्प को प्रदर्शित करके पृथ्वी 
को कॉपाते हुए घनुष का टकार किया और उस अक्षय ब्रह्मास्त्र का स्मरण किया, जिसे विश्वा- 
मित्र ने अपने यज्ञ के समय राम को प्रदान किया था। फिर, उन्होने अक्षत वेद-मत्रो का 
उच्चारण करके, उस ब्रह्मास्त्र को प्रत्यचा पर चढाया और प्रत्यचा को तानकर वाम चरण 
को आगे रखा और रावण के वक्ष स्थल को लक्ष्य करके वाण चलाया । यह देखकर 
देवेन्द्र आादि देवता फूल उठे । तब वह वाण प्रचण्ड गति से तथा भयकर ज्वालाओ से 
युक्त हो वसुओ को पाद्व-भाग में, आदित्यो को अपने अग्रभाग में, इन्द्र आदि देवताओओ 
को पृष्ठभाग में तथा पृथुल पवन को आगे किये हुए चल पडा । अपने पखो से उज्ज्वल 
तथा दिव्य आभा को व्याप्त -करते हुए अपनी अमोघ महिमा से दीप्त होते हुए, समस्त 
वानरो के अभीष्ट को सफल बनाने के निमित्त वह शर विना रुके आगे बढा और प्रलय- 
काल के मेंघों तथा बच्चो का-सा घोष चारो ओर व्याप्त करके राक्षस-नेताओ को भयभीत 
करते हुए जय-ध्वनियो से आकाश को कपित करते हुए रावण के वक्षः्थल में गड गया, 
उस अस्त्र ने इन्द्र, यम तथा वरुणो के लिए भी अभेद्य उसके (रावण के) मर्मस्थल को 
भेद डाला और उसके प्राण लेकर उसके हृदय को पार करके निकल गया ओर पृथ्वी में इस 
प्रकार गड़ गया, मानो पृथ्वी से कह रहा हो कि जिस पापी ने तुम्हारी पुत्री को बन्दी 
वनाकर बडी नीचता के साथ उन्हें अपनाने का विचार किया था, उसके प्राण मेने हर 
लिये है । फिर, लौटकर उस वाण ने राघव के महिमामय तृणीर में प्रवेश किया, मानो 
ब्रह्म के (पुलस्त्य) पोते का वध करने के पाप से मुक्त होने के लिए कही भी शरण 
न पाकर उसने राघव की चरण ली हो । 


इुद्धका्ड 99९ 
त॑ंब राघव के अस्त्र के आघात से रावण के शरीर से रक्‍त की धाराएँ बहने लगी 
और वज़ाघात से पृथ्वी' पर गिरनेवाले कुलपर्वतो की भाँति रावण पृथ्वी पर गिर पडा । 
उस दैत्य के विशाल शरीर के गिरने से पृथ्वी आइचर्यजनक ढंग से घेंस गई । पर्वत भी 
घेंस गये, दिग्गज दब गये, आदिशेष तथा कूर्म भी खिसक गये। सप्त पातालो के अधिपति 
व्याकुल हो गये । हतशोष दैत्य-वीर भयभीत हुए । वानरो ने सिंहनाद किया, अमर, 
किन्नर, खेचर आदि राम की स्तुति करने लगे । अप्सराओ ने रघराम पर पुष्पवृष्टि की, 
सारे स्व में दिव्य दुदुभियाँ, दिव्य काहल एवं दिव्य शख बजने लगे। झीतल-मद- 
सुगध पवन चलने लगा और दिश्षाएँ निर्मल हो गई । इस प्रकार, सुर, मुनि एवं खेचरो के 
शोक का निवारण करके, समस्त भूमि का भार उतारकर, अपनी इच्छित विजग्न को प्राप्त 
करने के पदचात्‌ प्रभु राम ने अपने हाथ के धनुष की प्रत्यचा को शिथिल किया और 
प्रसन्नचित्त हो. उसे लक्ष्मण को सौपा । समस्त वानर, सभी खेचर, सभी दिक्‍पाल, सारे 
भूपति, समस्त भूत, सभी देवता, सभी गन्धवें, सभी सनन्‍्मुनि, सभी पन्मण, सकल सिद्ध एव 
सभी लोक तब राम की प्रशसा करने लगे । उस समय युद्ध में अन्धकासुर का वध करके 
शोभायमान होनेवाले घूर्जटि (शिवजी) के समान राम, लोकाभिराम, विजयधाम एवं 
नवसुधा-धाम की भाँति सुशोभित हुए । 


१४७८, विमीषण का शोक 


तब विभीषण अत्यधिक शोक से सतप्त होते हुए युद्ध में गिरे हुए अपने अग्रज को 
देखकर बार-बार ऊँचे स्वर में विलाप करने लगा-- हाय, सुरासुरो के लिए भयप्रद, युद्ध- 
भयकर, तुम्हारी ये भुजाएँ आज पक्षियों के वशीभूत हो गई , अत्यन्त कोमल शय्या पर लेटने- 
वाला यह शरीर जाज कठोर यूद्धभूमि पर गिरा हुआ है । शत्रु-छपी अन्धकार के लिए 
बाल-सूर्य की भाँति ये मणिमय किरीट आज मिट्टी में मिल गये ! हे वन्धु ! विक्रम, विनय, 
नय तथा कीत्ति में तुम्हारी समता कोई नहीं कर सकता था । ऐसे तुम, घोर पापो में 
प्रवृत्त होने के कारण क्रूर, पापी एवं उद्धत कहलाने लगे । नीति-च्युत होना बुरा है, यह 
तुमने कभी सोचा ही नहीं । मेरी बातों पर तुमने ध्यान नहीं दिया, प्रशस्त नीति-मार्गे 
को तुम पहचान नहीं सके । जानकी' को राम के सुपुर्द करने के लिए मेने परामर्ण दिया, 
किन्तु तुम ऐसा नहीं कर सके । मेने तुम्हें समकाया था कि तुम राम को साधारण मानव 
मत समझको, किन्तु तुमने मेरी बातो की अवहेलना कर दी । तुम्हारे अभिमान तथा गवे ने 
ही आज तुम्हारी ऐसी दशा कर दी । अब में तुम्हारे लिए कैसे शोक करें ? क्‍या मेने 
तुमसे नही कहा था कि राम के साथ वैर करना उचित नही हैँ, उसे (वैर) छोड दो । हें अनुपम 
नीति-सम्पन्न ! क्या, तुम्हारे जैसे सुकृति के लिए परस्त्री को माता के सदृश नही मानना चाहिए ? 
तुमने उचित-अनुचित का विचार ही नही किया। अन्त में मेरे वचन ही सत्य सिद्ध हुए !” इस 
प्रकार, वह अपने अग्नमज के अपराधों का स्मरण करके वार-वार शोक करने लगा । 

१४९, मृत रावण के निकट मंदोदरी का आना 

तव मदोदरी आदि दनुज-वधुएँ उमडती हुई शोकाग्नि में जलती हुई, अपने मुयों 
तथा छातियो को पीटती हुई तथा उच्च स्वर में रुदन एवं विलाप करनी हुई सका से 

प््छ 


४० रंगनाय रामायण 


युद्ध-भूमि की ओर मन्‍द गति से चल पड़ी । उनके चलते समय, उनके चरणों की अरुर्ण 
कान्ति पृथ्वी पर पड़ रही थी, लड़खडाकर चलने से उनकी मेखलाएँ शिथिल हो रही थी; 
उनकी क्षीण कटियाँ अवश हो भुकी जा रही थी, हृदय के शोक-भार से उनकी 
तनु-लताएँ काँप रही थी; उनके कठ-हार टूठ रहे थे, आँखो से जाँसू का प्रवाह भर 
रहा था, उनके आँचल खिसक रहे थे, वेणियाँ खुलकर पीठ पर डोल रही थी और उनके 
मुख कान्तिहीन हो गये थे । अपनी रुदन-ध्वनि से समस्त आकाश को गुँजाती हुई वे 
युद्ध-मूमि में पहुँची । उस समय वह रण-भूमि टूटे हुए रथ, छिन्न-भिन्न होकर पड़े, हाथी के 
कुभ-स्थल, कटे हुए सिर, पैर एवं शरीर, चूर-चूर बने हुए हाथी के दाँत, कुचले हुए सिर, 
दूटी हुई गदाएँ, चूर्ण बनें हुए कवच, कटे हुए वक्ष, उखड़े हुए मस्तक, फटे हुए कठ, भग्न 
हुए शस्त्र, आँतो की राशियाँ, माँस-खड, मृत पडे हुए गज, खण्डित अइब, पर्वत-श्रुग, एक 
दूसरे पर पड़े हुए घड़, अजस्न वहनेवाली रक्त की नदियों में वहनेवाली हाथी के शुड, 
पर्वतो के नीचे गिरकर दव जाने से निकली हुई आँखोवाले सैनिक तथा कठोर ध्वनि करते 
हुए शवों पर मेडरानेबाले अनेक काक, घृक, कक, गीघ आदि से भरी हुई थी । 


इतना ही नहीं, उस युद्ध-मूमि में अनेक भूतों का सचार होने लगा था । कुछ 
भूत राम के वाणों के आघात से बहनेवाले रकक्‍त-प्रवाह का पान करते हुए उसे सोमपान 
समभकर कभ्ूमते थे । कुछ भूत राम को घोखा देकर सीता को ले आनेवाले राक्षसेन् 
की प्रशसा करते थे, कुछ रावण के दस सिरो एवं बीस हाथो को उसके घड़ में यथा- 
स्थान जोड़कर मृत रावण के शरीर को देखकर कह रहे थे कि हे दैत्येन्द्र, तुम्हारे लिए 
यह अनुचित है, तुम सीता को राम के सुपुदें कर दो । कुछ भूत वाचरो के शरीर में 
प्रविष्ट होकर, वानर वनकर हाथी के धडो को ले बाते और रक्त-समुद्र में डालकर बडे 
यत्न से सेतु बाँघने में तत्पर दिखाई देते थे । कोई भूत कहता--में नारायण हूँ । तुम 
देवता हो, तुम राक्षस हो । फिर, वे हाथी के घड पर आँतो को वासुकि के समान लपेटते 
ओऔर उस घड को रक़्त-समुद्र में डालकर मथने लगते ( मानो वे समुद्र-मथन की पुनरा- 
वृत्ति कर रहे हो)। कुछ भूत इन्द्र की ओर देखकर हँसते हुए कहते---हमारे राम के 
वाणो से अच्छी तरह मथे हुए मास को लेकर उसके बदले हमें स्वर्ग क्यो नहीं देते ? 
क्यो बकरी के थोडे मास-खण्डो के बदले स्वर्ग देते हो ?” * कुछ भूत यह कहते हुए नाच रहे थे 
कि शक्ति-सपन्न कुमार एवं तारकासुर की युद्ध-भूमि भी हमने देखी थी, भीषण गति 
से युद्ध करनेवाले शिवजी तथा अन्धकासुर की रण-मूमि भी हमने देखी थी, इन्द्र तथा 
वृत्रासुर का रण-क्षेत्र भी हमने देखा था, किन्तु इतने मास-खण्ड, इतने घड, ऐसा रकक्‍त- 
प्रवाह ऐसी विविध स्वादिष्ठ वस्तुएँ हमने अवतक कभी नही देखी । कुछ भूत रवि-कुला- 
विप राम के विक्रम की भूरि-भूरि प्रशसा करते थे, कुछ भूत कहते थे कि 'राम का 
विक्रम भी क्‍या, हमारी प्रशसा के योग्य हैँ ? इसने तो युद्ध में उस दशकठ का वध 
कर डाला, जो भयंकर युद्ध करके, श्रेष्ठ रक्त-मांस आंदि से हमें तुष्ट किया करता था, 

कयज्ञ के समय इन्द्र को बकरी के मांस की जो वलि दी जाती है, उसी की ओर 
संकेत हे । 


ह खुद्धकोंड 94९ 


अब हमें वह भाग्य कहाँ मिलेगा ? कुछ भूत ऊँचे ध्वज-दण्डो को खडा करके, उनमें आँतो 
के भूले डालकर बडे मोद से अपनी स्त्रियों के साथ उनपर भूलतें हुए सरस आनन्द का 
अनुभव करते, कुछ भूत हड्डियों तथा शरो को एक ओर हटाकर, एक विज्ञाल स्थान वना 
लेते और अपने प्रिय जनो तथा प्रेमिकाओ के साथ आराम से बैठकर रक्‍तपान करते हुए 
आनदित होते थे और सतुष्ट हो आशीर्वाद देते थे कि सीता के साथ राम सुखी रहें । 
ऐसे भूत-समूह से भरे, भयकर दिखाई देनेवाले उस युद्धक्षेत्र में राक्षस-बबुएँ रोती- 
कलपती तथा बार-बार पति को पुकारती हुई पहुँच गई । वहाँ उन्होने अनुपम रीति से 
व्याप्त राम की शर-चन्द्रिकाओ से व्याकुल होकर वीर-लक्ष्मी के विरह की अग्नि से दग्ध 
होकर पृथ्वी' पर गिरे हुए दशकठ को देखा । कटी हुई तथा रक्‍त से भीगी हुई उसकी 
विशाल भुजाएँ ही उसके लिए शीतलोपचार के योग्य किसलय-शय्या के समान थी । उसके 
मुकुट की अकलक मणियो की अरुण कान्ति उसके सारे शरीर पर व्याप्त हो घातु के वस्त्रो 
के समान दीप्त हो रही थी । उसके सिर की मज्जा सारे शरीर में व्याप्त होकर चन्दन- 
लेप की भाँति दीख रही थी । (राम के) घोर प्रहारों के फलस्वरूप उसके शरीर-भर में 
व्याप्त अस्थियो का चूर्ण, अनुपम पुष्प-रज के समान दीखता था । टूटकर भुके हुए रथ 
को ताल-सम ऊँची ध्वजाएँ तथा रावण के कोमल एवं विमल दुकूल-खण्ड, (पवन में हिलते 
हुए) भलनेवाले पखो के समान दीखते थे । चारो ओर पृथ्वी पर विकीर्ण हो पडे हुए, 
गज-मुक्ताफल उपचार के निमित्त उपयोग में लाने के पश्चात्‌ बिखरी हुई मल्लिका की 
कलियो के समान दीखते थे । इस प्रकार मृत पडे हुए रावण को देखकर शोक-सागर की 
तरगो में डूबी हुई दानव-वधुएँ दनुजेश्वर के शरीर पर गिर पडी । 


१४०, मन्दोदरी का विलाप 


तब मन्दोदरी पति के मृत शरीर पर गिर पडी और उमडते हुए शोक-सागर को 
पार करने में असमर्थ होकर आँखो से अविराम अश्रु-धारा बहाती हुई बार-बार ऊंचे स्वर 
में यो विलाप करने लगी--'हे राक्षसेश्वर, हे वीरवर, हे रणालकार, हें नाथ, ” फिर 
उसने अपने शोक एवं क्लान्ति को प्रकट करते हुए वार-वार विलाप किया और उसके 
पद्चात्‌ यो कहने लगी--'े लंकेश ! आज सूर्य-रश्मियाँ निदशक होकर आपकी लका में पहुँच 
गई हैँ । इन्द्रादि देवता यह सोचकर आनन्दित हो रहे हूँ कि अब अच्छा अवसर मिल 
गया हैं। आपने इन्द्र को जीता, अग्नि को जीता, यम को जीता, नैक्त को जीता, वरुण 
को परास्त किया, पवन को हराया, कुबेर को जीता और ईशान को भी परास्त किया 
और समस्त लोको पर अपनी प्रभुता जमाई । आप कही भी दुर्वार थे, आपकी यह 
दुर्दशा कैसे हुई ? क्‍या आपसे भी अधिक बलवान कोई उत्पन्न हुआ ? मेने आपसे कहा था 
कि आप राम को सीता लौठा दीजिए, आपका यह कार्य उचित नहीं है, राघव 
स्वय नारायण हूँ, वे नर नहीं हैँ । किन्तु मेरी बातें आपने नहीं सुनी । भला, आपका 
दुर्भाग्य आपको मेरी बातें सुनने क्यो देता ? हे दशकठ, पहले तपस्या करते समय आपने 
अत्यधिक निष्ठा से अपनी इच्द्रियों का दमन किया था । कदाचित्‌ उन्ही इन्द्रियों ने सीता 
को ले आने के लिए आपको प्रेरित किया और युद्ध में सूर्यवशज (राम) से आपका वध 


6श्‌र एंगनाएथ एगपायण ह 


कराया । देवताओं के लिए दुर्भाद्य इस लका में हनुमान्‌ ने अकेले प्रवेश किया । विना 
प्रयास के समुद्र पर सेतु बाँधना क्‍या वानरो के लिए सभव था ? मेने उसी समय कहा था 
कि ये देवता हे (वानर नहीं )। जनस्थान में राम ने अकेले अपने बाहुबल से खर- 
दूषण जादि अनेक राक्षसों का सहार किया था । उस दिन से आपको देखकर और राम 
का स्मरण करके में भयभीत होती रहती थी । वह मेरा भय आज पूर्णतया सत्य सिद्ध 
हुआ । सारा ससार उसी दिन जान गया कि धर्मंपरायणा अरुधती से, निर्मेल-मति-सपन्न 
रोहिणी से, अत्यधिक उज्ज्वलगुणवती भूदेवी से भी अधिक सहनशील एवं पुण्य-साध्वी 
जानकी को जिस दिव आप ले आये, उसी दित आप उस देवी की क्ोघागर्नि से कुलस गये। 
जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, वह अवश्य ही वैसा फल पाता हैं। अत्यन्त नीति-सम्पन्न 
विभीषण पुण्यात्मा है, इसीलिए वह अतुल सुख को प्राप्त कर सका । समस्त लोको को 
पीडित करनेवाले आप पापात्मा की ऐसी दुर्दशा हुई । सीता देवी से भी अधिक सोभाग्य- 
सपन्न कितनी ही सुन्दर कामिनियाँ हैँ ? किन्तु काम-रूप अन्चकार ने आपके नयनो को 
ढक लिया था, इसलिए आप उन्हें पहचान नहीं पाये थे । कुल, रूप, दाक्षिण्य, गुण एव कला 
में वेदेही किसी भी प्रकार मेरी समता नहीं कर सकती । में नहीं कह सकती थी कि वह 
आपकी दुष्टि में मुझसे श्रेष्ठ दीख पडी या मेरे समान दीख पडी । यह सत्य हैं कि जीवो 
की मृत्यु, किसी-त-किसी निमित्त से होती हैँ | दूर की मृत्यू को समीप लाने के सम्रान 
आप वैदेही को ले आये । भाग्यवती सीता ने पति से मिलकर योग्य सुख को प्राप्त किया। 
है नाथ, मुझ अभागिन की ओर निहारिए, में दुख-समुद्र में डव रही हें । आपके साथ 
पुष्पक विमान पर आरूढ हो मेने मदराचल, धवलगिरि, कनकाद्रि, विशाल नन्‍्दनवन आदि 
स्थानों में बडे उल्लास से लीला-विहार किया था । हाय ! वे सभी विनोद मुझे सालने के 
मिस मेरे प्राण ले रहे हूँ । हें नाथ, में गे करती थी कि मेरे पिता मय हे, मेरे पति 
रावण हे, और मेरा पुत्र, युद्ध-प्रेमी इन्रजीत हे । किन्तु में जानती नही थी कि युद्ध में 
राम-भूपाल के हाथो से आपका वध हो जायगा । वच्ज-पात से गिरकर नष्ट होनेवाले 
पर्वत की भाँति आप चूर-चूर होकर पृथ्वी पर गिर पडे हे । आप मूुत्यु के लिए मृत्यु 
समान थे, पर आज पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु के वश में हो गये । आप शत्रु-स्त्रियों को 
वैधव्य देते थे, आज आपकी पत्नियों को उसका फल मिल गया ।” 


इस श्रकार, रोती, विलाप करती हुई मदोदरी, कभी असुरेन्द्र का मुख देखकर उसका 
वर्णन करती, कभी आँसू गिराती, कभी अपनी गोद में रावण का सिर रख लेती, कभी 
अपने अश्रु-जल से रावण के मुख की धूलि घोती, कभी खिन्न होती, कभी रावण का हाथ 
अपने अरुण हाथो में ले लेती | वह इस तरह फूट-फूटकर रोने लगती कि शोकतप्त हृदय 
फट जाय । वह अपने प्राणेश्वर का सिर वायें हाथ में उठाकर थाम लेती । उसे देखकर 
अपना सिर केपाती । दाहिना हाथ पृथ्वी पर फटकारकर कहती--हाय तुम चल बसे।' 
कभी कहती--राम-भूपाल क्‍या ऐसा भी करते हे । अब में क्‍या करूँ ?” कभी छटपटाकर 
पृथ्वी पर लोटती और अपनी दीन दशशा का विचार करके अत्यन्त दुखी होती । 


जझपनी भाभी को अनन्त शोकागिनि में इस प्रकार दग्ध होते देखकर विभीषण उसके 


खछ्धकांड 8९३ 
चरणो पर गिरा और उमडते हुए शोक से कहने लगा--हे साध्वी, अत्यधिक वेग से 
उमडनेवाला रावण-रूपी समुद्र रघुराम की वाणारिति में सूख गया है । राधघव-रूपी प्रलय- 
मारुत ने रावण-रूपी सरस पारिजात को गिरा दिया हैं। राघव-लपी भयकर दावानल ने 
दरशानन-रूपी कानन को भस्म कर दिया हूँ । राघव-हूपी पश्चिम समुद्र में रावण-रूपी 
दिवाकर अस्त हो गया हैं । राघव-रूपी अमोघ नील मेघ की शसनृष्टि ने रावण-रूपी 


अग्नि को बुझा दिया हैँ ।' 
१४१, राम का विमीषण के द्वारा रावण की अंत्येप्टि कराना 


इस प्रकार, विविध रीतियो से शोक-स्न्तप्त होनेवाले विभीषण को देखकर काकुत्स्थ ने 
कहा---हे विभीषण, अब इन स्त्रियों का दु.ख दूर करो और तुम भी अब शोक करना छोड दो। 
युद्ध में घूर, शत्रुओं पर आक्रमण करके उनके हाथो से मरते हे और जझत्रुओ को 
मारते हे । समर में दोनो पक्षों की विजय तो होती नही, न जय-पराजय ही स्थिर वस्तु हें । 
रावण ने समस्त देवताओ को जीत लिया था, सभी दिक्पालो पर विजय प्राप्त की थी। 
यह एकाकी वीर है, महान्‌ साहसी है, अद्वितीय विजयी है और तिलोक-भयकर हूँ । 
मेने तो देखा ही है कि तुम्हारे अग्रज ने रण में कैसी शक्ति दिखाई थी। कौन ऐसा है, 
जो इस प्रकार अविचल युद्ध कर सकता हैँ ? कौन ऐसा है, जो अन्त में ऐसी मृत्यु को 
प्राप्त करेगा । ऐसी शक्ति तथा ऐसी मृत्यु दूसरों के लिए असम्भव हैँ । हे अनघ, तुम्हारा 
अग्रज कइृतार्थ हुआ । अब शोक करने की आवश्यकता नही है ! इसलिए अब घैयें धारण 
किये हुए इस दनुजेश्वर की अत्येप्टि-क्रिया का प्रवन्ध करो ।' 

तब भयभीत हो विभीषण ने अत्यन्त भक्ति के साथ हाथ जोडकर कहा--हैे देव, 
अब इसके लिए क्रिया-कर्म की क्‍या आवश्यकता हैं ? यह मेरा अग्नज ही कहाँ हैं ? यह 
तो मेरा शत्र हैं। आपकी पत्नी को यह क्र, नीच एव दुष्ट यहाँ हर लाया था, अब इसके 
लिए क्रिया-कर्म कैसा ? पर-वधुओं का स्पशे-मात्र करनेवाले पुरुष अधोगति को 
प्राप्त होते हे। ऐसे लोगो का स्पर्श करना भी उचित नहीं हूँ । उनको देखना भी 
नही चाहिए। इस पापी को में छू भी नहीं सकता। यह वंदिक कर्म के लिए योग्य 
नही है ।' 

विभीवण की इन वातो पर मन-द्वीमन विचार करने के पदचात्‌ राघव ने विभीषण 
को देखकर कहा--हे अनघ, तुम्हारी बातें सच हे, किल्तु अब दनुजेश्वर की निन्‍्दा नहीं 
करनी चाहिए। उसने युद्ध-रूपी गगा-प्रवाह में अपने सभी पापों को घो दिया है । मेरे 
सभी कार्य सम्पन्न हो गये । मृत्यु के पदचात्‌ वैर रखना उचित नही हैं । अत, तुम निष्ठा 
के साथ रावण की अन्त्येप्टि-क्रिया करो ।” तव विभीषण ने उनका आदेश स्वीकार करके 
वेद-विधियों का अनुसरण करते हुए अग्नि-त्रय को मेंगाया और एकनिप्ठ हो अपने अग्रज 
का जग्नि-सस्कार किया । उसके पद्चात्‌ बडी श्रद्धा से उसकी अत्येप्टि-फ्रिया पूरी की । 
क्रिया-कर्म से निवृत्त होने के पश्चात्‌ उसने आकर रामचन्द्र के चरणों में प्रणाम किया । 
तब उस विमलात्मा को देखकर राम ने मिप्ट भाषण से उसका आदर किया और दयाई 
हो उसे सात्वना दी । 


&49 रंगनायथ एया्यणग |" 


* १४२. विमीषण का राजतिलक 

तत्पश्चात्‌ राम ने अपने अनुज को देखकर अनुपम करुणाद्न॑ चित्त से कहा--हें 
लक्ष्मण, तुम लंका में प्रवेश करके इस पुण्यात्मा विभीषण का राजतिलक सपन्न करके 
आओ ॥ रामानुज बड़ी प्रीति के साथ लंका में गये; वानर-श्रेष्ठो को भेजकर समुद्र-जल 
मेंगाया । राक्षस-पुरोहितों तथा सज्जन मत्रियो को बुलवा भेजा और मंगल-वाद्यों के विपुल 
नाद के बीच, विभीषण को अभिषिकत किया और मंगलोपचार के साथ उसे सिंहासन पर 
आसीन किया । इस प्रकार, बड़े हर्ष के साथ उसे लंका का राजा बनाकर लक्ष्मण ने 
जाशीर्वाद दिया कि 'जवतक रवि-चन्द्र, पृथ्वी, कुलपर्वत, आकाश-समुद्र और सभी दिशाएँ रहेंगी, 
जवतक राघव का कीत्ति-गान इस पृथ्वी पर होता रहेगा, तवतक तुम इस राज्य पर 
शासन करते रहो । राक्षस-राज्य का वहन करना और उसका सचालन करना दुर्लभ काय॑ हूँ । 
अतः, तुम सावधान होकर इसका सचालन करो भर शाइवत धर्म का पालन करो ।' 
तव विभीषण विशाल राज्य-प्राप्ति के आनन्द में इतराते हुए मगल-द्वव्य, आभूषण, वस्त्र 
एवं अमूल्य मणिसमूह साथ लिये हुए लक्ष्मण के साथ राम की सेवा में उपस्थित हुआ 
भमौर उन वस्तुओं को राम के चरणों में समर्पित करके बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम किया । 
रघुराम ने वे वस्तुएँ मातलि को भेंट के रूप [में दी और बड़ी प्रीति से उसे 
विदा दिया । मातलि ने रथ पर आएरूढ हो वेंग के साथ स्वर्ग की ओर प्रस्थातव किया । 
उसके पद्चात्‌ राम ने मन में विचार करके मारुति को देखकर कहा--तुम शीघ्र लंका में 
प्रवेश करके जानकी को हमारी विजय तथा कुशल का वृत्तांत सुनाओ ।॥* 


१४३, हनुमान्‌ का सीता को रास की विजय का समाचार देनो 
राम का आदेश पाकर हनुमान्‌ अत्यन्त हर्षित हुआ जौर बडें वेग से लंका में प्रवेश 
किया । राम की विजय की मन-ही-मन कामना करती हुई, अशोक-वन में बैठी 
राम की पत्नी को देखकर हनुमान्‌ ने उनको प्रणाम किया और अत्यन्त विनय से कहा--है कल्याणी, 
में आ गया हें और आपके लिए हर्ष का समाचार लाया हूँ। जो जाप चाहती थी, वही हुआ । 
हैं देवी, आपके पति राम देव ने लोक-भयंकर रावण का सहार किया और अनेक 
दुष्ट राक्षतों का नाश करते हुए अद्भुत रीति से युद्ध किया । वें जब अपने अनुज सोमित्र 
के साथ सकुदल है । इसके पश्चात्‌ उसने उस साध्वी की चिन्ता को दूर करते हुए, 
इसके पहले कहें गये वचनो का स्मरण दिलातें हुए कहा--हे कल्याणी, मेने आप से, पहले 
ही निवेदन किया था कि आप के पति समुद्र पर सेतु बाँघेंगे,,लंका पर आक्रमण करेंगे, 
लौर रावण का संहार करके आपको अपनायेंगे । वें वचन आज सत्य हो गये हैं । अब में 
जापकी आज्ञा चाहता ।[हें । मेरे योग्य सेवा का आदेश दीजिए ।' 
तव पवन-पुत्र को देखकर तथा रावण का मरण और रघुराम की विजय को 
सोचकर हर्ष के साथ वे वोली---हे अनघ, तुम्हारे प्रताप की सहायता से ही राम मूपाल ने 
यह कार्य संपन्न किया हैं| दैत्यो के गर्वान्चकार से आवृत इस लंका में प्रवेश करके इसे 
साधना, दूसरों के लिए कहाँ सभव था ? तुम्हारे धैर्य, गभीरता, महान्‌ झ्यौयें, माधुये एवं 
सद्गुणों की महिमा की प्रशंसा कैसे करें ? तुम्हारे शील एवं पराक्रम की सराहना में कैसे करू ? 


अद्गैँकाड 9५4 


अंसंसुय, नवार्भेरण, श्रेष्ठ वस्त्र, स्वर्ग और रत्नों से युक्त राज्य तुम्हें भेंट दू', तो भी 
वह तुम्हारे वीरतापूर्ण कार्यों के लिए अल्प ही होगे । हे पवनपुत्र, तुम्हारे कार्य से में 
अपने मन में बहुत सतुष्ट हूँ ॥* , 

सीता की बातें सुनकर हनुमान्‌ अत्यत हषे से कहने लगा--हे माता | आप मुझपर 
इतनी करुणा-पूर्ण दृष्टि रखती हे और मेरा इतना आदर करती हे, यही मेरे लिए पर्याप्त हे । 
सच तो यह है कि (आपका आदर प्राप्त करना ) इन्द्रपद या किसी दूसरी वस्तु 
से भी महान्‌ है । तब भूमिसुता ने हनुमान्‌ को देखकर कहा--हें अनघ ! तुम्हें बल, 
शौये, पराक्रम, अपार तेज, क्षमा, ज्ञान, उदारता, स्थैयं, सतत निरचल स्वामिभक्ति, विनय 
आदि विश्वुत गृण प्राप्त हो । इसके पश्चात्‌ हनुमान्‌ ने उस देवी के निकट रहनेवाली 
भयकर आकारवाली राक्षसियो को देखकर कहा--डउस पापात्मा की आज्ञा का पालन करती 
हुईं ये पापी स्त्रिय़ाँ कदाचित्‌ आपको हानि पहुँचायेंगी । में अभी इन्हें अपनी कठोर मुप्टि- 
प्रहार से मार डालता हूँ ।! तब जानकी ने हनुमान्‌ को देखकर कहा--बाण चलानेवाले के 
रहते हुए भला बाण को दोषी ठहराना क्‍या उचित हूँ ? दासियो का वध करना कदापि 
उचित नहीं । मेने अपने पापों के फलस्वरूप यह सब विपत्ति पाईं । इसके लिए ये कंसे 
दोषी हो सकती हे ? हे प्रण्यचरित, महान्‌ व्यक्ति पापियों पर भी दया दिखाते हे 4 


ब्ध 


अत हे वानरोत्तम, इन राक्षसियों का मारना तुम्हारे लिए उचित नहीं हैं । तब हनुमान्‌ ने 
कहा--हे देवी !” आप निर्मल गुण-रत्नो की निधि है । आप राम की धर्म-पत्नी वनने के 
योग्य हे । अब मुझे राम की सेवा में जाने की आज्ञा दीजिए । तब उस देंवी ने कहा-- 
है वानरोत्तम, अबतक उन्हीं को में अपनी आत्मा मानकर अपने प्राण रोके हुई हूँ । 
अब में उन्हें देखे विना एक क्षण भी नहीं जी सकती । यह बात मेरें ग्रभु को बतलाना । 
अब तुम जाओ ।' इस प्रकार कहने के पद्चात्‌ उन्होने हनुमान्‌ को आश्षीर्वाद दिया । 
हनुमान्‌ ने बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम किया और राम भूपाल के निकट पहुँचकर अत्यत 
विनय से निवेदन किया कि हे देव, मेने आपकी विजय तथा कुशल का वृत्तात देवी सीता 
से निवेदन किया, तो वे बहुत हंषिंत हुई । उन्होने मुझसे कहा कि तुम मेरी ओर से प्रभु 


जे .. 


से निवेदन करना कि में उनके दर्शनो की अभिलाषिणी हूँ । 
१४४, राम के आदेश से विमीषण का सीता को लिवा लाना 


तब राम ने थोडी देर तक मन-ही-मन सोचा और विभीषण को बुलाकर कहा-- 
हैं विभीषण ! तुम शीघ्र जानकी के मगल-स्मान का प्रवन्ध करो और दिव्य वस्थाभरण 
एवं पुष्प-मालाओ से अलकृृत कराके उन्हें यहाँ लिवा लाओ । तब उसने बडें हर से 
जाकर सरमा आदि अपने अन्त पुर की स्त्रियों से सारी वातें समकाकर जानकी को लिवा 
लाने का आदेश दिया । वे भी बडी प्रीति से सीता के पास गई और उन्हें बडी भक्ति 
के साथ प्रणाम करके कहा--हे देवी, आपके पति रास देव ने विभीषण को, आपको 
लिवा लाने की ाज्ञा दी है | इस हेतु उन्होने हमें आपकी सेवा में भेजा है । आप प्रसम 
होकर अभीष्ट मगलदाता राम के समक्ष पघारें | हे सुन्दरी, जाप यह वेश तज दीजिए । 
आप तो शुभ-प्रदायिनी हे ।! एस प्रकार कहने के पश्चात्‌ उन्होंने उनका मंगल-स्नान कराया, 


& ९६ रंगनाथ साया 

उनकी तनुलता को पोछकर दिव्य वस्त्रो से उन्हें सजाया, दिव्य मालाएँ और दिव्य आभूषणों 
से उन्हें अलकृत किया और उसके पदचात्‌ स्वर्ण-पालकी में बिठाकर उन्हें ले चली । तब 
राक्षसेइ१र विभीषण बडी भक्ति के साथ राजचिह्न तथा वेत्र धारण करके अपने-आपको घन्‍न्य 
मानते हुए, एक सेवक के समान प्रमुख राक्षसों के साथ पालकी के आगे-आगे चलने लगा। राम कें 


निवास से थोडी दूर पर पालकी को रोककर विभीषण राम की सेवा में उपस्थित हुआ और 
हाथ जोड़कर नम्नता से बोला-'देव, लिवा लाया हूँ, देवी को ! देवी यहाँ पघारी हुई हे ।' 


तब राम ने अत्यन्त हर्ष, रोष एवं दैन्य से अभिभूत हो, मन में विचार कर 
विभीषण से कहा--लिवा लाओ । तव परम पावन तथा ज्ञानी विभीषण पावन-चरिता स्रीता को 
बड़ी श्रद्धा से लिवा ले चला । उस समय राक्षसों एवं वानरों की भीड (सीता के दर्शनों 
की तीजन्न उत्कठा से) उमड़-उमड़कर मार्ग को रोकने लगी । तब विभीषण निर्देय होकर अपने 
हाथ की वेंत से उत्पर कसकर प्रहार करने लगा । इस कारण से भीड़ में उठनेवाले आात्तें- 
नाद को सुनकर राम ने विभीषण से कहा--हे विभीषण ! ऐसा भयंकर कार्य क्‍या तुम्हारे 
लिए उचित हैं ? अब इनमें से हमारे लिए पराया कौन हैं ” अपनो को इस प्रकार दुख 
क्यो पहुँचाते हो ? उन्हें रोकों मत | सभी लोग आकर देखें । इसमें बरा क्‍या है ? (स्त्री 
के लिए) कालान्तर एवं देशान्तर में नष्ट न होनेवाला एक शील ही गोपन की वस्तु हैं । 
ये विशाल दुर्ग, भवन, पर्दे आदि कभी स्त्रियों के लिए उचित आवरण नहीं हो सकते । 
व्यसनो में, विवाहो में, युद्धो में, मित्रो में और उत्सवो में स्त्रियों के लिए आवरण अनावश्यक है । 
में यहाँ हुँ गौर यह रण-मूमि है । गत, इसमें कोई दोष नही है; उन्हें भाने दो ।' 

तव राम के आदेशानुसार विभीषण सीता को लिवा लाया । उस समय कल्याणी 
सीता का शरीर स्वेद-विन्दुमो से ऐसे आप्लावित हो रहा था, मानो उनके हृदय में उमड़ता 
हुआ आनन्द (हृदय से) छलककर सारे शरीर में व्याप्त हो गया हो | उन्होने राका-शशि 
रामचन्द्र के दर्शनामृत का पान करके चिरविरह्ाग्ति को झान्त किया और परम-अनुरागर से 
भरी हुई अपने मन की उत्कठ इच्छा से प्रेरित हो राघव को देखने लगी । राघव को 
देखते ही उनको घवल-लोचन-उत्पलो से अश्रु्रवाह उमड़ आया। वे भय, प्रीति एवं ब्रीडा 
से अभिभूत होकर सिर भुकाये खड़ी रही । 

तब रघुराम का मन क्रोघावेश से भर गया । उन्होनें उस रमणी को देखकर 
कहा--हे नारी, पुण्यशीला स्त्रियों के लिए लज्जा ही प्राण है | हें लज्जावती, प्रतिष्ठा 
की रक्षा का विचार करके मेने तुम्हें मृततत किया हैं। इसके सिवा मेरे हृदय में तुम्हारे 
प्रति कोई आसक्ति शेष नही हैं। काकृत्स्थ-वशज घैय के धनी होते है, लोक-रक्षण-तत्पर होते हे, 
तया लोक-पअ्रणसा के योग्य होते हे । उनके वश्ञ में जन्म लेकर (यदि में तुम्हें ग्रहण 
करूँ, तो) लोग कहेंगे कि मेने अपने औचित्य को त्याग दिया। जत्रु के घर में रही हुई 
तुम्हारा स्पर्ण करके तुम्हें अपनाना धर्म-सगत नही हो सकता | इस भय से कि लोग यह 
न कह वेठें कि यह अपनी पत्नी को खो बैठा और उसे छुडाकर नहीं ला सका, मेने 
तुम्हें छुठझाया हैँ । इसके सिवा तुम्हें लाने का मेरा कोई दूसरा उद्देश्य नही है । में तुम्हें 
स्वीकार नहीं कर सकता । तुम जहाँ चाहो, जा सकती हो ॥ 


ईछुकाई 28९४ 


राम के इन निष्ठुर वचन-वाणों के लगने से सीता तिलमिला उठी । वह कमलाक्षी 
सद्य प्राप्त आनन्द को भूल गई और अवाक्‌ एवं स्तभित-सी रह गई। क्षोम, दु,ख एवं 
क्रोध से अभिभूत हो, वे रामचन्द्र को देखकर गद्गद कठ से कहने लगी--हे देव, क्या आप 
मेरा हृदय नही जानते ? क्या, आप सर्वज्ञ एव मनीषी नहीं हे ? वाल्यावस्था में आप मुझे 
ले आये और तब से मेरा पालन-मोषण तथा रक्षण करते रहे । आप ऐसे कठोर वचनो से 
मुझे क्‍यों दुखी बना रहे हैँ ? में कहाँ, आप कहाँ और आपके ये वचन कंसे ? मेने भूं- 
माता के गर्भ से जन्म लिया, उसके पदचात्‌ महाराज जनक ने मुझे पाल-पोसकर बडा 
किया, फिर आपजजैसे नृप-शिरोमणि की पत्नी हुईं। क्‍या, न्चल चिक्तवाली स्त्रियों का-्सा 
व्यवहार मेरे लिए कभी सह्य हो सकता है ? पुरुष, अविश्वसनीय स्त्रियों के प्रति जैसे वचन 
कहते हू, वैसे वचन आप मेरे प्रति कह रहे हे । क्‍या, यह आपके लिए उचित है ? यदि 
आपको मुझपर विश्वास नही था, तो जिस दिन मेरा पता जानने के लिए हनुमान्‌ को भेजा था, 
उसी दिन कहला भेजते, तो उसी दिन में अपनी सभी आज्ञाओ को तजकर प्राण 
त्याग देती ।॥' 

इसके पदचात्‌ सीता ने लक्ष्मण को देखकर कहा--हे अनघ, तुम्हारे अग्रज मुझपर 
सदेह करके मेरे प्रति परुष वचन कह रहे हे । कया मेरे प्रति ऐसा व्यवहार उचित है ? 
क्या, ऐसी बातें वे मुझे कह सकते हे ? क्या, तुम्हें: उनसे यह कहना नहीं चाहिए कि ऐसे 
वचन कहना उचित नहीं हैं ? मेरा आचरण देखते हुए, क्‍या, तुम मुझमें किसी पाप का 
अनुमान कर सकते हो ?! 


१४६ सीता का अग्नि-प्रवेश 


वे आगे कहने लगी--अब शका मत करो । तुम भली भाँति विचार करो और 
यदि तुम लोगो का यही निरचय है, तो यहाँ चिता सजाओ । में सबके समक्ष, विना 
विचलित हुए अग्नि में प्रवेश करूँगी । अग्नि के द्वारा में अपनी पवित्रता का प्रमाण दूंगी 
और ब्रह्मादि देवताओं की प्रशसा प्राप्त करते हुए भूमि में प्रवेश कर जाऊँगी ॥' 

तब लक्ष्मण ने बडी व्याकुलता से अपने अग्रज की ओर देखा और उनके मन के 
भावों को समझकर सीता के लिए चिता का प्रवन्ध किया । तव सीता ने बडी भक्ति से 
चिता की परिक्रमा की और उसकी स्तुति करके, उसे प्रणाम किया। फिर, अग्निदेव के 
समक्ष खडे होकर हाथ जोडे हुए वे कहने लगी--हे धर्मादि देवताओं, हे धर्मो, हे निर्मला- 
त्मायो, हे नियतात्माओो, हे जगत्‌ के अधिष्ठाताओ, हे सूर्य-चन्द्भ, हे बेदसाधको, हे वेंदो, 
है महात्माओ, हे सर्वेज्ञो, हे पचभूतो, हे परहितात्माओ, हे श्रेष्ठ नरो, हें श्रेष्ठ किन्नरो, 
हैं सुरवरो, हे भूसुरवरो, हे कृपालुओ, हे दिक्‍्पालो, हे सन्मतियों, हे पापसहारको, मेने 
मन-वचन-कर्म से राजा राम के सिवा और किसी का स्मरण नहीं किया हैं । यदि मेने 
ऐसा किया हो, तो में इस अग्नि का सहन नहीं कर सकूंगी और सब के समक्ष इसी अग्नि 
में भस्म हो जाऊँगी ।! यो कहती हुई सीता ने आकाश तक व्याप्त होनेवाली अनुपम 
आकार की भयकर ज्वालाओ से युक्‍त प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश किया । अग्नि-कुड में 
अविचल खड़ी रहनेवाली सीता किचित्‌ भी नहीं जली । कर-नरण-आनन-झूपी कमल, चच> 

प््ध 


(240० रंगनाथ एरायोॉयर्ी 


वाक-हपी कुच-दय, वाहुलताएँ-हपी मृणाल, विमल त्रिवली-हूपी तरमगें, विशाल एवं चंचल 
नेत्र-ल्पी मत्स्य, सहज नील चिकुर-रूपी जैवाल से युक्त सरोवर की भाँति सुश्रोभित उस 
कमलाकषी को देखकर वानर एवं राक्षस शोक करने लगे । सुर, सिद्ध एव साध्य स्तुति करने लगे । 
पवन-पुत्र, सूर्ये-पुत्र, सौमित्र, विभीषण, अंगद, वानर-सेना, दानव-वीर, साथ ही सरमा 
बादि रानसलघुएँ अत्यधिक जोक से सतप्त हो उठी । राम निर्वेद से अभिभूत हो 
स्थिर रहें । 

तव शिव, ब्रह्मा, जखिल दिकपाल, गरुड़-गधर्व एवं खेचर-श्रेष्ति विमान पर आरूढ 
हों वहाँ आा पहुँचे । राम उन्हें देखकर उनके स्वागतार्थ खड़े हुए । राम को देखकर उन्होने 
कहा--- है देव ! आप वेदान्त के द्वास नेय है, (अखिल ससार के ) साक्षी है, कर्ता है, नाव-स्वरूप हूँ 
मुक्त हे, नित्यपूर्ण हे, सर्वव हे, जगदेकनिधि है, अक्षीण पुण्यात्मा हे, अव्यक्त हे, अक्षर 
त्रिमूत्ति है जौर आद्यत-पति हैँ । भुवन, समुद्र, भूत, नदियाँ, यज्ञ, पर्वत, जन्तु-समूह, वृक्ष, 
मार्ग, तन्‍्त्र, विधियाँ, सुर, सक्षत्र, वेद, गास्त्र आदि सहस्रों, लाखो, करोडो तथा अस्बो 
की सख्या में एक-एक ब्रह्माण्ड में पाये जाते हे, उनकी गणना कोई भी नहीं कर सकता । 
ऐसे असख्य ब्रह्माण्ड जापके उदर में रहते हे | उनकी गणना ही नहीं हो सकती । आपके 
स्वरूप का पार पाना किसके लिए संभव है ? आपकी माया का प्रभाव जानना आपके 
सिवा दूसरों के लिए कहाँ संभव है ? 'जापने अमुक का सहार किया, आपने अमुक को 
जीता, अमुक ने बापको जीता, अमुक आपके अबघीन है, अमुक आपके श्रेष्ठ हे--ऐसी 
निन्‍्दा एवं स्तुति आपका स्पर्श भी नहीं कर सकती । दास-भाव को छोड़कर अन्य किसी 
भी मार्ग से आपके ज्ञान-रूप -का दर्शन -दुर्लभ हे । हें राजनू, आप आदिनारायण हे और 
जानकी आदिलक्मी हैँ | लोक-रक्षणार्थ जाप काकुत्स्थ के रूप में विस्यात हुए है । बाप 
स्वयं अपने को क्यों भूल गये हूँ ? निष्ठुर वह्लि में स्थित जानकी को देखते हुए चुप रहना 
आपके लिए उचित नहीं है । आप उन्हें अपनाइए, प्रीति से आदर कीजिए । उस वनजाक्षी 
की उपेक्षा मत कीजिए ।” 


१५७, सीता-परिग्रहण 

देवताओ ने जब रामचन्द्र को कई रीतियों से समझाया, तब दैत्य तथा कपि परस्पर 
कहने लगें---इस साध्वी के घरीर से न श्रम-विन्दु निकल रहे है, न इनका मुख कुम्हला 
रहा हैं, न इनकी तनुलता सूख रही है, न ये व्याकुल हो रही हैँ, न इनकी घारण की हुई 
पुप्प-मालाएँ मुरकाई हैं और न इनका अगराग ही छुटा हैं । वे सीता को देखकर शोक- 
सत्तप्त होते हुए गद॒गद कठ से कहने लगे--..रामचन्द्र को ऐसी पवित्र पत्नी के प्रत्ति ऐसे 
निप्ठुर वचन नहीं कहना चाहिए । ऐसा साहस उचित नहीं हैँ । उनके इस प्रकार कहते 
समय अस्निदेव कोमलाबी सीता को अपनी गोंद में उठाकर बाहर निकले और उन्हें बडी 
प्रीति से राम के सामने खडा करके कहा--थह कल्याणी मुग्वा है | तुम्ही इसके देवता हो, 
तुम्ही इसके प्राण हो, तुम्ही इसके वन्बु हो और तुम्ही इसके सर्वेस्व हो । तुम्हारे सिवा 
ओर किसी को इसके हृदय में स्थान नहीं हैं । रावण की आज्ञा से कई राक्षस-स्त्रियों ने 
कई प्रकार से इसे पीडित किया, भवकर कृत्यों से इसे डराबा, धमकाया और छल किया ! 


सुछकांड श्र्श्र 


इस पर भी यह साध्वी तुम्हारा विस्मरण नही करती थीं, विचलित नहीं होती थीं, अपना मन 
तुम' पर ही केन्द्रित करके अपना सर्वेस्त्र तुम्हारे विश्वास पर त्यागकर अपना दिन विताती 
रही'। अब प्रीति के साथ इस कमलाक्षी को स्वीकार करो । स्वीकार न करना अवधर्म 
होगा; ।' 
जब अग्निदेव ने इस प्रकार कहा, तब राम ने अपने मन-हीं-मन कुछ देर तक विचार 
किया और फिर शिव, ब्रह्मा, आदि देवताओं की मडली को देखकर इस प्रकार कहने लगे-- 
में जानता हें कि इस रमणी में कोई पाप नहीं है । यह उन्नत विचारवाली रमणी मेरे 
प्रति अकलक निष्ठा रखती आई है, इस सुन्दरी में भय, भक्ति, शील, ज्ञान आदि गुण 
में यह भी जानता, हें कि राक्षस इसे अपने वश में कर नहीं सका। किन्तु, मझे जानर्क 
को ऐसा जआादेश इसलिए देना पडा कि पीछे लोग यह न कहें कि महान पापी तथा 
अत्यधिक बलवान्‌ रावण ने अपने उद्यान में जानकी को रखा था, किन्तु रघुराम उसे चुप- 
चाप ले आये । ऐसा कामुक व्यक्ति इस ससार में और कौन हो सकता है, जो अपने जपयण 
का किचित्‌ भी विचार नहीं करता । अब सभी शकाओ का निर्मूलन हो गया । आपके 
आदेशो का पालन करके में सीता को स्वीकार करता हूँ !! इस प्रकार कहते हुए उन्होंने 
सीता को अपने निकट बुला लिया । उस समय रघुराम सीता के साथ ऐसे शोभित हुए 
जैसे आकाश में रोहिणी से युक्त प्रभा-सपन्न चन्द्र हो । 
तव महादेव ने आश्रित्त-कऋल्पतरु रामचन्द्र को देखकर बडी प्रीति से कहा--हे 
अनघ, ऐसे महत्तर कार्य को साधने के लिए आपके सिवा और कौन उद्यत होगा ? ऐसे 
लोक-कल्याण का कार्य और कौन संपन्न करेगा ” रावण तो लोक-कटक, त्रिलोंक-भयकर, 
देवो की वदना को प्राप्त करनेवाला तथा महा बलझाली था । ऐसे रावण का नाथ करना 
किसी के लिए भी सभव नहीं था । ऐसे व्यक्ति से आपने अत्रुत्व ठाना, उस पर आक्रमण 
किया, उसका सहार किया और उसका दहन-सस्कार करके अपने अनुपम वल तथा विक्रम 
की प्रौदता दिखाई, आपकी समता करनेवाला इस ससार में कौन हो सकता हैँ ? आपने 
रावण का सहार किया और आपके कारण चौदहो भुवनों की रक्षा हुई | इस जोभा को 
देखने के लिए आपके पिता महाराज दशरथ स्वर्ग से आये हूँ । वह देखिए, वे देवताओं के 
आधिपत्य से दीप्त हो विमान पर आत्ढ हैँ । आप उस सत्यनिधि एवं पुण्यात्मा की पूजा 
तथा सत्कार कीजिए । 
१४८, दशरथ के दर्शन 
तव सुशील रघुराम ने अनुजन्युक्त हो, वडे प्रेम, श्रद्धा एवं निप्ठा के साथ महाराज 
को साप्टाग प्रणाम किया। तब महाराज ने बहें फैलाकर बड़े मोद से उन्हें हृदय से जगा 
लिया और राम को देखकर कहा--हे वत्स, कैकेयी की वालें सुनवर तुम जैसे लोब-रक्षण- 
कला-निरत को मंने वन में भेज दिया । मेने बौचित्य का विचार नहीं किया औौर न शूल 
कार्य को पहचान सका । तुम्हारा राजतिलक करके तुमको राज्य बरतें हुए जी भन्‍वदर 
देखने का तथा समस्त ससार को सखी होते देखने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुला । 
पुत्र-शोक से मेने मृत्यु को प्राप्त किया। ऐसे मुझे इन्द्र-लोक में प्रवेश करने वा अधियार गहाँ ? 


8६० रंगनाथ एल्यायण 


कर 


वह दुख सतत प्रज्वलित अग्नि के समान मेरे हृदय में जलता रहता हैं । अमर 
लोक में भी जो अग्नि शमित नहीं हुई, वही आज तुम्हारे समक्ष उपशमित (शान्‍्त) 
हो गई । हे कमलाप्त-सम-तेजस्वी, हे कमलाभिराम, हें कमलाप्तवशज, तुम अयोध्या को लौट 
जाओ और निखिल धर्मों का पालन करते हुए साम्राज्य को ग्रहण करके अक्षय कीत्ति के 
साथ चिर काल तक इस पृथ्वी का ऐसा पालन करो कि प्रजा कहे कि राम लोकाभिराम हे । 

उसके पद्चात्‌ उन्होने लक्ष्मण को देखकर कहा--हे सौमित्र, तुमने राम के साथ 
अरुप्य में घूमते हुए अनेक उत्तम एवं साहसपूर्ण कार्य करके पुण्य प्राप्त किया हैं । भविष्य 
में भी सावधानी के साथ, अपने 'अग्रज के मन को दुखी बनाये विना आचरण करते रहना।' 
तदनतर उन्होंने अपना सिर भुकाकर प्रणाम करके खडी हुई सीता को देखकर कहा--हैं 
पुत्री, परम पवित्र पातिव्रत्य धर्म में तुम्हारी समता कोई स्त्री नही कर सकती। तुम “उत्तम 
साध्वी हो । राम ने तुम्हें जो निष्ठुर वचन कहें, उनके लिए तुम रुष्ट और दूःखी मत 
होना । तुम राघव के समान महान्‌ कीत्तिवान्‌ पुत्रों को प्राप्त करो, पुण्य प्राप्त करते हुए 
जीवन व्यतीत करो । इस प्रकार, तीनो को आश्ञीर्वाद देकर महाराज दशरथ भमन-ही-मन 
सतुष्ट हुए । 

१४९, देवताओं का असिनन्दन 


तब चन्द्रसम शीतल प्रभू राम को देखकर इन्द्र आदि देवताओ ने कहा-- हे प्रुण्यात्मा, 
आपने हमारे निमित्त मनुष्य के रूप में जन्म लिया, राक्षसों का सहार किया, अनेक 
प्रकार के दुखो का सहन किया और भूमि का भार उतारकर हमारी रक्षा की, हमें जीवन- 
दान दिया और हमें ज्ञान्ति प्रदान करके भेज रहे है । हम आपको वर देंगे। आप अपना 
जमीष्ट कहें ।' 

तब राम ने देवताओं को देखकर मदहास करते हुए कहा--आपकी कृपा से इस 
ससार में मेरे सभी कार्य सम्पन्न हो गये । कितने ही वानर, अपना-अपना देश, घर-वार, 
बन्वुजन, पुत्र तथा मित्रों को छोडकर, बडे साहस के साथ, अपने प्राणो की भी परवाह 
किये विना मेरे लिए शत्रुओं के साथ युद्ध करके प्राण खो वैठे है । ये कपि-वीर 
उन्नतात्मा है । उन्हें जीवन प्रदान कीजिए।' तब देवताओ ने कहा-- ऐसा ही हो । ये वानर प्राण 
प्राप्त करेंगे।' इतना कहकर महादेव, ब्रह्म, इन्द्र आदि देवता तथा दिक्पाल, मुनि, सुर समीराम की 
प्रणसा करते हुए स्वर्गेलोक को चले गये । उसके पश्चात्‌ दशरथ भी स्वर्ग को चले गये । 

देवताओ के वर के प्रताप से युद्धभूमि में कटकर गिरे हुए सभी वानर जीवन 
प्राप्त करके ऐसे उठे, मानो वे नीद से जाग रहे हो । फिर, राम को देखकर बडे हर्ष से 
उन्होने प्रणाम किया । तव राम बडी दया से उन सब को निहारकर बहुत प्रसन्न हुए । 

तव॒ विभीषण ने राम को देखकर बडी भक्ति के साथ कहा--हें देव, हे राधघव- 
राज, आपके लका में पधारकर अभिषेक स्वीकार करने का यही उचित समय है । तव 
राघव ने कहा--जटाओ का भार धारण किये हुए तथा वल्कल पहने भरत के (अयोध्या 
में) तप में निरत रहते समय, उसको विना देखे हमारा यहाँ सुख-भोग में तत्पर रहना 


हि. 


अनुचित हूँ ।' 


खुद्धकांड 4९ 
तब विचारवान्‌ विभीपण ने बडी भक्ति से पुण्यात्मा स्त्रियों तथा पुरुषों को, पुण्य 
वाद्यो के साथ भेजकर चन्दन एवं अक्षत-भरे स्वर्णपात्र, रत्ताभरण एवं कनकावर मंगाये 
और अत्यन्त विनय के साथ उन्हें राम-लक्षम्ण तथा सीता को घारण करने के निमित्त 
दिया । तब आकाश से देव-दु दुभियाँ वज उठी, देवता स्तुति करने लगे और अप्सराएँ पृप्प- 
वृष्टि करने लगी । तब राम ने निशचल आनन्द में भरे हुए प्रीति के साथ कहा--हे 
विभीषण हमें और भी कितने ही महान्‌ कार्य करना शेष हैं । हम अब यहाँ विलम्ब नहीं 
कर सकते । हमें शीक्र अयोध्या पहुँचना चाहिए ।' 
१६०, पुष्पक-आरोहण 
तब विभीषण ने राम को देखकर भक्ति से कहा--हे देव, पूर्वकाल में रावण ने 
क्रुद्ध होकर कुबेर के साथ भयकर युद्ध किया था और युद्ध में उसे पराजित करके उसका 
विमान छीन लिया था, वह विमान तैयार है । इच्धलोक के पुष्पक विमान की भाँति यह 
भी अदुभूत वेग से जा सकता हैं, अत आप उस पुष्पक में आरूढ हो, हर्ष के साथ अयोध्या 
लौटें । यही अच्छा होगा ।' 
इस पर राम ने (उसे लाने की) अनुमति दी । तब राक्षसराज अत्यधिक सश्रम 
एवं प्रीति से समस्त वैभवों से विलसित उस पृुष्पक को ले आया । वह पृष्पक अचल 
नवरत्न-दीपो तथा मन्द पवन से युक्‍त था । वे दीप ऐसे दीखते थे, मानो समस्त लोको को 
जला देने की दक्ति रखनेवाले रावण की शक्ति की कल्पना करके अनिल दीपो को हिलाने 
से डरता हो और दीप भी हिलने से डरते हो । उसके विमल द्वारो पर हरित-नील मणियाँ 
ऐसी भासमान हो रही थी, मानो विमान के भीतर सजे हुए पुष्पो का रसपान करने के 
लिए आये हुए भ्रमर भय के कारण भीतर प्रवेश नहीं कर रहे हो | उन नील-मणियों के 
निकेट ही जडी हुई मुक्ता-मणियाँ ऐसी दीख रही थी, मानो पुष्प-वाटिका में मुग्धावस्था 
में रहनेवाली मल्लिका की कलियो को मुग्ध करके उन्हें छोडकर भ्रमर यहाँ चले आये है 
ओर उनके विरह से मल्लिका की कलियाँ यहाँ आकर भूमरों के साथ रहने लगी हो । 
हसो तथा कमलो के चित्र काढे हुए दुकूलो से रचित उसका वितान ऐसा दीख रहा था, 
मानो त्रिभुवन में भ्रमण करने के पदुचात्‌ यहाँ आकर गगा अलसाई हुई लेटी हो । उसके 
उज्ज्वल स्तभो में खचित मणिमय मृत्तियाँ ऐसी दीखती थी, मानो देव-कन्याएँ, यह विचार 
करती हुई कि राम यहाँ कब (इस पुष्पक विमान में) पधारेंगे, हम उन्हें कब देखेंगे, स्तभो 
पर अपनी तनु-लताओं को ठेके हुए प्रतीक्षा कर रही हो । वह विमान ऐसा सुन्दर दीख 
रहा था, मानो समस्त सुष्टि के रक्षणार्थ जब विष्णु राम के रूप में पृथ्वी पर आये, त्तव 
वैकुठ ही पुष्पक के रूप में यहाँ आ गया हो । ऐसे पृुष्पक विमान को देसकर काकृुत्स्थ- 
वशज बडे प्रेम से विभीषण को देखकर और वानरों को लक्ष्य करके कहने लगे--हैं 
विभीषण, ये (वानर) ही रावण-रूपी भयकर अग्नि को बृकानेवाले महान्‌ मेघ-पुज है | 
अत इनका आदर-सत्कार करों तथा विपुल घनन्सपत्ति से इन्हें पुरकृत करो ।॥ तब 
विभीषण ने बडी प्रीति से धन, वस्त्र, योग्य आभूषण तथा स्वर्ण आदि मेंगागर राम के समक्ष 
ही उन वानरो को क्रमण भेंट किये । उसके पदचात्‌ राम ने अपनी पत्नी तथा अनुज के 


ल्क्ष्र रएंगनशायप, एयायर |. ० 


साथ उस पुष्पक की पूजा की और उसकी परिक्रमा करने के बाद बड़े हु से उस विमान 
पर' आरूढ हुए ।* 

तब राम ने सुग्रीवः आदि मित्रो तथा, अन्य वानरों को देखकर कहा--वुम लोगो' ने” 
मित्रता, के नाते: जो कार्य किये, उन्हें देवता भी नहीं कर सकते थे। मेने; तुम्हारे कारणः 
समस्त तेज: समस्त सुख तथा अपार कीत्ति, प्राप्त की । तुम पुण्यात्मा, परम-पावन तथा 
धन्यजीवी: होओगे । अब तुम लोग अपने-अपने देश को लौट जाओ ।॥' तब करपियों ने 
कहा--हें राजनू, हम भी आपकी सेवा करते हुए अयोध्या! जायेंगे, आपका राजतिलक 
देखेंगे और आपके अनुपम चरित्रवान्‌- अनुज भरत-शत्रुध्त को, परम-पावनी आपकी माताओं 
को देखेंगे और आपके नगर तथा गगाजी के दर्शन करके लोटेंगे ।” 

तब राम ने मन-ही-मन हर्षित होते हुए विभीषण, सुग्रीव, अगद, हनुमान, नील 
आदि अनेक महान्‌ वानर-श्रेष्ठो को पुष्पक में चढने की अनुमति दे दी । वे भी बडे उत्साह. 
से पुष्पक में बैठ गये। दनुज-स्त्रियाँ सीता को प्रणाम करके अपने-अपने निवास को ल्ौट.गईं-। 
तब दाशरधि को देखकर विभीषण ने कहा--हे देव, इस पृष्पक की विशेषता यह है 
कि इसमें कितने लोग भी बेठें, सब के लिए तो इसमें स्थान: निकल आयगा, साथ ही 
एक कोने में पाँच सौ लोगो के लिए स्थान वचा रहेगा । तब राम ने बडें हर्ष से असख्य 
वानर एवं राक्षसों को उस- विमान में बैठने की अनुमति दी | इसके परचात्‌ वह पुष्पक 
गगन की ओर उडकर आकाश-मार्ग से, मनोवेग के सदृश वेग से ऐसा. जाने लगा, 
मानो सू्यविस्व पूर्व से पद्चिम को जाना छोड दक्षिण से- उत्तर की जोर जा 
रहा हो । ४ 

१६१ श्रीराम का सीता को विभिन्न इइयों को दिखाकर समझाना 

तब नित्य-पुण्यवानू, राम ने” सीता से कहा--हे शुकबयनी, क्‍्या। तुमने अक लक श्री 
से विलसित इस लका।को देखा ? यह विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हुई हैँ और त्रिकूट पर्व॑त 
के मध्य में स्थित हैं । इस लका का राज्य करने का- भाग्य रावण को नहीं था, इसलिए 
उस दुर्जन का नाश हुआ; । उसके पछचात्‌ राम ने उन्हें रक्त, मास, मज्जा तथा अस्थि- 
खण्डो से परिपूर्ण समर-भूमि को दिखातें हुए कहा--हे- कमलाक्षी, यही पर रावण अपना 
रण-कौशल दिखाते हुए युद्ध करके मारा गया। देखो, वहाँ महान शक्ति-सपन्न -कुभकर्ण 
घोर युद्ध करने के पदचात्‌ हत हुआ '। यहाँ पर प्रहस्त ,नील पर आक्रमण करके नष्ट हुआ। 
यही पर हनुमान्‌ ने महान्‌ बली घूम्राक्ष का सहार किया । उस स्थान पर अजेय हो मेघ- 
नाद ने हमें नाग-पाशों से बाँधा था | वहाँ पर सौमित्र ने अपना शौय तथा शक्ति, दिखाते 
हुए- अतिकाय का वध किया था । यहाँ पर अक्षीण वलशाली मकराक्ष युद्ध करते हुए 
गिरा था । इस स्थान पर शत्रु-दलन तथा अकुठित विक्रमी अग्निवर्ण गिरा । उस स्थान 
पर सौमित्र ने इद्रजीत का सहार किया । हे सरोजाक्षी, इसी स्थान पर अगद ने अनुपम 
वली', अतिकाय का वघः किया था । इसी स्थान पर महोदर तथा महापादव नामक- भयकर 
विक्रमी लडते हुए गिरे थे। यहाँ देवातक एवं नरातक क्ररता से युद्ध करते हुए मारे 
गये थे । 


ईछैक8 #देई 


यह लो, यही पर महान्‌ सेतु है, जिसे हमने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए 
ममुद्र पर जाँघा “था । यही गधमादन नामक पुण्यश्तीर्थ है । यह सदाशिव का सर्वमान्य 
/निवास-स्थान हैं । हे कमलाक्षी, यह जो 'काचनाचल दीख रहा है, वही 'हिरण्यनाभ है । 
है “सुदरी, पवन-पुत्र तुम्हारा अन्वेषण करते हुए «बडे 'वेग से लका की ओर जा रहा था, 
तब उसको आतिथ्य देने के उद्देश्य से यह महान्‌ पर्वत समुद्र से ऊपर निकल आया था । 
जब राम इस प्रकार वर्णन कर ही रहे थे कि -राम ने अपने समक्ष भयकर आकार 
से युक्त रावण का रूप देखा । “उसे देखते ही सशभ्रमचित्त हो राम ने विभीषण से कहा-- 
हें विभीषण, यह कैसा विचित्र है ? में ने अपने प्रचण्ड बाहुबल से-युद्ध-क्षेत्र में दशकठ का 
सहार किया था, -और इसके लिए -ब्रह्म -आदि समस्त देवताओं ने बार-वार मेरी प्रशसा 
भी की थी -। तब फ़िर -आज मेरी आँखो के सामने रावण आकर कंसे खडा हैं ”? इसका 
क्या रहस्य है ?' तब विभीषण ने कहा--हे राजन, ब्रह्मा की सतति में जन्म लिये हुए 
दुर्जेज रावण का आपने वध किया था। अत, आपको ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया है । 
इसलिए कदाचित्‌ रावण आपको दीख पडा है । इस पाप का आयब्चित्त यही करके आगे 
बदना चाहिए । नही तो आगे के कार्य सफल नहीं होगे। अत', आप मन-दही-मन 'ब्रह्मा 
का स्मरण कीजिए । देवताओ के साथ वे बडे हर्ष से आयेंगे और कत्तंव्य का निर्देश करेंगे । 
तब राम ने पुष्पक विमान को पृथ्वी पर उतरवाया और मन-ही-मत बडी श्रद्धा 
से ब्रह्म का स्मरण किया । तुरन्त सभी दिक्‍पालो, मुनियो तथा देवताओ के साथ ब्रह्मा 
वहाँ आये और बडी प्रीति से चोले--हे देव, आपने मुझे किसलिए स्मरण किया है ?' 
तब रघुराम ने अपने देखे हुए रावण के रूप का वृत्तात सुनाया | तब ब्रह्मा विस्मित होकर 
बोले--हे देव, यह दैत्य मेरे तेज से इस पृथ्वी पर पैदा हुआ और इतने घोर पाप किये, 
'फिर भी अन्त में पाप-रहित होकर मरा। इस पृथ्वी पर विप्र अपने वर्णाश्रम धर्म का ज्ञान 
रखते हुए, उसके अनुसार कर्म न करे, उसके विपरीत कर्म करे, अतुल पाप करें, गुए- 
दृषण करे, कुल-अ्रष्ट हो जाय और गो-त्नाह्मण हत्या आदि घोर पाप भी क्यों न करें, 
'फिर भी वह इस पृथ्वी पर वध के योग्य नहीं है । राजा को यही चाहिए कि ऐसे दु्जन, 
क्र एव पापी के वश को निर्मुल कर दे और उसे अपने देश से निर्वासित कर दें । 
है जगदीश, विश्ववसु का पुत्र, अब मोक्षार्थी हो आपके सामने खडा हुआ हैं । उसे सठुप्ट 
कोजिए और एक शुभ लग्न में समुद्र के सेतु पर अपने नाम पर शिव की प्रतिप्ठा कीजिए | 
इसके पश्चात्‌ उसकी विधि बतलाकर ब्रह्मा चले गये । 
- १६२. राम को द्वारा शिवलिंग का प्रतिष्ठापन 
तुरन्त राम ने अपने निकट रहनेवाले पवन-पुत्र को देखकर कहा-+ हे प्रशमनीय 
'बलादय तथा साहसी हनुमान, तुमने हमारा कार्य पूरा करके हमारा उद्धार किया हैँ और 
हमारी कीत्ति को चारो और 'फैलाकर हमें कृतार्थ किया है । विनय, विक्रम, घर्य एव 
'प्रसिद्धि में निखिल लोको में तुम्हारी समता कोई नहीं कर सकता । अभी हमारा एवः और 
कार्य सपन्न करो। हे वानरोत्तम, तुम असख्यफलप्रदायिनी काशी को शीघ्न जाकर चटां से 
'एक शिवलिंग लें आओ ॥ यहाँ से काशी दो सी दस योजन हूर हैं! दो घटा में 


हि 


9६8 रगनायें रायायर्ी 


तुम शिवलिंग को लेकर वापस आबो । कही भी विलम्व किये विना शीघ्र आना । पृथ्वी 
पर मूच्छित होकर गिरे हुए मेरे भाई के लिए तुम तेईस लाख वीस सहद्न और दस योजन 
की दूरी पवन-वेग से पार करके ओपधी-शैल ले आये थे और फिर उसे यथास्थान पहुँचा 
दिया था । यह सारा कार्य तुमने एक बद्ध प्रहर में सपतन्न किया था । यह कार्य तुम्हारे 
लिए कोई बड़ा नहीं है ॥ 

यह सुनकर हनुमान्‌ ने हु से फूलते ह हुए रामचन्द्र को प्रणाम किया और उनकी 
आज्ञा लेकर चल पड़ा । वह तुरन्त महेनद्रावल पर चढकर अपनी सारी शक्ति के साथ 
आकाश की ओर उछलकर आकाथ-मार्ग से काजी नगरी में पहुँच गया । उसने वहाँ पुण्य- 
तरमिणी गगा में स्नान किया, काशी में विलसित परम दयालु भक्तजन-पालक विब्वनाथजी 
के दर्शन करके उनकी स्तुति की । वहाँ से एक शिवलिंग को लेकर हनुमान्‌ तुरन्त अत्यधिक 
वेंग से लौटने लगा 

हनुमान्‌ के आगमन की प्रतीक्षा में बैठे हुए बबु-जन-वदित राम मन-ही-मन सोचने 
लगें--शुम लग्न आसन्न हो रहा है । पता नहीं कि हनुमान्‌ अभी तक क्यो नहीं आया है। 
कदाचित्‌ किसी राक्षस से छेंड़े जाने पर उससे युद्ध कर रहा होगा। न जाने क्‍या वात हुई ?' 
फिर, उन्होंने निर्चय किया--झथुभ मुहत्त के वीतने के पहले ही में एक सैकत 
लिंग बनाकर उसकी प्रतिष्ठा कर दूंगा । ऐसा निरचय करके राम ने एक योग्य स्थल 
को चुनकर वहाँ अपने हाथो से एक सैकत लिंग वबनाया। कमलाक्षी सीता ने पार्वती-नाथ 
के लिंग के ठीक सामने रेत से एक ननन्‍्दी बनाई । उसके पदचात्‌ राम उस लिंग की पूजा 
करने लगे । 

उसी समय वायुपुत्र वायु वेग से वहाँ पहुँचकर रामचन्द्र के चरणों में प्रणाम किया । 
फिर, वह रामचन्द्र द्वारा प्रतिप्ठित शिवलिंग को देखकर खिन्न हुआ । उसका सारा शरीर 
दुःख के आवेश्य से काँपने लगा और गदुगद कठ से वह राम को देखकर वोला-+हे सूर्य- 
वशतिलक, आपकी आज्ना के अनुसार में काशी गया और ब्रह्मा आदि देवताओं के समक्ष 
ही में वहाँ से एक शिवलिंग ले आया हूँ । मुझे भेजकर, मेरे लौटने के पहले ही आपने 
शिवजी का प्रतिष्ठापन सपूर्ण कर दिया। क्‍या, यह आपके लिए उचित था ? हे देव, कंदाचित्‌ 
मे आपके विश्वास के अयोग्य हो गया हूँ, आपके मन में मेरे प्रति प्रेम नही है ।' 
तव राम ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए हनुमान्‌ के देखकर कहा--हे पवन-पुत्र, तुम भी मेरे 
भाइयो में एक हो । मेरा तुम पर अपार स्नेह है | गूम मुहत्त न बीत जाय, यही विचार 
करके मेने रेत से शिवजी का प्रतिप्ठापन किया | इतने में तुम आ गये । मुझे बडी प्रसन्नता हुई। 
अब वुरा ही क्या हूँ ? तुम इस शिवलिंग को हटाकर अपने लाये हुए शिवलिंग का 
प्रतिष्ठापन करो ॥ त़्व वायुपुत्र ने बडे हर्ष से अपनी पूछ से उस शिवलिंग को लपेटा 
और वारस-वार उसे हिलाने का प्रयत्न किया, किन्तु वहू शिवलिंग किचित्‌ भी नहीं हिला। 
हनुमान्‌ू_ मन-ही-मन आशंकित होने लगा। फिर भी, उसने अनेक वार प्रयत्न किया, किन्तु 
उसे हिलाने में अपने को असमर्थ पाकर मन-हींमन चिताकुल हो सोचने लगा--हाय में 
पूर्व में सहज ही द्रोणाचल को उख्ाड़कर ल्ाग्मा था । थिव तथा भूतगण से युक्त कैलास 


छछ्धकांड 9६4 


पर्वत को उठानेवाले रावण भी जब सौमित्र को उठाने में अपने आपको असमर्थ पाया, तब 
मेने सौमित्र को उठाकर इन्द्र आदि देवताओ की प्रशसा प्राप्त की । मेरु तथा मन्दर पव॑तों 
को मेने अपने पैर के अँगूठे से उछालने की शक्ति रखता हूँ । क्‍या आइचय है कि यह 
शिवलिंग मेरे लिए बहुत भारी हो रहा है । कदाचित्‌ मेरी शक्ति ही घट गई है, अथवा 
सूर्यवशज को क्रोध से अपशब्द कहने का पाप मुझे लग गया है या काशी का शिवलिंग यहाँ 
तक ले आने के कारण ही ऐसा हो रहा है । अन्यथा यह कैसे हो सकता हैं कि यह शिव- 
लिंग मेरे लिए भारी पड़ जाय । 


इस प्रकार सोचकर हनुमान्‌ ने अपनी सारी' शक्ति का सचय किया और उस जथिव- 
लिंग को उखाडने का शक्ति-भर प्रयत्न किया, किन्तु वह असफल हुआ । उसकी सारी 
शक्ति जाती रही और वह रक्‍त उगलते हुए मूच्छित हो नीचे गिर पडा। तब राम ने अपने 
दीप्तिमानू एवं कोमल कर-कमल फैलाकर हनुमान्‌ को उठाया । तब उसकी चेतना लौट 
आई और उसने राम को साष्टाग प्रणाम करके कहा--हे सीता के हृदय-क्मल-पद्चरण, 
आपकी जय हो । हे घोर कुटिल-राक्षस-समूह-सहारक, आपकी जय हो । हे शिव के उद्ृण्ड- 
कोदण्ड-भजक, आपकी जय हो। हे बाणागिनि से समुद्र को सोखनेवाले वीर, आपकी जय हो । 
है रावण-रूपी उन्नत शैल के लिए अमरेन्द्र-स्वरूप, आपकी जय हो। हे भक्तवत्सल ! 
आपकी जय हो। हे निर्मलात्मा, सज्जन-कल्पतरु, शतकोटि सूर्य-सम तेजस्वी, आपकी जय हो | 
आपकी महिंमा महेंश्वर, इन्द्र, नाग्रेन्र तथा वागीश, इनमें कोई भी जान नहीं सकते । 
तव भला मेरी शक्ति ही क्‍या है कि में आपकी महिमा जानू ? आपके द्वारा प्रतिष्ठित 
शिवलिंग को अबोध की भाँति उखाडने का प्रयत्न करके मैने जो अपराध किया है, उसे आप 
क्षमा कीजिए और आपकी आज्ञा के अनुसार मेरे द्वारा लाये गये इस शिवलिंग की ग्रथोचित 
व्यवस्था कीजिए ।” 

इस प्रकार अत्यन्त भक्ति से स्तुति करनेवाले हनुमान्‌ को देखकर राघव ने कहा-- 
है पवनपुत्र, तुम मन-ही-मन ऐसे क्यो दुखी होते हो ? तुम अपने लाये हुए लिंग को 
यही पर प्रतिष्ठित करो । इस पृथ्वी के लोग पहले उसी शिव की पूजा करेंगे, उसके 
पदचात्‌, मेरे द्वारा प्रतिष्ठित ईइ्वर की अर्चना करेंगे । जो भक्त जाहूनवी का पुण्य-सलिल 
ले आकर उससे तुम्हारे लाये हुए शिवलिंग का अभिषेक करेंगे, उनके किये हुए ब्रह्म-हत्या 
आदि पाप नष्ट हो जायेंगे, उनकी कीत्ति शाशवत होगी, अनुपम पृत्र-यौन्नों की वृद्धि उन्हें प्राप्त होगी 
और वे अनुपम सपत्ति प्राप्त करेंगे।” यह सुनकर हनुमान्‌ अत्यन्त हर्पित एवं सतुष्ट हुआ | 

उसके पद्चात्‌ राम ने काशी-लिंग को वहाँ प्रतिप्ठित किया और पहले उसी लिंग 
की पोडशोपचार पूजा बडी भक्ति के साथ की और उसके पश्चात्‌ अत्यन्त हर्ष से अपने 
द्वारा प्रतिष्ठित शिव की पूजा की । तब देवताओं ने राम पर पुष्पन्वृष्ठि की और सभी 
वानर आनन्द से प्रफुल्लित हो उठे । तब विभीषण ने राम से कहा--हे जगदीण, आप 
ऐसी कोई व्यवस्था कीजिए कि इस सेतुनमार्ग से कोई लका में न आ सके ॥ 

१६३. श्रीराम का सेतु की महिमा वताना 
श्रीराम ने तव बडे हुँ से उस विभीषण को देखकर कहा--ऐसा ही होगा ।' 
भ£ 


8६4 रंगनांथ ए/यीायएण 


फिर, वे सेतु पर कुछ कदम आगे चले और उस पर खडे होकर अपने अनुज के हाथ का 
घनुष अपने हाथ में लिया और उसकी नोक से उस सेतु पर एक रेखा खीचकर उसे इस 
प्रकार काट दिया कि कपियो के द्वारा निर्मित उस सेतु के सभी जोड दूट गये । उसके 
पदचात्‌ वें वोले--जो व्यक्ति इस स्थान पर स्तान करेगा, उसके परस्त्रीगमन, ब्रह्महत्या, गुरु- 
द्रोह, गो-वव, सुरापान, वेद-दूषण, पर-वित्तापहरण, सहोदरी रति, स्त्री-हत्या, चोरों की 
मित्रता, गृह-दाह, मास-भक्षण आदि कार्यो के द्वारा उत्पन्न समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे, पुण्य की प्राप्ति 
होगी, और उसे चिरायु, आरोग्य, पर-हितवुद्धि, सौभाग्य एव शाइवत कीत्ति प्राप्त होगी ।' 


इसके पदचात्‌ राघव बडे हर्ष से पृष्पक पर आरूढ हुए । यह पृष्पक देवताओं के 
आशीर्वाद तथा वानरो की प्रशसा प्राप्त करते हुए पूर्ववत्‌ आकाझन-मार्ग में बड़े वेग से जाने 
लगा । तव मनुकुलेश्वर भूमि सुता को देखकर बोलें--हे विधुवदनी, इसी स्थान पर 
विभीषण हम से मिला था। यही पर मेने कुश-शब्या पर शयन किया था ! यही पर मेने 
एकान्त-सेवा की और ब्रह्मास्त्र को चढाकर समुद्र पर चलाने का उपक्रम किया, तो नदियों 
के साथ समुद्र ने आकर इसी स्थान पर मुझे प्रणाम किया था । हे कमलमुखी, यहाँ पर 
मेने अनुपम विक्रम एवं शान्ति से वाण का सधान करके वालि का वध किया था । वहाँ 
देखो, प्रचुर वरो और फलो से युक्त किष्किन्धापुरी है, जो सुग्रीव की राजधानी हैँ । 


तव चचल नेत्रवाली जानकी ने रामचन्द्र से कहा--हे नाथ, मेंरी इच्छा है कि 
सुग्रीव की पत्नियों को भी अपने साथ अयोध्या ले चलू' | तब राम ने पुष्पक को वहाँ 
रोक दिया । राम की आज्ञा से सुग्रीव आकाश-मार्ग से जाकर तारा आदि अपनी पत्नियों 
को ले आया । वे बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम करके पुष्पक विमान में बैठ गईं । 
फिर, पुष्पक पूर्ववत्‌ चलने लगा । ऋष्यमूक पर्वत के त्तिकट पहुँचते ही रघुराम ने जानकी 
को देखकर कहा--यही ऋष्यमृक पवेत मेरे वानर-मित्रों का निवास हुँ । इसी पर्वत पर 
मंने सभी रहस्यो को जानकर सुत्रीव से मित्रता की थी । यही वह पपा सरोवर है, 
जो सदा रवि-किरणों से विकसित कमलो से दीप्तिमान्‌ रहता है । हें सीते, तुम्हारे वियोग 
से तप्त में इस पुण्य सरोवर के मृदुल तटो पर“जब अपार दुख का अनुभव कर रहा था, 
तब पुण्यात्मा पवनकुमार हमसे मिला और मेरे हृदय-कमल को शान्ति पहुँचाकर सुग्रीव 
से हमारी भेंट कराई। वहाँ देखो, उस वन के मध्य शबरी का आश्रम सुशोभित हो रहा है । 
यही पर मेने कुंद्ध होकर घोर युद्धकौशल दिखाया था और महा वलशाली कबघ का 
वब किया था । इसी स्थान पर उचन्नतात्मा जटायु का स्वर्गंवास हुआ । तुम्हें ले जानेवाले 
नीच रावण को उसने रोका था और उसके साथ युद्ध करके यही पर आहत होकर गिरा था । 
वहाँ भाड़ियों एव वनो से आकार्ण प्रदेश ही जनस्थान! कहलाता हैं। वहाँ देखो, 
उसी स्थान पर सौमित्र ने शूर्पणखा के तलाक-कान काठे थे । यहाँ देखो, इस स्थान पर मद- 
मत्त हो हम पर आक्रमण करने आये हुए खर-दृषण आदि राक्षसों का सहार हुआ था । 
यहाँ पर मायामृग के रूप में मारीच ने मुझे तग किया था और यहाँ पर उसकी मृत्यु हुई । 
यही पंचवटी है । लो, यही वह पर्णशाला है, जहाँ से रावण मायारूप घरकर तुम्हें 
चुरा ले गया था | वहाँ देखो, वही सुतीक्ष्ण मुनि का आश्रम है और उससे थोडी दूर पर 


खुद्धकांड 8६७ 


दीखने वाला आश्रम अगस्त्य का है। वहाँ शरभग मुनि का आश्रम है और वह देखो महामुनि 
अत्रि का आश्रम दीख रहा है । वही पर सती अनसूया ने तुम्हें प्रेम से अगराग प्रदान 
किया था । वही चित्रकूट पर्वत है, जहाँ भरत ने मुझसे (घर लौटने की) प्रार्थना की थी। 
वहाँ देखो, अनतिदूर विमल काननो के मध्य यमुना सुशोभित हो रही है। वहाँ देखो, अनेक दिव्य 
मुनि जिसकी सेवा करते हे, ऐसी विमल तरगावली से युक्त गगा नदी प्रवाहित हो रही हैं। उसके 
किनारे अनेक उद्यानों से परिपूर्ण श्गबेरपुर विलसित हो रहा है । वही वह सुन्दर स्थान है, जहाँ 
गृह बडी भक्ति के साथ हमसे मिला था । वह देखों, वही' सरयू नदी है, जिसके तट पर 
अनेक यूप-काष्ठ विलसित है । हे कमलाक्षी, विशाल पुण्य-राशि अयोध्या वहाँ दीख रही हैं, 
उसे प्रणाम करो ।' इस प्रकार, जब राम ने सीता को सकेत से अयोध्या दिखाई, तब बड़े 
कुतूहल से वानर एवं राक्षस उचक-उचककर उस सुन्दर नगर को देखने लगे, जो असरूय 
रत्ती, स्वर्ण-पौधो, असरूष तोरणो, ध्वजाओ तथा बहुत-से गज, अश्व, रथ, पदाति-सेना से 
युक्त हो अपार वैभव से विलसित होते हुए अमरावती के समान दीख रहा था । 


१६४ मरेद्वाज मुनि का आतिश्य 


चौदह वर्ष की समाप्ति के पदचात्‌ शुक्ल पचमी (पंचम) के शुभ दिन में राम 
अविरत तेजस्वी भरद्वाज मूनि के आश्रम के निकट उतरे । वे पुष्पक को आकाश में ठहरा- 
कर आप आश्रम में गये और उस मुनि के चरण-कमलो में अपना मस्तक भुकाकर प्रणाम 
किया और बडे हर्ष से मुनि के आशीर्वाद प्राप्त किये । उसके पश्चात्‌ उन्होने अत्यन्त 
विनय के साथ कहा--हे अनघ, बहुत समय से मुझभे आपका कुशल-समाचार ज्ञात नहीं 
हुआ था । वनवास में रहते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है। आप को, कद, मूल, फल, 
जल आदि उपलब्ध होने में कोई कष्ट तो नहीं होता ” आप की तपस्या विना विध्न- 
बाधा के सतत चल रही है न ?' 

राम के विनयपूर्ण वचनों को सुनकर मूनि अत्यन्त प्रसन्न हुए । वे बोले-- 
है निखिल लोकाराध्य, जब तुम स्वय यहाँ जन्म लेकर बडी निष्ठा से समस्त लोको का पालन 
करते हो, तब भला, कही किसी को कष्ट या कोई दुख हो सकता है ? पुण्य-कर्म करने- 
वालो को कही कोई विघ्न-वाधा हो सकती है ? हे सत्यनिष्ठ, तुम्हारे प्रसाद से हम अत्यत 
सुखी हो सभी धर्म-का् सपन्न करते, वेद-विहितअनुष्ठान का आचरण करते हुए तपस्या 
करते हे | वनवास के लिए जाते समय तुम यहाँ आये थे । यहाँ से जाने के दिन से फिर 
आज लौटकर आने तक तुम्हारा सारा वृत्तात मैने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया हूँ | 
तुम्हारे किये हुए अद्भुत कार्य देवताओं के लिए भी असमभव है । पुम्हारे वन जानें 
के दिन से ही समस्त सुख-भोगो का त्याग कर घन जटा-भार एवं वल्कल धारग किये हुए, 
भरत अत्यन्त भक्ति से तुम्हारी पादुकाओ पर समस्त राज्य-भार डालकर राज्य जता रहा हू। 
आइचयेजनक श्रद्धा से वह तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा कर रहा होगा । अपन अनुज का 
श्रद्धा का विचार करके तुम्हें वहाँ शीघ्र पहुँच जाना चाहिए | किन्तु हूँ अनघ, तुम वनवान 
से थके हुए आये हो, अत आज तुम हमारे आश्रम में विश्लाम करो । काल प्रात काल ही 
हम से विदा लेकर यहाँ से जाना । में प्रीतिमोज की व्यवस्था कर्ता है । 


क््द ८८/३२८८/८८८ 


9. 


इतना कहकर मुनि ने अपने श्रेप्ठ तप की महिमा से राम को चकित करते हुए 
कामधेनू का स्मरण किया । तुरन्त उस कामधेनु ने स्वच्छ कान्ति से चमकता हुआ, भात, 
फल, घृत, दाल, विविध मिष्ठान्न, मधुर गाक, शक्कर, दधि, परमान्न, ऑऔँटाया हुआ दूध, 
मधु, शिखरन, शरबत, चटनी, पेवस, वरी, सुगधित जल और स्वादिप्ट अचार आदि का 
प्रबन्ध कर दिया । तब राम ने वानर तथा दैत्य-नायकों के साथ बडी भक्ति एब प्रीति से 
भोजन किया । तदनतर भरद्वाज ने राम से कहा--हे सुगृणाभिराम, हें कल्याणगृणधाम, 
म॑ तुम्हें कोई वर देवा चाहता हूँ | तुम अपनी इच्छा से माँग लो ।” तव राम ने हाथ 
जोडकर कहा--हें मुनीश्वर, आप कृपा करके ऐसा वर प्रदान कीजिए कि साकंत नगरी 
के चारो ओर तीन योजन तक की भूमि वर्ष भर शस्य-श्यामल बनी रहे और वहां के वृक्ष 
सदा फूनते-फनते रहें । इसके सिवा में और कोई वर नही चाहता । मुनि ने ऐसा ही 
वर देने की कृपा की । वानस्-त्रीर मुनि के दर्जन करके हर्ष से प्रफुल्लित होकर अपने को 
कृतार्थ मानने लगे । 

तव रघुपति अनिलकुमार को देखकर वोलें--हे मारुति, तुम अपनी अनुपम शवित 
से गोप्र श्गवेरपुर जाकर पुण्पात्मा गुह से मिलो और हमारे आगमन की सूचना उसे दो। 
उम्र पुण्यात्मा से मार्ग जानकर नदीग्राम पहुँचकर हमारे अनुज शुभब्रती, दयालु तथा 
उन्नवात्मा भरत को हमारे आगमन का समाचार देकर ज्ञीत्र लौट आओ ॥ 


तब हनुमान्‌ ने मानव-रूप धारण कर बडे बेंग से गगानदी को प्रार किया, और 
शगवेरपुर में पहुँचा । वहाँ परहितात्मा परमेश्वर के आगमन का समाचार न जानने के 
कारण गृह मन-ही-मन सोचने लगा>-मैं अपने प्रभु राजाराम के चरण-कमलो की सेवा 
करते हुए उनके साथ वन में नही जा सका। पता नही, वें वहाँ कैसे रहते हे और कहाँ हे ! 
कदाचित्‌ वे सिंह, भेरुण्ड, राक्षस, अग्नि, भुजग, विष आदि से पीडित हो कही 
नष्ट तो नहीं हो गये । अन्यथा, (चौदह वर्ष की) अवधि समाप्त होने के पहचात्‌ भी 
स्घुसम लौटकर क्यो नही आये । राम अपने वचन तोडनेवाले नहीं है। मुझमे भूल हो गई 
में अभी अग्नि में ग्रवेश करके राम को प्राप्त करूँगा ।! ऐसा निरचय करने के 
पदचात्‌ उसने चिता सजाई जौर उसमें अग्नि को प्रज्वलित किया । फिर बढ़ी भ्रक्ति से 
वह अपने अनुज, पुत्र एवं स्त्री को साथ लिये हुए अपने मन में राम को धारण किये हुए 
उस अग्नि में प्रवेश करने का उपक्रम करने लगा । 


रु 


उसी समय हनुमान्‌ ने उसका मार्ग रोककर कहा--अपने ब्रत का पालन करके 
प्रमु राम लौटकर आ रहे हूं | वे कल ही यहाँ पहुँचेंगे । यह असत्य मही है । तुम अग्नि- 
प्रवेश कसे, तो राम के चरणों की सौगन्ध है । राम के आगमन का समाचार सुनकर 
अपने अनुचरो के साथ गृह अत्यन्त हर्षपित हुआ और पवन-पुत्र को प्रणाम किया। फिर, 
गृह से आदर-सत्कार प्राप्त करके हनुमान्‌ सरयू नदी को पार करके आगे बढा । नदीग्राम 
में पवित्रचरित्र भरत अपने मन में सोच रहे थे--पता नहीं, राम-लक्ष्मण तथा सीता 
कसी अवस्था में हे और कहाँ हे ”? चौदह वर्ष पूरे हो गये, फिर भी राम लौटे नहीं । 
में घोखें में पड गया | जिस प्रकार सुमित्रानदन, मुनिन्‍वृत्ति स्वीकार करके राम के चरण- 


चुद्धकांड 84९ 


कमलो की सेवा करते हुए गया, वैसे में भी उस दिन जा नहीं सका । राम से अलग हो, 
से क॑ंसे इस पृथ्वी पर जीवित रह सकता हूँ ? मेने उसी दिल प्रतिज्ञा की थी कि यदि 
चौदह वर्ष समाप्त होने के परचात्‌ भी रघुपति लौटने की कृपा नहीं करेंगे, तो में चिता 
में जलकर अपने प्राण त्याग दूंगा । क्‍या, मे उस प्रतिज्ञा को भूठी होने दूं। ऐसा निव्चय 
करके उन्होने अपने मत्रियों को बुलाकर कहा--में राम से मिलने के लिए अग्निश्रवेथ 
करके अपने प्राण त्यागूगा । तुम शत्रुओं का मद हरण करनेवाले, शौरय॑-सम्पन्न शत्रुघ्न का 
राजतिलक कर दो ।' तब झत्रुष्व ने भरत को देखकर कहा--हे राजनू, आपके न रहने 
पर मूझे यह राज्य किसलिए चाहिए ” यह शरीर किसलिए ? में भी आपके चरणो की 
सेवा करते हुए आपके साथ ही चलूँगा।' ऐसा दृढ़ निश्चय किये हुए उन्तको देखकर सभी 
लोग भयभीत हो गये ॥ 


१६५, हनुमान्‌ का भरत को राघवों का कुशल-समाचार सुनाना 


इसी समय अनिलकुमार अत्यन्त वेग के साथ वहाँ पहुँच गया और भरत को बहुत 
विनय से प्रणाम करके खडा रहा । तब भरत ने पूछा--तुम कौन हो ” तुम्हारा नाम 
क्या है ? तुम्हारे यहाँ आने का क्‍या कारण है ? तुम किस कुल के हो ? तुम कहाँ 
आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो ” तब अनिलपुत्र ने भरत से कहा--हैे देव, 
वानर हूँ और रघुराम का प्रिय दूत हूँ । सूर्य-कुल-कमल-भानु, उत्तमचरित्र राम 
अपने वनवास की अवधि समाप्त करके सौमित्र तथा जानकी के साथ वन में ठहरे हुए हूं 
उन्होंने आपका कुशल-समाचार जानकर यहाँ आने के लिए मुझे भेजा है, इसीलिए 
जाया हूँ । 

त्व भरत अत्यधिक हर्ष से पुलकित हो उठे और वोले--हे प्रुण्यवत्सल, हैं वानर- 
श्रेष्ठ, हे पवन कुमार, में तुम्हारा स्वागत करता हूँ । इसके परचात्‌ उन्होने उस वानर- 
श्रेष्ठ को हृदय से लगा लिया और उन्हें गज-मुक्ताओ तथा मणियो की मालाएं, कनकावर, 
श्रेष्ठ आभूषण, असख्य घन तथा नगर भेंट किये और कहा-- हमारे प्रभु राम के वनवास 
गये हुए बहुत समय व्यतीत हो गया है । वे कहाँ रहे ? कहाँ-कहाँ विषर हि अब वे 
कहाँ हे ? तुम राघव के प्रिय दूत हो, इसलिए हें अनघ, तुम सभी बातें विस्तार से कहो । 
में तुम्हारी बातो का विश्वास नही कर पा रहा हूँ । हे वानरश्रेष्ठ, क्या उनका आना नत्य है ” 

तब उस विमलात्मा ने हँसकर बडी भक्ति से कहा--/आपके पिता महाराज 
राम को राज्याधिकार से वचित करके उनके वनवास की आज्ञा दी, तो वें वडी भक्ति रे 
जटाएँ तथा वलकल घारण किये हुए जानकी तथा लक्ष्मण के साथ पैदल ह्टी वनवास के 
लिए रवाना हुए और बडे हो से श्रेष्ठ मुनियों की सगति में चित्रकूट पर्वत में चले से 
तव आपने राज्य-ग्रहण को अस्वीकार कर अपने अग्रज को लौटा लाने का मय पक 
उनके अस्वीकार करने पर आप वर्ड भक्ति के साथ उनकी पादुकाओं को ले आये जोर 
उनपर राज्य-भार डालकर राज-भोग त्याग कर तपस्वी के समान यहाँ रहने लग । हि 
राषव कुटिल दानवो से पूर्ण दण्डक-वन में पहुंचे । पहले वें शरमग मुनि के आश्रम मे प्तान 
और वहाँ मुनियो के प्रति होनेवाले राक्षसों के अत्याचारों को दूर करके, सात्वना दन के सशयात्‌ 


के ८५५ 


नक - न्यूड 


नये अं 


&90 रएनाथ एयायय 


आग वढे और जनस्थान में राक्षतराज की वहन शूर्पणखा की नाक और कान कादे । 
उसके वाद उन्होने खर, दूषण आदि चौदह सहख्र राक्षतों का सहार किया और वहाँ (पच- 
वटी में) पर्णशाला बनाकर रहने लगे । वहाँ रहते समय राक्षसराज रावण की प्रेरणा से 
मारीच नामक मायावी राक्षस सुन्दर स्वर्ण-मृग का रूप धारण किये हुए वहाँ दिखाई पडा | तव 
मृगतेत्री सीता ने उस मृग को देखकर राम से कहा--हे नाथ मुझे यह मृग बहुत प्रिय 
लग रहा है । आप इसे अवश्य ला दीजिए । राघवेब्वर ने चाप लेकर पीछा किया और 
निदान उसपर तीक्षण वाण चलाया, तो वह कुटिल राक्षस--हाय लक्ष्मण ! हाय लक्ष्मण ! 
कहकर आत्तंताद करते हुए गिर पडा । यह आर्तस्वर सुनकर साध्वी सीता ने भय से 
व्याकुल होकर लक्ष्मण को भेज दिया । तव मुनि-वेष घरकर रावण वहाँ आया और 
सीता को वलात्‌ उठाकर ले जाने लगा । तब जटायु ने इसे देखा । उसने रावण को 
रोका, तो रावण ने उप्तके साथ युद्ध करके उसे परास्त करके मार डाला । उसने समुद्र 
पार किया और लका के अपने उद्यान में सीता देवी को वंदिनी वनाकर रखा। जब रामचन्र 
मायामृग का वब करके कलान्त हो लौटने लगे, तब उन्होने मार्ग में लक्ष्मण को देखा । 
तुरन्त उन्होने व्याकुल हो लक्ष्मण से पूछा कि सीता को अकेली छोडकर यहाँ क्यो जाये ? 
दोनो भाई गीघ्न पर्णशाला में लौट आये । किन्तु वहाँ सीता को न देखकर वें अत्यन्त 
शोकाभिभूत हो गये। फिर, सीता की खोज करते हुए वे दोनो वनो में से होकर जाने लगे। 
मार्ग में उन्होंने रावण के वाहुबल से कटकर पृथ्वी पर गिरे हुए जटायु को देखा । -जटायु 
से उन्हें विदित हुआ कि दशकठ उसकी ऐसी दशा करके सीता को ले गया है। फिर, उस 
विहगेश की दाह-क्रिपा करके वे जगलो में भटकते हुए जाने लगे । ऋष्यमूक पर पहुँचकर 
उन्होने सुग्रीव से मित्रता की । राम ने सुग्रीव के लिए वालि का सहार किया और तारा 
के साथ वानर-राज्य सुग्रीव को प्रदान किया । सुग्रीव बड़े हर्ष से सीता के अन्वेषणार्थ दो 
लाख असमान बलगजाली तथा यशस्वी वानरो को प्रत्येक दिशा में भेजा । वानर दत्तचित्त 
हो सीता का अन्वेषण करने लगे, तो सपाति ने उन्हें बतलाया कि सीता लका में है । 
तुम चिन्ता मत करो । में जैसा कहता हूँ वैसा करो | में ने सपाति के परामर्श से सौ 
योजन समुद्र को पार करके अशोक-वन में शोक-सतप्त हो रहनेवाली वैदेही के दर्शन किये । 
उन्हें रामचन्द की मुद्रिका दी। उस देवी से चूडामणि प्राप्त की और उसे लाकर रामचन्द्र 
को दिया | तव राम अत्यन्त प्रसन्न हुए और फिर समस्त वानर-सेता के साथ वें लका 
पर आक्रमण करने के लिए चले, समुद्र पर सेतु को बाँधा, लंका पर आक्रमण किया और 
अपने प्रशंसनीय पराक्रम से लकेशवर का सहार किया और ससार का दुख दूर किया। फिर, 
उन्होने पुण्यात्मा विभीषण को लका का राजा बनाया और पतित्रात्मा ब्रह्मादि देवताओ से 
अनेक वर प्राप्त किये । तदनन्तर देवताबो के साथ आये हुए आपके पिता के चरणो में 
प्रणाम करके, अग्नि-मुख से पवित्र घोषित की हुई सीता को स्वीकार किया। फिर, उन्होने 
वानरो, राक्षसो, सुग्रीव, विभीषण, अगद आदि के साथ पुष्पक विमान पर आखरूढह हो 
लंका से प्रस्थान किया और सफल, विक्रम तथा यश से सुशोभित होते हुए भरद्वाज मुनि 
के आज्नम में पहुँचकर वहाँ ठहरे हुए हे । वे अवश्य ही कल यहाँ पषघारेंगे ।” 


खुद्धकांड 80९ 


भरत ने हनुमान्‌ की बातो से अत्यन्त हर्षित होकर, शत्रुघ्न से कहा--हे भत्रुष्न, 
तुम तुरन्त अयोध्या में जाकर सवंत्र मगलोत्सव की घोषणा करा दो । राज-सभा-भवन में 
राम के सेतु-बन्धत आदि के चित्र बनवाओ । देव-गृहो, भूदेव-गृहो (त्राह्मण-यूह) का 
अलकरण, तुम स्वयं अपने समक्ष कराओ, नगर-मार्ग को श्रेष्ठ तोरणो तथा ध्वजाओं 
सजाओ । युवतियों के द्वारा मोतियों से (घरो के आगे) चौक पुरवाओ, सभी घरो 
सुन्दर वस्तुएं वितरित कराओ । और, सभी नगर-वासियो को सुन्दर वस्व्राभूषणों 
सुसज्जित रहने का आदेश दो। श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार निकटवर्त्ती देशों 
राजाओ के पास भेजो और गजन-तुरगों की विपुल ध्वनि किये विना चतुरगिणी सेना तथा 
मंत्रियों को साथ लेकर माताओ की सेवा में तुम शीघ्र यहाँ लौट आओ. ।' 

भरत का आदेश प्राप्त करके अनघ शत्रुघ्न अत्यन्त वेंग से अयोध्या में गये और बडे 
उल्लास के साथ राघव के आगमन का शुभ समाचार अपने सभी वधु-जनों को सुनाया, 
कौशल्या से कहा, कैकेयी से कहा और फिर सुमित्रा को कह सुनाया। फिर, उन्होंने भरत 
के आदेशानुसार नगर को सजवाया और अकलक रीति से अन्त पुरो का अलकरण कराया, 
चन्दन एवं कर्पर से सुगन्धित जल आँगनो में छिडकवाया और नगर-वीधियों में नव-रत्व- 
तोरण बँधवाये । तब महात्मा वसिष्ठ आदि मुनि, पुरोहित, मुनि-पत्नियाँ, माताएँ, वन्धु-जन, 
मत्री, मित्र, स्त्रियाँ, नगर-निवासी तथा वृद्ध-जन, कुछ रथो में, कुछ पालकियो में, कुछ 
अदवो पर, कुछ गजो पर आरूढ हो चल पड़े । शत्रुष्त पच महावाद्यों के रव के साथ 
सभी को साथ लेकर भरत की सेवा में पहुँच गये । 


१६६. मरत-मिलाप 


भरत अपनी माताओं, अनुज तथा सेना के साथ राम की अगवानी करने के लिए, 
अत्यधिक उल्लास से चले । तब हनुमान्‌ ने भरत से कहा--हे अनघ, वह देखिए । राघव 
भरद्वाज मुनि के आश्रम से आ रहे है । वही पुष्पक हैं । वहाँ देखिए, वे ही राम हैं । 
वही कपि-सेना है । वह सुनिए, वानरो के सरयू नदी को पार करने की ध्वनि सुनाई 
पड रही है ।' भरत विमान को देखकर फूले नहीं समाये और जहाँ उस पुष्पक को देखा, 
उसी स्थान पर वह बडी भक्ति से भाई को साष्टाग श्रणाम किया। फिर, उदयाद्रि पर 
प्रकाशमान होनेवाले उदयोन्मुख सूर्य की भाँति अपनी श्रभा को द्सो दिशाओं में विकीण 
करते हुए पुष्पक पर आरूढ, पृण्यात्मा रघुराम के निकट पहुँचकर उन्हें प्रणाम किया | क 

तब राम ने पुष्पक को पृथ्वी पर उतारा और लक्ष्मण के साथ बडे हर्ष से "एक 
करके अपनी माताओं को प्रणाम किया । माताओ ने आश्षीवरदि देकर उन्हें हृदय मे लगाया। 
उसके पदचात्‌ भरत एवं झत्रुष्न ने बडी भवित से राम, सीता तथा लक्ष्मण को प्रणाम किया। 
राम ने उन्हें हृदय से लगाकर आशीर्वाद दिया। फिर, सीता ने बडी प्रीति एव किक ग 
अपनी सासो को प्रणाम किया, तो उन्होंने अलगन्अलग उन्हें हृदय से लगाकर बाशीवद 
दिये । राम-लक्ष्मण ने वडी भवित से मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को प्रणाम किया, तो हा उस ते ने 
उन राजपुत्रों को आशीर्वाद देकर बडे स्नेह से उनका आलिंगन किया। भरत ६ पा 
संतुष्ट हृदयो से अपनी माताओ को प्रणाम किया और राम के पीछे भवितन्युकत हो रा 


कर व न खा 


09 रंगनाथ रामायर 


वालि-पुत्र अगद है । (उस पवन-पुत्र को देखो) उस पुण्यात्मा ने समुद्र को पार करके सीता का 
पता लगाया, सहज ही सेतु को वंबवाकर राम को लका में ले गया और युद्ध में गिरे हुए 
लक्ष्मण के लिए ओपधियो को लाकर उन्हें प्राण-प्रदान किया ॥' 

पुरजनो के ऐसे वार्त्तालापों के वीच सूर्यवशज रामचन्द्र ने अन्त पुर में प्रवेश किया । 
फिर, उन्होने भरत-अत्रुघध्न को बुलाकर उन्हें देत्यराज तथा वानर-तायको के ठहरने 
के लिए बावब्यक प्रवन्ध करने का आदेश दिया और उन्हें विविध स्वादिप्ट भोजन आदि 
भिजवाये । इसके पब्चात्‌ भरत ने सुग्रीव से कहा--हे अनघ, हमने कल सूर्यवश-मणि रामचन्द्र 
के राजतिनक करने का ग्रवन्व किया है । इसके लिए हमें चारो समुद्र का जल तथा गगा आदि 
तीथों के जल चाहिए। उनको मंँगवाने का प्रवन्ध करो । सूर्य-पुत्र ने परम हर्ष से गज, सुषेण, 
जाववानू और शीक्रगामी वेगदर्णी को बुलाकर उन्हें सुन्दर रत्न-कलञ देकर तीर्थों का जल 
लाने के लिए भेजा । फिर नल, गवाक्ष, वायुपुत्र तथा ऋषभ को समुद्र का जल लाने के लिए 
भेजा । तव वानर-बीर अत्यन्त वेग से गये और दूसरे ही दिन प्रात.काल तक आवश्यक तीर्थों 
के जल आदि ले आये । यह देखकर सब लोग आइचर्यंचकित रह गये । 

१६८ राजतिरुक 

भरत ने निर्मेलचेता एव सदाचार-सम्पन्न वसिप्ठ, गौतम, जावालि, कश्यप, कण्व, 
वामदेव आदि मुनोब्वरों को तथा चतुर्वेद-पारंगत विवुधो को बुलाकर विनय एवं भक्ति के 
साथ उनसे कहा--आप कृपया विधिवत्‌ श्रीराम का राजतिलक कीजिए । तब वें मगल- 
वाद्यो की ध्वनि के साथ जानकी तथा राम को वुला लाये और रमणीय रत्त-पीठ पर उन दोनो 
को आसीन किया और बवेदमत्र-पूर्वक पुण्य-सलिल से उनका अभिषेक किया । राम के सिर पर 
से गिरनेवाली पूर्ण जल की घारा देखने में बहुत ही रमणीय प्रतीत होती थी । देवताओो की 
स्तुतियों को प्राप्त करते हुए, पार्वती के साथ विलसित होनेवाले परमशिव की जटा से भरें- 
वाली गगानदी की भाँति वह जल-घारा अत्यन्त कमनीय दीख रही थी । वह जल-घारा क्रमश 
उनके चरणों से होकर पृथ्वी पर ऐसे गिरने लगी, मानो विष्णु के चरणों से जन्म लेकर 
पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतर रही हो । इस प्रकार, उस समय रामचन्द्र स्वयं विष्णु तथा शिव 
की भाँति जोमायमान हुए । राज्याभिषिक्त राम उस समय अपने ललाट पर वंधे राजपट्ट के साथ, 
देखनेवालो को शिव की भाँति दीख रहे थे और ललाट पर बँघा हुआ पढ्ट, ऐसा दीखता था 
मानों शिव की जठाओ में स्थित हो, अपनी सरस कान्ति से जटाओ को आलोकित करनेवाली 
शशिरेखा हो गगा की लहरो के घकके से फिसलकर ललाट पर आ गईं हो । उस समय 
गरुड, खेचर, गवर्व, सूर, सिद्ध तथा साध्य, आकाशण से अत्यन्त उत्साह से जय-निनाद करने 
लगे । जप्सराएँ नृत्य करने लगी | उस शुभ घडी में इन्द्र ने अनिल के द्वारा बडे प्रेम से राम 
के पास पारिजात पुष्पो की माला तथा मोती के हार मेजे । राघव ने बड़े आदर के साथ 
उन्हें घारण किया । उस महान्‌ उत्सव के समय, पृथ्वी अस्यश्यामला हो गईं, वृक्ष पुष्पो एवं 
फलो से लद गये, पुप्पो में अद्वितीय सुगध आ गईं और दिशाएं निर्मेल हो गईं । 

तब रघुराम ने भूसुरों तथा महात्माजों को अनुपम भक्ति-युक्‍त हृदय से त्तीस करोड 
मुद्राएं, एक लाख अच्च, एक लाख गज तथा एक लाख गायें दान दी, सुग्रीव को प्रिय वचनो से 


खद्धकांड 54 


अपने निकट बुलाकर उसे ललित दिव्यावर आभूषण तथा स्वर्ण-कुसुमो की माला दी, अगद को 
अमूल्य रत्न-जटित स्वर्ण-अगद (केयूर) दिये, प्रुण्यात्मा विभीषण को अमूल्य केयूर एवं मुकुट 
दिये । नील को लोल कान्तियो से विलसित नील मणियों का और नल को नव-रतनों 
का सुन्दर हार दिया । उसके परुचात्‌ प्रसन्नचित्त हो राम भूपाल नें सभी वानरो को देख-देख- 
कर, एक को भी छोडे विना, सबको दिव्य वस्त्र तथा आभूषण दिये। फिर, उन्होनें सीता को 
शरच्चन्द्र से भी' उज्ज्वल कान्तियुक्त मणिमय हार दिया । किन्तु सीता ने उसे पहना नहीं, 
किन्तु वह उस उपहार को हाथ में लिये साभिप्राय दृष्टि से रामचन्द्र के मुख की ओर देखने 
लगी । उनकी दृष्टि का अभिप्राय समककर चतुर राम ने अनुमति दी, तो उन्होने अपने 
कृपा-रस से सीचतें हुए उस हार को हनुमान्‌ के कठ में पहना दिया । उस पवित्र हार को 
धारण कर वह पुण्यात्मा पवन-पुत्र, शरत्काल के वादलो से घिरे हुए मेरू पर्वत की भाँति 
सुशोभित होने लगा । (2; 

उसके पदचात्‌ वसिष्ठ की आज्ञा से राम अन्त पुर में गये और क्रमश अपनी सभी 
माताओं को प्रणाम किया । सभी' माताओ ने बडे स्नेह से उन्हें आशीर्वाद दिये | सीता ने भी 
अपनी सासो को बडी भक्ति से प्रणाम किया । तब उन्होनें सीता को हृदय से लगाकर 
आशीर्वाद दिया--तुम लक्ष्मी के सदृश, सरस्वती की भाँति, पार्वती के समान पति-भक्ति, 
सुमति, सौभाग्य, तेज एवं अतुल कीत्ति से सम्पन्न होती हुई, सूर्य-चन्द्र के समान तेजस्त्री पुत्रो 
की माता बनो ।* 

१६९, मित्रों को प्रीतिमोज देना 


उसके परचात्‌ रघुकुलाधिप बडे उल्लास से भोजनालय में गये । उन्होने मित्रो, 
बधुओ, अनुजो तथा रवि-पुत्र आदि वानरो, विभीषण आदि दैत्य-बीरो एवं पवित्रात्मा गृह 
आदि लोगो को बडे स्नेह से बुलवा भेजा और उन्हें उचित आसनो पर विठाया । बडे स्नेह 
से सच्चरित्र हनुमान को अपने साथ बैठकर भोजन करने के लिए कहा । (जब सव लोग 
उचित आसनो पर उपस्थित हुए), सुन्दरियों ने प्रत्येक के आगे सोने के थाले लगाये ओर 
पायस, भात, दाल, मिष्ठान्न, वढिया सूखा शाक, विविध स्वादिष्ट गाक, कई प्रकार की चटनियाँ 
शिखरन, मँंचार, ताजा घी और मीठे फल आदि परोसे । तब सूर्यवशाधीक् ने दुगुनी प्रीति 
से हनुमान्‌ से कहा--हे अनिलकुमार, भोजन प्रारम करो ।” इतना कहकर उन्होने स्वयं एक 
कोर ग्रहण किया । तब हनुमान्‌ ने अत्यन्त भक्ति से उस थाल को, जिसमें रामचन्द्र ने भोजन 
प्रारभ किया था, उठाकर अपने सिर पर रख लिया और आनदातिरेंक से नृत्य करते हुए 
फहने लगा-- हे वानरो, आओ । राम के थाल का प्रसाद प्रचुर मात्रा में हम सव को मिल 
गया है ।' यो कहते हुए उसने सामने के अगस्त्य वृक्ष पर चढ़कर उसके पत्तें तोड लिये और 
उन पत्तों में उस प्रसाद को रखकर बडी भक्ति से सभी वानर-वीरों को बांदा । वे भी उस 
प्रसाद को ग्रहण करके अत्यन्त सतुष्ट हुए । यही कारण है कि उस दिन से अगस्त्य वृक्ष के पर्ण 
एकादशी (पारण) के लिए बहुत ही मुख्य माने जाते है । है 

रघुराम नें, अजना-सुत (हनुमान) की भक्त से अत्यन्त नतुष्ट हो, दूसरा थाल मंगवा- 
कर भोजन तथा जल ग्रहण किया । तदनतर उन्होने सुगध-युप्पो की मालाओं से सब लोगो का 


894 एंगनायथ एयशस्‍वग 


बलकार किया और कर्पूर, ताबूल, चन्दन आदि सब को बाँट दिये । फिर, अत्त्यन्त प्रसन्नता 
एवं प्रीति से सकल भृत्य एवं अमार्त्यों के साथ राजसभा में बैठे । 

उसी समय निद्रा देवी सौमित्र को अपने वेश्ञ कर लेने का उपक्रम करने लगी । सभा में 
राम के समक्ष बैठे हुए लक्ष्मण यह देखकर जोर से हंसने लगे ।' तब राम, सीता, विभीषण, 
सुग्रीव, हतुमान्‌ अगद, नल, नील, घरभ, सन्नाद, त्तार आदि वावर तथा झनत्रुध्त, भरत आदि ने 
अपने-अपने कलक की वात सोचकर अपने सिर भूका लिये । तब राम ने सब की यह दशा देखकर 
अपने अनुज से कहा--हे लक्ष्मण, तुम अकारण ही क्यों हेसे ” इसका क्या अभिवप्राय है बताओं।' 

तब लक्ष्मण ने भयभीत हों हाथ जोडकर कहा--हें देव, जब में आपको सेंवा करते 
हुए वन में आपके साथ रहने लगा, तव निद्रा मुझ पर अपना प्रभाव डालने लगी | तैव मेने 
उससे कहा कि तुम चौदह वर्ष तक मेरे पास मत जाओ । मेरी वात मानकर वह चली गई । 
चौदह वर्ष समाप्त होते ही वह फिर लौटकर मेरे पास आईं। हें देव, यही सोचकर मे हँसा 
और यहीं मेरे हँसने का मूल कारण है । हे दयासमुद्र, में आपके चरणों की सौगध खाकर कहता हूं, 
इसके सिवा मेरे हँसने का और कोई कारण नहीं है / तव सब लोगों के मन की शंकाएँ 
दूर हुई और सभी प्रसन्न हुए । ह॒ 

करुणामूत्ति राम ने सव वानरों को देखकर कहा--सभी कार्यों में सदा किसी भी धर्म 
की अपेक्षा किये विना, उनका आचरण करते रहो |” इतना कहकर उन्होने उन्हें वडे आदर से कई 
प्रकार के उपदेश देकर प्रिय बचनो से जानें की अनुमति दी । उसके पदचात्‌ उन्होने 
अनिलकुमार, सुत्रीव आदि प्रमुख वानरो को तथा विभीषण को विदा किया । सुग्रीव आदि 
वानर प्रसन्नचित्त हो किप्किवा लौट गये । विभीषण भी राक्षसों के साथ बडे उत्साह से लका 
लौट गया । 

राम ने मनस्वी सौमित्र एवं भरत को युवराज बनाया और विशाल राज-वैभव का 
अनुभव करते हुए, सीता के साथ समस्त सुखो को भोगते हुए राज्य करने लगे । वें अपने 
पूर्वजों की अपेला अधिक वेद-विहित बर्मों का आचरण करते हुए, कई प्रकार के अनुष्ठान 
बादि करते थे । उन्होने अशवमेव तथा वाजपेय आदि कई श्रेष्ठ यज्ञ करते-हुए, देवता और 
भूसुरों की रक्षा करते हुए परिपूर्ण रूप से घर्मनिप्ठ हो, ग्यारह सहस्न वर्ष तक पृथ्वी का पालन 
किया । उनके राज्य में प्रजा को कोई दुःख नहीं था, अकाल और पाप कही नहीं था, सत्य 
तथा धर्म नप्ट नहीं होते थे और सभी जन परहित-रत थे । ॥॒ 

इस प्रकार, आन्त्र-भाषा का सम्राटू, काव्य, आगम आदि के प्रणसनीय ज्ञाता, आचार- 
वानू, अपार वधैब-सपन्न, भूलोक-निधि, गोनवुद्ध भूपाल ने सुन्दर गुणों से सम्पन्न, वैर्यवान्‌, 
गत्रुओं के लिए भयकर, महात्मा, महान्‌ दयालु तथा ललित सदुगुणालकार अपने पिता विद्वुल- 
नरेंभ के नाम पर, अनुपम तथा ललित छब्द एवं अर्थ से सम्पन्न, रामायण के इस युद्धकाड 
की, श्रेप्ठ अलंकार एवं सुन्दर भावों से परिपूर्ण ववाकर, इस प्रकार रचना की, कि वह इस ससार 
में आचन्द्रा्क अत्यन्त पूजनीय हो, गोभमायमान होता रहे । 

रसिक्जनों के लिए आनन्ददायक, इस प्रसिद्ध तथा आर्प आदि काव्य का पठन जो कोई करेगा, 

या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद आदि विविघ वेदो का आधार रामन्नाम-रूपी चिन्तामणि के 


रद्धकोंड 958 


द्वारा नव्य भोग, परोपकार-बुद्धि, उदात्त विचार, परिपूर्ण शक्ति, राज्य-सुख, निर्मल कीर्त्ति, नित्य सुख, 
धर्मनिष्ठा, दान-पुण्य में अनुरक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य तथा अपार ऐंड्वर्य प्राप्त होगे। उनके पापों 
का क्षय होगा, उन्हें श्रेष्ठ पुत्र लाभ होगा, उनके शझात्रु नष्ट होगे और उन्हें घन-बान्य की समृद्धि 
सुलभ होगी। उनका जीवन निर्विष्त रहेगा, घर में लावण्यवती स्त्रियो का अनुराग प्राप्त होगा। 
भाइयो की वृद्धि होगी तथा उनके साथ सुखमय सहजीवन का भाग्य मिलेगा । उनके 
घरो में सतत देव-पूजन तथा पितरो की तृप्ति होती रहेगी । यह रामायण मोक्ष-साधक, पाप- 
हारक, भव्य, दिव्य तथा शुभप्रद है । विधिवत्‌ इस रामायण की पूजा करने से पुण्य प्राप्त 
होगे । इसके रचय्रिताओ की श्रेष्ठ एवं शुभ उन्नति होगी तथा इन्द्र-लोक का निवास प्राप्त 
होगा । जबतक कुलपर्वत, समुद्र, सूर्य-चन्द्र, वेद, दिशाएँ, पृथ्वी तथा सभी भुवन सुशोभित 
रहेंगे, तततक यह कथा अक्षय आनन्द-समूह का आगार बनी रहेगी । 


ओं तत्सत्‌ ! 


परिषद के महत्त्वप्रर्ण प्रकाशन 


१, हिन्दी-साहित्य का आदिकाल--आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी | ३२५। 
२. यूरोपीय दर्शन--ल्व० महामहोपाध्याय रामावतार छर्मा। ३ २५। 
हर्षचरित : एक सांस्कृतिक अध्ययन--डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल । ६ ५० । 
४. विश्वधर्म-दश्शन--श्रीसाँवलियाविहारीलाल वर्मा । १३ ५० । 
४. सार्थवाह--डॉ० मोतीचन्द्र | १०० ऐतिहासिक चित्र | ११०० । 
६. वैज्ञानिक विकास की भारतीय परम्परा--डॉ० सत्यप्रकाश ८ ००। 
७, सब्तकवि दरिया: एक अनशीलन--डॉ० परमेन्द्र ब्रह्मचारी शास्त्री। १४००। 
८. काज्यमीमांसा ( राजशंखर-कृत )--अनुवादक स्व० १० केदारनाथ शर्मा । ६ ५०। 
६, श्रीरामावतार शर्मा-निवन्धावली--स्व० महामहोपाध्याय रामावतार शर्मा । ५ ७५। 
१० प्राडमौययं विहार--डॉ० देवसहाय त्रिवेद | ७२५। 
११ गुप्तकाल्ञीन स॒द्राएं--स्व० डॉ० अनन्त सदाशिव अलतेकर । ६ ५० । 
५२ भोजपुरी भाषा ओर साहित्य--डॉ० उदयनारायण तिवारी १३ ५४०। 
१३, राजकीय व्यय-प्रवन्ध के सिद्धांत--श्रीगोरखनाथ सिंह। १ ५० । 
१४७. रबर--श्रीफूलदेवसहाय वर्मा, एम्‌० एस-सी० | चित्र ६१। ७५०। 
१४, प्रह-नक्षत्र--भीत्रिवेणीप्रसाद सिंह, आइ० सी० एसू० | ४ २५। 
१६ नीहारिकाएं--डॉ० गोरखप्रसाद (प्रयाग-विश्वविद्यालय) । ४.२५। 
१७, हिन्दू धार्मिक कथाओ' के भोतिक अर्थ--पश्रीत्रिवेणीप्रसाद सिंह । ३ ०० । 
१८, इईख और चीनी--श्री फूलदेवसहाय वर्मा | चित्र १०४। १३५० । 
१६ शेवमत--मूल लेखक और अनुवादक डॉ० यदुवशी | ८ ००। 
२०, सध्यदेश : ए तिहासिक ओर सांस्कृतिक सिंहावलोकन--डॉ० धीरेन्ध वर्मा | कई 
रगीन मानचित्र, ऐतिहासिक महत्त्व के कलापूर्ण चित्र | ७ ००। 
२१-२२. प्राचीन हस्तलिखित पोधियो' का विवरण--( पहला और दूसरा खड )। 
स० डॉ० धर्मेन्द्र ब्रह्म चारी शास्त्री । प्रत्येक का मूल्य २.५० । 
२३--२६. शिवपूजन-रचनावली--आचार्य शिवपूजन सहाय (४ भाग ) | मूल्य त्रमण 
८प७५, ६००, १०.००, ८ ५० | 
२७. राजनीति झूोर दर्शन--डाँ० विद्वनाथप्रसाद वर्मा । १४ ०० । 
र८. बोद्धधर्म-दशेन--स्व० आचार्य नरेन्द्रदेव । पृष्ठ 5५०।॥ १७,००। 
२६-३०, मध्य एसिया का इतिहास--( दो खडो में ) महापडित राहुल साकृत्यायन ! प्रथम 
खण्ड १२२१५ द्वितीय खण्ड ८ ५० | 


३१, दोहाकोश--मूल कवि : वीद्धसिद्ध सरहपाद । छायानुवादका--महापण्डित राहुल 
साकृत्यायन । पृष्ठ ५५४८ । १३ २५॥ 


६० 


६२ 


के हैक 


5३. 


( खें ) 
, हिन्दी को मराठी संतो' की देच--आचार्य विनयमोहन शर्मा । ११.२५। 


, रामभक्ति-साहित्य में मधुर उपासना--डॉ० भुवनेश्वरनाथ मिश्र 'माघव' । १०.२५। 
, अध्यात्मयोग और चित्तविकलन--स्वर्गीय वेडूटेब्वर शमी । ७ ५०। 
, ग्राचीन भारत की सांग्रासिकता--परण्डित रामदीन पाण्डेय । ६.४० । 


. बाँसरी बज रही--श्रीजगदीण त्रिगुणायत | ८ ०० 


, चंतुदेशभाषा-निवन्धावल्ली--पृष्ठ १्घ४। ४ २५। 
, भारतीय कला को विहार की देत--डॉ० विन्ध्येब्वरीप्रसाद सिंह । पृष्ठ २१६। ७.५०। 


, भोजपुरी के कवि ओर काव्य--अ्रीदुर्गाशकरप्रसाद सिंह । स० डॉ० विश्वनाथ प्रसाद । 
पृष्ठ ३६६। ५७५। 


, पेट्रोलियम--श्रीफूलदेवसहाय वर्मा । चित्र ४०॥ ५ ५०। 


. नील-पंछी--(मूल-लेखक मारिस मेटरलिक) । अनु० डॉ० कामिल बुल्के । २५०। 


. लिंग्विस्टिक सर्वे आफू सानमूस एण्ड सिहमूस | ४ ५०। 


न घडदुशेन-रहस्य--प ० रगनाथ पाठक । ५ ००।॥ 


» जातक-कालीन भारतीय संस्कृति--श्रीमोहतलाल महतो 'वियोगी'। ६ ५०। 


, आकृत भाषाओ' का व्याकरणु--मूल-ले० श्रीरिचर्ड पिशल। अनु० डॉ० हेमचन्द्र 
जीशी | पृष्ठ १००४॥। २० ००। 


, दक्खिनी हिन्दी-काव्यधारा--म्रहापण्डित राहुल साकृत्यायन | ६ ००। 

. भारतीय प्रतीक-विद्या--डॉ० जनाद॑न मिश्र । पृष्ठ ६१२। ११ ००। 

, संतमत का सरमभंग-सम्प्रदाय--हॉ० धर्मेन्र ब्रह्मचारी शास्त्री । ५५० । 

. कृषिकोश (प्रथम खण्ड)--प ० डॉ० विश्वनाथ प्रसाद । ३.०० । 

. कुवरसिंह-अमरसिंह--जनु ० पं० छविनाथ पाण्डेय। ५००। 

- सुद्रण-क्ञा--स ० छविनाथ पाण्डेय |। ७ २५। 

. लोक-साहित्य : आकर-साहित्य-सूची--आचायें नलिनविलोचन शर्मा | ५० न० पै० । 
. लोककथा-कोश--आचार्य नलिवविलोचन हर्मा। ३ २न०पै०। 

. लोकगाथा-परिचय--आचार्य वलिनविलोचन झर्मा । २५ न० पै०। 

५4 
५६. 
शछ, 
श्ण, 
न््६, 


वोद्धधर्म और विहार--प० हवलदार त्रिपाठी 'सहृदय' । ७७ दुर्लभ चित्र | ८ ०० । 
साहित्य का इतिहास-दुशेच--आचार्य नलिनविलोचन शर्मा | ५ ००। 
मुहावरा-सीमाँसा--डाँ० ओमप्रकाश गुप्त । ६ ४० । 

वैदिक विज्ञान ओर सारतीय संस्कृति--म० म० पं ० ग्रिरिवर जर्मा चतुर्वेदी | ५.००। 
पंचदश लोकभाषा-निवन्धावल्ली ।४ ५०। 


.5१. प्राचीन हस्तलिखित पोधियो का विवरण (३-४ खण्ड )--स ० आचार्य 
नलिनविलोउन जर्मा। १२४५॥ १ ००। 


हिन्दी-साहित्य और विहार (विहार का साहित्यिक इतिहास; सातवीं शती से 
अठारहवीं शत्ती तक)--स्त० जाचाये शिवपूजन सहाय । ५ ५० । 


कथा-सरित्सागर--मूल-लेखक महाकवि सोमदेवभट्ट | अनु ० स्व० प० केदारनाथ शर्मा 
सारस्वत । ( प्रथम खण्ड, पष्ठ लम्बक तक ) पृष्ठ द४६ | १०.००॥ 


#*उपयु कत प्रत्येक सजिल्द पुस्तक पर तिरंगा नयनाभिरास आवरण हैं ।